खाद्य अभियांत्रिकी II: यांत्रिक संक्रियाएँ, तापीय संक्रियाएँ व आर्द्रतामिति
2. समांगीकरण, अवसादन व अपकेंद्रण
उच्च-दाब समांगीकारक एक पिस्टन-पंप है जो द्रव को एक संकरे समायोज्य अंतराल, समांगीकरण वाल्व, से धकेलता है। दाब के अचानक मुक्त होने से तीव्र विक्षुब्धता, अपरूपण व गुहिकायन (cavitation) उत्पन्न होते हैं, जो वसा-गोलिकाओं व बूँदों को तोड़ते हैं। दूध की वसा-गोलिकाएँ (औसत लगभग 3 से 4 µm) लगभग 10 से 25 MPa पर, दूध गर्म व वसा द्रव अवस्था में रहते, लगभग 1 µm या उससे छोटी हो जाती हैं; बहुत कम दाब वाला द्वितीय चरण नई गोलिकाओं के गुच्छों को तोड़ता है। समांगीकृत दूध पर मलाई नहीं उठती, वह अधिक सफ़ेद दिखता है और भरा-पूरा स्वाद देता है।
कारण है रेंगते प्रवाह (कण-रेनॉल्ड्स संख्या लगभग 1 से कम) में छोटे गोले के अंतिम वेग का स्टोक्स नियम: v = d²(ρ_p − ρ_f)g/(18μ)। ऋणात्मक मान का अर्थ है कि कण ऊपर उठता है, जैसे दूध में वसा। वेग d² के अनुसार बदलता है, अतः गोलिकाओं को 4 µm से 1 µm करने पर क्रीम-उत्प्लवन सोलह गुना धीमा हो जाता है। गुरुत्वीय अवसादन टंकियाँ द्रवों को स्वच्छ करती हैं; गर्म करने से μ घटता है और अवसादन तेज़ होता है।
अपकेंद्रक g की जगह अभिकेंद्र त्वरण ω²r लाता है: v = d²(ρ_p − ρ_f)ω²r/(18μ), और आपेक्षिक अपकेंद्री बल RCF = ω²r/g है। 5000 rpm (ω = 2π × 5000/60 = 523.6 rad/s) व r = 0.15 m पर ω²r = 41,100 m/s², लगभग 4190 g। स्थिर त्रिज्या पर वेग घूर्णन-गति के वर्ग के अनुसार बदलता है। डिस्क-स्टैक क्रीम पृथक्कारी में शंक्वाकार डिस्कें अवसादन-पथ छोटा करती हैं: सघन स्किम दूध बाहर की ओर जाकर परिधि पर निकलता है, जबकि हल्की क्रीम भीतर की ओर जाकर अक्ष के पास निकलती है।
3. निस्यंदन, मिश्रण व विलोडन
केक निस्यंदन में घोल को कपड़े या जाली से धकेला जाता है और रुके ठोस एक केक बनाते हैं जो मुख्य छानने वाली परत बन जाता है। स्थिर दाब पर समय t में एकत्र निस्यंद-आयतन V, t/V = [μαc/(2A²ΔP)]V + μR_m/(AΔP) का पालन करता है, जहाँ α विशिष्ट केक-प्रतिरोध, c प्रति इकाई निस्यंद-आयतन शुष्क केक-द्रव्यमान और R_m माध्यम-प्रतिरोध है; t/V बनाम V का आलेख सरल रेखा है जिसका ढाल α और अंतःखंड R_m देता है। R_m नगण्य हो तो t ∝ V², अतः दोगुना निस्यंद चार गुना समय लेता है। फलों के गूदे जैसे संपीड्य केक दाब बढ़ने पर अधिक प्रतिरोधी हो जाते हैं, अतः डायटमी मृदा जैसा निस्यंदन-सहायक पहले से परत के रूप में चढ़ाया या मिलाया जाता है ताकि केक सरंध्र रहे।
द्रवों का मिश्रण व विलोडन टंकी में एक इम्पेलर से होता है। प्रोपेलर (अक्षीय प्रवाह, उच्च गति) व सपाट-ब्लेड टर्बाइन (त्रिज्य प्रवाह, उच्च अपरूपण) पतले द्रवों के अनुकूल हैं; ऐंकर व हेलिकल रिबन धीरे घूमकर गाढ़े उत्पादों में दीवार तक बुहारते हैं। बैफ़ल (प्रायः चार ऊर्ध्वाधर पट्टियाँ) न हों तो पतले द्रव में केंद्रीय इम्पेलर केवल सामग्री को घुमाता है और भँवर बनाता है। शक्ति इम्पेलर रेनॉल्ड्स संख्या Re = ρND²/μ (N rev/s में, D इम्पेलर-व्यास) व शक्ति संख्या Np = P/(ρN³D⁵) से सहसंबद्ध है। स्तरीय परास (Re लगभग 10 से कम) में Np × Re स्थिर है, अतः P ∝ μN²D³; बैफ़ल-युक्त टंकी के विक्षुब्ध परास में Np स्थिर है, अतः P = Np ρN³D⁵। हल किया उदाहरण: ρ = 1000 kg/m³ वाले रस में Np = 5, D = 0.3 m व N = 2 rev/s वाला टर्बाइन 5 × 1000 × 2³ × 0.3⁵ = 97 W लेता है।
4. ब्लांचिंग, पाश्चुरीकरण व निर्जर्मीकरण
ब्लांचिंग सब्ज़ियों को हिमीकरण, शुष्कन या कैनिंग से पहले गर्म जल या भाप में थोड़े समय (प्रायः 70 से 100 °C पर कुछ मिनट) गर्म करना है। इसका मुख्य उद्देश्य उन एंज़ाइमों को निष्क्रिय करना है (पेरॉक्सिडेज़, कैटालेज़, लाइपॉक्सीजिनेज़, पॉलिफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़) जो भंडारण में अरुचिकर स्वाद, भूरापन तथा रंग व विटामिन-हानि करते; यह ऊतकों की वायु भी निकालता है और सूक्ष्मजीव-भार घटाता है। इन एंज़ाइमों में पेरॉक्सिडेज़ सर्वाधिक ताप-स्थायी में से है, अतः ऋणात्मक पेरॉक्सिडेज़ परीक्षण ही सामान्य जाँच है। जल-ब्लांचिंग भाप-ब्लांचिंग की तुलना में अधिक जल-विलेय विटामिन व ठोस बहा देती है।
पाश्चुरीकरण एक हल्का ताप-उपचार है जो कायिक रोगजनकों को मारता और विकारक जीवों को घटाता है, अतः उत्पाद को फिर भी प्रशीतन चाहिए। दूध के लिए उत्कृष्ट संयोजन 63 °C पर 30 min (बैच, निम्न ताप दीर्घ समय) व 72 °C पर 15 s (उच्च ताप अल्प समय, HTST) हैं; दोनों Coxiella burnetii को नष्ट करते हैं, जो दूध में प्रायः मिलने वाला सर्वाधिक ताप-प्रतिरोधी अबीजाणुजनक रोगजनक है। ऋणात्मक क्षारीय फ़ॉस्फ़ेटेज़ परीक्षण पर्याप्त पाश्चुरीकरण की पुष्टि करता है, क्योंकि दूध का यह प्राकृतिक एंज़ाइम उस रोगजनक से थोड़ा अधिक ताप-प्रतिरोधी है। HTST संयंत्र एक प्लेट-विनिमायक है जिसमें पुनर्जनन खंड (गर्म पाश्चुरीकृत दूध ठंडे कच्चे दूध को पूर्व-तप्त करता है), तापन व शीतलन खंड, ऐसी होल्डिंग ट्यूब जिसमें सबसे तेज़ तत्व भी पूरा धारण-समय रुके (स्तरीय प्रवाह में v_max = 2v̄), और कम गर्म दूध को लौटाने वाला प्रवाह-विचलन वाल्व होता है।
कम-अम्लीय खाद्यों (pH 4.6 से ऊपर) के व्यावसायिक निर्जर्मीकरण में Clostridium botulinum के बीजाणु नष्ट होने चाहिए; 12D संकल्पना उसके बीजाणुओं में बारह दशमलव-कमी माँगती है। घातकता F₀ मान के रूप में व्यक्त होती है, यानी z = 10 °C के साथ 121.1 °C पर तुल्य मिनट: ताप T पर घातक दर L = 10^((T − 121.1)/z), और F₀ = Σ L Δt, शीत बिंदु के ताप-इतिहास पर, जो सबसे धीमे गर्म होने वाला बिंदु है (चालन से गर्म होने वाले पैक में ज्यामितीय केंद्र, संवहन से गर्म होने वाले में ऊर्ध्व अक्ष पर नीचे)। हल किया उदाहरण: 115 °C पर 20 min से F₀ = 20 × 10^(−0.61) = 4.9 min। UHT प्रसंस्करण (लगभग 135 से 150 °C पर कुछ सेकंड, फिर पूतिरहित पैकेजिंग) में गुणवत्ता की हानि अल्प होती है, क्योंकि गुणवत्ता-कारकों के z मान बीजाणुओं से बहुत बड़े हैं, अतः ऊँचा ताप बीजाणु-मृत्यु को गुणवत्ता-क्षति से कहीं अधिक तेज़ करता है।
5. द्रव खाद्यों का वाष्पन
वाष्पन जल को उबालकर दूध, रस, टमाटर-गूदे व शर्करा-विलयनों को सांद्रित करता है। यह निर्वात में चलता है ताकि द्रव लगभग 40 से 70 °C पर उबले और रंग व सुगंध बचें। विलयन समान दाब पर शुद्ध जल से ऊँचे ताप पर उबलता है; यह क्वथनांक उन्नयन (BPE), जिसका अनुमान ड्यूहरिंग नियम से लगता है (विलयन का क्वथनांक जल के क्वथनांक में रैखिक है), उपयोगी तापांतर घटाता है। प्रचलित अभिकल्प हैं पतन-फ़िल्म (लंबी नलियों में नीचे बहती पतली फ़िल्म, अल्प निवास; दूध व रस हेतु मानक), गाढ़े या मलिनता करने वाले द्रवों के लिए बलात्-परिसंचरण, और अति गाढ़े, ताप-संवेदी सांद्रों के लिए विलोडित पतली-फ़िल्म।
स्थायी अवस्था में एकल प्रभाव के लिए: F = P + V तथा F x_F = P x_P (ठोस बंधक घटक हैं); BPE व हानियाँ नगण्य मानें तो ऊर्जा संतुलन S λ_s = V λ_v + F c_p (T₁ − T_F) है, जहाँ S भाप और T₁ क्वथन ताप है। भाप-मितव्ययिता = V/S। हल किया उदाहरण: 10% ठोस वाले 1000 kg/h रस को 40% तक सांद्रित किया जाता है: P = 1000 × 0.10/0.40 = 250 kg/h और V = 750 kg/h। भरण अपने क्वथनांक पर हो, λ_v = 2350 kJ/kg व λ_s = 2200 kJ/kg हों, तो S = 750 × 2350/2200 = 801 kg/h, मितव्ययिता 0.94।
बहु-प्रभावी वाष्पित्र में प्रत्येक प्रभाव का वाष्प अगले को गर्म करता है, जो कम दाब व ताप पर चलता है, अतः n प्रभावों में एक किलोग्राम भाप लगभग n किलोग्राम जल वाष्पित करती है (व्यवहार में कुछ कम)। भाप व संघनित्र के बीच का कुल ताप-पात प्रभावों में बँट जाता है, अतः प्रति प्रभाव समान क्षेत्रफल होने पर क्षमता लगभग एक प्रभाव के क्षेत्रफल वाले एकल प्रभाव जितनी रहती है: अतिरिक्त प्रभाव मितव्ययिता देते हैं, उत्पादन-दर नहीं। अग्र-भरण बिना पंप उच्च से निम्न दाब की ओर बहता है और सांद्र को सबसे ठंडे प्रभाव में छोड़ता है, जो ताप-संवेदी खाद्यों के अनुकूल है; पश्च-भरण को पंप चाहिए पर वह ठंडे भरण व गाढ़े सांद्र बेहतर सँभालता है। वाष्प-पुनर्संपीडन भी मितव्ययिता बढ़ाता है: तापीय (TVR, भाप-जेट इजेक्टर) या यांत्रिक (MVR, विद्युत-चालित संपीडक)।
6. गर्म-वायु, फुहार व हिम-शुष्कन
गर्म-वायु शुष्कन में वायु ऊष्मा देती और वाष्प हटाती है। स्थिर-दर अवधि में सतह मुक्त जल की तरह गीली रहती है, उत्पाद वायु के आर्द्र-बल्ब ताप पर रहता है, और दर बाहरी दशाओं (वायु का ताप, आर्द्रता व वेग) से तय होती है, R_c = h(T_a − T_w)/λ_w। क्रांतिक नमी X_c पर सतह सूखने लगती है और पतन-दर अवधि आरंभ होती है: विसरण व केशिका-प्रवाह द्वारा आंतरिक नमी-गति नियंत्रण करती है, दर घटती है और उत्पाद वायु-ताप की ओर गर्म होता है, जब ताप-क्षति व बाह्य कठोरीकरण (case hardening) होते हैं। शुष्कन वायु की आपेक्षिक आर्द्रता से तय साम्य नमी X_e पर रुक जाता है।
शुष्क-ठोस द्रव्यमान M_s, शुष्कन-क्षेत्रफल A व शुष्क-आधार नमी X के साथ स्थिर-दर समय t_c = M_s(X₀ − X_c)/(A R_c) है। यदि पतन-दर (X − X_e) के समानुपाती हो, तो पतन-दर समय t_f = [M_s(X_c − X_e)/(A R_c)] ln[(X_c − X_e)/(X − X_e)] है। हल किया उदाहरण: M_s/A = 10 kg/m² व R_c = 2 kg m⁻² h⁻¹ पर X₀ = 3.0 से X_c = 1.0 तक सुखाने में t_c = 10 × 2.0/2 = 10 h लगते हैं।
फुहार-शुष्कन द्रव को (घूर्णी डिस्क या दाब-नॉज़ल से) गर्म वायु में परमाणुकृत कर कुछ सेकंडों में चूर्ण बना देता है (दूध, कॉफ़ी, अंडा, सुगंध-पदार्थ)। वाष्पन-शीतलन हर बूँद को आर्द्र-बल्ब ताप के निकट रखता है, जो प्रवेशी वायु-ताप से बहुत नीचे है, अतः ताप-संवेदी ठोस बचे रहते हैं; साइक्लोन चूर्ण एकत्र करते हैं। हिम-शुष्कन पहले उत्पाद को जमाता है, फिर प्राथमिक शुष्कन में जल के त्रिक बिंदु (लगभग 611 Pa व 0.01 °C) से नीचे, निर्वात में, बर्फ़ को ऊर्ध्वपातन द्वारा हटाता है, जिसकी गुप्त ऊष्मा शेल्फ़ की ऊष्मा देती है; द्वितीयक शुष्कन ऊँचे शेल्फ़-ताप पर विशोषण द्वारा बद्ध जल हटाता है। सरंध्र उत्पाद जल्दी पुनर्जलित होता है और सुगंध व रंग बनाए रखता है, पर हिम-शुष्कन धीमा और सबसे महँगी विधि है।
7. हिमीकरण व क्रिस्टलन
किसी खाद्य का हिमीकरण-वक्र शीतलन, केंद्रकन से पहले हल्का अतिशीतलन, और फिर प्रारंभिक हिमांक पर गुप्त ऊष्मा हटने से लगभग समतल भाग दिखाता है; यह हिमांक 0 °C से नीचे होता है क्योंकि विलेय उसे अवनमित करते हैं। बर्फ़ बनने पर शेष विलयन सांद्र होता है और उसका हिमांक गिरता जाता है, अतः कम ताप पर भी कुछ जल अजमा रहता है। तीव्र हिमीकरण अधिकतम हिम-क्रिस्टल निर्माण क्षेत्र (लगभग −1 से −5 °C) को जल्दी पार करता है और कोशिकाओं के भीतर व बीच अनेक छोटे क्रिस्टल बनाता है; मंद हिमीकरण बड़े बाह्यकोशिकीय क्रिस्टल बनाता है जो ऊतक को क्षति पहुँचाते और पिघलाने पर रिसाव-हानि (drip loss) करते हैं।
प्लैंक समीकरण हिमीकरण-समय का अनुमान देता है: t_F = [ρλ/(T_F − T_a)](Pa/h + Ra²/k), जहाँ ρ, k व λ जमे खाद्य का घनत्व, ऊष्मा चालकता व (प्रति kg) संगलन की गुप्त ऊष्मा, T_F प्रारंभिक हिमांक, T_a माध्यम का ताप, h सतह-गुणांक और a पट्ट की पूरी मोटाई (P = 1/2, R = 1/8) या अनंत बेलन (P = 1/4, R = 1/16) या गोले (P = 1/6, R = 1/24) का व्यास है। जो पुस्तकें आधी मोटाई लेती हैं उनके P व R भिन्न हैं, अतः प्रश्न अपना रूप बताता है। प्लैंक T_F से ऊपर व नीचे हटाई गई संवेद्य ऊष्मा को छोड़ देता है, अतः समय कम आँकता है। हल किया उदाहरण: −30 °C वायु व h = 25 W m⁻² K⁻¹ में 5 cm का पट्ट (ρ = 1000 kg/m³, λ = 250 kJ/kg, k = 1.5 W m⁻¹ K⁻¹, T_F = −1.5 °C) (1000 × 250,000/28.5)(0.5 × 0.05/25 + 0.125 × 0.05²/1.5) = 10,600 s, लगभग 2.9 h, लेता है।
क्रिस्टलन किसी विलेय (सुक्रोज़, लवण, लैक्टोज़) या वसा को विलयन या गलित से पृथक करता है। इसका प्रेरक बल अतिसंतृप्ति है, यानी विलेयता-वक्र से ऊपर की सांद्रता, जो शीतलन या विलायक के वाष्पन से मिलती है। विलेयता से ठीक ऊपर के मितस्थायी क्षेत्र में उपस्थित क्रिस्टल बढ़ते हैं पर नए केंद्रक कम बनते हैं, अतः बारीक क्रिस्टलों से बीजन (seeding) उनकी संख्या व आकार नियंत्रित करता है; उससे आगे स्वतः केंद्रकन बारीक क्रिस्टलों की बौछार देता है। उदाहरण: किरकिरापन रोकने हेतु मीठे संघनित दूध में बारीक लैक्टोज़ का बीजन, और चॉकलेट का टेम्परिंग ताकि कोको-बटर चमकदार फ़ॉर्म V क्रिस्टलों में जमे।
8. आर्द्रतामिति, आर्द्रीकरण व निरार्द्रीकरण
आर्द्रतामिति नम वायु को कुल दाब P (समुद्र-तल पर 101.325 kPa) पर शुष्क वायु व जलवाष्प का मिश्रण मानती है, और प्रति kg शुष्क वायु पर गणना करती है क्योंकि प्रक्रम में वही प्रवाह स्थिर रहता है। आर्द्रता अनुपात W = 0.622 p_v/(P − p_v) kg जल प्रति kg शुष्क वायु; आपेक्षिक आर्द्रता φ = p_v/p_s, यानी शुष्क-बल्ब ताप पर संतृप्ति-दाब के अंश के रूप में वाष्प-दाब। ओसांक वह ताप है जहाँ स्थिर W पर ठंडी की गई वायु संतृप्त हो जाती है। आर्द्र-बल्ब ताप (गतिशील वायु में गीली बत्ती वाला तापमापी) वायु–जल के लिए लगभग रुद्धोष्म संतृप्ति ताप के बराबर है। प्रति kg शुष्क वायु एन्थैल्पी प्रायः h = 1.006T + W(2501 + 1.86T) kJ/kg ली जाती है, T °C में (पुस्तकें स्थिरांकों को थोड़ा भिन्न पूर्णांकित करती हैं)।
| प्रक्रम | चार्ट पर पथ | क्या बदलता है |
|---|---|---|
| संवेद्य तापन | क्षैतिज, दाईं ओर | T बढ़ता है; W व ओसांक स्थिर; φ घटती है |
| शीतलन व निरार्द्रीकरण | बाईं ओर, फिर ओसांक से नीचे जाते ही नीचे | T व W घटते हैं; कुंडली पर जल संघनित होता है |
| रुद्धोष्म (वाष्पनीय) आर्द्रीकरण | स्थिर आर्द्र-बल्ब रेखा के अनुदिश | T घटता है; W व φ बढ़ते हैं; h लगभग स्थिर |
| शोषक द्वारा निरार्द्रीकरण | कम W की ओर, लगभग स्थिर एन्थैल्पी पर | W घटता है; अधिशोषण-ऊष्मा मुक्त होने से T बढ़ता है |
हल किया उदाहरण: 30 °C व 60% RH (p_s = 4.246 kPa) वाली वायु का p_v = 2.548 kPa और W = 0.622 × 2.548/(101.325 − 2.548) = 0.0160 kg/kg शुष्क वायु है। शुष्कक हेतु समान W पर 70 °C (p_s = 31.20 kPa) तक गर्म करने पर उसकी RH घटकर 2.548/31.20 = 8.2% रह जाती है, इसीलिए गर्म वायु अच्छी तरह सुखाती है; गीले उत्पाद पर वह फिर नमी लेते हुए स्थिर आर्द्र-बल्ब रेखा के अनुदिश ठंडी होती है। आर्द्रीकरण (जल-फुहार, भाप-अंतःक्षेपण) पकाने के कक्षों व शीत-भंडारों को नम रखकर भार-हानि सीमित करता है; निरार्द्रीकरण (ओसांक से नीचे की शीतलन-कुंडलियाँ, या सिलिका जेल जैसे शोषक) शुष्कन व शुष्क भंडारों हेतु सूखी वायु देता है।
मुख्य बिंदु
- रिटिंगर (बारीक पिसाई) E ∝ 1/x₂ − 1/x₁; किक (मोटा) E ∝ ln(x₁/x₂); बॉन्ड E = 10Wᵢ(1/√x₂ − 1/√x₁), x µm में।
- स्टोक्स: v = d²Δρg/(18μ), अपकेंद्रक में g की जगह ω²r। माध्यम-प्रतिरोध नगण्य हो तो निस्यंदन में t ∝ V²। विक्षुब्ध विलोडक-शक्ति P = Np ρN³D⁵।
- ब्लांचिंग एंज़ाइम निष्क्रिय करती है (पेरॉक्सिडेज़ परीक्षण); दूध का पाश्चुरीकरण 63 °C/30 min या 72 °C/15 s पर होता है (फ़ॉस्फ़ेटेज़ परीक्षण); निर्जर्मता शीत बिंदु पर F₀ = Σ10^((T − 121.1)/10)Δt से आँकी जाती है।
- वाष्पन: F = P + V, F x_F = P x_P, S λ_s = V λ_v + F c_p(T₁ − T_F)। n प्रभाव मितव्ययिता लगभग n गुना करते हैं, क्षमता नहीं।
- शुष्कन: स्थिर दर आर्द्र-बल्ब ताप पर, बाह्य नियंत्रित; X_c से नीचे पतन-दर, आंतरिक नियंत्रित। हिम-शुष्कन 611 Pa से नीचे बर्फ़ का ऊर्ध्वपातन करता है।
- प्लैंक: t_F = [ρλ/(T_F − T_a)](Pa/h + Ra²/k), जिसमें P, R = 1/2, 1/8 (पट्ट) या 1/6, 1/24 (गोला)। W = 0.622p_v/(P − p_v); स्थिर W पर तापन RH घटाता है।
अभ्यास प्रश्न (18)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
आकार न्यूनीकरण का कौन-सा नियम मानता है कि आवश्यक ऊर्जा बने नए पृष्ठ-क्षेत्रफल के समानुपाती है?
उत्तर देखें
उत्तर: C — रिटिंगर का नियम, E = K_R(1/x₂ − 1/x₁)
प्रति इकाई द्रव्यमान नया पृष्ठ कण-आकार के व्युत्क्रमानुपाती है, अतः ऊर्जा ∝ (1/x₂ − 1/x₁): रिटिंगर का नियम (n = 2), जो बारीक पिसाई के अनुकूल है। भ्रामक विकल्प किक का नियम ऊर्जा को आकार-न्यूनीकरण अनुपात पर निर्भर करता है और मोटे कुचलने के अनुकूल है; बॉन्ड का नियम बीच का n = 1.5 वाला रूप है; स्टोक्स का नियम अवसादन-वेग देता है, पिसाई-ऊर्जा नहीं।एक मसाला-मिल 10 t/h ऐसा पदार्थ पीसती है जिसका बॉन्ड कार्य-सूचकांक 12 kWh/t है। भरण व उत्पाद के आकार (80% गुज़रने वाले) 5000 µm व 500 µm हैं। बॉन्ड के नियम E = 10Wᵢ(1/√x₂ − 1/√x₁) से, x µm में व E kWh/t में, आवश्यक शक्ति, kW में (एक दशमलव स्थान तक), ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 36.7
E = 10 × 12 × (1/√500 − 1/√5000) = 120 × (0.044721 − 0.014142) = 120 × 0.030579 = 3.6695 kWh/t। शक्ति = 3.6695 kWh/t × 10 t/h = 36.7 kW।एक खाद्य पदार्थ रिटिंगर के नियम का पालन करता है। उसे 1.0 mm से 0.5 mm तक पीसने में E₁ kWh प्रति टन लगते हैं, और उस उत्पाद को आगे 0.5 mm से 0.25 mm तक पीसने में E₂ kWh प्रति टन। अनुपात E₂/E₁ है
उत्तर देखें
उत्तर: D — 2
रिटिंगर: E ∝ (1/x₂ − 1/x₁)। E₁ ∝ 1/0.5 − 1/1.0 = 1 mm⁻¹ और E₂ ∝ 1/0.25 − 1/0.5 = 2 mm⁻¹, अतः E₂/E₁ = 2। भ्रामक उत्तर 1 किक का नियम देता है, क्योंकि दोनों चरणों का न्यूनीकरण अनुपात 2 ही है; रिटिंगर बारीक चरण के लिए अधिक ऊर्जा लेता है क्योंकि उसमें अधिक नया पृष्ठ बनता है।4 µm व्यास व 920 kg/m³ घनत्व वाली दूध की एक वसा-गोलिका 1035 kg/m³ घनत्व व 1.5 mPa·s श्यानता वाले स्किम दूध में ऊपर उठती है। g = 9.81 m/s² लेकर स्टोक्स के नियम से क्रीम-उत्प्लवन वेग, mm प्रति घंटा में (दो दशमलव स्थान तक), ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 2.41
v = d²(ρ_f − ρ_p)g/(18μ) = (4 × 10⁻⁶)² × (1035 − 920) × 9.81/(18 × 1.5 × 10⁻³) = 1.6 × 10⁻¹¹ × 115 × 9.81/0.027 = 6.685 × 10⁻⁷ m/s। 3600 s/h व 1000 mm/m से गुणा करने पर 2.41 mm/h, ऊपर की ओर, क्योंकि वसा स्किम दूध से हल्की है।एक घोल को स्थिर दाब पर ऐसे माध्यम से छाना जाता है जिसका प्रतिरोध केक के प्रतिरोध की तुलना में नगण्य है। पहला 2 m³ निस्यंद 10 min में एकत्र होता है। समान घोल व दाब पर आरंभ से 4 m³ निस्यंद एकत्र करने का कुल समय है
उत्तर देखें
उत्तर: C — 40 min
R_m नगण्य हो तो t = [μαc/(2A²ΔP)]V², अतः t ∝ V²। V दोगुना करने पर समय 4 गुना: आरंभ से 10 × (4/2)² = 40 min, जिनमें दूसरे 2 m³ के 30 min हैं। 20 min, t ∝ V मानकर बढ़ते केक को अनदेखा करता है; 28.3 min, t ∝ V^1.5 के और 80 min, t ∝ V³ के संगत हैं।एक द्रव खाद्य को बैफ़ल-युक्त टंकी में पूर्ण विक्षुब्ध परास में टर्बाइन से विलोडित किया जाता है, जहाँ शक्ति संख्या स्थिर है। ज्यामितीय रूप से समरूप एक बड़ी टंकी में उसी द्रव के लिए दोगुने व्यास का इम्पेलर आधी गति पर चलाया जाता है। इम्पेलर की शक्ति हो जाती है
उत्तर देखें
उत्तर: A — मूल का 4 गुना
Np स्थिर होने से P = Np ρN³D⁵, अतः अनुपात (1/2)³ × 2⁵ = 32/8 = 4 है। उत्तर 2 स्तरीय संबंध P ∝ μN²D³ देता, (1/2)² × 2³ = 2, पर बताई गई व्यवस्था विक्षुब्ध है; 16 शक्ति को N³ की जगह N के समानुपाती मानता है, और कोई परिवर्तन न होना यह मानता है कि दोनों बदलाव एक-दूसरे को काट देते हैं।यांत्रिक पृथक्करण व विलोडन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर देखें
उत्तर: B — समांगीकरण क्रीम-उत्प्लवन को धीमा करता है क्योंकि स्टोक्स वेग गोलिका-व्यास के वर्ग के समानुपाती है; D — डायटमी मृदा जैसा निस्यंदन-सहायक संपीड्य केक को सरंध्र बनाए रखने के लिए प्रयुक्त होता है
क्रीम-उत्प्लवन वेग ∝ d², अतः गोलिकाओं को लगभग 4 µm से 1 µm करने पर वह लगभग सोलह गुना धीमा होता है। डायटमी मृदा जैसे निस्यंदन-सहायक एक दृढ़, सरंध्र परत बनाते हैं जो संपीड्य केक को माध्यम बंद करने से रोकती है। क्रीम पृथक्कारी में हल्की क्रीम भीतर जाकर अक्ष के पास निकलती है और सघन स्किम दूध परिधि पर। बैफ़ल घूर्णन व भँवर रोकने के लिए लगाए जाते हैं, बढ़ाने के लिए नहीं।दूध के किस प्राकृतिक एंज़ाइम का ऋणात्मक परीक्षण यह पुष्टि करने में प्रयुक्त होता है कि दूध का पर्याप्त पाश्चुरीकरण हुआ है?
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उत्तर: B — क्षारीय फ़ॉस्फ़ेटेज़
क्षारीय फ़ॉस्फ़ेटेज़ दूध का प्राकृतिक एंज़ाइम है जो लक्ष्य रोगजनकों से थोड़ा अधिक ताप-प्रतिरोधी है, अतः तापन के बाद उसकी अनुपस्थिति दिखाती है कि पाश्चुरीकरण की दशाएँ पूरी हुईं। पेक्टिन मेथिलएस्टरेज़ खट्टे फलों के रस के पाश्चुरीकरण का सामान्य सूचक एंज़ाइम है, जो भ्रम पैदा करता है; पॉलिफ़ीनॉल ऑक्सिडेज़ कटे फलों को भूरा करता है, और लाइपॉक्सीजिनेज़ सब्ज़ियों की ब्लांचिंग का लक्ष्य है। इन तीनों में से कोई भी दूध का परीक्षण नहीं है।एक कैन का शीत बिंदु 111.1 °C पर 10 min रखा जाता है; तापन व शीतलन की पश्चता अनदेखी की जाती है। संदर्भ ताप 121.1 °C व z = 10 °C लेकर दिया गया F₀ मान है
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उत्तर: A — 1.0 min
L = 10^((111.1 − 121.1)/10) = 10⁻¹ = 0.1, अतः F₀ = 0.1 × 10 = 1.0 min: संदर्भ से 10 °C नीचे के 10 min, 121.1 °C पर 1 min के तुल्य हैं। 0.1 min घातक दर को ही F₀ मान लेता है, 10 min धारण को संदर्भ ताप पर हुआ मानता है, और 100 min भाग की जगह 10 से गुणा करता है, मानो कम ताप अधिक घातक हो।मटर जैसी सब्ज़ियों को हिमीकरण से पहले ब्लांच करने का मुख्य कारण है
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उत्तर: B — उन एंज़ाइमों को निष्क्रिय करना जो हिमीकृत भंडारण में अरुचिकर स्वाद व रंग-हानि करते
ब्लांचिंग मुख्यतः एंज़ाइम-निष्क्रियण का चरण है: इसके बिना पेरॉक्सिडेज़, लाइपॉक्सीजिनेज़ व ऐसे एंज़ाइम हिमीकारक में धीरे-धीरे काम करते रहते हैं और अरुचिकर स्वाद तथा रंग व विटामिन-हानि करते हैं। इसकी हल्की ऊष्मा सूक्ष्मजीव घटाती है पर व्यावसायिक निर्जर्मता से बहुत दूर है, जो भ्रामक धारणा है; यह हिमांक नहीं बढ़ाती, और ऐस्कॉर्बिक अम्ल जोड़ती नहीं, बहा देती है।एक एकल-प्रभाव वाष्पित्र 5000 kg/h रस को 12% से 60% कुल ठोस तक सांद्रित करता है। भरण 30 °C पर प्रवेश करता है और रस 55 °C पर उबलता है। भरण की विशिष्ट ऊष्मा 3.9 kJ kg⁻¹ K⁻¹, बनने वाले वाष्प की गुप्त ऊष्मा 2370 kJ/kg तथा संघनित होती तापन-भाप द्वारा दी गई गुप्त ऊष्मा 2200 kJ/kg लें। क्वथनांक उन्नयन व ऊष्मा-हानियाँ नगण्य मानें। भाप की खपत, kg/h में (निकटतम पूर्णांक तक), ____ है।
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उत्तर: 4531
ठोस संतुलन: P = 5000 × 0.12/0.60 = 1000 kg/h, अतः V = 4000 kg/h। आवश्यक ऊष्मा = Vλ_v + Fc_p(T₁ − T_F) = 4000 × 2370 + 5000 × 3.9 × (55 − 30) = 9,480,000 + 487,500 = 9,967,500 kJ/h। S = 9,967,500/2200 = 4530.7, अतः 4531 kg/h (मितव्ययिता 0.88)। भरण को क्वथनांक तक गर्म करना भूलने पर 4309 kg/h मिलता है।द्रव खाद्यों के वाष्पन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — क्वथनांक उन्नयन तापन-भाप व उबलते द्रव के बीच उपलब्ध तापांतर को घटाता है; B — अग्र-भरण में सबसे सांद्र द्रव उस प्रभाव में होता है जो सबसे कम ताप पर चलता है
विलयन समान दाब पर शुद्ध जल के संतृप्ति-ताप से ऊपर उबलता है, अतः BPE भाप-से-द्रव तापांतर को घटा देता है। अग्र-भरण में द्रव घटते दाब के साथ बहता है, अतः वह अंतिम, सबसे ठंडे प्रभाव में सबसे सांद्र होता है। समान कुल ताप-पात तीन प्रभावों में बँटने से क्षमता लगभग एक प्रभाव जितनी रहती है; तीन गुनी भाप-मितव्ययिता होती है। भाप-जेट इजेक्टर तापीय वाष्प-पुनर्संपीडन है; यांत्रिक पुनर्संपीडन विद्युत-चालित संपीडक प्रयोग करता है।शुष्कन-सतह के प्रति m² पर 8 kg शुष्क ठोस वाले एक खाद्य को ट्रे-शुष्कक में सुखाया जाता है। स्थिर शुष्कन-दर 2.0 kg जल m⁻² h⁻¹, क्रांतिक नमी 1.20 और साम्य नमी 0.05 kg जल प्रति kg शुष्क ठोस है। पतन-दर अवधि में शुष्कन-दर (X − X_e) के समानुपाती है। क्रांतिक नमी से 0.15 kg जल प्रति kg शुष्क ठोस तक सुखाने का समय, घंटों में (दो दशमलव स्थान तक), ____ है।
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उत्तर: 11.23
t_f = [M_s(X_c − X_e)/(A R_c)] ln[(X_c − X_e)/(X − X_e)] = (8 × 1.15/2.0) × ln(1.15/0.10) = 4.6 × ln 11.5 = 4.6 × 2.4423 = 11.23 h। इस भाग पर स्थिर-दर सूत्र लगाने से, 8 × (1.20 − 0.15)/2.0 = 4.2 h, समय बहुत कम आँका जाता है क्योंकि दर लगातार घटती रहती है।गीले खाद्य-पट्ट के गर्म-वायु शुष्कन की स्थिर-दर अवधि में, जब ऊष्मा केवल वायु से संवहन द्वारा मिलती है, पट्ट की सतह किसके निकट रहती है?
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उत्तर: D — वायु का आर्द्र-बल्ब ताप
स्थिर-दर अवधि में सतह मुक्त जल की तरह व्यवहार करती है: संवहन से आई सारी ऊष्मा जल वाष्पित करने में लगती है, और यही संतुलन सतह को आर्द्र-बल्ब ताप पर रखता है। सतह शुष्क-बल्ब ताप की ओर केवल पतन-दर अवधि में, सूखने के बाद, जाती है, यही भ्रामक बात है। ओसांक पर, जो और नीचे है, वाष्प वाष्पित होने की जगह संघनित होगा, और संवहनी वायु-शुष्कन सतह को कभी क्वथनांक तक नहीं ले जाता।खाद्यों के शुष्कन व हिमीकरण के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — प्राथमिक हिम-शुष्कन में बर्फ़ को जल के त्रिक बिंदु से कम जलवाष्प-दाब पर ऊर्ध्वपातन द्वारा हटाया जाता है; C — मंद हिमीकरण बड़े बाह्यकोशिकीय हिम-क्रिस्टल बनाता है और पिघलाने पर रिसाव-हानि बढ़ाता है
लगभग 611 Pa के त्रिक-बिंदु दाब से नीचे बर्फ़ पिघल नहीं सकती, अतः सीधे वाष्प में ऊर्ध्वपातित होती है। मंद हिमीकरण में जल कोशिकाओं से बाहर निकलकर कुछ बड़े बाह्यकोशिकीय क्रिस्टल बनाता है जो ऊतक को क्षति पहुँचाते हैं, अतः पिघलाने पर अधिक रिसाव होता है। फुहार-शुष्कन की बूँदें वाष्पन के दौरान आर्द्र-बल्ब ताप के निकट रहती हैं, जो प्रवेशी वायु-ताप से बहुत नीचे है। प्लैंक समीकरण केवल गुप्त ऊष्मा लेता है और संवेद्य ऊष्मा छोड़ देता है, अतः हिमीकरण-समय कम आँकता है।हरी मटर को 1.0 cm व्यास के गोले मानकर तरलित-तल हिमीकारक में −35 °C वायु व 100 W m⁻² K⁻¹ सतह ऊष्मा-स्थानांतरण गुणांक पर जमाया जाता है। जमी मटर के लिए घनत्व 1050 kg/m³, ऊष्मा चालकता 1.2 W m⁻¹ K⁻¹, संगलन की गुप्त ऊष्मा 260 kJ प्रति kg मटर तथा प्रारंभिक हिमांक −1.2 °C लें। प्लैंक समीकरण t_F = [ρλ/(T_F − T_a)](Pa/h + Ra²/k) लगाएँ, जिसमें a गोले का व्यास, P = 1/6 व R = 1/24 है। हिमीकरण-समय, मिनटों में (दो दशमलव स्थान तक), ____ है।
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उत्तर: 2.71
ρλ/(T_F − T_a) = 1050 × 260,000/(−1.2 + 35) = 2.73 × 10⁸/33.8 = 8.077 × 10⁶। Pa/h = 0.01/(6 × 100) = 1.667 × 10⁻⁵ और Ra²/k = 0.01²/(24 × 1.2) = 3.47 × 10⁻⁶, योग 2.014 × 10⁻⁵। t_F = 8.077 × 10⁶ × 2.014 × 10⁻⁵ = 162.7 s = 2.71 min। इन्हीं P व R के साथ a के रूप में त्रिज्या लेने पर 74 s मिलते हैं, जो सही समय के आधे से भी कम हैं।101.325 kPa, 30 °C व 50% आपेक्षिक आर्द्रता वाली परिवेशी वायु को शुष्कक में जाने से पहले नमी-मात्रा बदले बिना 70 °C तक गर्म किया जाता है। 30 °C पर जल का संतृप्ति वाष्प-दाब 4.246 kPa, आर्द्रता अनुपात W = 0.622p_v/(P − p_v) तथा नम वायु की एन्थैल्पी h = 1.006T + W(2501 + 1.86T) kJ प्रति kg शुष्क वायु लें, T °C में। आवश्यक ऊष्मा, kJ प्रति kg शुष्क वायु में (दो दशमलव स्थान तक), ____ है।
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उत्तर: 41.23
p_v = 0.50 × 4.246 = 2.123 kPa; W = 0.622 × 2.123/(101.325 − 2.123) = 0.01331 kg/kg शुष्क वायु, जो तापन से नहीं बदलता। Δh = (1.006 + 1.86W)(70 − 30) = (1.006 + 0.02476) × 40 = 41.23 kJ प्रति kg शुष्क वायु (पहले h = 64.21 kJ/kg और बाद में 105.44 kJ/kg)। वाष्प-पद छोड़ देने पर 40.24 kJ/kg मिलता है।वायु एक फुहार-कक्ष से गुज़रती है जिसमें पुनर्परिसंचारित जल रुद्धोष्म रूप से उसमें वाष्पित होता है, बाहर से कोई ऊष्मा न दी जाती है न ली जाती है। वायु में कौन-से परिवर्तन होते हैं?
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उत्तर: C — शुष्क-बल्ब ताप घटता है, आर्द्रता अनुपात बढ़ता है और आर्द्र-बल्ब ताप लगभग स्थिर रहता है
बाहरी ऊष्मा न होने से वाष्पन की गुप्त ऊष्मा वायु की अपनी संवेद्य ऊष्मा से आती है: वाष्प जुड़ने के साथ शुष्क-बल्ब ताप घटता है, अतः W बढ़ता है, और अवस्था लगभग स्थिर आर्द्र-बल्ब ताप व एन्थैल्पी की रेखा पर चलती है। बढ़ते W के साथ स्थिर शुष्क-बल्ब ताप के लिए ऊष्मा देनी पड़ती, जैसे भाप-आर्द्रीकरण में; घटते W व ओसांक ओसांक से नीचे की शीतलन-कुंडली का वर्णन हैं; स्थिर W पर बढ़ता ताप संवेद्य तापन है।