हिंदी साहित्य, रस, छंद और अलंकार

यह अध्याय पुलिस भर्ती परीक्षाओं के सामान्य हिंदी खंड के साहित्य-संबंधी विषयों का उत्तर देता है: रस और स्थायी भाव, अलंकार, छंद, हिंदी साहित्य के काल व उनके कवि और रचनाएँ, तथा प्रमुख गद्यकार। यह हिंदी की परीक्षा लेने वाले सिपाही और उप-निरीक्षक पत्रों के लिए है। प्रत्येक भाग में वह जाल बताया गया है जो समान तथ्यों को आपस में बदल देता है, और काल अनुमानित अवधि के रूप में दिए हैं क्योंकि पुस्तकों में मतभेद है।

रस और स्थायी भाव: नौ रस

रस काव्य या नाटक को पढ़ने-देखने से मिलने वाला आनंद है। संस्कृत काव्यशास्त्र, जिसका आरंभ भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से माना जाता है, कहता है कि जब मन का स्थायी भाव तीन प्रकार की सामग्री से जाग्रत और पुष्ट होता है, तब रस उत्पन्न होता है। विभाव कारण है: आलंबन (वह व्यक्ति या वस्तु जिससे भाव जागे) और उद्दीपन (वह परिवेश जो भाव को भड़काए)। अनुभाव बाहरी चेष्टा है, जैसे काँपना या आँसू बहना। संचारी (व्यभिचारी) भाव क्षणिक मनोदशा है, जैसे चिंता या हर्ष; पाठ्यपुस्तकों में इनकी संख्या 33 मानी जाती है।

नौ रस, उनके स्थायी भाव और पहचान
रसस्थायी भावपहचान
शृंगाररतिप्रेमी-प्रेमिका, संयोग या वियोग
हास्यहासविचित्र वेश, वाणी या व्यवहार
करुणशोकमृत्यु, हानि, दुर्दशा
रौद्रक्रोधअपमान, उकसावा, लाल आँखें
वीरउत्साहयुद्ध, दान, साहस
भयानकभयसंकट, काँपना, रोमांच
वीभत्सजुगुप्सागंदगी, सड़ाँध, घिनौने दृश्य
अद्भुतविस्मयचमत्कार, आश्चर्यजनक दृश्य
शांतनिर्वेदवैराग्य, शांति, संसार से विरक्ति
🧠 पहले आठ का क्रम
पहले आठ को इसी क्रम में याद रखें: शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत; नौवाँ शांत। पड़ोसी रस प्रायः अदल-बदल कर पूछे जाते हैं, इसलिए ध्वनि से जोड़ें: हास्य–हास, वीर–उत्साह, भयानक–भय, करुण–शोक।
⚠️ भय क्रोध नहीं; शांत करुण नहीं
बाघ की दहाड़ से यात्री का काँपना भयानक है; रौद्र उस व्यक्ति का क्रोध है जिसके साथ अन्याय हुआ। शांत का भाव निर्वेद है, शोक नहीं; शोक करुण का है। शृंगार के दो रूप हैं, संयोग और वियोग (विप्रलंभ), और इसे रसराज कहा जाता है।
ℹ️ नौ से आगे: जहाँ विद्वान भिन्न हैं
पाठ्यक्रम में मानक संख्या नौ है। परवर्ती आचार्यों ने वात्सल्य (स्थायी भाव: वात्सल्य या स्नेह, जैसे सूरदास के बाल कृष्ण) और भक्ति (ईश्वर-विषयक अनुराग) जोड़कर ग्यारह रस भी माने। भरत मुनि के मूल आठ में शांत की स्थिति पर भी मतभेद है, इसलिए “कितने रस” पूछने पर प्रायः नौ ही उत्तर होता है।

शब्द अलंकार: ध्वनि का सौंदर्य

अलंकार काव्य को सजाने वाला साधन है। शब्दालंकार में सौंदर्य शब्दों की ध्वनि में होता है, इसलिए शब्द के स्थान पर उसका पर्याय रखने से अलंकार नष्ट हो जाता है। अर्थालंकार में सौंदर्य अर्थ में होता है, इसलिए पर्याय रखने पर भी बना रहता है। परीक्षा में तीन शब्दालंकार सबसे अधिक पूछे जाते हैं।

तीन शब्दालंकार
अलंकारलक्षणउदाहरण
अनुप्रासएक ही वर्ण या ध्वनि पास-पास बार-बार आती है“चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल-थल में” (मैथिलीशरण गुप्त, पंचवटी): ‘च’ की आवृत्ति
यमकएक ही शब्द एक से अधिक बार आता है और हर बार अर्थ भिन्न होता है“कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय” (बिहारी): पहला ‘कनक’ धतूरा, दूसरा सोना
श्लेषएक शब्द एक ही बार आता है पर उससे दो या अधिक अर्थ निकलते हैं“सुबरन को ढूँढ़त फिरत कवि, व्यभिचारी, चोर”: ‘सुबरन’ एक बार = अच्छे वर्ण (कवि), सुंदर रंग-रूप (व्यभिचारी), सोना (चोर)
⚠️ यमक या श्लेष? आवृत्तियाँ गिनें
यमक में शब्द दो या अधिक बार आता है और अर्थ भिन्न होते हैं। श्लेष में शब्द एक बार आता है और कई अर्थ देता है। “सुबरन को ढूँढ़त फिरत…” में ‘सुबरन’ एक बार लिखा है और कवि, व्यभिचारी तथा चोर उससे अलग-अलग अर्थ लेते हैं, इसलिए श्लेष है; “काली घटा का घमंड घटा” में ‘घटा’ दो बार आता है (बादल, फिर कम हुआ), इसलिए यमक है।
ℹ️ अनुप्रास केवल स्वर-साम्य नहीं
अनुप्रास में व्यंजन-ध्वनियों की आवृत्ति होती है (छेक, वृत्ति, अंत्य आदि इसके भेद हैं)। इसे तुक से न मिलाएँ: तुक पंक्ति के अंत में होती है, अनुप्रास कहीं भी हो सकता है।

अर्थ अलंकार: अर्थ का सौंदर्य

उपमा में दो भिन्न वस्तुओं की किसी समान गुण के कारण तुलना होती है। इसके चार अंग हैं: उपमेय (जिसकी तुलना हो), उपमान (जिससे तुलना हो), साधारण धर्म (दोनों का समान गुण) और वाचक शब्द (सा, सम, सरिस, जैसा आदि)। “मुख चंद्रमा के समान सुंदर है” में मुख उपमेय, चंद्रमा उपमान, सुंदरता साधारण धर्म और ‘के समान’ वाचक शब्द है।

  • रूपक: उपमेय और उपमान को एक कह दिया जाता है, वाचक शब्द नहीं रहता। “चरण-कमल बंदौं हरि राई” (सूरदास): चरण ही कमल हैं।
  • उत्प्रेक्षा: उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है; संकेत-शब्द मानो, मनु, जनु, मनहुँ, जानो हैं। “लगता है मानो चाँद ने धरती पर चाँदी बिछा दी हो।”
  • अतिशयोक्ति: बढ़ा-चढ़ाकर कथन, जो लोक-सीमा से परे हो। “हनुमान की पूँछ में लग न पाई आग, लंका सारी जल गई गए निसाचर भाग।” पूँछ में आग लगने से पहले ही लंका जल जाती है।
🧠 तीन संकेत: जैसा, है, मानो
वाचक शब्द (सा, समान, जैसा) हो तो उपमा; दो वस्तुएँ सीधे एक हों (मुख-चंद्र, चरण-कमल) तो रूपक; पंक्ति में “मानो, जनु” जैसा संभावना-सूचक शब्द हो तो उत्प्रेक्षा।
⚠️ उपमा में वाचक शब्द आवश्यक
“कमल-सा मुख” उपमा है; “मुख-कमल” रूपक है। वाचक शब्द हटते ही दोनों एक हो जाते हैं और अलंकार बदल जाता है, इसलिए उत्तर चुनने से पहले पंक्ति में सा/सम/सरिस खोजें।

छंद: हिंदी काव्य के माप

छंद पद्य की ध्वनि का निश्चित विधान है। मात्रिक छंद में मात्राएँ गिनी जाती हैं: लघु वर्ण की 1 और गुरु वर्ण की 2। वर्णिक छंद में वर्ण गिने जाते हैं। पंक्ति चरणों (चौथाई भागों) में बँटी होती है; पंक्ति के भीतर ठहराव यति कहलाता है।

जानने योग्य पाँच छंद
छंदप्रकारमापटिप्पणी
दोहामात्रिक, अर्धसमविषम चरण 13, सम चरण 11 मात्राएँकबीर, रहीम, बिहारी, तुलसी
सोरठामात्रिक, अर्धसमविषम चरण 11, सम चरण 13: दोहे का उलटारामचरितमानस में प्रयुक्त
चौपाईमात्रिक, समचार चरण, प्रत्येक में 16 मात्राएँरामचरितमानस का मुख्य कथा-छंद
रोलामात्रिक, समचार चरण, प्रत्येक में 24 मात्राएँ, यति 11 और 13 परदोहा + रोला से कुंडलिया बनती है
सवैयावर्णिकचार चरण, प्रत्येक में 22 से 26 वर्णरसखान, घनानंद, तुलसी, भूषण

गणना का उदाहरण। रहीम के दोहे का पहला चरण “रहिमन धागा प्रेम का” लें: रहिमन = 1+1+1+1 = 4; धागा = 2+2 = 4; प्रेम = प्रे(2)+म(1) = 3; का = 2। योग 4+4+3+2 = 13, यानी दोहे का विषम चरण। अगला चरण “मत तोड़ो चटकाय”: मत 2 + तोड़ो 4 + चटकाय 5 = 11। यहाँ ‘प्रे’ गुरु इसलिए है कि उसमें ‘ए’ की मात्रा है।

⚠️ दोहा बनाम सोरठा; मात्रा बनाम वर्ण
दोहा 13+11 है, सोरठा 11+13; दोनों की अदला-बदली आम जाल है। चौपाई (16), रोला (24) और दोहा मात्रिक हैं; सवैया वर्णिक है। याद रखें: दोहे में लंबा भाग पहले आता है।

हिंदी साहित्य के काल

प्रचलित चार-काल विभाजन आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य का इतिहास (1929) पर आधारित है, जो मानक इतिहास माना जाता है। उनकी तिथियाँ विक्रम संवत् में हैं; पाठ्यपुस्तकें लगभग ईसवी वर्ष देती हैं, इसीलिए पुस्तकों में तिथियों का अंतर प्रायः आधी सदी तक रहता है। क्रम याद रखें, सटीक वर्ष नहीं।

काल, प्रमुख कवि और रचनाएँ
काललगभग अवधिकवि और रचनाएँ
आदिकाललगभग 1000–1350चंदबरदाई: पृथ्वीराज रासो; जगनिक: आल्हखंड (आरोपित); विद्यापति: पदावली, कीर्तिलता; अमीर खुसरो: पहेलियाँ व गीत
भक्तिकाललगभग 1350–1650कबीर: बीजक; जायसी: पद्मावत; सूरदास: सूरसागर; तुलसीदास: रामचरितमानस; मीरा: पद; रहीम; रसखान
रीतिकाललगभग 1650–1850केशवदास: रसिकप्रिया, कविप्रिया; बिहारी: बिहारी सतसई; भूषण: शिवराजभूषण; मतिराम; घनानंद; पद्माकर
आधुनिक काललगभग 1850 सेभारतेंदु, द्विवेदी, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता (अगली तालिका)
  • भक्तिकाल की दो धाराएँ हैं। निर्गुण: ज्ञानाश्रयी शाखा (कबीर, रैदास, दादू) और प्रेमाश्रयी (सूफ़ी) शाखा (जायसी, मंझन)। सगुण: रामभक्ति (तुलसीदास) और कृष्णभक्ति (सूरदास, मीरा, रसखान तथा वल्लभ संप्रदाय के आठ कवियों का अष्टछाप)।
  • रीतिकाल के कवि रीतिबद्ध (काव्यशास्त्र से बँधे: केशवदास, मतिराम), रीतिसिद्ध (रीति के सिद्धहस्त: बिहारी) और रीतिमुक्त (स्वच्छंद: घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर) में बाँटे जाते हैं।
ℹ️ जहाँ इतिहासकार भिन्न हैं
शुक्ल जी ने प्रथम काल का नाम वीरगाथाकाल रखा। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल नाम पसंद किया, जो अब मानक है। राहुल सांकृत्यायन का सिद्ध-सामंत युग और मिश्रबंधुओं का प्रारंभिक काल पुराने विकल्प हैं। पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता और रचना-काल भी विवादित हैं। कुछ लोग रीतिकाल को शृंगारकाल कहते हैं, और कुछ आधुनिक काल का आरंभ 1850 की जगह 1800 से मानते हैं।

आधुनिक हिंदी कविता: धाराएँ और कवि

आधुनिक काल की धाराएँ
धारालगभग अवधिकवि और रचनाएँ
भारतेंदु युग1850–1900भारतेंदु हरिश्चंद्र: अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र
द्विवेदी युग1900–1918नाम महावीर प्रसाद द्विवेदी (संपादक, सरस्वती) पर; मैथिलीशरण गुप्त: भारत-भारती, साकेत, पंचवटी; अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’: प्रियप्रवास
छायावादलगभग 1918–1936चार स्तंभ: जयशंकर प्रसाद (कामायनी, आँसू), निराला (परिमल, अनामिका, सरोज स्मृति), सुमित्रानंदन पंत (पल्लव, गुंजन, चिदंबरा), महादेवी वर्मा (नीहार, रश्मि, नीरजा, दीपशिखा)
प्रगतिवादलगभग 1936–1943मार्क्सवादी झुकाव की सामाजिक कविता: नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन
प्रयोगवाद1943 सेआरंभ अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक (1943) से, जिसके सात कवियों में मुक्तिबोध भी हैं; अज्ञेय: हरी घास पर क्षण भर, आँगन के पार द्वार
नई कवितालगभग 1950 के दशक सेधर्मवीर भारती (कनुप्रिया), कुँवर नारायण (आत्मजयी), गिरिजाकुमार माथुर
🧠 छायावाद के चार स्तंभ
प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी: प्रथमाक्षर प-नि-प-म। मैथिलीशरण गुप्त समकालीन होते हुए भी पूर्ववर्ती द्विवेदी युग के हैं और राष्ट्रकवि कहलाते हैं।
ℹ️ दिनकर और ज्ञानपीठ
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ वीर और राष्ट्रीय भावों के कवि हैं; उनकी रचनाएँ कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, हुंकार हैं और गद्य-ग्रंथ संस्कृति के चार अध्याय। 1965 से दिया जा रहा ज्ञानपीठ पुरस्कार हिंदी के रचनाकारों को 1968 (सुमित्रानंदन पंत), 1972 (दिनकर), 1978 (अज्ञेय) और 1982 (महादेवी वर्मा) में मिला।

हिंदी गद्य और प्रमुख गद्यकार

आधुनिक हिंदी गद्य भारतेंदु युग में पनपा। प्रेमचंद (1880–1936) उपन्यास और कहानी के शिखर-पुरुष हैं, और हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा रामचंद्र शुक्ल श्रेष्ठ निबंधकार और आलोचक। प्रथम रचनाओं पर मतभेद है: कुछ विद्वान लाला श्रीनिवास दास के परीक्षा गुरु (1882) को पहला हिंदी उपन्यास कहते हैं, कुछ पहले की कृतियाँ गिनाते हैं; और पहली कहानी के दावे किशोरीलाल गोस्वामी की इंदुमती से लेकर चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था (1915) तक जाते हैं। परीक्षा में कवि-कृति और लेखक-कृति के जोड़े पूछे जाते हैं, इसलिए उन्हें विधा के अनुसार याद करें।

गद्यकार और कृतियाँ
लेखककृतियाँ
प्रेमचंदगोदान, गबन, निर्मला, सेवासदन, रंगभूमि; कहानियाँ कफ़न, पूस की रात, ईदगाह
जयशंकर प्रसादनाटक स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी; उपन्यास कंकाल, तितली
हजारीप्रसाद द्विवेदीबाणभट्ट की आत्मकथा, अशोक के फूल, कबीर, हिंदी साहित्य की भूमिका
यशपालझूठा सच, दिव्या, दादा कामरेड
फणीश्वरनाथ रेणुमैला आँचल, परती परिकथा; कहानी तीसरी कसम
अज्ञेयशेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी
भीष्म साहनी, मोहन राकेश, धर्मवीर भारतीतमस; आषाढ़ का एक दिन; गुनाहों का देवता तथा काव्य-नाटक अंधा युग
हरिशंकर परसाईव्यंग्य निबंध: वैष्णव की फिसलन, विकलांग श्रद्धा का दौर
महादेवी वर्मासंस्मरण-रेखाचित्र अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ; निबंध शृंखला की कड़ियाँ
⚠️ कवि का गद्य, उपन्यासकार का काव्य
अंधा युग धर्मवीर भारती का काव्य-नाटक है, उपन्यास नहीं; कामायनी प्रसाद का महाकाव्य है, यद्यपि उन्होंने उपन्यास भी लिखे; गोदान प्रेमचंद का है, तमस भीष्म साहनी का। पहले विधा से, फिर नाम से मिलान करें।

मुख्य बिंदु

  • नौ रस और स्थायी भाव: शृंगार–रति, हास्य–हास, करुण–शोक, रौद्र–क्रोध, वीर–उत्साह, भयानक–भय, वीभत्स–जुगुप्सा, अद्भुत–विस्मय, शांत–निर्वेद; वात्सल्य और भक्ति बाद के जोड़ हैं।
  • अनुप्रास में ध्वनि दोहराई जाती है, यमक में शब्द भिन्न अर्थों में दोहराया जाता है, श्लेष में एक शब्द में कई अर्थ होते हैं; उपमा में वाचक शब्द होता है, रूपक में अभेद, उत्प्रेक्षा में मानो/जनु से संभावना।
  • दोहा 13+11 मात्राएँ, सोरठा 11+13, चौपाई प्रति चरण 16, रोला प्रति चरण 24, सवैया 22 से 26 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद है।
  • काल-क्रम आदि, भक्ति, रीति, आधुनिक है; शुक्ल का वीरगाथाकाल आज प्रायः आदिकाल कहलाता है और सभी कालों की तिथियाँ अनुमानित हैं।
  • छायावाद के चार स्तंभ प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी हैं; गुप्त द्विवेदी युग के हैं, और तारसप्तक (1943) से प्रयोगवाद आरंभ होता है।
  • गद्य-कृतियाँ विधा के अनुसार याद करें: प्रेमचंद (गोदान), रेणु (मैला आँचल), यशपाल (झूठा सच), भीष्म साहनी (तमस); ज्ञानपीठ 1968, 1972, 1978 और 1982 में पंत, दिनकर, अज्ञेय और महादेवी को मिला।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. रस-सिद्धांत में वीर रस का स्थायी भाव क्या है?

    1. क्रोध
    2. विस्मय
    3. उत्साह
    4. भय
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — उत्साह

    वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है, जो युद्ध, दान या धर्म के कार्य का जोश है। क्रोध रौद्र रस का स्थायी भाव है और भ्रम इसलिए होता है कि योद्धा क्रोधित भी होता है, पर वीर का स्थायी भाव क्रोध नहीं।
  2. इन रस और स्थायी भाव के जोड़ों को परखिए। P: वीभत्स–जुगुप्सा। Q: भयानक–भय। R: अद्भुत–निर्वेद। S: शांत–विस्मय। कौन-से सही हैं?

    1. केवल P और Q
    2. केवल P और R
    3. केवल Q और S
    4. केवल R और S
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — केवल P और Q

    वीभत्स का स्थायी भाव जुगुप्सा और भयानक का भय है। अद्भुत का विस्मय और शांत का निर्वेद है, इसलिए R और S में दोनों भाव आपस में बदल दिए गए हैं और वे गलत हैं; R वाला विकल्प इसलिए भ्रामक है कि दोनों अपेक्षाकृत कम पूछे जाने वाले रस हैं।
  3. संस्कृत काव्यशास्त्र के मानक पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने वाले नौ रसों में कौन-सा रस आता है?

    1. वात्सल्य (संतान-स्नेह)
    2. भक्ति (ईश्वर-अनुराग)
    3. दास्य (सेवा-भाव)
    4. शांत (शांति)
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — शांत (शांति)

    शांत नौवाँ रस है और इसका स्थायी भाव निर्वेद है। वात्सल्य और भक्ति को बाद के आचार्यों ने जोड़कर ग्यारह रस माने, इसलिए वे मानक नौ में नहीं हैं। दास्य भक्ति का एक भाव है, इस सूची का रस नहीं।
  4. “निर्जन वन में सिंह की दहाड़ सुनकर यात्री के रोंगटे खड़े हो गए और वह थर-थर काँपने लगा।” यह कौन-सा रस है?

    1. रौद्र, क्योंकि यात्री तीव्र प्रतिक्रिया करता है
    2. भयानक, क्योंकि स्थायी भाव भय है
    3. वीर, क्योंकि एक खतरनाक पशु उपस्थित है
    4. अद्भुत, क्योंकि दृश्य असामान्य है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — भयानक, क्योंकि स्थायी भाव भय है

    सिंह आलंबन है और काँपना तथा रोंगटे खड़े होना भय के अनुभाव हैं, इसलिए रस भयानक है। रौद्र में किसी अपराधी के प्रति क्रोध चाहिए, जो यहाँ नहीं है; यात्री केवल भयभीत है।
  5. “चरण-कमल बंदौं हरि राई” में कौन-सा अलंकार है?

    1. उपमा, क्योंकि चरण और कमल की तुलना है
    2. रूपक, क्योंकि चरणों को कमल ही कह दिया गया है
    3. उत्प्रेक्षा, क्योंकि कवि समानता की कल्पना करता है
    4. यमक, क्योंकि शब्द की आवृत्ति है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — रूपक, क्योंकि चरणों को कमल ही कह दिया गया है

    यहाँ कोई वाचक शब्द नहीं है और चरणों को सीधे कमल कहा गया है, इसलिए रूपक है। उपमा में ‘सा’ जैसा वाचक शब्द चाहिए (कमल-से चरण); उत्प्रेक्षा में ‘मानो’ या ‘जनु’ चाहिए।
  6. “सुबरन को ढूँढ़त फिरत कवि, व्यभिचारी, चोर।” यहाँ ‘सुबरन’ शब्द एक बार लिखा है, पर कवि, व्यभिचारी और चोर अलग-अलग वस्तु खोजते हैं (अच्छे वर्ण, सुंदर रंग, सोना)। यह कौन-सा अलंकार है?

    1. अनुप्रास, क्योंकि समान ध्वनियाँ एक साथ पिरोई गई हैं
    2. उपमा, क्योंकि तीनों खोजने वालों की तुलना की गई है
    3. यमक, क्योंकि शब्द नए अर्थों के साथ दोहराया गया है
    4. श्लेष, क्योंकि एक शब्द कई अर्थ देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — श्लेष, क्योंकि एक शब्द कई अर्थ देता है

    ‘सुबरन’ की एक ही आवृत्ति से तीन अर्थ निकलते हैं, यही श्लेष है। यमक भ्रामक विकल्प है, पर उसमें शब्द दो या अधिक बार लिखा जाता है और हर बार अर्थ भिन्न होता है।
  7. इन कथनों पर विचार कीजिए। P: उपमा में उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द सभी आ सकते हैं। Q: रूपक में सादृश्य-वाचक शब्द नहीं होता। R: उत्प्रेक्षा के संकेत ‘मनहुँ’, ‘जनु’ जैसे शब्द हैं। S: यमक में शब्द एक बार आकर अनेक अर्थ देता है। कौन-से कथन सही हैं?

    1. केवल P, Q और S
    2. केवल P, Q और R
    3. केवल Q, R और S
    4. केवल P, R और S
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — केवल P, Q और R

    P, Q और R सही हैं। S श्लेष का लक्षण है, यमक का नहीं: यमक में शब्द दोहराया जाता है और हर बार अर्थ भिन्न होता है। इसलिए S वाले विकल्प दो सही कथन होने पर भी गलत हैं।
  8. दोहे के पहले और दूसरे चरण में क्रमशः कितनी मात्राएँ होती हैं?

    1. 11 और 13
    2. 16 और 16
    3. 13 और 11
    4. 24 और 24
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — 13 और 11

    दोहे के विषम चरणों में 13 और सम चरणों में 11 मात्राएँ होती हैं। 11 और 13 सोरठे का उलटा क्रम है, जो प्रायः भ्रम पैदा करता है।
  9. एक युग्म के विषम चरणों में 11 और सम चरणों में 13 मात्राएँ हैं। यह कौन-सा छंद है?

    1. दोहा, जो सामान्य युग्म-छंद है
    2. सोरठा, जो दोहे का उलटा है
    3. चौपाई, जो कथा-छंद है
    4. रोला, जो 24 मात्रा वाला छंद है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — सोरठा, जो दोहे का उलटा है

    सोरठा दोहे का उलटा है: पहले 11, फिर 13। दोहे में पहले 13, फिर 11 होती हैं। चौपाई में प्रति चरण 16 और रोला में 24 मात्राएँ होती हैं, इसलिए दोनों 11 और 13 वाले युग्म में नहीं बैठते।
  10. छंद और उसके माप का कौन-सा जोड़ा सही नहीं है?

    1. दोहा: एकांतर चरणों में 13 और 11 मात्राएँ
    2. चौपाई: चार चरण, प्रत्येक में 16 मात्राएँ
    3. रोला: चार चरण, प्रत्येक में 24 मात्राएँ
    4. सवैया: चार चरण, प्रत्येक में 16 मात्राएँ
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — सवैया: चार चरण, प्रत्येक में 16 मात्राएँ

    सवैया वर्णिक छंद है, जिसमें वर्ण गिने जाते हैं (प्रति चरण 22 से 26), मात्राएँ नहीं। अन्य जोड़े सही हैं; चौपाई की 16 मात्राओं को ही प्रायः सवैये से मिला दिया जाता है।
  11. लघु को 1 और गुरु को 2 मानकर “रहिमन धागा प्रेम का” में कितनी मात्राएँ हैं?

    1. 11 मात्राएँ
    2. 12 मात्राएँ
    3. 13 मात्राएँ
    4. 14 मात्राएँ
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — 13 मात्राएँ

    रहिमन = 1+1+1+1 = 4, धागा = 2+2 = 4, प्रेम = 2+1 = 3, का = 2; योग 4+4+3+2 = 13 मात्राएँ, यानी दोहे का विषम चरण। 12 का उत्तर तब आता है जब ‘प्रे’ को लघु मान लिया जाए, जो ‘ए’ की मात्रा के कारण गलत है।
  12. इन कवियों को उनके हिंदी-साहित्य काल के क्रम में, प्राचीनतम पहले, लगाइए: P: बिहारी। Q: चंदबरदाई। R: कबीर। S: भारतेंदु हरिश्चंद्र।

    1. Q, R, P, S
    2. R, Q, P, S
    3. Q, P, R, S
    4. Q, R, S, P
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Q, R, P, S

    चंदबरदाई आदिकाल, कबीर भक्तिकाल, बिहारी रीतिकाल और भारतेंदु आधुनिक काल के हैं: Q, R, P, S। बिहारी को कबीर से पहले रखना आम भूल है; बिहारी की भाषा अधिक परिष्कृत है पर वे बाद के हैं।
  13. कवि और कृति का कौन-सा जोड़ा सही है?

    1. सूरदास – रामचरितमानस
    2. जायसी – पद्मावत
    3. बिहारी – रसिकप्रिया
    4. तुलसीदास – सूरसागर
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — जायसी – पद्मावत

    मलिक मुहम्मद जायसी ने सूफ़ी प्रेमाख्यान पद्मावत लिखा। रामचरितमानस तुलसीदास का, सूरसागर सूरदास का और रसिकप्रिया केशवदास की है; बिहारी की प्रसिद्ध कृति बिहारी सतसई है।
  14. इनमें से किस रचनाकार को छायावाद के चार स्तंभों में नहीं गिना जाता?

    1. जयशंकर प्रसाद, कामायनी के रचयिता
    2. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, परिमल के रचयिता
    3. महादेवी वर्मा, नीहार की रचयिता
    4. मैथिलीशरण गुप्त, साकेत के रचयिता
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    उत्तर: D — मैथिलीशरण गुप्त, साकेत के रचयिता

    चार स्तंभ प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी हैं। मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग से जुड़े राष्ट्रकवि हैं; समकालीन प्रमुख कवि होने के कारण वे भ्रामक विकल्प हैं, पर छायावाद के स्तंभ नहीं।
  15. हिंदी साहित्य के किस इतिहासकार ने 1929 के अपने इतिहास में प्रथम काल का नाम वीरगाथाकाल रखा?

    1. रामचंद्र शुक्ल
    2. हजारीप्रसाद द्विवेदी
    3. राहुल सांकृत्यायन
    4. प्रेमचंद
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    उत्तर: A — रामचंद्र शुक्ल

    रामचंद्र शुक्ल ने वीरगाथाकाल नाम दिया। हजारीप्रसाद द्विवेदी का दिया नाम आदिकाल बाद में मानक बना और आधुनिक पाठ्यपुस्तकों में मिलने से भ्रामक उत्तर है; राहुल सांकृत्यायन ने सिद्ध-सामंत युग सुझाया, और प्रेमचंद उपन्यासकार थे, साहित्येतिहासकार नहीं।
  16. इनमें से कौन-सा उपन्यास फणीश्वरनाथ रेणु ने लिखा है?

    1. गोदान
    2. तमस
    3. झूठा सच
    4. मैला आँचल
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    उत्तर: D — मैला आँचल

    मैला आँचल रेणु का आंचलिक उपन्यास है। गोदान प्रेमचंद का, तमस भीष्म साहनी का और झूठा सच यशपाल का है; ये तीनों प्रसिद्ध उपन्यास हैं, इसलिए आकर्षक भ्रम-विकल्प बनते हैं।
  17. लेखक और कृति का कौन-सा जोड़ा सही नहीं है?

    1. अज्ञेय – शेखर: एक जीवनी
    2. हरिशंकर परसाई – वैष्णव की फिसलन
    3. यशपाल – मैला आँचल
    4. मोहन राकेश – आषाढ़ का एक दिन
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    उत्तर: C — यशपाल – मैला आँचल

    मैला आँचल फणीश्वरनाथ रेणु का है, यशपाल का नहीं; यशपाल के उपन्यासों में झूठा सच और दिव्या हैं। शेष तीनों जोड़े सही हैं; परसाई के व्यंग्य निबंध उपन्यास-शीर्षक जैसे लगते हैं, इसलिए वह सही जोड़ा भी भ्रामक बनता है।
  18. 1968 का ज्ञानपीठ पुरस्कार, जो पहली बार किसी हिंदी रचनाकार को मिला, किस कवि को दिया गया?

    1. रामधारी सिंह ‘दिनकर’
    2. सुमित्रानंदन पंत
    3. अज्ञेय
    4. महादेवी वर्मा
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    उत्तर: B — सुमित्रानंदन पंत

    1968 का पुरस्कार पंत को मिला। दिनकर को 1972, अज्ञेय को 1978 और महादेवी वर्मा को 1982 में मिला; दिनकर इस समूह के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि होने से भ्रामक उत्तर हैं।