प्रकाश: दर्पण, लेंस और मानव नेत्र

यह अध्याय रेलवे भर्ती बोर्डों के लेवल-1 (ग्रुप D) और NTPC पाठ्यक्रम के सामान्य विज्ञान-बिंदु “भौतिकी: प्रकाश, परावर्तन, लेंस, दर्पण” का उत्तर देता है, जिसमें विज्ञान “10वीं CBSE तक” रखा गया है; टेक्नीशियन और ALP परीक्षाओं के बेसिक साइंस प्रश्नपत्रों में भी यही विषय आता है। इसमें परावर्तन व समतल दर्पण, गोलीय दर्पण व दर्पण सूत्र, अपवर्तन व अपवर्तनांक, लेंस, लेंस सूत्र व क्षमता, मानव नेत्र, उसके दोष व उनका संशोधन, तथा वायुमंडल में विक्षेपण व प्रकीर्णन पढ़ाए गए हैं। प्रत्येक सूत्र के साथ उसका चिह्न-परिपाटी व हल किया गया संख्यात्मक उदाहरण है, क्योंकि परीक्षा में छोटे संख्यात्मक प्रश्न और “कौन-सा लेंस किस दोष को ठीक करता है” जैसे तथ्य पूछे जाते हैं।

1. परावर्तन और समतल दर्पण

परावर्तन के नियम: (i) आपतन कोण परावर्तन कोण के बराबर होता है; (ii) आपतित किरण, परावर्तित किरण और आपतन बिंदु पर अभिलंब, तीनों एक ही तल में होते हैं। दोनों कोण अभिलंब से नापे जाते हैं, दर्पण की सतह से नहीं। सबसे आम भूल यही है: जो किरण दर्पण की सतह से 30° पर टकराती है उसका आपतन कोण 60° है, इसलिए आपतित व परावर्तित किरणों के बीच 2 × 60° = 120° का कोण बनता है।

समतल दर्पण में बना प्रतिबिंब आभासी, सीधा, वस्तु के बराबर आकार का और पार्श्व-उल्टा होता है, तथा दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है जितनी दूरी पर वस्तु आगे है। दर्पण की ओर 1 m/s से चलने पर प्रतिबिंब आपकी ओर 2 m/s से आता है। यदि आप दर्पण से 5 m दूर हैं और 1 m पास आ जाएँ, तो आप 4 m दूर हैं, प्रतिबिंब 4 m पीछे है, अतः आपके और प्रतिबिंब के बीच 8 m है। θ कोण पर झुके दो समतल दर्पण, जब 360°/θ सम पूर्ण संख्या हो, n = 360°/θ − 1 प्रतिबिंब बनाते हैं: 60° पर 5 और 90° पर 3 प्रतिबिंब।

🎯 ऐसा क्यों होता है
प्रतिबिंब आभासी इसलिए है कि परावर्तित किरणें केवल दर्पण के पीछे से आती प्रतीत होती हैं, वहाँ वास्तव में मिलती नहीं, इसलिए पर्दे पर नहीं उतरता। पार्श्व-उलटाव में दायाँ-बायाँ बदल जाता है; इसी कारण एम्बुलेंस के आगे AMBULANCE उल्टा लिखा जाता है ताकि आगे वाले चालक को पीछे-दर्शी दर्पण में सीधा पढ़ने में आए।

2. गोलीय दर्पण: पद, चिह्न-परिपाटी और दर्पण सूत्र

अवतल दर्पण भीतर की ओर वक्रित होता है (परावर्तक सतह गोले के भीतर की ओर) और समांतर किरणों को अभिसारित करता है; उत्तल दर्पण बाहर की ओर उभरा होता है और उन्हें अपसारित करता है। ध्रुव P दर्पण का मध्य बिंदु है, वक्रता केंद्र C उस गोले का केंद्र है जिससे दर्पण कटा है, वक्रता त्रिज्या R = PC है, और मुख्य फोकस F वह बिंदु है जहाँ अक्ष के समांतर किरणें मिलती हैं (अवतल में, वास्तविक) या जहाँ से आती प्रतीत होती हैं (उत्तल में, आभासी)। फोकस दूरी f = PF है तथा f = R/2।

नई कार्तीय चिह्न-परिपाटी: सभी दूरियाँ ध्रुव से नापी जाती हैं; वस्तु सदैव बाईं ओर रखी जाती है, आपतित प्रकाश की दिशा (दाईं ओर) की दूरियाँ धनात्मक और विपरीत दिशा की ऋणात्मक मानी जाती हैं। अक्ष से ऊपर की ऊँचाइयाँ धनात्मक, नीचे की ऋणात्मक। अतः वास्तविक वस्तु के लिए u ऋणात्मक है; अवतल दर्पण की f ऋणात्मक और उत्तल दर्पण की f धनात्मक होती है। दर्पण सूत्र है 1/v + 1/u = 1/f और आवर्धन m = h′/h = −v/u। m ऋणात्मक हो तो प्रतिबिंब वास्तविक व उलटा, धनात्मक हो तो आभासी व सीधा।

हल उदाहरण 1. एक अवतल दर्पण की f = −10 cm है और वस्तु u = −15 cm पर है। तब 1/v = 1/f − 1/u = −1/10 + 1/15 = −1/30, अतः v = −30 cm: प्रतिबिंब दर्पण के सामने 30 cm पर है, और m = −v/u = −(−30)/(−15) = −2, अर्थात् वास्तविक, उलटा और दो गुना बड़ा। हल उदाहरण 2. एक उत्तल दर्पण की f = +20 cm और u = −30 cm है। तब 1/v = 1/20 + 1/30 = 1/12, अतः v = +12 cm (दर्पण के पीछे 12 cm) और m = −12/(−30) = +0.4: आभासी, सीधा, छोटा।

3. दर्पणों द्वारा प्रतिबिंब और उनके उपयोग

उत्तल दर्पण, किसी भी वास्तविक वस्तु के लिए, दर्पण के पीछे P और F के बीच आभासी, सीधा, छोटा प्रतिबिंब बनाता है।
वस्तु की स्थिति (अवतल दर्पण)प्रतिबिंब की स्थितिप्रकृति व आकार
अनंत परF परवास्तविक, उलटा, अत्यंत छोटा
C से परेF और C के बीचवास्तविक, उलटा, छोटा
C परC परवास्तविक, उलटा, समान आकार
C और F के बीचC से परेवास्तविक, उलटा, बड़ा
F परअनंत परवास्तविक, उलटा, अत्यंत बड़ा
P और F के बीचदर्पण के पीछेआभासी, सीधा, बड़ा
  • अवतल दर्पण (प्रकाश अभिसारित करता है; पास की वस्तु का बड़ा आभासी प्रतिबिंब): शेविंग व मेक-अप दर्पण, दंत-चिकित्सक व डॉक्टर के शीर्ष-दर्पण, टॉर्च व वाहन-हेडलाइट के परावर्तक (लैंप F पर रखा जाता है ताकि समांतर पुंज मिले), सौर कुकर व भट्ठियाँ।
  • उत्तल दर्पण (प्रतिबिंब सदैव सीधा व छोटा, अतः दृष्टि-क्षेत्र विस्तृत): वाहनों के पीछे-दर्शी दर्पण, दुकानों व सड़क के मोड़ों पर सुरक्षा-दर्पण।
🧠 स्मरण-सूत्र
अवतल दर्पण के लिए स्थितियाँ दूर से पास गिनें: अनंत, C से परे, C, C-F के बीच, F, F के भीतर। प्रतिबिंब क्रमशः F, F-C के बीच, C, C से परे, अनंत पर जाता है और फिर दर्पण के पीछे आ जाता है। वास्तविक प्रतिबिंब सदैव उलटे होते हैं और आभासी सदैव सीधे। अवतल दर्पण में बड़ा आभासी प्रतिबिंब केवल तब मिलता है जब वस्तु F के भीतर हो।

4. अपवर्तन, अपवर्तनांक और लेंस

अपवर्तन प्रकाश का वह मुड़ना है जब वह एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे में तिरछा जाता है, क्योंकि उसकी चाल बदल जाती है। सघन (प्रकाशिक रूप से सघन) माध्यम में जाने पर वह अभिलंब की ओर और विरल माध्यम में जाने पर अभिलंब से दूर मुड़ता है। स्नेल का नियम: माध्यमों के किसी दिए युग्म के लिए sin i / sin r नियत होता है। निरपेक्ष अपवर्तनांक n = c/v है, जहाँ c = 3 × 10⁸ m/s निर्वात में प्रकाश की चाल है; इसका कोई मात्रक नहीं और यह 1 से कम कभी नहीं होता। प्रारूपिक मान: जल लगभग 1.33, क्राउन काँच लगभग 1.5, हीरा लगभग 2.42। n = 1.5 वाले काँच में प्रकाश 3 × 10⁸/1.5 = 2 × 10⁸ m/s से चलता है। आयताकार काँच की सिल्ली किरण को बग़ल में खिसका देती है, पर निर्गत किरण आपतित किरण के समांतर होती है।

उत्तल (अभिसारी) लेंस बीच में मोटा और अवतल (अपसारी) लेंस बीच में पतला होता है। लेंस में भी यही चिह्न-परिपाटी चलती है, दूरियाँ प्रकाशिक केंद्र से नापी जाती हैं: लेंस सूत्र 1/v − 1/u = 1/f, आवर्धन m = h′/h = v/u (दर्पण के −v/u से चिह्न भिन्न है), और क्षमता P = 1/f, जहाँ f मीटर में है; मात्रक डायोप्टर (D) है। उत्तल लेंस की f व P धनात्मक; अवतल लेंस की ऋणात्मक। संपर्क में रखे लेंसों की क्षमताएँ बीजगणितीय रूप में जुड़ती हैं: P = P₁ + P₂।

हल उदाहरण 3. उत्तल लेंस f = +10 cm, वस्तु u = −30 cm: 1/v = 1/f + 1/u = 1/10 − 1/30 = 1/15, अतः v = +15 cm (दूसरी ओर वास्तविक प्रतिबिंब) और m = v/u = −0.5: उलटा और आधे आकार का। हल उदाहरण 4. अवतल लेंस f = −20 cm, u = −20 cm: 1/v = −1/20 − 1/20 = −1/10, v = −10 cm और m = +0.5: आभासी, सीधा, आधे आकार का। क्षमता: f = +25 cm से P = +4 D; f = −50 cm से P = −2 D; +3 D का लेंस −1 D के लेंस के संपर्क में +2 D देता है, अतः f = 50 cm।

⚠️ परीक्षा-जाल
दर्पण: m = −v/u। लेंस: m = v/u। दर्पण सूत्र 1/v + 1/u है; लेंस सूत्र 1/v − 1/u। इन्हें आपस में बदल देने से लगभग हर संख्यात्मक प्रश्न का भ्रामक विकल्प बनता है। साथ ही, अवतल लेंस वास्तविक वस्तु का वास्तविक प्रतिबिंब कभी नहीं बनाता (सदैव आभासी, सीधा, छोटा), जबकि उत्तल लेंस वस्तु के F से परे होने पर बनाता है।

5. मानव नेत्र और उसके दोष

प्रकाश पारदर्शी कॉर्निया से भीतर आता है, जो अधिकांश अपवर्तन करता है; उसके पीछे परितारिका (रंगीन पेशी) पुतली का आकार नियंत्रित करती है, जो तय करती है कि कितना प्रकाश भीतर जाए। नेत्र लेंस फ़ोकस को सूक्ष्मता से समायोजित करता है और दृष्टिपटल (रेटिना) पर वास्तविक, उलटा प्रतिबिंब बनाता है, जहाँ प्रकाश-संवेदी शलाका व शंकु कोशिकाएँ प्रकाशिक तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क को संकेत भेजती हैं। पक्ष्माभी पेशियाँ लेंस की वक्रता बदलती हैं: यही समंजन है। सामान्य नेत्र का निकट बिंदु लगभग 25 cm और दूर बिंदु अनंत होता है।

दोषव्यक्ति क्या देख पाता हैकारणसंशोधन
निकट-दृष्टि दोषपास स्पष्ट, दूर धुँधलानेत्र-गोलक अधिक लंबा या लेंस अधिक वक्र; प्रतिबिंब रेटिना के आगे बनता हैअवतल (अपसारी) लेंस, ऋणात्मक क्षमता
दीर्घ-दृष्टि दोषदूर स्पष्ट, पास धुँधलानेत्र-गोलक छोटा या लेंस अधिक चपटा; प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता हैउत्तल (अभिसारी) लेंस, धनात्मक क्षमता
जरा-दूरदृष्टिताआयु के साथ निकट बिंदु दूर हो जाता हैपक्ष्माभी पेशियाँ दुर्बल, लेंस का लचीलापन घटता हैद्विफोकसी लेंस (ऊपर अवतल, नीचे उत्तल)

हल उदाहरण 5 (निकट-दृष्टि)। किसी व्यक्ति का दूर बिंदु 80 cm है। लेंस को अत्यंत दूर की वस्तु (u = −∞) का प्रतिबिंब 80 cm पर बनाना है, अतः f = −80 cm = −0.8 m और P = 1/f = −1.25 D, अर्थात् अवतल लेंस। हल उदाहरण 6 (दीर्घ-दृष्टि)। किसी का निकट बिंदु 50 cm है पर वह 25 cm पर पढ़ना चाहता है। लेंस को u = −25 cm की वस्तु का प्रतिबिंब v = −50 cm पर बनाना है: 1/f = 1/v − 1/u = −1/50 + 1/25 = 1/50, अतः f = +50 cm और P = +2 D, अर्थात् उत्तल लेंस। मोतियाबिंद भिन्न समस्या है: आयु के साथ क्रिस्टलीय लेंस धुँधला हो जाता है और उसका उपचार शल्य-क्रिया से होता है, चश्मे से नहीं।

🧠 स्मरण-सूत्र
निकट-दृष्टि में पास साफ़, दूर धुँधला और ऋणात्मक (अवतल) लेंस; दीर्घ-दृष्टि में धनात्मक (उत्तल) लेंस। अवतल = ऋण = अपसारी; उत्तल = धन = अभिसारी।

6. विक्षेपण, वायुमंडलीय अपवर्तन और प्रकीर्णन

विक्षेपण: काँच का प्रिज़्म श्वेत प्रकाश को उसके सात रंगों VIBGYOR (बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल) में बाँट देता है, क्योंकि काँच में प्रत्येक रंग की चाल भिन्न होती है और इसलिए वह भिन्न मात्रा में मुड़ता है। बैंगनी सबसे अधिक और लाल सबसे कम मुड़ता है। न्यूटन ने दूसरे उलटे प्रिज़्म से रंगों को पुनः मिलाया। इंद्रधनुष तब बनता है जब वर्षा की बूँदों में सूर्य-प्रकाश का विक्षेपण व आंतरिक परावर्तन होता है; यह तब दिखता है जब सूर्य प्रेक्षक के पीछे और वर्षा सामने हो।

वायुमंडलीय अपवर्तन: वायु की परतों के घनत्व भिन्न होते हैं, इसलिए तारे का प्रकाश क्रमशः मुड़ता है और उसकी आभासी स्थिति डगमगाती है; इसी से तारे टिमटिमाते हैं। ग्रह बहुत पास होते हैं और विस्तारित स्रोत की तरह काम करते हैं, अतः उतार-चढ़ाव औसत होकर मिट जाते हैं और वे नहीं टिमटिमाते। इसी कारण सूर्य वास्तविक सूर्योदय से लगभग 2 मिनट पहले और वास्तविक सूर्यास्त के लगभग 2 मिनट बाद तक दिखता है।

प्रकीर्णन: टिंडल प्रभाव कोलॉइड या वायु में उपस्थित कणों द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन है (धूल-भरे कमरे या जंगल की धुंध में दिखता प्रकाश-पुंज)। वायु के अणुओं द्वारा प्रकीर्णन कम तरंगदैर्घ्य के लिए कहीं अधिक होता है, इसलिए प्रकीर्णित नीला प्रकाश आकाश में फैलकर उसे नीला दिखाता है; सूर्योदय व सूर्यास्त पर प्रकाश वायु की मोटी परत से गुज़रता है, नीला प्रकाश बिखर जाता है और सूर्य लालिमा लिए दिखता है। लाल प्रकाश कोहरे व धुएँ से सबसे कम प्रकीर्णित होता है, इसलिए खतरे के संकेतों, रेल-संकेतों सहित, में लाल रंग प्रयोग होता है क्योंकि वह दूर से दिखता है। अंतरिक्ष-यात्री को आकाश काला दिखता है क्योंकि वहाँ प्रकाश बिखेरने वाली वायु नहीं है।

⚠️ परीक्षा-जाल
बैंगनी सबसे अधिक मुड़ता है पर लाल सबसे कम प्रकीर्णित होता है। आकाश नीला इसलिए है कि नीला सबसे अधिक प्रकीर्णित होता है, न कि इसलिए कि वह सबसे अधिक “अपवर्तित” होता है। विक्षेपण प्रिज़्म में अपवर्तन का प्रभाव है; आकाश का रंग प्रकीर्णन का प्रभाव है।

मुख्य बिंदु

  • आपतन व परावर्तन कोण अभिलंब से नापे जाते हैं; समतल दर्पण का प्रतिबिंब आभासी, सीधा, समान आकार का व पार्श्व-उल्टा होता है, और उतना ही पीछे बनता है जितनी वस्तु आगे है।
  • दर्पण: 1/v + 1/u = 1/f, m = −v/u, f = R/2; लेंस: 1/v − 1/u = 1/f, m = v/u, P = 1/f डायोप्टर में (f मीटर में)। अवतल दर्पण व अवतल लेंस की f ऋणात्मक; उत्तल दर्पण व उत्तल लेंस की f धनात्मक।
  • वास्तविक प्रतिबिंब उलटे और आभासी सीधे होते हैं; अवतल दर्पण या उत्तल लेंस बड़ा आभासी प्रतिबिंब तभी देते हैं जब वस्तु F के भीतर हो; उत्तल दर्पण व अवतल लेंस सदैव आभासी, सीधा, छोटा प्रतिबिंब देते हैं।
  • अपवर्तनांक n = c/v (c = 3 × 10⁸ m/s); सघन माध्यम में प्रकाश अभिलंब की ओर मुड़ता है। संपर्क में रखे लेंसों की क्षमताएँ बीजगणितीय रूप से जुड़ती हैं।
  • निकट-दृष्टि दोष अवतल लेंस (ऋणात्मक क्षमता) से, दीर्घ-दृष्टि दोष उत्तल लेंस (धनात्मक क्षमता) से और जरा-दूरदृष्टिता द्विफोकसी लेंस से ठीक होती है; लेंस की क्षमता P = 1/f (डायोप्टर में) होती है; निकट-दृष्टि दोष में f दूर-बिंदु की दूरी (ऋणात्मक) के बराबर होता है, और दीर्घ-दृष्टि दोष में 1/f = 1/v − 1/u प्रयोग करें।
  • प्रिज़्म में बैंगनी सबसे अधिक व लाल सबसे कम मुड़ता है; तारे वायुमंडलीय अपवर्तन से टिमटिमाते हैं; आकाश का नीलापन व अस्त होते सूर्य की लालिमा प्रकीर्णन से हैं; लाल रंग सबसे कम प्रकीर्णित होने से खतरे के संकेत में प्रयुक्त होता है।

अभ्यास प्रश्न (16)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. वाहनों में पीछे-दर्शी दर्पण के रूप में कौन-सा दर्पण लगाया जाता है, और किस कारण से?

    1. उत्तल दर्पण, क्योंकि वह सदैव सीधा, छोटा प्रतिबिंब और विस्तृत दृष्टि-क्षेत्र देता है
    2. अवतल दर्पण, क्योंकि वह पीछे के वाहनों का बड़ा और सीधा प्रतिबिंब देता है
    3. समतल दर्पण, क्योंकि वह वाहन के पीछे की सड़क का वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है
    4. अवतल दर्पण, क्योंकि वह पीछे के वाहनों का प्रकाश चालक की आँख में अभिसारित करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उत्तल दर्पण, क्योंकि वह सदैव सीधा, छोटा प्रतिबिंब और विस्तृत दृष्टि-क्षेत्र देता है

    उत्तल दर्पण किसी भी वास्तविक वस्तु का सीधा, छोटा आभासी प्रतिबिंब बनाता है और छोटा प्रतिबिंब होने से छोटे दर्पण में बड़ा क्षेत्र समा जाता है। अवतल दर्पण केवल पास की वस्तु का बड़ा प्रतिबिंब देता है और दूर की वस्तु का उलटा वास्तविक, अतः अनुपयुक्त है; समतल दर्पण का प्रतिबिंब आभासी होता है, वास्तविक नहीं, और दृष्टि-क्षेत्र संकरा।
  2. एक अवतल दर्पण की फोकस दूरी 10 cm है। वस्तु को उसके ध्रुव से 15 cm दूर रखा गया है। प्रतिबिंब कहाँ बनेगा?

    1. दर्पण के पीछे 6 cm पर
    2. दर्पण के सामने 30 cm पर
    3. दर्पण के पीछे 30 cm पर
    4. दर्पण के सामने 6 cm पर
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — दर्पण के सामने 30 cm पर

    f = −10 cm और u = −15 cm लेने पर 1/v = 1/f − 1/u = −1/10 + 1/15 = −1/30, अतः v = −30 cm: प्रतिबिंब वास्तविक और सामने 30 cm पर है। 6 cm का मान 1/10 व 1/15 को जोड़ने (f का चिह्न ग़लत) से आता है, और धनात्मक v का अर्थ दर्पण के पीछे आभासी प्रतिबिंब होता, जो फोकस से परे वस्तु के लिए संभव नहीं।
  3. दो समतल दर्पण परस्पर 60° कोण पर झुके हैं और उनके बीच एक छोटी वस्तु रखी है। कितने प्रतिबिंब बनेंगे?

    1. 3
    2. 4
    3. 5
    4. 6
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — 5

    प्रतिबिंबों की संख्या 360°/θ − 1 होती है जब 360°/θ सम पूर्णांक हो, अतः 360/60 − 1 = 5। उत्तर 6 में एक घटाना भूल जाते हैं (उस गणना में वस्तु स्वयं जुड़ी होती है), और 3 दर्पणों के 90° पर होने का परिणाम है।
  4. निर्वात में प्रकाश की चाल 3 × 10⁸ m/s है। निरपेक्ष अपवर्तनांक 1.5 वाले काँच में उसकी चाल कितनी होगी?

    1. 4.5 × 10⁸ m/s
    2. 1.5 × 10⁸ m/s
    3. 3 × 10⁸ m/s
    4. 2 × 10⁸ m/s
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — 2 × 10⁸ m/s

    n = c/v से v = c/n = 3 × 10⁸/1.5 = 2 × 10⁸ m/s। 4.5 × 10⁸ का मान भाग की जगह गुणा करने से आता है, जिससे पदार्थ में प्रकाश की चाल c से अधिक हो जाती, जो असंभव है।
  5. 10 cm फोकस दूरी का एक उत्तल लेंस लेंस से 30 cm दूर रखी वस्तु का प्रतिबिंब बनाता है। प्रतिबिंब कैसा है?

    1. वास्तविक, उलटा, लेंस की दूसरी ओर 15 cm पर
    2. आभासी, सीधा, वस्तु वाली ओर 15 cm पर
    3. वास्तविक, उलटा, लेंस की दूसरी ओर 7.5 cm पर
    4. वास्तविक, उलटा, लेंस की दूसरी ओर 30 cm पर
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — वास्तविक, उलटा, लेंस की दूसरी ओर 15 cm पर

    1/v = 1/f + 1/u = 1/10 − 1/30 = 1/15, अतः v = +15 cm, दूसरी ओर वास्तविक प्रतिबिंब, m = v/u = −0.5 (उलटा, आधा आकार)। 7.5 cm वाला विकल्प दोनों व्युत्क्रमों को जोड़ने से आता है, और 30 cm की प्रतिबिंब दूरी के लिए वस्तु 15 cm (u = −15 cm) पर चाहिए, 30 cm पर नहीं; 2f = 20 cm पर रखी वस्तु का प्रतिबिंब 20 cm पर बनता है।
  6. 25 cm फोकस दूरी वाले उत्तल लेंस की क्षमता कितनी है?

    1. +0.25 D
    2. +4 D
    3. −4 D
    4. +25 D
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — +4 D

    f मीटर में लेने पर P = 1/f: f = 0.25 m, अतः P = +4 D, उत्तल लेंस के लिए धनात्मक। f = 25 को मीटर में बदले बिना लेने से 1/25 = 0.04 आता है, जो ग़लत है, और −4 D उसी फोकस दूरी के अवतल लेंस का होता।
  7. इन कथनों पर विचार कीजिए। P: उत्तल दर्पण वास्तविक वस्तु का सदैव आभासी, सीधा, छोटा प्रतिबिंब बनाता है। Q: अवतल लेंस वास्तविक वस्तु का वास्तविक प्रतिबिंब बना सकता है। R: जब वस्तु अवतल दर्पण के ध्रुव व फोकस के बीच हो तो वह आभासी, बड़ा प्रतिबिंब बनाता है। S: समतल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब वास्तविक होता है। कौन-से कथन सही हैं?

    1. P, Q और R
    2. केवल R और S
    3. केवल P और R
    4. केवल P और S
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — केवल P और R

    P और R सही हैं। Q ग़लत है क्योंकि अवतल लेंस प्रकाश को सदैव अपसारित करता है और आभासी, सीधा, छोटा प्रतिबिंब देता है। S ग़लत है क्योंकि किरणें समतल दर्पण के पीछे से आती प्रतीत होती हैं, अतः प्रतिबिंब आभासी है; यही सबसे भ्रामक भूल है।
  8. निम्नलिखित में उपकरण और उसके दर्पण का कौन-सा युग्म सही नहीं है?

    1. दाँतों का बड़ा प्रतिबिंब देखने हेतु दंत-चिकित्सक का दर्पण: अवतल दर्पण
    2. सौर कुकर का परावर्तक: अवतल दर्पण
    3. सड़क के मोड़ का सुरक्षा-दर्पण: उत्तल दर्पण
    4. वाहन की हेडलाइट के पीछे का परावर्तक: उत्तल दर्पण
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — वाहन की हेडलाइट के पीछे का परावर्तक: उत्तल दर्पण

    हेडलाइट का परावर्तक अवतल दर्पण होता है जिसमें लैंप फोकस पर रहता है, ताकि अपसारी प्रकाश समांतर पुंज बन जाए; उत्तल दर्पण पुंज को केवल फैलाता। शेष तीनों युग्म मानक हैं: दंत-चिकित्सक व सौर कुकर अवतल दर्पण और मोड़ के सुरक्षा-दर्पण उत्तल दर्पण प्रयोग करते हैं।
  9. प्रकाश की एक किरण समतल दर्पण से इस प्रकार टकराती है कि वह दर्पण की सतह से 30° का कोण बनाती है। आपतित किरण और परावर्तित किरण के बीच का कोण कितना है?

    1. 120°
    2. 60°
    3. 30°
    4. 90°
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — 120°

    आपतन कोण अभिलंब से नापा जाता है, अतः वह 90° − 30° = 60° है। परावर्तित किरण भी अभिलंब से 60° बनाती है, इसलिए दोनों किरणों के बीच का कोण 120° है। 60° भ्रामक उत्तर है क्योंकि वह स्वयं आपतन कोण है, और 30° सतह के कोण को ही आपतन कोण मान लेता है।
  10. एक उत्तल दर्पण की फोकस दूरी +20 cm है और एक वास्तविक वस्तु उसके सामने 30 cm पर रखी है। प्रतिबिंब की दूरी और आवर्धन क्या होंगे?

    1. दर्पण के पीछे 60 cm, m = +2
    2. दर्पण के पीछे 12 cm, m = +0.4
    3. दर्पण के सामने 12 cm, m = −0.4
    4. दर्पण के सामने 60 cm, m = −2
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — दर्पण के पीछे 12 cm, m = +0.4

    1/v = 1/f − 1/u = 1/20 + 1/30 = 5/60, अतः v = +12 cm (दर्पण के पीछे) और m = −v/u = −12/(−30) = +0.4: आभासी, सीधा, छोटा। 60 cm वाला विकल्प व्युत्क्रमों को जोड़ने की जगह घटाने से आता है, जिससे बड़ा प्रतिबिंब मिल जाता, जो उत्तल दर्पण कभी नहीं बनाता।
  11. एक व्यक्ति पास की वस्तुएँ स्पष्ट देख सकता है पर दूर की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं देख पाता। यह कौन-सा दोष है और कौन-सा लेंस इसे ठीक करता है?

    1. दीर्घ-दृष्टि दोष, उत्तल लेंस
    2. जरा-दूरदृष्टिता, द्विफोकसी लेंस
    3. निकट-दृष्टि दोष, अवतल लेंस
    4. निकट-दृष्टि दोष, उत्तल लेंस
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — निकट-दृष्टि दोष, अवतल लेंस

    पास स्पष्ट और दूर धुँधला दिखना निकट-दृष्टि दोष है, जिसमें प्रतिबिंब रेटिना के आगे बनता है; अवतल (अपसारी) लेंस प्रतिबिंब को रेटिना पर पीछे ले आता है। दीर्घ-दृष्टि दोष इसका उलटा है और उत्तल लेंस माँगता है; जरा-दूरदृष्टिता आयु से समंजन-क्षमता घटना है।
  12. एक निकट-दृष्टि दोष वाले व्यक्ति का दूर बिंदु 80 cm है। इस व्यक्ति को दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाने वाले लेंस की क्षमता कितनी है?

    1. +1.25 D
    2. −80 D
    3. −0.8 D
    4. −1.25 D
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — −1.25 D

    लेंस को अनंत पर स्थित वस्तु का प्रतिबिंब दूर बिंदु पर बनाना है, अतः f = −80 cm = −0.8 m और P = 1/f = −1.25 D। −0.8 में व्युत्क्रम लेना भूल जाते हैं, और +1.25 D का परिमाण सही है पर वह उत्तल लेंस होता, जो निकट-दृष्टि और बिगाड़ता।
  13. एक दीर्घ-दृष्टि दोष वाले व्यक्ति का निकट बिंदु 50 cm है। 25 cm के सामान्य निकट बिंदु पर पुस्तक पकड़कर पढ़ने के लिए कितनी क्षमता का लेंस चाहिए?

    1. +2 D
    2. −2 D
    3. +4 D
    4. +0.5 D
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — +2 D

    लेंस को u = −25 cm की वस्तु का प्रतिबिंब v = −50 cm पर बनाना है: 1/f = 1/v − 1/u = −1/50 + 1/25 = 1/50, अतः f = +50 cm और P = +2 D। +4 D भ्रामक उत्तर है जो 50 cm के निकट बिंदु की उपेक्षा कर केवल 25 cm लेता है, और −2 D का चिह्न दीर्घ-दृष्टि के लिए ग़लत है।
  14. सामान्य मानव नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश का वह क्रम कौन-सा है जो मस्तिष्क के लिए संकेत बनने तक सही पथ बताता है?

    1. कॉर्निया, लेंस, पुतली, रेटिना, प्रकाशिक तंत्रिका
    2. कॉर्निया, पुतली, लेंस, रेटिना, प्रकाशिक तंत्रिका
    3. पुतली, कॉर्निया, लेंस, प्रकाशिक तंत्रिका, रेटिना
    4. कॉर्निया, पुतली, रेटिना, लेंस, प्रकाशिक तंत्रिका
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — कॉर्निया, पुतली, लेंस, रेटिना, प्रकाशिक तंत्रिका

    प्रकाश पारदर्शी कॉर्निया से, फिर पुतली (जिसका आकार परितारिका नियंत्रित करती है) से, फिर नेत्र लेंस से गुज़रकर रेटिना पर फ़ोकस होता है, जिसकी शलाका व शंकु कोशिकाएँ प्रकाशिक तंत्रिका से संकेत भेजती हैं। पुतली कॉर्निया के पीछे और लेंस के आगे होती है, और यही चरण सबसे अधिक उलटा जाता है।
  15. खतरे के संकेतों, रेल-संकेतों सहित, में लाल प्रकाश क्यों प्रयोग किया जाता है?

    1. हवा में प्रवेश करने पर लाल प्रकाश सबसे अधिक मुड़ता है, इसलिए वह बड़े कोण पर दिखता है
    2. लाल प्रकाश की आवृत्ति सबसे अधिक होती है, इसलिए वह दूरी तक सबसे अधिक ऊर्जा ले जाता है
    3. लाल प्रकाश कोहरे, धूल व धुएँ से सबसे कम प्रकीर्णित होता है, इसलिए दूर से दिखाई देता है
    4. लाल प्रकाश सबसे अधिक प्रकीर्णित होता है, इसलिए हर दिशा से दिखाई देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — लाल प्रकाश कोहरे, धूल व धुएँ से सबसे कम प्रकीर्णित होता है, इसलिए दूर से दिखाई देता है

    प्रकीर्णन कम तरंगदैर्घ्य के लिए सबसे अधिक और दृश्य प्रकाश के सबसे लंबे तरंगदैर्घ्य वाले लाल के लिए सबसे कम होता है, इसलिए लाल संकेत कोहरे व धुएँ में सबसे कम क्षय के साथ गुज़रता है। प्रिज़्म में लाल सबसे कम मुड़ता है, सबसे अधिक नहीं, और उसकी आवृत्ति दृश्य रंगों में सबसे कम है, इसलिए पहले दो कारण ग़लत हैं।
  16. तारों के टिमटिमाने का मुख्य कारण निम्नलिखित में से कौन-सा है?

    1. वायुमंडल की ऊपरी परत द्वारा तारे के प्रकाश का प्रिज़्म-जैसा विक्षेपण
    2. वायु में धूल द्वारा तारे के प्रकाश का पूर्ण अवशोषण
    3. तारों की अपनी चमक में प्रति सेकंड होने वाले परिवर्तन
    4. बदलते घनत्व वाली वायु-परतों से होकर वायुमंडलीय अपवर्तन
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — बदलते घनत्व वाली वायु-परतों से होकर वायुमंडलीय अपवर्तन

    तारे का प्रकाश भिन्न व घटते-बढ़ते घनत्व वाली वायु-परतों से गुज़रता है, इसलिए पल-पल थोड़ा भिन्न अपवर्तित होता है और तारे की आभासी स्थिति व चमक डगमगाती है। विक्षेपण रंगों को अलग करता है, तारे को झिलमिलाता नहीं, और तारों का अपना प्रकाश एक सेकंड के पैमाने पर नहीं बदलता।