नाइट्रोजन उपापचय, प्रकाश-संश्लेषण व केल्विन चक्र, तथा उपापचयी विकार
2. अमीनो अम्ल अपचय व यूरिया चक्र
अधिकांश अमीनो अम्ल α-कीटोग्लूटेरेट को पारऐमीनन (transamination) द्वारा अपना α-अमीनो समूह देते हैं, जिससे ग्लूटामेट व संगत α-कीटो अम्ल बनते हैं। ऐमीनोट्रांसफ़रेज़ विटामिन B₆ से बना पिरिडॉक्सल फ़ॉस्फ़ेट (PLP) उपयोग करते हैं: अमीनो अम्ल PLP से शिफ़ क्षार बनाता है, अमीनो समूह पिरिडॉक्सामीन फ़ॉस्फ़ेट के रूप में सहकारक पर रहता है, और फिर ग्राही कीटो अम्ल को सौंपा जाता है (पिंग-पॉन्ग क्रियाविधि)। क्षतिग्रस्त कोशिकाओं से सीरम में ALT (ऐलानिन ऐमीनोट्रांसफ़रेज़) व AST (ऐस्पार्टेट ऐमीनोट्रांसफ़रेज़) रिसते हैं; ALT यकृत का अधिक विशिष्ट सूचक है। फिर यकृत के माइटोकॉन्ड्रिया में ग्लूटामेट डिहाइड्रोजिनेज़ (NAD⁺ या NADP⁺) ग्लूटामेट का ऑक्सीकरणी विऐमीनन करता है, NH₄⁺ मुक्त करता है, और GTP से संदमित व ADP से सक्रिय होता है। पेशी अपना नाइट्रोजन ऐलानिन के रूप में और, अधिकांश ऊतकों की तरह, ग्लूटामीन के रूप में बाहर भेजती है।
कार्बन ढाँचे पाइरुवेट या TCA मध्यवर्ती (ग्लूकोजनिक) अथवा ऐसीटिल-CoA व ऐसीटोऐसीटेट (कीटोजनिक) बनते हैं। ल्यूसीन व लाइसीन केवल कीटोजनिक हैं; आइसोल्यूसीन, फ़िनाइलऐलानिन, टायरोसीन व ट्रिप्टोफ़ैन दोनों हैं। यकृत का यूरिया चक्र दो कक्षों में फैला है:
- मैट्रिक्स: कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट सिंथेटेज़ I (CPS I) NH₄⁺, HCO₃⁻ व 2 ATP से कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट बनाता है। यह अपने अपरस्थानिक सक्रियक N-ऐसीटिलग्लूटामेट के बिना निष्क्रिय है, जिसका संश्लेषण आर्जिनीन उत्तेजित करता है, अतः प्रोटीन-समृद्ध भोजन चक्र को तेज़ करता है।
- मैट्रिक्स: ऑर्निथीन ट्रांसकार्बामॉयलेज़ (OTC) कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट को ऑर्निथीन से जोड़कर सिट्रुलीन बनाता है, जो कोशिकाद्रव्य में जाता है।
- कोशिकाद्रव्य: आर्जिनिनोसक्सिनेट सिंथेटेज़ ATP → AMP + PPi का उपयोग कर सिट्रुलीन को ऐस्पार्टेट से संघनित करता है, जो दूसरे नाइट्रोजन का स्रोत है।
- कोशिकाद्रव्य: आर्जिनिनोसक्सिनेट लायेज़ आर्जिनीन व फ्यूमरेट मुक्त करता है, और आर्जिनेज़ आर्जिनीन को यूरिया व ऑर्निथीन में जल-अपघटित करता है; ऑर्निथीन मैट्रिक्स में लौटता है।
प्रत्येक यूरिया की लागत 3 ATP पर 4 उच्च-ऊर्जा फ़ॉस्फ़ेट बंध है। फ्यूमरेट यूरिया चक्र को TCA चक्र से जोड़ता है: फ्यूमरेट → मैलेट → ऑक्सैलोऐसीटेट एक NADH देता है, और ऑक्सैलोऐसीटेट पारऐमीनन से फिर ऐस्पार्टेट बनता है, जिससे लागत का कुछ भाग पूरा हो जाता है।
3. न्यूक्लियोटाइड उपापचय: नवसंश्लेषण, पुनर्प्राप्ति व अपघटन
दोनों कुलों को PRPP (5-फ़ॉस्फ़ोराइबोसिल-1-पायरोफ़ॉस्फ़ेट) चाहिए, जो राइबोज़-5-फ़ॉस्फ़ेट व ATP से बनता है। प्यूरीन शर्करा पर ही बनाए जाते हैं: ग्लूटामीन-PRPP ऐमिडोट्रांसफ़रेज़, जो AMP, GMP व IMP से संदमित प्रतिबद्ध चरण है, पहला नाइट्रोजन जोड़ता है, और वलय परमाणु-दर-परमाणु जुड़कर IMP बनता है। IMP से AMP (GTP उपयोग कर) व GMP (ATP उपयोग कर) की शाखाएँ निकलती हैं, यह पारस्परिक व्यवस्था दोनों को संतुलित रखती है। पिरिमिडीन में पहले वलय बनता है और बाद में जुड़ता है: कोशिकाद्रव्यी CPS II (ग्लूटामीन से) का कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट ऐस्पार्टेट से संघनित होता है (ऐस्पार्टेट ट्रांसकार्बामॉयलेज़, ATCase); वलय बंद होकर ओरोटेट में ऑक्सीकृत होता है, जो PRPP से जुड़कर (OMP) विकार्बोक्सिलीकरण से UMP बनता है। UTP के ऐमीनन से CTP बनता है। E. coli में ATCase नियंत्रण-बिंदु है, जो CTP से संदमित व ATP से सक्रिय होता है; जंतुओं में CPS II।
| वलय परमाणु | स्रोत |
|---|---|
| प्यूरीन N-1 | ऐस्पार्टेट (अमीनो समूह) |
| प्यूरीन C-2 व C-8 | N¹⁰-फ़ॉर्मिलटेट्राहाइड्रोफ़ोलेट |
| प्यूरीन N-3 व N-9 | ग्लूटामीन (ऐमाइड नाइट्रोजन) |
| प्यूरीन C-4, C-5 व N-7 | ग्लाइसीन (पूरा अणु) |
| प्यूरीन C-6 | CO₂ (HCO₃⁻ के रूप में) |
| पिरिमिडीन N-1, C-4, C-5 व C-6 | ऐस्पार्टेट |
| पिरिमिडीन C-2 व N-3 | कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट (HCO₃⁻ व ग्लूटामीन) |
राइबोन्यूक्लियोटाइड रिडक्टेज़ NDP को dNDP में बदलता है और अपरस्थानिक रूप से ऐसा समायोजित है कि चारों dNTP संतुलन में बनें (dATP समग्र सक्रियता बंद कर देता है)। थाइमिडिलेट सिंथेज़ N⁵,N¹⁰-मेथिलीन-टेट्राहाइड्रोफ़ोलेट से dUMP का मेथिलीकरण कर dTMP बनाता है, और फ़ोलेट डाइहाइड्रोफ़ोलेट में ऑक्सीकृत होता है; डाइहाइड्रोफ़ोलेट रिडक्टेज़ (DHFR) टेट्राहाइड्रोफ़ोलेट पुनर्जनित करता है। ये औषधि-लक्ष्य हैं: 5-फ़्लोरोयूरेसिल (FdUMP के रूप में) थाइमिडिलेट सिंथेज़ को निष्क्रिय करता है, मेथोट्रेक्सेट DHFR को, ट्राइमेथोप्रिम जीवाणु DHFR को और हाइड्रॉक्सीयूरिया राइबोन्यूक्लियोटाइड रिडक्टेज़ को संदमित करता है। पुनर्प्राप्ति (salvage) मुक्त क्षारकों को सस्ते में पुनः उपयोग करती है: HGPRT हाइपोज़ैन्थीन व ग्वानीन को (PRPP सहित) IMP व GMP में बदलता है, और APRT ऐडिनीन हेतु यही करता है। प्यूरीन यूरिक अम्ल तक अपघटित होते हैं (ज़ैन्थीन ऑक्सीडेज़ हाइपोज़ैन्थीन को ज़ैन्थीन व ज़ैन्थीन को यूरेट में बदलता है), क्योंकि मनुष्य में यूरेट ऑक्सीडेज़ नहीं है; पिरिमिडीन घुलनशील β-ऐलानिन व β-ऐमीनोआइसोब्यूटिरेट देते हैं।
- गाउट: अतिउत्पादन या अल्प-उत्सर्जन से जोड़ों में यूरेट क्रिस्टल; ऐलोप्यूरिनॉल ज़ैन्थीन ऑक्सीडेज़ को संदमित करता है।
- लेश–नाइहन सिंड्रोम: X-सहलग्न HGPRT की कमी। अप्रयुक्त PRPP संचित होता है और पुनर्प्राप्ति-उत्पाद अब प्रतिपुष्टि नहीं देते, अतः नवसंश्लेषण व यूरिक अम्ल बढ़ते हैं; अतियूरिसीमिया के साथ आत्म-क्षति व डिस्टोनिया होते हैं।
- ऐडिनोसीन डीऐमिनेज़ की कमी: लसीकाणुओं में dATP संचित होकर राइबोन्यूक्लियोटाइड रिडक्टेज़ को संदमित करता है, जिससे गंभीर संयुक्त प्रतिरक्षा-न्यूनता होती है।
- आनुवंशिक ओरोटिक ऐसिडूरिया: UMP सिंथेज़ की कमी; मेगालोब्लास्टिक रक्ताल्पता जो B₁₂ या फ़ोलेट से ठीक नहीं होती, यूरिडीन से उपचार।
4. प्रकाश-संश्लेषण: प्रकाश अभिक्रियाएँ व प्रकाश-फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण
थायलाकॉइड झिल्ली में दो फ़ोटोसिस्टम श्रेणी में लगे हैं (Z योजना)। फ़ोटोसिस्टम II (अभिक्रिया केंद्र P680) प्रकाश से अपने ऑक्सीजन-मुक्तिकारी Mn₄CaO₅ गुच्छ पर जल से इलेक्ट्रॉन लेता है: 2 H₂O → O₂ + 4 H⁺ + 4 e⁻, और प्रोटॉन ल्यूमेन में मुक्त होते हैं। इलेक्ट्रॉन फ़ीयोफ़ाइटिन व क्विनोन QA व QB से होकर प्लास्टोक्विनोन पूल में, फिर साइटोक्रोम b₆f संकुल से, जो और प्रोटॉन ल्यूमेन में भेजता है, ताम्र-प्रोटीन प्लास्टोसायनिन तक जाते हैं। फ़ोटोसिस्टम I (P700) उन्हें फिर ऊर्जित कर फ़ेरेडॉक्सिन के माध्यम से फ़ेरेडॉक्सिन–NADP⁺ रिडक्टेज़ को देता है, जो स्ट्रोमा में NADPH बनाता है।
प्रकाश-फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण रसोपरासरणी है, ऑक्सीकरणी फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण जैसा पर उलटी दिशा-व्यवस्था के साथ: प्रोटॉन थायलाकॉइड ल्यूमेन में संचित होते हैं और CF₀CF₁ ATP सिंथेज़ से, जिसका शीर्ष स्ट्रोमा की ओर है, बाहर स्ट्रोमा में बहते हैं। अचक्रीय प्रवाह (जल से NADP⁺ तक) में दोनों फ़ोटोसिस्टम कार्य करते हैं और ATP, NADPH व O₂ बनते हैं। चक्रीय प्रवाह में फ़ेरेडॉक्सिन इलेक्ट्रॉनों को साइटोक्रोम b₆f संकुल से होकर वापस P700 तक लौटाता है; केवल फ़ोटोसिस्टम I कार्य करता है, और ATP बनता है पर NADPH व O₂ नहीं। चक्रीय प्रवाह ATP की पूर्ति करता है, क्योंकि केल्विन चक्र को प्रत्येक 2 NADPH पर 3 ATP चाहिए।
- एमर्सन वर्धन: केवल सुदूर-लाल प्रकाश (680 nm से आगे) प्रकाश-संश्लेषण को दुर्बल रूप से चलाता है (लाल पतन), पर छोटी तरंगदैर्घ्य का लाल प्रकाश जोड़ने पर दर दोनों किरणपुंजों की अलग-अलग दरों के योग से अधिक हो जाती है, जिससे सिद्ध होता है कि दो फ़ोटोसिस्टम श्रेणी में कार्य करते हैं।
- जैगनडॉर्फ़ का अम्ल-स्नान प्रयोग: अंधेरे में pH 4 पर संतुलित थायलाकॉइड को ADP व Pi सहित pH 8 में डालने पर बिना प्रकाश ATP बना, जिससे सिद्ध हुआ कि केवल प्रोटॉन प्रवणता ATP संश्लेषण चला सकती है।
- DCMU (डाइयूरॉन) फ़ोटोसिस्टम II के QB स्थल को घेरकर O₂ मुक्ति व NADP⁺ अपचयन रोकता है, जबकि फ़ोटोसिस्टम I के चारों ओर चक्रीय प्रवाह जारी रहता है। पैराक्वाट फ़ोटोसिस्टम I से इलेक्ट्रॉनों को O₂ की ओर मोड़कर हानिकारक सुपरऑक्साइड बनाता है।
- क्वांटम आवश्यकता: एक इलेक्ट्रॉन को जल से NADP⁺ तक ले जाने में दो फ़ोटॉन लगते हैं, प्रत्येक फ़ोटोसिस्टम पर एक, अतः एक O₂ (4 e⁻) मुक्त करने हेतु कम से कम 8 फ़ोटॉन चाहिए।
5. केल्विन चक्र व उसका नियमन
स्ट्रोमा में केल्विन चक्र के तीन चरण हैं। कार्बोक्सिलीकरण: रुबिस्को (राइबुलोज़-1,5-बिसफ़ॉस्फ़ेट कार्बोक्सिलेज़/ऑक्सीजिनेज़) राइबुलोज़-1,5-बिसफ़ॉस्फ़ेट (RuBP) में CO₂ जोड़कर दो 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट बनाता है; Chlorella पर केल्विन के ¹⁴CO₂ स्पंद-प्रयोगों में पहला स्थायी उत्पाद 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट मिला, जिसका कार्बोक्सिल कार्बन चिह्नित था। अपचयन: फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट काइनेज़ व NADPH-निर्भर ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट डिहाइड्रोजिनेज़ प्रति CO₂ 2 ATP व 2 NADPH उपयोग कर 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट को ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट में बदलते हैं। पुनर्जनन: ऐल्डोलेज़, ट्रांसकीटोलेज़, सेडोहेप्टुलोज़-1,7-बिसफ़ॉस्फ़ेटेज़ व फ्रक्टोज़-1,6-बिसफ़ॉस्फ़ेटेज़ पाँच ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट को तीन पेन्टोज़ में पुनर्व्यवस्थित करते हैं, और फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ RuBP पुनः बनाने हेतु प्रति CO₂ एक और ATP व्यय करता है।
| निर्गत | स्थिर CO₂ | ATP | NADPH |
|---|---|---|---|
| प्रति CO₂ | 1 | 3 | 2 |
| निर्यातित एक ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट | 3 | 9 | 6 |
| एक हेक्सोज़ | 6 | 18 | 12 |
प्रकाश चक्र को कई प्रकार से चालू करता है। ल्यूमेन में प्रोटॉन पंपन स्ट्रोमा का pH लगभग 7 से लगभग 8 कर देता है, और बदले में Mg²⁺ स्ट्रोमा में आता है; दोनों रुबिस्को व फ्रक्टोज़-1,6-बिसफ़ॉस्फ़ेटेज़ को सक्रिय करते हैं। अपचयित फ़ेरेडॉक्सिन थायोरिडॉक्सिन को अपचयित करता है, जो नियामक डाइसल्फ़ाइड बंध तोड़कर फ्रक्टोज़-1,6-बिसफ़ॉस्फ़ेटेज़, सेडोहेप्टुलोज़-1,7-बिसफ़ॉस्फ़ेटेज़ व फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ को सक्रिय करता है। रुबिस्को का स्वयं कार्बामिलीकरण आवश्यक है: अधःस्तर से भिन्न एक CO₂ अणु सक्रिय स्थल के एक लाइसीन पर कार्बामेट बनाता है जो फिर Mg²⁺ बाँधता है, और रुबिस्को ऐक्टिवेज़ ATP उपयोग कर स्थल से संदमक शर्करा-फ़ॉस्फ़ेट हटाता है। अंधेरे में ये एंज़ाइम बंद हो जाते हैं, अतः रात में चक्र शर्करा-विघटन से होड़ नहीं करता।
6. शर्करा, अमीनो अम्ल व लिपिड उपापचय के विकार
गैरॉड की जन्मजात उपापचयी त्रुटियों की अवधारणा, जो पहले ऐल्कैप्टोनूरिया से प्रतिपादित हुई, एक-चरणीय तर्क पर टिकी है: अनुपस्थित एंज़ाइम अपने अधःस्तर को संचित (और पार्श्व मार्गों में प्रवाहित) करता है और अपने उत्पाद की कमी करता है। हर विकार को इसी प्रकार पढ़ें। अधिकांश अलिंगसूत्री अप्रभावी हैं; पारिवारिक अतिकोलेस्ट्रॉलरक्तता प्रभावी है, और OTC की कमी, लेश–नाइहन सिंड्रोम, G6PD की कमी व फ़ैब्री रोग X-सहलग्न हैं। ईंधन-उपापचय का सबसे आम विकार मधुमेह (diabetes mellitus) जन्मजात नहीं, उपार्जित है: इंसुलिन-क्रिया के बिना यकृत रक्त ग्लूकोज़ ऊँचा होते हुए भी उपवास जैसा व्यवहार करता है, वसा-अपघटन उसे वसा-अम्लों से भर देता है, और टाइप 1 मधुमेह में कीटोन काय कीटोऐसिडोसिस तक संचित हो सकते हैं।
| विकार | दोष | मुख्य परिणाम |
|---|---|---|
| पारंपरिक गैलेक्टोसीमिया | गैलेक्टोज़-1-फ़ॉस्फ़ेट यूरिडिलिलट्रांसफ़रेज़ | गैलेक्टोज़-1-फ़ॉस्फ़ेट संचित: वमन, यकृत-क्षति, मोतियाबिंद (गैलेक्टिटॉल), बौद्धिक अक्षमता; आहार से गैलेक्टोज़ हटाएँ |
| आनुवंशिक फ्रक्टोज़ असहिष्णुता | ऐल्डोलेज़ B | फ्रक्टोज़-1-फ़ॉस्फ़ेट Pi को फँसाता है, ATP घटता है, ग्लाइकोजन-विघटन व ग्लूकोनियोजेनेसिस रुकते हैं: फ्रक्टोज़ या सुक्रोज़ के बाद अल्पग्लूकोज़रक्तता |
| अनिवार्य फ्रक्टोसूरिया | फ्रक्टोकाइनेज़ | मूत्र में फ्रक्टोज़; हानिरहित |
| लैक्टोज़ असहिष्णुता | आंत्र लैक्टेज़ (दूध छुड़ाने के बाद अनिरंतरता) | बृहदांत्र में किण्वन: अफारा व परासरणी अतिसार |
| वॉन गीर्के रोग (ग्लाइकोजन संचय प्रकार I) | ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेटेज़ | ग्लूकैगॉन से न सुधरने वाली उपवास-अल्पग्लूकोज़रक्तता, बढ़ा यकृत, लैक्टिक ऐसिडोसिस, अतियूरिसीमिया, अतिलिपिडरक्तता |
| पॉम्पे रोग (प्रकार II) | लयनकायी अम्ल α-1,4-ग्लूकोसिडेज़ | लयनकायों में ग्लाइकोजन संचय; हृदपेशी-विकृति व पेशी-दुर्बलता |
| मैकआर्डल रोग (प्रकार V) | पेशी ग्लाइकोजन फ़ॉस्फ़ोरिलेज़ | व्यायाम में ऐंठन व मायोग्लोबिनूरिया; व्यायाम पर रक्त लैक्टेट नहीं बढ़ता |
| विकार | दोष | मुख्य परिणाम |
|---|---|---|
| फ़ीनाइलकीटोनूरिया | फ़िनाइलऐलानिन हाइड्रॉक्सिलेज़, या उसका सहकारक टेट्राहाइड्रोबायोप्टेरिन | फ़िनाइलऐलानिन व फ़िनाइलपाइरुवेट संचित, टायरोसीन आवश्यक हो जाता है; शैशव से निम्न-फ़िनाइलऐलानिन आहार न हो तो बौद्धिक अक्षमता; नवजात जाँच से पहचान |
| ऐल्कैप्टोनूरिया | होमोजेन्टिसेट ऑक्सीडेज़ (होमोजेन्टिसेट 1,2-डाइऑक्सीजिनेज़) | रखा मूत्र काला पड़ता है; वयस्कों में ओक्रोनोसिस व संधिशोथ |
| नेत्रत्वचीय ऐल्बिनिज़्म प्रकार 1 | टायरोसिनेज़ | त्वचा, बाल व नेत्रों में मेलानिन नहीं |
| मेपल सिरप मूत्र रोग | शाखित-शृंखला α-कीटो अम्ल डिहाइड्रोजिनेज़ | ल्यूसीन, आइसोल्यूसीन, वैलीन व उनके कीटो अम्ल संचित; मीठी गंध वाला मूत्र, मस्तिष्क-विकृति |
| पारंपरिक होमोसिस्टिनूरिया | सिस्टाथायोनीन β-सिंथेज़ (PLP चाहिए) | होमोसिस्टीन व मेथियोनीन बढ़ते हैं; लेंस-विस्थापन, घनास्त्रता; कुछ रूप विटामिन B₆ से सुधरते हैं |
| पारिवारिक अतिकोलेस्ट्रॉलरक्तता | LDL ग्राही | जन्म से ऊँचा LDL कोलेस्ट्रॉल, ज़ैन्थोमा, शीघ्र हृद्धमनी रोग; स्टैटिन HMG-CoA रिडक्टेज़ संदमित करते हैं |
| लाइपोप्रोटीन लाइपेज़ की कमी | लाइपोप्रोटीन लाइपेज़ (या उसका सक्रियक apoC-II) | काइलोमाइक्रॉन व ट्राइऐसिलग्लिसरॉल अत्यधिक; अग्न्याशयशोथ, उद्भेदी ज़ैन्थोमा |
| MCAD की कमी | मध्यम-शृंखला ऐसिल-CoA डिहाइड्रोजिनेज़ | उपवास पर अल्पकीटोनी अल्पग्लूकोज़रक्तता; उपवास से बचें |
| टे–सैक्स रोग | हेक्सोसैमिनिडेज़ A | तंत्रिकाकोशिकाओं में GM2 गैंग्लियोसाइड; तंत्रिका-अपह्रास, चेरी-लाल मैक्युला |
| गौशे रोग | β-ग्लूकोसेरेब्रोसिडेज़ | महाभक्षकाणुओं में ग्लूकोसेरेब्रोसाइड; बढ़े यकृत व प्लीहा, अस्थि-रोग; एंज़ाइम-प्रतिस्थापन उपलब्ध |
| फ़ैब्री रोग | α-गैलेक्टोसिडेज़ A (X-सहलग्न) | ग्लोबोट्राइयोसिलसेरामाइड संचय; पीड़ादायी तंत्रिकाविकृति, वृक्क-विफलता |
मुख्य बिंदु
- नाइट्रोजिनेज़: N₂ + 8 H⁺ + 8 e⁻ + 16 ATP → 2 NH₃ + H₂; यह O₂-संवेदी है और लेगहीमोग्लोबिन, हेटरोसिस्ट या तीव्र श्वसन से सुरक्षित रहता है; दुर्लभ अमोनियम का स्वांगीकरण GS–GOGAT करते हैं।
- पारऐमीनन (PLP) अमीनो समूहों को ग्लूटामेट तक पहुँचाता है और ग्लूटामेट डिहाइड्रोजिनेज़ NH₄⁺ मुक्त करता है; यूरिया एक N को NH₄⁺ से CPS I (जिसे N-ऐसीटिलग्लूटामेट चाहिए) के माध्यम से और एक ऐस्पार्टेट से लेता है, 4 उच्च-ऊर्जा फ़ॉस्फ़ेट की लागत पर। ओरोटिक ऐसिडूरिया OTC की कमी को CPS I की कमी से अलग करता है।
- प्यूरीन PRPP पर IMP तक बनते हैं (वलय-परमाणु ग्लाइसीन, ग्लूटामीन, ऐस्पार्टेट, फ़ॉर्मिल-THF व CO₂ से); पिरिमिडीन ओरोटेट के रूप में बनकर फिर PRPP से जुड़ते हैं। HGPRT की हानि लेश–नाइहन सिंड्रोम कराती है; DHFR, थाइमिडिलेट सिंथेज़ व ज़ैन्थीन ऑक्सीडेज़ औषधि-लक्ष्य हैं।
- अचक्रीय प्रवाह ATP, NADPH व O₂ बनाता है (प्रति O₂ कम से कम 8 फ़ोटॉन); फ़ोटोसिस्टम I के चारों ओर चक्रीय प्रवाह केवल ATP बनाता है; DCMU फ़ोटोसिस्टम II को रोकता है; केवल प्रोटॉन प्रवणता ATP संश्लेषण चला सकती है।
- केल्विन चक्र प्रति CO₂ 3 ATP व 2 NADPH उपयोग करता है (प्रति ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट 9 व 6, प्रति हेक्सोज़ 18 व 12); प्रकाश उसे स्ट्रोमा के pH व Mg²⁺, थायोरिडॉक्सिन तथा रुबिस्को कार्बामिलीकरण से सक्रिय करता है; ऑक्सीजनीकरण प्रकाश-श्वसन कराता है।
- हर जन्मजात त्रुटि को अधःस्तर ऊपर, उत्पाद नीचे के रूप में पढ़ें: गैलेक्टोसीमिया, फ्रक्टोज़ असहिष्णुता, वॉन गीर्के, मैकआर्डल, फ़ीनाइलकीटोनूरिया, ऐल्कैप्टोनूरिया, मेपल सिरप मूत्र रोग, यूरिया-चक्र दोष, पारिवारिक अतिकोलेस्ट्रॉलरक्तता व स्फ़िंगोलिपिडोसिस।
अभ्यास प्रश्न (18)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
फलीदार पौधों की मूल-ग्रंथिकाओं में लेगहीमोग्लोबिन की भूमिका क्या है?
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उत्तर: C — यह O₂ को कसकर बाँधता है, मुक्त O₂ को कम रखते हुए बैक्टीरॉइड के श्वसन को आपूर्ति देता है
O₂ नाइट्रोजिनेज़ को अनुत्क्रमणीय रूप से निष्क्रिय करती है, फिर भी बैक्टीरॉइड को उस श्वसन हेतु O₂ चाहिए जो नाइट्रोजिनेज़ द्वारा व्यय ATP की आपूर्ति करता है। अत्यधिक O₂ बंधुता वाला लेगहीमोग्लोबिन मुक्त O₂ को निम्न सांद्रता पर स्थिर रखता है और उसे बैक्टीरॉइड के अंतस्थ ऑक्सीडेज़ों तक पहुँचाता है। Fe प्रोटीन तक इलेक्ट्रॉन फ़ेरेडॉक्सिन या फ़्लेवोडॉक्सिन से आते हैं, और FeMo सहकारक MoFe प्रोटीन का भाग है, किसी ग्लोबिन का नहीं।अमोनियम दुर्लभ होने पर जीवाणु व पौधे उसका स्वांगीकरण मुख्यतः ग्लूटामेट डिहाइड्रोजिनेज़ के बजाय ग्लूटामीन सिंथेटेज़ व ग्लूटामेट सिंथेज़ (GOGAT) से करते हैं। क्यों?
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उत्तर: B — ग्लूटामीन सिंथेटेज़ की NH₄⁺ हेतु बंधुता कहीं अधिक है, और उसका ATP जल-अपघटन निम्न सांद्रता पर स्वांगीकरण चलाता है
GS ग्लूटामेट के ऐमिडीकरण को ATP जल-अपघटन से युग्मित करता है और NH₄⁺ हेतु उसका Km निम्न है, अतः वह निम्न सांद्रता पर भी अमोनियम पकड़ लेता है; फिर GOGAT ऐमाइड नाइट्रोजन को α-कीटोग्लूटेरेट पर ले जाकर दो ग्लूटामेट बनाता है। ग्लूटामेट डिहाइड्रोजिनेज़ उत्क्रमणीय है और α-कीटोग्लूटेरेट का ऐमीनन कर सकता है, पर NH₄⁺ हेतु उच्च Km के कारण केवल प्रचुर अमोनियम पर प्रभावी है। GS NADPH नहीं, ATP उपयोग करता है, और कोई भी एंज़ाइम N₂ पर कार्य नहीं करता।सभी ऐमीनोट्रांसफ़रेज़ों को पिरिडॉक्सल फ़ॉस्फ़ेट चाहिए। अभिक्रिया में यह सहकारक क्या करता है?
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उत्तर: D — यह अमीनो अम्ल से शिफ़ क्षार बनाता है और अमीनो समूह को पिरिडॉक्सामीन फ़ॉस्फ़ेट के रूप में रखता है
PLP का ऐल्डिहाइड आने वाले अमीनो अम्ल से शिफ़ क्षार बनाता है; पिरिडीन वलय इलेक्ट्रॉन-अवशोषक का कार्य करता है, अमीनो समूह पिरिडॉक्सामीन फ़ॉस्फ़ेट के रूप में सहकारक पर रहता है और α-कीटो अम्ल निकल जाता है। पिंग-पॉन्ग अभिक्रिया के दूसरे भाग में अमीनो समूह ग्राही कीटो अम्ल, प्रायः α-कीटोग्लूटेरेट, को दिया जाता है। पारऐमीनन मुक्त NH₄⁺ नहीं छोड़ता; वह ग्लूटामेट डिहाइड्रोजिनेज़ के NAD⁺-निर्भर ऑक्सीकरणी विऐमीनन में होता है, जिसका वर्णन एक भ्रामक विकल्प करता है। एक-कार्बन स्थानांतरण टेट्राहाइड्रोफ़ोलेट का कार्य है।दो नवजातों में निम्न प्लाज़्मा सिट्रुलीन के साथ अतिअमोनियारक्तता है। एक के मूत्र में ओरोटिक अम्ल की बड़ी मात्रा है; दूसरे के नहीं। ओरोटिक ऐसिडूरिया वाले शिशु में किस एंज़ाइम की कमी सर्वाधिक संभावित है?
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उत्तर: A — ऑर्निथीन ट्रांसकार्बामॉयलेज़, क्योंकि अप्रयुक्त कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट कोशिकाद्रव्य में रिसकर पिरिमिडीन संश्लेषण में जाता है
निम्न सिट्रुलीन अवरोध को सिट्रुलीन बनने से पहले रखता है: CPS I या OTC। OTC की कमी में कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट बनता तो है पर ऑर्निथीन से अभिक्रिया नहीं कर पाता; वह कोशिकाद्रव्य में बह जाता है, जहाँ ऐस्पार्टेट ट्रांसकार्बामॉयलेज़ उसे उपयोग करता है, अतः ओरोटेट का अतिउत्पादन होता है। CPS I की कमी में कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट बनता ही नहीं, अतः ओरोटिक ऐसिडूरिया नहीं होता: वह दूसरा शिशु है। आर्जिनिनोसक्सिनेट सिंथेटेज़ की कमी सिट्रुलीन बढ़ाती है और आर्जिनेज़ की कमी आर्जिनीन, अतः दोनों मेल नहीं खाते।यूरिया चक्र के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — N-ऐसीटिलग्लूटामेट कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट सिंथेटेज़ I का अनिवार्य अपरस्थानिक सक्रियक है; C — आर्जिनिनोसक्सिनेट सिंथेटेज़ ATP को AMP व पायरोफ़ॉस्फ़ेट में तोड़ता है
N-ऐसीटिलग्लूटामेट के बिना CPS I लगभग निष्क्रिय है, और उसका संश्लेषण आर्जिनीन उत्तेजित करता है। आर्जिनिनोसक्सिनेट सिंथेटेज़ सिट्रुलीन को सिट्रुलिल-AMP मध्यवर्ती के रूप में सक्रिय कर PPi मुक्त करता है, जो जल-अपघटित होता है, अतः यह चरण दो उच्च-ऊर्जा बंधों का पड़ता है। यूरिया का एक नाइट्रोजन कार्बामॉयल फ़ॉस्फ़ेट के माध्यम से NH₄⁺ से और दूसरा ऐस्पार्टेट से आता है। OTC माइटोकॉन्ड्रियल है, पर आर्जिनेज़ कोशिकाद्रव्य में कार्य करता है।मेथोट्रेक्सेट तेज़ी से विभाजित होती कैंसर कोशिकाओं के विरुद्ध प्रयुक्त होता है। इसकी मुख्य क्रिया है
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उत्तर: A — डाइहाइड्रोफ़ोलेट रिडक्टेज़ को संदमित करना, जिससे थाइमिडिलेट संश्लेषण के बाद टेट्राहाइड्रोफ़ोलेट पुनर्जनित नहीं होता
dTMP बनाते समय थाइमिडिलेट सिंथेज़ N⁵,N¹⁰-मेथिलीन-टेट्राहाइड्रोफ़ोलेट को डाइहाइड्रोफ़ोलेट में ऑक्सीकृत करता है, और डाइहाइड्रोफ़ोलेट रिडक्टेज़ को उसे वापस अपचयित करना होता है। फ़ोलेट-अनुरूप मेथोट्रेक्सेट DHFR से अत्यंत दृढ़ता से बंधता है, अतः टेट्राहाइड्रोफ़ोलेट समाप्त हो जाता है और विभाजित कोशिकाओं में dTMP व प्यूरीन संश्लेषण रुक जाता है। फ़्लोरीनयुक्त न्यूक्लियोटाइड 5-फ़्लोरोयूरेसिल (FdUMP) का, मूलक-अपमार्जन हाइड्रॉक्सीयूरिया का वर्णन है, और ज़ैन्थीन ऑक्सीडेज़ ऐलोप्यूरिनॉल का लक्ष्य है।आत्म-क्षति के व्यवहार व गाउटी संधिशोथ वाले एक बालक का सीरम यूरिक अम्ल बढ़ा हुआ है। उसकी संवर्धित कोशिकाओं में PRPP ऊँचा है और प्यूरीन नवसंश्लेषण की दर बढ़ी हुई है। कौन-सा दोष इन सभी निष्कर्षों की सर्वोत्तम व्याख्या करता है?
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उत्तर: C — हाइपोज़ैन्थीन-ग्वानीन फ़ॉस्फ़ोराइबोसिलट्रांसफ़रेज़ की कमी, जिससे पुनर्प्राप्ति अब PRPP का उपभोग नहीं करती
HGPRT सामान्यतः हाइपोज़ैन्थीन व ग्वानीन की पुनर्प्राप्ति हेतु PRPP उपयोग करता है। इसके न होने पर PRPP संचित होकर ग्लूटामीन-PRPP ऐमिडोट्रांसफ़रेज़ को उत्तेजित करता है, जबकि प्रतिपुष्टि हेतु IMP व GMP कम उपलब्ध होते हैं; नवसंश्लेषण बढ़ता है और अतिरिक्त प्यूरीन यूरिक अम्ल तक अपघटित होते हैं। ज़ैन्थीन ऑक्सीडेज़ की हानि यूरिक अम्ल घटाती, ADA की कमी अतियूरिसीमिया के बिना प्रतिरक्षा-न्यूनता कराती है, और निष्क्रिय PRPP सिंथेटेज़ PRPP घटाता, जो प्राप्त निष्कर्ष के विपरीत है।कौन-सा इलेक्ट्रॉन वाहक साइटोक्रोम b₆f संकुल से फ़ोटोसिस्टम I तक इलेक्ट्रॉन पहुँचाता है?
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उत्तर: D — प्लास्टोसायनिन, थायलाकॉइड ल्यूमेन का एक ताम्र-प्रोटीन
छोटा ताम्र-प्रोटीन प्लास्टोसायनिन ल्यूमेन में b₆f संकुल के साइटोक्रोम f से P700⁺ तक इलेक्ट्रॉन ढोता है। प्लास्टोक्विनोन फ़ोटोसिस्टम II से b₆f संकुल तक इलेक्ट्रॉन ले जाता है, फ़ीयोफ़ाइटिन फ़ोटोसिस्टम II के भीतर प्राथमिक ग्राही है, और फ़ेरेडॉक्सिन फ़ोटोसिस्टम I के आगे स्ट्रोमा की ओर है।ADP, Pi व NADP⁺ सहित प्रकाशित हरितलवकों को DCMU से उपचारित किया जाता है। कौन-सा प्रेक्षण अपेक्षित है?
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उत्तर: B — O₂ मुक्ति व NADP⁺ अपचयन रुकते हैं, पर चक्रीय प्रकाश-फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण फिर भी ATP बना सकता है
DCMU फ़ोटोसिस्टम II के D1 प्रोटीन के QB स्थल से बंधकर प्लास्टोक्विनोन तक इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण रोकता है। अतः जल से अचक्रीय प्रवाह रुक जाता है, और उसके साथ O₂ मुक्ति व NADPH निर्माण भी। फ़ोटोसिस्टम I के चारों ओर चक्रीय प्रवाह में फ़ोटोसिस्टम II सम्मिलित नहीं है, अतः वह साइटोक्रोम b₆f संकुल से प्रोटॉन भेजकर फिर भी ATP बना सकता है। DCMU अयुग्मक नहीं है, और फ़ोटोसिस्टम I जल का ऑक्सीकरण नहीं कर सकता।केल्विन चक्र व उसके नियमन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — प्रकाश स्ट्रोमा का pH व Mg²⁺ बढ़ाता है, और दोनों रुबिस्को व फ्रक्टोज़-1,6-बिसफ़ॉस्फ़ेटेज़ को सक्रिय करते हैं; B — प्रकाश में अपचयित थायोरिडॉक्सिन फ्रक्टोज़-1,6-बिसफ़ॉस्फ़ेटेज़, सेडोहेप्टुलोज़-1,7-बिसफ़ॉस्फ़ेटेज़ व फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ को सक्रिय करता है
ल्यूमेन में प्रोटॉन पंपन स्ट्रोमा को क्षारीय (लगभग pH 8) बनाता है, और बदले में Mg²⁺ स्ट्रोमा में आता है; रुबिस्को व स्ट्रोमा का FBPase इन्हीं दशाओं में सर्वश्रेष्ठ कार्य करते हैं। फ़ेरेडॉक्सिन–थायोरिडॉक्सिन रिडक्टेज़ थायोरिडॉक्सिन को अपचयित करता है, जो FBPase, SBPase व फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ के नियामक डाइसल्फ़ाइडों को अपचयित करता है। सक्रियक CO₂ लाइसीन से कार्बामेट बनाकर Mg²⁺ सहित बंधा रहता है, जबकि अलग अधःस्तर CO₂ स्थिर होता है। ऑक्सीजनीकरण एक 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट व एक 2-फ़ॉस्फ़ोग्लाइकोलेट देता है।एक शिशु माँ के दूध पर भली-भाँति बढ़ता है, पर आहार में फलों का रस व सुक्रोज़ जोड़ने के शीघ्र बाद उसे वमन, अल्पग्लूकोज़रक्तता व बढ़ा यकृत हो जाता है। किस एंज़ाइम की कमी सर्वाधिक संभावित है?
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उत्तर: C — ऐल्डोलेज़ B, जो फ्रक्टोज़-1-फ़ॉस्फ़ेट को दो तीन-कार्बन उत्पादों में तोड़ता है
आनुवंशिक फ्रक्टोज़ असहिष्णुता में फ्रक्टोकाइनेज़ फ्रक्टोज़-1-फ़ॉस्फ़ेट बनाता तो है, पर ऐल्डोलेज़ B उसे नहीं तोड़ पाता, अतः फ़ॉस्फ़ेट फँस जाता है, ATP घटता है, और ग्लाइकोजन-विघटन व ग्लूकोनियोजेनेसिस संदमित होते हैं, जिससे फ्रक्टोज़ या सुक्रोज़ के बाद अल्पग्लूकोज़रक्तता होती है। फ्रक्टोकाइनेज़ की कमी (अनिवार्य फ्रक्टोसूरिया) हानिरहित है क्योंकि फ्रक्टोज़ फ़ॉस्फ़ेट के रूप में फँसता ही नहीं। गैलेक्टोसीमिया लैक्टोज़-युक्त माँ के दूध पर ही प्रकट होता, और ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेटेज़ की कमी फ्रक्टोज़ से निरपेक्ष उपवास-अल्पग्लूकोज़रक्तता कराती है।अमीनो अम्ल व लिपिड उपापचय के आनुवंशिक विकारों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — पारंपरिक फ़ीनाइलकीटोनूरिया में टायरोसीन आहार हेतु आवश्यक अमीनो अम्ल बन जाता है; B — ऐल्कैप्टोनूरिया में होमोजेन्टिसेट ऑक्सीडेज़ की कमी होती है और वायु में रखा मूत्र काला पड़ता है; D — टे–सैक्स रोग में हेक्सोसैमिनिडेज़ A की कमी होती है और तंत्रिकाकोशिकाओं में GM2 गैंग्लियोसाइड संचित होता है
फ़िनाइलऐलानिन हाइड्रॉक्सिलेज़ की कमी में फ़िनाइलऐलानिन से टायरोसीन नहीं बनता और उसे आहार से आना पड़ता है। न टूट पाने वाला होमोजेन्टिसेट उत्सर्जित होकर वायु में काले वर्णक में ऑक्सीकृत होता है। हेक्सोसैमिनिडेज़ A GM2 का अंतस्थ N-ऐसीटिलगैलेक्टोसामीन हटाता है, अतः उसके बिना GM2 संचित होता है। मेपल सिरप मूत्र रोग शाखित-शृंखला α-कीटो अम्ल डिहाइड्रोजिनेज़ का दोष है, अतः ल्यूसीन, आइसोल्यूसीन, वैलीन व उनके कीटो अम्ल संचित होते हैं; ऐरोमैटिक अमीनो अम्ल इसमें सम्मिलित नहीं।रोगी X को उपवास-अल्पग्लूकोज़रक्तता, बढ़ा यकृत, लैक्टिक ऐसिडोसिस है और ग्लूकैगॉन के बाद रक्त ग्लूकोज़ नहीं बढ़ता। रोगी Y को व्यायाम में पेशी-ऐंठन होती है, और अरक्तता-युक्त अग्रबाहु व्यायाम परीक्षण में उसका रक्त लैक्टेट नहीं बढ़ता। क्रमशः X व Y की व्याख्या कौन-सी कमियाँ करती हैं?
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उत्तर: D — X में ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेटेज़; Y में पेशी ग्लाइकोजन फ़ॉस्फ़ोरिलेज़
वॉन गीर्के रोग (ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेटेज़ की कमी) में ग्लाइकोजन या ग्लूकोनियोजेनेसिस से बना ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट ग्लूकोज़ के रूप में मुक्त नहीं हो पाता, अतः ग्लूकैगॉन रक्त ग्लूकोज़ नहीं बढ़ा पाता, और फँसा ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट ग्लाइकोलिसिस से होकर लैक्टेट बनता है। मैकआर्डल रोग में पेशी अपना ग्लाइकोजन नहीं तोड़ पाती, अतः व्यायाम करती पेशी में ईंधन घट जाता है और अतिरिक्त लैक्टेट नहीं बनता। लयनकायी अम्ल α-ग्लूकोसिडेज़ की कमी (पॉम्पे रोग) लयनकायों में ग्लाइकोजन संचित कर हृदपेशी-विकृति व दुर्बलता कराती है, लैक्टेट-वृद्धि का अभाव नहीं, और यकृत फ़ॉस्फ़ोरिलेज़ पेशी में कार्य नहीं करता।नाइट्रोजिनेज़ अभिक्रिया को N₂ + 8 H⁺ + 8 e⁻ + 16 ATP → 2 NH₃ + H₂ + 16 ADP + 16 Pi मानते हुए, बनने वाले प्रति NH₃ अणु कितने ATP जल-अपघटित होते हैं?
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 8
16 ATP से 2 NH₃ बनते हैं, अतः प्रति NH₃ 16 / 2 = 8 ATP (प्रति इलेक्ट्रॉन 2 ATP, और H₂ में गए 2 सहित 8 इलेक्ट्रॉन दो NH₃ पर बँटे)। 16 उत्तर प्रति NH₃ के बजाय प्रति N₂ गिनता है, और 6 उत्तर अनिवार्य H₂ को अनदेखा करता है (प्रति N₂ 6 इलेक्ट्रॉन)।यूरिया चक्र में टूटने वाले प्रत्येक फ़ॉस्फ़ोऐनहाइड्राइड बंध को एक ATP तुल्यांक गिनें (मुक्त पायरोफ़ॉस्फ़ेट जल-अपघटित होता है)। मान लें कि मुक्त फ्यूमरेट इस प्रकार ऑक्सैलोऐसीटेट में बदलता है कि एक NADH बनता है, जिसका मूल्य 2.5 ATP है, और अन्य सभी ऊर्जा-परिवर्तन अनदेखे करें। यूरिया का एक अणु बनाने की शुद्ध ATP लागत, एक दशमलव स्थान तक, क्या है?
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 1.5
CPS I 2 ATP → 2 ADP उपयोग करता है (2 बंध)। आर्जिनिनोसक्सिनेट सिंथेटेज़ ATP → AMP + PPi उपयोग करता है, और PPi जल-अपघटित होता है (2 बंध)। सकल लागत 4। फ्यूमरेट → मैलेट → ऑक्सैलोऐसीटेट 2.5 मूल्य का एक NADH देता है। शुद्ध 4 − 2.5 = 1.5। 4 बंधों के बजाय 3 ATP अणु गिनने पर 0.5 आता है।प्यूरीन नवसंश्लेषण में प्यूरीन वलय-तंत्र के कितने परमाणु ग्लाइसीन देता है?
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 3
ग्लाइसीन पूरा का पूरा जुड़ता है और C-4, C-5 व N-7 देता है: तीन परमाणु। शेष वलय-परमाणु हैं: ऐस्पार्टेट से N-1, N¹⁰-फ़ॉर्मिलटेट्राहाइड्रोफ़ोलेट से C-2 व C-8, ग्लूटामीन के ऐमाइड नाइट्रोजन से N-3 व N-9, और CO₂ से C-6, कुल नौ परमाणु। 2 उत्तर केवल ग्लाइसीन के कार्बन गिनता है।एक पत्ती केल्विन चक्र से 6 CO₂ को एक हेक्सोज़ में स्थिर करती है। मान लें कि समस्त NADPH अचक्रीय इलेक्ट्रॉन प्रवाह से आता है, कि एक इलेक्ट्रॉन को जल से NADP⁺ तक ले जाने में दो फ़ोटॉन (प्रत्येक फ़ोटोसिस्टम पर एक) लगते हैं, और अतिरिक्त ATP बनाने में लगे फ़ोटॉनों को अनदेखा करें। अवशोषित फ़ोटॉनों की न्यूनतम संख्या क्या है?
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 48
प्रत्येक CO₂ को 2 NADPH = 4 इलेक्ट्रॉन चाहिए; 4 इलेक्ट्रॉन × 2 फ़ोटॉन = प्रति CO₂ 8 फ़ोटॉन, जो प्रति मुक्त O₂ के 8 फ़ोटॉन के बराबर है (प्रत्येक O₂ 4 इलेक्ट्रॉन छोड़ता है)। 6 CO₂ हेतु: 6 × 8 = 48। प्रति इलेक्ट्रॉन एक फ़ोटॉन गिनने पर 24, और प्रति NADPH एक फ़ोटॉन गिनने पर 12 आता है।हरितलवक से निर्यात हेतु ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट का एक अणु बनाने में केल्विन चक्र कितने ATP अणु व्यय करता है?
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 9
एक ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट के निर्यात हेतु 3 CO₂ का शुद्ध स्थिरीकरण चाहिए। प्रत्येक CO₂ की लागत फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट काइनेज़ पर 2 ATP (दो 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट का अपचयन) व फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ पर 1 ATP है, अतः प्रति CO₂ 3 ATP और प्रति ट्रायोज़ 9, साथ में 6 NADPH। 3 उत्तर प्रति CO₂ लागत है, और 18 प्रति हेक्सोज़ लागत।