खाद्य उत्पाद प्रौद्योगिकी: अनाज, तेल, फल, बागानी फ़सलें, दूध, मांस, अपशिष्ट उपयोग व खाद्य मानक

यह अध्याय XL5 खाद्य प्रौद्योगिकी के खंड XL5.3 “खाद्य उत्पाद प्रौद्योगिकी” को उसके वस्तु-आधारित मदों का उत्तर देकर पूरा करता है: “अनाज प्रसंस्करण व उत्पाद” सहित “मांस-सदृश उत्पाद व वनस्पति-आधारित दूध-विकल्प”, “तेल प्रसंस्करण”, “फल व सब्ज़ी प्रसंस्करण”, “बागानी फ़सलों का प्रसंस्करण व उत्पाद”, “दूध व दुग्ध उत्पाद प्रसंस्करण”, “पशु उत्पादों का प्रसंस्करण”, “अपशिष्ट उपयोग”, तथा “खाद्य मानक व गुणवत्ता अनुरक्षण: FPO, PFA, A-Mark (Agmark), HACCP, खाद्य संयंत्र स्वच्छता व क्लीनिंग इन प्लेस (CIP), FSSAI, BIS, कोडेक्स एलिमेंटेरियस, ISO, खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली (FSMS)।” प्रत्येक वस्तु के लिए यह प्रक्रम-रेखा का अनुसरण करता है और पूछता है कि हर चरण क्यों है। संख्यात्मक प्रश्न मिलिंग उपज, तेल-प्राप्ति, जैम का शर्करा-संतुलन, पियर्सन वर्ग से दूध का मानकीकरण और आइसक्रीम का ओवररन हैं।

1. चावल, गेहूँ, मक्का व दालों की मिलिंग; उसनाकरण

चावल मिलिंग: साफ़ धान का छिलका उतारा जाता है, अधिकतर रबर-रोल शेलर से (भिन्न गतियों से घूमते दो रोल भूसी को कतर कर अलग करते हैं); भूसी धान के द्रव्यमान का लगभग पाँचवाँ भाग है। भूरा चावल (brown rice) अपघर्षी या घर्षण पॉलिशरों में सफ़ेद किया जाता है जो चोकर व भ्रूण हटाते हैं। मिल्ड चावल साबुत चावल (head rice) (पूरे दाने, या सामान्यतः कम-से-कम तीन-चौथाई दाने के टुकड़े) व टुकड़ों में श्रेणीकृत होता है; धान के प्रतिशत के रूप में साबुत चावल उपज मिल की आय तय करती है। उसनाकरण (parboiling) (भिगोना, भाप देना, सुखाना, फिर मिलिंग) स्टार्च का जिलेटिनीकरण करता है, जो दरारें भरकर भ्रूणपोष को जोड़ देता है, अतः टूटन घटती और साबुत चावल उपज बढ़ती है; थायमिन जैसे जल-विलेय विटामिन चोकर से भीतर चले जाते हैं, अतः मिल्ड उसना चावल अधिक पौष्टिक होता है; दाना कठोर, कुछ गहरे रंग का व देर से पकने वाला हो जाता है, और उसका चोकर अधिक तेल-युक्त। गर्म पानी में भिगोना समय घटाता है और लंबे ठंडे भिगोने की दुर्गंध से बचाता है।

गेहूँ साफ़ कर अनुकूलित (conditioning) किया जाता है (पानी मिलाकर विश्राम), जो चोकर को सख़्त बनाता है ताकि वह बड़ी परतों में उतरे और भ्रूणपोष को भुरभुरा करता है। खाँचेदार ब्रेक रोल दाने को खोलकर भ्रूणपोष को चोकर से खुरचते हैं, छलनियाँ व प्यूरीफ़ायर सामग्री को श्रेणीबद्ध व साफ़ करते हैं, और चिकने रिडक्शन रोल उसे आटे में पीसते हैं। सफ़ेद आटा (मैदा) सामान्यतः गेहूँ का लगभग 70–75% होता है (निष्कर्षण दर); चक्की आटा लगभग पूरा दाना रखता है, और सूजी मोटा भ्रूणपोष है। मक्का या तो भ्रूण-निष्कासन के बाद शुष्क-मिलिंग से ग्रिट्स, मील व आटे में बदली जाती है, या आर्द्र-मिलिंग से: दाने SO₂ युक्त गुनगुने पानी में भिगोए जाते हैं, जो स्टार्च के चारों ओर का प्रोटीन-जाल ढीला करता और अवांछित किण्वन रोकता है, फिर भ्रूण (तेल हेतु), रेशा, ग्लूटेन (पशु-आहार हेतु) व स्टार्च (सिरप हेतु) अलग किए जाते हैं। दालों का छिलका तेल व पानी के उपचार और सुखाने से ढीला कर उन्हें छीलकर दो भागों में बाँटा जाता है (दाल मिलिंग); गोंद से चिपका अरहर का छिलका सबसे कठिन है।

2. ब्रेड, बिस्कुट, एक्सट्रूडेड खाद्य, नाश्ता अनाज, मांस-सदृश उत्पाद व वनस्पति-आधारित दूध

ब्रेड को सशक्त आटा चाहिए: गूँथने पर ग्लियाडिन (प्रसार्यता) व ग्लूटेनिन (प्रत्यास्थता) ग्लूटेन जाल बनाते हैं जो यीस्ट-किण्वन की CO₂ को बाँधे रखता है। किण्वन, आकार देने व प्रूफ़िंग के बाद बेकिंग गैस फैलाती है (ओवन स्प्रिंग), स्टार्च का जिलेटिनीकरण कर क्रम्ब स्थिर करती है, जबकि मायार अभिक्रियाएँ व कैरामलीकरण पपड़ी भूरी करते हैं। बासीपन (staling) मुख्यतः एमाइलोपेक्टिन का रेट्रोग्रेडेशन है, सूखना नहीं: यह प्रशीतक ताप पर सबसे तेज़ होता है, दोबारा गर्म करने पर कुछ देर के लिए पलटता है, पायसीकारकों व माल्टोजेनिक एमाइलेज़ से धीमा होता है और हिमीकरण से रुक जाता है। कैल्शियम प्रोपियोनेट फफूँद व ‘रोप’ (Bacillus) रोकता है। बिस्कुट में नरम, अल्प-प्रोटीन आटा, ग्लूटेन-विकास सीमित करने वाली अधिक चीनी व वसा, रासायनिक उठावक (सोडियम या अमोनियम बाइकार्बोनेट) और कुछ प्रतिशत नमी तक बेकिंग प्रयुक्त होती है।

एक्सट्रूज़न पाचन (extrusion cooking) नम स्टार्चयुक्त या प्रोटीन-प्रचुर सामग्री को गर्म पेंच-बैरल व डाई से धकेलता है; अपरूपण, ताप व दाब एक-दो मिनट में स्टार्च का जिलेटिनीकरण, प्रोटीनों का विकृतीकरण तथा एंज़ाइमों व अनेक प्रतिपोषकों का विनाश कर देते हैं। डाई पर दाब अचानक गिरता है, अतितप्त जल भाप बन जाता है और पिघला द्रव्यमान फूलकर स्नैक बनता है। खाने-को-तैयार (RTE) नाश्ता अनाज फ़्लेक (पकाए मक्का ग्रिट्स को रोलों से चपटा कर सेंकना), गन-पफ़ (दाब अचानक छोड़ना), श्रेड या एक्सट्रूड किए जाते हैं। मांस-सदृश उत्पाद (meat analogues) सोया, मटर या गेहूँ प्रोटीनों को बनावट देते हैं: अल्प-नमी एक्सट्रूज़न पुनर्जलयोजन हेतु स्पंजी, सूखा बनावटी वनस्पति प्रोटीन (TVP) देता है, जबकि लंबी शीतलन डाई से होकर उच्च-नमी एक्सट्रूज़न प्रोटीन को मांसपेशी-सदृश रेशों में संरेखित करता है; मेथिलसेलुलोज़ जैसे बंधक, वसा व रंग उन्हें पूरा करते हैं। वनस्पति-आधारित दूध भिगोने, गीली पिसाई, छानने, सूत्रीकरण, समांगीकरण व UHT उपचार से बनते हैं। सोयाबीन गर्म पानी में पीसे जाते हैं ताकि लाइपॉक्सीजिनेज़ निष्क्रिय हो और ‘बीनी’ गंध घटे, तथा पकाना ट्रिप्सिन अवरोधक नष्ट करता है; ओट पेय को एमाइलेज़ से उपचारित कर स्टार्च पतला व मीठा किया जाता है। सोया को छोड़ अधिकांश में गाय के दूध से बहुत कम प्रोटीन होता है, और उन्हें कैल्शियम तथा विटामिन B₁₂ व D से प्रबलीकृत किया जाता है।

3. तेल प्रसंस्करण: निष्कासन, विलायक निष्कर्षण, परिष्करण व हाइड्रोजनीकरण

तिलहनों को साफ़ कर, उपयोगी हो तो छिलका उतारकर, फ़्लेक बनाकर व पकाकर सतत पेंच-प्रेस में निष्कासित (expel) किया जाता है, जो ऐसी खली छोड़ता है जिसमें अब भी कुछ प्रतिशत तेल रहता है। खाद्य-श्रेणी हेक्सेन से विलायक निष्कर्षण खली (meal) में लगभग 1% से कम तेल छोड़ता है, अतः सोयाबीन व चावल-चोकर जैसे अल्प-तेल बीजों का सीधा निष्कर्षण होता है, जबकि उच्च-तेल बीजों (मूँगफली, सूरजमुखी, सरसों) को पहले दबाकर फिर निष्कर्षित किया जाता है। हेक्सेन मिसेला से आसवन द्वारा और खली से विलायक-निष्कासन व सेंकने द्वारा वापस ली जाती है। हाइड्रोजनीकरण उच्च ताप पर निकल उत्प्रेरक पर C=C बंधों में हाइड्रोजन जोड़ता है, आयोडीन मान घटाता और गलनांक व ऑक्सीकरण-स्थायित्व बढ़ाता है, जिससे द्रव तेल वनस्पति (vanaspati) व शॉर्टनिंग जैसी सुघट्य वसाओं में बदल जाते हैं। आंशिक हाइड्रोजनीकरण शेष द्विबंधों को सिस से ट्रांस में भी समावयवित करता है, और ट्रांस वसा LDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ाती है, अतः FSSAI सहित नियामक अब इसे सीमित करते हैं। पूर्णतः हाइड्रोजनीकृत वसा में लगभग कोई द्विबंध नहीं बचता, और अंतर-एस्टरीकरण (interesterification) (रासायनिक या लाइपेज़-उत्प्रेरित) ग्लिसरॉल पर वसा-अम्लों को पुनर्व्यवस्थित कर बिना ट्रांस समावयवी बनाए गलन-व्यवहार समायोजित करता है।

अपरिष्कृत तेल के रासायनिक परिष्करण के चरण
चरणक्या हटाता हैकैसे
डीगमिंगफ़ॉस्फ़ोलिपिड (गोंद), जो लेसिथिन के रूप में प्राप्त होते हैंपानी या तनु अम्ल
उदासीनीकरणमुक्त वसा-अम्ल, साबुन-अवशेष (soapstock) के रूप मेंतनु NaOH (भौतिक परिष्करण इसके बजाय भाप से FFA निकालता है)
विरंजनवर्णक, साबुन व धातुओं के अंशसक्रियित मृदा या कार्बन पर अधिशोषण
दुर्गंध-निष्कासनवाष्पशील गंध-यौगिक व शेष FFAउच्च निर्वात में उच्च ताप पर भाप-निष्कासन
विंटराइज़ेशनमोम व उच्च-गलनांकी ग्लिसराइडधीमा शीतलन, फिर निस्यंदन

4. फल व सब्ज़ी उत्पाद

रस कुचलकर व दबाकर निकाला जाता है, और पेक्टिनेज़ उपज बढ़ाता है। स्वच्छ रस (सेब, अंगूर) के लिए पेक्टिनेज़ पेक्टिन तोड़ता है ताकि धुंध के कण गुच्छित हों, फिर फ़ाइनिंग, अपकेंद्रण व निस्यंदन होते हैं। धुंधला रस (संतरा) जल्दी गर्म किया जाता है ताकि पेक्टिन मेथिलएस्टरेज़ निष्क्रिय हो, जो अन्यथा पेक्टिन का डी-एस्टरीकरण कर कैल्शियम पेक्टेट के रूप में धुंध नीचे बैठा देता। रस का सांद्रण सुगंध अलग कर प्राप्त करने के बाद निर्वात वाष्पित्रों में (या हिम-सांद्रण या प्रतिलोम परासरण से) होता है, और पैकिंग गर्म-भराई, ऐसेप्टिक या हिमीकृत रूप में।

जैम फल-गूदे को चीनी के साथ लगभग 68 °Brix तक उबालकर बनता है। उच्च-मेथॉक्सिल पेक्टिन जेल को लगभग 0.5–1% पेक्टिन, पेक्टिन से जल खींचने हेतु लगभग 55% से अधिक चीनी, और कार्बॉक्सिल समूहों का आवेश दबाने हेतु लगभग 3 pH चाहिए; अल्प-मेथॉक्सिल पेक्टिन कैल्शियम सेतुओं से जेल बनाता है और कम-चीनी उत्पादों के उपयुक्त है। अंत-बिंदु अपवर्तनमापी, क्वथनांक (लगभग 105 °C) या शीट परीक्षण से परखा जाता है। कम अम्ल या पेक्टिन से जमाव ढीला रहता है, अधिक अम्ल से सिनेरेसिस (पानी छोड़ना) होता है, और सुक्रोज़ का बहुत कम प्रतिलोमन उसे क्रिस्टलित होने देता है। जेली स्वच्छ, छने निष्कर्ष से जमाई जाती है; मार्मलेड खट्टे फल की जेली है जिसमें छिलके की कतरनें निलंबित रहती हैं। स्क्वैश रस-आधारित सांद्र पेय है जिसे पीने से पहले पतला किया जाता है और KMS या बेंज़ोएट से परिरक्षित किया जाता है। कैंडी फल क्रमशः बढ़ती सांद्रता के सिरप में डुबोकर (एकाएक गाढ़ा सिरप उसे सिकोड़ देता है) निथारा जाता है, फिर ग्लेज़ या क्रिस्टलित किया जाता है।

टमाटर उत्पादों की शुरुआत हॉट ब्रेक (कुचले टमाटरों को तेज़ी से लगभग 85–95 °C तक गर्म करना) से होती है, जो पेक्टिन मेथिलएस्टरेज़ व पॉलीगैलेक्टुरोनेज़ को पेक्टिन तोड़ने से पहले निष्क्रिय कर पेस्ट व केचप में वांछित उच्च गाढ़ापन देता है; कोल्ड ब्रेक (लगभग 60–70 °C) अधिक ताज़ा रंग व स्वाद रखता है पर पतला उत्पाद देता है, जो रस के उपयुक्त है। छिलके व बीज रहित गूदा प्यूरी है, जो और सांद्रित होकर पेस्ट बनती है; केचप व सॉस में चीनी, नमक, सिरका व मसाले मिलाए जाते हैं। आलू चिप्स के लिए अधिक शुष्क पदार्थ व कम अपचायी शर्करा वाले कंद चाहिए: लगभग 4 °C पर भंडारण शीत-जनित मिठास लाता है, जिससे चिप्स गहरे तले जाते हैं और अधिक एक्रिलामाइड (एस्पेरैजिन व अपचायी शर्कराओं से) बनता है, जिसे लगभग 20 °C पर पुनः-अनुकूलन घटाता है। अचार नमक (जो लैक्टिक किण्वन को बढ़ावा देता है), सिरके या वायु रोकने वाली तेल-परत पर टिके हैं।

5. चाय, कॉफ़ी, कोको, मसाले, सगंध तेल व ओलियोरेज़िन

काली चाय: कोंपलों (दो पत्तियाँ व एक कली) को मुरझाया (withering) जाता है ताकि नमी घटे और वे लचीली हों, फिर कोशिकाएँ तोड़ने हेतु रोल (ऑर्थोडॉक्स) या CTC (क्रश–टियर–कर्ल) मशीनों से काटा जाता है। “किण्वन” में, जो एंज़ाइमी ऑक्सीकरण है, सूक्ष्मजैविक नहीं, पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़ कैटेचिनों को थियाफ़्लेविन व थियारूबिजिन में ऑक्सीकृत करता है; फिर गर्म-वायु फ़ायरिंग एंज़ाइम रोक देती है। हरी चाय को पहले भाप दी जाती या कड़ाही में भूना जाता है, अतः एंज़ाइम मर जाते हैं और कैटेचिन अनॉक्सीकृत रहते हैं; ऊलोंग आंशिक ऑक्सीकृत है। कॉफ़ी चेरी का शुष्क प्रसंस्करण (पूरी चेरी धूप में सुखाकर छिलका उतारना) या आर्द्र प्रसंस्करण (गूदा हटाना, पेक्टिन-प्रचुर म्यूसिलेज प्राकृतिक किण्वन से हटाना, धोकर पार्चमेंट के रूप में सुखाना, फिर छीलकर हरे बीज) होता है। लगभग 200–240 °C पर भूनना मायार अभिक्रियाओं, कैरामलीकरण व तापअपघटन से रंग व सुगंध बनाता है और CO₂ छोड़ता है; इंस्टेंट कॉफ़ी फुहार- या हिम-शुष्कित निष्कर्ष है।

कोको बीज अपने गूदे सहित ढेरों या पेटियों में कई दिन किण्वित होते हैं: यीस्ट और फिर लैक्टिक व ऐसीटिक अम्ल जीवाणु गूदे पर कार्य करते हैं, और अम्ल व ताप बीज को मारकर उसके एंज़ाइमों को सुवास-पूर्वगामी (पेप्टाइड, अमीनो अम्ल, शर्कराएँ) बनाने देते हैं जो भूनने पर अभिक्रिया करते हैं। सूखे बीज भूनकर फटके जाते हैं और निब्स मिलते हैं, जिन्हें पीसकर कोको लिकर और दबाकर कोको बटर व पाउडर हेतु केक बनता है। चॉकलेट को परिष्कृत, कॉन्च (लंबा मिश्रण जो वाष्पशील अम्ल निकालता व बनावट चिकनी करता है) और टेम्पर किया जाता है ताकि कोको बटर अपने स्थायी रूप V में क्रिस्टलित हो और चमक व कुरकुरापन आए; कमज़ोर टेम्परिंग या गर्म भंडारण से वसा-ब्लूम होता है। मसाले पिसाई की ऊष्मा से वाष्पशील तेल खोते हैं, अतः द्रव नाइट्रोजन से क्रायोजेनिक पिसाई सुगंध बचाती है। सगंध तेल (essential oils), यानी वाष्पशील सुगंध-अंश, भाप आसवन से मिलते हैं; ओलियोरेज़िन विलायक निष्कर्षण व विलायक हटाने से, अतः उनमें वाष्पशील तेल के साथ अवाष्पशील तीखे व रंजक तत्व भी रहते हैं, जैसे काली मिर्च का पाइपेरिन, मिर्च का कैप्सैसिन, अदरक के जिंजरॉल और हल्दी का करक्यूमिन।

6. दूध व दुग्ध उत्पाद

गाय के दूध में लगभग 87% जल, 4% वसा, 3.3% प्रोटीन (अधिकतर केसीन) व 4.8% लैक्टोज़ होता है; भैंस के दूध में वसा अधिक होती है। डेयरी में दूध ठंडा, स्वच्छ, अपकेंद्री पृथक्कारी में पृथक्कृत (स्टोक्स नियम से पृथक्करण-वेग गोलिका-व्यास के वर्ग के अनुपात में बढ़ता है), मानकीकृत, समांगीकृत (उच्च दाब पर सँकरे वाल्व से धकेलना ताकि गोलिकाएँ लगभग 1 µm रह जाएँ और मलाई की परत न बने) और ताप-उपचारित किया जाता है: पाश्चुरीकृत (63 °C/30 मिनट या 72 °C/15 s) या UHT-उपचारित कर ऐसेप्टिक पैक।

🧠 पियर्सन वर्ग
वसा A% वाले दूध को वसा B% वाले दूध से मिलाकर C% (A > C > B) पाने के लिए पहले के (C − B) भाग व दूसरे के (A − C) भाग लें। 6.0% भैंस के दूध व 0.1% स्किम दूध से 4.5% हेतु: 4.4 भाग बनाम 1.5, अतः 100 kg भैंस के दूध में 100 × 1.5/4.4 = 34.1 kg स्किम।

मक्खन: क्रीम पाश्चुरीकृत कर, वसा क्रिस्टलित करने हेतु ठंड में परिपक्व कर मथी जाती है, जिससे गोलिका-झिल्लियाँ टूटती हैं और वसा कणों में जुड़ती है; यह तेल-में-जल पायस (क्रीम) से जल-में-तेल पायस (मक्खन, लगभग 80% वसा) में प्रावस्था-व्युत्क्रमण है, और छाछ अलग बह जाती है। घी मक्खन या क्रीम को लगभग 110–120 °C तक गर्म कर बनता है, जो जल उड़ाता और दुग्ध-ठोसों (अवशेष) को भूरा कर उसकी सुवास देता है; घी लगभग शुद्ध वसा है। आइसक्रीम मिश्रण (वसा, वसा-रहित दुग्ध ठोस, चीनी, स्थायीकारक, पायसीकारक) पाश्चुरीकृत, समांगीकृत, लगभग 4 °C पर परिपक्व, वायु फेंटते हुए खुरचन-सतह फ़्रीज़र में जमाया और −20 °C से काफ़ी नीचे कठोर किया जाता है। ओवररन = (आइसक्रीम का आयतन − मिश्रण का आयतन) ÷ मिश्रण का आयतन × 100; समान आयतनों के लिए यह (मिश्रण का द्रव्यमान − आइसक्रीम का द्रव्यमान) ÷ आइसक्रीम का द्रव्यमान × 100 के बराबर है। चीज़: रेनेट का काइमोसिन κ-केसीन को Phe105–Met106 बंध पर काटता है, अस्थिर मिसेल कैल्शियम के साथ जमते हैं, और दही को काटा, पकाया, निथारा, नमकीन किया, दबाया व परिपक्व किया जाता है; इसके विपरीत पनीर अम्ल व ताप से जमाया जाता है और परिपक्व नहीं किया जाता। दुग्ध चूर्ण निर्वात वाष्पन और फिर फुहार शुष्कन या रोलर शुष्कन (अधिक ताप-क्षति, कम विलेयता) से बनता है।

7. मांस, कुक्कुट व मछली प्रसंस्करण

वध इस क्रम में होता है: बाड़े में विश्राम (पेशी-ग्लाइकोजन बहाल करने हेतु), वध-पूर्व निरीक्षण, अचेतीकरण (stunning), रक्त-निकासी, खाल या बाल उतारना, आंत्र-निष्कासन, वध-पश्चात निरीक्षण व शीतलन। मृत्यु के बाद ATP समाप्त होता है और ऐक्टिन व मायोसिन मृत्यु-कठोरता (rigor mortis) में जकड़ जाते हैं; ग्लाइकोलिसिस pH को लगभग 7 से लगभग 5.5 के अंतिम pH तक गिराता है, और फिर एजिंग प्रोटीन-अपघटन (कैल्पेन) से मांस मुलायम करती है। वध-पूर्व तनाव ग्लाइकोजन घटाकर ऊँचा अंतिम pH और जल्दी बिगड़ने वाला DFD (गहरा, सख़्त, सूखा) मांस देता है; शव के गर्म रहते pH का बहुत तेज़ गिरना, जो तनाव-संवेदी सूअरों में विशिष्ट है, PSE (पीला, नरम, रिसने वाला) मांस देता है। गोमांस या मेमने को मृत्यु-कठोरता से पहले लगभग 10 °C से नीचे ठंडा करना शीत-संकुचन (cold shortening) व सख़्ती लाता है; विद्युत उद्दीपन ग्लाइकोलिसिस तेज़ करता है ताकि पेशी ठंडी होने से पहले कठोरता आ जाए। कुक्कुट को अचेत, वध, रक्त-निकासी, पंख ढीले करने हेतु गर्म पानी में स्कैल्डिंग, पंख-निष्कासन, आंत्र-निष्कासन और ठंडे पानी या वायु में शीतलन से गुज़ारा जाता है।

क्योरिंग में नमक, नाइट्राइट (या उसमें अपचित होने वाला नाइट्रेट), चीनी व ऐस्कॉर्बेट प्रयुक्त होते हैं: नाइट्राइट NO मुक्त करता है, जो गुलाबी नाइट्रोसिल मायोग्लोबिन बनाता, क्योर्ड सुवास देता, विकृतगंधिता धीमी करता और C. botulinum रोकता है; ऐस्कॉर्बेट रंग-निर्माण तेज़ करता और नाइट्रोसामीन सीमित करता है। धूमन (smoking) सुखाता व सुवास देता है: धुएँ के फ़ीनॉल प्रतिऑक्सीकारक व सूक्ष्मजीवरोधी हैं और कार्बोनिल सतह को भूरा करते हैं; शीत धूमन पकाता नहीं, गर्म धूमन पकाता है, और बेंज़ो[a]पाइरीन जैसे बहुचक्रीय ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन इसका खतरा हैं। मछली सबसे जल्दी बिगड़ती है: कम ग्लाइकोजन से मृत्यु-पश्चात pH ऊँचा रहता है, जीवाणु TMAO को मछलीनुमा गंध वाले TMA में अपचित करते हैं, अत्यधिक असंतृप्त वसाएँ विकृतगंधित होती हैं, और टूना व मैकेरल में ताप-दुरुपयोग हिस्टिडीन को हिस्टामीन में बदल देता है (स्कॉम्ब्रॉइड विषाक्तता)। मछली को बर्फ़ में रखा, जमाया (प्लेट या झोंका, फिर पतली बर्फ़-परत से ग्लेज़), पूर्ण अल्प-अम्ल प्रक्रम से डिब्बाबंद, सुखाया या नमकीन, या धूमित किया जाता है, अथवा खाने-को-तैयार सुरीमी उत्पादों (क्रायोरक्षक के रूप में चीनी व सॉर्बिटॉल सहित धुला कीमा, जेल में जमाया) में बदला जाता है; मांस से भी जमे, डिब्बाबंद, सूखे व खाने-को-तैयार उत्पाद (सॉसेज, हैम, नगेट) बनते हैं।

8. अपशिष्ट उपयोग

पेक्टिन खट्टे फलों के छिलकों व सेब की खली से गर्म तनु अम्ल द्वारा निष्कर्षित, ऐल्कोहॉल से अवक्षेपित, धोया, सुखाया व पीसा जाता है; नियंत्रित डी-एस्टरीकरण उच्च-मेथॉक्सिल को अल्प-मेथॉक्सिल श्रेणियों में बदलता है। चावल मिलिंग के उपोत्पाद हैं भूसी (बॉयलर ईंधन; उसकी सिलिका-प्रचुर राख सीमेंट व ऊष्मारोधन में जाती है), चोकर (जल्दी ताप-स्थायीकृत, क्योंकि उसका लाइपेज़ शीघ्र मुक्त वसा-अम्ल बढ़ाता है, फिर राइस ब्रान तेल हेतु निष्कर्षित, और तेल-रहित चोकर पशु-आहार में) तथा टूटा चावल (आटा, स्टार्च, स्नैक, ब्रूइंग)। खाद्य फ़िल्में व लेपन उपोत्पाद जैव-बहुलकों से बनते हैं, जैसे व्हे प्रोटीन, खाल व हड्डियों का जिलेटिन, मक्का का ज़ीन, क्रस्टेशियन कवचों का काइटोसन (जो सूक्ष्मजीवरोधी भी है), स्टार्च व पेक्टिन, जिन्हें ग्लिसरॉल या सॉर्बिटॉल से सुघट्य बनाया जाता है; वे अच्छे ऑक्सीजन अवरोध पर दुर्बल नमी अवरोध हैं, जब तक वसा न मिलाई जाए। खोई (bagasse), सुपारी-पत्ते व स्टार्च-आधारित या PLA सामग्री कुछ प्लास्टिक पैकेजिंग का स्थान लेती हैं।

9. खाद्य मानक, HACCP, स्वच्छता व CIP

भारत के पुराने खाद्य क़ानूनों व आदेशों में खाद्य अपमिश्रण निवारण (PFA) अधिनियम, 1954 और फल उत्पाद आदेश (FPO), 1955 प्रमुख थे; FPO चिह्न प्रसंस्कृत फल व सब्ज़ी उत्पादों पर अनिवार्य था। खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 ने इन क़ानूनों व आदेशों को एक प्रणाली में समेकित किया, जिसका संचालन भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) करता है; यह मानक तय करता, खाद्य व्यवसायों को लाइसेंस देता और लाइसेंसधारी व्यवसायों से उत्तम स्वच्छता व विनिर्माण प्रथाओं पर आधारित खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली (FSMS) योजना चलाने की भी अपेक्षा करता है। कृषि उपज (श्रेणीकरण और चिह्नन) अधिनियम, 1937 के अंतर्गत एगमार्क (Agmark) दालों, मसालों, घी व शहद जैसी कृषि वस्तुओं की श्रेणियाँ प्रमाणित करता है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) राष्ट्रीय मानक निकाय है, जिसका ISI चिह्न भारतीय मानकों से अनुरूपता प्रमाणित करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर FAO व WHO का कोडेक्स एलिमेंटेरियस आयोग खाद्य मानक व आचार-संहिताएँ जारी करता है, और ISO 22000 ऐसी FSMS निर्दिष्ट करता है जो HACCP, पूर्वापेक्षित कार्यक्रमों व प्रबंधन-प्रणाली अपेक्षाओं को जोड़ती है।

HACCP निवारक है: तैयार उत्पादों की जाँच के बजाय वह जैविक, रासायनिक व भौतिक खतरों (और एलर्जनों) को वहीं नियंत्रित करता है जहाँ वे उत्पन्न होते हैं। इसके सात सिद्धांत:
(1) खतरा-विश्लेषण करें;
(2) क्रांतिक नियंत्रण बिंदु (CCP) तय करें, यानी वे चरण जहाँ किसी खतरे को रोकने, मिटाने या स्वीकार्य स्तर तक घटाने हेतु नियंत्रण अनिवार्य है;
(3) क्रांतिक सीमाएँ तय करें (जैसे 72 °C पर 15 s);
(4) निगरानी करें;
(5) सुधारात्मक कार्रवाइयाँ तय करें;
(6) सत्यापन करें;
(7) अभिलेख रखें। स्वच्छता पहले गंदगी हटाती है (सफ़ाई) और फिर सूक्ष्मजीवों को सुरक्षित स्तर तक घटाती है (सैनिटाइज़िंग); क्लोरीन कार्बनिक गंदगी से शीघ्र खप जाती है, अतः केवल साफ़ सतहों पर कारगर है। सफ़ाई समय, यांत्रिक क्रिया, रसायन-सांद्रता व ताप पर निर्भर है। क्लीनिंग इन प्लेस (CIP) बंद उपकरण को खोले बिना उसमें विक्षुब्ध वेग से विलयन प्रवाहित करता है: पानी से पूर्व-धुलाई, वसा व प्रोटीन हेतु गर्म क्षार (NaOH), धुलाई, मिल्कस्टोन जैसी खनिज-परत हेतु अम्ल (नाइट्रिक या फ़ॉस्फ़ोरिक), अंतिम धुलाई, फिर गर्म पानी, क्लोरीन या पेरऐसीटिक अम्ल से सैनिटाइज़िंग।

मुख्य बिंदु

  • चावल: भूसी धान का लगभग पाँचवाँ भाग है, और उसनाकरण स्टार्च-जिलेटिनीकरण से साबुत चावल उपज बढ़ाता है। गेहूँ अनुकूलित कर खाँचेदार रोलों पर तोड़ा व चिकने रोलों पर पीसा जाता है।
  • ब्रेड एमाइलोपेक्टिन रेट्रोग्रेडेशन से बासी होती है, ठंड में सबसे तेज़; अतितप्त जल के भाप बनने से एक्सट्रूडेड स्नैक फूलते हैं; उच्च-नमी एक्सट्रूज़न रेशेदार मांस-सदृश उत्पाद बनाता है।
  • निष्कासन कुछ प्रतिशत तेल छोड़ता है, हेक्सेन 1% से कम; परिष्करण है डीगमिंग, उदासीनीकरण, विरंजन व दुर्गंध-निष्कासन; आंशिक हाइड्रोजनीकरण ट्रांस वसा बनाता है, अंतर-एस्टरीकरण नहीं।
  • उच्च-मेथॉक्सिल पेक्टिन लगभग 55% से अधिक चीनी व लगभग 3 pH पर जमता है; जैम लगभग 68 °Brix पर पूरा होता है; हॉट ब्रेक टमाटर पेस्ट गाढ़ा करता है। चाय का “किण्वन” PPO ऑक्सीकरण है; ओलियोरेज़िन तीखापन रखते हैं, सगंध तेल केवल सुगंध।
  • पियर्सन वर्ग: अधिक वसा वाले दूध के (C − B) भाग, कम वाले के (A − C)। मथना क्रीम को मक्खन में उलटता है; काइमोसिन κ-केसीन काटता है। विद्युत उद्दीपन शीत-संकुचन रोकता है; मछलीनुमा गंध TMA है।
  • FSS अधिनियम, 2006 ने PFA अधिनियम, FPO व अन्य आदेशों को FSSAI के अधीन समेकित किया। HACCP के सात सिद्धांत हैं; CIP क्रम है धुलाई, क्षार, धुलाई, अम्ल, धुलाई, सैनिटाइज़िंग।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. एक चावल मिल 1000 kg धान का प्रसंस्करण करती है। भूसी धान के द्रव्यमान का 20% है, सफ़ेद करने में हटाया गया चोकर व पॉलिश भूरे चावल का 9% है, और टूटे दाने मिल्ड चावल का 12% हैं। धान के प्रतिशत के रूप में साबुत चावल उपज (एक दशमलव स्थान तक) ____ है।

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    उत्तर: 64.1

    भूरा चावल = 1000 × 0.80 = 800 kg। मिल्ड चावल = 800 × (1 − 0.09) = 728 kg। साबुत चावल = 728 × (1 − 0.12) = 640.64 kg, अर्थात धान का 64.06% ≈ 64.1%। सभी प्रतिशतों को 100 से घटाना (100 − 20 − 9 − 12 = 59%) प्रचलित भूल है, क्योंकि प्रत्येक हानि भिन्न धारा का अंश है।
  2. उसना धान मिलिंग पर प्रायः उसी किस्म के कच्चे धान से अधिक साबुत चावल उपज देता है। उसनाकरण के दौरान कौन-सा परिवर्तन मुख्यतः इसका कारण है?

    1. भिगोना भूसी को बाँधने वाले प्रोटीन घोल देता है, अतः शेलर में दाने पर दबाव डाले बिना भूसी उतर जाती है
    2. भाप देने पर स्टार्च जिलेटिनीकृत होता है और सूखने पर दरारें भरकर भ्रूणपोष को कठोर, मज़बूत दाने में बाँध देता है
    3. थायमिन व अन्य विटामिन चोकर से भ्रूणपोष में जाते हैं, जहाँ वे स्टार्च कणिकाओं को मज़बूत बनाते हैं
    4. भाप देने से चोकर का अधिकांश तेल निकल जाता है, अतः वांछित सफ़ेदी हेतु दाने को बहुत कम पॉलिश चाहिए
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    उत्तर: B — भाप देने पर स्टार्च जिलेटिनीकृत होता है और सूखने पर दरारें भरकर भ्रूणपोष को कठोर, मज़बूत दाने में बाँध देता है

    जिलेटिनीकृत स्टार्च दरारों में बहकर सूखने पर जम जाता है, अतः दाना पारभासी व कठोर होकर छिलाई व सफ़ेदी में टूटन का प्रतिरोध करता है। विटामिनों का भीतर जाना उसनाकरण का वास्तविक प्रभाव है, जो उस विकल्प को भ्रामक बनाता है, पर वह पोषण बढ़ाता है, मज़बूती नहीं। उसना चोकर वास्तव में अधिक तेल-युक्त होता है, और भूसी उतरना टूटन घटने का कारण नहीं।
  3. रेफ़्रिजरेटर में 4 °C पर रखी कटी सफ़ेद ब्रेड, 25 °C पर रखी उसी ब्रेड से जल्दी सख़्त होती है, यद्यपि उसकी नमी कम घटती है। इसकी सर्वोत्तम व्याख्या क्या है?

    1. क्रम्ब के सख़्त होने का मुख्य कारण, एमाइलोपेक्टिन रेट्रोग्रेडेशन, कमरे के ताप की तुलना में प्रशीतक ताप पर तेज़ चलता है
    2. क्रम्ब में बची यीस्ट-सक्रियता से बने डाइसल्फ़ाइड बंधों द्वारा ग्लूटेन प्रोटीन ठंड में भी तिर्यक-बंधित होते रहते हैं
    3. 4 °C पर नमी क्रम्ब से पपड़ी की ओर कहीं तेज़ी से जाती है, अतः कुल नमी बनी रहने पर भी क्रम्ब सूख जाता है
    4. 4 °C पर ब्रेड की वसा बड़े क्रिस्टल बनाती है, और यही, न कि स्टार्च में कोई परिवर्तन, सख़्त होने का मुख्य कारण है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — क्रम्ब के सख़्त होने का मुख्य कारण, एमाइलोपेक्टिन रेट्रोग्रेडेशन, कमरे के ताप की तुलना में प्रशीतक ताप पर तेज़ चलता है

    बासीपन मुख्यतः जिलेटिनीकृत स्टार्च में एमाइलोपेक्टिन का पुनःक्रिस्टलन है; यह कमरे के ताप से ठंडे ताप पर तेज़ और जमी अवस्था में नगण्य होता है, इसीलिए ब्रेड रेफ़्रिजरेटर में सबसे जल्दी बासी होती और फ़्रीज़र में अच्छी रहती है। क्रम्ब से पपड़ी की ओर नमी जाती तो है, पर ठंड में तेज़ नहीं होती और नमी घटे बिना सख़्ती नहीं समझाती; यीस्ट बेकिंग में मर जाता है, और वसा-क्रिस्टलन अधिक-से-अधिक गौण योगदान है।
  4. एक्सट्रूडेड खाद्यों, मांस-सदृश उत्पादों व वनस्पति-आधारित दूधों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. लंबी शीतलन डाई से होकर उच्च-नमी एक्सट्रूज़न वनस्पति प्रोटीनों को रेशेदार, मांस-सदृश संरचना में संरेखित करता है
    2. डाई पर एक्सट्रूडेड मक्का स्नैक का फूलना दाब गिरने पर अतितप्त जल के भाप बनने से होता है
    3. सोयाबीन ठंडे पानी में पीसे जाते हैं ताकि लाइपॉक्सीजिनेज़ बचा रहे, जो सोया दूध की ‘बीनी’ गंध हटाता है
    4. ओट व बादाम आधारित पेयों में प्राकृतिक रूप से गाय के दूध से अधिक प्रोटीन होता है, अतः उनका प्रबलीकरण नहीं होता
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — लंबी शीतलन डाई से होकर उच्च-नमी एक्सट्रूज़न वनस्पति प्रोटीनों को रेशेदार, मांस-सदृश संरचना में संरेखित करता है; B — डाई पर एक्सट्रूडेड मक्का स्नैक का फूलना दाब गिरने पर अतितप्त जल के भाप बनने से होता है

    लंबी डाई में बहते प्रोटीन-पिघल को ठंडा करना उसे रेशों में संरेखित करता है, जो साबुत-टुकड़ा मांस-सदृश उत्पादों का आधार है, और स्नैक का फूलना डाई पर अतितप्त जल के अचानक भाप बनने से है। ‘बीनी’ गंध लाइपॉक्सीजिनेज़ बनाता है, अतः उसे निष्क्रिय करने हेतु सोयाबीन गर्म पानी में पीसे जाते हैं। ओट व बादाम पेयों में गाय के दूध से बहुत कम प्रोटीन होता है और उन्हें प्रायः कैल्शियम व विटामिनों से प्रबलीकृत किया जाता है।
  5. एक तिलहन में 40% तेल है, शेष तेल-रहित ठोस हैं (नमी की उपेक्षा करें)। केवल निष्कासन ऐसी खली छोड़ता है जिसमें 7.0% तेल है, जबकि विलायक निष्कर्षण ऐसी मील छोड़ता है जिसमें 1.0% तेल है, दोनों खली या मील के द्रव्यमान पर। यह मानकर कि समस्त तेल-रहित ठोस खली या मील में जाते हैं, प्रति 1000 kg बीज पर निष्कासन की तुलना में विलायक निष्कर्षण से प्राप्त अतिरिक्त तेल (kg, एक दशमलव स्थान तक) ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 39.1

    तेल-रहित ठोस = 600 kg। खली: शेष तेल x के लिए x/(600 + x) = 0.07, अतः x = 0.07 × 600/0.93 = 45.16 kg। मील: x = 0.01 × 600/0.99 = 6.06 kg। अतिरिक्त प्राप्त तेल = 45.16 − 6.06 = 39.10 ≈ 39.1 kg। 1000 kg बीज का 7% व 1% लेना (70 − 10 = 60 kg) प्रचलित भूल है, क्योंकि प्रतिशत खली व मील के हैं।
  6. एक वसा निर्माता आंशिक हाइड्रोजनीकृत सोयाबीन तेल के स्थान पर पूर्ण हाइड्रोजनीकृत सोयाबीन तेल व द्रव सोयाबीन तेल के अंतर-एस्टरीकरण से बना मिश्रण लेता है। नई वसा में ट्रांस वसा-अम्ल बहुत कम क्यों है?

    1. अंतर-एस्टरीकरण उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त लाइपेज़ की क्रिया से ट्रांस द्विबंधों को वापस सिस रूप में बदल देता है
    2. पूर्ण हाइड्रोजनीकरण का निकल उत्प्रेरक सिस बंधों में हाइड्रोजन जोड़ता है पर ट्रांस बंधों पर कार्य नहीं कर सकता, अतः वे परिष्करण में हटाए जाते हैं
    3. द्रव सोयाबीन तेल में प्राकृतिक सिस समावयवी होते हैं जो मिश्रण करने पर हाइड्रोजनीकरण में बने ट्रांस वसा-अम्लों को निष्प्रभावी कर देते हैं
    4. पूर्ण हाइड्रोजनीकरण समावयवन हेतु लगभग कोई द्विबंध नहीं छोड़ता, और अंतर-एस्टरीकरण केवल वसा-अम्लों को ग्लिसरॉल की स्थितियों के बीच खिसकाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — पूर्ण हाइड्रोजनीकरण समावयवन हेतु लगभग कोई द्विबंध नहीं छोड़ता, और अंतर-एस्टरीकरण केवल वसा-अम्लों को ग्लिसरॉल की स्थितियों के बीच खिसकाता है

    ट्रांस समावयवी तब बनते हैं जब कोई द्विबंध आंशिक हाइड्रोजनीकृत होकर ट्रांस विन्यास में पुनः बनता है; पूर्ण हाइड्रोजनीकृत वसा लगभग संतृप्त है, अतः उसमें ये लगभग नहीं होते। अंतर-एस्टरीकरण द्विबंधों को छुए बिना ग्लिसरॉल पर वसा-अम्लों को यादृच्छिक करता है और कठोर वसा को द्रव तेल से नरम बनाता है, अतः नए ट्रांस समावयवी नहीं बनते। यह ट्रांस बंधों को सिस में नहीं बदलता, और मिश्रण पहले से उपस्थित समावयवियों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।
  7. जैम का एक बैच 12 °Brix के 60 kg फल-गूदे व 54 kg सुक्रोज़ से बनाकर 68 °Brix तक उबाला जाता है। सभी घुलनशील ठोस गूदे व सुक्रोज़ से आए मानकर और अन्य हानियों की उपेक्षा कर, वाष्पित जल का द्रव्यमान (kg) ____ है।

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    उत्तर: 24

    घुलनशील ठोस = 60 × 0.12 + 54 = 7.2 + 54 = 61.2 kg, जो संरक्षित रहते हैं। अंतिम जैम = 61.2/0.68 = 90.0 kg। आरंभिक द्रव्यमान = 60 + 54 = 114 kg, अतः वाष्पित जल = 114 − 90 = 24 kg। गूदे के ठोस भूलने पर 54/0.68 = 79.4 kg जैम और गलत उत्तर 34.6 kg आता है।
  8. एक प्रसंस्कर्ता टमाटर केचप बनाता है और अधिकतम गाढ़ापन चाहता है; दूसरा टमाटर रस बनाता है और सबसे ताज़ा रंग व स्वाद चाहता है। कौन-सा ब्रेक-चयन दोनों के अनुकूल है?

    1. केचप हेतु कोल्ड ब्रेक, क्योंकि लगभग 65 °C पर सक्रिय पेक्टिन मेथिलएस्टरेज़ गूदे को काफ़ी गाढ़ा करता है; रस हेतु हॉट ब्रेक
    2. दोनों हेतु हॉट ब्रेक, क्योंकि कोल्ड ब्रेक पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़ को सक्रिय छोड़ता है, जो टमाटर उत्पादों को घंटों में काला कर देता है
    3. केचप हेतु हॉट ब्रेक, क्योंकि तेज़ तापन पेक्टिक एंज़ाइमों को पेक्टिन तोड़ने से पहले निष्क्रिय कर देता है; रस हेतु कोल्ड ब्रेक
    4. दोनों हेतु कोल्ड ब्रेक, क्योंकि हॉट ब्रेक अधिकांश लाइकोपीन नष्ट कर देता है, अतः केचप व रस दोनों अपना लाल रंग खो देते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — केचप हेतु हॉट ब्रेक, क्योंकि तेज़ तापन पेक्टिक एंज़ाइमों को पेक्टिन तोड़ने से पहले निष्क्रिय कर देता है; रस हेतु कोल्ड ब्रेक

    कुचले टमाटरों को तेज़ी से लगभग 85–95 °C तक गर्म करना पेक्टिन मेथिलएस्टरेज़ व पॉलीगैलेक्टुरोनेज़ को पेक्टिन तोड़ने से पहले निष्क्रिय कर देता है, अतः उत्पाद श्यानता बनाए रखता है, जो पेस्ट व केचप के उपयुक्त है। कोल्ड ब्रेक (लगभग 60–70 °C) इन एंज़ाइमों को कार्य करने देता है, जिससे उत्पाद पतला होता है, पर वह रंग व ताज़े स्वाद के प्रति मृदु है, जो रस के उपयुक्त है। टमाटर के गूदे में पेक्टिन मेथिलएस्टरेज़ पेक्टिन को पॉलीगैलेक्टुरोनेज़ द्वारा विघटन हेतु तैयार करता है, अतः वह गूदे को गाढ़ा नहीं, पतला करता है; लाइकोपीन अपेक्षाकृत ताप-स्थायी है, और पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़ का भूरापन टमाटर उत्पादों की सीमा नहीं है।
  9. हरी व काली चाय एक ही चाय-कोंपलों से बनाई जा सकती हैं। प्रसंस्करण का कौन-सा अंतर समझाता है कि हरी चाय अपने अधिकांश कैटेचिन क्यों बनाए रखती है?

    1. उसकी पत्तियों को आरंभ में भाप दी जाती या कड़ाही में भूना जाता है, जिससे रोलिंग द्वारा कोशिकाएँ टूटने से पहले पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़ निष्क्रिय हो जाता है
    2. उसका यीस्टों द्वारा अधिक समय तक किण्वन होता है, और यीस्ट थियाफ़्लेविनों को वापस कैटेचिनों में बदल देते हैं
    3. वह ऐसी पुरानी पत्तियों से बनती है जिनमें पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़ नहीं होता, काली चाय की कली व दो पत्तियों के विपरीत
    4. उसमें मुरझाने का चरण नहीं होता, और मुरझाना ही वह चरण है जिसमें कैटेचिन थियारूबिजिन में बदलते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उसकी पत्तियों को आरंभ में भाप दी जाती या कड़ाही में भूना जाता है, जिससे रोलिंग द्वारा कोशिकाएँ टूटने से पहले पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़ निष्क्रिय हो जाता है

    काली चाय में रोलिंग या CTC पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़ को कैटेचिनों के संपर्क में लाते हैं, जो “किण्वन” में थियाफ़्लेविन व थियारूबिजिन में ऑक्सीकृत होते हैं। हरी चाय को पहले भाप देना या भूनना एंज़ाइम को मार देता है, अतः रोलिंग से ऑक्सीकरण आरंभ नहीं होता। चाय का “किण्वन” एंज़ाइमी है, सूक्ष्मजैविक नहीं, और ऑक्सीकरण मुरझाने के बाद नहीं, रोलिंग के बाद होता है।
  10. एक खाद्य कंपनी को काली मिर्च का ऐसा निष्कर्ष चाहिए जो मसाले की सुगंध व तीखापन दोनों दे। उसे कौन-सा उत्पाद चुनना चाहिए, और क्यों?

    1. काली मिर्च का सगंध तेल, क्योंकि भाप आसवन सभी सुगंध-यौगिकों के साथ पाइपेरिन भी प्राप्त कर लेता है
    2. काली मिर्च का सगंध तेल, क्योंकि तीखापन उन वाष्पशील टरपीनों में है जिन्हें भाप आसवन प्राप्त व सांद्रित करता है
    3. काली मिर्च ओलियोरेज़िन, क्योंकि विलायक निष्कर्षण वाष्पशील तेल के साथ अवाष्पशील तीखा पाइपेरिन भी ले आता है
    4. क्रायोजेनिक रूप से पिसी काली मिर्च, क्योंकि द्रव नाइट्रोजन पिसे मसाले से पाइपेरिन का चयनात्मक निष्कर्षण करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — काली मिर्च ओलियोरेज़िन, क्योंकि विलायक निष्कर्षण वाष्पशील तेल के साथ अवाष्पशील तीखा पाइपेरिन भी ले आता है

    तीखा तत्व पाइपेरिन अवाष्पशील है, अतः भाप आसवन में पीछे रह जाता है; सगंध तेल में सुगंध है पर तीखापन बहुत कम। विलायक निष्कर्षण व फिर विलायक हटाने से ओलियोरेज़िन मिलता है जिसमें वाष्पशील तेल व अवाष्पशील तीखा रेज़िन दोनों हैं। क्रायोजेनिक पिसाई वाष्पशील तेल बचाने वाली पिसाई-विधि है, निष्कर्षण-विधि नहीं।
  11. एक डेयरी 6.5% वसा वाले 400 kg भैंस के दूध को 0.1% वसा वाला स्किम दूध मिलाकर 3.0% वसा पर मानकीकृत करना चाहती है। पियर्सन वर्ग (वसा-संतुलन) से मिलाए जाने वाले स्किम दूध का द्रव्यमान (kg, एक दशमलव स्थान तक) ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 482.8

    भैंस के दूध के भाग = 3.0 − 0.1 = 2.9; स्किम दूध के भाग = 6.5 − 3.0 = 3.5। स्किम दूध = 400 × 3.5/2.9 = 482.76 ≈ 482.8 kg। जाँच: 882.8 kg में वसा = 26.0 + 0.48 = 26.48 kg, जो 3.0% है।
  12. आइसक्रीम मिश्रण से भरा 2.0 L का कप 2.20 kg (शुद्ध) तौलता है, और उसी मिश्रण से बनी जमी आइसक्रीम से भरा वही कप 1.16 kg (शुद्ध) तौलता है। ओवररन (%, एक दशमलव स्थान तक) ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 89.7

    समान आयतनों के लिए ओवररन = (मिश्रण का द्रव्यमान − आइसक्रीम का द्रव्यमान)/आइसक्रीम का द्रव्यमान × 100 = (2.20 − 1.16)/1.16 × 100 = 89.7%; समतुल्य रूप से, मिश्रण का कोई द्रव्यमान जमने के बाद अपने आयतन का 2.20/1.16 = 1.897 गुना घेरता है। मिश्रण के द्रव्यमान से भाग देना (47.3%) प्रचलित भूल है।
  13. वध के दो घंटे के भीतर 2 °C तक ठंडे किए गोमांस के अर्ध-शव धीरे ठंडे किए अर्ध-शवों से कहीं सख़्त निकलते हैं। तेज़ शीतलन की अनुमति रखते हुए वध के समय कौन-सा उपाय इस सख़्ती को सर्वोत्तम रोकेगा?

    1. शव को तुरंत −20 °C पर जमाना, जो पेशी को पकाए जाने तक उसकी शिथिल कठोरता-पूर्व अवस्था में बाँध देता है
    2. शव का विद्युत उद्दीपन, जो ग्लाइकोलिसिस व ATP-क्षय तेज़ करता है ताकि पेशी ठंडी होने से पहले मृत्यु-कठोरता आ जाए
    3. नाइट्राइट लवण-जल का इंजेक्शन, जो मायोग्लोबिन से बँधकर इस प्रकार उस कैल्शियम-मुक्ति को रोकता है जो ठंडी पेशी को संकुचित करती है
    4. पशुओं को पहले दो दिन बिना चारे-पानी के रखना, ताकि वे कम पेशी-ग्लाइकोजन के साथ वध तक पहुँचें
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — शव का विद्युत उद्दीपन, जो ग्लाइकोलिसिस व ATP-क्षय तेज़ करता है ताकि पेशी ठंडी होने से पहले मृत्यु-कठोरता आ जाए

    लगभग 10 °C से नीचे ठंडी की गई कठोरता-पूर्व पेशी ATP उपस्थित रहते कैल्शियम मुक्त कर प्रबल संकुचन करती है: शीत-संकुचन। विद्युत उद्दीपन ATP शीघ्र समाप्त करता है, अतः पेशी ठंडी होने से पहले कठोरता पूरी हो जाती है। तुरंत जमाना पिघलन-कठोरता (thaw rigor) लाता है, जो और बुरी है; नाइट्राइट कैल्शियम-मुक्ति पर कोई प्रभाव नहीं डालता; और ग्लाइकोजन घटाना संकुचन रोकने के बजाय DFD मांस देता है।
  14. दुग्ध उत्पादों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. रेनेट का काइमोसिन κ-केसीन को काटता है, जिससे केसीन मिसेल अस्थिर होकर कैल्शियम की उपस्थिति में जम जाते हैं
    2. मथना तेल-में-जल पायस (क्रीम) को जल-में-तेल पायस (मक्खन) में बदलता है
    3. पनीर रेनेट से जमाया जाता है और फिर सुवास विकसित करने हेतु कई सप्ताह परिपक्व किया जाता है
    4. समांगीकरण वसा-गोलिकाओं को बड़ा करता है ताकि क्रीम तेज़ी से ऊपर आए और आसानी से अलग की जा सके
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — रेनेट का काइमोसिन κ-केसीन को काटता है, जिससे केसीन मिसेल अस्थिर होकर कैल्शियम की उपस्थिति में जम जाते हैं; B — मथना तेल-में-जल पायस (क्रीम) को जल-में-तेल पायस (मक्खन) में बदलता है

    काइमोसिन κ-केसीन को Phe105–Met106 पर काटकर वह रोएँदार परत हटाता है जो मिसेलों को अलग रखती है, और फिर कैल्शियम उन्हें जमा देता है। मथना गोलिका-झिल्लियों को क्षति पहुँचाता है, अतः वसा जुड़ती है और पायस तेल-में-जल से जल-में-तेल में उलट जाता है। पनीर अम्ल व ताप से जमाया और ताज़ा खाया जाता है, परिपक्व नहीं किया जाता, और समांगीकरण गोलिकाओं को लगभग 1 µm तक तोड़ता है ठीक इसलिए कि क्रीम ऊपर न आए।
  15. बर्फ़ में बहुत देर रखी समुद्री मछली में विकसित “मछलीनुमा” गंध मुख्यतः किस यौगिक के कारण होती है?

    1. हिस्टामीन, जो सभी समुद्री मछलियों में उपस्थित मुक्त हिस्टिडीन के लैक्टिक अम्ल जीवाणुओं द्वारा विकार्बॉक्सिलन से बनता है
    2. हाइड्रोजन सल्फ़ाइड, जो भंडारण में मछली की वसाओं के वायुमंडलीय ऑक्सीजन द्वारा ऑक्सीकरण से बनती है
    3. अमोनिया, जो मृत्यु के बाद मछली के पेशी-ग्लाइकोजन के अवायवीय विघटन से बनती है
    4. ट्राइमेथिलऐमीन, जो मांसपेशी में उपस्थित ट्राइमेथिलऐमीन ऑक्साइड के विकारी जीवाणुओं द्वारा अपचयन से बनता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — ट्राइमेथिलऐमीन, जो मांसपेशी में उपस्थित ट्राइमेथिलऐमीन ऑक्साइड के विकारी जीवाणुओं द्वारा अपचयन से बनता है

    समुद्री मछलियों में TMAO होता है, जिसे Shewanella जैसे विकारी जीवाणु इलेक्ट्रॉन-ग्राही के रूप में प्रयोग कर वाष्पशील, मछलीनुमा गंध वाले TMA में अपचित करते हैं, जो विकार का मानक सूचक है। हिस्टामीन टूना व मैकेरल जैसी हिस्टिडीन-प्रचुर मछलियों में ताप-दुरुपयोग से बना स्कॉम्ब्रॉइड आविष है, मछलीनुमा गंध का सामान्य कारण नहीं; वसा-ऑक्सीकरण विकृत (rancid) गंध देता है, सल्फ़ाइड नहीं; और ग्लाइकोजन-विघटन लैक्टिक अम्ल देता है, अमोनिया नहीं।
  16. दूध के HTST पाश्चुरीकरण की HACCP योजना में यह अपेक्षा कि दूध को कम-से-कम 72 °C पर 15 s रखा जाए, किस तत्व का उदाहरण है?

    1. क्रांतिक सीमा, अर्थात वह मानदंड जो किसी क्रांतिक नियंत्रण बिंदु पर स्वीकार्य को अस्वीकार्य से अलग करता है
    2. पूर्वापेक्षित कार्यक्रम, अर्थात एक सामान्य स्वच्छता-शर्त जो पूरे संयंत्र पर लागू होती है
    3. सत्यापन गतिविधि, अर्थात वह आवधिक जाँच जो पुष्टि करती है कि HACCP योजना अभीष्ट रूप से कार्य कर रही है
    4. सुधारात्मक कार्रवाई, अर्थात वह कदम जो निगरानी से CCP पर नियंत्रण खोने का पता चलने पर उठाया जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — क्रांतिक सीमा, अर्थात वह मानदंड जो किसी क्रांतिक नियंत्रण बिंदु पर स्वीकार्य को अस्वीकार्य से अलग करता है

    पाश्चुरीकरण एक CCP है, और वहाँ पूरा किया जाने वाला समय–ताप संयोजन उसकी क्रांतिक सीमा है। पूर्वापेक्षित कार्यक्रम पूरे संयंत्र की स्वच्छता-शर्तें हैं, किसी चरण-विशेष का मानदंड नहीं; सत्यापन (जैसे तापमापी का अंशांकन या चार्टों की समीक्षा) प्रणाली की जाँच करता है; सुधारात्मक कार्रवाई (कम गर्म हुए दूध को मोड़ना) सीमा टूटने पर होती है।
  17. खाद्य संयंत्र स्वच्छता व क्लीनिंग इन प्लेस (CIP) के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. डेयरी CIP में गर्म क्षार-धुलाई वसा व प्रोटीन हटाती है, और अम्ल-धुलाई मिल्कस्टोन जैसे खनिज-जमाव हटाती है
    2. क्लोरीन सैनिटाइज़र सफ़ाई से पहले लगाने पर सर्वोत्तम कार्य करते हैं, क्योंकि कार्बनिक गंदगी उन्हें विघटन से बचाती है
    3. CIP बंद उपकरण को खोले बिना उसमें धुलाई-जल व अपमार्जक विलयन प्रवाहित कर साफ़ करता है
    4. अपमार्जक-सांद्रता तय हो जाने पर सफ़ाई-ताप बढ़ाने का सफ़ाई-दक्षता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — डेयरी CIP में गर्म क्षार-धुलाई वसा व प्रोटीन हटाती है, और अम्ल-धुलाई मिल्कस्टोन जैसे खनिज-जमाव हटाती है; C — CIP बंद उपकरण को खोले बिना उसमें धुलाई-जल व अपमार्जक विलयन प्रवाहित कर साफ़ करता है

    क्षार वसा का साबुनीकरण करता व प्रोटीन घोलता है, अम्ल कैल्शियम फ़ॉस्फ़ेट की परत घोलता है, और CIP यह सब बंद पाइपों व पात्रों में प्रवाह द्वारा करता है। क्लोरीन कार्बनिक पदार्थ से अभिक्रिया कर खप जाती है, अतः सैनिटाइज़ करने से पहले सतहें साफ़ करनी होती हैं। सफ़ाई-दक्षता समय, यांत्रिक क्रिया, सांद्रता व ताप पर मिलकर निर्भर है, अतः तय सांद्रता पर भी ताप मायने रखता है।
  18. खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 भारतीय खाद्य नियमन के लिए मुख्यतः इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने:

    1. कृषि उपज हेतु एगमार्क श्रेणीकरण योजना बनाई और साथ ही भारतीय मानक ब्यूरो को समाप्त कर दिया
    2. पूर्ववर्ती खाद्य क़ानूनों व आदेशों, जैसे PFA अधिनियम व फल उत्पाद आदेश, को एक प्राधिकरण, FSSAI, के अधीन समेकित किया
    3. किसी भी राष्ट्रीय मानक के स्थान पर कोडेक्स एलिमेंटेरियस मानकों को भारतीय खाद्य व्यवसायों पर सीधे बाध्यकारी बनाया
    4. पहली बार फल उत्पाद आदेश लागू किया, जिससे फल प्रसंस्कर्ताओं हेतु लाइसेंस अनिवार्य हो गया
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — पूर्ववर्ती खाद्य क़ानूनों व आदेशों, जैसे PFA अधिनियम व फल उत्पाद आदेश, को एक प्राधिकरण, FSSAI, के अधीन समेकित किया

    FSS अधिनियम, 2006 ने खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954, फल उत्पाद आदेश, 1955 व अन्य खाद्य आदेशों का स्थान लेकर उन्हें समेकित किया, और मानक तय करने व खाद्य व्यवसायों को लाइसेंस देने हेतु FSSAI बनाया। एगमार्क कृषि उपज (श्रेणीकरण और चिह्नन) अधिनियम, 1937 पर आधारित है और BIS राष्ट्रीय मानक निकाय बना हुआ है; FPO 1955 का है और उन आदेशों में था जिनका स्थान इस अधिनियम ने लिया; FSSAI कोडेक्स को ज्यों-का-त्यों अपनाने के बजाय अपने मानक बनाता है।