PCR, अनुक्रमण व उत्परिवर्तजनन; प्रतिरक्षी–प्रतिजन अन्योन्यक्रिया, प्रतिरक्षा-परख व एकक्लोनी प्रतिरक्षी

यह अध्याय XL1 जैव रसायन के खंड XL1.4, “विश्लेषणात्मक तकनीकें”, को शीर्षक के दूसरे भाग से पूरा करता है: “अगली पीढ़ी का DNA अनुक्रमण, PCR व स्थल-निर्देशित उत्परिवर्तजनन। प्रतिरक्षी–प्रतिजन अन्योन्यक्रिया; प्रतिरक्षा तकनीकें: प्रतिरक्षा-विसरण, प्रतिरक्षा-वैद्युतकण-संचलन, RIA व ELISA, फ़्लो साइटोमेट्री; एकक्लोनी प्रतिरक्षी व उनके अनुप्रयोग।” यह PCR चक्र व उसका गणित, वास्तविक-समय PCR, स्थल-निर्देशित उत्परिवर्तजनन, लघु-रीड व दीर्घ-रीड अनुक्रमक कैसे कार्य करते हैं, प्रतिरक्षी की संरचना व बंधन, जेल, रेडियो- व एंज़ाइम-प्रतिरक्षा परखें, फ़्लो साइटोमेट्री, तथा हाइब्रिडोमा तकनीक व एकक्लोनी प्रतिरक्षियों के चिकित्सीय उपयोग पढ़ाता है। संख्यात्मक प्रश्न PCR प्रतियों की संख्या व चक्र, Ct व ΔΔCt से गुना-परिवर्तन, मानक-वक्र से मात्रा-निर्धारण, अनुक्रमण कवरेज व Phred अंक हैं।

1. PCR: घटक, चक्र व घातांकी प्रवर्धन

पॉलिमरेज़ शृंखला अभिक्रिया दो प्राइमरों के बीच के DNA भाग की प्रतियाँ बनाती है। अभिक्रिया में टेम्पलेट, दो प्राइमर (प्रत्येक रज्जुक हेतु एक, एक-दूसरे की ओर उन्मुख), चारों dNTP, Mg²⁺ (पॉलिमरेज़ का सहकारक) तथा एक तापस्थिर DNA पॉलिमरेज़ होता है, परंपरागत रूप से Thermus aquaticus का Taq, जो बार-बार गरम होने पर भी बचा रहता है। प्रत्येक चक्र के तीन चरण हैं: लगभग 94–95 °C पर विकृतीकरण रज्जुकों को अलग करता है; ऐनीलिंग, प्रायः 50–65 °C पर और प्राइमरों के Tm से कुछ डिग्री नीचे, प्राइमरों को उनके लक्ष्यों से युग्मित होने देती है; 72 °C पर विस्तार प्राइमरों के 3′ सिरों पर न्यूक्लियोटाइड जोड़ता है।

गणित। आदर्श रूप से प्रत्येक चक्र लक्ष्य को दोगुना करता है, अतः N = N₀ × 2ⁿ; दक्षता E (0 से 1) के साथ N = N₀(1 + E)ⁿ। 100 प्रतियों से 25 पूर्ण चक्र 100 × 2²⁵ ≈ 3.4 × 10⁹ प्रतियाँ देते हैं, पर E = 0.9 पर केवल लगभग 9.3 × 10⁸। ठीक प्राइमर-से-प्राइमर लंबाई के उत्पाद पहली बार चक्र 3 में बनते हैं और शीघ्र ही प्रमुख हो जाते हैं। बाद में प्राइमर व dNTP घटने और एंज़ाइम की सक्रियता कम होने से अभिक्रिया धीमी होकर पठार पर पहुँचती है, अतः अंतिम उत्पाद की मात्रा आरंभिक मात्रा का अच्छा माप नहीं है।

  • छोटे ओलिगोन्यूक्लियोटाइडों का प्राइमर Tm प्रायः वॉलेस नियम से आँका जाता है, Tm = 2(A + T) + 4(G + C) °C; दोनों प्राइमरों के Tm मिलाए जाते हैं और जाँचा जाता है कि वे आपस में युग्मित न हों (प्राइमर डाइमर)।
  • यथार्थता। Taq में 3′→5′ प्रूफ़रीडिंग एक्सोन्यूक्लिएज़ नहीं है और वह एक 3′ A उभार छोड़ता है (TA क्लोनिंग में प्रयुक्त); जब उत्पाद का क्लोनन या अभिव्यक्ति करनी हो तो Pyrococcus furiosus के Pfu जैसे प्रूफ़रीडिंग एंज़ाइम चुने जाते हैं।
  • RT-PCR पहले रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज़ से RNA की cDNA प्रति बनाता है, जिससे mRNA व RNA विषाणुओं का प्रवर्धन हो सके। चूँकि PCR कुछ ही अणु पकड़ लेता है, संदूषण पकड़ने हेतु सदैव एक टेम्पलेट-रहित नियंत्रण चलाया जाता है।

2. वास्तविक-समय मात्रात्मक PCR (qPCR)

qPCR प्रत्येक चक्र में प्रतिदीप्ति पढ़ता है। SYBR Green किसी भी द्विरज्जुकी DNA से बँधकर प्रतिदीप्त होता है, अतः सस्ता है पर प्राइमर डाइमर भी दर्ज करता है; प्रयोग के बाद मेल्ट वक्र जाँचता है कि एक ही उत्पाद बना। TaqMan (जल-अपघटन) प्रोब के 5′ सिरे पर रिपोर्टर रंजक और 3′ सिरे पर शमनकारी होता है, जो प्रोब के अखंड रहते रिपोर्टर की ऊर्जा सोख लेता है। प्रोब प्राइमरों के बीच ऐनील होता है, और विस्तार के दौरान Taq का 5′→3′ एक्सोन्यूक्लिएज़ उसे काटकर रिपोर्टर मुक्त कर देता है, अतः प्रतिदीप्ति केवल अभीष्ट लक्ष्य हेतु बढ़ती है।

देहली चक्र (Ct) वह चक्र है जिस पर प्रतिदीप्ति घातांकी प्रावस्था में तय देहली पार करती है; आरंभिक मात्रा बढ़ने पर Ct घटता है। 100% दक्षता पर 1 Ct का अंतर दो गुना और 3.32 Ct दस गुना है। Ct बनाम log₁₀N₀ के मानक वक्र का ढाल 100% दक्षता पर −3.32 है, और दक्षता = 10^(−1/ढाल) − 1। ΔΔCt विधि में प्रत्येक नमूने में ΔCt = Ct(लक्ष्य) − Ct(संदर्भ जीन), ΔΔCt = ΔCt(उपचारित) − ΔCt(नियंत्रण), और गुना-परिवर्तन = 2^(−ΔΔCt), जो तब मान्य है जब दोनों जीन लगभग 100% दक्षता से प्रवर्धित हों।

🎯 हल किया उदाहरण
उपचारित कोशिकाओं में लक्ष्य Ct 22.0 व संदर्भ (हाउसकीपिंग जीन) Ct 16.0; नियंत्रण कोशिकाओं में 25.0 व 16.5। ΔCt = 6.0 व 8.5, ΔΔCt = −2.5, गुना-परिवर्तन = 2^2.5 ≈ 5.7 गुना प्रेरण। संदर्भ से सामान्यीकरण निवेश RNA की असमान मात्रा को सुधारता है। चिकित्सा में RT-qPCR विषाणु-भार मापता है, और कम Ct का अर्थ अधिक विषाणु RNA है।

3. स्थल-निर्देशित उत्परिवर्तजनन

स्थल-निर्देशित उत्परिवर्तजनन क्लोन किए जीन के किसी चुने हुए क्षारक, कोडॉन या छोटे भाग को बदलता है, जिससे एक अवशेष की भूमिका जाँची जा सके। परिवर्तन एक संश्लिष्ट उत्परिवर्तजनी प्राइमर में होता है जिसके मध्य के निकट बेमेल क्षारक और दोनों ओर मेल खाता अनुक्रम होता है, ताकि वह फिर भी ऐनील हो। प्रचलित पूर्ण-प्लाज़्मिड विधि में दो पूरक उत्परिवर्तजनी प्राइमर व उच्च-यथार्थता पॉलिमरेज़ पूरे प्लाज़्मिड की प्रति बनाते हैं; फिर उत्पाद को DpnI से उपचारित किया जाता है, जो केवल मेथिलित GATC स्थल काटता है, अतः E. coli से पृथक Dam-मेथिलित पैतृक प्लाज़्मिड नष्ट हो जाता है जबकि अमेथिलित, नया बना उत्परिवर्ती DNA बचकर E. coli में रूपांतरित किया जाता है। अतिव्यापी-विस्तार PCR दो अतिव्यापी PCR उत्पादों को जोड़कर किसी खंड के भीतर उत्परिवर्तन डालता है। प्रत्येक क्लोन की पुष्टि अनुक्रमण से होती है।

उपयोग। किसी उत्प्रेरक अवशेष को बदलना (जैसे सेरीन प्रोटिएज़ के सक्रिय-स्थल सेरीन को ऐलानीन से) प्रस्तावित क्रियाविधि जाँचता है; ऐलानीन स्कैनिंग बंधन हेतु आवश्यक अवशेषों का मानचित्र बनाती है; उत्परिवर्तन ग्लाइकोसिलन या फ़ॉस्फ़ोरिलन स्थल जोड़ या हटा सकते हैं, स्थिरता बढ़ा सकते हैं, या चिह्नन हेतु सिस्टीन डाल सकते हैं।

⚠️ सक्रियता का लोप प्रमाण नहीं है
उत्परिवर्ती इसलिए निष्क्रिय हो सकता है कि वह गलत वलित होता है, न कि इसलिए कि अवशेष उत्प्रेरक है। निष्कर्ष से पहले दिखाएँ कि उत्परिवर्ती वलित है (समान CD स्पेक्ट्रम, सामान्य जेल-निस्यंदन व्यवहार या बचा हुआ क्रियाधार-बंधन), और Asp से Asn या Ser से Ala जैसे संरक्षी प्रतिस्थापन चुनें, जो एक बार में एक ही गुण बदलते हैं।

4. अगली पीढ़ी का अनुक्रमण

सैंगर अनुक्रमण, संदर्भ विधि, प्रति अभिक्रिया एक टेम्पलेट पढ़ता है: पॉलिमरेज़ प्रतिदीप्त डाइडिऑक्सीन्यूक्लियोटाइडों की उपस्थिति में प्राइमर का विस्तार करता है, जिनमें 3′-OH नहीं होता और जो शृंखला रोक देते हैं, तथा केशिका वैद्युतकण-संचलन खंडों को क्रम में लगाता है, जिससे लगभग 800–1,000 क्षारकों के रीड मिलते हैं। अगली पीढ़ी का अनुक्रमण (NGS) लाखों खंड समानांतर पढ़ता है। DNA को खंडित कर व ऐडैप्टर जोड़कर लाइब्रेरी बनाई जाती है, जिनमें इंडेक्स बारकोड होते हैं ताकि नमूने एक साथ मिलाए जा सकें; खंडों का क्लोनी प्रवर्धन, फ़्लो सेल पर सेतु प्रवर्धन द्वारा गुच्छों में या मनकों पर इमल्शन PCR द्वारा, होता है, और फिर उन्हें चक्र-दर-चक्र पढ़ा जाता है।

रसायनसंकेतरीडप्रमुख कमज़ोरी
उत्क्रमणीय-समापक संश्लेषण द्वारा अनुक्रमण (Illumina)हटाने योग्य अवरोध वाले प्रतिदीप्त न्यूक्लियोटाइड: प्रति चक्र एक क्षारक जुड़ता, चित्रित होता व अवरोध-मुक्त होता हैलघु, लगभग 50–300 क्षारक, प्रायः युग्मित-सिराकम त्रुटि, अधिकतर प्रतिस्थापन; पुनरावृत्तियाँ स्थापित करना कठिन
पायरोअनुक्रमणमुक्त पायरोफ़ॉस्फ़ेट ATP सल्फ़्यूरिलेज़ द्वारा ATP में बदलता है, और ATP ल्यूसिफ़ेरेज़ से प्रकाश देता हैलघु से मध्यमसमबहुलक की लंबाई प्रकाश-तीव्रता से आँकी जाती है
आयन अर्धचालकसमावेशन पर मुक्त H⁺ सूक्ष्म-कूप का pH बदलता हैलघु से मध्यमसमबहुलक त्रुटियाँ, ऊपर जैसी
एकल-अणु वास्तविक-समय (PacBio)नैनो-स्तरीय कूप में एक पॉलिमरेज़; प्रत्येक प्रतिदीप्त न्यूक्लियोटाइड समावेशन के समय दिखता हैदीर्घ, प्रायः 10 kb से अधिकअधिक कच्ची त्रुटि, एक ही अणु को कई बार पढ़कर घटाई जाती है
नैनोपोरप्रोटीन छिद्र से DNA रज्जुक गुज़रने पर आयनिक धारा बदलती हैअति दीर्घ, दसियों से सैकड़ों kbअधिक कच्ची त्रुटि; प्रवर्धन की आवश्यकता नहीं

कवरेज व गुणवत्ता। औसत कवरेज-गहराई C = N × L/G, जहाँ N रीडों की संख्या, L रीड-लंबाई व G जीनोम-आकार है: 3.0 × 10⁹ bp के जीनोम पर 150 क्षारकों के 40 करोड़ रीड 20× देते हैं। प्रत्येक क्षारक-निर्धारण के साथ Phred गुणवत्ता Q = −10 log₁₀P होती है, जहाँ P उस निर्धारण के गलत होने की प्रायिकता है, अतः Q20 का अर्थ 100 में एक त्रुटि और Q30 का 1,000 में एक। युग्मित-सिरा रीड पुनरावृत्तियों के आर-पार खंडों को स्थापित करने में सहायक हैं। अनुप्रयोगों में वंशागत रोगों के निदान हेतु पूर्ण-जीनोम व एक्सोम अनुक्रमण, अभिव्यक्ति हेतु RNA-seq, बंधन-स्थलों हेतु ChIP-seq, मेटाजीनोमिकी, और मातृ रक्त में कोशिका-मुक्त भ्रूण DNA की जाँच शामिल हैं।

5. प्रतिरक्षी–प्रतिजन अन्योन्यक्रिया

IgG अणु (लगभग 150 kDa) में दो समान भारी व दो समान हल्की शृंखलाएँ डाइसल्फ़ाइड बंधों से Y आकृति में जुड़ी होती हैं। प्रत्येक भुजा एक Fab क्षेत्र है जिसमें एक प्रतिजन-बंधन स्थल होता है, जो एक भारी व एक हल्की शृंखला के परिवर्ती डोमेनों से बनता है, जिनके अतिपरिवर्ती लूप (CDR) पैराटोप बनाते हैं; तना Fc क्षेत्र है, जो Fc ग्राहियों व कॉम्प्लिमेंट से जुड़ता है। पैपेन कब्ज़े (hinge) के ऊपर काटकर दो Fab व एक Fc देता है; पेप्सिन उसके नीचे काटकर एक द्विसंयोजी F(ab′)₂ देता है। प्रतिजन का बँधने वाला भाग एपिटोप है, जो रैखिक (अनुक्रम का सतत भाग) या संरूपणी (वलन से पास आए अवशेष, विकृतीकरण पर लुप्त) होता है।

बंधन असहसंयोजी व उत्क्रमणीय है: निकटता से मेल खाती सतहों पर हाइड्रोजन बंध, आयनिक आकर्षण, वान डर वाल्स संपर्क व जलविरागी प्रभाव। बंधुता एक पैराटोप–एपिटोप बंध की शक्ति है, Ka = [AbAg]/([Ab][Ag]); अतिबंधुता (avidity) बहुसंयोजी बंधन की समग्र शक्ति है, इसीलिए पंचतयी IgM प्रति स्थल कम बंधुता के बावजूद कोशिका-सतहों से अच्छी तरह बँधता है। पर-अभिक्रियाशीलता तब होती है जब किसी अन्य प्रतिजन पर मिलता-जुलता एपिटोप हो।

अवक्षेपण व समूहन। द्विसंयोजी प्रतिरक्षी व बहुसंयोजी प्रतिजन एक तिर्यक-बंधित जालक बनाते हैं। अवक्षेपण-वक्र में अवक्षेप तुल्यता पर अधिकतम होता है; प्रतिरक्षी की अधिकता (प्रोज़ोन) या प्रतिजन की अधिकता (पोस्टज़ोन) में छोटे विलेय संकुल बनते हैं, अतः बहुत सांद्र नमूना मिथ्या रूप से दुर्बल परिणाम दे सकता है। लाल कोशिकाओं या जीवाणुओं जैसे कणों का तिर्यक-बंधन समूहन (agglutination) है, जो रक्त-वर्ग निर्धारण का आधार है।

6. प्रतिरक्षा-विसरण, प्रतिरक्षा-वैद्युतकण-संचलन, RIA, ELISA व फ़्लो साइटोमेट्री

तकनीकसिद्धांतपठन व उपयोग
एकल अरीय प्रतिरक्षा-विसरण (मैनसिनी)प्रतिजन कूप से प्रतिरक्षी-युक्त जेल में विसरित होता हैअवक्षेप का वलय जिसका व्यास प्रतिजन-सांद्रता के साथ बढ़ता है, मानकों से तुलना कर पढ़ा जाता है (सीरम IgG, कॉम्प्लिमेंट)
द्वि-प्रतिरक्षा-विसरण (ऑक्टरलोनी)प्रतिजन व प्रतिरक्षी अलग कूपों से एक-दूसरे की ओर विसरित होते हैंरेखाएँ जो जुड़ जाएँ (सर्वसमता), स्पर सहित जुड़ें (आंशिक सर्वसमता) या एक-दूसरे को काटें (असर्वसमता)
प्रतिरक्षा-वैद्युतकण-संचलनप्रोटीन पहले जेल में वैद्युतकण-संचलन से पृथक होते हैं; फिर खाँचे में रखा प्रतिसीरम उनकी ओर विसरित होता हैअवक्षेपण-चाप; असामान्य सीरम प्रोटीन जैसे मायलोमा में एकक्लोनी इम्यूनोग्लोबुलिन (M-प्रोटीन)
रॉकेट प्रतिरक्षा-वैद्युतकण-संचलनविद्युत क्षेत्र प्रतिजन को प्रतिरक्षी-युक्त जेल में धकेलता हैरॉकेट-आकार का शिखर जिसकी ऊँचाई प्रतिजन-सांद्रता के समानुपाती है
प्रतिधारा प्रतिरक्षा-वैद्युतकण-संचलनक्षेत्र प्रतिजन व प्रतिरक्षी को एक-दूसरे की ओर धकेलता हैकेवल विसरण की तुलना में कहीं शीघ्र अवक्षेपण-रेखा

रेडियो-प्रतिरक्षा परख (RIA) एक प्रतिस्पर्धा है: प्रतिरक्षी की सीमित मात्रा, रेडियो-चिह्नित प्रतिजन (प्रायः ¹²⁵I) की निश्चित मात्रा और नमूने का अचिह्नित प्रतिजन बंधन-स्थलों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। बँधे व मुक्त प्रतिजन को अलग करने के बाद नमूने का प्रतिजन बढ़ने पर बँधी रेडियोधर्मिता घटती है, और सांद्रताएँ मानक वक्र से पढ़ी जाती हैं। रोज़ालिन यालो व सोलोमन बर्सन द्वारा इंसुलिन हेतु विकसित इस विधि ने हॉर्मोनों को अत्यंत कम सांद्रता पर मापने योग्य बनाया; विकिरण-जोखिम के कारण अब इसका स्थान बड़े पैमाने पर एंज़ाइम व रसायनदीप्ति परखों ने ले लिया है।

ELISA रेडियो-चिह्न के स्थान पर एंज़ाइम लेता है, प्रायः हॉर्सरैडिश पेरॉक्सिडेज़ (TMB क्रियाधार के साथ, अम्ल से रोकने के बाद 450 nm पर पठन) या ऐल्कलाइन फ़ॉस्फ़ेटेज़ (p-नाइट्रोफ़ेनिल फ़ॉस्फ़ेट के साथ, 405 nm पर पठन)। प्रत्यक्ष ELISA चिह्नित प्राथमिक प्रतिरक्षी लेता है; अप्रत्यक्ष ELISA सीरम में प्रतिरक्षी पकड़ता है (प्लेट पर प्रतिजन, रोगी का प्रतिरक्षी, फिर एंज़ाइम-चिह्नित प्रति-मानव इम्यूनोग्लोबुलिन), जैसे संक्रमणों की जाँच में; सैंडविच ELISA प्रतिजन को भिन्न एपिटोपों के दो प्रतिरक्षियों के बीच पकड़ता है, अतः संकेत प्रतिजन के साथ बढ़ता है; प्रतिस्पर्धी ELISA एक एपिटोप वाले छोटे प्रतिजनों हेतु उपयुक्त है, और उसका संकेत प्रतिजन बढ़ने पर घटता है। अवरोधक प्रोटीन अविशिष्ट चिपकाव रोकता है और धुलाई अबंधित अभिकर्मक हटाती है।

फ़्लो साइटोमेट्री कोशिकाओं को हाइड्रोडायनामिक फ़ोकसन द्वारा एक-एक करके लेज़र किरणों से गुज़ारती है। अग्र प्रकीर्णन मुख्यतः कोशिका-आकार और पार्श्व प्रकीर्णन आंतरिक जटिलता या कणिकामयता बताता है; सतही चिह्नकों (CD प्रतिजनों) के प्रतिदीप्तिधर-चिह्नित प्रतिरक्षी और चैनल जोड़ते हैं, और गेटिंग समष्टियाँ चुनती है, जैसे पहले प्रकीर्णन से लसीकाणु और फिर CD4⁺ कोशिकाएँ। उपयोगों में HIV संक्रमण में CD4 गणना, ल्यूकेमिया व लिंफ़ोमा का प्रतिरक्षा-लक्षणन, और DNA रंजकों से कोशिका-चक्र विश्लेषण शामिल हैं। प्रतिदीप्ति-सक्रियित कोशिका छँटाई यंत्र (FACS) बूँदों को आवेशित व विक्षेपित कर चुनी हुई कोशिकाओं को जीवित भी एकत्र करता है।

7. एकक्लोनी प्रतिरक्षी: हाइब्रिडोमा तकनीक व अनुप्रयोग

प्रतिरक्षण के बाद का सीरम बहुक्लोनी होता है: अनेक B-कोशिका क्लोनों से अनेक एपिटोपों के विरुद्ध प्रतिरक्षी, जो प्रत्येक खेप में बदलते हैं। एकक्लोनी प्रतिरक्षी एक ही क्लोन से आता है और एक बंधुता के साथ एक एपिटोप पहचानता है। जॉर्ज कोह्लर व सेज़ार मिल्स्टीन ने 1975 में इन्हें हाइब्रिडोमा तकनीक से बनाया (नोबेल पुरस्कार, 1984)। चूहे का प्रतिरक्षण किया जाता है; उसकी प्लीहा की B कोशिकाएँ, जो प्रतिरक्षी बनाती हैं पर संवर्धन में मर जाती हैं, पॉलिएथिलीन ग्लाइकॉल द्वारा मायलोमा कोशिकाओं से संलयित की जाती हैं, जो अमर हैं पर जिनमें HGPRT नहीं होता और जो अपना कोई प्रतिरक्षी स्रावित नहीं करतीं; मिश्रण को HAT माध्यम (हाइपोज़ैन्थीन, ऐमिनोप्टेरिन, थाइमिडीन) में उगाया जाता है।

HAT संकरों को क्यों चुनता है। ऐमिनोप्टेरिन डाइहाइड्रोफ़ोलेट रिडक्टेज़ का संदमन कर प्यूरिनों व थाइमिडिलेट का नव-संश्लेषण रोक देता है, अतः कोशिकाओं को बचाव-पथ अपनाना पड़ता है, जिसे हाइपोज़ैन्थीन के उपयोग हेतु HGPRT चाहिए। असंलयित मायलोमा कोशिकाएँ (HGPRT⁻) मर जाती हैं; असंलयित B कोशिकाएँ अमर न होने से कुछ दिनों में मर जाती हैं; केवल संकर, जिन्हें HGPRT B कोशिका से और अमरता मायलोमा से मिलती है, बढ़ते हैं। अधिप्लवों की जाँच प्रायः ELISA से होती है, और धनात्मक कूपों का सीमांत तनुकरण से क्लोनन किया जाता है ताकि प्रत्येक संवर्धन एक कोशिका से उत्पन्न हो।

अभियांत्रिकी व अनुप्रयोग। बार-बार दिए गए चूहे के प्रतिरक्षी मानव प्रति-चूहा प्रतिरक्षी (HAMA) अनुक्रिया उत्पन्न करते हैं, अतः चिकित्सीय प्रतिरक्षी काइमेरी (चूहे के परिवर्ती, मानव के स्थिर क्षेत्र; रिटुक्सिमैब, प्रति-CD20), मानवीकृत (केवल चूहे के CDR रखे गए; ट्रैस्टुज़ुमैब, प्रति-HER2) या पूर्णतः मानव (फ़ेज डिस्प्ले या पारजीनी चूहों से; ऐडालिमुमैब, प्रति-TNF-α) बनाए जाते हैं। उपयोग: निदान (घरेलू गर्भावस्था परीक्षण पार्श्व-प्रवाह सैंडविच में hCG पकड़ते हैं; ELISA किट; रक्त-वर्ग निर्धारण; फ़्लो साइटोमेट्री में CD चिह्नक), प्रतिरक्षा-बंधुता शोधन, प्रतिबिंबन, तथा चिकित्सा, जो लिगैंड या ग्राही को अवरुद्ध कर, कॉम्प्लिमेंट या प्रतिरक्षी-निर्भर कोशिका-मध्यस्थ कोशिकाविषाक्तता (ADCC) बुलाकर, अथवा प्रतिरक्षी–औषधि संयुग्म के रूप में औषधि पहुँचाकर होती है।

मुख्य बिंदु

  • PCR तापस्थिर पॉलिमरेज़ के साथ विकृतीकरण (लगभग 95 °C), ऐनीलिंग (50–65 °C) व विस्तार (72 °C) का चक्र चलाता है; पठार तक N = N₀(1 + E)ⁿ। Taq में प्रूफ़रीडिंग नहीं; RT-PCR RNA से आरंभ होता है; टेम्पलेट-रहित नियंत्रण संदूषण पकड़ता है।
  • qPCR में कम Ct का अर्थ अधिक टेम्पलेट है: 100% दक्षता पर 1 चक्र दो गुना और 3.32 चक्र दस गुना; दक्षता = 10^(−1/ढाल) − 1, और गुना-परिवर्तन = 2^(−ΔΔCt)। SYBR Green किसी भी dsDNA से बँधता है; TaqMan प्रोब Taq के 5′→3′ एक्सोन्यूक्लिएज़ से कटता है।
  • स्थल-निर्देशित उत्परिवर्तजनन उत्परिवर्तजनी प्राइमर लेता है; DpnI मेथिलित पैतृक प्लाज़्मिड हटाता है; क्लोनों का अनुक्रमण होता है, और किसी अवशेष को उत्प्रेरक कहने से पहले उत्परिवर्ती का वलन जाँचना होता है।
  • NGS ऐडैप्टर लाइब्रेरी बनाकर क्लोनी प्रवर्धन करता है और समानांतर पढ़ता है: उत्क्रमणीय समापक लघु व सटीक रीड देते हैं, पायरोअनुक्रमण व आयन रसायन समबहुलकों में चूकते हैं, PacBio व नैनोपोर दीर्घ रीड देते हैं। कवरेज C = NL/G; Phred Q = −10 log₁₀P।
  • IgG की दो Fab भुजाएँ व एक Fc तना है (पैपेन से 2 Fab + Fc, पेप्सिन से F(ab′)₂); बंधन असहसंयोजी है, प्रति स्थल बंधुता व समग्र अतिबंधुता के साथ। जालक तुल्यता पर सर्वाधिक अवक्षेपित होते हैं; प्रतिरक्षा-विसरण व प्रतिरक्षा-वैद्युतकण-संचलन अवक्षेपण के वलय, रेखाएँ, चाप व रॉकेट पढ़ते हैं।
  • RIA व प्रतिस्पर्धी ELISA में प्रतिजन बढ़ने पर संकेत घटता है, सैंडविच ELISA में बढ़ता है; फ़्लो साइटोमेट्री आकार (अग्र प्रकीर्णन), कणिकामयता (पार्श्व प्रकीर्णन) व चिह्नक पढ़ती है। हाइब्रिडोमा B कोशिका से HGPRT व मायलोमा से अमरता लेकर HAT में बचते हैं; काइमेरी, मानवीकृत व मानव प्रतिरक्षी क्रमशः HAMA अनुक्रिया को घटाते हैं।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. एक PCR लक्ष्य अनुक्रम की 500 प्रतियों से आरंभ होता है। प्रत्येक चक्र में पूर्ण दोगुनापन मानकर, कम से कम 1.0 × 10⁹ प्रतियाँ पाने हेतु न्यूनतम चक्रों की संख्या ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 21

    500 × 2ⁿ ≥ 10⁹ हेतु 2ⁿ ≥ 2 × 10⁶ चाहिए, अतः n ≥ log₂(2 × 10⁶) = 20.93, और सबसे छोटा पूर्णांक 21 है। जाँच: 20 चक्र 500 × 1,048,576 = 5.2 × 10⁸ देते हैं (कम), 21 चक्र 1.05 × 10⁹ देते हैं। 20.93 को नीचे 20 कर देना प्रचलित भूल है।
  2. Ct बनाम log₁₀(आरंभिक प्रतियाँ) के एक qPCR मानक वक्र का ढाल −3.45 है। दक्षता = 10^(−1/ढाल) − 1 का उपयोग करने पर प्रवर्धन दक्षता सबसे निकट है

    1. 100%, हर एक चक्र में पूर्ण दोगुनापन
    2. 110%, दोगुनेपन से थोड़ा अधिक
    3. 87%, पूर्ण दोगुनेपन से काफ़ी कम
    4. 95%, पूर्ण दोगुनेपन से थोड़ा कम
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — 95%, पूर्ण दोगुनेपन से थोड़ा कम

    10^(1/3.45) = 10^0.290 = 1.949, अतः दक्षता = 0.949, लगभग 95%। पूर्ण दोगुनेपन हेतु ढाल −3.32 चाहिए, क्योंकि 10^(1/3.32) = 2.00; अधिक तीव्र ढाल का अर्थ प्रति दस गुना अधिक चक्र, अर्थात् दोगुने से कम है। 110% के लिए लगभग −3.1 का कम तीव्र ढाल और 87% के लिए लगभग −3.68 का अधिक तीव्र ढाल चाहिए।
  3. एक RT-qPCR प्रयोग में औषधि-उपचारित कोशिकाओं में लक्ष्य जीन Ct = 24.6 व संदर्भ जीन Ct = 18.2 देता है; नियंत्रण कोशिकाओं में लक्ष्य Ct = 27.1 व संदर्भ Ct = 18.7 देता है। दोनों जीनों हेतु 100% दक्षता मानकर, नियंत्रण की तुलना में उपचारित कोशिकाओं में लक्ष्य-अभिव्यक्ति का गुना-परिवर्तन (2^−ΔΔCt विधि से) ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 4

    ΔCt(उपचारित) = 24.6 − 18.2 = 6.4; ΔCt(नियंत्रण) = 27.1 − 18.7 = 8.4; ΔΔCt = 6.4 − 8.4 = −2.0; गुना-परिवर्तन = 2^2.0 = 4, अर्थात् चार गुना प्रेरण। केवल लक्ष्य के कच्चे Ct की तुलना (27.1 − 24.6 = 2.5, जिससे 5.7 गुना) निवेश RNA की उस भिन्न मात्रा की उपेक्षा करती है जिसे संदर्भ जीन सुधारता है।
  4. एक विषाणु की RT-qPCR परख का मानक वक्र Ct = 38.0 − 3.32 log₁₀N₀ है, जहाँ N₀ अभिक्रिया में लक्ष्य की प्रतियों की संख्या है। एक रोगी का नमूना Ct = 26.38 देता है। अभिक्रिया में लक्ष्य की प्रतियों की संख्या (निकटतम पूर्णांक तक) ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 3162

    log₁₀N₀ = (38.0 − 26.38)/3.32 = 11.62/3.32 = 3.50, अतः N₀ = 10^3.5 = 3,162 प्रतियाँ। −3.32 का ढाल 100% दक्षता दर्शाता है, अतः अंतःखंड से हर 3.32 चक्र नीचे जाना दस गुना वृद्धि है। अंतःखंड भूलकर 26.38/3.32 लेने से असंगत 10^7.9 मिलता है।
  5. TaqMan (जल-अपघटन प्रोब) qPCR में लक्ष्य के प्रवर्धन के साथ रिपोर्टर प्रतिदीप्ति क्यों बढ़ती है?

    1. Taq का 5′→3′ एक्सोन्यूक्लिएज़ ऐनील हुए प्रोब को काटकर रिपोर्टर को शमनकारी से अलग कर देता है
    2. रिपोर्टर रंजक प्रत्येक चक्र में बने द्विरज्जुकी DNA में अंतर्वेशित होने के बाद ही प्रतिदीप्त होता है
    3. Taq का 3′→5′ प्रूफ़रीडिंग एक्सोन्यूक्लिएज़ प्रोब के बेमेल 3′ सिरे से शमनकारी हटा देता है
    4. Taq प्रोब का उसके 3′ सिरे से विस्तार करता है, जिससे शमनकारी रिपोर्टर रंजक से बहुत दूर चला जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Taq का 5′→3′ एक्सोन्यूक्लिएज़ ऐनील हुए प्रोब को काटकर रिपोर्टर को शमनकारी से अलग कर देता है

    प्रोब के अखंड रहते, कुछ नैनोमीटर दूर स्थित शमनकारी रिपोर्टर की ऊर्जा सोख लेता है। विस्तार के दौरान Taq ऐनील हुए प्रोब तक पहुँचता है और उसका 5′→3′ एक्सोन्यूक्लिएज़ उसे तोड़कर रिपोर्टर मुक्त करता है, अतः प्रत्येक नई प्रति और रिपोर्टर मुक्त करती है। अंतर्वेशन SYBR Green का वर्णन है, प्रोब का नहीं। Taq में 3′→5′ प्रूफ़रीडिंग सक्रियता नहीं है, और प्रोब का 3′ सिरा अवरुद्ध रहता है, अतः उसका विस्तार नहीं हो सकता।
  6. पूर्ण-प्लाज़्मिड स्थल-निर्देशित उत्परिवर्तजनन में E. coli में रूपांतरण से पहले PCR उत्पाद को DpnI से उपचारित किया जाता है। इस चरण का उद्देश्य क्या है?

    1. अमेथिलित, नए बने DNA को पचाना, जबकि Dam-मेथिलित पैतृक प्लाज़्मिड को छोड़ देना
    2. नए बने उत्परिवर्ती रज्जुकों में बचे निक जोड़ना ताकि वृत्ताकार प्लाज़्मिड का रूपांतरण हो सके
    3. Dam-मेथिलित पैतृक प्लाज़्मिड को पचाना, जबकि अमेथिलित, नए बने उत्परिवर्ती DNA को छोड़ देना
    4. पॉलिमरेज़ द्वारा छोड़े गए एकल 3′ A उभार काटना ताकि प्लाज़्मिड के सिरे कुंद हो जाएँ
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — Dam-मेथिलित पैतृक प्लाज़्मिड को पचाना, जबकि अमेथिलित, नए बने उत्परिवर्ती DNA को छोड़ देना

    DpnI GATC को तभी काटता है जब ऐडेनीन मेथिलित हो। dam⁺ E. coli से शुद्ध किया टेम्पलेट प्लाज़्मिड मेथिलित होता है, जबकि PCR द्वारा पात्रे बना DNA नहीं, अतः DpnI वन्य-प्रकार टेम्पलेट हटाकर उत्परिवर्ती को समृद्ध करता है। उलटा कथन भ्रामक भूल है। निक रूपांतरण के बाद परपोषी कोशिका जोड़ती है, DpnI नहीं, और प्रतिबंधन एंज़ाइम A उभार नहीं काटता।
  7. PCR व स्थल-निर्देशित उत्परिवर्तजनन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. Taq पॉलिमरेज़ बार-बार के विकृतीकरण चरणों में बचा रहता है पर उसमें 3′→5′ प्रूफ़रीडिंग सक्रियता नहीं है
    2. उत्परिवर्तजनी प्राइमर का बेमेल क्षारक उसके मध्य के निकट होता है, दोनों ओर मेल खाते अनुक्रम के साथ
    3. SYBR Green प्रतिदीप्ति स्वयं ही, बिना मेल्ट वक्र के, अभीष्ट उत्पाद को प्राइमर डाइमर से अलग पहचान लेती है
    4. PCR द्वारा mRNA लक्ष्य के प्रवर्धन हेतु पहले cDNA में रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन आवश्यक है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Taq पॉलिमरेज़ बार-बार के विकृतीकरण चरणों में बचा रहता है पर उसमें 3′→5′ प्रूफ़रीडिंग सक्रियता नहीं है; B — उत्परिवर्तजनी प्राइमर का बेमेल क्षारक उसके मध्य के निकट होता है, दोनों ओर मेल खाते अनुक्रम के साथ; D — PCR द्वारा mRNA लक्ष्य के प्रवर्धन हेतु पहले cDNA में रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन आवश्यक है

    Taq तापस्थिर है पर उसमें प्रूफ़रीडिंग एक्सोन्यूक्लिएज़ नहीं; मध्य में बेमेल व मेल खाते पार्श्व उत्परिवर्तजनी प्राइमर को ऐनील होकर प्रारंभन करने देते हैं; और PCR पॉलिमरेज़ DNA की प्रति बनाते हैं, अतः RNA का पहले रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन आवश्यक है। SYBR Green किसी भी द्विरज्जुकी DNA से बँधता है, अतः प्राइमर डाइमर को उत्पाद से अलग नहीं कर सकता; मेल्ट वक्र या जेल चाहिए।
  8. पायरोअनुक्रमण व आयन-अर्धचालक अनुक्रमण दोनों AAAAAAA जैसे भागों में उत्क्रमणीय-समापक अनुक्रमण से अधिक त्रुटियाँ करते हैं। इसका कारण क्या है?

    1. उनके पॉलिमरेज़ समान क्षारकों के भाग पर रुक जाते हैं और हर भाग का कुछ अंश अगले चक्र तक बिना पढ़े छोड़ देते हैं
    2. समान क्षारकों का पूरा भाग एक ही न्यूक्लियोटाइड-प्रवाह में जुड़ता है, अतः उसकी लंबाई संकेत के आकार से आँकनी पड़ती है
    3. प्रकाश व pH संकेत तभी बनते हैं जब टेम्पलेट के सामने मेल खाता क्षारक नहीं, बल्कि कोई बेमेल क्षारक समाविष्ट होता है
    4. उत्क्रमणीय समापक ऐडेनीन के भागों से अधिक दृढ़ता से बँधते हैं, अतः वे भाग प्रति क्षारक प्रबल संकेत देते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — समान क्षारकों का पूरा भाग एक ही न्यूक्लियोटाइड-प्रवाह में जुड़ता है, अतः उसकी लंबाई संकेत के आकार से आँकनी पड़ती है

    ये प्रवाह-आधारित रसायन एक बार में एक ही प्रकार का अनवरुद्ध न्यूक्लियोटाइड देते हैं, अतः पॉलिमरेज़ उसी प्रवाह में पूरा समबहुलक भर देता है; प्रकाश (पायरोफ़ॉस्फ़ेट से ATP से ल्यूसिफ़ेरेज़) या H⁺ संकेत जुड़े क्षारकों की संख्या के समानुपाती होता है, और 7 व 8 में भेद कठिन है। उत्क्रमणीय समापक प्रति चक्र ठीक एक क्षारक जुड़ने देते हैं, अतः भाग को क्षारक-दर-क्षारक गिना जाता है। संकेत सही समावेशन से आते हैं, बेमेल से नहीं, और रुकना इसका कारण नहीं है।
  9. 4.6 Mb के एक जीवाणु जीनोम का 2 × 150 bp युग्मित-सिरा रीडों से 30× औसत कवरेज तक अनुक्रमण करना है, अर्थात् प्रत्येक रीड-युग्म 300 क्षारक देता है। दोहरे व अमानचित्रित रीडों की उपेक्षा कर आवश्यक रीड-युग्मों की संख्या ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 460000

    कवरेज C = N × L/G, अतः N = C × G/L = 30 × 4.6 × 10⁶ / 300 = 4,60,000 रीड-युग्म। प्रति युग्म 300 के बजाय 150 क्षारक गिनने से उत्तर दोगुना, 9,20,000, हो जाता है।
  10. एक अनुक्रमक आँकता है कि किसी क्षारक-निर्धारण के गलत होने की प्रायिकता 2,000 में 1 है। Q = −10 log₁₀P का उपयोग कर उसका Phred गुणवत्ता अंक (एक दशमलव स्थान तक) ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 33.0

    P = 1/2,000 = 5 × 10⁻⁴, अतः Q = −10 log₁₀(5 × 10⁻⁴) = 10 × 3.301 = 33.0। जाँच हेतु, Q30 का अर्थ 1,000 में 1 त्रुटि और Q40 का 10,000 में 1, अतः मान इन दोनों के बीच अपेक्षित है।
  11. IgG अणु का पैपेन से पाचन देता है

    1. दो एकसंयोजी Fab खंड और एक Fc खंड
    2. एक द्विसंयोजी F(ab′)₂ खंड और छोटे Fc पेप्टाइड
    3. एक-दूसरे से मुक्त दो भारी व दो हल्की शृंखलाएँ
    4. दो Fc खंड और एक द्विसंयोजी बंधक खंड
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — दो एकसंयोजी Fab खंड और एक Fc खंड

    पैपेन IgG को कब्ज़े के डाइसल्फ़ाइडों के N-सिरे वाली ओर काटता है, जिससे दो अलग Fab भुजाएँ, प्रत्येक में एक प्रतिजन-बंधन स्थल, तथा Fc तना मुक्त होते हैं। पेप्सिन कब्ज़े की दूसरी ओर काटता है, अतः दोनों Fab भुजाएँ F(ab′)₂ के रूप में जुड़ी रहती हैं और Fc टूट जाता है; यही भ्रामक विकल्प है। भारी व हल्की शृंखलाओं को अलग करने हेतु प्रोटिएज़ नहीं, डाइसल्फ़ाइडों का अपचयन चाहिए, और IgG में केवल एक Fc होता है।
  12. एक ऑक्टरलोनी प्लेट पर प्रतिसीरम केंद्रीय कूप में और प्रतिजन X व Y पास-पास के बाहरी कूपों में रखे गए हैं। X व Y द्वारा बनी अवक्षेपण-रेखाएँ बिना जुड़े एक-दूसरे को पूरी तरह काटती हैं। यह दर्शाता है कि

    1. X व Y समान एपिटोपों वाला एक ही अणु हैं
    2. X में Y के सभी एपिटोप और कम से कम एक अतिरिक्त एपिटोप है
    3. X व Y में ऐसा कोई एपिटोप साझा नहीं जिसे प्रतिसीरम पहचानता हो
    4. X व Y ठीक प्रतिरक्षी की सांद्रता पर उपस्थित हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — X व Y में ऐसा कोई एपिटोप साझा नहीं जिसे प्रतिसीरम पहचानता हो

    प्रत्येक प्रतिजन अपने विशिष्ट प्रतिरक्षियों के साथ अपनी रेखा बनाता है; यदि दोनों प्रतिजनों में कोई एपिटोप साझा न हो, तो कोई भी रेखा दूसरे के प्रतिरक्षियों को नहीं रोकती और रेखाएँ एक-दूसरे को काटती हैं (असर्वसमता)। समान प्रतिजन ऐसी रेखाएँ देते हैं जो सहज रूप से एक चाप में जुड़ जाती हैं (सर्वसमता), और अतिरिक्त एपिटोप वाला प्रतिजन स्पर सहित जुड़ी रेखाएँ देता है (आंशिक सर्वसमता)। यह प्रतिरूप एपिटोप-साझेदारी बताता है, सांद्रता नहीं।
  13. एक प्रयोगशाला को एक एकक्लोनी प्रतिरक्षी की सहायता से सीरम में एक छोटे औषधि-अणु (हैप्टेन-आकार, एक ही एपिटोप वाला) को मापना है। कौन-सा परख-प्रारूप उपयुक्त है, और उसका संकेत कैसे व्यवहार करता है?

    1. सैंडविच ELISA, जिसमें औषधि-सांद्रता बढ़ने पर संकेत बढ़ता है
    2. प्रतिस्पर्धी ELISA, जिसमें औषधि-सांद्रता बढ़ने पर संकेत घटता है
    3. अप्रत्यक्ष ELISA, जिसमें संकेत औषधि के विरुद्ध रोगी के प्रतिरक्षी बताता है
    4. प्रतिस्पर्धी ELISA, जिसमें औषधि-सांद्रता बढ़ने पर संकेत बढ़ता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — प्रतिस्पर्धी ELISA, जिसमें औषधि-सांद्रता बढ़ने पर संकेत घटता है

    सैंडविच के लिए दो प्रतिरक्षी एक साथ दो अलग एपिटोपों पर बँधने चाहिए, जो एक छोटे एपिटोप वाला अणु नहीं दे सकता। प्रतिस्पर्धी ELISA में नमूने की औषधि सीमित प्रतिरक्षी हेतु चिह्नित (या प्लेट-बंधित) औषधि की निश्चित मात्रा से प्रतिस्पर्धा करती है, अतः नमूने में अधिक औषधि का अर्थ कम चिह्न पकड़ा जाना और कम संकेत है। अप्रत्यक्ष ELISA प्रतिरक्षी मापता है, औषधि नहीं।
  14. इंसुलिन की रेडियो-प्रतिरक्षा परख में ¹²⁵I-इंसुलिन की निश्चित मात्रा व प्रति-इंसुलिन प्रतिरक्षी की सीमित मात्रा का मानकों या रोगी के सीरम के साथ ऊष्मायन किया जाता है। नमूने में इंसुलिन-सांद्रता बढ़ने पर प्रतिरक्षी-बंधित अंश की रेडियोधर्मिता

    1. बढ़ती है, क्योंकि अब कुल मिलाकर अधिक इंसुलिन प्रतिरक्षी से बँधा है
    2. स्थिर रहती है, क्योंकि प्रत्येक नली में प्रतिरक्षी की मात्रा समान है
    3. बढ़ती है, क्योंकि नमूने का इंसुलिन प्रतिरक्षियों को अधिक चिह्न वाले बड़े जालक में तिर्यक-बंधित करता है
    4. घटती है, क्योंकि अचिह्नित इंसुलिन सीमित स्थल चिह्नित इंसुलिन से छीन लेता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — घटती है, क्योंकि अचिह्नित इंसुलिन सीमित स्थल चिह्नित इंसुलिन से छीन लेता है

    स्थल सीमित व निश्चित हैं, अतः चिह्नित व अचिह्नित इंसुलिन उन्हें अपनी मात्राओं के अनुपात में बाँटते हैं। नमूने में अधिक इंसुलिन का अर्थ ट्रेसर का छोटा हिस्सा है, अतः बँधी गणना घटती और मुक्त गणना बढ़ती है; मानक वक्र इसी उलटी दिशा में पढ़ा जाता है। कुल बँधा इंसुलिन बंधन-क्षमता के निकट बना रह सकता है, पर केवल चिह्नित भाग गिना जाता है।
  15. हाइब्रिडोमा निर्माण के दौरान असंलयित मायलोमा कोशिकाएँ HAT माध्यम में क्यों मर जाती हैं?

    1. ऐमिनोप्टेरिन न्यूक्लियोटाइडों का नव-संश्लेषण रोकता है, और HGPRT के अभाव में वे प्यूरिनों का बचाव-पथ नहीं अपना सकतीं
    2. वे अमर नहीं हैं, अतः संवर्धन में रखे जाने के कुछ दिनों के भीतर विभाजन रोककर मर जाती हैं
    3. हाइपोज़ैन्थीन उन सभी कोशिकाओं के लिए विषैला है जो अपना प्रतिरक्षी स्रावित करने की क्षमता खो चुकी हैं
    4. माध्यम में थाइमिडीन उस HGPRT एंज़ाइम का संदमन करता है जिस पर मायलोमा कोशिकाएँ वृद्धि हेतु निर्भर हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — ऐमिनोप्टेरिन न्यूक्लियोटाइडों का नव-संश्लेषण रोकता है, और HGPRT के अभाव में वे प्यूरिनों का बचाव-पथ नहीं अपना सकतीं

    ऐमिनोप्टेरिन, एक फ़ोलेट-प्रतिपक्षी, डाइहाइड्रोफ़ोलेट रिडक्टेज़ और इस प्रकार प्यूरिन व थाइमिडिलेट के नव-संश्लेषण का संदमन करता है; तब जीवित रहने हेतु बचाव-पथ के एंज़ाइम चाहिए, जिनमें हाइपोज़ैन्थीन हेतु HGPRT भी है। मायलोमा साथी जानबूझकर HGPRT-हीन चुना जाता है, अतः अकेले वह मर जाता है। अमरता का अभाव असंलयित B कोशिकाओं के मरने का कारण है, यही भ्रामक विकल्प है। हाइपोज़ैन्थीन व थाइमिडीन बचाव-पथ के क्रियाधार हैं, विष या संदमक नहीं।
  16. हड्डियों में दर्द वाले एक रोगी का सीरम प्रतिरक्षा-वैद्युतकण-संचलन प्रति-IgG व प्रति-κ प्रतिसीरमों के साथ γ क्षेत्र में एक सघन, स्थानीय रूप से उभरा चाप दिखाता है, जबकि प्रति-λ प्रतिसीरम वाला चाप हल्का व सामान्य आकार का है। कौन-सी व्याख्या सबसे उपयुक्त है?

    1. IgG में बहुक्लोनी वृद्धि, जैसी दीर्घकालिक संक्रमण में होती है, जिसमें κ- व λ-युक्त प्रतिरक्षी साथ-साथ बढ़ते हैं
    2. एकक्लोनी IgG-λ इम्यूनोग्लोबुलिन, क्योंकि λ चाप ही वह है जिसने अपना सामान्य आकार बनाए रखा है
    3. एक विस्तारित प्लाज़्मा-कोशिका क्लोन द्वारा बना एकक्लोनी IgG-κ इम्यूनोग्लोबुलिन, जैसा मल्टिपल मायलोमा में होता है
    4. IgG की कमी, जैसी वंशागत प्रतिरक्षी-न्यूनता में होती है, जिससे केवल λ चाप दिखाई देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — एक विस्तारित प्लाज़्मा-कोशिका क्लोन द्वारा बना एकक्लोनी IgG-κ इम्यूनोग्लोबुलिन, जैसा मल्टिपल मायलोमा में होता है

    एक प्लाज़्मा-कोशिका क्लोन एक भारी-शृंखला वर्ग व एक हल्की-शृंखला प्रकार स्रावित करता है, अतः उसका अतिरिक्त प्रोटीन (M-प्रोटीन) केवल प्रति-IgG व प्रति-κ से बने चापों को विकृत करता है, और उसकी सीमित गतिशीलता चाप को स्थानीय रूप से उभार देती है। बहुक्लोनी वृद्धि में κ व λ दोनों शामिल होते हैं और चाप समान रूप से मोटे होते हैं। λ चाप सामान्य है, अतः असामान्य प्रोटीन λ नहीं है, और सघन IgG चाप IgG की कमी को खारिज करता है।
  17. फ़्लो साइटोमेट्री के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. विश्लेषण से पहले कोशिकाओं का लयन आवश्यक है ताकि उनके सतही प्रतिजन लेज़र किरण तक पहुँच सकें
    2. अग्र प्रकीर्णन मुख्यतः कोशिका-आकार और पार्श्व प्रकीर्णन आंतरिक जटिलता या कणिकामयता दर्शाता है
    3. प्रत्येक लेज़र केवल एक प्रतिदीप्तिधर को उत्तेजित कर सकता है, अतः हर अतिरिक्त रंग के लिए अलग लेज़र चाहिए
    4. प्रतिदीप्ति-सक्रियित कोशिका छँटाई यंत्र चुनी हुई कोशिका-समष्टि को जीवित एकत्र कर सकता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अग्र प्रकीर्णन मुख्यतः कोशिका-आकार और पार्श्व प्रकीर्णन आंतरिक जटिलता या कणिकामयता दर्शाता है; D — प्रतिदीप्ति-सक्रियित कोशिका छँटाई यंत्र चुनी हुई कोशिका-समष्टि को जीवित एकत्र कर सकता है

    कम कोणों पर प्रकाश-प्रकीर्णन आकार और समकोण पर आंतरिक संरचना बताता है, और FACS चुनी कोशिकाओं वाली आवेशित बूँदों को विक्षेपित कर उन्हें मारे बिना संग्रह-नलियों में भेजता है। अखंड कोशिकाओं का एक-एक कर विश्लेषण होता है; लयन उसी को नष्ट कर देगा जिसे मापना है। एक लेज़र सामान्यतः ऐसे कई प्रतिदीप्तिधरों को उत्तेजित करता है जिनका उत्तेजन-बैंड साझा हो पर उत्सर्जन भिन्न तरंगदैर्ध्य पर हो, जिन्हें अलग फ़िल्टरों से पढ़ा जाता है।
  18. एकक्लोनी प्रतिरक्षियों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. एक एकक्लोनी प्रतिरक्षी के सभी अणुओं का पैराटोप समान होता है और वे एक ही एपिटोप से बँधते हैं
    2. एक एकक्लोनी प्रतिरक्षी अपने एपिटोप की एक प्रति वाले एकलकी प्रोटीन के साथ सरलता से अवक्षेपण-जालक बनाता है
    3. मानवीकृत प्रतिरक्षी चूहे के प्रतिरक्षियों से उत्पन्न मानव प्रति-चूहा प्रतिरक्षी अनुक्रिया को घटाते हैं
    4. हाइब्रिडोमा में HGPRT मायलोमा साथी से और अमरता प्लीहा की B कोशिका से मिलती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — एक एकक्लोनी प्रतिरक्षी के सभी अणुओं का पैराटोप समान होता है और वे एक ही एपिटोप से बँधते हैं; C — मानवीकृत प्रतिरक्षी चूहे के प्रतिरक्षियों से उत्पन्न मानव प्रति-चूहा प्रतिरक्षी अनुक्रिया को घटाते हैं

    एकक्लोनी प्रतिरक्षी एक ही आणविक प्रजाति है, अतः एक पैराटोप व एक एपिटोप; और मानवीकरण में केवल चूहे के CDR रखे जाते हैं, अतः बहुत कम विदेशी प्रोटीन HAMA उत्पन्न करता है। जालक हेतु बहुसंयोजी प्रतिजन चाहिए: एपिटोप की एक प्रति वाला एकलक केवल एक प्रतिरक्षी से बँध सकता है, अतः तिर्यक-बंधित अवक्षेप नहीं बनता। हाइब्रिडोमा में भूमिकाएँ उस कथन से उलटी हैं: HGPRT B कोशिका से और अमरता मायलोमा से मिलती है।