जैव प्रक्रम
मनुष्य में पाचन
भोजन आहारनाल से इस क्रम में गुज़रता है: मुख, ग्रसनी, ग्रासनली (क्रमाकुंचन से भोजन आगे बढ़ता है), आमाशय, छोटी आँत, बड़ी आँत, गुदा। पाचन एंज़ाइमों द्वारा भोजन का रासायनिक विखंडन है: कार्बोहाइड्रेट से ग्लूकोस, प्रोटीन से अमीनो अम्ल, वसा से वसा अम्ल व ग्लिसरॉल।
| क्षेत्र / ग्रंथि | स्रावण | कार्य |
|---|---|---|
| मुख (लार ग्रंथि) | लार एमिलेस युक्त लार | मंड का शर्करा (माल्टोस) में विखंडन |
| आमाशय | जठर रस: HCl, पेप्सिन, श्लेष्मा | पेप्सिन प्रोटीन पचाता है; अम्ल माध्यम अम्लीय बनाकर जीवाणु मारता है; श्लेष्मा दीवार बचाता है |
| यकृत | पित्त रस | भोजन को क्षारीय बनाता है; वसा का पायसीकरण (एंज़ाइम नहीं) |
| अग्न्याशय | अग्न्याशयिक रस: ट्रिप्सिन, लाइपेज, एमिलेस | ट्रिप्सिन प्रोटीन, लाइपेज पायसीकृत वसा, एमिलेस मंड पचाते हैं |
| छोटी आँत | आंत्र रस | पाचन पूर्ण करता है; रसांकुर अवशोषण करते हैं |
| बड़ी आँत | उल्लेखनीय नहीं | जल अवशोषित; शेष मल रूप में बाहर |
छोटी आँत आहारनाल का सबसे लंबा भाग है और इसकी भीतरी दीवार पर अँगुली-जैसे रसांकुर होते हैं जो अवशोषण का क्षेत्रफल बढ़ाते हैं; प्रत्येक रसांकुर में रुधिर वाहिकाओं का जाल होता है। इसकी लंबाई आहार पर निर्भर है: सेल्युलोस पचाने वाले शाकाहारियों में यह माँसाहारियों से लंबी होती है।
श्वसन: भोजन से ऊर्जा मुक्त करना
श्वसन में ग्लूकोस से ऊर्जा मुक्त होती है। पहला चरण कोशिकाद्रव्य में है: ग्लूकोस (6-कार्बन) टूटकर पायरूवेट (3-कार्बन) बनता है। आगे का मार्ग ऑक्सीजन पर निर्भर है। ऑक्सीजन की उपस्थिति में (वायवीय, माइटोकॉन्ड्रिया में) पायरूवेट टूटकर CO₂, जल व बहुत ऊर्जा देता है। ऑक्सीजन के बिना (अवायवीय): यीस्ट में पायरूवेट से एथेनॉल + CO₂ + ऊर्जा (किण्वन); हमारी पेशियों में लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा बनता है, जिसके जमाव से ऐंठन होती है। वायवीय श्वसन अवायवीय से कहीं अधिक ऊर्जा देता है।
ऊर्जा ATP (कोशिका की ऊर्जा-मुद्रा) में संचित होती है: ADP + अकार्बनिक फॉस्फेट + ऊर्जा से ATP बनता है, और ATP के टूटकर ADP बनने पर ऊर्जा (लगभग 30.5 kJ/mol) मुक्त होती है, जो पेशी-संकुचन, प्रोटीन-संश्लेषण व तंत्रिका-आवेग के लिए काम आती है।
| प्रकार | स्थान | अंतिम उत्पाद |
|---|---|---|
| वायवीय | माइटोकॉन्ड्रिया (कोशिकाद्रव्य के बाद) | CO₂ + H₂O + ऊर्जा |
| यीस्ट में अवायवीय | कोशिकाद्रव्य | एथेनॉल + CO₂ + ऊर्जा |
| पेशी में अवायवीय | कोशिकाद्रव्य | लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा |
मनुष्य का वायुमार्ग है नासाद्वार, ग्रसनी, कंठ, श्वासनली (उपास्थि के छल्लों से खुली रहती है), श्वसनी, श्वसनिकाएँ और वायुकोष (एल्वियोलाई), जो पतली दीवार वाली गुब्बारे-जैसी थैलियाँ हैं जहाँ गैसों का विनिमय होता है। अंतःश्वसन में पसलियाँ ऊपर उठती हैं और डायाफ्राम चपटा होता है, जिससे वक्ष-गुहा बढ़कर वायु भीतर खिंचती है। लाल रुधिर कोशिकाओं का हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन ले जाता है; CO₂ जल में अधिक विलेय है और अधिकतर रुधिर में घुलकर जाती है। जलीय जंतु स्थलीय जंतुओं से तेज़ श्वास लेते हैं क्योंकि जल में घुली ऑक्सीजन वायु से बहुत कम होती है। पौधे रंध्रों (पत्तियाँ), वातरंध्रों (काष्ठीय तने) और जड़ की सतह से विसरण द्वारा गैस-विनिमय करते हैं।
मनुष्य और पौधों में परिवहन
मनुष्य का हृदय चार कक्षों वाला पेशीय अंग है: दो ऊपरी अलिंद और दो निचले निलय, जो पृथक् रहते हैं ताकि ऑक्सीजनित व अनॉक्सीजनित रुधिर न मिलें। रुधिर का मार्ग: शरीर, महाशिरा, दायाँ अलिंद, दायाँ निलय, फुफ्फुस धमनी, फेफड़े, फुफ्फुस शिरा, बायाँ अलिंद, बायाँ निलय, महाधमनी, शरीर। एक पूरे चक्कर में रुधिर हृदय से दो बार गुज़रता है, यही दोहरा परिसंचरण है। बाएँ निलय की दीवार सबसे मोटी होती है क्योंकि वह पूरे शरीर में रुधिर भेजता है। कपाट पश्चप्रवाह रोकते हैं। मछलियों में दो-कक्षीय हृदय (एकल परिसंचरण), उभयचरों व अधिकांश सरीसृपों में तीन-कक्षीय, पक्षियों व स्तनधारियों में चार-कक्षीय हृदय होता है।
| वाहिका / द्रव | विशेषता | वहन |
|---|---|---|
| धमनी | मोटी लचीली दीवार; कपाट नहीं | हृदय से दूर रुधिर (फुफ्फुस धमनी में अनॉक्सीजनित) |
| शिरा | पतली दीवार; कपाट | हृदय की ओर रुधिर (फुफ्फुस शिरा में ऑक्सीजनित) |
| केशिका | एक कोशिका मोटी; ऊतकों से विनिमय | धमनी को शिरा से जोड़ती है |
| प्लाज़्मा | रुधिर का तरल भाग | भोजन, CO₂, यूरिया, लवण, घुले रूप में |
| लसीका | रंगहीन, कम प्रोटीन | आँत से पचा वसा; ऊतक द्रव का निकास |
रक्तदाब स्फिग्मोमैनोमीटर से मापा जाता है। सामान्य वयस्क में प्रकुंचन (निलय संकुचन) दाब लगभग 120 mm Hg और अनुशिथिलन दाब लगभग 80 mm Hg होता है; दोनों का अंतर (नाड़ी दाब) 120 − 80 = 40 mm Hg है। प्लेटलेट्स कटने पर रुधिर का थक्का जमाने में सहायक हैं। पौधों में जाइलम (वाहिकाएँ व वाहिनिकाएँ, मृत कोशिकाएँ) जल व खनिज ऊपर ले जाता है, जो मुख्यतः वाष्पोत्सर्जन कर्षण (पत्तियों से जलवाष्प के निकलने से उत्पन्न चूषण) से चलता है; रात में मूल दाब सहायक है। फ्लोएम (चालनी नलिकाएँ व सहचर कोशिकाएँ, जीवित) बना हुआ भोजन दोनों दिशाओं में पहुँचाता है (स्थानांतरण) और इसमें ATP ऊर्जा लगती है।
मनुष्य और पौधों में उत्सर्जन
उत्सर्जन में हानिकारक उपापचयी अपशिष्ट बाहर निकलते हैं। मानव उत्सर्जन तंत्र में एक जोड़ी वृक्क, दो मूत्रवाहिनियाँ, मूत्राशय और मूत्रमार्ग होते हैं। वृक्क की क्रियात्मक इकाई नेफ्रॉन है: पतली दीवार वाली कोशिकाओं का गुच्छा केशिका-गुच्छ (ग्लोमेरुलस), प्यालेनुमा बोमन संपुट और एक लंबी नलिका। मूत्र का मार्ग है वृक्क, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय, मूत्रमार्ग।
- केशिका-गुच्छ में निस्पंदन: जल, ग्लूकोस, अमीनो अम्ल, लवण व यूरिया बोमन संपुट में आते हैं।
- नलिका में वरणात्मक पुनःअवशोषण: उपयोगी पदार्थ (ग्लूकोस, अमीनो अम्ल, लवण, बहुत-सा जल) रुधिर में लौटते हैं।
- शेष तरल, मूत्र, संग्राहक नलिका में जमा होकर मूत्रवाहिनी में जाता है; इसकी मात्रा इस पर निर्भर है कि कितना अतिरिक्त जल व कितना घुला अपशिष्ट (मुख्यतः यूरिया) निकालना है।
हल किया उदाहरण: वयस्क के वृक्क प्रतिदिन लगभग 180 लीटर निस्पंद बनाते हैं, पर मूत्र केवल 1 से 2 लीटर निकलता है। यदि 1.5 L मूत्र निकले तो पुनःअवशोषित मात्रा 180 − 1.5 = 178.5 L है। वृक्क विफल होने पर कृत्रिम वृक्क (हीमोडायलिसिस, अपोहन) रुधिर साफ़ करता है: रुधिर झिल्लियों के बीच बहता है जिन्हें ऐसे अपोहन द्रव में डुबोया जाता है जिसका परासरण दाब रुधिर के बराबर है पर नाइट्रोजनी अपशिष्ट नहीं हैं, अतः यूरिया बाहर विसरित हो जाता है।
पौधों में उत्सर्जन भिन्न है: ऑक्सीजन व CO₂ रंध्रों से, अतिरिक्त जल वाष्पोत्सर्जन से बाहर जाता है, और अन्य अपशिष्ट रसधानी में, पुराने जाइलम में (गोंद व रेज़िन के रूप में) संचित होते हैं या गिरती पत्तियों व छाल के साथ निकलते हैं; कुछ पौधे लैटेक्स देते हैं।
मुख्य बिंदु
- पौधे प्रकाश-संश्लेषण से भोजन बनाते हैं: 6CO₂ + 12H₂O → C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O; निकली ऑक्सीजन जल से आती है और CO₂ रंध्रों से प्रवेश करती है।
- पाचन: मुख मंड (एमिलेस), आमाशय प्रोटीन (पेप्सिन, HCl में), छोटी आँत तीनों खाद्य वर्ग पचाती है; पित्त रस एंज़ाइम नहीं, वह वसा का पायसीकरण करता है।
- ग्लूकोस कोशिकाद्रव्य में पायरूवेट बनता है; वायवीय श्वसन माइटोकॉन्ड्रिया में पूरा होता है, अवायवीय से एथेनॉल + CO₂ (यीस्ट) या लैक्टिक अम्ल (पेशी) बनता है। ATP ऊर्जा-मुद्रा है।
- चार-कक्षीय हृदय व दोहरा परिसंचरण: महाशिरा, दायाँ अलिंद, दायाँ निलय, फुफ्फुस धमनी, फेफड़े, फुफ्फुस शिरा, बायाँ अलिंद, बायाँ निलय, महाधमनी।
- जाइलम जल ऊपर ले जाता है (वाष्पोत्सर्जन कर्षण); फ्लोएम ATP से पका भोजन दोनों दिशाओं में ले जाता है। सामान्य रक्तदाब लगभग 120/80 mm Hg है।
- नेफ्रॉन निस्पंदन, वरणात्मक पुनःअवशोषण व मूत्र-निर्माण करता है; प्रतिदिन लगभग 180 L निस्पंद से 1 से 2 L मूत्र बनता है; हीमोडायलिसिस कृत्रिम वृक्क है।
अभ्यास प्रश्न (16)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
हरी पत्ती में प्रकाश-संश्लेषण के दौरान वायु में निकलने वाली ऑक्सीजन गैस किस पदार्थ के विघटन से प्राप्त होती है?
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उत्तर: A — जड़ों द्वारा अवशोषित जल
प्रकाश अभिक्रिया में जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में टूटता है, इसलिए निकली ऑक्सीजन जल से आती है। कार्बन डाइऑक्साइड भ्रामक उत्तर है क्योंकि यही ग्रहण की जाने वाली गैस है, पर उसका कार्बन व ऑक्सीजन ग्लूकोस में चले जाते हैं। ग्लूकोस व मंड उत्पाद हैं, स्रोत नहीं।कौन-सा जीव अपने पोषण के प्रकार से सही सुमेलित है?
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उत्तर: C — ब्रेड मोल्ड: मृतोपजीवी पोषण
ब्रेड मोल्ड कवक है जो मृत व सड़ते पदार्थ से पोषण लेता है, यह मृतोपजीवी पोषण है। अमीबा प्राणिसमभोजी है (भोजन को घेरता है), अमरबेल जीवित पोषी पर परजीवी है और फीताकृमि विषमपोषी परजीवी है। अमरबेल वाला जोड़ा भ्रामक है क्योंकि प्राणिसमभोजी और परजीवी अक्सर आपस में बदल दिए जाते हैं।प्रकाश-संश्लेषण के संतुलित समीकरण 6CO₂ + 12H₂O → C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O के अनुसार 3 ग्लूकोस अणु बनाने के लिए कितने कार्बन डाइऑक्साइड अणु चाहिए?
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उत्तर: B — 18
एक ग्लूकोस अणु के लिए 6 CO₂ अणु चाहिए, अतः 3 ग्लूकोस अणुओं के लिए 3 × 6 = 18 CO₂ चाहिए। संख्या 6 एक ग्लूकोस की है, और 36 गलती से 12 (समीकरण में जल अणुओं की संख्या) से गुणा करने पर आता है।मनुष्य में पाचन के बारे में ये कथन देखिए। P: पित्त रस में वसा पचाने वाले एंज़ाइम होते हैं। Q: पेप्सिन आमाशय के अम्लीय माध्यम में कार्य करता है। R: लार एमिलेस मंड पर कार्य करता है। S: रसांकुर बड़ी आँत में होते हैं। कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: B — केवल Q और R
Q और R सही हैं। P गलत है क्योंकि पित्त रस में एंज़ाइम नहीं होते: वह वसा का पायसीकरण करता है और माध्यम को क्षारीय बनाता है। S गलत है क्योंकि रसांकुर छोटी आँत में होते हैं जहाँ अवशोषण होता है; बड़ी आँत मुख्यतः जल अवशोषित करती है।आमाशय से निकला भोजन अम्लीय होता है, पर अग्न्याशयी रस के एंज़ाइमों को क्षारीय माध्यम चाहिए। छोटी आँत में भोजन को कौन-सा स्रावण क्षारीय बनाता है?
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उत्तर: D — यकृत का पित्त रस
यकृत का पित्त रस क्षारीय है और वसा का पायसीकरण भी करता है, इसलिए माध्यम ट्रिप्सिन व लाइपेज के अनुकूल बनता है। पेप्सिन अम्ल में कार्य करने वाला एंज़ाइम है और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल अम्लता ही बढ़ाता है। लार पहले, मुख में कार्य करती है।जब यीस्ट ऑक्सीजन के बिना श्वसन करता है, तो ऊर्जा के साथ कौन-से उत्पाद बनते हैं?
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उत्तर: A — एथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड
यीस्ट में पायरूवेट एथेनॉल व CO₂ में बदलता है (किण्वन)। लैक्टिक अम्ल जंतु की पेशी में बनता है, और कार्बन डाइऑक्साइड व जल वायवीय श्वसन के उत्पाद हैं, जिनसे अक्सर भ्रम होता है।अचानक दौड़ लगाने के बाद एक खिलाड़ी की टाँगों की पेशियों में दर्द व ऐंठन होती है। इसका कारण किस यौगिक का जमाव है?
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उत्तर: C — पेशी कोशिकाओं में पायरूवेट से बना लैक्टिक अम्ल
ऑक्सीजन कम होने पर पेशी कोशिकाएँ पायरूवेट को लैक्टिक अम्ल में बदलती हैं और उसके जमाव से ऐंठन होती है। एथेनॉल यीस्ट का मार्ग है, जंतुओं का नहीं। कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर में बह जाती है, और यूरिया नाइट्रोजनी अपशिष्ट है जिसका ऐंठन से संबंध नहीं।मनुष्य में अंतःश्वसित वायु वायुकोषों तक पहुँचने से पहले जिस मार्ग से गुज़रती है, उसका सही क्रम कौन-सा है?
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उत्तर: B — नासाद्वार, ग्रसनी, कंठ, श्वासनली, श्वसनी, श्वसनिकाएँ
वायु नासाद्वार, ग्रसनी, कंठ, श्वासनली, श्वसनी, श्वसनिकाओं और फिर वायुकोषों में पहुँचती है। श्वासनली दो श्वसनियों में बँटती है, अतः वह उनसे पहले आती है, और कंठ श्वासनली के ऊपर स्थित है। अन्य क्रमों में आसन्न अंग आपस में बदल दिए गए हैं।इन कथनों को देखिए। P: जलीय जंतु स्थलीय जंतुओं से तेज़ श्वास लेते हैं क्योंकि जल में घुली ऑक्सीजन वायु से कम होती है। Q: अधिकांश कार्बन डाइऑक्साइड हीमोग्लोबिन द्वारा रुधिर में ले जाई जाती है। R: काष्ठीय तने वातरंध्रों से गैस-विनिमय करते हैं। S: पेशी में अवायवीय श्वसन माइटोकॉन्ड्रिया के भीतर होता है। कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: D — केवल P और R
P और R सही हैं। Q गलत है क्योंकि हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन ले जाता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड जल में अधिक विलेय होने से मुख्यतः रुधिर में घुलकर जाती है। S गलत है क्योंकि पायरूवेट का अवायवीय विखंडन कोशिकाद्रव्य में होता है; केवल वायवीय चरण माइटोकॉन्ड्रिया में होता है।फेफड़ों से हृदय में लौटता रुधिर सबसे पहले किस कक्ष में प्रवेश करता है?
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उत्तर: C — बायाँ अलिंद
फुफ्फुस शिराएँ ऑक्सीजनित रुधिर को बाएँ अलिंद में लाती हैं। दायाँ अलिंद महाशिरा से शरीर का अनॉक्सीजनित रुधिर ग्रहण करता है। निलय पंप करने वाले कक्ष हैं और वे रुधिर अलिंदों से लेते हैं, सीधे शिराओं से नहीं।कौन-सी रुधिर वाहिका अनॉक्सीजनित रुधिर को हृदय से दूर ले जाती है?
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उत्तर: A — फुफ्फुस धमनी
फुफ्फुस धमनी दाएँ निलय से निकलकर अनॉक्सीजनित रुधिर फेफड़ों तक ले जाती है। महाशिरा भी अनॉक्सीजनित रुधिर ले जाती है, पर वह उसे हृदय की ओर लाती है। महाधमनी ऑक्सीजनित रुधिर को दूर ले जाती है और फुफ्फुस शिरा ऑक्सीजनित रुधिर को भीतर लाती है।एक स्वस्थ वयस्क का प्रकुंचन दाब 120 mm Hg और अनुशिथिलन दाब 80 mm Hg है। निलयों के संकुचन पर धमनियों में दाब कितना बढ़ता है?
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उत्तर: D — 40 mm Hg
शिथिल अवस्था से संकुचन अवस्था तक दाब में वृद्धि 120 − 80 = 40 mm Hg है। 200 का मान दोनों रीडिंग जोड़ने की गलती से आता है, और 120 या 80 केवल एक रीडिंग है, अंतर नहीं।पौधों में परिवहन के बारे में ये कथन देखिए। P: जाइलम मृत कोशिकाओं, वाहिकाओं व वाहिनिकाओं का बना होता है। Q: फ्लोएम में स्थानांतरण ATP की ऊर्जा से होता है। R: सुक्रोस वाष्पोत्सर्जन कर्षण से ऊपर ले जाया जाता है। S: जाइलम बना हुआ भोजन दोनों दिशाओं में ले जाता है। कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: C — केवल P और Q
P और Q सही हैं। R और S में ऊतक आपस में बदल दिए गए हैं: वाष्पोत्सर्जन कर्षण जाइलम में जल पर कार्य करता है, जबकि सुक्रोस जैसा बना हुआ भोजन फ्लोएम में दोनों दिशाओं में चलता है।हृदय और परिसंचरण के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
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उत्तर: B — बाएँ निलय की दीवार दाएँ से पतली होती है क्योंकि वह केवल फेफड़ों को रुधिर देता है
बाएँ निलय वाला कथन गलत है: वह महाधमनी द्वारा पूरे शरीर में रुधिर भेजता है, इसलिए उसकी दीवार सबसे मोटी होती है। दायाँ निलय केवल फेफड़ों को रुधिर देता है। शेष तीनों कथन मानक तथ्य हैं।नेफ्रॉन में मूत्र बनने की प्रक्रिया में घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?
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उत्तर: A — केशिका-गुच्छ में निस्पंदन, नलिका में वरणात्मक पुनःअवशोषण, संग्राहक नलिका में संग्रहण
रुधिर पहले केशिका-गुच्छ में छनकर बोमन संपुट में आता है, फिर नलिका में ग्लूकोस व जल जैसे उपयोगी पदार्थ पुनः अवशोषित होते हैं, और शेष तरल संग्राहक नलिका में जमा होकर मूत्रवाहिनी में जाता है। पुनःअवशोषण निस्पंदन से पहले नहीं हो सकता, क्योंकि निस्पंद बनने तक अवशोषित करने को कुछ होता ही नहीं।एक वयस्क के वृक्क एक दिन में 180 लीटर निस्पंद बनाते हैं और इसका 99% पुनः अवशोषित हो जाता है। उस दिन कितना मूत्र निकलता है?
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उत्तर: C — 1.8 L
99% पुनःअवशोषित होने पर 1% शेष रहता है: 180 L का 1% = 1.8 L मूत्र, जो प्रतिदिन के सामान्य 1 से 2 L से मेल खाता है। 178.2 L पुनःअवशोषित मात्रा (180 का 99%) है, जो प्रश्न में पूछी नहीं गई, और 0.18 L 0.1% लेने पर आता है।