पश्चिमी समालोचना-सिद्धांत व अंतरविषयी क्षेत्र: संरचनावाद से उत्तर-मानववाद तक
2. मार्क्सवाद व नारीवाद
मार्क्सवादी आलोचना साहित्य को आर्थिक आधार (base) व उसे टिकाए रखने में सहायक सांस्कृतिक अधिरचना (superstructure) के संबंध में पढ़ती है, और पाठ को विचारधारा (ideology) से आकारित मानती है — वे विचार जो किसी वर्ग-व्यवस्था को स्वाभाविक जान पड़ने देते हैं। बाद के मार्क्सवादियों ने यांत्रिक आधार–अधिरचना कड़ी को ढीला किया: अंतोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) ने वर्चस्व (hegemony) का सिद्धांत दिया (केवल बल नहीं, सहमति से शासन); लुई आल्थ्यूसर (Louis Althusser) ने बताया कि वैचारिक राज्य-तंत्र (Ideological State Apparatuses) कैसे अभिसंबोधन (interpellation) द्वारा कर्ताओं का गठन करते हैं; फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल (Frankfurt School) (एडोर्नो व हॉर्कहाइमर) ने संस्कृति-उद्योग (culture industry) पर प्रहार किया; वाल्टर बेन्यामिन (Walter Benjamin) ने यांत्रिक पुनरुत्पादन में कलाकृति की “आभा (aura)” के ह्रास का विश्लेषण किया; रेमंड विलियम्स (Raymond Williams) ने सांस्कृतिक भौतिकवाद विकसित किया, और फ़्रेड्रिक जेमसन (Fredric Jameson) ने आलोचकों से कहा कि “सदैव इतिहासपरक बनो।”
नारीवादी आलोचना पूछती है कि पाठ लिंग (gender) की रचना कैसे करते हैं और पुरुष-केंद्रित मानक-सूची ने स्त्रियों को कैसे पढ़ा है। वर्जिनिया वुल्फ़ (Virginia Woolf) की A Room of One’s Own (1929) ने स्त्री-लेखन को भौतिक स्थितियों से जोड़ा; सीमोन द बोउवार (Simone de Beauvoir) की The Second Sex (1949) ने तर्क दिया कि “स्त्री जन्म नहीं लेती, बनाई जाती है,” जिससे sex व gender अलग हुए। द्वितीय-लहर कार्य केट मिलेट (Kate Millett) की Sexual Politics (1970) से लेकर इलेन शोवॉल्टर (Elaine Showalter) की गाइनोक्रिटिसिज़्म (gynocriticism) (स्त्रियों का लेखिका के रूप में अध्ययन) तथा गिल्बर्ट व गूबर (Gilbert and Gubar) की The Madwoman in the Attic (1979) तक फैला। फ़्रांसीसी नारीवादियों — एलेन सिक्सू (Hélène Cixous) (écriture féminine), ल्यूस इरिगरे (Luce Irigaray), क्रिस्तेवा — ने लेखन को स्त्री-देह व सांकेतिक (semiotic) से जोड़ा। जूडिथ बटलर (Judith Butler) की Gender Trouble (1990) ने gender को निष्पादनात्मकता (performativity) के रूप में पुनर्परिभाषित किया — एक स्थिर सत्ता नहीं, दोहराया जाने वाला कर्म।
3. अस्तित्ववाद, आधुनिकतावाद व उत्तर-आधुनिकतावाद
अस्तित्ववाद मानता है कि अस्तित्व सार से पहले आता है (existence precedes essence): कोई दत्त मानव-प्रकृति नहीं है, अतः हम “स्वतंत्र होने को अभिशप्त” हैं और एक निरर्थक या ईश्वर-रहित विश्व में अपने चयनों से अर्थ रचना करनी होती है। ज़ां-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) (Being and Nothingness) ने इसे एक तंत्र बनाया व मिथ्या-निष्ठा (bad faith) शब्द गढ़ा (स्वतंत्रता से आत्म-प्रवंचक पलायन); अल्बेर कामू (Albert Camus) ने निरर्थकता (absurd) की पड़ताल की; सीमोन द बोउवार ने इसे नारीवादी व नैतिक मोड़ दिया। इसका साहित्यिक चिह्न व्यथा के समक्ष अकेला चयनकर्ता है, जैसे सार्त्र की Nausea व कामू की The Outsider में।
आधुनिकतावाद (लगभग 1890 से 1940 का दशक) ने “मेक इट न्यू (make it new)” (एज़रा पाउंड) के नारे तले यथार्थवादी रूढ़ि को तोड़ा: रूपगत प्रयोग, विखंडन, पौराणिक पद्धति, और जॉयस, वुल्फ़ व फ़ॉक्नर में चेतना-प्रवाह (stream of consciousness), जिसका प्रतीक टी. एस. एलियट की The Waste Land (1922) है। उत्तर-आधुनिकतावाद (बीसवीं सदी के मध्य से) इसका उत्तर “महावृत्तांतों के प्रति अविश्वास (incredulity toward metanarratives)” (ज़ां-फ़्रांस्वा ल्योतार, The Postmodern Condition, 1979) से देता है: पेस्टीश, परिहास, क्रीड़ामय आत्म-संदर्भ, और अधि-कथा (metafiction)। ज़ां बोद्रीयार (Jean Baudrillard) ने प्रतिरूपक (simulacrum) व अति-यथार्थ (hyperreality) का वर्णन किया; लिंडा हचियन (Linda Hutcheon) ने इतिहासलेखीय अधि-कथा (historiographic metafiction) को नाम दिया; जेमसन ने उत्तर-आधुनिकतावाद को “परवर्ती पूँजीवाद (late capitalism) का सांस्कृतिक तर्क” कहा।
4. नव-इतिहासवाद, उत्तर-औपनिवेशिकतावाद व उत्तर-मानववाद
नव-इतिहासवाद, जो स्टीफ़न ग्रीनब्लैट (Stephen Greenblatt) से जुड़ा है (जिन्होंने यह पद प्रयुक्त किया व Renaissance Self-Fashioning, 1980, लिखी), किसी साहित्यिक कृति को उसके समय के अ-साहित्यिक दस्तावेज़ों के साथ एक ही “पाठ” के समान अंशों के रूप में पढ़ता है, सामाजिक ऊर्जा के संचरण (circulation of social energy) का अनुसरण करते हुए, और फ़ूको की सत्ता-विमर्श कड़ी तथा गीर्ट्स की “गहन वर्णन (thick description)” को उधार लेते हुए। इसका ब्रिटिश सजातीय, सांस्कृतिक भौतिकवाद (डोलीमोर व सिनफ़ील्ड, रेमंड विलियम्स के बाद), असहमति व वर्तमान राजनीति पर बल देता है। पुराने इतिहासवाद के विरुद्ध, यह नकारता है कि इतिहास एक स्थिर पृष्ठभूमि है जिसे कविता मात्र प्रतिबिंबित करती है।
उत्तर-औपनिवेशिकतावाद उपनिवेशवाद व उसके परवर्ती प्रभावों की संस्कृति का अध्ययन करता है। एडवर्ड सैद (Edward Said) की Orientalism (1978) ने दिखाया कि पश्चिमी विद्वत्ता ने “पूर्व (Orient)” को एक शासनयोग्य अन्य (Other) के रूप में कैसे गढ़ा, फ़ूको व ग्राम्शी से प्रेरित होकर; गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक (Gayatri Chakravorty Spivak) के “Can the Subaltern Speak?” (1988) ने पूछा कि क्या निःशब्द किए गए का प्रतिनिधित्व संभव है, और रणनीतिक सारवाद (strategic essentialism) पद भी उन्हीं से जुड़ा है; होमी के. भाभा (Homi K. Bhabha) (The Location of Culture, 1994) ने औपनिवेशिक संपर्क में संकरता (hybridity), अनुकरण (mimicry) व द्वैधभाव (ambivalence) का सिद्धांत दिया। फ़्रांत्स फ़ैनन (Frantz Fanon) (The Wretched of the Earth) साझा पूर्ववर्ती हैं, और न्गूगी वा थ्योंगो (Ngũgĩ wa Thiong’o) (Decolonising the Mind) ने भाषा को रणक्षेत्र बनाया।
उत्तर-मानववाद मनुष्य को केंद्र से हटाता है: यह एक परिबद्ध, स्वायत्त “मानव” की उदार-मानवतावादी धारणा की आलोचना करता है और मानव, पशु, मशीन व पर्यावरण के परस्पर उलझाव पर ध्यान देता है। डॉना हैरावे (Donna Haraway) के “A Cyborg Manifesto” (1985) ने देह व मशीन की सीमाएँ तोड़ीं; एन. कैथरीन हेल्स (N. Katherine Hayles) की How We Became Posthuman ने विदेह सूचना के स्वप्न पर प्रश्न उठाया; रोज़ी ब्रैडॉटी (Rosi Braidotti) की The Posthuman ने एक सकारात्मक, भौतिकवादी रूप दिया। इसे ट्रांसह्यूमनवाद (transhumanism) से अलग रखें, जो मनुष्य को केंद्र से हटाने के बजाय उसे संवर्धित व परिपूर्ण करना चाहता है।
5. सांस्कृतिक अध्ययन, फ़िल्म व मीडिया, स्मृति व आघात
सांस्कृतिक अध्ययन ब्रिटेन के बर्मिंघम सेंटर फ़ॉर कंटेम्पररी कल्चरल स्टडीज़ (Birmingham Centre for Contemporary Cultural Studies) से विकसित हुआ। रिचर्ड हॉगर्ट (Richard Hoggart) (The Uses of Literacy) व रेमंड विलियम्स (Culture and Society) ने “संस्कृति” को उच्च कला से बढ़ाकर “संपूर्ण जीवन-पद्धति” तक पहुँचाया, और स्टुअर्ट हॉल (Stuart Hall) के कूटन/विकूटन (encoding/decoding) मॉडल ने दिखाया कि श्रोता-दर्शक मीडिया संदेशों को प्रभावी, समझौतापरक या विरोधी ढंग से पढ़ते हैं। यह लोकप्रिय संस्कृति, उप-संस्कृतियों व रोज़मर्रा की प्रथाओं को अध्ययन की गंभीर वस्तु मानता है।
फ़िल्म व मीडिया अध्ययन चलचित्र का एक अर्थकारी तंत्र के रूप में विश्लेषण करता है। लॉरा मल्वी (Laura Mulvey) के “Visual Pleasure and Narrative Cinema” (1975) ने पुरुष-दृष्टि (male gaze) को नाम दिया, जिससे शास्त्रीय सिनेमा दर्शक को पुरुष व स्त्री को देखे जाने की वस्तु के रूप में स्थापित करता है; ऑत्योर सिद्धांत (auteur theory) (Cahiers du cinéma से) निर्देशक को लेखक मानता है; मार्शल मक्लूहन (Marshall McLuhan) का “माध्यम ही संदेश है (the medium is the message)” अंतर्वस्तु पर रूप की ओर ध्यान मोड़ता है। स्मृति व आघात अध्ययन पूछता है कि अकथनीय का प्रतिनिधित्व कैसे हो: कैथी कैरुथ (Cathy Caruth) (Unclaimed Experience) ने आघात को विलंबित रूप से लौटने वाले घाव के रूप में सिद्धांतित किया; मॉरिस आल्बवाक्स (Maurice Halbwachs) ने सामूहिक स्मृति (collective memory) शब्द गढ़ा; पियेर नोरा (Pierre Nora) ने स्मृति-स्थल (lieux de mémoire) को नाम दिया; मारीआन हर्श (Marianne Hirsch) ने दूसरी पीढ़ी की विरासत-स्मृति हेतु उत्तर-स्मृति (postmemory) शब्द दिया।
6. दलित व अधीनस्थ अध्ययन; पर्यावरणीय, चिकित्सकीय व डिजिटल मानविकी
अधीनस्थ अध्ययन (Subaltern Studies), रणजीत गुहा (Ranajit Guha) द्वारा आरंभ की गई इतिहासलेखीय परियोजना, दक्षिण एशियाई इतिहास को “नीचे से” पुनर्लिखती है, अभिजनों के बजाय किसानों व उपनिवेशितों की कर्तृता को पुनःप्राप्त करते हुए; स्पिवाक का निबंध इसका सर्वाधिक उद्धृत हस्तक्षेप है, और दीपेश चक्रवर्ती (Dipesh Chakrabarty) (Provincializing Europe) ने इसे आगे बढ़ाया। दलित अध्ययन व दलित सौंदर्यशास्त्र जाति व जीवित अनुभव को केंद्र में रखते हैं: शरणकुमार लिंबाले (Sharankumar Limbale) (Towards an Aesthetic of Dalit Literature) जैसे आलोचक तर्क देते हैं कि दलित लेखन का मूल्यांकन शास्त्रीय सौंदर्य से नहीं, बल्कि अनुभव (anubhava, प्रामाणिक जीवित अनुभव) व मुक्ति के लक्ष्य से होना चाहिए, जिसके बौद्धिक स्रोत ज्योतिराव फुले (Jotirao Phule) व बी. आर. आंबेडकर (B. R. Ambedkar) हैं और ओमप्रकाश वाल्मीकि की Joothan तथा बामा की Karukku जैसी आत्मकथात्मक कृतियाँ मील के पत्थर हैं।
- पर्यावरणीय मानविकी / पारिस्थितिक-आलोचना (ecocriticism) साहित्य व भौतिक पर्यावरण के संबंध का अध्ययन करती है। शेरिल ग्लॉटफ़ेल्टी (Cheryll Glotfelty) ने इस पद को संस्थागत बनाने में सहायता की, और लॉरेंस बुएल (Lawrence Buell) (The Environmental Imagination) संस्थापक आलोचक हैं; “प्रथम लहर” ने प्रकृति-लेखन व वन्यता का उत्सव मनाया, “द्वितीय लहर” पर्यावरणीय न्याय, विषाक्तता व नगरीय की ओर मुड़ी, जिसमें रॉब निक्सन की मंद हिंसा (slow violence) जैसी धारणाएँ हैं।
- चिकित्सकीय मानविकी (medical humanities) साहित्य, नीतिशास्त्र व कलाओं को चिकित्सा में लाती है: आख्यानपरक चिकित्सा (narrative medicine) (रीटा चैरॉन, Rita Charon से संबद्ध) चिकित्सकों को रोगियों की कथाएँ पढ़ना सिखाती है, और रोग-कथाएँ या रुग्णता-लेख (pathographies) (आर्थर फ़्रैंक की The Wounded Storyteller) रोग के अनुभव को निकट-पठन योग्य पाठ मानती हैं।
- डिजिटल मानविकी (digital humanities) मानविकी-अध्ययन में संगणकीय विधियाँ लागू करती है: पाठ-कूटन व डिजिटल अभिलेखागार, संगणकीय पाठ-विश्लेषण, डेटा-दृश्यीकरण, तथा दूर-पठन (distant reading) (फ़्रांको मोरेती, Franco Moretti), जो प्रत्येक को निकट से पढ़ने के बजाय हज़ारों पाठों का डेटा के रूप में विश्लेषण करता है — यह निकट-पठन का पूरक है, प्रतिस्थापन नहीं।
7. श्रेय-संदर्भ: किसने क्या कहा
| संकल्पना | प्रवर्तक | परिभाषक कृति |
|---|---|---|
| संकेतक / संकेतित; langue / parole | सस्यूर | 1916 की Course in General Linguistics |
| मिथक में द्विआधारी विरोध | लेवी-स्त्रॉस | संरचनात्मक नृविज्ञान |
| स्वाभाविक बनाई गई विचारधारा के रूप में मिथक; लेखक की मृत्यु | बार्त | Mythologies (1957) व “The Death of the Author” (1967) |
| विखंडन; différance | देरिदा | Of Grammatology (1967); निबंध “Différance” (1968) |
| एपिस्टीम; विमर्श व सत्ता; लेखक-प्रकार्य | फ़ूको | The Order of Things तथा “What Is an Author?” |
| अंतःपाठीयता | क्रिस्तेवा | उनके 1960 के दशक के अंत के निबंध |
| वर्चस्व | ग्राम्शी | Prison Notebooks |
| अभिसंबोधन | आल्थ्यूसर | वैचारिक राज्य-तंत्रों पर निबंध |
| निष्पादनात्मकता के रूप में gender | बटलर | Gender Trouble (1990) |
| अस्तित्व सार से पहले; मिथ्या-निष्ठा | सार्त्र | सूत्र हेतु Existentialism Is a Humanism (1946); मिथ्या-निष्ठा हेतु Being and Nothingness (1943) |
| महावृत्तांतों के प्रति अविश्वास | ल्योतार | 1979 की The Postmodern Condition |
| ओरिएंटलिज़्म (Orientalism) | सैद | Orientalism (1978) |
| संकरता, अनुकरण, द्वैधभाव | भाभा | 1994 की The Location of Culture |
| पुरुष-दृष्टि (male gaze) | मल्वी | 1975 का निबंध “Visual Pleasure and Narrative Cinema” |
| साइबॉर्ग (cyborg) | हैरावे | “A Cyborg Manifesto” (1985) |
मुख्य बिंदु
- संरचनावाद सस्यूर के चिह्न (यादृच्छिक संकेतक/संकेतित, langue/parole, विभेदात्मक अर्थ) को संस्कृति पर लागू करता है; उत्तर-संरचनावाद संबंधपरक आधार रखता है पर समापन नकारता है — देरिदा का विखंडन व différance, फ़ूको का विमर्श/सत्ता, क्रिस्तेवा की अंतःपाठीयता।
- मार्क्सवाद आधार/अधिरचना व विचारधारा पढ़ता है (ग्राम्शी का वर्चस्व, आल्थ्यूसर का अभिसंबोधन, फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल, जेमसन); नारीवाद वुल्फ़ व बोउवार के sex/gender भेद से गाइनोक्रिटिसिज़्म, écriture féminine व बटलर की निष्पादनात्मकता तक जाता है।
- अस्तित्ववाद: अस्तित्व सार से पहले (सार्त्र, कामू, बोउवार)। आधुनिकतावाद खोई व्यवस्था का शोक करते हुए खंडित करता है (“make it new”, एलियट); उत्तर-आधुनिकतावाद महावृत्तांतों के प्रति अविश्वास (ल्योतार), पेस्टीश व अधि-कथा है (बोद्रीयार, हचियन, जेमसन)।
- नव-इतिहासवाद (ग्रीनब्लैट) साहित्यिक व अ-साहित्यिक पाठों को सत्ता व सामाजिक ऊर्जा द्वारा साथ पढ़ता है; उत्तर-औपनिवेशिकतावाद सैद का Orientalism, स्पिवाक का अधीनस्थ व भाभा की संकरता/अनुकरण चलाता है; उत्तर-मानववाद (हैरावे, हेल्स, ब्रैडॉटी) मनुष्य को केंद्र से हटाता है और ट्रांसह्यूमनवाद नहीं है।
- सांस्कृतिक अध्ययन (बर्मिंघम; हॉगर्ट, विलियम्स, हॉल का encoding/decoding) रोज़मर्रा की संस्कृति पढ़ता है; फ़िल्म अध्ययन मल्वी की पुरुष-दृष्टि व ऑत्योर सिद्धांत देता है; स्मृति/आघात कैरुथ का विलंबित घाव, आल्बवाक्स की सामूहिक स्मृति, नोरा के स्मृति-स्थल, हर्श की उत्तर-स्मृति देता है।
- अधीनस्थ अध्ययन (गुहा) इतिहास नीचे से लिखता है; दलित सौंदर्यशास्त्र (लिंबाले) अनुभव व मुक्ति से मूल्यांकन करता है, जिसका मूल फुले व आंबेडकर में है; पर्यावरणीय, चिकित्सकीय व डिजिटल मानविकी पारिस्थितिक-आलोचना, आख्यानपरक चिकित्सा व दूर-पठन (मोरेती) को साहित्य-अध्ययन में लाती हैं।
अभ्यास प्रश्न (16)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
सस्यूर के भाषिक चिह्न के विवरण में, संकेतक (ध्वनि-प्रतिमा) व संकेतित (संप्रत्यय) के बीच संबंध को कैसा कहा गया है?
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उत्तर: C — यादृच्छिक, जो केवल किसी भाषा की रूढ़ियों से नियत होता है
सस्यूर का पहला सिद्धांत चिह्न की यादृच्छिकता है: संकेतक व उसके संकेतित के बीच कोई स्वाभाविक या अनिवार्य कड़ी नहीं होती, इसीलिए भिन्न भाषाएँ एक ही संप्रत्यय हेतु भिन्न ध्वनियाँ प्रयोग करती हैं। ‘अनुकरण’ वाला विकल्प ध्वनि-अनुकरणात्मक शब्द (onomatopoeia) का वर्णन करता है, जिसे सस्यूर नियम नहीं, एक गौण अपवाद मानते हैं।एक निबंध तर्क देता है कि कृति लिखे जाने के बाद लेखक का अभिप्राय उसके अर्थ को नहीं बाँधता, वरन् अर्थ पठन के बिंदु पर उत्पन्न होता है। इस “लेखक की मृत्यु” की घोषणा से सर्वाधिक कौन संबद्ध है?
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उत्तर: A — रोलां बार्त, लेखक की मृत्यु पर अपने निबंध में
“लेखक की मृत्यु” का नारा रोलां बार्त का है। भ्रामक विकल्प फ़ूको है, जिन्होंने “What Is an Author?” व लेखक-प्रकार्य की धारणा से उत्तर दिया — पर वह निबंध लेखक की मृत्यु की घोषणा करने के बजाय उसे जटिल बनाता है, अतः वह बार्त का उत्तर है, इस पदबंध का स्रोत नहीं।देरिदा अर्थ के विषय में एक ही बात कहने हेतु différance शब्द गढ़ते हैं। कौन-सा कथन उस बात को सर्वाधिक सटीक रूप से पकड़ता है?
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उत्तर: D — अर्थ चिह्नों के परस्पर भेद से उत्पन्न होता है और अनंत रूप से स्थगित रहता है, कभी पूर्णतः उपस्थित नहीं होता
Différance जान-बूझकर “भेद करना” (अर्थ संबंधपरक है, जैसे सस्यूर में) व “स्थगित करना” (उपस्थिति संकेतन-श्रृंखला में सदैव टलती रहती है) को मिलाता है। ‘कालातीत गहन-संरचना’ वाला विकल्प वही संरचनावादी मत है जिसके विरुद्ध देरिदा तर्क देते हैं, और शेष अर्थ को अभिप्राय या निजी मनोविज्ञान में रखते हैं, जिसे विखंडन नकारता है।इन दावों पर विचार करें। P: किसी पाठ को अपने ही श्रेणीबद्ध द्विआधारियों को ढहाता हुआ दिखाया जा सकता है। Q: एक ही स्थिर गहन-संरचना समस्त अर्थ उत्पन्न करती है और आलोचना का कार्य उसे पुनःप्राप्त करना है। R: ज्ञान सत्ता से अविभाज्य है, अतः किसी काल में क्या सत्य माना जाए यह सत्ता-संपृक्त विमर्श से आकारित होता है। S: संकेतकों की क्रीड़ा कभी रुकती नहीं, अतः अर्थ स्थगित रहता है। इनमें से कौन-से संरचनावादी नहीं बल्कि विशिष्ट रूप से उत्तर-संरचनावादी हैं?
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उत्तर: A — P — पाठ अपने ही द्विआधारियों को ढहाता है; C — R — ज्ञान व सत्य सत्ता से आकारित; D — S — संकेतन कभी रुकता नहीं, अर्थ स्थगित
P (विखंडन), R (फ़ूको का ज्ञान–सत्ता संबंध) व S (अर्थ का स्थगन) सभी उत्तर-संरचनावादी हैं। Q संरचनावादी आधार है — पुनःप्राप्य गहन-संरचना व बंद तंत्र — जिसे उत्तर-संरचनावाद नकारता है, अतः वही एकमात्र छोड़ा गया दावा है।“स्त्री जन्म नहीं लेती, बनाई जाती है” — यह दावा, जो जैविक sex को सामाजिक रूप से निर्मित gender से अलग करता है, किस कृति से है?
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उत्तर: B — सीमोन द बोउवार की The Second Sex
यह वाक्य सीमोन द बोउवार का है, The Second Sex (1949) से, और sex/gender भेद का संस्थापक कथन है। बटलर ने बाद में इस विचार को निष्पादनात्मकता तक उग्र किया, पर उद्धृत पंक्ति बोउवार की है, बटलर की नहीं।एक आलोचक बताता है कि कोई शासक-व्यवस्था विद्यालय, धर्मस्थल व समाचार-पत्र जैसी संस्थाओं के माध्यम से शासितों की स्वेच्छा-सहमति कैसे प्राप्त करती है, केवल बल से नहीं। यह संकल्पना सर्वाधिक किससे संबद्ध है?
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उत्तर: D — अंतोनियो ग्राम्शी का वर्चस्व
केवल बल से नहीं, सहमति से प्राप्त शासन ग्राम्शी का वर्चस्व है। संस्कृति-उद्योग (एडोर्नो) मानकीकृत संस्कृति के बड़े पैमाने के उत्पादन को नाम देता है, आभा (बेन्यामिन) कलाकृति की अद्वितीयता से संबंधित है, और राजनीतिक अचेतन (जेमसन) एक व्याख्या-पद्धति है — इनमें से कोई सहमति-बनाम-बल का विचार नहीं है।एक विज्ञापन अपने दर्शक को “विवेकी ग्राहक” के रूप में संबोधित करता है, और उस संबोधन में स्वयं को पहचानते हुए दर्शक एक विशेष प्रकार के कर्ता (subject) के रूप में गठित होती है। विचारधारा द्वारा कर्ता (subject) के रूप में “पुकारे जाने” की इस प्रक्रिया को कौन-सी संकल्पना ठीक-ठीक नाम देती है?
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उत्तर: A — अभिसंबोधन (interpellation), आल्थ्यूसर के विचारधारा-विवरण में
आल्थ्यूसर का अभिसंबोधन ठीक वही “पुकार” है जिससे विचारधारा व्यक्तियों को ऐसे कर्ताओं के रूप में भर्ती करती है जो उसके संबोधन में स्वयं को पहचानते हैं। वर्चस्व सहमति की व्यापक प्राप्ति है; वस्तुकरण व अपरिचितीकरण भिन्न समस्याओं (लुकाच का पण्य-विश्लेषण व रूपवादी काव्यशास्त्र) से हैं, अतः वे इस पुकार को नाम नहीं देते।नारीवादी साहित्यिक आलोचना के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — शोवॉल्टर की गाइनोक्रिटिसिज़्म स्त्रियों का विशेष रूप से साहित्य-निर्मात्री के रूप में अध्ययन करती है; B — सिक्सू की écriture féminine स्त्री-लेखन को स्त्री-देह से जोड़ती है; D — वुल्फ़ की A Room of One’s Own स्त्री-लेखन को भौतिक स्थितियों से जोड़ती है
गाइनोक्रिटिसिज़्म (स्त्रियाँ लेखिका के रूप में), écriture féminine (देह का लेखन) व वुल्फ़ का भौतिक तर्क सभी सही हैं। बटलर वाला कथन उनके मत को उलट देता है: वे gender को निष्पादनात्मकता मानती हैं, एक दोहराया जाने वाला सामाजिक कर्म, ठीक वह नहीं जो स्थिर जैविक सार हो, अतः वही असत्य दावा है।यह प्रतिज्ञप्ति कि “अस्तित्व सार से पहले आता है” — कोई निश्चित मानव-प्रकृति नहीं है, और हम अपने चयनों से स्वयं को गढ़ते हैं — किसका केंद्रीय सिद्धांत है?
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उत्तर: C — अस्तित्ववाद
“अस्तित्व सार से पहले” सार्त्र का सूत्र व अस्तित्ववाद का परिभाषक दावा है। संरचनावाद व नव-इतिहासवाद पठन की पद्धतियाँ हैं, और उत्तर-आधुनिकतावाद इसके बजाय महावृत्तांतों के प्रति अविश्वास से परिभाषित है, अतः इनमें से कोई इस प्रतिज्ञप्ति का स्वामी नहीं।उत्तर-आधुनिक की “महावृत्तांतों के प्रति अविश्वास” के रूप में परिभाषा निम्नलिखित में से किस कृति में आती है?
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उत्तर: B — The Postmodern Condition, उन्नत समाजों में ज्ञान पर एक प्रतिवेदन
यह पदबंध ल्योतार की The Postmodern Condition (1979) से है, जो उन्नत समाजों में ज्ञान पर प्रतिवेदन है। Being and Nothingness सार्त्र का अस्तित्ववादी ग्रंथ है, The Waste Land एलियट की आधुनिकतावादी कविता है, और Orientalism सैद का उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन है: भिन्न लेखक व भिन्न परियोजनाएँ।एक उपन्यास कालक्रम व स्वर को छिन्न-भिन्न करता है, फिर भी उसके खंड मिथक द्वारा पुनःप्राप्त एक खोई समग्रता की ओर प्रयास करते हैं, और यह विघटन शोक-योग्य सांस्कृतिक विपत्ति के रूप में प्रस्तुत है। विखंडन का यह निर्वाह सर्वाधिक किसका लक्षण है?
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उत्तर: A — आधुनिकतावाद, जो खोई व्यवस्था का शोक करता है व नई समग्रता की ओर पहुँचता है
खोई व्यवस्था का शोक व मिथक द्वारा नई समग्रता का प्रयास आधुनिकतावादी हस्ताक्षर है (जैसे एलियट की पौराणिक पद्धति)। उत्तर-आधुनिकतावाद उसी विखंडन को क्रीड़ा मानता और संदेह करता कि कोई व्यवस्था कभी वास्तविक थी; संरचनावाद व यथार्थवाद विखंडन को इस प्रकार अग्रभूमि में लाते ही नहीं।नव-इतिहासवाद को उस पुरानी ऐतिहासिक आलोचना से, जिसे उसने प्रतिस्थापित किया, मुख्यतः क्या अलग करता है?
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उत्तर: D — यह साहित्यिक व अ-साहित्यिक पाठों को संचारी सामाजिक ऊर्जा के एक ही क्षेत्र के रूप में साथ पढ़ता है
नव-इतिहासवाद, फ़ूको व गीर्ट्स का अनुसरण करते हुए, साहित्यिक व अ-साहित्यिक दस्तावेज़ों को एक ही सांस्कृतिक पाठ के अंशों के रूप में साथ रखता है और सामाजिक ऊर्जा का संचरण खोजता है। ‘स्थिर पृष्ठभूमि जिसे पाठ प्रतिबिंबित करता है’ वाला विकल्प ठीक वही पुराना इतिहासवाद है जिसे वह नकारता है; केवल-जीवनी व केवल-रूप अन्य उपागमों का वर्णन करते हैं।विचार को उसके प्रवर्तक से मिलाएँ। P: पूर्व के बारे में एक पश्चिमी विमर्श के रूप में Orientalism — सैद। Q: प्रश्न “Can the Subaltern Speak?” — स्पिवाक। R: औपनिवेशिक संपर्क में संकरता व अनुकरण — भाभा। S: “पुरुष-दृष्टि (male gaze)” — सैद। कौन-से युग्म सही हैं?
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उत्तर: A — P — Orientalism / सैद; B — Q — Can the Subaltern Speak? / स्पिवाक; C — R — संकरता व अनुकरण / भाभा
सैद (Orientalism), स्पिवाक (अधीनस्थ निबंध) व भाभा (संकरता, अनुकरण) उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धांत के तीन संस्थापक व्यक्ति हैं और सही मिलाए गए हैं। “पुरुष-दृष्टि” फ़िल्म अध्ययन में लॉरा मल्वी की है, सैद की नहीं, अतः S ग़लत युग्म है।एडवर्ड सैद की Orientalism में, “पूर्व (the Orient)” को किस रूप में सर्वोत्तम रूप से समझा जाता है?
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उत्तर: B — एक विमर्शात्मक रचना जिसके द्वारा पश्चिम ने एक “अन्य (Other)” को परिभाषित व शासित किया
सैद का तर्क है कि “पूर्व” को पश्चिमी ज्ञान एक शासनयोग्य अन्य के रूप में उत्पन्न करता है, जिससे विद्वत्ता व साम्राज्य एक-दूसरे को सुदृढ़ करते हैं। ‘तटस्थ तथ्य’ व ‘प्रामाणिक आत्म-प्रतिनिधित्व’ वाले विकल्प उनका केंद्रीय बिंदु चूक जाते हैं कि पूर्व को पश्चिम गढ़ता है, न कि उसका वर्णन करता है या पूर्व स्वयं करता है।एक सिद्धांतकार मनुष्य को प्रकृति के एक परिबद्ध, स्वायत्त स्वामी के रूप में नकारता है और इसके बजाय इस पर बल देता है कि मनुष्य पशुओं, मशीनों व पर्यावरण से कैसे उलझा हुआ है। यह रुख, व एक प्रतिद्वंद्वी से उसका भेद, किस रूप में सर्वोत्तम रूप से वर्णित है?
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उत्तर: C — उत्तर-मानववाद, जो ट्रांसह्यूमनवाद से भिन्न है, जो मनुष्य को संवर्धित करना चाहता है
मनुष्य को केंद्र से हटाना व उलझाव पर बल देना उत्तर-मानववाद है, और परीक्षा-बिंदु ट्रांसह्यूमनवाद से उसका विरोध है, जो मनुष्य को केंद्र में रखता है व उसे परिपूर्ण या संवर्धित करना चाहता है। ट्रांसह्यूमनवाद वाला विकल्प दोनों को ग़लती से बराबर मानता है; मानवतावाद व अस्तित्ववाद दोनों केंद्रित मानव-कर्ता को बनाए रखते हैं।निम्नलिखित में से कौन-से क्षेत्र-एवं-व्यक्ति युग्म सही हैं? P: कूटन/विकूटन मॉडल — स्टुअर्ट हॉल (सांस्कृतिक अध्ययन)। Q: दूर-पठन — फ़्रांको मोरेती (डिजिटल मानविकी)। R: उत्तर-स्मृति — मारीआन हर्श (स्मृति अध्ययन)। S: मंद हिंसा (slow violence) — लॉरा मल्वी।
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उत्तर: A — P — कूटन/विकूटन / स्टुअर्ट हॉल; B — Q — दूर-पठन / फ़्रांको मोरेती; C — R — उत्तर-स्मृति / मारीआन हर्श
हॉल का कूटन/विकूटन, मोरेती का दूर-पठन व हर्श की उत्तर-स्मृति सही श्रेय हैं। “मंद हिंसा” पर्यावरणीय मानविकी से रॉब निक्सन का पद है; मल्वी पुरुष-दृष्टि की आलोचक हैं, अतः S ग़लत युग्म है।