भारतीय साहित्यिक व सौंदर्यपरक परंपराएँ: रस, ध्वनि व संस्कृत काव्यशास्त्र के संप्रदाय
2. रस व भरत का नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra)
सबसे पुरानी परत नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra) की रस-व्यवस्था है, जो परंपरागत रूप से भरत से श्रेयित है और सामान्यतः लगभग दूसरी शताब्दी ईसा-पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच की मानी जाती है। इसका प्रसिद्ध रस-सूत्र कहता है कि “रस विभाव (कारण — स्थिति व उसके हेतु), अनुभाव (परिणाम — बाह्य प्रतिक्रियाएँ) व व्यभिचारिभाव (संचारी/अस्थायी भाव) के संयोग (saṃyoga) से उत्पन्न होता है।” श्रोता-दर्शक में प्रसुप्त एक स्थायी भाव (स्थायिभाव) इस रंगमंचीय संयोग से रस — आस्वादित सौंदर्यपरक भाव — तक उठाया जाता है। अतः रस दर्शक के अनुभव का गुण है, केवल पात्र का नहीं।
नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra) पहले रंगमंच की और दूसरे स्थान पर काव्यशास्त्र की पुस्तिका है: यह नाटक को प्रदर्शन मानता है और चार प्रकार के अभिनय (निरूपण) गिनाता है — आंगिक (देह की मुद्राएँ), वाचिक (वाणी), आहार्य (वेश-भूषा व श्रृंगार) और सात्त्विक (आंतरिक भावना के अनैच्छिक संकेत, जैसे अश्रु या कंपन)। अतः रस पहले यह सिद्धांत है कि प्रदर्शन दर्शकों को कैसे भावविभोर करता है, और बाद में ही पृष्ठ पर पढ़ी जाने वाली कविताओं तक बढ़ाया गया।
भरत आठ रस गिनाते हैं, प्रत्येक एक स्थायी भाव से युग्मित: शृंगार (रति/प्रेम से), हास्य (हास/हँसी से), करुण (शोक से), रौद्र (क्रोध से), वीर (उत्साह से), भयानक (भय से), बीभत्स (जुगुप्सा/घृणा से) व अद्भुत (विस्मय से)। एक नौवाँ रस, शांत (शम/प्रशांति से), बाद में जोड़ा गया और उसकी स्वीकृति विशेष रूप से अभिनवगुप्त से संबद्ध है।
3. रस-सूत्र के चार व्याख्याता
रस-सूत्र में निष्पत्ति (“उत्पत्ति/होना”) शब्द ने चार शास्त्रीय व्याख्याओं को जन्म दिया, जो मुख्यतः अभिनवगुप्त की टीका से सुरक्षित हैं। विवाद इस पर है कि रस कहाँ व कैसे होता है — पात्र में, अभिनेता में या दर्शक में — और अंतिम मत परंपरा में मानक मत बन गया।
- भट्ट लोल्लट — उत्पत्तिवाद: रस वस्तुतः मूल पात्र में (और उसके विस्तार से अभिनेता में) संयोग द्वारा उत्पन्न होता है और उसी का होता है; यह सीधी उत्पत्ति है।
- श्री शंकुक — अनुमितिवाद: दर्शक भाव को सीधे अनुभव नहीं करता, बल्कि अभिनेता में उसका अनुमान करता है, जैसे धुएँ से अग्नि का; रस अनुमान से ज्ञात होता है।
- भट्ट नायक — भुक्तिवाद: रस न उत्पन्न होता है न अनुमित, वरन् भोगा/आस्वादित होता है, एक विशेष शक्ति द्वारा जो भाव का साधारणीकरण (sādhāraṇīkaraṇa) करती है, उसे व्यक्ति से मुक्त कर देती है ताकि दर्शक उसे निर्वैयक्तिक रूप से आस्वादे।
- अभिनवगुप्त — अभिव्यक्तिवाद: नायक के साधारणीकरण पर आधारित, रस पहले से प्रसुप्त होता है और दर्शक के समक्ष अभिव्यक्त/व्यंजित होता है, जिसे एक स्वयंप्रकाश, अलौकिक आनंद (आत्मानंद के सदृश) के रूप में आस्वादा जाता है। यही मानक, सर्वाधिक प्रभावशाली व्याख्या बनी।
4. अलंकार व रीति: अलंकरण व शैली
अलंकार संप्रदाय अलंकारों को काव्य का सार बनाता है। भामह व दंडी (जिनका काव्यादर्श आधारभूत ग्रंथ है) अलंकारों को शब्द के (शब्दालंकार, जैसे अनुप्रास) व अर्थ के (अर्थालंकार, जैसे उपमा व रूपक) में वर्गीकृत करते हैं, और अलंकरण को वह मानते हैं जो साधारण कथन को काव्य तक उठाता है। इस संप्रदाय हेतु कविता सुंदर इसलिए है कि वह अलंकृत है।
इसके बजाय वामन का रीति संप्रदाय घोषित करता है कि “रीति काव्य की आत्मा है” (रीतिरात्मा काव्यस्य, rītir ātmā kāvyasya)। रीति शब्दों की एक विशिष्ट संरचना है जो विशेष गुणों — जैसे माधुर्य, ओज व प्रसाद — से चिह्नित होती है। वामन क्षेत्रीय शैलियाँ गिनाते हैं — वैदर्भी (परिष्कृत, दक्षिणी शैली जिसकी वे सर्वाधिक प्रशंसा करते हैं), गौड़ी (अलंकृत, ओजस्वी पूर्वी शैली) व पांचाली — अतः उनके लिए काव्य-उत्कर्ष केवल अलंकार का नहीं, वरन् उचित पदरचना व गुणों का विषय है।
5. ध्वनि, वक्रोक्ति व औचित्य
सर्वाधिक प्रभावशाली मोड़ आनंदवर्धन (नौवीं शताब्दी, कश्मीर) का ध्वनि सिद्धांत है, उनके ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka) में: काव्य की आत्मा ध्वनि (व्यंग्य/सुझाव) है, वह अनकहा अर्थ जिसे शब्द अपने अभिधेय व लाक्षणिक अर्थों से परे जगाते हैं। वे शब्द की तीन शक्तियाँ भेद करते हैं — अभिधा (अभिधेय, वाच्य अर्थ), लक्षणा (लाक्षणिक) व व्यंजना (सुझाव) — और व्यंग्य अर्थ को वस्तु-ध्वनि (सुझाया गया तथ्य/विचार), अलंकार-ध्वनि (सुझाया गया अलंकार) व रस-ध्वनि (सुझाया गया रस) में बाँटते हैं, जिनमें अंतिम सर्वोच्च है। अभिनवगुप्त ने अपनी टीकाओं लोचन (Locana) (ध्वन्यालोक पर) व अभिनवभारती (Abhinavabhāratī) (नाट्यशास्त्र पर) में रस व ध्वनि को मिला दिया: रस ठीक व्यंजना द्वारा ही सिद्ध होता है।
आनंदवर्धन ध्वनि को इस आधार पर भी बाँटते हैं कि वाच्य अर्थ कैसे व्यवहार करता है। अविवक्षित-वाच्य (लक्षणा-मूला भी कहलाती) ध्वनि में वाच्य अर्थ विवक्षित नहीं होता और परे रख दिया जाता है, जैसे “गंगा पर गाँव”, जहाँ वाच्य अर्थ “तट पर” के लिए हट जाता है और शीतलता व पावनता का एक और अर्थ सुझाया जा सकता है। विवक्षितान्य-पर-वाच्य (अभिधा-मूला) ध्वनि में वाच्य अर्थ विवक्षित होता है पर आगे एक और व्यंग्य अर्थ तक ले जाता है। व्यंजना लक्षणा से इसलिए भिन्न है कि लक्षणा हेतु वाच्य अर्थ में बाधा चाहिए, जबकि व्यंजना तब भी चलती है जब वाच्य अर्थ बना रहे।
दो और मत इस समूह को पूरा करते हैं। कुंतक अपने वक्रोक्तिजीवित (Vakroktijīvita) में वक्रोक्ति — कवि की सर्जनात्मक कुशलता (वैदग्ध्य) से उपजा वाणी का “वक्र” या कलात्मक मोड़ — को काव्य का जीवन बनाते हैं; वे वक्रता का विश्लेषण अनेक स्तरों पर करते हैं, एकल वर्ण व पद से लेकर संपूर्ण रचना तक। क्षेमेन्द्र (ग्यारहवीं शताब्दी, परंपरागत रूप से अभिनवगुप्त के शिष्य माने जाते हैं) अपने औचित्यविचारचर्चा (Aucityavicāracarcā) में तर्क देते हैं कि औचित्य काव्य का प्राण है: प्रत्येक तत्त्व अपने संदर्भ के अनुकूल होना चाहिए, और एक भी अनौचित्य रस को बिगाड़ सकता है, अतः औचित्य अलंकार, रीति व ध्वनि सभी का शासन करता है।
6. मम्मट का समन्वय व अन्य देशज प्रणालियाँ
मम्मट (लगभग ग्यारहवीं–बारहवीं शताब्दी) ने अपने काव्यप्रकाश (Kāvyaprakāśa) में संस्कृत काव्यशास्त्र का सर्वाधिक पठित ग्रंथ लिखा, ध्वनि का पक्ष लेते हुए व समस्त क्षेत्र को व्यवस्थित करते हुए। वे काव्य को ऐसा शब्द व अर्थ परिभाषित करते हैं जो निर्दोष (अदोष) हो व गुणों से युक्त हो, अलंकार कभी-कभी ही आवश्यक; वे काव्य के हेतु गिनाते हैं — शक्ति (सहज प्रतिभा), व्युत्पत्ति (निपुणता/ज्ञान) व अभ्यास; और काव्य को तीन श्रेणियों में बाँटते हैं — उत्तम (ध्वनि-काव्य), जहाँ व्यंग्य अर्थ प्रधान हो; मध्यम (गुणीभूत-व्यंग्य), जहाँ व्यंजना वाच्य के अधीन हो; व निम्नतम अवर/चित्र, जो वास्तविक व्यंजना से रहित मात्र शाब्दिक या आलंकारिक प्रदर्शन है।
संस्कृत परंपरा से परे भारत में अन्य देशज काव्यशास्त्र भी हैं। तमिल तोल्काप्पियम् (Tolkāppiyam) काव्य को अकम् (akam) (प्रेम की “आंतरिक” कविता) व पुरम् (puram) (युद्ध व सार्वजनिक जीवन की “बाह्य” कविता) में वर्गीकृत करता है, और भावात्मक स्थितियों को पाँच भू-दृश्यों (तिणै, tiṇai) — पर्वत, वन, कृषि-भूमि, समुद्रतट व ऊसर — पर आरोपित करता है, प्रत्येक परंपरागत रूप से प्रेम की किसी अवस्था से जुड़ा। ये प्रणालियाँ किसी कृति की व्याख्या यह पूछकर करती हैं कि वह किस भू-दृश्य व प्रकार की है, ठीक जैसे रस-सिद्धांत पूछता है कि वह किस भाव का सौंदर्यीकरण करती है।
7. कवि, पाठक व परवर्ती काव्यशास्त्री
राजशेखर (लगभग नौवीं शताब्दी के अंत से दसवीं के आरंभ), अपने काव्यमीमांसा (Kāvyamīmāṃsā) में, प्रतिभा (सर्जनात्मक प्रज्ञा) के दो प्रकार भेद करते हैं: कारयित्री, कवि की, जो रचती है, और भावयित्री, पाठक की, जो रसास्वाद करती है। इस प्रकार संवेदनशील पाठक काव्य में सहभागी है। आदर्श पाठक सहृदय (“जिसका हृदय अनुकूल हो”) है, यह पद आनंदवर्धन व अभिनवगुप्त ने उस रसिक के लिए प्रयुक्त किया जिसके माध्यम से रस सिद्ध होता है।
परवर्ती परिभाषाएँ दिखाती हैं कि प्रत्येक लेखक किस संप्रदाय की विरासत पाता है। विश्वनाथ (चौदहवीं शताब्दी) अपने साहित्यदर्पण (Sāhityadarpaṇa) में काव्य को “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” (vākyaṃ rasātmakaṃ kāvyam), अर्थात् “रसात्मक वाक्य”, परिभाषित करते हैं, जो रस संप्रदाय का नारा है। जगन्नाथ (सत्रहवीं शताब्दी) अपने रसगंगाधर (Rasagaṅgādhara) में उसे ऐसा शब्द परिभाषित करते हैं जो रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करे। भक्ति-परंपराओं में रूप गोस्वामी (सोलहवीं शताब्दी) अपने भक्तिरसामृतसिंधु (Bhaktirasāmṛtasindhu) में भक्ति को ही एक रस मानते हैं, जो दिखाता है कि रस-ढाँचा अपने रंगमंचीय मूल से आगे भी जीवित रहा।
मुख्य बिंदु
- संस्कृत काव्यशास्त्र पूछता है कि काव्य की आत्मा क्या है; छह संप्रदाय इसका उत्तर रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति व औचित्य से देते हैं, प्रत्येक का एक प्रमुख आचार्य व ग्रंथ है।
- भरत का नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra) रस-सूत्र देता है: रस विभाव + अनुभाव + व्यभिचारिभाव के स्थायिभाव पर क्रिया से उत्पन्न होता है। आठ रस, शांत बाद में जोड़ा गया; शोक जैसा स्थायिभाव स्वयं करुण रस नहीं है।
- रस-सूत्र के चार व्याख्याता थे: लोल्लट (उत्पत्ति), शंकुक (अनुमिति), भट्ट नायक (भुक्ति, साधारणीकरण द्वारा) व अभिनवगुप्त (अभिव्यक्ति/व्यंजना), अंतिम मानक व्याख्या बनी।
- अलंकार (भामह, दंडी) अलंकारों को केंद्रीय बनाता है; रीति (वामन) शैली को आत्मा बनाती है — रीतिरात्मा काव्यस्य (rītir ātmā kāvyasya) — गुणों (माधुर्य, ओज, प्रसाद) व शैलियों वैदर्भी, गौड़ी, पांचाली के साथ।
- आनंदवर्धन का ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka) ध्वनि (व्यंग्य अर्थ) को आत्मा बनाता है: अभिधा/लक्षणा/व्यंजना, व वस्तु-, अलंकार- व रस-ध्वनि (सर्वोच्च)। अभिनवगुप्त की लोचन (Locana) व अभिनवभारती (Abhinavabhāratī) रस को ध्वनि से मिलाती हैं।
- कुंतक का वक्रोक्तिजीवित (Vakroktijīvita) वक्रोक्ति को काव्य का जीवन बनाता है; क्षेमेन्द्र का औचित्यविचारचर्चा (Aucityavicāracarcā) औचित्य को; मम्मट का काव्यप्रकाश (Kāvyaprakāśa) सबका समन्वय करता है, काव्य को उत्तम (ध्वनि), मध्यम (गुणीभूत-व्यंग्य) व चित्र में श्रेणीबद्ध करते हुए।
- परवर्ती काव्यशास्त्र: राजशेखर की दो प्रतिभाएँ (कारयित्री व भावयित्री) व सहृदय पाठक; विश्वनाथ का “रसात्मक वाक्य”; जगन्नाथ का “रमणीय अर्थ”; रूप गोस्वामी का भक्ति-रस।
अभ्यास प्रश्न (16)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
रस का सिद्धांत पहली बार किस कृति में प्रस्तुत होता है, जो परंपरागत रूप से किस आचार्य से श्रेयित है?
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उत्तर: D — नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra), भरत से श्रेयित
रस-सिद्धांत नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra) में उद्भूत होता है, जो परंपरागत रूप से भरत को श्रेयित है। ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka; आनंदवर्धन) ध्वनि का ग्रंथ है, काव्यप्रकाश (Kāvyaprakāśa; मम्मट) बाद का समन्वय है, और वक्रोक्तिजीवित (Vakroktijīvita; कुंतक) वक्रोक्ति का पक्ष लेता है — ये सभी बाद की कृतियाँ हैं जो रस की नींव रखने के बजाय उसे पूर्वमान्य लेती हैं।भरत के रस-सूत्र के अनुसार, रस किन तीन तत्त्वों के संयोग से उत्पन्न होता है?
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उत्तर: A — विभाव, अनुभाव व व्यभिचारिभाव (कारण, परिणाम व संचारी भाव)
सूत्र विभाव, अनुभाव व व्यभिचारिभाव को नाम देता है। स्थायिभाव वह है जिस पर ये क्रिया करते हैं, संयुक्त तीन कारकों में से एक नहीं, इसीलिए स्थायिभाव डालने वाला विकल्प ग़लत है। अभिधा/लक्षणा/व्यंजना ध्वनि-सिद्धांत के हैं, और रीति/वक्रोक्ति/औचित्य प्रतिद्वंद्वी संप्रदाय हैं।शृंगार रस के मूल में जो स्थायिभाव है, वह है:
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उत्तर: C — रति (प्रेम)
रति (प्रेम) शृंगार के पीछे का स्थायिभाव है। शोक करुण के, उत्साह वीर के, और हास हास्य के मूल में है; प्रत्येक रस को उसके भिन्न स्थायिभाव से मिलाना यहाँ की मानक परीक्षा है।रस-सूत्र के एक व्याख्याता ने माना कि दर्शक भाव को सीधे अनुभव नहीं करता, वरन् अभिनेता में उसका अनुमान करता है, जैसे कोई धुएँ से अग्नि का अनुमान करे। यह किसका मत है?
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उत्तर: B — श्री शंकुक, जिन्होंने माना रस अनुमित (अनुमिति) होता है
दृश्य चिह्नों से छिपी अवस्था का अनुमान, जैसे धुएँ से अग्नि का, शंकुक के अनुमितिवाद का तर्क है, जो रस को अनुमान पर आधृत करता है। लोल्लट कहते हैं रस पात्र में वस्तुतः उत्पन्न होता है; नायक कहते हैं वह साधारणीकरण द्वारा भोगा जाता है; अभिनवगुप्त कहते हैं वह व्यंजित व अभिव्यक्त होता है — इनमें से कोई किसी चिह्न से अनुमान नहीं है।किस व्याख्याता ने तर्क दिया कि रस न उत्पन्न होता है न अनुमित, वरन् आस्वादित होता है, एक विशेष शक्ति द्वारा जो भाव का साधारणीकरण (sādhāraṇīkaraṇa) कर उसे विशिष्ट व्यक्ति से परे ले जाती है?
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उत्तर: D — भट्ट नायक
साधारणीकरण व “भोग/आस्वाद” का विवरण भट्ट नायक का योगदान है, जिस पर अभिनवगुप्त ने आगे निर्माण किया। लोल्लट (उत्पत्ति) व शंकुक (अनुमिति) भिन्न क्रियाविधि देते हैं, और दंडी अलंकार संप्रदाय के हैं, रस-सूत्र विवाद के हैं ही नहीं।रस-सिद्धांत के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं? P: भरत आठ रस गिनाते हैं। Q: नौवाँ रस, शांत, बाद में जोड़ा गया और उसकी स्वीकृति अभिनवगुप्त से संबद्ध है। R: स्थायिभाव अपने रस के साथ बस समरूप (एक ही) होता है। S: अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद (अभिव्यक्ति) रस-सूत्र की मानक, सर्वाधिक प्रभावशाली व्याख्या बना।
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उत्तर: A — P — भरत आठ रस गिनाते हैं; B — Q — शांत बाद में जोड़ा गया, अभिनवगुप्त से जुड़ा; D — S — अभिव्यक्ति मानक व्याख्या बनी
भरत आठ रस देते हैं, शांत बाद का नौवाँ है जो अभिनवगुप्त से जुड़ा है, और उनका अभिव्यक्तिवाद मानक व्याख्या बना। R असत्य है: स्थायिभाव रस तभी बनता है जब विभाव–अनुभाव–व्यभिचारिभाव संयोग द्वारा उसका सौंदर्यीकरण हो, अतः दोनों समरूप नहीं हैं।नौवाँ रस, जो भरत की मूल आठ की सूची में नहीं था और बाद की परंपरा द्वारा जोड़ा गया, है:
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उत्तर: A — शांत
शांत, प्रशांति का रस, नौवाँ है, जो भरत के आठ के बाद जोड़ा गया। वीर, अद्भुत व बीभत्स सभी मूल आठ में हैं, अतः वे बाद का संयोजन नहीं हो सकते।रस-सूत्र के प्रत्येक व्याख्याता को उसके सिद्धांत से मिलाएँ। P: भट्ट लोल्लट — उत्पत्ति। Q: श्री शंकुक — अनुमिति। R: भट्ट नायक — भुक्ति। S: अभिनवगुप्त — रीति। कौन-से युग्म सही हैं?
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उत्तर: A — P — लोल्लट / उत्पत्ति; B — Q — शंकुक / अनुमिति; C — R — नायक / भुक्ति
लोल्लट (उत्पत्ति), शंकुक (अनुमिति) व नायक (भुक्ति) सही मिलाए गए हैं। अभिनवगुप्त का सिद्धांत अभिव्यक्ति (व्यंजना) है, रीति नहीं; रीति (शैली) वामन का मत है, अतः S ग़लत युग्म है।यह सिद्धांत कि काव्य की आत्मा ध्वनि (व्यंग्य/सुझाव) है, आनंदवर्धन किस कृति में प्रस्तुत करते हैं?
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उत्तर: C — ग्रंथ ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka)
ध्वनि-सिद्धांत आनंदवर्धन के ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka) में प्रतिष्ठित है। नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra) भरत का रस-ग्रंथ है, काव्यादर्श (Kāvyādarśa) दंडी का अलंकार-ग्रंथ है, और औचित्यविचारचर्चा (Aucityavicāracarcā) क्षेमेन्द्र की औचित्य पर कृति है।ध्वनि-सिद्धांत में किसी कविता का व्यंग्य अर्थ शब्द की तीन शक्तियों में से किससे उत्पन्न होता है?
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उत्तर: B — व्यंजना, जो व्यंग्य (सुझाया गया) अर्थ देती है
व्यंजना वह शक्ति है जो व्यंग्य अर्थ देती है, और ध्वनि वही काव्य है जिसमें यह प्रधान हो। अभिधा वाच्य व लक्षणा लाक्षणिक अर्थ देती है; प्रतिभा कवि की प्रतिभा है, जो काव्य का हेतु है, कोई अर्थ-शक्ति नहीं।यह सूक्ति “रीतिरात्मा काव्यस्य” (rītir ātmā kāvyasya) — रीति (शैली) काव्य की आत्मा है — किस आचार्य का केंद्रीय दावा है?
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उत्तर: D — वामन
“रीति काव्य की आत्मा है” वामन की उक्ति है, जो रीति संप्रदाय की नींव रखती है। कुंतक वक्रोक्ति के, भरत रस के, और क्षेमेन्द्र औचित्य के पक्षधर हैं — प्रत्येक काव्य की आत्मा हेतु भिन्न प्रत्याशी।एक आचार्य मानते हैं कि काव्य का जीवन वक्रोक्ति में है — कवि की सर्जनात्मक कुशलता (वैदग्ध्य) से उपजा वाणी का कलात्मक, “वक्र” मोड़ — जिसका विश्लेषण एकल ध्वनि से लेकर संपूर्ण रचना तक के स्तरों पर होता है। यह किसका मत है?
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उत्तर: A — कुंतक, वक्रोक्तिजीवित (Vakroktijīvita) में
वक्रोक्ति को काव्य का जीवन, वैदग्ध्य से परिभाषित व स्तरों पर विश्लेषित, कुंतक के वक्रोक्तिजीवित (Vakroktijīvita) में है। क्षेमेन्द्र औचित्य को, आनंदवर्धन ध्वनि को, और वामन रीति को केंद्रीय बनाते हैं — अतः प्रत्येक काव्य की भिन्न आत्मा को नाम देता है।अभिनवगुप्त की दो प्रसिद्ध टीकाएँ, लोचन (Locana) व अभिनवभारती (Abhinavabhāratī), क्रमशः किन पर टीकाएँ हैं?
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उत्तर: C — ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka) व नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra)
लोचन (Locana) आनंदवर्धन के ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka) पर व अभिनवभारती (Abhinavabhāratī) भरत के नाट्यशास्त्र (Nāṭyaśāstra) पर टीका है; इन्हीं के द्वारा अभिनवगुप्त ने रस को ध्वनि से मिलाया। युग्म को उलटने वाला विकल्प भ्रामक भूल है, और शेष उन ग्रंथों को नाम देते हैं जिन पर उन्होंने इस प्रकार टीका नहीं की।मम्मट के काव्यप्रकाश (Kāvyaprakāśa) में काव्य तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है। सर्वोच्च, उत्तम काव्य, वह है जिसमें:
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उत्तर: B — व्यंग्य अर्थ वाच्य पर प्रधान रहता है
उत्तम काव्य ध्वनि-काव्य है, जहाँ व्यंग्य अर्थ प्रधान हो। वाच्य के अधीन व्यंजना मध्यम श्रेणी (गुणीभूत-व्यंग्य) है, और व्यंजना-रहित मात्र शाब्दिक/आलंकारिक प्रदर्शन निम्नतम (चित्र) है। केवल-शैली वाला विकल्प मम्मट का श्रेणी-मानदंड है ही नहीं।निम्नलिखित में से कौन-से ग्रंथ-एवं-आचार्य श्रेय सही हैं? P: वक्रोक्तिजीवित (Vakroktijīvita) — कुंतक। Q: औचित्यविचारचर्चा (Aucityavicāracarcā) — क्षेमेन्द्र। R: काव्यप्रकाश (Kāvyaprakāśa) — मम्मट। S: ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka) — वामन।
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उत्तर: A — P — वक्रोक्तिजीवित (Vakroktijīvita) / कुंतक; B — Q — औचित्यविचारचर्चा (Aucityavicāracarcā) / क्षेमेन्द्र; C — R — काव्यप्रकाश (Kāvyaprakāśa) / मम्मट
कुंतक ने वक्रोक्तिजीवित (Vakroktijīvita), क्षेमेन्द्र ने औचित्यविचारचर्चा (Aucityavicāracarcā) व मम्मट ने काव्यप्रकाश (Kāvyaprakāśa) लिखा। ध्वन्यालोक (Dhvanyāloka) आनंदवर्धन का है, वामन का नहीं (जिन्होंने रीति संप्रदाय की नींव रखी), अतः S ग़लत श्रेय है।तमिल काव्य-परंपरा के तोल्काप्पियम् (Tolkāppiyam) में अकम् (akam) व पुरम् (puram) का भेद किसके बीच का भेद है?
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उत्तर: A — प्रेम की “आंतरिक” कविता बनाम युद्ध व सार्वजनिक जीवन की “बाह्य” कविता
अकम् प्रेम व निजी अनुभव की “आंतरिक” कविता है, और पुरम् युद्ध, राजत्व व सार्वजनिक जीवन की “बाह्य” कविता; अकम् की स्थितियाँ आगे पाँच भू-दृश्यों (तिणै, tiṇai) पर आरोपित होती हैं। यह भेद विषयगत है, भाषा, माध्यम या भक्ति का नहीं।