पुलिस परीक्षाओं के लिए सामान्य हिंदी: व्याकरण व शब्द-भंडार

यह अध्याय उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली की पुलिस सिपाही व उप-निरीक्षक भर्ती परीक्षाओं के लिखित प्रश्न-पत्र के सामान्य हिंदी खंड का उत्तर देता है, जो मैट्रिक (कक्षा 10) स्तर के हिंदी व्याकरण और शब्द-भंडार पर आधारित होता है। इसमें वे विषय पढ़ाए गए हैं जो प्रश्न-पत्रों में बार-बार पूछे जाते हैं: संधि, समास, उपसर्ग व प्रत्यय, काल, वाच्य, कारक, आठ भेदों वाले शब्द-भेद, विलोम, पर्यायवाची, अनेकार्थी शब्द, अनेक शब्दों के लिए एक शब्द, मुहावरे व लोकोक्तियाँ, शुद्ध-अशुद्ध वर्तनी तथा विराम-चिह्न। यहाँ हिंदी मुख्य भाषा है; अंग्रेज़ी पाठ प्रत्येक नियम समझाता है और हिंदी उदाहरण रोमन लिपि में देता है। प्रत्येक खंड में वह जाल भी बताया गया है जिसमें अंक कटते हैं और दस सेकंड में लगने वाली एक जाँच-विधि भी।

1. संधि: ध्वनियों का मेल

संधि का अर्थ है एक शब्द की अंतिम ध्वनि का अगले शब्द की पहली ध्वनि से मिलकर एक रूप हो जाना; मिले हुए शब्द को वापस अलग करना संधि-विच्छेद कहलाता है। संधि के तीन भेद हैं: स्वर संधि (स्वर + स्वर), व्यंजन संधि (व्यंजन का स्वर या व्यंजन से मेल) और विसर्ग संधि (विसर्ग में परिवर्तन)। मैट्रिक स्तर के प्रश्नों में स्वर संधि सबसे अधिक आती है, इसलिए उसके पाँच उपभेद तालिका से याद कीजिए।

स्वर संधि एक नज़र में
स्वर संधि का भेदनियम (स्वर + स्वर से)उदाहरण
दीर्घअ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊहिम + आलय = हिमालय; विद्या + अर्थी = विद्यार्थी; रवि + इंद्र = रवींद्र
गुणअ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्गण + ईश = गणेश; सूर्य + उदय = सूर्योदय; महा + ऋषि = महर्षि
वृद्धिअ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औसदा + एव = सदैव; वन + औषधि = वनौषधि
यणइ/ई, उ/ऊ, ऋ + भिन्न स्वर: ये य्, व्, र् बनते हैं और अगला स्वर जुड़ता हैइति + आदि = इत्यादि; सु + आगत = स्वागत; अनु + अय = अन्वय
अयादिए, ऐ, ओ, औ + कोई स्वर = अय्, आय्, अव्, आव्ने + अन = नयन; नै + अक = नायक; पो + अन = पवन; नौ + इक = नाविक
🧠 स्मरण-सूत्र
तीनों के लिए सूत्र: समान स्वर मिलें तो दीर्घ, अ-वर्ण + इ/उ/ऋ मिले तो ए/ओ/अर् (गुण), अ-वर्ण + ए/ओ मिले तो ऐ/औ (वृद्धि)। यण और अयादि में जुड़े शब्द में य्, व्, र् या अय्, अव् दिखें तो उसी ओर सोचिए: स्वागत में व् है, नायक में आय् है।

व्यंजन संधि के उदाहरण: जगत् + ईश = जगदीश (त् का द् होना); सत् + जन = सज्जन; उत् + लास = उल्लास; दिक् + गज = दिग्गज; सम् + तोष = संतोष; उत् + ज्वल = उज्ज्वल। विसर्ग संधि: निः + चल = निश्चल; निः + कपट = निष्कपट; मनः + हर = मनोहर; नमः + ते = नमस्ते; तपः + बल = तपोबल; निः + धन = निर्धन। विसर्ग आगे की ध्वनि के अनुसार प्रायः ओ, र्, श् या स् में बदलता है।

⚠️ परीक्षा का जाल
आम भूलें: विद्यालय व हिमालय दीर्घ संधि हैं (आ + आ तथा अ + आ), गुण नहीं; सूर्योदय व परमेश्वर गुण संधि हैं (अ + उ तथा अ + ई), दीर्घ नहीं; सदैव व मतैक्य वृद्धि संधि हैं। शब्द की शक्ल नहीं, मिलने वाले दोनों स्वर देखिए।

2. समास: शब्दों का संक्षिप्त मेल

समास में दो या अधिक शब्द बीच के संबंध-सूचक शब्द हटाकर एक हो जाते हैं; उसे फिर पूरे वाक्यांश में खोलना विग्रह कहलाता है। सब कुछ इस पर टिका है कि प्रधान पद कौन-सा है, और इसी से छह भेद अलग होते हैं।

छह समास व प्रत्येक की पहचान
समासप्रधान पदपहचानउदाहरण व विग्रह
अव्ययीभावपहला पद (अव्यय)पूरा शब्द क्रियाविशेषण जैसा चलता हैयथाशक्ति = शक्ति के अनुसार; प्रतिदिन = हर दिन; आजन्म = जन्म तक; भरपेट = पेट भरकर
तत्पुरुषदूसरा पदकारक-चिह्न (को, से, का, में...) छिपा होता हैराजपुत्र = राजा का पुत्र; हस्तलिखित = हाथ से लिखित; देशनिकाला = देश से निकाला; शरणागत = शरण को आगत
कर्मधारयदूसरा पदविशेषण + संज्ञा, या उपमान-उपमेयनीलकमल = नीला है जो कमल; महापुरुष = महान है जो पुरुष; चरणकमल = कमल के समान चरण
द्विगुदूसरा पदपहला पद संख्या; शब्द समूह बताता हैनवरात्र = नौ रात्रियों का समूह; त्रिलोक = तीन लोकों का समूह; चौराहा = चार राहों का समूह; सप्ताह = सात दिनों का समूह
द्वंद्वदोनों पदविग्रह में 'और' या 'या' आता हैमाता-पिता = माता और पिता; दाल-रोटी = दाल और रोटी; भला-बुरा = भला या बुरा
बहुव्रीहिकोई नहीं; कोई तीसरा अर्थविग्रह 'जो / जिसके ...' पर समाप्तदशानन = दश हैं आनन जिसके (रावण); लंबोदर = लंबा है उदर जिसका (गणेश); चक्रधर = चक्र धारण करे जो (विष्णु); त्रिनेत्र = तीन हैं नेत्र जिसके (शिव)
🧠 स्मरण-सूत्र
स्थिति से भेद पहचानिए: पहला पद प्रधान = अव्ययीभाव; दूसरा पद प्रधान = तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु; दोनों प्रधान = द्वंद्व; कोई नहीं = बहुव्रीहि। फिर दूसरे पद वाले समूह में कारक-चिह्न छिपा हो तो तत्पुरुष, विशेषण-संज्ञा हो तो कर्मधारय, पहला पद संख्या हो तो द्विगु।
⚠️ परीक्षा का जाल
द्विगु बनाम बहुव्रीहि: त्रिलोक (तीन लोकों का समूह) द्विगु है, पर शिव के अर्थ में त्रिनेत्र (तीन नेत्रों वाला) बहुव्रीहि है, जैसे विष्णु के अर्थ में चतुर्भुज। इसी तरह नीलकमल (नीला कमल) कर्मधारय है। विग्रह 'जिसके' या 'जो' पर समाप्त हो तो बहुव्रीहि है।

3. उपसर्ग व प्रत्यय

उपसर्ग शब्द के पहले जुड़कर अर्थ बदलता या जोड़ता है; प्रत्यय शब्द (या धातु) के बाद जुड़कर नया शब्द बनाता है। दिशा याद रखिए: उपसर्ग आगे, प्रत्यय पीछे। संस्कृत के उपसर्ग 22 हैं: प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्/निर्, दुस्/दुर्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप (जोड़ी वाले रूप अलग-अलग गिनने पर)।

बार-बार पूछे जाने वाले संस्कृत उपसर्ग
उपसर्गअर्थउदाहरण
प्रआगे, अधिकप्रबल, प्रकाश, प्रसिद्ध
सु / दुर्अच्छा / बुरासुजन, सुपुत्र / दुर्जन, दुर्लभ

हिंदी के अपने उपसर्ग भी हैं: अ, अन (अनपढ़, अनजान), कु (कुपुत्र), सु (सुडौल), अध (अधपका), उन (उनतीस), भर (भरपेट) और नि (निडर)। उर्दू मूल के उपसर्ग हैं: बे (बेमिसाल, बेईमान), बद (बदनाम), ला (लापरवाह), गैर (गैरहाज़िर) और खुश (खुशबू)।

प्रत्यय के दो वर्ग हैं। कृत् प्रत्यय क्रिया की धातु में लगता है: पढ़ + आई = पढ़ाई; लिख + आवट = लिखावट; चल + अक = चालक; पठ् + अक = पाठक। तद्धित प्रत्यय संज्ञा, विशेषण या सर्वनाम में लगता है: मानव + ता = मानवता; लड़का + पन = लड़कपन; धन + वान = धनवान; बुद्धि + मान = बुद्धिमान; भारत + ईय = भारतीय; समाज + इक = सामाजिक।

⚠️ परीक्षा का जाल
'किस शब्द में उपसर्ग नहीं है?' जैसे प्रश्न में शब्द के आरंभ की जाँच कीजिए, अंत की नहीं। पढ़ाई में केवल अंत में प्रत्यय है; अनपढ़, निडर और कुपुत्र तीनों का आरंभ उपसर्ग से होता है। शब्द को तभी तोड़िए जब बचा हुआ भाग सार्थक शब्द या धातु हो।

4. काल व वाच्य

काल बताता है कि क्रिया कब होती है: भूत, वर्तमान और भविष्यत्। भूतकाल के उपभेद सबसे अधिक हैं और प्रश्न वहीं से आते हैं। वाक्य के अंत की सहायक क्रिया पहचानिए।

क्रिया के अंत से काल पहचानना
काल व भेदअंत का संकेतउदाहरण
सामान्य भूतकेवल भूतकालिक रूपराम ने पत्र लिखा।
आसन्न भूत+ है / हैंवह आया है।
पूर्ण भूत+ था / थी / थेवह आया था।
अपूर्ण भूतरहा था / रही थीवह जा रहा था।
संदिग्ध भूत+ होगा / होगीवह आया होगा।
हेतुहेतुमद् भूतदो उपवाक्य, 'यदि... तो', दोनों क्रियाएँ घटित नहींवर्षा होती तो फ़सल अच्छी होती।
वर्तमान सामान्यता / ती / ते + हैवह पढ़ता है।
भविष्यत् सामान्य+ एगा / एगी / एँगेवह पढ़ेगा।

वाच्य बताता है कि क्रिया किस संज्ञा के अनुसार चलती है। कर्तृवाच्य में क्रिया कर्ता के अनुसार होती है: 'राम पत्र लिखता है'। कर्मवाच्य में क्रिया कर्म के अनुसार होती है और कर्ता 'से' द्वारा दिखाया जाता है या छोड़ दिया जाता है: 'पत्र लिखा गया', 'राम से पत्र लिखा गया'। भाववाच्य में कर्म नहीं होता, क्रिया सदा पुल्लिंग एकवचन रहती है और वाक्य प्रायः असमर्थता बताता है: 'रोगी से उठा नहीं जाता', 'मुझसे चला नहीं जाता'। कर्मवाच्य का चिह्न कृदंत के साथ जाना है: लिखा गया, पढ़ा जाता है।

⚠️ परीक्षा का जाल
'ने' लगने से वाक्य कर्मवाच्य नहीं हो जाता। 'राम ने पत्र लिखा' कर्तृवाच्य ही है, भले ही क्रिया 'लिखा' कर्म 'पत्र' के अनुसार हो। कर्मवाच्य के लिए 'जाना' चाहिए (लिखा गया)। केवल 'से' वाले, कर्मरहित असमर्थता-वाक्य भाववाच्य हैं।

5. कारक व आठ शब्द-भेद

कारक संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया से संबंध है, जो विभक्ति (कारक-चिह्न) से प्रकट होता है। आठों को चिह्न और एक परीक्षण-वाक्य के साथ याद कीजिए।

आठ कारक
कारकचिह्नपरीक्षण-वाक्य
कर्ताने (या कोई नहीं)छात्र ने पाठ पढ़ा।
करणसे (साधन)वह कलम से लिखता है।
संप्रदानको, के लिए (देना)गुरु ने शिष्य को पुस्तक दी।
अपादानसे (अलगाव)वृक्ष से फल गिरा।
संबंधका, के, की; रा, रे, रीराम का घर बड़ा है।
अधिकरणमें, पर (स्थान या समय)पुस्तक मेज़ पर है।
कर्मको (या कोई नहीं)राम ने रावण को मारा।
संबोधनहे, अरे, ओ (पुकारना)अरे भाई, इधर आओ।
⚠️ परीक्षा का जाल
'से' दो रूपों में आता है। यदि वह साधन बताए (कलम से) तो करण है; यदि अलग होने का बिंदु बताए (घर से निकला, पेड़ से गिरा) तो अपादान। इसी प्रकार 'को' जब किसी को कुछ दिया जाए तब संप्रदान है, अन्यथा कर्म।

हिंदी के शब्द आठ भेदों में बँटते हैं। चार लिंग, वचन या कारक के अनुसार बदलते हैं, ये विकारी हैं: संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया। चार कभी नहीं बदलते, ये अविकारी या अव्यय हैं: क्रियाविशेषण (धीरे, यहाँ, कल), संबंधबोधक (के पास, के बिना), समुच्चयबोधक (और, किंतु, अथवा) और विस्मयादिबोधक (वाह, अरे, हाय)।

सर्वनाम के भेद: पुरुषवाचक (मैं, हम = उत्तम पुरुष; तू, तुम, आप = मध्यम; वह, वे, यह = अन्य), निश्चयवाचक (यह, वह), अनिश्चयवाचक (कोई, कुछ), संबंधवाचक (जो, सो), प्रश्नवाचक (कौन, क्या) और निजवाचक (आप, अपना, स्वयं)। विशेषण गुणवाचक (सुंदर), संख्यावाचक (तीन), परिमाणवाचक (थोड़ा दूध) और सार्वनामिक (यह लड़का) होते हैं। क्रिया सकर्मक (कर्म सहित) या अकर्मक (कर्म रहित) होती है।

⚠️ परीक्षा का जाल
आप के दो प्रयोग हैं। 'आप कहाँ जा रहे हैं?' में वह आदरसूचक मध्यम पुरुष (पुरुषवाचक) है। 'मैं आप ही चला जाऊँगा' में उसका अर्थ 'स्वयं' है और वह निजवाचक है। जाँच: क्या 'आप' उसी वाक्य के वक्ता या कर्ता की ओर लौटता है? यदि हाँ, तो निजवाचक।

6. विलोम, पर्यायवाची व अनेकार्थी शब्द

शब्दार्थ के प्रश्न तभी सबसे तेज़ अंक देते हैं जब जोड़ी पहले देखी हो, इसलिए समूह बनाकर याद कीजिए। विलोम विपरीतार्थक शब्द हैं; पर्यायवाची एक ही अर्थ के कई शब्द हैं; अनेकार्थी शब्द एक होते हुए कई अर्थ रखते हैं।

प्रचलित विलोम जोड़ियाँ
विलोम जोड़ीविलोम जोड़ीविलोम जोड़ी
कृतज्ञ - कृतघ्नआस्तिक - नास्तिकउत्थान - पतन
उपकार - अपकारनिंदा - स्तुतिसंयोग - वियोग
गुप्त - प्रकटजड़ - चेतनसुलभ - दुर्लभ
स्वाधीन - पराधीनलाभ - हानिस्थावर - जंगम
पर्यायवाची समूह
अर्थपर्यायवाची शब्द
अग्निअनल, पावक, वह्नि, आग
आकाशगगन, नभ, अंबर, व्योम
जलनीर, सलिल, वारि, पानी
पृथ्वीधरा, धरती, भू, वसुधा, अवनि
सूर्यरवि, भास्कर, दिनकर, भानु, दिवाकर
कमलपंकज, नीरज, जलज, सरोज, अंबुज

अनेकार्थी उदाहरण: कर = हाथ, किरण, टैक्स; अर्थ = धन, मतलब, प्रयोजन; कनक = सोना, धतूरा; काल = समय, मृत्यु; वर्ण = अक्षर, रंग, जाति; पत्र = चिट्ठी, पत्ता; गुण = विशेषता, रस्सी; उत्तर = जवाब, एक दिशा; अंक = गोद, संख्या; तीर = किनारा, बाण; द्विज = ब्राह्मण, पक्षी, दाँत। इससे जुड़ा जाल श्रुतिसम (मिलती-जुलती ध्वनि वाले) शब्दों का है: अनल (आग) व अनिल (हवा); अपेक्षा (आशा) व उपेक्षा (अनादर); परिणाम (फल) व परिमाण (मात्रा); प्रसाद (भोग, कृपा) व प्रासाद (महल)।

🧠 स्मरण-सूत्र
पर्यायवाची समूह के लिए मूल बिंब याद रखिए: कमल के नाम 'जल/कीचड़ में जन्मा' भाव से बनते हैं (पंकज = कीचड़ में जन्मा, जलज = जल में जन्मा)। नीरज व सरोज भी यही भाव देते हैं। जो शब्द यह बिंब न रखे (जैसे जल के समूह में 'अनल'), वही बेमेल है।

7. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

इन प्रश्नों में एक वाक्यांश दिया जाता है और उसके लिए एक शब्द पूछा जाता है। अधिकांश शब्द अ-/अन् (नहीं), सर्व- (सब), पर- (दूसरा) या स्व- (अपना) जैसे उपसर्ग से बने होते हैं। वाक्यांश में मूल शब्द पहचानिए और वही अर्थ देने वाला विकल्प चुनिए।

बार-बार पूछे जाने वाले एक शब्द
वाक्यांशएक शब्द
जिसका कोई शत्रु पैदा न हुआ होअजातशत्रु
जो ईश्वर में विश्वास रखे / न रखेआस्तिक / नास्तिक
जो सब कुछ जानता होसर्वज्ञ
जिसका आदि न हो / अंत न होअनादि / अनंत
जिसे जीता न जा सकेअजेय
जो उपकार न माने / मानेकृतघ्न / कृतज्ञ
जो दूर की बात सोचेदूरदर्शी
⚠️ परीक्षा का जाल
मिलते-जुलते शब्द: अजेय (जिसे जीता न जा सके) और अपराजित (जो कभी हारा न हो) एक नहीं हैं; अग्रज (बड़ा भाई) का उलटा अनुज (छोटा भाई) है; कृतघ्न (अकृतज्ञ) और कृतज्ञ (आभारी) विपरीत हैं। वाक्यांश का ठीक भाव मिलाइए, केवल मोटा क्षेत्र नहीं।

8. मुहावरे व लोकोक्तियाँ

मुहावरा ऐसा वाक्यांश है जो अपने शब्दों के सीधे अर्थ से भिन्न अर्थ देता है; वह अकेले पूरा वाक्य नहीं होता और वाक्य के अनुसार क्रिया बदलता है ('उसने अँगूठा दिखाया')। लोकोक्ति पूरा, स्वतंत्र वाक्य है जिसमें अनुभव से निकली सीख होती है ('जैसी करनी वैसी भरनी')। दोनों का अर्थ पूछा जाता है और दृश्य की कल्पना करने से दोनों आसान हो जाते हैं।

बार-बार आने वाले मुहावरे
मुहावराअर्थ
अँगूठा दिखानासाफ़ इनकार करना
आँखों का ताराबहुत प्यारा
गागर में सागर भरनाथोड़े शब्दों में बहुत कहना
नौ दो ग्यारह होनाभाग जाना
आस्तीन का साँपविश्वासघाती मित्र
ऊँट के मुँह में जीराआवश्यकता से बहुत कम
लोकोक्तियाँ व उनकी सीख
लोकोक्तिआशय
अधजल गगरी छलकत जायकम ज्ञान वाला अधिक दिखावा करता है
नाच न जाने आँगन टेढ़ाअपनी अयोग्यता का दोष दूसरों पर डालना
का बरसा जब कृषि सुखानीअवसर निकल जाने पर सहायता व्यर्थ
⚠️ परीक्षा का जाल
पशु या वस्तु वाली लोकोक्ति प्रायः उस पशु के बारे में नहीं होती। 'आस्तीन का साँप' धोखेबाज़ साथी के बारे में है और 'खोदा पहाड़ निकली चुहिया' व्यर्थ परिश्रम के बारे में। दो विकल्प दोनों नैतिक लगें तो वह चुनिए जिसका दृश्य कहावत से मिले (आधा भरा घड़ा छलकना = दिखावा)।

9. शुद्ध-अशुद्ध वर्तनी व विराम-चिह्न

वर्तनी के प्रश्नों में एक शब्द के चार रूप दिए जाते हैं और शुद्ध या अशुद्ध रूप पूछा जाता है। भूलें एक ढर्रे की होती हैं: दीर्घ की जगह ह्रस्व स्वर, आधा अक्षर छूटना या बढ़ जाना, गलत श/ष/स और संयुक्ताक्षर का अशुद्ध लिखना। नीचे के शुद्ध रूप कंठस्थ कीजिए।

प्रचलित अशुद्ध व शुद्ध वर्तनी
शुद्ध रूपप्रचलित अशुद्ध रूपअशुद्धि का कारण
आशीर्वादआर्शीवादर् गलत वर्ण पर लगा है
कवयित्रीकवियत्रीइ की मात्रा 'य' पर लगती है, 'व' पर नहीं
उज्ज्वलउज्जवलउत् + ज्वल से ज्ज् + व बनता है; संयुक्ताक्षर टूटना नहीं चाहिए
प्रतीक्षाप्रतिक्षादीर्घ ई आवश्यक है
गृहिणीगृहणीस्त्रीलिंग रूप में इ की मात्रा चाहिए

विराम-चिह्न: पूर्ण विराम ( । ) वाक्य के अंत में; अल्प विराम ( , ) थोड़ा ठहराव; अर्ध विराम ( ; ) संबंधित उपवाक्यों के बीच अधिक ठहराव; प्रश्नवाचक ( ? ) और विस्मयादिबोधक ( ! ); योजक ( - ) द्वंद्व समास व दोहराए शब्दों को जोड़ता है (माता-पिता, धीरे-धीरे); निर्देशक ( — ) स्पष्टीकरण से पहले; विवरण ( :- ) सूची या कथन से पहले; उद्धरण ( " " ) कहे हुए शब्दों को घेरता है; कोष्ठक ( ) अतिरिक्त सूचना को घेरता है; और हंसपद ( ^ ) छूटा हुआ शब्द जोड़ने का संकेत है।

⚠️ परीक्षा का जाल
योजक (-) और निर्देशक (—) को न मिलाइए: पहला छोटा है और शब्द के भीतर आता है (सुख-दुख), दूसरा लंबा है और वाक्यांशों के बीच आता है। साथ ही, 'अर्ध विराम' अर्धविराम (;) है, कोलन नहीं।

मुख्य बिंदु

  • संधि में मिलने वाले दोनों स्वर पहचानिए। समान स्वर से दीर्घ; अ + इ/उ/ऋ से ए/ओ/अर् (गुण); अ + ए/ओ से ऐ/औ (वृद्धि); इ/उ/ऋ के बाद भिन्न स्वर आए तो य्/व्/र् (यण); ए/ऐ/ओ/औ के बाद स्वर आए तो अय्/आय्/अव्/आव् (अयादि)।
  • समास प्रधान पद पर निर्भर है: पहला पद, अव्ययीभाव; दूसरा पद, तत्पुरुष, कर्मधारय व द्विगु; दोनों पद, द्वंद्व; कोई नहीं, बहुव्रीहि। जिस विग्रह के अंत में 'जिसके' या 'जो' हो, वह बहुव्रीहि है।
  • उपसर्ग शब्द के पहले और प्रत्यय बाद में लगता है। उपसर्ग के लिए शब्द का आरंभ और प्रत्यय के लिए अंत जाँचिए; कृत् प्रत्यय धातु में और तद्धित प्रत्यय संज्ञा व विशेषण में लगते हैं।
  • काल क्रिया के अंत (है, था, होगा) से और वाच्य इस से पहचाना जाता है कि क्रिया किसके अनुसार चलती है: कर्ता (कर्तृ), कर्म ('जाना' सहित) या कोई नहीं (भाव, असमर्थता)। केवल 'ने' से वाक्य कर्मवाच्य नहीं होता।
  • कारक: 'से' साधन हो तो करण और अलगाव हो तो अपादान; 'को' जब कुछ दिया जाए तो संप्रदान। आठ शब्द-भेद चार विकारी (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया) और चार अव्यय (क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक) हैं।
  • शब्द-भंडार को समूह और बिंब से सीखिए: पर्यायवाची मूल बिंब से, अनेकार्थी शब्द समुच्चय में, एक शब्द उपसर्ग से, मुहावरे दृश्य से। मुहावरा वाक्य के अनुसार बदलने वाला वाक्यांश है, लोकोक्ति पूरी उक्ति। वर्तनी व विराम-चिह्न में दीर्घ-ह्रस्व स्वर, संयुक्ताक्षर और ठीक चिह्न जाँचिए।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. 'गणेश' (गण + ईश) शब्द में दोनों खंडों को किस संधि ने जोड़ा है?

    1. दीर्घ स्वर संधि, क्योंकि दोनों स्वर मिलकर एक दीर्घ स्वर बनते हैं
    2. वृद्धि स्वर संधि, क्योंकि अ + ई मिलकर ऐ बनते हैं
    3. गुण स्वर संधि, क्योंकि अ + ई मिलकर ए बनते हैं
    4. यण स्वर संधि, क्योंकि ई का य् हो जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — गुण स्वर संधि, क्योंकि अ + ई मिलकर ए बनते हैं

    अ और ई मिलकर ए बनते हैं, यही गुण संधि का नियम है (अ/आ + इ/ई = ए)। दीर्घ संधि के लिए दो समान स्वर चाहिए, जैसे हिमालय में अ + आ; इसलिए वह यहाँ भ्रामक पर गलत विकल्प है।
  2. चार शब्द अपने विच्छेद के साथ दिए गए हैं। इनमें यण स्वर संधि का उदाहरण कौन-सा नहीं है?

    1. स्वागत (सु + आगत)
    2. इत्यादि (इति + आदि)
    3. अन्वय (अनु + अय)
    4. नायक (नै + अक)
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — नायक (नै + अक)

    नायक नै + अक से बना है, जहाँ ऐ का आय् हुआ है; यह अयादि संधि है। शेष तीनों में इ या उ का य् या व् होकर दूसरा स्वर जुड़ता है, यही यण है। स्वागत भ्रामक है क्योंकि उसमें भी व् दिखता है, पर वह उ से बना है।
  3. विच्छेदों को परखिए। P: जगदीश = जगत् + ईश। Q: मनोहर = मनः + हर। R: सज्जन = सम् + जन। S: दुश्चरित्र = दुः + चरित्र। कौन-से कथन सही हैं?

    1. केवल P, Q और R
    2. केवल P, Q और S
    3. केवल Q, R और S
    4. केवल P, R और S
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — केवल P, Q और S

    सज्जन = सत् + जन है (त् और ज मिलकर ज्ज), सम् + जन नहीं, जिससे 'संजन' बनता। अतः R गलत है और P, Q, S सही हैं। R भ्रामक है क्योंकि संतोष जैसे कई संधि-शब्दों में सम् आता है।
  4. 'यथाशक्ति', अर्थात् 'शक्ति के अनुसार', कौन-सा समास है?

    1. तत्पुरुष समास (छिपा कारक-चिह्न)
    2. अव्ययीभाव समास
    3. द्वंद्व समास (दोनों पद समान)
    4. बहुव्रीहि समास (तीसरा अर्थ)
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अव्ययीभाव समास

    पहला पद 'यथा' अव्यय है, वही प्रधान है और पूरा शब्द क्रियाविशेषण की तरह चलता है; यही अव्ययीभाव है। विग्रह में 'के अनुसार' देखकर तत्पुरुष का भ्रम होता है, पर तत्पुरुष में दूसरा पद प्रधान होता है।
  5. इनमें बहुव्रीहि समास कौन-सा है?

    1. त्रिलोक, अर्थात् 'तीन लोकों का समूह'
    2. महापुरुष, अर्थात् 'महान है जो पुरुष'
    3. माता-पिता, अर्थात् 'माता और पिता'
    4. दशानन, अर्थात् 'दश हैं मुख जिसके' (रावण)
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — दशानन, अर्थात् 'दश हैं मुख जिसके' (रावण)

    दशानन केवल दस मुख नहीं, तीसरे व्यक्ति रावण की ओर संकेत करता है, इसलिए बहुव्रीहि है। त्रिलोक द्विगु (संख्या + समूह), महापुरुष कर्मधारय और माता-पिता द्वंद्व है। त्रिलोक भ्रामक है क्योंकि वह भी संख्या से शुरू होता है।
  6. शिव के अर्थ में 'त्रिनेत्र' (तीन नेत्रों वाला) और साधारण अर्थ में 'त्रिलोक' (तीन लोकों का समूह) क्रमशः कौन-से समास हैं?

    1. बहुव्रीहि और द्विगु
    2. द्विगु और बहुव्रीहि
    3. कर्मधारय और द्विगु
    4. बहुव्रीहि और तत्पुरुष
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — बहुव्रीहि और द्विगु

    शिव के अर्थ में त्रिनेत्र दोनों पदों से बाहर के किसी व्यक्ति को बताता है, अतः बहुव्रीहि है; त्रिलोक तीन लोकों का समूह है, अतः द्विगु। भ्रामक विकल्प में क्रम उलट दिया गया है क्योंकि दोनों शब्द संख्या से शुरू होते हैं।
  7. 'परिक्रमा' (चारों ओर घूमना) शब्द में कौन-सा उपसर्ग है?

    1. प्र
    2. परा
    3. परि
    4. उप
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — परि

    परिक्रमा = परि + क्रम; 'परि' का अर्थ चारों ओर है। प्र का अर्थ आगे और परा का अर्थ उलटा या हार (पराजय) है, ये केवल देखने में मिलते हैं।
  8. किस शब्द में प्रत्यय है पर उपसर्ग नहीं?

    1. पढ़ाई
    2. अनपढ़
    3. निडर
    4. कुपुत्र
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पढ़ाई

    पढ़ाई = पढ़ + आई, केवल अंत में प्रत्यय है। अनपढ़ का आरंभ अन से, निडर का नि से और कुपुत्र का कु से होता है, अतः तीनों में आरंभ में उपसर्ग है। जो भी जुड़ा खंड खोजेंगे वे इनमें से किसी को गलत चुन लेंगे।
  9. 'वह सुबह दिल्ली से लौटा होगा।' यह कौन-सा काल है?

    1. आसन्न भूत
    2. पूर्ण भूत
    3. संदिग्ध भूत
    4. भविष्यत् सामान्य
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — संदिग्ध भूत

    क्रिया भूतकाल की है (लौटा) पर वक्ता को संदेह है, जो 'होगा' से झलकता है; यह संदिग्ध भूत है। भविष्यत् का भ्रम इसलिए होता है कि 'होगा' भविष्य जैसा लगता है, पर मुख्य क्रिया 'लौटा' भूत की है और घटना अनुमानित है।
  10. 'रोगी से उठा नहीं जाता।' यह किस वाच्य का वाक्य है?

    1. कर्तृवाच्य
    2. कर्मवाच्य
    3. प्रेरणार्थक क्रिया रूप, जो वाच्य नहीं है
    4. भाववाच्य
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — भाववाच्य

    इसमें कर्म नहीं है, क्रिया 'उठा जाता' पुल्लिंग एकवचन है और वाक्य असमर्थता बताता है; ये सब भाववाच्य के लक्षण हैं। 'जाता' के कारण कर्मवाच्य का भ्रम होता है, पर उसके लिए ऐसा कर्म चाहिए जिसके अनुसार क्रिया चले।
  11. 'वह घर से निकला' में 'से' किस कारक का चिह्न है?

    1. करण कारक
    2. अपादान कारक
    3. अधिकरण कारक
    4. संप्रदान कारक
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अपादान कारक

    'से' यहाँ उस स्थान को बताता है जिससे वह अलग हुआ, यानी अलगाव: अपादान। करण का भ्रम इसलिए होता है कि वह भी 'से' लेता है, पर करण साधन बताता है, जैसे 'कलम से लिखा'।
  12. 'मैं आप ही चला जाऊँगा' में 'आप' किस प्रकार का सर्वनाम है?

    1. पुरुषवाचक मध्यम पुरुष (आदरसूचक 'आप')
    2. संबंधवाचक सर्वनाम
    3. निजवाचक सर्वनाम
    4. अनिश्चयवाचक सर्वनाम
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — निजवाचक सर्वनाम

    यहाँ 'आप' वक्ता 'मैं' की ओर लौटता है और 'स्वयं' का अर्थ देता है, इसलिए निजवाचक है। 'आप कहाँ जा रहे हैं' जैसा आदरसूचक प्रयोग भ्रामक है क्योंकि शब्द वही दिखता है।
  13. नीर, सलिल, वारि, अनल: इस समूह में बेमेल शब्द कौन-सा है?

    1. नीर
    2. अनल
    3. सलिल
    4. वारि
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अनल

    नीर, सलिल और वारि तीनों का अर्थ जल है, जबकि अनल का अर्थ अग्नि है, अतः बेमेल अनल है। वारि को केवल इसलिए न चुनें कि वह कम परिचित है।
  14. 'जिसका कोई शत्रु पैदा ही न हुआ हो' के लिए एक शब्द कौन-सा है?

    1. अजातशत्रु
    2. अजेय
    3. अमित्र
    4. अपराजित
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — अजातशत्रु

    अजात का अर्थ 'जन्मा नहीं' और शत्रु का अर्थ 'दुश्मन' है, इसलिए अजातशत्रु ठीक बैठता है। अजेय का अर्थ 'जिसे जीता न जा सके' और अपराजित का अर्थ 'जो कभी हारा न हो' है; दोनों हार-जीत की बात करते हैं, शत्रु की नहीं।
  15. 'आस्तीन का साँप' मुहावरे का अर्थ क्या है?

    1. बहुत खतरनाक खुला शत्रु
    2. सदा डरा रहने वाला व्यक्ति
    3. विश्वासघात करने वाला मित्र
    4. अपना धन छिपाने वाला व्यक्ति
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — विश्वासघात करने वाला मित्र

    आस्तीन में छिपा साँप पास ही रहता है और दिखता नहीं, इसलिए मुहावरा विश्वासघाती मित्र बताता है। खुला शत्रु भ्रामक विकल्प है, पर मुहावरा उसके बारे में है जिस पर भरोसा किया गया हो।
  16. 'अधजल गगरी छलकत जाय' लोकोक्ति किस स्थिति के लिए प्रयुक्त होती है?

    1. समय बीत जाने के बाद सहायता मिलना
    2. छोटे प्रयास से दोहरा लाभ होना
    3. जो कम जानता है, वही सबसे अधिक दिखावा करता है
    4. बहुत परिश्रम पर बहुत कम फल मिलना
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — जो कम जानता है, वही सबसे अधिक दिखावा करता है

    आधा भरा घड़ा छलकता है, भरा हुआ शांत रहता है; इसलिए यह कहावत कम ज्ञान वाले के दिखावे को बताती है। 'का बरसा जब कृषि सुखानी' देर से मिली सहायता और 'खोदा पहाड़ निकली चुहिया' व्यर्थ परिश्रम की है; ये दूसरी कहावतों के अर्थ हैं।
  17. 'इंतज़ार' के अर्थ वाले शब्द की शुद्ध वर्तनी कौन-सी है?

    1. प्रतिक्षा
    2. प्रतीच्छा
    3. प्रतिच्छा
    4. प्रतीक्षा
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — प्रतीक्षा

    यह शब्द प्रति + ईक्षा से बना है और दीर्घ ई आती है, अतः प्रतीक्षा शुद्ध है। ह्रस्व इ वाला रूप सबसे आम भूल है, और छ वाले रूप क्ष संयुक्ताक्षर बदल देते हैं।
  18. निम्नलिखित में अशुद्ध वर्तनी वाला शब्द कौन-सा है?

    1. कवियत्री
    2. आशीर्वाद
    3. प्रतीक्षा
    4. गृहिणी
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — कवियत्री

    शुद्ध रूप कवयित्री है, जिसमें इ की मात्रा 'य' पर लगती है; 'कवियत्री' में वह 'व' पर लगी है। आशीर्वाद, प्रतीक्षा और गृहिणी तीनों शुद्ध हैं।