विकास: जीवन की उत्पत्ति व इतिहास, सिद्धांत, प्राकृतिक वरण, अनुकूलन तथा जाति-उद्भवन

यह अध्याय जीवन विज्ञान (XL) पेपर के पाँच वैकल्पिक खंडों में से एक, XL4 प्राणी विज्ञान, के खंड XL4.2 का उत्तर है: “Origin and history of life on earth, theories of evolution, natural selection, adaptation, speciation” (पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति व इतिहास, विकास के सिद्धांत, प्राकृतिक वरण, अनुकूलन, जाति-उद्भवन)। यह सिखाता है जीवन की रासायनिक उत्पत्ति व RNA विश्व, भूवैज्ञानिक अभिलेख की प्रमुख घटनाएँ और उनकी अनुमानित आयु, लैमार्क व डार्विन से आधुनिक संश्लेषण व तटस्थ सिद्धांत तक के सिद्धांत, योग्यता व वरण का गणित, क्या अनुकूलन है और क्या नहीं, तथा जनन-पृथक्करण व नई जातियाँ कैसे उत्पन्न होती हैं। संख्यात्मक प्रश्न हैं: सापेक्ष योग्यता व वरण गुणांक, वरण के अंतर्गत एलील-आवृत्ति में परिवर्तन, विषमयुग्मजी श्रेष्ठता में साम्य, और आण्विक घड़ी से विचलन-काल। सभी आयु अनुमानित हैं और “लगभग” के साथ लिखी गई हैं।

1. जीवन की उत्पत्ति

पृथ्वी लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले बनी, और जीवन के सबसे पुराने व्यापक रूप से स्वीकृत चिह्न, सूक्ष्मजीवी परतों द्वारा निर्मित स्ट्रोमैटोलाइट तथा सूक्ष्मजीवाश्म, लगभग 3.5 अरब वर्ष पुराने हैं। 1920 के दशक में ओपेरिन और हाल्डेन ने स्वतंत्र रूप से प्रस्तावित किया कि जीवन रासायनिक विकास से उत्पन्न हुआ: मुक्त ऑक्सीजन से लगभग रहित और अपचायक गैसों से भरपूर आरंभिक वायुमंडल में तड़ित व पराबैंगनी प्रकाश की ऊर्जा से सरल कार्बनिक अणु बने जो समुद्र में “पूर्वजैविक सूप” के रूप में संचित हुए। 1953 में स्टैनली मिलर ने हेरोल्ड यूरी के साथ CH₄, NH₃, H₂ व जलवाष्प को विद्युत-स्फुलिंगों के पास से प्रवाहित किया; एक सप्ताह में संघनित जल में ग्लाइसीन व ऐलानीन जैसे अमीनो अम्ल बन गए। अनेक भू-रसायनविद् अब मानते हैं कि आरंभिक वायुमंडल कम अपचायक (CO₂ व N₂) था, जिससे ध्यान जलतापीय छिद्रों व खनिज सतहों जैसे स्थलों की ओर जाता है। मर्चिसन जैसे उल्कापिंडों में मिले अमीनो अम्ल दिखाते हैं कि ऐसा संश्लेषण अंतरिक्ष में भी होता है।

एकलकों से मार्ग बहुलकों तक (वाष्पन से सांद्रित या मृत्तिका पर अधिशोषित), फिर कक्षों तक (ओपेरिन के कोएसर्वेट, फ़ॉक्स के प्रोटीनॉइड सूक्ष्मगोलक, स्वतः संगठित लिपिड पुटिकाएँ) और अंततः एक प्रतिकृतिशील तंत्र तक जाता है। RNA विश्व परिकल्पना के अनुसार RNA पहले आया क्योंकि वह सूचना संचित भी कर सकता है और अभिक्रियाएँ उत्प्रेरित भी। प्रमाण: स्व-स्प्लाइसिंग इंट्रॉन व RNase P जैसे राइबोज़ाइम उत्प्रेरक हैं; राइबोसोम में पेप्टाइड बंध rRNA बनाता है; NAD⁺, FAD व कोएंज़ाइम A जैसे सहएंज़ाइमों में न्यूक्लियोटाइड भाग होते हैं; और डीऑक्सीराइबोन्यूक्लियोटाइड आज भी राइबोन्यूक्लियोटाइडों से बनते हैं। बाद में संचय का कार्य DNA ने ले लिया क्योंकि वह रासायनिक रूप से अधिक स्थिर है, और अधिकांश उत्प्रेरण प्रोटीनों ने, क्योंकि बीस अमीनो अम्ल चार क्षारकों से अधिक रसायन प्रदान करते हैं।

⚠️ परीक्षा जाल
मिलर के प्रयोग ने अमीनो अम्ल बनाए, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल या कोशिकाएँ नहीं; और वह दिखाता है कि अपचायक वायुमंडल क्या उत्पन्न कर सकता था, यह नहीं कि आरंभिक वायुमंडल अपचायक था। पैनस्पर्मिया, अर्थात अंतरिक्ष से पृथ्वी पर जीवन का बीजारोपण, जीवन की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता; वह केवल उसे कहीं और ले जाता है।

2. जीवन का इतिहास: भूवैज्ञानिक अभिलेख

आयु रेडियोमितीय काल-निर्धारण से मिलती है: मूल समस्थानिक एक निश्चित अर्धायु से क्षयित होता है, अतः n अर्धायुओं के बाद शेष अंश (1/2)ⁿ होता है। कार्बन-14 (अर्धायु लगभग 5,730 वर्ष) लगभग 50,000 वर्ष तक पुरानी सामग्री का काल बताता है; यूरेनियम–लेड व पोटैशियम–आर्गन अरबों वर्ष पुरानी चट्टानों का।

जीवन के इतिहास के प्रमुख पड़ाव (सभी आयु अनुमानित)
लगभग कितने समय पहलेघटना
4.5 अरब वर्षपृथ्वी का निर्माण
3.5 अरब वर्षसबसे पुराने व्यापक रूप से स्वीकृत जीवाश्म: स्ट्रोमैटोलाइट व प्रोकैरियोटी सूक्ष्मजीवाश्म
2.4 अरब वर्षमहा-ऑक्सीकरण घटना: सायनोबैक्टीरिया के प्रकाश-संश्लेषण की ऑक्सीजन वायुमंडल में संचित होती है
1.8 अरब वर्षसबसे पुराने व्यापक रूप से स्वीकृत यूकैरियोटी जीवाश्म
57 करोड़ वर्षएडियाकरन जीव-समूह: बड़े, कोमल-देह बहुकोशिकीय जीव
54 करोड़ वर्षकैम्ब्रियन विस्फोट: कठोर अंगों वाले अधिकांश प्राणी-संघ भूवैज्ञानिक दृष्टि से अल्प समय में प्रकट होते हैं
37.5 करोड़ वर्षडेवोनियन पालिपक्षी मछलियों से चतुष्पादों की उत्पत्ति (Tiktaalik)
25.2 करोड़ वर्षपर्मियन-अंत विलोपन, सबसे बड़ा; पुराजीवी महाकल्प का अंत
23 से 20 करोड़ वर्षट्राइऐसिक: पहले डायनासोर और कल्प के अंत में पहले स्तनधारी
15 करोड़ वर्षजुरैसिक Archaeopteryx, पक्षी-लक्षणों वाला पंखयुक्त डायनासोर
6.6 करोड़ वर्षक्षुद्रग्रह-टक्कर के बाद क्रिटेशियस-अंत विलोपन से पक्षी-भिन्न डायनासोर लुप्त; स्तनधारियों का विकिरण
3 लाख वर्षअफ़्रीका में Homo sapiens

फ़ैनेरोज़ोइक के तीन महाकल्प हैं। पुराजीवी (Palaeozoic) (कैम्ब्रियन, ऑर्डोविशियन, सिलूरियन, डेवोनियन, कार्बोनिफ़ेरस, पर्मियन) में प्राणी-संघों, मछलियों (डेवोनियन “मछलियों का युग” है), स्थलीय पादपों, उभयचरों और पहले ऐम्नियोटों का उदय हुआ। मध्यजीवी (Mesozoic) (ट्राइऐसिक, जुरैसिक, क्रिटेशियस) सरीसृपों का युग था, जिसमें पहले स्तनधारी, पक्षी व पुष्पी पादप आए। नूतनजीवी (Cenozoic) (पैलियोजीन, नियोजीन, क्वाटर्नरी) स्तनधारियों का युग है। पाँच सामूहिक विलोपन प्रमुख हैं: ऑर्डोविशियन-अंत, उत्तर डेवोनियन, पर्मियन-अंत, ट्राइऐसिक-अंत और क्रिटेशियस-अंत। प्रत्येक ने निकेत खाली किए जिन्हें बचे हुए जीवों ने अनुकूली विकिरण से भरा।

📖 अंतःसहजीविता के चिह्न
माइटोकॉन्ड्रिया व लवकों में दो झिल्लियाँ, अपना वृत्ताकार DNA, और ऐसे राइबोसोम होते हैं जो जीवाणु-राइबोसोम जैसे हैं तथा क्लोरैम्फ़ेनिकॉल जैसे प्रतिजैविकों से अवरुद्ध होते हैं; ये विखंडन से विभाजित होते हैं और कोशिका इन्हें नए सिरे से नहीं बना सकती। इनका rRNA माइटोकॉन्ड्रिया को α-प्रोटियोबैक्टीरिया में और लवकों को सायनोबैक्टीरिया में रखता है। इनके अधिकांश मूल जीन तब से केंद्रक में स्थानांतरित हो चुके हैं।

3. विकास के सिद्धांत व आण्विक घड़ी

विकास के सिद्धांत
सिद्धांतमूल दावानिष्कर्ष
लैमार्कवाद (लैमार्क, 1809)अंग उपयोग से बढ़ते और अनुपयोग से घटते हैं, और ऐसे उपार्जित लक्षण वंशागत होते हैंअस्वीकृत: वाइसमान का जननद्रव्य सिद्धांत कायद्रव्य को जनन-वंश से अलग करता है; कई पीढ़ियों तक पूँछ काटे गए चूहों के बच्चे फिर भी पूँछ वाले हुए
डार्विनवाद (डार्विन व वॉलेस, 1858; On the Origin of Species, 1859)अति-उत्पादन, वंशागत विभिन्नता और अस्तित्व के लिए संघर्ष से अधिक उपयुक्त जीव अधिक संतति छोड़ते हैं; समस्त जीवन का वंश सामान्य हैमूल रूप से स्वीकृत; डार्विन के पास वंशागति का सही सिद्धांत नहीं था
उत्परिवर्तन सिद्धांत (दी व्रीज़, 1900 के आरंभ में)नई जातियाँ बड़े उत्परिवर्तनों से एक ही चरण में उत्पन्न होती हैं (Oenothera lamarckiana)उनके “उत्परिवर्तन” अधिकतर गुणसूत्रीय परिवर्तन थे; जाति-उद्भवन विरले ही एक छलाँग होता है
आधुनिक संश्लेषण (1930–40 के दशक: फ़िशर, हाल्डेन, राइट, डोबज़ांस्की, मेयर, सिम्पसन)विकास उत्परिवर्तन, वरण, विचलन व जीन-प्रवाह द्वारा एलील-आवृत्तियों का परिवर्तन है; मेंडेलीय आनुवंशिकी विभिन्नता देती हैवर्तमान विकासीय जीवविज्ञान का ढाँचा
तटस्थ सिद्धांत (किमुरा, 1968)अधिकांश आण्विक अंतर वरण की दृष्टि से तटस्थ हैं और विचलन से स्थिर हुए; तटस्थ प्रतिस्थापन-दर = तटस्थ उत्परिवर्तन-दरआण्विक घड़ी की व्याख्या करता है; अनुकूली लक्षणों को वरण ही गढ़ता है
विरामित साम्य (एल्ड्रेज व गूल्ड, 1972)लंबा ठहराव, जो जाति-उद्भवन पर केंद्रित तीव्र परिवर्तन से टूटता हैजातिवृत्तीय क्रमिकता के विपरीत; दोनों प्रतिरूप पाए जाते हैं

रूपांतरण सहित वंश के प्रमाण परस्पर संगत हैं: संक्रमणकालीन जीवाश्म (Tiktaalik, Archaeopteryx); समजात व अवशेषी संरचनाएँ (पंचांगुलीय पाद; मानव कॉक्सिक्स); सभी कशेरुकी भ्रूणों में ग्रसनी-चाप; निकटतम मुख्यभूमि की जातियों से मिलती-जुलती द्वीपीय जातियाँ; और आण्विक समजातता, लगभग सार्वभौमिक आनुवंशिक कूट से लेकर उन अनुक्रम-अंतरों (जैसे साइटोक्रोम c में) तक जो शारीरिकी से बने वृक्ष से मेल खाते हैं।

आण्विक घड़ी। यदि प्रत्येक वंश में प्रति स्थल प्रति वर्ष r की स्थिर दर से प्रतिस्थापन संचित हों, तो T वर्ष पहले अलग हुई दो जातियों के बीच की दूरी K = 2rT है, क्योंकि विभाजन के बाद दोनों वंश बदलते हैं; अतः T = K/(2r)। हल किया उदाहरण: K = 0.1 प्रतिस्थापन प्रति स्थल और r = 1 × 10⁻⁹ प्रति स्थल प्रति वर्ष से T = 0.1/(2 × 10⁻⁹) = 5 करोड़ (50 मिलियन) वर्ष। दरें जीनों व वंशों में भिन्न होती हैं (छोटी पीढ़ी वाली जातियों में तेज़), अतः घड़ी को दिनांकित जीवाश्मों से अंशांकित किया जाता है और जाँचा जाता है, जैसे बहिःसमूह के विरुद्ध सापेक्ष-दर परीक्षण से।

⚠️ परीक्षा जाल
लैमार्क वंशागति के बारे में गलत थे, पर्यावरण के महत्व के बारे में नहीं: वरण भी पर्यावरण के माध्यम से ही कार्य करता है, पर जीवनकाल में शरीर द्वारा उपार्जित परिवर्तन जनन-वंश में अंकित नहीं होते। “योग्यतम” का अर्थ है सबसे अधिक जीवित संतति छोड़ना, सबसे बलवान होना नहीं।

4. प्राकृतिक वरण: योग्यता व एलील-आवृत्ति परिवर्तन

प्राकृतिक वरण के लिए विभिन्नता, वंशागतता और भिन्न जनन-सफलता चाहिए। यह लक्षणप्ररूपों पर कार्य करता है पर जीनप्ररूप व एलील-आवृत्तियाँ बदलता है। किसी जीनप्ररूप की निरपेक्ष योग्यता W प्रजनन-आयु तक जीवित रहने वाली उसकी संतति की औसत संख्या है, अर्थात उत्तरजीविता व प्रजनन-क्षमता का गुणनफल। सापेक्ष योग्यता w = W/W_max सर्वोत्तम जीनप्ररूप को 1 मानती है, और वरण गुणांक s = 1 − w उसकी हानि मापता है। उदाहरण: यदि AA, Aa व aa के वयस्कता तक जीवित रहने की प्रायिकताएँ 0.8, 0.8 व 0.5 हों और वे 50, 50 व 40 अंडे दें, तो W = 40, 40 व 20, w = 1, 1 व 0.5, और aa के विरुद्ध s = 0.5।

एलील-आवृत्ति परिवर्तन। प्रत्येक हार्डी–वाइनबर्ग जीनप्ररूप-आवृत्ति को उसकी योग्यता से गुणा करें और माध्य योग्यता w̄ = p²w_AA + 2pq·w_Aa + q²w_aa से भाग दें। अप्रभावी के विरुद्ध वरण (योग्यताएँ 1, 1, 1 − s) में w̄ = 1 − sq² और q′ = (pq + q²(1 − s))/w̄, अतः Δq = −sq²(1 − q)/(1 − sq²)। हल किया उदाहरण: q = 0.4 और s = 0.5। जीनप्ररूप-आवृत्तियाँ 0.36, 0.48 व 0.16 हैं; w̄ = 1 − 0.5 × 0.16 = 0.92; q′ = (0.24 + 0.08)/0.92 = 0.348, अतः एक पीढ़ी में Δq = −0.052। q घटने पर a की अधिकांश प्रतियाँ विषमयुग्मजियों में छिप जाती हैं जहाँ वरण उन्हें देख नहीं पाता, और गिरावट धीमी हो जाती है। अप्रभावी घातक (s = 1) के लिए q_t = q₀/(1 + tq₀), अतः आवश्यक पीढ़ियाँ 1/q_t − 1/q₀ हैं: q को 0.02 से 0.01 करने में 50 पीढ़ियाँ लगती हैं।

वरण के प्रकार
प्रकारकिसे वरीयताउदाहरण
दिशात्मकएक छोर; माध्य खिसकता हैऔद्योगिक कृष्णता; कीटनाशी-प्रतिरोध
स्थायीकारीमध्यवर्ती; प्रसरण घटता हैमानव जन्म-भार, जिसमें मध्यवर्ती भार पर शिशु-उत्तरजीविता सर्वाधिक
विदारकमध्यवर्ती के ऊपर दोनों छोर; समष्टि को बाँट सकता हैब्लैक-बेलिड सीडक्रैकर फ़िंच, जिनके बड़ी व छोटी चोंच वाले पक्षी अलग-अलग प्रकार के बीज तोड़ते हैं
संतुलनकारीदो या अधिक एलील बनाए रखता हैविषमयुग्मजी श्रेष्ठता; ऋणात्मक आवृत्ति-आश्रित वरण
लैंगिकसंगम-सफलता बढ़ाने वाले लक्षणसींगों से नर-संघर्ष (अंतःलिंगी); मोर की पूँछ का मादा द्वारा चयन (अंतरलिंगी)

विषमयुग्मजी श्रेष्ठता स्थिर बहुरूपता देती है। योग्यताएँ 1 − s (AA), 1 (Aa) व 1 − t (aa) हों तो a की साम्य-आवृत्ति q̂ = s/(s + t) है, प्रारंभिक आवृत्ति चाहे जो हो। मलेरिया-ग्रस्त क्षेत्रों में HbA/HbS विषमयुग्मजी गंभीर Plasmodium falciparum मलेरिया का प्रतिरोध करते हैं, HbA/HbA लोग मलेरिया से अधिक पीड़ित होते हैं और HbS/HbS लोगों को सिकल-कोशिका अरक्तता होती है, अतः HbS उच्च आवृत्ति पर बना रहता है। मात्रात्मक लक्षणों में वरण की अनुक्रिया R = h²S है, जहाँ S वरण-अंतर और h² संकीर्ण-अर्थ वंशागतता है।

5. अनुकूलन

अनुकूलन वह वंशागत लक्षण है जो किसी पर्यावरण में योग्यता बढ़ाता है और जिसे उसकी वर्तमान भूमिका के लिए प्राकृतिक वरण ने गढ़ा है। अध्ययन किए गए उदाहरण: पेपर्ड मॉथ Biston betularia में औद्योगिक कृष्णता, जिसका गहरा (carbonaria) रूप औद्योगिक ब्रिटेन के कालिख से काले हुए वनों में उच्च आवृत्ति तक पहुँचा क्योंकि पक्षी स्पष्ट दिखने वाले हल्के पतंगे अधिक खाते थे, और स्वच्छ-वायु क़ानूनों के बाद फिर घट गया; डार्विन की भू-फ़िंचों में चोंच की गहराई, जो गैलापागोस पर सूखे के बाद बढ़ी जब मुख्यतः बड़े, कठोर बीज बचे; और मच्छरों में DDT-प्रतिरोध। प्रत्येक में वरण पहले से उपस्थित रूपों पर कार्य करता है; कारक आवश्यक उत्परिवर्तन उत्पन्न नहीं करता।

रक्षात्मक अनुकूलन। गुप्तरंजन (crypsis) प्राणी को उसकी पृष्ठभूमि में छिपाता है; चेतावनी रंजन (aposematism) स्पष्ट चेतावनी-रंगों से अरुचिकरता का विज्ञापन करता है। बेट्सी अनुहरण में एक रुचिकर जाति (होवरफ़्लाई) किसी रक्षित मॉडल (ततैया) की नकल करती है; लाभ इस पर निर्भर है कि शिकारी मॉडल से अधिक बार मिलें, अतः अनुहारक के सामान्य होते जाने पर लाभ घटता है, जो ऋणात्मक आवृत्ति-आश्रितता का उदाहरण है। म्यूलरी अनुहरण में दो या अधिक रक्षित जातियाँ (अनेक Heliconius तितलियाँ) एक ही चेतावनी-प्रतिरूप साझा करती हैं और इस प्रकार शिकारियों को सिखाने की लागत बाँट लेती हैं।

हर लक्षण अनुकूलन नहीं होता। कोई लक्षण किसी अन्य विशेषता का उप-उत्पाद हो सकता है, विचलन से स्थिर हुआ हो सकता है, या ऐतिहासिक बाध्यता दर्शा सकता है: कशेरुकी रेटिना में तंत्रिका-तंतु प्रकाशग्राहियों के आगे होते हैं, जिससे अंध-बिंदु बनता है। एक्सेप्टेशन वह लक्षण है जो एक भूमिका के लिए विकसित हुआ और बाद में दूसरी के लिए अपना लिया गया; पंख, जो उड़ान से पहले ऊष्मारोधन या प्रदर्शन के लिए उत्पन्न हुए, इसका मानक उदाहरण हैं। असंबंधित वंशों में एक ही समाधान का अभिसारी विकास (शार्क, इक्थियोसॉर व डॉल्फ़िन का धारारेखित आकार) प्रबल प्रमाण है कि लक्षण अनुकूली है। अनुकूली विकिरण एक वंश का अनेक निकेतों में तीव्र विविधीकरण है: डार्विन की फ़िंचें, हवाई की हनीक्रीपर पक्षी और अफ़्रीकी महान झीलों की सिक्लिड मछलियाँ।

6. जाति-उद्भवन

जैविक जाति-अवधारणा में जाति परस्पर प्रजनन करने वाली प्राकृतिक समष्टियों का वह समूह है जो ऐसे अन्य समूहों से जननिक रूप से पृथक है, अतः जाति-उद्भवन जनन-पृथक्करण का विकास है। अवरोध युग्मनज बनने से पहले या बाद में कार्य करते हैं।

जनन-पृथक्करण के अवरोध
अवरोधचरणउदाहरण
आवासयुग्मनज-पूर्वएक क्षेत्र की समष्टियाँ भिन्न आवास प्रयुक्त करती हैं और विरले मिलती हैं
कालिकयुग्मनज-पूर्वसंबंधित जातियाँ भिन्न ऋतुओं या दिन के भिन्न समय प्रजनन करती हैं
व्यवहारगतयुग्मनज-पूर्वजाति-विशिष्ट प्रणय-गीत, प्रदर्शन या जुगनू के चमक-प्रतिरूप
यांत्रिकयुग्मनज-पूर्वअनेक कीटों में असंगत जननांग
युग्मकीयुग्मनज-पूर्वसमुद्री अर्चिन के शुक्राणु का बाइंडिन केवल अपनी जाति के अंडों से जुड़ता है
संकर अजीव्यतायुग्मनज-पश्चसंकर भ्रूण परिवर्धन के दौरान मर जाते हैं
संकर बंध्यतायुग्मनज-पश्चखच्चर (घोड़ा 2n = 64, गधा 2n = 62, खच्चर 2n = 63) सामान्य अर्धसूत्रण पूरा नहीं कर पाता
संकर विघटनयुग्मनज-पश्चF1 संकर उर्वर हैं पर F2 या प्रतीप-संकरण की संतति दुर्बल या बंध्य होती है

विस्थानिक (allopatric) जाति-उद्भवन भौगोलिक अवरोध से आरंभ होता है। विभाजन (vicariance) में अवरोध एक विस्तृत समष्टि को बाँट देता है, जैसे लगभग 30 लाख वर्ष पहले बंद हुए पनामा स्थलडमरूमध्य ने समुद्री प्राणियों को प्रशांत व कैरिबियाई सहोदर जातियों में बाँट दिया। परिधीय-स्थानिक (peripatric) जाति-उद्भवन में परास के किनारे की एक छोटी संस्थापक समष्टि विचलन व नए वरण से शीघ्र अलग हो जाती है, जैसे द्वीपों पर। परास्थानिक (parapatric) जाति-उद्भवन में पर्यावरणीय प्रवणता पर सटी समष्टियाँ संकर-क्षेत्र के आर-पार कुछ जीन-प्रवाह के बावजूद अलग हो जाती हैं। समस्थानिक (sympatric) जाति-उद्भवन में भौगोलिक पृथक्करण आवश्यक नहीं: बहुगुणिता से (पादपों में सामान्य, प्राणियों में विरल), नए परपोषी पर स्थानांतरण से, जैसे Rhagoletis pomonella मक्खी की सेब व हॉथॉर्न प्रजातियाँ जो अपने-अपने परपोषी फल पर संगम करती हैं, या साथी-चयन से, जैसे सिक्लिडों में। जहाँ अपूर्ण पृथक समष्टियाँ मिलती हैं और संकर अयोग्य होते हैं, वहाँ वरण युग्मनज-पूर्व पृथक्करण को सुदृढ़ करता है: प्रबलन (reinforcement)।

⚠️ हाल्डेन का नियम
जब F1 संकरों में एक लिंग अनुपस्थित, विरल या बंध्य हो, तो वह विषमयुग्मकी लिंग होता है। स्तनधारियों व Drosophila (XY) में यह नर है, पर पक्षियों व तितलियों (ZW) में मादा, अतः “संकर नर बंध्य होते हैं” केवल नर-विषमयुग्मकी समूहों के लिए सही है।

मुख्य बिंदु

  • जीवन रासायनिक विकास से कम-से-कम लगभग 3.5 अरब वर्ष पहले उत्पन्न हुआ; मिलर–यूरी ने अपचायक परिस्थितियों में अमीनो अम्ल बनाए, और राइबोज़ाइम तथा rRNA द्वारा पेप्टाइड बंध का उत्प्रेरण RNA विश्व का समर्थन करते हैं।
  • अनुमानित आयु: पृथ्वी 4.5 अरब वर्ष, पहले जीवाश्म 3.5 अरब, महा-ऑक्सीकरण 2.4 अरब, यूकैरियोट 1.8 अरब, कैम्ब्रियन विस्फोट 54 करोड़, पर्मियन-अंत 25.2 करोड़ और क्रिटेशियस-अंत 6.6 करोड़ वर्ष पहले।
  • उपार्जित लक्षणों की वंशागति विफल रही; आधुनिक संश्लेषण में मेंडेलीय आनुवंशिकी से जुड़ा प्राकृतिक वरण टिका है। तटस्थ सिद्धांत प्रतिस्थापन-दर को तटस्थ उत्परिवर्तन-दर के बराबर बताता है, जो आण्विक घड़ी T = K/(2r) का आधार है।
  • w = W/W_max और s = 1 − w; वरण के बाद q′, a का योग्यता-भारित अंश w̄ से भाग देकर है। विरल अप्रभावी के विरुद्ध वरण धीमा है, और विषमयुग्मजी श्रेष्ठता q̂ = s/(s + t) बनाए रखती है।
  • अनुकूलन चयनित वंशागत लक्षण हैं, आवश्यकता की प्रतिक्रिया नहीं; एक्सेप्टेशन, उप-उत्पादों व बाध्यताओं को अलग पहचानें। बेट्सी अनुहरण आवृत्ति-आश्रित है; म्यूलरी अनुहरण रक्षित जातियों में लागत बाँटता है।
  • जाति-उद्भवन युग्मनज-पूर्व व युग्मनज-पश्च अवरोधों द्वारा जनन-पृथक्करण का विकास है, विस्थानिक, परिधीय-स्थानिक, परास्थानिक या समस्थानिक परिस्थितियों में; प्रबलन व हाल्डेन का नियम परीक्षा के क्लासिक बिंदु हैं।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. मिलर व यूरी के 1953 के प्रयोग में CH₄, NH₃, H₂ व जलवाष्प के मिश्रण में विद्युत-स्फुलिंग प्रवाहित किए गए। प्रयोग से क्या उत्पन्न हुआ?

    1. बंद उपकरण में सरल गैसों से बने ग्लाइसीन व ऐलानीन जैसे अमीनो अम्ल
    2. संघनित जल में अपनी प्रतिलिपि बनाने वाले छोटे स्व-प्रतिकृतिशील RNA अणु
    3. एंज़ाइमों द्वारा सरल उपापचय करने वाली झिल्ली-बद्ध कोएसर्वेट बूँदें
    4. विलयन में पेप्टाइड बंधों से जुड़ी लगभग सौ अवशेषों वाली पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएँ
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — बंद उपकरण में सरल गैसों से बने ग्लाइसीन व ऐलानीन जैसे अमीनो अम्ल

    स्फुलिंग-विसर्जन उपकरण ने सरल कार्बनिक एकलक, विशेषतः ग्लाइसीन व ऐलानीन जैसे अमीनो अम्ल दिए, जिससे पता चला कि अपचायक परिस्थितियों में ऐसे अणु अजैविक रूप से बनते हैं। इससे स्व-प्रतिकृतिशील RNA, आद्यकोशिकाएँ या लंबे पॉलिपेप्टाइड नहीं बने; बहुलकीकरण व कक्ष बाद के चरण हैं जिनका अध्ययन कोएसर्वेट व प्रोटीनॉइड सूक्ष्मगोलकों जैसे अन्य प्रयोगों में हुआ।
  2. कौन-सा प्रेक्षण इस परिकल्पना का सबसे प्रबल समर्थन करता है कि आरंभिक जीवन में RNA, DNA व प्रोटीन दोनों से पहले आया?

    1. DNA, RNA से अधिक स्थिर है क्योंकि उसकी शर्करा में 2′-हाइड्रॉक्सिल समूह नहीं होता
    2. राइबोसोम की पेप्टिडिल ट्रांसफ़रेज़ सक्रियता उसके rRNA में निहित है
    3. अपचायक गैस-मिश्रण में स्फुलिंग प्रवाहित करने पर अमीनो अम्ल सहज ही बनते हैं
    4. माइटोकॉन्ड्रिया में वृत्ताकार DNA होता है और वे विखंडन-जैसी प्रक्रिया से विभाजित होते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — राइबोसोम की पेप्टिडिल ट्रांसफ़रेज़ सक्रियता उसके rRNA में निहित है

    RNA विश्व को ऐसा अणु चाहिए जो सूचना भी वहन करे और उत्प्रेरण भी करे; राइबोसोम का पेप्टाइड-बंध बनाने वाला केंद्र RNA होना उस अवस्था का आण्विक जीवाश्म है। DNA की अधिक स्थिरता यह समझाती है कि बाद में संचय DNA ने क्यों सँभाला, जो भ्रामक उत्तर है, पर इससे RNA के पहले आने के बारे में कुछ पता नहीं चलता। स्फुलिंग-संश्लेषण एकलकों से संबंधित है, और माइटोकॉन्ड्रियल DNA अंतःसहजीविता का प्रमाण है।
  3. निम्नलिखित में से कौन-से प्रेक्षण माइटोकॉन्ड्रिया की अंतःसहजीवी उत्पत्ति का समर्थन करते हैं?

    1. माइटोकॉन्ड्रिया में उनका अपना वृत्ताकार DNA अणु होता है
    2. माइटोकॉन्ड्रियल राइबोसोम जीवाणु-राइबोसोम जैसे हैं और क्लोरैम्फ़ेनिकॉल से अवरुद्ध होते हैं
    3. माइटोकॉन्ड्रियल rRNA अनुक्रम α-प्रोटियोबैक्टीरिया के अनुक्रमों से सर्वाधिक मिलते हैं
    4. माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम अंगक के लिए आवश्यक हर प्रोटीन को कूटित करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — माइटोकॉन्ड्रिया में उनका अपना वृत्ताकार DNA अणु होता है; B — माइटोकॉन्ड्रियल राइबोसोम जीवाणु-राइबोसोम जैसे हैं और क्लोरैम्फ़ेनिकॉल से अवरुद्ध होते हैं; C — माइटोकॉन्ड्रियल rRNA अनुक्रम α-प्रोटियोबैक्टीरिया के अनुक्रमों से सर्वाधिक मिलते हैं

    वृत्ताकार जीनोम, क्लोरैम्फ़ेनिकॉल-संवेदी जीवाणु-जैसे राइबोसोम और α-प्रोटियोबैक्टीरिया से rRNA-समानता, सभी जीवाणु-पूर्वज की ओर संकेत करते हैं। यह दावा कि अंगक अपने सभी प्रोटीन स्वयं कूटित करता है, असत्य है: अधिकांश माइटोकॉन्ड्रियल प्रोटीन केंद्रक में कूटित होकर आयात किए जाते हैं, क्योंकि अंतःसहजीवी के अधिकांश जीन केंद्रकीय जीनोम में चले गए।
  4. कौन-सा क्रम इन घटनाओं को सबसे पुरानी से सबसे हाल की ओर सूचीबद्ध करता है?

    1. सबसे पुराने यूकैरियोटी जीवाश्म → महा-ऑक्सीकरण घटना → पर्मियन-अंत विलोपन → कैम्ब्रियन विस्फोट
    2. महा-ऑक्सीकरण घटना → कैम्ब्रियन विस्फोट → सबसे पुराने यूकैरियोटी जीवाश्म → पर्मियन-अंत विलोपन
    3. महा-ऑक्सीकरण घटना → सबसे पुराने यूकैरियोटी जीवाश्म → कैम्ब्रियन विस्फोट → पर्मियन-अंत विलोपन
    4. सबसे पुराने यूकैरियोटी जीवाश्म → कैम्ब्रियन विस्फोट → महा-ऑक्सीकरण घटना → पर्मियन-अंत विलोपन
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — महा-ऑक्सीकरण घटना → सबसे पुराने यूकैरियोटी जीवाश्म → कैम्ब्रियन विस्फोट → पर्मियन-अंत विलोपन

    महा-ऑक्सीकरण घटना लगभग 2.4 अरब वर्ष पहले हुई, सबसे पुराने व्यापक रूप से स्वीकृत यूकैरियोटी जीवाश्म लगभग 1.8 अरब वर्ष पुराने हैं, कैम्ब्रियन विस्फोट लगभग 54 करोड़ वर्ष पहले और पर्मियन-अंत विलोपन लगभग 25.2 करोड़ वर्ष पहले हुआ। यूकैरियोटों को वायुमंडल के ऑक्सीकरण से पहले रखना सबसे प्रचलित भूल है।
  5. कौन-सा सामूहिक विलोपन पुराजीवी व मध्यजीवी महाकल्पों की सीमा अंकित करता है?

    1. क्रिटेशियस-अंत विलोपन
    2. पर्मियन-अंत विलोपन
    3. ऑर्डोविशियन-अंत विलोपन
    4. उत्तर डेवोनियन विलोपन
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — पर्मियन-अंत विलोपन

    पर्मियन-अंत विलोपन, लगभग 25.2 करोड़ वर्ष पहले और पाँचों में सबसे बड़ा, पुराजीवी महाकल्प को समाप्त कर मध्यजीवी को आरंभ करता है। क्रिटेशियस-अंत विलोपन, लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले, भ्रामक उत्तर है पर वह मध्यजीवी–नूतनजीवी सीमा अंकित करता है। ऑर्डोविशियन-अंत व उत्तर डेवोनियन घटनाएँ पुराजीवी के भीतर आती हैं।
  6. एक मछली-जाति की गुफ़ावासी समष्टियों में आँखें छोटी व अकार्यशील हैं। कौन-सी व्याख्या डार्विनी या तटस्थ नहीं, बल्कि लैमार्की है?

    1. जिन मछलियों ने महँगे नेत्र-ऊतक पर कम ऊर्जा लगाई उन्होंने अधिक संतति छोड़ी, अतः आँख घटाने वाले एलील फैले
    2. दृष्टि बनाए रखने वाले वरण के अभाव में नेत्र-जीनों को बाधित करने वाले उत्परिवर्तन आनुवंशिक विचलन से संचित हुए
    3. आँख घटाने वाले एलील गुफ़ाओं में लाभकारी एलीलों से सहलग्न हैं और उनके साथ आवृत्ति में बढ़े
    4. अंधेरे में अनुपयोग से हर पीढ़ी में आँखें छोटी होती गईं, और छोटी आँखें वंशागत हुईं
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — अंधेरे में अनुपयोग से हर पीढ़ी में आँखें छोटी होती गईं, और छोटी आँखें वंशागत हुईं

    जीवनकाल में अनुपयोग से उपार्जित परिवर्तन की वंशागति लैमार्क की क्रियाविधि है। ऊर्जा-बचत वाली व्याख्या वंशागत विभिन्नता पर डार्विनी वरण है, विचलन वाली व्याख्या शिथिल वरण में तटस्थ विकास है, और सहलग्नता वाली व्याख्या साथ-चढ़ाव (hitchhiking) द्वारा अप्रत्यक्ष वरण है; तीनों में एलील-आवृत्तियाँ बदलती हैं, उपार्जित लक्षण वंशागत नहीं होते।
  7. स्थिर आकार N वाली एक द्विगुणित समष्टि में तटस्थ उत्परिवर्तन प्रति जीन-प्रति प्रति पीढ़ी μ की दर से उत्पन्न होते हैं। तटस्थ सिद्धांत के अनुसार समष्टि में प्रति पीढ़ी तटस्थ प्रतिस्थापनों के स्थिर होने की दर क्या है?

    1. μ, समष्टि-आकार से स्वतंत्र
    2. 2Nμ, समष्टि-आकार के समानुपाती
    3. μ/2N, समष्टि-आकार के व्युत्क्रमानुपाती
    4. 4Nμ, समष्टि की मापित उत्परिवर्तन-दर
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — μ, समष्टि-आकार से स्वतंत्र

    हर पीढ़ी 2N जीन-प्रतियों में 2Nμ नए तटस्थ उत्परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, और प्रत्येक के विचलन द्वारा स्थिर होने की प्रायिकता 1/(2N) है, अतः प्रतिस्थापन-दर 2Nμ × 1/(2N) = μ है। समष्टि-आकार कट जाता है, इसीलिए तटस्थ आण्विक परिवर्तन घड़ी की तरह चल सकता है। 2Nμ भ्रामक है क्योंकि वह प्रति पीढ़ी नए उत्परिवर्तनों की संख्या है, स्थिर होने वालों की नहीं; 4Nμ वह प्राचल θ है जो तटस्थ विषमयुग्मजता निर्धारित करता है।
  8. निम्नलिखित में से कौन-से प्रेक्षण आण्विक विकास के तटस्थ सिद्धांत से संगत हैं?

    1. प्रोटीन-कूटक जीनों के पर्यायवाची स्थल अपर्यायवाची स्थलों से तेज़ी से प्रतिस्थापन संचित करते हैं
    2. कार्यशील उत्पाद कूटित न करने वाले कूटजीन जीनोम में सर्वाधिक दरों में से कुछ पर विकसित होते हैं
    3. हिस्टोन H4, जिसका कार्य लगभग कोई परिवर्तन सहन नहीं करता, बहुत धीरे विकसित होता है
    4. बड़ी समष्टियों वाली जातियाँ प्रति पीढ़ी तटस्थ प्रतिस्थापन तेज़ी से संचित करती हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — प्रोटीन-कूटक जीनों के पर्यायवाची स्थल अपर्यायवाची स्थलों से तेज़ी से प्रतिस्थापन संचित करते हैं; B — कार्यशील उत्पाद कूटित न करने वाले कूटजीन जीनोम में सर्वाधिक दरों में से कुछ पर विकसित होते हैं; C — हिस्टोन H4, जिसका कार्य लगभग कोई परिवर्तन सहन नहीं करता, बहुत धीरे विकसित होता है

    तटस्थ सिद्धांत के अनुसार कोई स्थल जितना कम बाध्य हो, उसके उतने अधिक उत्परिवर्तन तटस्थ होते हैं और वह उतना तेज़ विकसित होता है: इसीलिए पर्यायवाची स्थल व कूटजीन तेज़ हैं और अत्यधिक बाध्य हिस्टोन H4 धीमा। तटस्थ प्रतिस्थापन-दर तटस्थ उत्परिवर्तन-दर के बराबर है और समष्टि-आकार पर निर्भर नहीं, अतः बड़ी समष्टियों में तेज़ तटस्थ प्रतिस्थापन का दावा सिद्धांत के विपरीत है।
  9. हार्डी–वाइनबर्ग अनुपातों पर यादृच्छिक संगम करने वाली समष्टि में अप्रभावी एलील a की आवृत्ति 0.3 है। AA, Aa व aa की सापेक्ष योग्यताएँ 1, 1 व 0.6 हैं। वरण की एक पीढ़ी के बाद a की आवृत्ति ____ है (तीन दशमलव स्थानों तक)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 0.274

    p = 0.7 और q = 0.3, अतः जीनप्ररूप-आवृत्तियाँ AA 0.49, Aa 0.42 व aa 0.09 हैं। माध्य योग्यता w̄ = 0.49 + 0.42 + 0.09 × 0.6 = 0.964। वरण के बाद q′ = (½ × 0.42 + 0.09 × 0.6)/0.964 = (0.21 + 0.054)/0.964 = 0.264/0.964 = 0.274। w̄ से भाग देना भूलने पर 0.264 मिलता है।
  10. एक कीट-समष्टि में जीनप्ररूप AA, Aa व aa के वयस्कता तक जीवित रहने की प्रायिकताएँ 0.9, 0.9 व 0.6 हैं, और जीवित मादाएँ औसतन क्रमशः 40, 40 व 35 अंडे देती हैं। निरपेक्ष योग्यता को उत्तरजीविता × प्रजनन-क्षमता मानते हुए aa के विरुद्ध वरण गुणांक ____ है (दो दशमलव स्थानों तक)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 0.42

    निरपेक्ष योग्यता: AA = 0.9 × 40 = 36, Aa = 36, aa = 0.6 × 35 = 21। aa की सापेक्ष योग्यता = 21/36 = 0.583, अतः s = 1 − 0.583 = 0.417, यानी दो दशमलव स्थानों तक 0.42। केवल उत्तरजीविता लेने पर s = 1 − 0.6/0.9 = 0.33 मिलता है, जो योग्यता के प्रजनन-क्षमता घटक की उपेक्षा करता है।
  11. विषमयुग्मजी श्रेष्ठता दर्शाने वाले एक लोकस पर AA, Aa व aa की सापेक्ष योग्यताएँ 0.8, 1.0 व 0.5 हैं। वरण द्वारा बनाए रखी गई एलील a की साम्य-आवृत्ति ____ है (दो दशमलव स्थानों तक)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 0.29

    योग्यताएँ 1 − s (AA), 1 (Aa) व 1 − t (aa) हों तो स्थिर साम्य q̂ = s/(s + t) है, जहाँ q, a की आवृत्ति है। यहाँ s = 0.2 और t = 0.5, अतः q̂ = 0.2/0.7 = 0.286, यानी 0.29। t/(s + t) = 0.71 लिखने पर A की आवृत्ति मिलती है, जो प्रचलित भ्रम है: जिस एलील का समयुग्मजी कम योग्य है, वही अंत में विरल रहता है।
  12. एक जीन दो स्तनधारी जातियों के बीच K = 0.08 प्रतिस्थापन प्रति स्थल से भिन्न है। प्रत्येक वंश में प्रति स्थल प्रति वर्ष r = 2 × 10⁻⁹ प्रतिस्थापन की स्थिर दर मानें, जिससे विचलन-काल T = K/(2r) है। दोनों जातियाँ ____ मिलियन वर्ष पहले अलग हुईं।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 20

    विभाजन के बाद दोनों वंश प्रतिस्थापन संचित करते हैं, अतः K = 2rT और T = K/(2r) = 0.08/(2 × 2 × 10⁻⁹) = 0.08/(4 × 10⁻⁹) = 2 × 10⁷ वर्ष = 20 मिलियन वर्ष। केवल r से भाग देने पर, मानो एक ही वंश बदला हो, 40 मिलियन वर्ष मिलता है।
  13. बीज खाने वाले पक्षियों की एक समष्टि में उपलब्ध बीज या तो बहुत छोटे हैं या बहुत बड़े व कठोर, और मध्यवर्ती चोंच वाले पक्षी दोनों पर ठीक से भोजन नहीं कर पाते। कई पीढ़ियों में चोंच का आकार द्विबहुलकी (bimodal) हो जाता है। कौन-सा वरण कार्य कर रहा है?

    1. स्थायीकारी वरण, जो मध्यवर्ती को वरीयता देता और प्रसरण घटाता है
    2. दिशात्मक वरण, जो माध्य को एक छोर की ओर खिसकाता है
    3. विदारक वरण, जो मध्यवर्ती के ऊपर दोनों छोरों को वरीयता देता है
    4. लैंगिक वरण, जो संगम-सफलता बढ़ाने वाले लक्षणों को वरीयता देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — विदारक वरण, जो मध्यवर्ती के ऊपर दोनों छोरों को वरीयता देता है

    जब दोनों छोरों की योग्यता मध्यवर्ती से अधिक हो, तो वरण विदारक होता है और वितरण द्विबहुलकी बन जाता है। स्थायीकारी वरण भ्रामक विपरीत है: वह छोरों के विरुद्ध कार्य करता है। दिशात्मक वरण पूरे वितरण को एक ओर खिसकाता, और परिदृश्य में साथी-चयन का कोई प्रसंग नहीं है।
  14. एक हानिरहित, रुचिकर होवरफ़्लाई पर डंक मारने वाली ततैया जैसी पीली-काली धारियाँ हैं। क्षेत्र-अध्ययन दिखाते हैं कि जहाँ होवरफ़्लाई ततैया से बहुत अधिक सामान्य है वहाँ उसे पक्षियों से कम सुरक्षा मिलती है। यह किस परिघटना का उदाहरण है?

    1. म्यूलरी अनुहरण, जिसमें दो रक्षित जातियाँ शिकारियों को सिखाने की लागत बाँटती हैं
    2. होवरफ़्लाई का चेतावनी रंजन, जिसके रंग उसकी अपनी अरुचिकरता का सच्चा विज्ञापन हैं
    3. गुप्तरंजन, जिसमें धारियाँ फूलों व पत्तियों की पृष्ठभूमि में मक्खी की रूपरेखा तोड़ देती हैं
    4. बेट्सी अनुहरण, जिसका लाभ अनुहारक के मॉडल की तुलना में सामान्य होते जाने पर घटता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — बेट्सी अनुहरण, जिसका लाभ अनुहारक के मॉडल की तुलना में सामान्य होते जाने पर घटता है

    रक्षित मॉडल की नकल करने वाला रुचिकर जीव बेट्सी अनुहारक है। शिकारी मॉडल से अप्रिय भेंटों से प्रतिरूप से बचना सीखते हैं; जहाँ अनुहारक सामान्य हैं वहाँ पक्षी उनसे अधिक मिलते हैं और कम परहेज़ सीखते हैं, अतः सुरक्षा घटती है (ऋणात्मक आवृत्ति-आश्रितता)। म्यूलरी अनुहरण भ्रामक विकल्प है, पर उसमें दोनों जातियों का रक्षित होना आवश्यक है। होवरफ़्लाई हानिरहित है, अतः उसके रंग सच्ची चेतावनी नहीं, और ध्यान खींचने वाली धारियाँ गुप्तरंजन नहीं हैं।
  15. अनुकूलन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. पंख, जो उड़ान से पहले उत्पन्न हुए और बाद में उसके लिए प्रयुक्त हुए, एक्सेप्टेशन का उदाहरण हैं
    2. पेपर्ड मॉथ का गहरा रूप कालिख से काले वनों में बढ़ा और वायु-प्रदूषण घटने के बाद कम हुआ
    3. समष्टि में सामान्य कोई भी लक्षण अवश्य ही प्राकृतिक वरण द्वारा वरीय रहा होगा
    4. कीटनाशी-प्रतिरोध इसलिए प्रकट होता है कि कीटनाशी के संपर्क से रक्षात्मक उत्परिवर्तन प्रेरित होते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पंख, जो उड़ान से पहले उत्पन्न हुए और बाद में उसके लिए प्रयुक्त हुए, एक्सेप्टेशन का उदाहरण हैं; B — पेपर्ड मॉथ का गहरा रूप कालिख से काले वनों में बढ़ा और वायु-प्रदूषण घटने के बाद कम हुआ

    पंख एक्सेप्टेशन का क्लासिक उदाहरण हैं, और कृष्ण Biston betularia का उत्थान-पतन पक्षी-परभक्षण के माध्यम से प्रदूषण के साथ चला। सामान्य लक्षण उप-उत्पाद, विचलन का परिणाम या ऐतिहासिक बाध्यता हो सकता है, अतः केवल सामान्य होना अनुकूलन सिद्ध नहीं करता। प्रतिरोधी एलील संपर्क से पहले ही उपस्थित होते हैं; कीटनाशी उन्हें चुनता है, बनाता नहीं।
  16. दो निकट संबंधी पक्षी-जातियों के संकरणों में एक लिंग के F1 संकर बंध्य हैं जबकि दूसरे लिंग के उर्वर। हाल्डेन के नियम के अनुसार किस लिंग के बंध्य होने की अपेक्षा है?

    1. मादाएँ, क्योंकि पक्षियों में मादा विषमयुग्मकी लिंग (ZW) है
    2. नर, क्योंकि हर प्राणी-समूह में संकर नर ही बंध्य लिंग होते हैं
    3. नर, क्योंकि पक्षियों में नर दो भिन्न लिंग-गुणसूत्र धारण करता है
    4. दोनों में से कोई भी समान संभावना से, क्योंकि पक्षियों में लिंग-गुणसूत्र नहीं होते
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — मादाएँ, क्योंकि पक्षियों में मादा विषमयुग्मकी लिंग (ZW) है

    हाल्डेन का नियम विषमयुग्मकी लिंग को, जो पक्षियों में ZW मादा है, संकरों में अनुपस्थित, विरल या बंध्य बताता है। “संकर नर बंध्य होते हैं” स्तनधारियों व Drosophila से किया गया भ्रामक अति-सामान्यीकरण है, जहाँ नर XY हैं। पक्षी नर ZZ (समयुग्मकी) हैं, और पक्षियों में लिंग-गुणसूत्र होते हैं।
  17. एक फल-मक्खी की दो समष्टियाँ एक ही बगीचों में रहती हैं। एक सेब पर अंडे देती है और दूसरी हॉथॉर्न के फलों पर; मक्खियाँ उसी प्रकार के फल पर संगम करती हैं जिस पर उनका परिवर्धन हुआ, और सेब हॉथॉर्न के फलों से कई सप्ताह पहले पकते हैं। प्रयोगशाला में संकर जीवनक्षम व उर्वर हैं। कौन-सी व्याख्या सर्वाधिक उपयुक्त है?

    1. विस्थानिक जाति-उद्भवन, क्योंकि दोनों परपोषी आवास के अलग द्वीप बनाते हैं जो भौगोलिक अवरोध का कार्य करते हैं
    2. परपोषी-परिवर्तन से प्रेरित समस्थानिक विचलन, जिसमें आवास व कालिक पृथक्करण संगम से पहले कार्य करते हैं
    3. युग्मनज-पश्च पृथक्करण से पूर्ण हुआ जाति-उद्भवन, क्योंकि बगीचों में बनने पर संकर बंध्य होते
    4. परास्थानिक जाति-उद्भवन, क्योंकि समष्टियाँ एक पर्यावरणीय प्रवणता पर सटे क्षेत्रों में रहती हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — परपोषी-परिवर्तन से प्रेरित समस्थानिक विचलन, जिसमें आवास व कालिक पृथक्करण संगम से पहले कार्य करते हैं

    समष्टियाँ एक ही भौगोलिक क्षेत्र साझा करती हैं, और विचलन नए परपोषी पर स्थानांतरण के बाद होता है। जन्म-परपोषी पर संगम (आवास पृथक्करण) और सेबों का पहले पकना (कालिक पृथक्करण) युग्मनज-पूर्व अवरोध हैं, अतः यह प्रगतिशील समस्थानिक विचलन है। प्रयोगशाला में उर्वर संकर युग्मनज-पश्च पृथक्करण को अवरोध के रूप में खारिज करते हैं; एक बगीचे के वृक्ष भौगोलिक अवरोध नहीं हैं, और परास्थानिकता के लिए आवश्यक स्थानिक प्रवणता यहाँ नहीं है।
  18. निम्नलिखित में से कौन-से युग्मनज-पूर्व पृथक्करण अवरोध हैं?

    1. दो मेंढक-जातियाँ एक ही तालाब में पर वर्ष के भिन्न महीनों में प्रजनन करती हैं
    2. एक समुद्री अर्चिन-जाति के शुक्राणु संबंधित जाति के अंड-आवरण से नहीं जुड़ पाते
    3. घोड़ा–गधा संकर सामान्य रूप से परिवर्धित होते हैं पर बंध्य होते हैं
    4. F1 संकर उर्वर हैं, पर उनकी अनेक संतानें दुर्बल व बंध्य होती हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — दो मेंढक-जातियाँ एक ही तालाब में पर वर्ष के भिन्न महीनों में प्रजनन करती हैं; B — एक समुद्री अर्चिन-जाति के शुक्राणु संबंधित जाति के अंड-आवरण से नहीं जुड़ पाते

    कालिक पृथक्करण और युग्मकी असंगति (बाइंडिन द्वारा जाति-विशिष्ट शुक्राणु–अंड पहचान) युग्मनज बनने से पहले कार्य करते हैं, अतः युग्मनज-पूर्व हैं। खच्चर की बंध्यता संकर बंध्यता है, और उर्वर F1 संकरों की दुर्बल या बंध्य संतति संकर विघटन; दोनों युग्मनज-पश्च हैं।