पादपों में जल-संबंध, परिवहन, रंध्र, नाइट्रोजन उपापचय, प्रकाश-संश्लेषण व श्वसन
2. जल, आयनों व विलेयों का अवशोषण व परिवहन
जल व आयन मूल-वल्कुट को तीन मार्गों से पार करते हैं। एपोप्लास्टी मार्ग कोशिका-भित्तियों व अंतराकोशिकीय अवकाशों से, बिना कोई झिल्ली पार किए, चलता है; सिमप्लास्टी मार्ग प्लाज़्मोडेस्मेटा से होकर एक कोशिकाद्रव्य से दूसरे तक चलता है; पारझिल्ली मार्ग एक्वापोरिनों (प्लाज़्मा झिल्ली में PIP, टोनोप्लास्ट में TIP) से होकर झिल्लियों को बार-बार पार करता है; कोशिकाद्रव्य के अम्लीय होने पर ये बंद हो जाते हैं, जो जलप्लावन में मूल द्वारा जल-अवशोषण घटने का एक कारण है। अंतस्त्वचा पर कैस्पेरियन पट्टी, अरीय व अनुप्रस्थ भित्तियों में लिग्निन व सुबेरिन की पट्टी, एपोप्लास्ट को रोक देती है, अतः रंभ में प्रवेश करने वाली हर वस्तु को कम से कम एक बार प्लाज़्मा झिल्ली पार करनी पड़ती है। इसी झिल्ली-चरण पर मूल अपने आयनों का चयन करती है।
ज़ाइलम में जल संसंजन–तनाव से चढ़ता है: पर्णमध्योतक की भित्तियों से वाष्पन भित्ति-छिद्रों के नवचंद्रकों को वक्र करता है, और इससे बना ऋणात्मक दाब संसंजन (हाइड्रोजन बंध) तथा भित्तियों से आसंजन द्वारा थमे अविच्छिन्न जल-स्तंभों से नीचे तक पहुँचता है; ज़ाइलम में कोई उपापचयी ऊर्जा व्यय नहीं होती। मूल दाब रात में जलरंध्रों से बिंदुस्राव कराता है, पर वाष्पोत्सर्जन करते वृक्ष की आपूर्ति नहीं कर सकता। अधिक तनाव से गुहिकायन व एम्बोलिज़्म का जोखिम रहता है, जिसे गर्त-झिल्लियाँ एक वाहिका तक सीमित रखती हैं। वाष्पोत्सर्जन लगभग संतृप्त पर्ण-वायु-अवकाशों व बाहरी वायु के बीच जलवाष्प के अंतर से, रंध्री व सीमा-परत प्रतिरोधों के विरुद्ध, चलता है। वाष्पोत्सर्जन अनुपात (स्थिर प्रति mol CO₂ पर खोए जल के mol) सामान्यतः C3 हेतु लगभग 500, C4 हेतु 250 और CAM पादपों हेतु 50 तक पढ़ाया जाता है; जल-उपयोग दक्षता इसका व्युत्क्रम है।
किसी आयन के लिए प्रश्न यह है कि अवशोषण निष्क्रिय है या सक्रिय। नर्न्स्ट समीकरण वह विभव देता है जिस पर आयन साम्य में होता है: E = (2.303RT/zF) log(C_out/C_in), जो 25 °C पर प्रति दस-गुना प्रवणता लगभग 59 mV/z है; नर्न्स्ट वितरण से अधिक संचित आयन का परिवहन सक्रिय होता है। प्लाज़्मा झिल्ली का P-प्रकार H⁺-ATPase प्रोटॉन बाहर पंप कर कोशिकाद्रव्य को भीतर से ऋणात्मक और एपोप्लास्ट को अम्लीय करता है, तथा टोनोप्लास्ट का V-ATPase व H⁺-पाइरोफ़ॉस्फ़ेटेज़ रिक्तिका को अम्लीय करते हैं। ये प्रवणताएँ द्वितीयक परिवहन चलाती हैं: NO₃⁻, Cl⁻, फ़ॉस्फ़ेट व सुक्रोज़ H⁺ सहपरिवहन (सिमपोर्ट) से आते हैं, Na⁺ प्रतिपरिवहन (Na⁺/H⁺ एंटीपोर्ट) से बाहर जाता है, और K⁺ मिलीमोलर बाह्य सांद्रता पर अंतर्मुखी-दिष्टकारी चैनलों से आता है पर माइक्रोमोलर सांद्रता पर उसे H⁺-युग्मित वाहक चाहिए। भीतर से ऋणात्मक झिल्ली ऋणायनों को प्रतिकर्षित करती है, अतः ऋणायन अवशोषण सदा सक्रिय होता है।
शर्कराएँ फ्लोएम में दाब-प्रवाह (म्यून्श) से चलती हैं: स्रोत पर चालनी तत्वों में भरा सुक्रोज़ उनका Ψs घटाता है, ज़ाइलम से जल प्रवेश करता है, और स्फीति दाब रस को सिंक (उपभोग-स्थल) की ओर धकेलता है, जहाँ अनभारण उसे घटाता है। एपोप्लास्टी भारण H⁺-सुक्रोज़ सहपरिवाहकों (SUC/SUT) का उपयोग करता है; बहुलक-जाल भारण में, जैसे कुकुरबिटों में, प्लाज़्मोडेस्मेटा से आया सुक्रोज़ रैफ़िनोज़ व स्टैकियोज़ में बदल जाता है, जो वापस विसरित होने के लिए बहुत बड़े हैं।
3. रंध्र-गति की क्रियाविधि
रंध्र तब खुलता है जब उसकी द्वार कोशिकाएँ विलेय ग्रहण करती हैं, अपना Ψs घटाती हैं, जल अवशोषित करती हैं और फूलती हैं। वृक्काकार द्वार कोशिकाओं (घासों में डम्बलाकार) के चारों ओर अरीय रूप से लिपटे सेलुलोज़ सूक्ष्मतंतु उन्हें चौड़ा नहीं होने देते, अतः वे लंबी होकर बाहर की ओर मुड़ती हैं। फ़ोटोट्रॉपिनों द्वारा ग्रहण किया गया नीला प्रकाश प्लाज़्मा झिल्ली के H⁺-ATPase के C-सिरे का फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण कर उसे सक्रिय करता है, जिसके बाद उससे एक 14-3-3 प्रोटीन बंधता है। प्रोटॉन-निष्कासन झिल्ली को अतिध्रुवित कर अंतर्मुखी-दिष्टकारी K⁺ चैनल खोलता है; K⁺ के साथ Cl⁻ तथा स्टार्च से PEP कार्बोक्सिलेज़ द्वारा बना मैलेट²⁻ प्रवेश करते हैं, और दिन ढलते सुक्रोज़ भी परासरणी भार बढ़ाता है। कवकीय विष फ़्यूसिकोकिन H⁺-ATPase को सक्रिय अवस्था में जकड़कर रंध्रों को पूरा खोल देता है।
बंद होना इसका उलटा है, जिसे ऐब्सिसिक अम्ल (ABA), उच्च अंतराकोशिकीय CO₂, अंधकार या शुष्क वायु प्रेरित करते हैं। ABA, PYR/PYL/RCAR ग्राहियों से बंधता है, जो PP2C फ़ॉस्फ़ेटेज़ों का संदमन कर काइनेज़ OST1 (SnRK2.6) को मुक्त करते हैं। OST1 SLAC1 मंद ऋणायन चैनल तथा अभिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियाँ बनाने वाले एक NADPH ऑक्सीडेज़ को सक्रिय करता है, और कोशिकाद्रव्यी Ca²⁺ बढ़ता है। ऋणायन-बहिर्प्रवाह झिल्ली को विध्रुवित करता है, जिससे अंतर्मुखी K⁺ चैनल बंद और बहिर्मुखी-दिष्टकारी K⁺ चैनल (GORK) खुल जाते हैं; K⁺, Cl⁻ व मैलेट बाहर निकलते हैं, जल पीछे-पीछे जाता है और छिद्र बंद हो जाता है।
4. नाइट्रोजन उपापचय: नाइट्रेट स्वांगीकरण व नाइट्रोजन स्थिरीकरण
अधिकांश फ़सलें नाइट्रेट को H⁺-युग्मित परिवाहकों (निम्न-बंधुता NRT1/NPF व उच्च-बंधुता NRT2) से ग्रहण करती हैं और दो चरणों में आठ इलेक्ट्रॉनों से अमोनियम में अपचित करती हैं। अमोनियम, चाहे नाइट्रेट से आए, स्थिरीकरण से या प्रकाश-श्वसन से, विषैला है और तुरंत GS–GOGAT चक्र द्वारा स्वांगीकृत होता है, जिसका शुद्ध परिणाम 2-ऑक्सोग्लूटारेट + NH₄⁺ + ATP + 2e⁻ → ग्लूटामेट है। ऐमिनोट्रांसफ़रेज़ ऐमिनो समूह को आगे देते हैं (ग्लूटामेट + ऑक्सैलोऐसीटेट → ऐस्पार्टेट + 2-ऑक्सोग्लूटारेट), और ऐस्पैरेजीन सिंथेटेज़ नाइट्रोजन-समृद्ध परिवहन रूप ऐस्पैरेजीन बनाता है। C3 पत्तियों में प्रकाश-श्वसन से मुक्त NH₄⁺ हरितलवक के GS2 व Fd-GOGAT द्वारा ऐसी दरों पर पुनः स्थिर होता है जो प्राथमिक नाइट्रेट स्वांगीकरण से कई गुना अधिक हो सकती हैं।
| एंज़ाइम | स्थान | अभिक्रिया | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| नाइट्रेट रिडक्टेज़ | कोशिकाद्रव्य | NO₃⁻ + NAD(P)H + H⁺ → NO₂⁻ + NAD(P)⁺ + H₂O (2e⁻) | FAD, हीम व मॉलिब्डेनम सहकारक; नाइट्रेट व प्रकाश से प्रेरित, अंधकार में फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से निष्क्रिय |
| नाइट्राइट रिडक्टेज़ | प्लैस्टिड | NO₂⁻ + 6 Fd (अपचित) + 8H⁺ → NH₄⁺ + 6 Fd (ऑक्सीकृत) + 2H₂O (6e⁻) | सायरोहीम व Fe₄S₄ समूह |
| ग्लूटामीन सिंथेटेज़ (GS) | कोशिकाद्रव्य (GS1), प्लैस्टिड (GS2) | ग्लूटामेट + NH₄⁺ + ATP → ग्लूटामीन + ADP + Pi | NH₄⁺ हेतु उच्च बंधुता; ग्लूफ़ोसिनेट से संदमित |
| GOGAT | प्लैस्टिड | ग्लूटामीन + 2-ऑक्सोग्लूटारेट + 2e⁻ → 2 ग्लूटामेट | पत्तियों में Fd-GOGAT; मूलों व ग्रंथिकाओं में NADH-GOGAT |
| नाइट्रोजिनेज़ | बैक्टीरॉइड या मुक्तजीवी नाइट्रोजन-स्थिरक | N₂ + 8e⁻ + 8H⁺ + 16 ATP → 2NH₃ + H₂ + 16 ADP + 16 Pi | Fe प्रोटीन MoFe प्रोटीन को अपचित करता है, जो N₂ बाँधता है; O₂ से अनुत्क्रमणीय रूप से निष्क्रिय |
शिंब ग्रंथिकाओं में नाइट्रोजन स्थिरीकरण रासायनिक संवाद से आरंभ होता है: मूल के फ़्लेवोनॉइड NodD के माध्यम से राइज़ोबियम के nod जीन प्रेरित करते हैं, और जीवाणु बदले में Nod कारक (लाइपो-काइटोओलिगोसैकेराइड) देते हैं जो मूल-रोम का मुड़ना, संक्रमण-सूत्र तथा वल्कुट कोशिका-विभाजन प्रेरित करते हैं। चूँकि O₂ नाइट्रोजिनेज़ को नष्ट करती है पर बैक्टीरॉइडों को ATP बनाने हेतु O₂ चाहिए, ग्रंथिका वल्कुट के विसरण-अवरोध तथा लेगहीमोग्लोबिन द्वारा मुक्त O₂ को बहुत कम रखती है; लेगहीमोग्लोबिन O₂ को बाँधकर श्वसन तक पहुँचाता है। मटर जैसे शीतोष्ण शिंब स्थिर नाइट्रोजन को ऐमाइड (ग्लूटामीन, ऐस्पैरेजीन) के रूप में और सोयाबीन जैसे उष्णकटिबंधीय शिंब यूरीड (ऐलैंटॉइन, ऐलैंटोइक अम्ल) के रूप में निर्यात करते हैं।
5. प्रकाश-संश्लेषण: प्रकाश अभिक्रियाएँ
थायलाकॉइड में दो प्रकाशतंत्र श्रेणीक्रम में कार्य करते हैं, जिसे Z-योजना कहते हैं। प्रकाशतंत्र II (अभिक्रिया केंद्र P680), जो सटे हुए ग्रैना में सांद्रित है, ऑक्सीजन-विमोचक संकुल (एक Mn₄CaO₅ समूह) पर जल का ऑक्सीकरण करता है: 2H₂O → O₂ + 4H⁺ (ल्यूमेन में) + 4e⁻। इलेक्ट्रॉन फ़ियोफ़ाइटिन, Q_A व Q_B से प्लास्टोक्विनोन भंडार तक, फिर साइटोक्रोम b₆f संकुल तक जाते हैं, जो Q-चक्र से और प्रोटॉन पंप करता है, फिर प्लास्टोसायनिन से होकर प्रकाशतंत्र I (P700, ATP सिंथेज़ के साथ स्ट्रोमा पटलिकाओं में) तक, और फ़ेरेडॉक्सिन व फ़ेरेडॉक्सिन–NADP⁺ रिडक्टेज़ से होकर NADPH तक। प्रत्येक इलेक्ट्रॉन दो फ़ोटॉनों से आगे बढ़ता है, प्रत्येक प्रकाशतंत्र में एक, अतः एक O₂ हेतु कम से कम 8 फ़ोटॉन चाहिए। प्रोटॉन प्रवणता, जो मुख्यतः ΔpH के रूप में होती है, CF₀CF₁ ATP सिंथेज़ को चलाती है।
चक्रीय इलेक्ट्रॉन प्रवाह फ़ेरेडॉक्सिन से इलेक्ट्रॉनों को प्लास्टोक्विनोन भंडार में लौटाता है, जिससे प्रोटॉन पंप होते हैं और बिना NADPH के ATP बनता है; रैखिक प्रवाह कैल्विन चक्र की 3:2 ATP:NADPH माँग से जितना ATP कम देता है, वह यही पूरा करता है। दो प्रकाशतंत्रों का प्रमाण एमर्सन के लाल पतन (लगभग 680 nm से आगे क्वांटम लब्धि गिरती है) तथा संवर्धन प्रभाव (कम तरंगदैर्घ्य का प्रकाश जोड़ने पर वह लौट आती है) से मिला। दो शाकनाशी यह क्रम पक्का करते हैं: DCMU (डाइयूरॉन) Q_B स्थल घेरकर PSII से बाहर इलेक्ट्रॉन प्रवाह रोकता है, और पैराक्वाट PSI से इलेक्ट्रॉन लेकर O₂ को देता है, जिससे सुपरऑक्साइड बनता है।
6. C3, C4 व CAM चक्र
कैल्विन–बेन्सन (C3) चक्र स्ट्रोमा में तीन चरणों में चलता है। कार्बोक्सिलीकरण: Rubisco राइबुलोज़-1,5-बिसफ़ॉस्फ़ेट (RuBP) में CO₂ जोड़कर दो 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट (3-PGA) बनाता है। अपचयन: 3-PGA का फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण (ATP) व अपचयन (NADPH) होकर ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट बनता है। पुनर्जनन: पाँच ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट पुनर्व्यवस्थित होकर तीन RuBP बनाते हैं, जिसका अंतिम चरण फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ ATP से करता है। लागत प्रति CO₂ 3 ATP व 2 NADPH है: प्रति निर्यातित ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट 9 ATP व 6 NADPH, प्रति हेक्सोज़ 18 ATP व 12 NADPH। प्रकाश Rubisco ऐक्टिवेज़, स्ट्रोमा में pH व Mg²⁺ की वृद्धि, तथा थायोरिडॉक्सिन द्वारा FBPase, SBPase व फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ के अपचयन से चक्र को चालू करता है।
C4 प्रकाश-संश्लेषण क्रान्ज़ शारीरिकी पर बना एक CO₂ पंप है। पर्णमध्योतक के कोशिकाद्रव्य में PEP कार्बोक्सिलेज़, जिसमें ऑक्सीजिनेज़ सक्रियता नहीं होती और HCO₃⁻ हेतु बंधुता अधिक होती है, फ़ॉस्फ़ोइनॉलपाइरुवेट पर HCO₃⁻ स्थिर कर ऑक्सैलोऐसीटेट बनाता है, जो मैलेट या ऐस्पार्टेट बनता है। C4 अम्ल पूलाच्छद में जाकर विकार्बोक्सिलित होता है (मक्का, गन्ना व ज्वार में NADP-मैलिक एंज़ाइम से; अन्य C4 प्रकारों में NAD-मैलिक एंज़ाइम या PEP कार्बोक्सीकाइनेज़ से), अतः Rubisco के चारों ओर CO₂ संचित होती है और प्रकाश-श्वसन लगभग समाप्त हो जाता है। पर्णमध्योतक में पाइरुवेट, फ़ॉस्फ़ेट डाइकाइनेज़ PEP का पुनर्जनन करता है: पाइरुवेट + ATP + Pi → PEP + AMP + PPi। AMP को दो ATP तुल्यांक गिनें तो पंप प्रति CO₂ 2 ATP जोड़ता है, अतः NADP-ME C4 की पाठ्यपुस्तकीय लागत प्रति CO₂ 5 ATP व 2 NADPH है। इसके बदले लगभग शून्य CO₂ क्षतिपूर्ति बिंदु (C3 पत्तियों में यह कई दसियों µL L⁻¹ होता है) तथा गर्म, तीव्र प्रकाश वाले, शुष्क आवासों में बेहतर जल- व नाइट्रोजन-उपयोग दक्षता मिलती है।
क्रासुलेसी अम्ल उपापचय (CAM) इन्हीं दो कार्बोक्सिलीकरणों को स्थान के बजाय समय में पृथक करता है। रंध्र रात में खुलते हैं; PEP कार्बोक्सिलेज़ CO₂ को ऑक्सैलोऐसीटेट में स्थिर करता है, जो मैलेट में अपचित होकर रिक्तिका में मैलिक अम्ल के रूप में संचित होता है, अतः रात भर अनुमापनीय अम्लता बढ़ती है। दिन में रंध्र बंद रहते हैं, मैलेट विकार्बोक्सिलित होता है और Rubisco बंद रंध्रों के पीछे CO₂ को पुनः स्थिर करता है। फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण रात्रिकालीन PEP कार्बोक्सिलेज़ को सक्रिय तथा मैलेट के प्रति कम संवेदी रखता है। हिम-पादप Mesembryanthemum crystallinum लवण या सूखे के प्रतिबल में C3 से CAM में बदल जाता है (वैकल्पिक CAM)।
| लक्षण | C3 | C4 | CAM |
|---|---|---|---|
| ¹⁴CO₂ का पहला स्थायी उत्पाद | 3-PGA (3 C) | ऑक्सैलोऐसीटेट, फिर मैलेट या ऐस्पार्टेट (4 C) | मैलेट, रात में |
| दोनों कार्बोक्सिलीकरणों का पृथक्करण | कोई नहीं | स्थानिक (पर्णमध्योतक व पूलाच्छद) | कालिक (रात व दिन) |
| प्रकाश-श्वसन | उल्लेखनीय, ताप के साथ बढ़ता है | बहुत कम | मैलेट के विकार्बोक्सिलीकरण के दौरान कम |
| उदाहरण | गेहूँ, धान, अधिकांश वृक्ष | मक्का, गन्ना, ज्वार | कैलांको, अनन्नास, ओपंशिया, एगेव |
7. प्रकाश-श्वसन: C2 चक्र
Rubisco O₂ को भी स्वीकार करता है: RuBP + O₂ → 3-PGA + 2-फ़ॉस्फ़ोग्लाइकोलेट। फ़ॉस्फ़ोग्लाइकोलेट हरितलवक के एंज़ाइमों का संदमन करता है और तीन अंगकों में फैले C2 चक्र द्वारा बचाया जाता है। हरितलवक में फ़ॉस्फ़ोग्लाइकोलेट फ़ॉस्फ़ेटेज़ ग्लाइकोलेट बनाता है। पेरॉक्सीसोम में ग्लाइकोलेट ऑक्सीडेज़ ग्लाइऑक्सिलेट व H₂O₂ (कैटालेज़ द्वारा हटाया जाता है) बनाता है, और ट्रांसऐमिनेशन से ग्लाइसीन बनता है। माइटोकॉन्ड्रिया में ग्लाइसीन डिकार्बोक्सिलेज़ संकुल, सेरीन हाइड्रॉक्सीमेथिलट्रांसफ़रेज़ के साथ, दो ग्लाइसीन को एक सेरीन में बदलता है, जिसमें CO₂ व NH₄⁺ मुक्त होते हैं और NADH बनता है। सेरीन पेरॉक्सीसोम में लौटकर हाइड्रॉक्सीपाइरुवेट व ग्लिसरेट बनता है, और ग्लिसरेट हरितलवक में फ़ॉस्फ़ोरिलीकृत होकर 3-PGA बनता है। दो फ़ॉस्फ़ोग्लाइकोलेटों के चार कार्बनों में से तीन कैल्विन चक्र में लौटते हैं और एक CO₂ के रूप में खो जाता है; NH₄⁺ को ATP व अपचायक की लागत पर GS–GOGAT द्वारा पुनः स्थिर करना पड़ता है।
कार्बोक्सिलीकरण की तुलना में ऑक्सीजनीकरण ताप के साथ बढ़ता है (CO₂ की विलेयता O₂ की तुलना में तेज़ी से घटती है और Rubisco की CO₂ हेतु वरीयता घटती है), उच्च O₂ से, तथा रंध्र बंद होने पर निम्न अंतराकोशिकीय CO₂ से। इसी कारण 21% O₂ C3 प्रकाश-संश्लेषण का संदमन करती है (वारबर्ग प्रभाव) और गर्म, शुष्क स्थानों में C4 व CAM लाभकारी हैं। हल किया उदाहरण: प्रति चार कार्बोक्सिलीकरणों पर एक ऑक्सीजनीकरण (vo/vc = 0.25) हो, तो प्रत्येक कार्बोक्सिलीकरण के साथ 0.25 × ½ = 0.125 CO₂ मुक्त होती है, अतः स्थिर कार्बन का 12.5% पुनः खो जाता है। C2-चक्र के एंज़ाइमों के Arabidopsis उत्परिवर्ती उच्च CO₂ में सामान्य रूप से बढ़ते हैं पर वायु में मर जाते हैं; यही इस चक्र की अनिवार्यता का प्रतिष्ठित प्रमाण है।
8. श्वसन: ग्लाइकोलिसिस, TCA चक्र व पादप इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला
पादप ग्लाइकोलिसिस कोशिकाद्रव्य व प्लैस्टिड दोनों में चलता है और इसके चरण लचीले हैं: सुक्रोज़ इन्वर्टेज़ या सुक्रोज़ सिंथेज़ से विखंडित होता है; फ़्रक्टोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट का फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण ATP-PFK या पाइरोफ़ॉस्फ़ेट-आश्रित PFK (PFP) करता है, जो फ़ॉस्फ़ेट की कमी में ATP बचाता है; और PEP, PEP कार्बोक्सिलेज़ व मैलेट डिहाइड्रोजिनेज़ के रास्ते पाइरुवेट काइनेज़ को बायपास कर माइटोकॉन्ड्रिया को मैलेट दे सकता है। TCA चक्र में प्रत्येक पाइरुवेट से 3 CO₂, 4 NADH (पाइरुवेट डिहाइड्रोजिनेज़ सहित), 1 FADH₂ व 1 ATP (पादप सक्सिनिल-CoA सिंथेटेज़ ATP बनाता है) मिलते हैं, और NAD-मैलिक एंज़ाइम पादप माइटोकॉन्ड्रिया को मैलेट का सीधे पाइरुवेट में ऑक्सीकरण करने देता है।
| घटक | इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण | प्रोटॉन पंप करता है? | संदमक |
|---|---|---|---|
| संकुल I | मैट्रिक्स NADH → यूबिक्विनोन | हाँ | रोटेनोन |
| टाइप II NAD(P)H डिहाइड्रोजिनेज़ | मैट्रिक्स या कोशिकाद्रव्यी NAD(P)H → यूबिक्विनोन | नहीं | रोटेनोन से अप्रभावित |
| संकुल II | सक्सिनेट → यूबिक्विनोन | नहीं | मैलोनेट |
| संकुल III | यूबिक्विनॉल → साइटोक्रोम c | हाँ | ऐन्टिमाइसिन A |
| संकुल IV | साइटोक्रोम c → O₂ | हाँ | सायनाइड, ऐज़ाइड, CO |
| वैकल्पिक ऑक्सीडेज़ (AOX) | यूबिक्विनॉल → सीधे O₂ | नहीं | SHAM (सैलिसिलहाइड्रॉक्सैमिक अम्ल); सायनाइड-प्रतिरोधी |
पंप न करने वाले मार्गों से जाने वाले इलेक्ट्रॉन बहुत कम ऊर्जा संरक्षित करते हैं, और शेष ऊष्मा के रूप में मुक्त होती है। वूडू लिली जैसे ऐरॉइड पादपों का ऊष्माजनक स्पैडिक्स AOX का इसी प्रकार उपयोग करता है, जिसमें सैलिसिलिक अम्ल ऊष्मा-विस्फोट प्रेरित करता है; अन्यत्र AOX यूबिक्विनोन भंडार को अति-अपचयन से बचाता है और प्रतिबल में अभिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियों को सीमित करता है। श्वसन गुणांक (RQ = मुक्त CO₂ ÷ उपभुक्त O₂) अधःस्तर बताता है: कार्बोहाइड्रेट से 1.0; वसा, जिनमें ऑक्सीजन कम है, लगभग 0.7 (ट्राइपामिटिन, C₅₁H₉₈O₆ + 72.5 O₂ → 51 CO₂ + 49 H₂O, RQ = 0.70), जैसा अंकुरित होते तैलीय बीजों में; कार्बनिक अम्लों से 1 से अधिक (मैलिक अम्ल, C₄H₆O₅ + 3 O₂ → 4 CO₂ + 3 H₂O, RQ = 1.33)।
मुख्य बिंदु
- Ψw = Ψs + Ψp + Ψg, जहाँ Ψs = −iCRT; जल निम्न Ψw की ओर चलता है। पूर्ण स्फीति पर Ψw = 0 व Ψp = −Ψs; आरंभिक जीवद्रव्यकुंचन पर Ψp = 0।
- कैस्पेरियन पट्टी रंभ में प्रवेश हेतु झिल्ली-चरण अनिवार्य करती है; ज़ाइलम जल संसंजन–तनाव से चढ़ता है; वाष्पोत्सर्जन अनुपात लगभग 500 (C3), 250 (C4) व 50 (CAM) हैं; नर्न्स्ट समीकरण निष्क्रिय व सक्रिय आयन-अवशोषण में भेद करता है; फ्लोएम दाब-प्रवाह से चलता है।
- नीला प्रकाश फ़ोटोट्रॉपिन, H⁺-ATPase सक्रियण तथा K⁺ व मैलेट के अवशोषण से रंध्र खोलता है; ABA उन्हें PYR/PYL, PP2C, OST1 व SLAC1 के माध्यम से बंद करता है, और K⁺ GORK से बाहर जाता है।
- नाइट्रेट रिडक्टेज़ (कोशिकाद्रव्य, 2e⁻) व नाइट्राइट रिडक्टेज़ (प्लैस्टिड, 6e⁻) GS–GOGAT हेतु NH₄⁺ बनाते हैं; नाइट्रोजिनेज़ प्रति N₂ 16 ATP व्यय करता है, सदा H₂ बनाता है और लेगहीमोग्लोबिन द्वारा O₂ से बचाया जाता है।
- कैल्विन चक्र की लागत प्रति CO₂ 3 ATP व 2 NADPH है; C4 पंप 2 ATP जोड़ता है (प्रति CO₂ 5); CAM कार्बोक्सिलीकरणों को समय में पृथक करता है; प्रकाश-श्वसन में प्रति दो ऑक्सीजनीकरण एक CO₂ खोती है।
- पादप श्वसन में PFP, NAD-मैलिक एंज़ाइम, रोटेनोन-अप्रभावित डिहाइड्रोजिनेज़ तथा सायनाइड-प्रतिरोधी, SHAM-संवेदी वैकल्पिक ऑक्सीडेज़ जुड़ते हैं; RQ कार्बोहाइड्रेट हेतु 1, वसा हेतु लगभग 0.7 और कार्बनिक अम्लों हेतु 1 से अधिक है।
अभ्यास प्रश्न (17)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
एक पूर्णतः स्फीत मृदूतक कोशिका वायुमंडलीय दाब पर शुद्ध जल के साथ साम्य में है (गुरुत्व की उपेक्षा करें)। उसके जल विभव के घटकों का कौन-सा वर्णन सही है?
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उत्तर: A — Ψw शून्य है, और Ψp परिमाण में Ψs के बराबर पर विपरीत चिह्न का है
साम्य पर कोशिका का Ψw शुद्ध जल के बराबर, अर्थात् शून्य, होता है। Ψg की उपेक्षा करने पर Ψs + Ψp = 0, अतः Ψp = −Ψs: भित्ति ठीक उतनी ही प्रबलता से पीछे धकेलती है जितना विलेय जल को भीतर खींचते हैं। Ψp = 0 व Ψw = Ψs भ्रामक उत्तर है, पर वह आरंभिक जीवद्रव्यकुंचन, अर्थात् विपरीत छोर, का वर्णन है। शुद्ध जल से साम्य वाली कोशिका का Ψw शून्य से ऊपर नहीं हो सकता, और रिक्तिका में विलेय बने रहते हैं, अतः Ψs ऋणात्मक ही रहता है।एक मृदूतक कोशिका का विलेय विभव −0.90 MPa है। उसे 300 K पर 0.15 M सुक्रोज़ के बड़े आयतन में रखकर साम्य तक पहुँचने दिया जाता है। मान लें कि कोशिका का विलेय विभव नहीं बदलता, सुक्रोज़ वियोजित नहीं होता (i = 1), गुरुत्व की उपेक्षा की जा सकती है और R = 0.008314 L MPa mol⁻¹ K⁻¹। साम्य पर कोशिका का दाब विभव ____ MPa है (दो दशमलव स्थानों तक)।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 0.53
खुले विलयन में Ψp = 0, अतः उसका Ψw = Ψs = −iCRT = −(1)(0.15)(0.008314)(300) = −0.374 MPa। साम्य पर कोशिका का Ψw भी −0.374 MPa है, अतः Ψp = Ψw − Ψs = −0.374 − (−0.90) = +0.526, अर्थात् 0.53 MPa। उलटा घटाने पर −0.53 और परिमाणों को जोड़ने पर 1.27 मिलता है; दोनों भूलें हैं।एक मूल उत्परिवर्ती में अंतस्त्वचा की कैस्पेरियन पट्टी नहीं बनती, जबकि एक्वापोरिन व प्लाज़्मोडेस्मेटा सामान्य हैं। किस परिणाम की सबसे अधिक अपेक्षा है?
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उत्तर: B — विलेय बिना कोई झिल्ली पार किए भित्तियों से होकर रंभ तक पहुँच सकते हैं, जिससे आयन-चयनात्मकता खो जाती है
कैस्पेरियन पट्टी अंतस्त्वचा पर एपोप्लास्ट को बंद करती है, जिससे जल व विलेयों को प्लाज़्मा झिल्ली पार करनी पड़ती है, जहाँ परिवाहक उनका चयन करते हैं। इसके बिना विलेय भित्तियों से होकर रंभ में रिस सकते हैं, अतः चयनात्मकता खो जाती है। मूल दाब वाला विकल्प भ्रामक है, पर वह बढ़ेगा नहीं, घटेगा, क्योंकि उसी रिक्ति से रंभ में संचित आयन वापस रिस जाते हैं। पारझिल्ली व सिमप्लास्टी मार्ग इस पट्टी पर निर्भर नहीं हैं।मूल-वल्कुट कोशिकाओं में 100 mM K⁺ है जबकि बाह्य विलयन में 1 mM K⁺ है। मापा गया झिल्ली-विभव −90 mV (बाहर के सापेक्ष भीतर) है। 25 °C पर K⁺ का नर्न्स्ट विभव E = 59 log₁₀(C_out/C_in) mV लें। (झिल्ली-विभव − K⁺ का नर्न्स्ट विभव) का मान ____ mV है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 28
E_K = 59 × log₁₀(1/100) = 59 × (−2) = −118 mV। झिल्ली-विभव − E_K = −90 − (−118) = +28 mV। किसी धनायन पर धनात्मक चालक बल का अर्थ है कि उसकी निष्क्रिय प्रवृत्ति बाहर की ओर है: कोशिकाएँ K⁺ को साम्य-स्तर से ऊपर रखती हैं, अतः इस प्रवणता के विरुद्ध अवशोषण सक्रिय (H⁺-युग्मित) होना चाहिए। log(C_in/C_out) लिखने पर E_K = +118 mV आता है और पूरा चिह्न उलट जाता है।निम्नलिखित में से कौन-से नीले प्रकाश से प्रेरित रंध्र-खुलने में योगदान करते हैं?
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उत्तर: A — प्लाज़्मा झिल्ली के H⁺-ATPase का फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण और उससे एक 14-3-3 प्रोटीन का बंधन; B — झिल्ली के अतिध्रुवित होने के बाद अंतर्मुखी-दिष्टकारी चैनलों से K⁺ का अंतर्वाह; D — द्वार कोशिकाओं में स्टार्च से PEP कार्बोक्सिलेज़ द्वारा मैलेट का संश्लेषण
नीला प्रकाश फ़ोटोट्रॉपिनों के माध्यम से H⁺-ATPase का फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण करता है, जो फिर 14-3-3 से बंधकर प्रोटॉन बाहर पंप करता है; अतिध्रुवण अंतर्मुखी K⁺ चैनल खोलता है; और स्टार्च से PEP कार्बोक्सिलेज़ द्वारा बना मैलेट प्रति-ऋणायन व परासरक देता है। OST1 द्वारा SLAC1 का सक्रियण ABA-प्रेरित बंद होने का भाग है: ऋणायन-बहिर्प्रवाह झिल्ली को विध्रुवित कर K⁺ को बाहर निकालता है, जो खुलने का उलटा है।प्रोटीन काइनेज़ OST1 (SnRK2.6) से रहित Arabidopsis उत्परिवर्ती के पादपों पर ऐब्सिसिक अम्ल छिड़ककर उन्हें शुष्क वायु में रखा जाता है। वन्य प्रकार की तुलना में उत्परिवर्ती की पत्तियाँ सबसे अधिक संभावना से
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उत्तर: C — रंध्र खुले रखेंगी, जल तेज़ी से खोएँगी और ऊष्मीय चित्रण में अधिक ठंडी दिखेंगी
OST1 वह SnRK2 काइनेज़ है जो ABA-बद्ध PYR/PYL ग्राहियों द्वारा PP2C के संदमन पर मुक्त होता है; यह SLAC1 तथा उस NADPH ऑक्सीडेज़ को सक्रिय करता है जो छिद्र बंद करते हैं। OST1 के बिना ABA रंध्र बंद नहीं कर सकता, अतः पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन करती रहती हैं, मुरझाती हैं और ठंडी रहती हैं। ABA छिड़कना सहायक नहीं होगा, इससे जैवसंश्लेषण वाला विकल्प खारिज होता है: अवरोध हॉर्मोन के बाद की शृंखला में है। नीले प्रकाश से खुलने हेतु OST1 आवश्यक नहीं, और PP2C उससे पहले कार्य करता है।पत्ती की कोशिका में नाइट्रेट रिडक्टेज़ व नाइट्राइट रिडक्टेज़ की कौन-सी तुलना सही है?
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उत्तर: C — नाइट्रेट रिडक्टेज़ कोशिकाद्रव्य में NAD(P)H से कार्य करता है; नाइट्राइट रिडक्टेज़ प्लैस्टिड में फ़ेरेडॉक्सिन के छह इलेक्ट्रॉनों से कार्य करता है
नाइट्रेट रिडक्टेज़ कोशिकाद्रव्यी है, NADH (या NADPH) लेता है और उसमें FAD, हीम व मॉलिब्डेनम सहकारक होते हैं; यह दो इलेक्ट्रॉन (नाइट्रेट से नाइट्राइट) स्थानांतरित करता है। नाइट्राइट रिडक्टेज़ प्लैस्टिड में है, अपचित फ़ेरेडॉक्सिन लेता है और सायरोहीम व Fe₄S₄ समूह के साथ छह इलेक्ट्रॉन (नाइट्राइट से अमोनियम) स्थानांतरित करता है। मॉलिब्डेनम वाला विकल्प भ्रामक है, पर मॉलिब्डेनम एंज़ाइम नाइट्रेट रिडक्टेज़ है, अतः इसकी कमी में नाइट्राइट नहीं, नाइट्रेट संचित होता है।नाइट्रोजन स्थिरीकरण व अमोनियम स्वांगीकरण के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — नाइट्रोजिनेज़ N₂ के अपचयन के अनिवार्य भाग के रूप में प्रोटॉनों को H₂ में अपचित करता है; B — लेगहीमोग्लोबिन संक्रमित कोशिकाओं में मुक्त O₂ कम रखते हुए भी बैक्टीरॉइड श्वसन हेतु O₂ पहुँचाता है
N₂ + 8e⁻ + 8H⁺ + 16 ATP → 2NH₃ + H₂: हाइड्रोजन-विमोचन क्रियाविधि में ही अंतर्निहित है। लेगहीमोग्लोबिन O₂ को बाँधकर मुक्त O₂ को नाइट्रोजिनेज़ हेतु पर्याप्त कम रखता है और उसे बैक्टीरॉइड की श्वसन शृंखला तक पहुँचाता है। GOGAT ग्लूटामीन का ऐमाइड नाइट्रोजन 2-ऑक्सोग्लूटारेट को देकर दो ग्लूटामेट बनाता है; ऐस्पार्टेट ऐमिनोट्रांसफ़रेज़ से बनता है। N₂ MoFe प्रोटीन (उसके FeMo सहकारक) से बंधता है; Fe प्रोटीन ATP-आश्रित इलेक्ट्रॉन दाता है।एक C3 पादप व एक C4 पादप प्रत्येक 1.76 g CO₂ स्थिर करते हैं। उनके वाष्पोत्सर्जन अनुपात क्रमशः 500 व 250 mol वाष्पोत्सर्जित H₂O प्रति mol स्थिर CO₂ हैं। मोलर द्रव्यमान CO₂ = 44 g mol⁻¹ व H₂O = 18 g mol⁻¹ लेते हुए, C3 पादप C4 पादप की तुलना में कितने ग्राम अधिक जल वाष्पोत्सर्जित करता है?
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उत्तर: 180
CO₂ के मोल = 1.76/44 = 0.04 mol। खोया जल: C3 = 500 × 0.04 = 20 mol; C4 = 250 × 0.04 = 10 mol। अंतर 10 mol, अर्थात् 10 × 18 = 180 g। जल के मोलों को ग्राम में न बदलने पर 10, और CO₂ के द्रव्यमान को सीधे लेने पर 440 आता है।मान लें कि कैल्विन–बेन्सन चक्र को प्रति स्थिर CO₂ 3 ATP व 2 NADPH चाहिए, और NADP-मैलिक एंज़ाइम प्रकार की प्रजाति का C4 पंप प्रति CO₂ अतिरिक्त 2 ATP लेता है (पाइरुवेट, फ़ॉस्फ़ेट डाइकाइनेज़ ATP को AMP में बदलता है, जिसे दो ATP गिना जाता है)। प्रकाश-श्वसन की उपेक्षा करते हुए, इस C4 पादप में एक हेक्सोज़ बनाने योग्य CO₂ स्थिर करने हेतु कुल ATP की संख्या ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 30
प्रति CO₂ C4 पादप 3 (कैल्विन चक्र) + 2 (PEP पुनर्जनन) = 5 ATP व्यय करता है। एक हेक्सोज़ हेतु 6 CO₂ चाहिए, अतः 6 × 5 = 30 ATP (और 12 NADPH, C3 जितने ही)। C3 पादप को 18 ATP चाहिए; PPDK चरण को केवल एक ATP गिनने पर 24 आता है।एक गूदेदार पादप की पत्तियों के नमूने हर कुछ घंटों पर लिए जाते हैं। अनुमापनीय अम्लता भोर में सर्वाधिक और संध्या में न्यूनतम है, तथा रात में दी गई ¹⁴CO₂ सबसे पहले मैलेट को चिह्नित करती है। इन आँकड़ों से कौन-सी व्याख्या मेल खाती है?
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उत्तर: B — PEP कार्बोक्सिलेज़ रात में CO₂ को मैलेट में स्थिर करता है; दिन में मैलेट CO₂ मुक्त करता है, जिसे Rubisco पुनः स्थिर करता है
रात में मैलेट का चिह्नित होना और रात भर अम्ल-संचय CAM की पहचान है: PEP कार्बोक्सिलेज़ CO₂ (HCO₃⁻ रूप में) को ऑक्सैलोऐसीटेट में स्थिर करता है, जो मैलेट में अपचित होकर मैलिक अम्ल के रूप में संचित होता है; दिन में रंध्र बंद रहते हैं और विकार्बोक्सिलीकरण Rubisco हेतु CO₂ मुक्त करता है, अतः अम्लता घटती है। Rubisco 3-PGA से मैलिक अम्ल नहीं बनाता। C4 वाला विकल्प समय उलट देता है और क्रान्ज़ शारीरिकी मान लेता है, और प्रकाश-श्वसन हेतु प्रकाश-चालित RuBP ऑक्सीजनीकरण चाहिए।मक्का व गेहूँ की पत्तियों को प्रकाश में ¹⁴CO₂ का 5 सेकंड का स्पंद दिया जाता है। प्रत्येक में अधिकांश चिह्न सबसे पहले किन यौगिकों में दिखता है?
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उत्तर: D — मक्का: ऑक्सैलोऐसीटेट व मैलेट; गेहूँ: 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट
मक्का एक C4 घास है: पर्णमध्योतक में PEP कार्बोक्सिलेज़ कार्बन को सबसे पहले C4 अम्लों ऑक्सैलोऐसीटेट व मैलेट में स्थिर करता है। गेहूँ C3 है, अतः Rubisco पहले 3-PGA बनाता है। उलटी जोड़ी प्रचलित भूल है। Rubisco एकमात्र कार्बोक्सिलेज़ नहीं है (C4 पत्तियाँ प्रारंभिक स्थिरीकरण हेतु PEP कार्बोक्सिलेज़ पर निर्भर हैं), और C3 पत्तियों में PEP कार्बोक्सिलेज़ प्राथमिक कार्बोक्सिलेज़ नहीं है।उच्च ताप पर एक C3 पत्ती में Rubisco प्रत्येक 10 कार्बोक्सिलीकरणों पर 3 ऑक्सीजनीकरण उत्प्रेरित करता है। मान लें कि C2 चक्र प्रत्येक दो RuBP ऑक्सीजनीकरणों पर एक CO₂ मुक्त करता है और कोई अन्य CO₂ हानि नहीं है। प्रकाश-श्वसन से मुक्त CO₂, कार्बोक्सिलीकरण द्वारा स्थिर CO₂ के प्रतिशत के रूप में, ____ है।
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उत्तर: 15
प्रति 10 कार्बोक्सिलीकरण (10 CO₂ स्थिर) पर 3 ऑक्सीजनीकरण होते हैं, जिनसे माइटोकॉन्ड्रिया में ग्लाइसीन डिकार्बोक्सिलेज़ द्वारा 3 × ½ = 1.5 CO₂ मुक्त होती है। हानि = 1.5/10 × 100 = 15%। प्रति ऑक्सीजनीकरण एक CO₂ मानने पर 30% आता है, जो प्रचलित भूल है।प्रकाश-श्वसनी C2 चक्र में CO₂ व NH₄⁺ कहाँ और किस चरण में मुक्त होते हैं?
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उत्तर: C — माइटोकॉन्ड्रिया में, जब ग्लाइसीन डिकार्बोक्सिलेज़ दो ग्लाइसीन को सेरीन में बदलता है
माइटोकॉन्ड्रिया मैट्रिक्स में सेरीन हाइड्रॉक्सीमेथिलट्रांसफ़रेज़ के साथ कार्यरत ग्लाइसीन डिकार्बोक्सिलेज़ संकुल दो ग्लाइसीन को एक सेरीन में बदलता है और CO₂ व NH₄⁺ मुक्त करता है (तथा NADH बनाता है)। पेरॉक्सीसोम का ग्लाइकोलेट ऑक्सीडेज़ भ्रामक उत्तर है क्योंकि वह ऑक्सीकरण करता है, पर वह CO₂ नहीं, ग्लाइऑक्सिलेट व H₂O₂ बनाता है। सेरीन से ग्लिसरेट तक के चरण ट्रांसऐमिनेशन व अपचयन हैं, जो इनमें से कुछ भी मुक्त नहीं करते।एक ऊष्माजनक ऐरॉइड स्पैडिक्स से पृथक माइटोकॉन्ड्रिया सायनाइड की उपस्थिति में O₂ का उपभोग करते रहते हैं, पर सैलिसिलहाइड्रॉक्सैमिक अम्ल (SHAM) भी मिलाने पर O₂ अवशोषण रुक जाता है। सबसे अच्छी व्याख्या यह है कि
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उत्तर: D — एक वैकल्पिक ऑक्सीडेज़ इलेक्ट्रॉनों को यूबिक्विनॉल से O₂ तक ले जाता है, संकुल IV को बायपास करते हुए, और SHAM इसका संदमन करता है
पादप माइटोकॉन्ड्रिया में एक वैकल्पिक ऑक्सीडेज़ होता है जो इलेक्ट्रॉनों को यूबिक्विनॉल से सीधे O₂ तक ले जाता है, संकुल III व IV को बायपास करता है और कोई प्रोटॉन पंप नहीं करता, अतः ऊर्जा ऊष्मा के रूप में प्रकट होती है। यह सायनाइड-प्रतिरोधी व SHAM-संवेदी है, जो ठीक प्रेक्षित प्रतिरूप है। संकुल IV सभी पादपों में सायनाइड-संवेदी है; अयुग्मक प्रोटीन इलेक्ट्रॉन नहीं, प्रोटॉन ले जाता है; और टाइप II डिहाइड्रोजिनेज़ O₂ को नहीं, यूबिक्विनोन को अपचित करते हैं।प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाश अभिक्रियाओं के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — DCMU, Q_A से Q_B तक इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण रोकता है, अतः प्रकाश अवशोषित होते रहने पर भी O₂ विमोचन रुक जाता है; C — दो जल अणुओं के ऑक्सीकरण से एक O₂ और थायलाकॉइड ल्यूमेन में चार प्रोटॉन मुक्त होते हैं
DCMU प्रकाशतंत्र II के Q_B स्थल से बंधता है, अतः इलेक्ट्रॉन PSII से बाहर नहीं जा सकते और जल का ऑक्सीकरण रुक जाता है। ऑक्सीजन-विमोचक संकुल 2H₂O को O₂ में ऑक्सीकृत करता है, जिससे ल्यूमेन में 4H⁺ और 4e⁻ मुक्त होते हैं। चक्रीय प्रवाह इलेक्ट्रॉनों को फ़ेरेडॉक्सिन से प्लास्टोक्विनोन में लौटाता है, अतः ATP बनाता है पर NADPH नहीं। वितरण उलटा है: PSII सटे हुए ग्रैना में समृद्ध है, जबकि PSI व ATP सिंथेज़ स्ट्रोमा पटलिकाओं व ग्रैना-किनारों पर होते हैं।एक तैल-समृद्ध प्रजाति के अंकुरित होते बीजों का श्वसन गुणांक 1 से काफ़ी कम है। क्यों?
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उत्तर: A — वसा में कार्बोहाइड्रेट की तुलना में ऑक्सीजन कम होती है, अतः प्रति मुक्त CO₂ अधिक O₂ उपभुक्त होती है
RQ = मुक्त CO₂ ÷ उपभुक्त O₂। वसा अत्यधिक अपचित होती हैं, अतः उनके ऑक्सीकरण में हाइड्रोजन हेतु अतिरिक्त O₂ लगती है: ट्राइपामिटिन 72.5 O₂ पर 51 CO₂ देता है, RQ लगभग 0.7। कार्बनिक अम्ल व किण्वन दोनों RQ को 1 से ऊपर ले जाते हैं, जो प्रेक्षण का उलटा है, और वैकल्पिक ऑक्सीडेज़ O₂ को जल में अपचित करता है, CO₂ नहीं बनाता।