तंतु-निर्माण: बहुलक-संरचना, बहुलकन, कताई-विधियाँ व कताई-उपरांत संक्रियाएँ

यह अध्याय अभियांत्रिकी विज्ञान (XE) पेपर के खंड XE9.1 “वस्त्र तंतु” के मध्य भाग का उत्तर देता है: “Molecular architecture, amorphous and crystalline phases, glass transition, plasticization, crystallization, melting, factors affecting Tg and Tm; Polymerization of nylon-6, nylon-66, poly (ethylene terephthalate), polyacrylonitrile and polypropylene; Melt spinning processes for PET, polyamide and polypropylene; Preparation of spinning dope; Principles of wet spinning, dry spinning, dry-jet-wet spinning and gel spinning; Spinning of acrylic, viscose and other regenerated cellulosic fibres such as polynosic and lyocell; Post spinning operations such as drawing, heat setting, tow-to-top conversion; Spin finish composition and applications; Different texturing methods.” यह तंतु-बहुलक की संरचना व उसके संक्रमण, पाँच बहुलकन, गलित व विलयन कताई, और उसके बाद तंतु पर किए जाने वाले कार्य पढ़ाता है। संख्यात्मक प्रश्न Tg हेतु फ़ॉक्स समीकरण, कैरदर्स बहुलकन-अंश, गलित-कताई उत्पादन-दर व ड्रॉ-डाउन, कर्षण-अनुपात तथा मिथ्या-ऐंठन की ऐंठन हैं।

1. आण्विक वास्तुकला, प्रावस्थाएँ, Tg, Tm व प्लास्टिकरण

आण्विक वास्तुकला का अर्थ है शृंखला-लंबाई (बहुलकन-अंश, DP), शाखन, सहबहुलक-संघटन, विन्यास (समविन्यास, सिंडियोटैक्टिक, असमविन्यास) तथा पुनरावर्ती इकाई की दृढ़ता व ध्रुवता। तंतु में शृंखलाएँ मुख्यतः अक्ष के अनुदिश होती हैं। अर्धक्रिस्टलीय तंतु का वर्णन द्विप्रावस्था मॉडल से होता है: क्रिस्टलीय क्षेत्र, जहाँ शृंखलाएँ नियमित जालक में संकुलित हैं, तथा अक्रिस्टलीय क्षेत्र, जहाँ वे अव्यवस्थित हैं और रंजक, नमी व रसायनों के लिए सुलभ। संबंधक अणु (tie molecules) अक्रिस्टलीय प्रावस्था से होकर क्रिस्टलाइटों को जोड़ते हैं; भार का बड़ा भाग वही वहन करते हैं, अतः अक्रिस्टलीय प्रावस्था का अभिविन्यास भी क्रिस्टलनता जितना महत्त्वपूर्ण है।

काँच-संक्रमण ताप Tg वह है जहाँ अक्रिस्टलीय प्रावस्था की खंडीय गति जमती या मुक्त होती है: इससे नीचे अक्रिस्टलीय क्षेत्र कठोर काँच-जैसे, ऊपर रबर-जैसे होते हैं। गलन Tm क्रिस्टलों का लोप है; ऊष्मागतिकीय रूप से Tm = ΔHm/ΔSm, अतः बहुलक अधिक ताप पर पिघलता है यदि उसके क्रिस्टलों की संगलन-एन्थैल्पी बड़ी हो (प्रबल हाइड्रोजन आबंध या द्विध्रुव) या संगलन-एन्ट्रॉपी छोटी हो (दृढ़ शृंखला जो पिघलने पर कम स्वतंत्रता पाती है)। मोटा मार्गदर्शन: सममित बहुलकों में Tm प्रायः Tg (केल्विन में) का 1.4 से 2 गुना होता है।

विशिष्ट संक्रमण ताप (सन्निकट)
बहुलकTg, °CTm, °C
पॉलिएस्टर (PET)लगभग 70 से 80लगभग 255 से 265
नायलॉन 66लगभग 50 (शुष्क)लगभग 265
नायलॉन 6लगभग 50 (शुष्क)लगभग 220
पॉलिप्रोपिलीन (समविन्यास)लगभग −10लगभग 165
  • Tg बढ़ाते हैं: दृढ़ मेरुदंड (p-फ़ेनिलीन वलय), स्थूल या ध्रुवीय पार्श्व समूह, प्रबल अंतर-शृंखला बल, क्रॉस-लिंक, उच्चतर आण्विक भार (एक सीमा तक; फ़्लोरी–फ़ॉक्स: Tg = Tg∞ − K/Mn, K बहुलक का स्थिरांक, अतः Mn बढ़ने पर Tg बढ़ता और समतल हो जाता है)।
  • Tg घटाते हैं (प्लास्टिकरण): छोटे अणु का प्लास्टिसाइज़र शृंखलाएँ अलग कर मुक्त आयतन बढ़ाता है। जल नायलॉन, ऊन व सेलुलोज़ का प्लास्टिसाइज़र है; आर्द्र नायलॉन का Tg कक्ष-ताप के निकट या नीचे होता है, इसीलिए गीला नायलॉन नरम व अधिक विस्तारी होता है। संगत मिश्रण हेतु फ़ॉक्स समीकरण 1/Tg = w₁/Tg₁ + w₂/Tg₂ देता है (द्रव्यमान-अंश, Tg केल्विन में)।
  • Tm बढ़ाते हैं: हाइड्रोजन आबंधन व द्विध्रुव (ऐमाइड, एस्टर), शृंखला-सममिति, दृढ़ता। सहबहुलकन, शाखन व कम आण्विक भार (अशुद्धियाँ क्रिस्टल भंग करती हैं) Tm घटाते हैं।

क्रिस्टलन हेतु गतिशीलता व केंद्रक चाहिए, अतः वह Tg व Tm के बीच होता है। Tg के ठीक ऊपर शृंखलाएँ मुश्किल से चलती हैं; Tm के ठीक नीचे केंद्रक अस्थिर होते हैं। अतः दर दोनों के बीच शिखर पर होती है, और शीत-क्रिस्टलन (काँचीय अक्रिस्टलीय अवस्था से गरम करने पर क्रिस्टलन) Tg के ऊपर ऊष्माक्षेपी शिखर के रूप में दिखता है। खिंचाव से अभिविन्यास क्रिस्टलन को तेज़ करता है (विकृति-प्रेरित), इसीलिए तंतु कताई-रेखा या कर्षण-क्षेत्र में सेकंड के अंश में क्रिस्टलित हो जाते हैं।

⚠️ Tg केवल अक्रिस्टलीय प्रावस्था का है
अत्यधिक क्रिस्टलीय बहुलक में Tg का चरण क्षीण दिखता है, पर क्रिस्टलों का कोई Tg नहीं होता। यह न कहें कि “Tg से ऊपर पूरा तंतु रबर-जैसा हो जाता है”: Tm तक क्रिस्टल उसे थामे रखते हैं। साथ ही Tg गतिज संक्रमण है और तापन-दर पर निर्भर करता है, जबकि दिए क्रिस्टल का Tm ऊष्मागतिकीय है।

2. नायलॉन-6, नायलॉन-66, PET, PAN व पॉलिप्रोपिलीन का बहुलकन

पाँच तंतु-बहुलकों के मार्ग
बहुलकएकलक व क्रियाविधिमुख्य शर्तें व बिंदु
नायलॉन-6ε-कैप्रोलैक्टम; जलअपघटनी वलय-विवृत्ति फिर योग, जो साम्यावस्था-नियंत्रित चरण-वृद्धि-जैसा व्यवहार करती हैजल आरंभ करता है, लगभग 250 से 270 °C; साम्य में लगभग 8 से 10% एकलक व ओलिगोमर बचता है, जो गर्म जल-निष्कर्षण या निर्वात से हटता है; ऐसीटिक अम्ल शृंखलाएँ बंद कर Mn तय करता है
नायलॉन-66हेक्सामेथिलीनडाइऐमीन + ऐडिपिक अम्ल, 1:1 नायलॉन-लवण द्वारा; चरण-वृद्धि संघननजल में लवण ऑटोक्लेव में दाब पर गरम, भाप निकासी, अंत में लगभग 270 से 280 °C; लवण यथार्थ रससमीकरणमिति तय करता है
PETटेरेफ़्थैलिक अम्ल (TPA) या डाइमेथिल टेरेफ़्थैलेट (DMT) + एथिलीन ग्लाइकॉल (EG); चरण-वृद्धिबिस(हाइड्रॉक्सीएथिल) टेरेफ़्थैलेट तक एस्टरीकरण (जल) या एस्टर-विनिमय (मेथनॉल), फिर लगभग 280 °C पर उच्च निर्वात में EG हटाते हुए संघनन; वस्त्र-श्रेणी आंतरिक श्यानता लगभग 0.6 से 0.7 dl/g
PAN (ऐक्रिलिक)ऐक्रिलोनाइट्राइल (द्रव्यमान से कम से कम 85%) व सहएकलक; मुक्त-मूलक शृंखला बहुलकनजल (निलंबन) या विलायक में रेडॉक्स आरंभक; उदासीन सहएकलक (मेथिल ऐक्रिलेट, वाइनिल ऐसीटेट) विलयन व रंजन में सहायक, आयनिक सहएकलक (सल्फ़ोनेट, इटाकोनिक अम्ल) रंजन-स्थल देता है
पॉलिप्रोपिलीनप्रोपिलीन; समन्वय बहुलकनज़िग्लर–नाटा (या मेटैलोसीन) उत्प्रेरक समविन्यास शृंखलाएँ देता है; हाइड्रोजन या परॉक्साइड आण्विक भार व गलित-प्रवाह नियंत्रित करता है

चरण-वृद्धि बहुलकन (नायलॉन-66, PET) में उच्च आण्विक भार केवल बहुत उच्च रूपांतरण p पर आता है। कैरदर्स समीकरण यथार्थ रससमीकरणमिति पर संख्या-माध्य बहुलकन-अंश (प्रति शृंखला औसत एकलक अवशेष) Xn = 1/(1 − p) देता है। यदि रससमीकरणमितीय अनुपात r (1 से कम) हो तो Xn = (1 + r)/(1 + r − 2rp)। हल उदाहरण: p = 0.99 व r = 0.99 के लिए Xn = 1.99/(1.99 − 2 × 0.99 × 0.99) = 1.99/0.0298 = 66.8। उसी p पर पूर्ण संतुलन से 100 मिलता; थोड़ा असंतुलन शृंखला-लंबाई का एक-तिहाई खा जाता है। इसीलिए पहले नायलॉन-लवण बनता है और PET संयंत्र EG को इतना पूर्णतः हटाते हैं। शृंखला बहुलकन (PAN, PP) में उच्च आण्विक भार तुरंत बनता है, और रूपांतरण मुख्यतः उपज बदलता है।

⚠️ नायलॉन-6 वास्तविक चरण-वृद्धि नहीं, पर साम्य-जैसा व्यवहार
नायलॉन-6 एक ही एकलक की वलय-विवृत्ति से बनता है और कोई उप-उत्पाद नहीं देता, जबकि नायलॉन-66 व PET जल, मेथनॉल या EG छोड़ते हैं। नायलॉन-6 में रूपांतरण की सीमा साम्य की एकलक-मात्रा तय करती है, उप-उत्पाद का निष्कासन नहीं, अतः कताई से पहले अवशिष्ट कैप्रोलैक्टम का निष्कर्षण अनिवार्य है; PET व नायलॉन-66 में अभिक्रिया आगे बढ़ाने हेतु उप-उत्पाद हटाना पड़ता है।

3. PET, पॉलिएमाइड व पॉलिप्रोपिलीन की गलित कताई

गलित कताई पिघले बहुलक को महीन छिद्रों से निकालती है, धाराओं को वायु में ठंडा करती है और जमे तंतुओं को लपेटती है। रेखा है: चिप्स (सुखाए हुए: PET व नायलॉन आर्द्रताग्राही हैं और गलित में जलअपघटित होते, अतः PET पिघलाने से पहले बहुत कम नमी तक सुखाया जाता है) → एक्सट्रूडर (पेंच पिघलाता व पंप करता है) → मीटरिंग गियर पंप (प्रवाह तय करता है) → स्पिन पैक (छानने की रेत या जालियाँ, फिर स्पिनरेट, अनेक केशिकाओं वाली प्लेट) → क्वेंच कक्ष (अनुप्रवाही वायु तंतुओं को जमाती है) → स्पिन फ़िनिश अनुप्रयोगक → गोडेट या वाइंडर। कताई-ताप Tm से ऊपर पर अपघटन से बहुत नीचे रहता है: नायलॉन ऑक्सीकरण रोकने हेतु नाइट्रोजन में कता है, PET जलअपघटन व तापीय अपघटन सीमित करने हेतु कम निवास-समय पर, और पॉलिप्रोपिलीन कम ताप पर स्थायीकारकों सहित क्योंकि वह सरलता से ऑक्सीकृत होता है।

द्रव्यमान-संतुलन। प्रति छिद्र द्रव्यमान-प्रवाह = अभिग्रहण-चाल × एक फिलामेंट का रैखिक घनत्व: w (g/min) = v (m/min) × denier/9000 (या × dtex/10,000)। कुल उत्पादन-दर w × छिद्र-संख्या। केशिका में निष्कासन-वेग v₀ = Q/A, जहाँ Q = w/ρ (गलित घनत्व) और A केशिका-क्षेत्रफल, तथा ड्रॉ-डाउन अनुपात v/v₀ है। हल उदाहरण: 0.25 mm व्यास के 72 छिद्र, गलित घनत्व 1.20 g/cm³, अभिग्रहण 3000 m/min, 3.0 denier फिलामेंट। w = 3000 × 3.0/9000 = 1.0 g/min प्रति छिद्र; उत्पादन = 72 g/min = 4.32 kg/h। Q = 1.0/1.20 = 0.833 cm³/min = 8.33 × 10⁻⁷ m³/min; A = π(0.25 × 10⁻³)²/4 = 4.91 × 10⁻⁸ m²; v₀ = 17.0 m/min; ड्रॉ-डाउन = 3000/17.0 = 177। फिलामेंट की चाल ड्रॉ-डाउन अनुपात के गुणक से बढ़ती है, अतः उसका अनुप्रस्थ-काट उतने गुणक से घटता है, और अधिकांश तनूकरण व प्रथम अभिविन्यास कताई-रेखा में होता है।

अभिग्रहण-चाल व उत्पन्न सूत्र (PET, संकेतक)
अभिग्रहण-चालनामअवस्थाअगला चरण
लगभग 1500 m/min तकअल्प-अभिविन्यस्त सूत्रलगभग अक्रिस्टलीय, कम द्विअपवर्तनपृथक् कर्षण, 3 से 5 गुना
लगभग 2500 से 3500 m/minआंशिक अभिविन्यस्त सूत्र (POY)आंशिक अभिविन्यस्त, स्थिरएक चरण में कर्षण-टेक्सचरन
4000 m/min व अधिकअति-अभिविन्यस्त सूत्रअभिविन्यस्त व आंशिक क्रिस्टलीयबिना या अल्प कर्षण के प्रयुक्त

4. कताई-डोप व आर्द्र, शुष्क, शुष्क-जेट-आर्द्र व जेल कताई

कताई-डोप वह बहुलक-विलयन है जिसे छानकर, वायु-रहित कर (बुलबुले तंतु तोड़ते हैं) स्पिनरेट तक मापित मात्रा में भेजा जाता है। उसकी सांद्रता एक समझौता है: सामर्थ्य व संसक्त तंतु हेतु पर्याप्त उच्च, पंप होने हेतु पर्याप्त निम्न। चारों विलयन-विधियाँ इस बात में भिन्न हैं कि तंतु कैसे जमता है।

  • आर्द्र कताई: स्पिनरेट स्कंदन-स्नान में डूबा रहता है; विलायक बाहर व अविलायक भीतर विसरित होता है (या अभिक्रिया से बहुलक पुनर्जनित होता है)। धीमी (दसियों से कुछ सौ m/min), अनुप्रस्थ-काट प्रायः अनियमित। विस्कोस व कुछ ऐक्रिलिक हेतु।
  • शुष्क कताई: वाष्पशील विलायक का डोप गरम गैस-स्तंभ में निकाला जाता है और विलायक वाष्पित होता है (सेलुलोज़ ऐसीटेट हेतु ऐसीटोन, ऐक्रिलिक हेतु डाइमेथिलफ़ॉर्मामाइड)। आर्द्र से तेज़, विलायक-पुनर्प्राप्ति सहित; कुत्ते-की-हड्डी जैसा अनुप्रस्थ-काट विशिष्ट है क्योंकि पहले त्वचा बनती है, फिर पिचकती है।
  • शुष्क-जेट-आर्द्र कताई: डोप स्पिनरेट से छोटे वायु-अंतराल में निकलकर फिर स्कंदन-स्नान में जाता है। अंतराल में तंतु तनाव में खिंच सकता है, जिससे शृंखलाएँ (या द्रव-क्रिस्टलीय क्षेत्र) स्थिर होने से पहले अभिविन्यस्त हो जाती हैं; यह श्यान, उच्च-सांद्रता डोपों हेतु उपयुक्त है, जैसे सल्फ़्यूरिक अम्ल में पैरा-ऐरामिड और लायोसेल।
  • जेल कताई: अति-उच्च आण्विक भार बहुलक का तनु विलयन (UHMWPE, डेकालिन या पैराफ़िन तेल जैसे विलायक में, कुछ प्रतिशत) निकालकर जेल तक ठंडा किया जाता है, जिससे शृंखलाएँ हल्के उलझी रहती हैं, फिर विलायक निकालकर जेल-तंतु को अनेक गुना गर्म खींचा जाता है, जिससे लगभग पूर्ण विस्तृत शृंखलाएँ बनती हैं।

विस्कोस डोप। लुगदी को लगभग 18% सोडियम हाइड्रॉक्साइड में भिगोकर क्षार सेलुलोज़ बनता है, जिसे दबाया, कतरा और वृद्ध (aged) किया जाता है (ऑक्सीजन शृंखलाएँ लक्ष्य DP तक छोटी करती है), फिर कार्बन डाइसल्फ़ाइड से नारंगी सेलुलोज़ ज़ैन्थेट बनता है, जो तनु क्षार में घुलकर विस्कोस डोप देता है; उसे परिपक्व किया, छाना व वायु-रहित किया जाता है। कताई-स्नान में सल्फ़्यूरिक अम्ल (सेलुलोज़ पुनर्जनित करता है), सोडियम सल्फ़ेट (निर्जलीकारक, स्कंदन तेज़ करता है) व ज़िंक सल्फ़ेट (पुनर्जनन मंद करता है ताकि तंतु पूर्णतः जमने से पहले खिंच सके) होते हैं। शीघ्र त्वचा-निर्माण के बाद कोर-पुनर्जनन से त्वचा-कोर संरचना व दंतुर अनुप्रस्थ-काट बनता है। पॉलिनोसिक (उच्च आर्द्र मॉड्यूलस) तंतु में उच्चतर DP की लुगदी, अल्प वृद्धन, तनु, ठंडा, ज़िंक-समृद्ध स्नान और भारी खिंचाव होता है, अतः त्वचा नहीं बनती: गोल, तंतुकीय, अधिक अभिविन्यस्त तंतु जिसका आर्द्र मॉड्यूलस व विमीय स्थायित्व उच्च है। लायोसेल सेलुलोज़ को गर्म N-मेथिलमॉर्फ़ोलिन N-ऑक्साइड (NMMO) हाइड्रेट में सीधे घोलता है, बिना व्युत्पन्न व कार्बन डाइसल्फ़ाइड के, शुष्क-जेट-आर्द्र विधि से जल में कातता है और विलायक बंद चक्र में पुनः प्राप्त करता है; इसका अनुप्रस्थ-काट गोल, समांग, आर्द्र सामर्थ्य उच्च, और गीला व घिसने पर तंतुकन की प्रवृत्ति होती है।

5. कताई-उपरांत संक्रियाएँ व स्पिन फ़िनिश

कर्षण अध्यायित तंतु को Tg से ऊपर उसकी लंबाई के कई गुना खींचता है ताकि शृंखलाएँ अभिविन्यस्त हों और सामर्थ्य व मॉड्यूलस बढ़ें। आयतन संरक्षित होने से कर्षण-अनुपात DR = L/L₀ = v₂/v₁ (निर्गम व भरण चाल) और कर्षण के बाद रैखिक घनत्व मूल को DR से भाग देने पर मिलता है: 4.5 denier का कताई-पश्चात् फिलामेंट 3.75 गुना खींचने पर 1.2 denier का होता है। अनेक तंतु ग्रीवा-निर्माण (necking) से प्राकृतिक कर्षण-अनुपात पर खिंचते हैं, जहाँ ग्रीवा तंतु के अनुदिश बढ़ती है और कर्षण-अनुपात बहुलक से तय होता है; PET हेतु कर्षण गरम (गरम प्लेटों पर, गरम स्नान या भाप में), नायलॉन हेतु ठंडा या गुनगुना होता है। जितना अधिक खींचें, अभिविन्यास व टेनेसिटी उतनी अधिक और विस्तार उतना कम, जब तक टूटन न हो।

ऊष्मा-स्थायीकरण (heat setting) खींचे हुए तंतु या वस्त्र को निश्चित लंबाई या नियंत्रित तनाव पर, बाद के किसी प्रसंस्करण-ताप से (और कर्षण-ताप से) ऊपर पर Tm से नीचे के ताप पर रखता है, जिससे क्रिस्टल परिपूर्ण होते व बढ़ते हैं और अवशिष्ट विकृति शिथिल होती है। इससे क्रिस्टलनता व घनत्व बढ़ते हैं, संकोचन घटता है और विमीय स्थायित्व व सिलवट-धारण मिलता है; रंजक-ग्रहण कुछ घटता है। टो-से-टॉप रूपांतरण अनेक हज़ार फिलामेंटों की संतत रस्सी (टो), प्रायः क्रिम्पित व खिंची हुई, को टॉप में बदलता है, यानी वर्स्टेड या कपास-प्रणाली कताई योग्य स्टेपल तंतु का स्लिवर, या तो निश्चित स्टेपल-लंबाई पर काटकर या खिंचाव-भंजन (stretch breaking) से (टो रोलरों के बीच लंबाइयों के वितरण में टूटता है, जिससे ऊन-जैसा टॉप बनता है); फिर उसका मिश्रण व गिलिंग होता है।

स्पिन फ़िनिश जलीय पायस है (तंतु-द्रव्यमान का कुछ प्रतिशत) जो क्वेंच के बाद या कर्षण के बाद लगाया जाता है। इसमें स्नेहक (खनिज तेल या एस्टर, तंतु-धातु व तंतु-तंतु घर्षण हेतु), प्रतिस्थैतिक कारक (आयनिक या एथॉक्सिलेटेड पृष्ठसक्रियक, स्थैतिक आवेश हेतु), पायसीकारक व संसंजन-कारक (ताकि फिलामेंट सूत्र की तरह साथ रहें) तथा जीवाणुनाशक व संक्षारण-रोधी योजक होते हैं। फिलामेंट सूत्र की फ़िनिश उच्च चाल पर संसंजन व स्नेहन पर बल देती है, जबकि स्टेपल फ़िनिश कार्डिंग व ड्राफ़्टिंग हेतु घर्षण-नियंत्रण व प्रतिस्थैतिक क्रिया पर।

6. टेक्सचरन विधियाँ

टेक्सचरन चिकने संतत-फिलामेंट सूत्र को ऊनी-जैसे फूलेपन व स्पर्श वाले स्थूल, विस्तारी सूत्र में बदलता है, जिसमें तंतु की तापसुघट्य प्रकृति का उपयोग होता है।

  • मिथ्या-ऐंठन (false-twist) टेक्सचरन (पॉलिएस्टर POY व नायलॉन की मुख्य विधि): सूत्र ऐंठा जाता है, ऐंठी अवस्था में Tg से ऊपर ऊष्मा-स्थायित किया जाता है, ठंडा किया जाता है, फिर खोला जाता है। ट्विस्टर के बाद सूत्र में लगभग कोई शुद्ध ऐंठन नहीं रहती, पर फिलामेंट कुंडलाकार स्मृति रखते हैं, जो फूलापन व तनाव देती है। तापन-क्षेत्र में डाली गई ऐंठन = स्पिंडल (या डिस्क) की चाल ÷ सूत्र की चाल; 300,000 rpm व 100 m/min पर यह 3000 मोड़/m है। पिन स्पिंडल व अब घर्षण डिस्क प्रयुक्त होते हैं; कर्षण-टेक्सचरन POY के कर्षण को टेक्सचरन से जोड़ता है।
  • वायु-जेट टेक्सचरन: अतिपूरित सूत्र पर विक्षुब्ध संपीडित वायु फूँकी जाती है, जिससे यादृच्छिक लूप व उलझे फिलामेंट बनते हैं और काता-सूत्र-जैसा रूप व स्पर्श मिलता है; ताप या ऐंठन नहीं चाहिए, और अतापसुघट्य सहित कोई भी तंतु प्रयुक्त हो सकता है।
  • स्टफ़र-बॉक्स क्रिम्पन: सूत्र या टो को गरम बॉक्स में ठूँसा जाता है, जिससे टेढ़ा-मेढ़ा क्रिम्प बनकर स्थायित होता है (कालीन-सूत्र व स्टेपल टो हेतु)। अन्य विधियाँ हैं गियर क्रिम्पन, एज क्रिम्पन (सूत्र को ब्लेड पर खींचना) तथा निट-डी-निट (बुनना, ऊष्मा-स्थायित करना, खोलना, जिससे मुड़ा सूत्र मिलता है)।
⚠️ फूलापन कहाँ से आता है
मिथ्या-ऐंठन व स्टफ़र-बॉक्स विधियाँ Tg से ऊपर ऊष्मा-स्थायीकरण पर निर्भर हैं, अतः तापसुघट्य तंतु चाहिए; वायु-जेट यांत्रिक उलझाव पर निर्भर है, अतः नहीं। मिथ्या-ऐंठन में सूत्र स्पिंडल से लगभग शून्य ऐंठन के साथ निकलता है, अतः ऐंठन क्षणिक है, उत्पाद में गिनने योग्य नहीं।

मुख्य बिंदु

  • अर्धक्रिस्टलीय तंतुओं में क्रिस्टलीय व अक्रिस्टलीय प्रावस्थाएँ होती हैं; Tg अक्रिस्टलीय प्रावस्था का संक्रमण है जो दृढ़ता व स्थूलता से बढ़ता और प्लास्टिसाइज़र से घटता है (फ़ॉक्स: 1/Tg = w₁/Tg₁ + w₂/Tg₂), जबकि Tm = ΔHm/ΔSm हाइड्रोजन आबंधों व शृंखला-दृढ़ता से बढ़ता है।
  • नायलॉन-6 कैप्रोलैक्टम की वलय-विवृत्ति से बनता है और साम्य की एकलक-शेष निकालनी पड़ती है; नायलॉन-66 1:1 लवण से और PET एस्टरीकरण या एस्टर-विनिमय व फिर निर्वात संघनन से; PAN व PP शृंखला बहुलक हैं (मूलक व ज़िग्लर–नाटा)। कैरदर्स: Xn = 1/(1 − p), और असंतुलन में (1 + r)/(1 + r − 2rp)।
  • गलित कताई: सूखे चिप्स, एक्सट्रूडर, मीटरिंग पंप, स्पिन पैक, क्वेंच, फ़िनिश, अभिग्रहण। प्रति छिद्र प्रवाह = चाल × denier/9000; ड्रॉ-डाउन = अभिग्रहण-चाल ÷ निष्कासन-चाल; उच्च अभिग्रहण POY व अधिक कताई-अभिविन्यास देता है।
  • आर्द्र कताई स्नान में स्कंदित करती है, शुष्क कताई विलायक वाष्पित करती है, शुष्क-जेट-आर्द्र स्कंदन से पहले खिंचाव हेतु वायु-अंतराल जोड़ती है, जेल कताई UHMWPE के जेल को खींचती है। विस्कोस में ज़ैन्थेट व अम्ल–सल्फ़ेट–ज़िंक स्नान होता है; पॉलिनोसिक में त्वचा नहीं; लायोसेल सेलुलोज़ को NMMO में सीधे घोलता है।
  • Tg से ऊपर कर्षण शृंखलाएँ अभिविन्यस्त करता है (DR = v₂/v₁, बाद का denier = पहले का ÷ DR); Tm से नीचे निश्चित लंबाई पर ऊष्मा-स्थायीकरण स्थिरता देता है; टो-से-टॉप काटकर या खिंचाव-भंजन से होता है; स्पिन फ़िनिश स्नेहन, प्रतिस्थैतिक क्रिया व संसंजन देती है।
  • टेक्सचरन: मिथ्या-ऐंठन (ऐंठना, स्थायित करना, खोलना; ऐंठन = स्पिंडल rpm ÷ सूत्र की चाल), वायु-जेट (विक्षुब्ध वायु से लूप, किसी भी तंतु पर), स्टफ़र-बॉक्स (टेढ़ा-मेढ़ा क्रिम्प), तथा गियर, एज व निट-डी-निट।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. पॉलिएस्टर के मेरुदंड में कौन-सा संरचनात्मक परिवर्तन उसके काँच-संक्रमण ताप को सर्वाधिक बढ़ाने की अपेक्षा रखता है?

    1. एस्टर समूहों के बीच लचीले ऐलिफ़ैटिक अंतराल को लंबा करना
    2. लचीली CH₂ इकाइयों को दृढ़ p-फ़ेनिलीन वलयों से बदलना
    3. बहुलक में छोटे अणु का प्लास्टिसाइज़र मिलाना
    4. शृंखला में लचीले ईथर बंध लाना
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — लचीली CH₂ इकाइयों को दृढ़ p-फ़ेनिलीन वलयों से बदलना

    दृढ़ वलय इकाइयाँ मेरुदंड-बंधों पर घूर्णन में बाधा डालती हैं, अतः खंडीय गति मुक्त करने हेतु अधिक तापीय ऊर्जा चाहिए और Tg बढ़ता है। लंबा लचीला अंतराल, ईथर बंध व प्लास्टिसाइज़र सब गतिशीलता या मुक्त आयतन बढ़ाकर Tg घटाते हैं; प्लास्टिसाइज़र भ्रामक ग़लत चयन है क्योंकि वह Tg-परिवर्तक के रूप में जाना जाता है, पर विपरीत दिशा में कार्य करता है।
  2. काँचीय, अक्रिस्टलीय PET नमूने को डिफ़रेंशियल स्कैनिंग कैलोरीमीटर में धीरे-धीरे गरम किया जाता है। गरम करने पर घटनाओं का कौन-सा क्रम होता है?

    1. गलन ऊष्माशोषी, फिर शीत-क्रिस्टलन ऊष्माक्षेपी, फिर काँच-संक्रमण चरण
    2. शीत-क्रिस्टलन ऊष्माक्षेपी, फिर काँच-संक्रमण, फिर गलन ऊष्माशोषी
    3. काँच-संक्रमण, फिर गलन ऊष्माशोषी, फिर शीत-क्रिस्टलन ऊष्माक्षेपी
    4. काँच-संक्रमण, फिर शीत-क्रिस्टलन ऊष्माक्षेपी, फिर गलन ऊष्माशोषी
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — काँच-संक्रमण, फिर शीत-क्रिस्टलन ऊष्माक्षेपी, फिर गलन ऊष्माशोषी

    शृंखला-गतिशीलता सबसे पहले Tg पर मुक्त होती है; चल सकने पर शृंखलाएँ क्रिस्टलित होती हैं (शीत-क्रिस्टलन, ऊष्माक्षेपी) और इस प्रकार बने क्रिस्टल Tm पर पिघलते हैं (ऊष्माशोषी)। क्रिस्टलन काँच-संक्रमण से पहले नहीं हो सकता क्योंकि Tg से नीचे शृंखलाएँ जमी हैं, और गलन उन क्रिस्टलों से पहले नहीं हो सकता जो अभी बने ही नहीं।
  3. नायलॉन-66 बनाने में पहले हेक्सामेथिलीनडाइऐमीन व ऐडिपिक अम्ल का 1:1 लवण तैयार किया जाता है। इस चरण का मुख्य कारण है

    1. चरण-वृद्धि अभिक्रिया को शृंखला अभिक्रिया में बदलना
    2. संघनन-चरण में जल के किसी भी निर्मुक्त होने से बचना
    3. दोनों एकलकों का यथार्थ रससमीकरणमितीय संतुलन सुनिश्चित करना
    4. बहुलक को समविन्यास बनाना
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — दोनों एकलकों का यथार्थ रससमीकरणमितीय संतुलन सुनिश्चित करना

    चरण-वृद्धि में उच्च आण्विक भार तभी मिलता है जब दोनों प्रकार्यात्मक समूह ठीक बराबर संख्या में हों; कोई भी असंतुलन पूर्ण रूपांतरण पर भी Xn को (1 + r)/(1 − r) पर सीमित कर देता है। लवण क्रिस्टलीय यौगिक है जिसमें दोनों एकलक 1:1 अनुपात में बँधे हैं। लवण गरम करने पर जल फिर भी निकलता है, क्रियाविधि चरण-वृद्धि ही रहती है, और स्टीरियो-केंद्र-रहित पॉलिएमाइड में टैक्टिसिटी अप्रासंगिक है।
  4. PET उत्पादन के अंतिम चरण में गलित को लगभग 280 °C पर उच्च निर्वात में रखा जाता है। निर्वात का उपयोग है

    1. एथिलीन ग्लाइकॉल हटाकर उत्क्रमणीय अभिक्रिया को आगे बढ़ाना
    2. कताई से पहले गलित का क्रिस्टलन रोकना
    3. बहुलक से अनभिक्रियित कैप्रोलैक्टम एकलक निकालना
    4. अंतिम उत्पाद का काँच-संक्रमण ताप बढ़ाना
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — एथिलीन ग्लाइकॉल हटाकर उत्क्रमणीय अभिक्रिया को आगे बढ़ाना

    PET का संघनन साम्य है; एथिलीन ग्लाइकॉल उप-उत्पाद है और निर्वात व उच्च ताप की सहायता से उसका निष्कासन साम्य को लंबी शृंखलाओं की ओर खिसकाता है। कैप्रोलैक्टम नायलॉन-6 का है, और निर्वात का क्रिस्टलन रोकने या Tg सीधे बदलने में कोई भूमिका नहीं।
  5. साधारण विस्कोस रेयॉन की तुलना में पॉलिनोसिक तंतु बनता है

    1. सेलुलोज़ को यथाशीघ्र पुनर्जनित करने हेतु सल्फ़्यूरिक अम्ल-समृद्ध गरम कताई-स्नान से, अल्प खिंचाव सहित
    2. उच्चतर-DP लुगदी, अल्प वृद्धन, तनु ठंडे स्नान व भारी खिंचाव से, जिससे बिना त्वचा की तंतुकीय संरचना मिलती है
    3. निम्न-DP लुगदी, व्यापक वृद्धन व बिना खिंचाव से
    4. सेलुलोज़ के N-मेथिलमॉर्फ़ोलिन N-ऑक्साइड में सीधे विलयन से
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — उच्चतर-DP लुगदी, अल्प वृद्धन, तनु ठंडे स्नान व भारी खिंचाव से, जिससे बिना त्वचा की तंतुकीय संरचना मिलती है

    पॉलिनोसिक (उच्च आर्द्र मॉड्यूलस) तंतु हेतु धीमा, मृदु पुनर्जनन चाहिए ताकि त्वचा न बने, उच्च-DP शृंखलाएँ और अभिविन्यास हेतु भारी खिंचाव; परिणाम गोल, तंतुकीय तंतु जिसका आर्द्र मॉड्यूलस उच्च है। गरम सांद्र अम्ल-स्नान साधारण विस्कोस की त्वरित त्वचा बनाता है, NMMO में सीधा विलयन लायोसेल को परिभाषित करता है, और निम्न DP व बिना खिंचाव से दुर्बल तंतु बनता।
  6. लायोसेल विस्कोस से इस बात में भिन्न है कि लायोसेल

    1. सेलुलोज़ के उस व्युत्पन्न से बनता है जो बाद में जलअपघटित होता है
    2. कार्बन डाइसल्फ़ाइड प्रयुक्त करता है और उसे कताई-स्नान से पुनः पाता है
    3. सेलुलोज़ के गलनांक से ऊपर गलित-कताई से बनता है
    4. सेलुलोज़ को बिना व्युत्पन्न बनाए सीधे विलायक में घोलता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — सेलुलोज़ को बिना व्युत्पन्न बनाए सीधे विलायक में घोलता है

    लायोसेल प्रक्रिया में सेलुलोज़ NMMO हाइड्रेट में भौतिक रूप से, बिना रासायनिक व्युत्पन्नीकरण के घुलता है और डोप को शुष्क-जेट-आर्द्र विधि से जल में काता जाता है, विलायक के पुनर्चक्रण सहित। व्युत्पन्न (ज़ैन्थेट) व कार्बन डाइसल्फ़ाइड वाली प्रक्रिया विस्कोस है; सेलुलोज़ पिघलता नहीं, अतः गलित कताई असंभव है।
  7. UHMWPE की परंपरागत गलित कताई नहीं हो सकती, और उसे जेल-कताई से काता जाता है, मुख्यतः क्योंकि

    1. वह जल में घुल जाता है
    2. वह अपने गलनांक से बहुत नीचे के ताप पर अपघटित हो जाता है, अतः पिघलाया नहीं जा सकता
    3. ऐसे आण्विक भार पर उसकी गलित-श्यानता अत्यधिक है
    4. उसका Tg 300 °C से ऊपर है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — ऐसे आण्विक भार पर उसकी गलित-श्यानता अत्यधिक है

    लाखों के मोलर द्रव्यमान पर उलझाव-घनत्व गलित को लगभग अप्रवाही बना देता है, अतः उसे महीन केशिकाओं से निकाला नहीं जा सकता; हल्के उलझाव वाला तनु विलयन निकालकर जेलित किया व अति-खींचा जा सकता है। UHMWPE जलविरोधी है, लगभग 150 °C पर बिना अपघटन पिघलता है, और उसका Tg कक्ष-ताप से बहुत नीचे है।
  8. एक कर्षित PET तंतु खींचा गया और फिर Tg व Tm के बीच के ताप पर निश्चित लंबाई पर ऊष्मा-स्थायित किया गया। अस्थायित कर्षित तंतु की तुलना में उसमें दिखेगा

    1. उच्चतर घनत्व व कम संकोचन, क्योंकि क्रिस्टल बढ़ते हैं और विकृति शिथिल होती है
    2. कम क्रिस्टलनता क्योंकि क्रिस्टल आंशिक पिघलते हैं
    3. कम घनत्व व उच्चतर उबलते-जल संकोचन
    4. कोई परिवर्तन नहीं, क्योंकि ऊष्मा-स्थायीकरण केवल अक्रिस्टलीय प्रावस्था पर कार्य करता है, क्रिस्टलों पर नहीं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उच्चतर घनत्व व कम संकोचन, क्योंकि क्रिस्टल बढ़ते हैं और विकृति शिथिल होती है

    निश्चित लंबाई पर कर्षण-ताप से ऊपर तापानुशीतन से क्रिस्टल परिपूर्ण होकर बढ़ते हैं और जमी विकृति शिथिल होती है, अतः घनत्व व क्रिस्टलनता बढ़ते और संकोचन घटता है। क्रिस्टल पिघलते नहीं क्योंकि ताप Tm से नीचे है, और प्रक्रिया स्पष्टतः दोनों प्रावस्थाओं की संरचना बदलती है।
  9. कौन-सी टेक्सचरन विधि अतापसुघट्य तंतु से बने सूत्र को स्थूल कर सकती है क्योंकि वह ऊष्मा-स्थायीकरण नहीं, यांत्रिक उलझाव पर निर्भर है?

    1. हीटर सहित मिथ्या-ऐंठन टेक्सचरन
    2. वायु-जेट टेक्सचरन
    3. ऊष्मा-स्थायीकरण सहित निट-डी-निट
    4. गरम बॉक्स सहित स्टफ़र-बॉक्स क्रिम्पन
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — वायु-जेट टेक्सचरन

    वायु-जेट टेक्सचरन अतिपूरित सूत्र पर विक्षुब्ध वायु से लूप बनाता है और ताप या ऐंठन नहीं चाहता, अतः तंतु का तापसुघट्य होना आवश्यक नहीं। शेष तीनों Tg से ऊपर विकृत आकार को तापीय रूप से स्थायित करने पर निर्भर हैं।
  10. संश्लिष्ट तंतुओं के कर्षण व ऊष्मा-स्थायीकरण के बारे में कौन-से कथन सही हैं?

    1. कर्षण Tg से ऊपर किया जाता है ताकि अक्रिस्टलीय शृंखलाएँ तंतु-अक्ष के अनुदिश अभिविन्यस्त हो सकें
    2. कर्षण टेनेसिटी बढ़ाता और भंग-विस्तार घटाता है
    3. ऊष्मा-स्थायीकरण Tg से नीचे किया जाता है ताकि क्रिस्टलनता में कोई परिवर्तन न हो
    4. लंबाई में 4 गुना खींचे फिलामेंट का रैखिक घनत्व अखिंचे फिलामेंट का चार गुना होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — कर्षण Tg से ऊपर किया जाता है ताकि अक्रिस्टलीय शृंखलाएँ तंतु-अक्ष के अनुदिश अभिविन्यस्त हो सकें; B — कर्षण टेनेसिटी बढ़ाता और भंग-विस्तार घटाता है

    Tg से ऊपर कर्षण शृंखलाएँ अभिविन्यस्त करता है, जिससे टेनेसिटी व मॉड्यूलस बढ़ते और विस्तार घटता है। ऊष्मा-स्थायीकरण कर्षण-ताप से ऊपर व Tm से नीचे किया जाता है ताकि क्रिस्टलनता व स्थिरता बढ़े, Tg से नीचे नहीं। आयतन संरक्षित होने पर लंबाई चौगुनी होने से रैखिक घनत्व चौथाई रह जाता है, चार गुना नहीं।
  11. निम्नलिखित में से कौन-से तंतु सामान्यतः गलित-कताई से बनते हैं?

    1. पॉलिएस्टर (PET)
    2. पॉलिऐक्रिलोनाइट्राइल (ऐक्रिलिक)
    3. समविन्यास पॉलिप्रोपिलीन
    4. नायलॉन 66
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पॉलिएस्टर (PET); C — समविन्यास पॉलिप्रोपिलीन; D — नायलॉन 66

    PET, पॉलिप्रोपिलीन व नायलॉन 66 अपने अपघटन-ताप से नीचे पिघलते हैं और गलित से काते जाते हैं। पॉलिऐक्रिलोनाइट्राइल में द्विध्रुवीय आकर्षण इतना प्रबल है कि वह पिघलने से पहले अपघटित हो जाता है, अतः ऐक्रिलिक विलयन से (आर्द्र या शुष्क) काता जाता है।
  12. निम्नलिखित में से कौन-से स्पिन फ़िनिश के कार्य हैं?

    1. स्नेहन, तंतु-धातु व तंतु-तंतु घर्षण घटाने हेतु
    2. स्थैतिक आवेश का क्षय
    3. बहुलक का गलनांक बढ़ाना
    4. बहुलक शृंखलाओं का स्थायी क्रॉस-लिंकन
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — स्नेहन, तंतु-धातु व तंतु-तंतु घर्षण घटाने हेतु; B — स्थैतिक आवेश का क्षय

    फ़िनिश पतला पायस है जो स्नेहन करता है, स्थैतिक नियंत्रित करता है व संसंजन देता है ताकि तंतु मशीनों से सुचारु चले। यह पृष्ठ-उपचार है और न Tm बदलता है न बहुलक को क्रॉस-लिंक करता है।
  13. Tg = 350 K वाले बहुलक को Tg = 200 K वाले प्लास्टिसाइज़र के द्रव्यमान से 10% के साथ प्लास्टिकित किया गया है। फ़ॉक्स समीकरण 1/Tg = w₁/Tg₁ + w₂/Tg₂ (w द्रव्यमान-अंश, ताप केल्विन में) मानकर मिश्रण का Tg केल्विन में, एक दशमलव स्थान तक, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 325.6

    1/Tg = 0.90/350 + 0.10/200 = 0.0025714 + 0.0005000 = 0.0030714 K⁻¹, अतः Tg = 325.6 K। साधारण द्रव्यमान-भारित औसत 335 K देता, जो प्रचलित ग़लत उत्तर है, और यह भूलता है कि व्युत्क्रम तापों का औसत होता है।
  14. एक गलित-कताई रेखा में प्रति स्पिनरेट 72 छिद्र हैं। प्रत्येक फिलामेंट 3.0 denier (1 denier = 9000 m का 1 g) का है और अभिग्रहण-चाल 3000 m/min है। स्पिनरेट की बहुलक-उत्पादन दर kg/h में, दो दशमलव स्थान तक, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 4.32

    प्रति फिलामेंट प्रति मीटर द्रव्यमान = 3.0/9000 g/m। प्रति छिद्र w = 3000 × 3.0/9000 = 1.0 g/min। 72 छिद्रों हेतु यह 72 g/min = 4320 g/h = 4.32 kg/h है।
  15. ऊपर की रेखा में प्रत्येक केशिका का व्यास 0.25 mm है, गलित घनत्व 1.20 g/cm³ है और प्रत्येक छिद्र 1.0 g/min देता है। ड्रॉ-डाउन अनुपात (अभिग्रहण-चाल 3000 m/min ÷ केशिका में औसत निष्कासन-वेग), निकटतम पूर्णांक में, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 177

    प्रति छिद्र आयतनी प्रवाह Q = 1.0 g/min ÷ 1.20 g/cm³ = 0.8333 cm³/min = 8.333 × 10⁻⁷ m³/min। क्षेत्रफल A = π(0.25 × 10⁻³ m)²/4 = 4.909 × 10⁻⁸ m²। निष्कासन-वेग v₀ = Q/A = 16.98 m/min। ड्रॉ-डाउन = 3000/16.98 = 176.7, अतः 177।
  16. एक पॉलिएमाइड चरण-वृद्धि बहुलकन से बनता है जिसमें रससमीकरणमितीय अनुपात r = 0.99 है (न्यून व आधिक्य प्रकार्यात्मक समूह का अनुपात)। न्यून समूह के रूपांतरण p = 0.99 पर कैरदर्स समीकरण Xn = (1 + r)/(1 + r − 2rp) से संख्या-माध्य बहुलकन-अंश (प्रति शृंखला एकलक अवशेष), निकटतम पूर्णांक में, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 67

    Xn = (1 + 0.99)/(1 + 0.99 − 2 × 0.99 × 0.99) = 1.99/(1.99 − 1.9602) = 1.99/0.0298 = 66.8, अतः 67। पूर्ण संतुलन पर उसी रूपांतरण से 1/(1 − 0.99) = 100 मिलता।
  17. एक मिथ्या-ऐंठन टेक्सचरन मशीन में स्पिंडल 300,000 rpm पर चलता है और सूत्र 100 m/min पर निर्गमित होता है। तापन-क्षेत्र में सूत्र में डाली गई ऐंठन, मोड़ प्रति मीटर में, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 3000

    ऐंठन (मोड़/m) = स्पिंडल की चाल (मोड़/min) ÷ सूत्र की चाल (m/min) = 300,000/100 = 3000 मोड़/m। स्पिंडल के बाद सूत्र पुनः खोल दिया जाता है, अतः उसकी शुद्ध ऐंठन लगभग शून्य रहती है।