वायुमंडल की संरचना, कृष्णिका विकिरण, विकिरण बजट तथा हरितगृह प्रभाव

यह अध्याय अभियांत्रिकी विज्ञान (XE) पेपर का है। यह XE7 वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान के खंड XE7.1 वायुमंडलीय विज्ञान के पूर्वार्ध का उत्तर देता है; XE7 नौ वैकल्पिक खंडों में से एक है, जिनमें से परीक्षा में अभ्यर्थी कोई दो चुनता है: “वायुमंडल की ऊर्ध्वाधर संरचना व संघटन; कृष्णिका विकिरण व विकिरण संतुलन; वायुमंडल में ऊष्मा-अंतरण की विधियाँ; हरितगृह प्रभाव; … वैश्विक विकिरण बजट, हरितगृह गैसों की भूमिका।” यह वायुमंडल की परतें व संघटन, Planck, Wien, Stefan–Boltzmann तथा Kirchhoff के नियम, ग्रहीय ऊर्जा संतुलन व 255 K का प्रभावी ताप, ऊष्मा-अंतरण की विधियाँ और एक-परत मॉडल सहित हरितगृह प्रभाव पढ़ाता है। संख्यात्मक प्रश्न Wien का शिखर तरंगदैर्ध्य, कृष्णिका फ्लक्स, प्रभावी ताप व उसकी ऐल्बिडो-संवेदनशीलता, वाष्पन से गुप्त ऊष्मा फ्लक्स, एक-परत वायुमंडल की उत्सर्जकता तथा CO₂ विकिरण बलन हैं, प्रत्येक में स्थिरांक दिए गए हैं।

1. वायुमंडल की ऊर्ध्वाधर संरचना व संघटन

संघटन। शुष्क वायु में आयतन के अनुसार 78.08% नाइट्रोजन, 20.95% ऑक्सीजन, 0.93% आर्गन और लगभग 0.04% कार्बन डाइऑक्साइड (करीब 420 ppm, जो बढ़ रही है) होती है, साथ में नियॉन, हीलियम, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड व ओज़ोन के अंश। इसका औसत मोलर द्रव्यमान 28.97 g/mol है। विक्षुब्ध मिश्रण इन अनुपातों को लगभग 80 से 100 km तक स्थिर रखता है (समरूप मंडल, homosphere); उसके ऊपर आण्विक विसरण हल्की गैसों को ऊपर उठने देता है। जलवाष्प अपवाद है: वह लगभग शून्य से आयतन के लगभग 4% तक बदलती है, अधिकतर सबसे निचले कुछ किलोमीटर में रहती है और संघनन के कारण ताप से निर्धारित होती है। ओज़ोन समताप मंडल में केंद्रित है (ओज़ोन परत, लगभग 15 से 35 km)।

वायुमंडल की परतें, dT/dz के चिह्न से परिभाषित
परतलगभग विस्तारऊँचाई के साथ तापकारण व टिप्पणी
क्षोभ मंडल (troposphere)0 से ध्रुवों पर लगभग 8–9 km, मध्य अक्षांशों पर 11–12 km, विषुवत् रेखा पर 16–17 kmघटता है, औसत 6.5 K/kmनीचे से धरातल द्वारा तप्त; संवहनी; लगभग 80% द्रव्यमान, लगभग सारी जलवाष्प और समस्त मौसम
समताप मंडल (stratosphere)क्षोभसीमा से लगभग 50 kmलगभग 20 km तक प्रायः स्थिर, फिर बढ़ता हैओज़ोन पराबैंगनी को अवशोषित करती है; स्थायी, ऊर्ध्वाधर मिश्रण कम
मध्य मंडल (mesosphere)लगभग 50 से 85 kmमध्यसीमा पर लगभग 180–190 K तक घटता है, जो सबसे ठंडा क्षेत्र हैपराबैंगनी सोखने को ओज़ोन कम; उल्काएँ जल जाती हैं
ऊष्म मंडल (thermosphere), ऊपर बहिर्मंडललगभग 85 km से ऊपरबढ़ता है, सौर सक्रियता के साथ 1000 K या अधिक तकO₂ व N₂ चरम पराबैंगनी व X-किरणें सोखती हैं; आयनमंडल, ध्रुवीय ज्योति; घनत्व बहुत कम

सीमाओं के नाम क्षोभसीमा (tropopause), समतापसीमा (stratopause) व मध्यसीमा (mesopause) हैं: ये वे स्तर हैं जहाँ dT/dz का चिह्न पलटता है। WMO की क्षोभसीमा वह निम्नतम स्तर है जहाँ ह्रास दर घटकर 2 K/km या उससे कम हो जाती है। विषुवत् रेखा की क्षोभसीमा ध्रुवीय क्षोभसीमा से ऊँची व ठंडी (लगभग 190 से 200 K) होती है, क्योंकि गहरा उष्णकटिबंधीय संवहन घटते ताप वाली परत को अधिक ऊँचाई तक ले जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मानक वायुमंडल में धरातल पर T = 288.15 K व p = 1013.25 hPa, 11 km (216.65 K) तक 6.5 K/km की ह्रास दर और 20 km तक समतापी परत ली जाती है। किसी भी स्तर पर दाब उसके ऊपर की वायु का भार है: लगभग आधा द्रव्यमान 5.5 km से नीचे और 99% द्रव्यमान 30 km से नीचे है।

⚠️ परतें ताप की प्रवृत्ति से परिभाषित हैं, गर्मी के अनुभव से नहीं
चारों परतों में ताप का चिह्न बदलता रहता है: घटता, बढ़ता, घटता, बढ़ता। ऊष्म मंडल में ताप (प्रति अणु गतिज ऊर्जा) सबसे अधिक है, पर अणु इतने कम हैं कि वहाँ रखा तापमापी तप्त नहीं होगा: ताप ऊष्मा-मात्रा नहीं है। समताप मंडल ऊपर से इसलिए गर्म है कि वहाँ ओज़ोन पराबैंगनी सोखती है; वह नीचे से तप्त नहीं होता।

2. कृष्णिका विकिरण: Planck, Wien, Stefan–Boltzmann व Kirchhoff

कृष्णिका (blackbody) अपने पर पड़ने वाले सारे विकिरण को अवशोषित करती है और अपने ताप पर प्रत्येक तरंगदैर्ध्य पर अधिकतम संभव विकिरण उत्सर्जित करती है। इसकी वर्णक्रमीय दीप्ति Planck फलन है, B_λ(T) = (2hc²/λ⁵) / [exp(hc/λkT) − 1], जिसमें h = 6.626×10⁻³⁴ J s, c = 3.00×10⁸ m/s तथा k = 1.381×10⁻²³ J/K है। तीन कार्यकारी नियम इससे निकलते या इसके साथ चलते हैं।

  • Wien विस्थापन नियम: dB_λ/dλ = 0 रखने पर λ_max T = 2.898×10⁻³ m·K (2898 μm·K) मिलता है। अधिक तप्त पिंड का शिखर छोटी तरंगदैर्ध्य पर होता है।
  • Stefan–Boltzmann नियम: सभी तरंगदैर्ध्यों व अर्धगोले पर समाकलन से फ्लक्स F = σT⁴ मिलता है, जहाँ σ = 5.67×10⁻⁸ W m⁻² K⁻⁴ है। वास्तविक धूसर सतह F = εσT⁴ उत्सर्जित करती है, उत्सर्जकता 0 < ε ≤ 1।
  • Kirchhoff का नियम: ऊष्मीय साम्य में प्रत्येक तरंगदैर्ध्य पर उत्सर्जकता अवशोषकता के बराबर होती है, ε_λ = a_λ। किसी तरंगदैर्ध्य पर अच्छा अवशोषक वहीं अच्छा उत्सर्जक होता है। समता तरंगदैर्ध्य-दर-तरंगदैर्ध्य है: हिम अधिकांश सूर्य-प्रकाश परावर्तित करता है, फिर भी ऊष्मीय अवरक्त में लगभग कृष्णिका (ε, 1 के निकट) है।
कृष्णिका के रूप में सूर्य व पृथ्वी
राशिसूर्यपृथ्वी
तापलगभग 5800 K (प्रकाशमंडल)288 K धरातल; 255 K प्रभावी
शिखर तरंगदैर्ध्य λ_max0.50 μm (दृश्य)288 K पर 10.1 μm; 255 K पर 11.4 μm (अवरक्त)
उत्सर्जित फ्लक्स σT⁴6.4×10⁷ W/m²288 K पर 390 W/m²
बैंड का नामलघुतरंग, लगभग 0.2 से 4 μmदीर्घतरंग, लगभग 4 से 100 μm

हल किया उदाहरण। 288 K के धरातल को कृष्णिका लें। शिखर तरंगदैर्ध्य: λ_max = 2898 μm·K / 288 K = 10.06 μm। फ्लक्स: F = 5.67×10⁻⁸ × 288⁴ = 5.67×10⁻⁸ × 6.88×10⁹ = 390 W/m²। T दोगुना करने पर λ_max आधा हो जाएगा और F में 2⁴ = 16 गुना वृद्धि होगी। चूँकि सौर व पार्थिव स्पेक्ट्रम लगभग अतिव्यापित नहीं होते, वायुमंडलीय विकिरण को पृथक लघुतरंग (सौर) व दीर्घतरंग (पार्थिव) धाराओं के रूप में लिया जाता है।

⚠️ दीप्ति फ्लक्स नहीं है, और शिखर चर पर निर्भर है
B_λ दीप्ति है (प्रति स्टेरेडियन प्रति इकाई तरंगदैर्ध्य); समदैशिक उत्सर्जक का अर्धगोलीय फ्लक्स F = π∫B_λ dλ = σT⁴ है। Wien का स्थिरांक 2898 μm·K प्रति इकाई तरंगदैर्ध्य वाले B के शिखर पर लागू है; प्रति इकाई आवृत्ति का शिखर अलग स्थान पर होता है, अतः λ = c/ν_max से कभी परिवर्तन न करें।

3. विकिरण संतुलन, प्रभावी ताप व वैश्विक बजट

सौर स्थिरांक S₀ ≈ 1361 W/m² पृथ्वी की औसत दूरी पर किरण-पुंज के लंबवत सतह पर सौर फ्लक्स है (पुरानी पुस्तकों में 1367 से 1370 मिलता है)। पृथ्वी पुंज को अपनी चकती πR² पर रोकती है, पर विकिरण पूरे गोले 4πR² से करती है, अतः वैश्विक औसत आपतित फ्लक्स S₀/4 ≈ 340 W/m² है। बादल, वायु, ऐरोसॉल व धरातल द्वारा एक भाग α, ग्रहीय ऐल्बिडो (≈ 0.30), परावर्तित हो जाता है। अवशोषित फ्लक्स S₀(1 − α)/4 ≈ 238 W/m² है।

प्रभावी ताप। स्थायी अवस्था में अवशोषित सौर ऊर्जा उत्सर्जित दीर्घतरंग के बराबर होती है: S₀(1 − α)/4 = σT_e⁴। अतः T_e = [S₀(1 − α)/(4σ)]^¼ = [238.2 / 5.67×10⁻⁸]^¼ = 254.6 K ≈ 255 K (−18 °C)। T_e वह कृष्णिका-ताप है जो प्रेक्षित निर्गामी फ्लक्स उत्सर्जित करे, कोई वास्तविक वायु-ताप नहीं। औसत धरातलीय ताप लगभग 288 K है, अतः हरितगृह प्रभाव लगभग 33 K जोड़ता है। 6.5 K/km की ह्रास दर पर 255 K (288 − 255)/6.5 ≈ 5 km ऊपर मिलता है, जो वह प्रारूपिक स्तर है जहाँ से दीर्घतरंग विकिरण निकल भागता है।

संवेदनशीलता। चूँकि T_e ∝ [S₀(1 − α)]^¼, S₀ में 1% परिवर्तन T_e को 0.25%, यानी लगभग 0.6 K बदलता है। α को 0.30 से 0.32 करने पर T_e 254.6 K से घटकर 252.7 K हो जाता है, यानी किसी भी पुनर्निवेश से पहले 1.8 K की कमी। परिमाण-जाँच: गुणनखंड 4 भूल जाने पर (952.7/5.67×10⁻⁸)^¼ ≈ 360 K आता है, जो किसी भी प्रेक्षित औसत से बहुत ऊँचा है, और भूल पकड़ में आ जाती है।

लगभग वैश्विक वार्षिक-औसत ऊर्जा बजट (W/m²; प्रकाशित आकलनों में कुछ W/m² का अंतर)
घटकमानटिप्पणी
वायुमंडल के शीर्ष पर आपतित सौर340S₀/4
परावर्तित सौर≈ 100अधिकांश बादलों व वायु द्वारा; लगभग एक-चौथाई धरातल द्वारा
वायुमंडल / धरातल द्वारा अवशोषित सौर≈ 80 / ≈ 160योग ≈ 240 = 340 − 100
धरातल का दीर्घतरंग उत्सर्जन / वायु से अधोगामी दीर्घतरंग≈ 396 / ≈ 340बड़ी पश्च-विकिरण ही हरितगृह प्रभाव है
धरातल से गुप्त / संवेद्य ऊष्मा फ्लक्स≈ 80 / ≈ 20धरातल से अविकिरणीय क्षय
शीर्ष पर निर्गामी दीर्घतरंग विकिरण≈ 240अवशोषित सौर को संतुलित करता है

धरातल जाँचें: वह 160 + 340 = 500 पाता है और लगभग 396 + 80 + 20 = 496 W/m² खोता है, यानी प्रकाशित बजटों में आपसी अंतर जितने कुछ W/m² के भीतर संतुलित (सारणी का हर मान पूर्णांकित है और अनुमानों में कुछ W/m² बदलता है)। अक्षांश-दर-अक्षांश संतुलन नहीं बैठता: निम्न अक्षांश उत्सर्जन से अधिक अवशोषित करते हैं, उच्च अक्षांश कम, और अधिशेष वायुमंडल व महासागर द्वारा ध्रुवों की ओर ले जाया जाता है (शिखर पर 5×10¹⁵ W कोटि का)। यही परिवहन सामान्य परिसंचरण को चलाता है।

4. वायुमंडल में ऊष्मा-अंतरण की विधियाँ

  • चालन (conduction) आण्विक अंतरण है। वायु कुचालक है (k ≈ 0.025 W m⁻¹ K⁻¹), अतः यह केवल धरातल से सटी मिलीमीटर-मोटी परत व मृदा में महत्त्व रखता है।
  • संवहन (convection) मौसम-विज्ञान में ऊर्ध्वाधर समूह-परिवहन है: उत्प्लावी तापीय धाराएँ व विक्षुब्ध भँवर तप्त धरातल से संवेद्य ऊष्मा ऊपर ले जाते हैं। निचले कुछ किलोमीटर की वायु इसी से मुख्यतः गर्म होती है।
  • अभिवहन (advection) माध्य पवन द्वारा ऊष्मा का क्षैतिज परिवहन है, जैसे गर्म वाताग्र, समुद्री समीर या गर्म लू में।
  • विकिरण (radiation) को माध्यम नहीं चाहिए। पृथ्वी तंत्र अंतरिक्ष से ऊर्जा का विनिमय केवल इसी से करता है, और मुक्त वायुमंडल में वायु मुख्यतः इसी से ठंडी होती है।

गुप्त ऊष्मा परिवहन का अलग उल्लेख आवश्यक है। वाष्पन धरातल से L_v = 2.5×10⁶ J/kg लेता है; बादल में संघनन उसे ऊँचाई पर वायु को लौटा देता है। इस प्रकार ऊर्जा नमी के साथ ऊपर और पवनों के साथ ध्रुवों की ओर चलती है। धरातल पर संवेद्य व गुप्त ऊष्मा फ्लक्स का अनुपात Bowen अनुपात है: उष्णकटिबंधीय महासागरों पर 1 से बहुत कम, मरुस्थलों पर 1 से बहुत अधिक।

हल किया उदाहरण। प्रतिदिन 1 m² से 1 mm जल वाष्पित करना प्रतिदिन 1 kg है, अतः गुप्त फ्लक्स 2.5×10⁶ J / 86 400 s = 28.9 W/m² है। लगभग 2.7 mm/दिन का वैश्विक औसत वर्षण इसलिए 2.7 × 28.9 ≈ 78 W/m² के तुल्य है, जो बजट के लगभग 80 W/m² गुप्त फ्लक्स से मेल खाता है। सुविधाजनक परिवर्तन 1 mm/दिन ≈ 29 W/m² है।

⚠️ संवहन ऊर्ध्वाधर है, अभिवहन क्षैतिज
बोलचाल में गतिमान वायु द्वारा ले जाई गई हर ऊष्मा को संवहन कह देते हैं। इस विषय में दोनों शब्द अलग हैं: संवहन ऊर्ध्वाधर है, अभिवहन क्षैतिज। मुक्त वायु में चालन नगण्य है, इसलिए मध्य क्षोभ मंडल तक ऊष्मा पहुँचने की व्याख्या में उसे कभी न लाएँ।

5. हरितगृह प्रभाव, हरितगृह गैसें व विकिरण बलन

वायुमंडल सूर्य के लघुतरंग विकिरण के लिए लगभग पारदर्शी है, पर धरातल के दीर्घतरंग विकिरण का बड़ा भाग सोखकर उसे अपने नीचे वाले ताप पर सभी दिशाओं में पुनः उत्सर्जित करता है (Kirchhoff)। इसलिए अंतरिक्ष को विकिरण 288 K के धरातल से नहीं, ऊँचे ठंडे स्तर (लगभग 5 km, 255 K के निकट) से निकलता है। धरातल को T_e से गर्म होना ही पड़ता है ताकि ठंडा उत्सर्जन-स्तर भी वही 238 W/m² विकिरित करे जो ग्रह अवशोषित करता है। हरितगृह गैस जोड़ने पर उत्सर्जन-स्तर और ठंडी ऊँचाई पर चला जाता है, निर्गामी फ्लक्स घटता है और ग्रह तब तक गर्म होता है जब तक संतुलन न लौट आए।

ऊष्मीय अवरक्त के मुख्य अवशोषक
गैसमुख्य बैंडटिप्पणी
जलवाष्प6.3 μm कंपन; लगभग 15 μm से आगे शुद्ध घूर्णनसबसे प्रबल अवशोषक; मात्रा ताप से निर्धारित, अतः पुनर्निवेश
कार्बन डाइऑक्साइड15 μm बंकन बैंड; 4.3 μmदीर्घजीवी व सुमिश्रित; 15 μm पृथ्वी के उत्सर्जन शिखर के निकट है
ओज़ोन9.6 μm, खिड़की के भीतरसमताप मंडल में पराबैंगनी भी सोखती है
मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइडलगभग 7.7 μm व 7.8 μm (N₂O का 17 μm भी)मात्रा कम, प्रति अणु प्रभाव अधिक

कोई अणु अवरक्त तभी सोखता है जब उसका कंपन या घूर्णन उसके विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण को बदले। N₂ व O₂, जो वायु का 99% हैं और समनाभिकीय द्विपरमाणुक हैं, में ऐसा परिवर्तन नहीं होता और वे पारदर्शी हैं; H₂O, CO₂, O₃, CH₄ व N₂O में होता है। वायुमंडलीय खिड़की (window), लगभग 8 से 12 μm, वह वर्णक्रमीय अंतराल है जिससे धरातल का विकिरण सीधे निकल जाता है।

विकिरण बलन (radiative forcing) आरोपित परिवर्तन (गैस, ऐरोसॉल, सौर निर्गम या ऐल्बिडो) से क्षोभसीमा पर नेट अधोगामी फ्लक्स का W/m² में परिवर्तन है, जब समताप मंडल समायोजित हो चुका हो पर धरातलीय ताप स्थिर रखा गया हो; धनात्मक बलन गर्म करता है। CO₂ के लिए व्यापक रूप से प्रयुक्त सरल सूत्र ΔF = 5.35 ln(C/C₀) W/m² है। लघुगणक इसलिए आता है कि बैंड के केंद्र पहले ही संतृप्त हैं और केवल पंख अवशोषण करते रहते हैं। CO₂ दोगुनी करने पर 5.35 × 0.693 = 3.7 W/m² मिलता है। पुनर्निवेश-रहित (Planck) अनुक्रिया ΔT = ΔF / (4σT_e³) = 3.7 / 3.76 ≈ 1.0 K है; पुनर्निवेश, मुख्यतः जलवाष्प का, इसे बढ़ाते हैं और दोगुनी CO₂ पर पूर्ण साम्य अनुक्रिया का आकलित सर्वोत्तम मान लगभग 3 K है।

एक-परत मॉडल। वायुमंडल को ताप T_a की एक समतापी परत मानें जो सूर्य-प्रकाश के लिए पारदर्शी है और जिसकी दीर्घतरंग उत्सर्जकता (= अवशोषकता) ε है। शीर्ष पर: ε σT_a⁴ + (1 − ε)σT_s⁴ = σT_e⁴। परत में अवशोषित = उत्सर्जित: ε σT_s⁴ = 2ε σT_a⁴, क्योंकि वह ऊपर व नीचे दोनों ओर विकिरित करती है। अतः σT_a⁴ = σT_s⁴/2 तथा T_s⁴ = 2T_e⁴/(2 − ε)। पूर्ण अवशोषक परत (ε = 1) के लिए T_a = T_e = 255 K और T_s = 2^¼ × 255 = 303 K, जो बहुत गर्म है। T_s = 288 K पाने के लिए परत को ε = 2[1 − (255/288)⁴] = 0.77 चाहिए। वास्तविक वायुमंडल में धरातल इसलिए अधिक ठंडा है कि संवहन व गुप्त ऊष्मा भी धरातल से ऊर्जा हटाते हैं।

⚠️ काँच के ग्रीनहाउस की उपमा भ्रामक है
काँच का ग्रीनहाउस मुख्यतः इसलिए गर्म रहता है कि काँच गर्म वायु को संवहन से बाहर नहीं जाने देता। वायुमंडल धरातल को दीर्घतरंग विकिरण सोखकर व पुनः उत्सर्जित करके गर्म करता है, जिससे दिए गए धरातलीय ताप पर निर्गामी फ्लक्स घटता है। साथ ही, हरितगृह गैसें सौर विकिरण के लिए “कंबल” नहीं हैं: वे सूर्य-प्रकाश को लगभग अछूता छोड़ती हैं और निर्गामी दीर्घतरंग धारा पर असर डालती हैं।

मुख्य बिंदु

  • वायुमंडल dT/dz के चिह्न से परतों में बँटा है: क्षोभ मंडल (घटता, औसत 6.5 K/km), समताप मंडल (ओज़ोन-तापन), मध्य मंडल (घटता) व ऊष्म मंडल (बढ़ता)। शुष्क वायु में 78.08% N₂, 20.95% O₂, 0.93% Ar और लगभग 0.04% CO₂ है; जलवाष्प परिवर्ती गैस है और क्षोभसीमा विषुवत् रेखा पर अधिक ऊँची है।
  • Planck स्पेक्ट्रम देता है, Wien λ_max T = 2898 μm·K, Stefan–Boltzmann F = σT⁴ (σ = 5.67×10⁻⁸ W m⁻² K⁻⁴) और Kirchhoff तरंगदैर्ध्य-दर-तरंगदैर्ध्य ε_λ = a_λ देता है। सूर्य का शिखर लगभग 0.5 μm पर और पृथ्वी का लगभग 10 μm पर है, इसलिए लघुतरंग व दीर्घतरंग को अलग माना जाता है।
  • अवशोषित सौर S₀(1 − α)/4 ≈ 238 W/m² है (4 गोले के क्षेत्रफल व चकती के क्षेत्रफल का अनुपात है), अतः T_e = [S₀(1 − α)/(4σ)]^¼ ≈ 255 K। 288 K पर धरातल इससे लगभग 33 K गर्म है; T_e निर्गामी विकिरण का कृष्णिका-ताप है, जो लगभग 5 km ऊँचाई पर मिलता है।
  • ऊष्मा चालन (धरातल को छोड़ नगण्य), संवहन (ऊर्ध्वाधर), अभिवहन (क्षैतिज) व विकिरण से चलती है, साथ में नमी द्वारा वहन की गई गुप्त ऊष्मा: 1 mm/दिन वाष्पन लगभग 29 W/m² है।
  • हरितगृह गैसों में द्विध्रुव आघूर्ण का बदलना आवश्यक है, इसलिए H₂O, CO₂, O₃, CH₄ व N₂O प्रभावी हैं और N₂ व O₂ नहीं। वे उत्सर्जन-स्तर को ठंडी ऊँचाई पर ले जाकर निर्गामी फ्लक्स घटाती हैं और धरातल को गर्म करती हैं। एक-परत मॉडल T_s⁴ = 2T_e⁴/(2 − ε) देता है।
  • CO₂ के लिए विकिरण बलन ΔF = 5.35 ln(C/C₀) W/m² है, दोगुना होने पर लगभग 3.7 W/m², लघुगणकीय क्योंकि बैंड के केंद्र संतृप्त हैं; पुनर्निवेश-रहित तापन लगभग 1 K है और पुनर्निवेश उसे बढ़ाते हैं।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. वायुमंडल की किस परत में ताप ऊँचाई के साथ मुख्यतः इसलिए बढ़ता है कि ओज़ोन सौर पराबैंगनी को अवशोषित करती है?

    1. क्षोभ मंडल, क्योंकि वह धरातल से तप्त होता है और ओज़ोन उसके आधार पर है
    2. मध्य मंडल, क्योंकि उल्काएँ जलते समय वहाँ ऊष्मा छोड़ती हैं
    3. समताप मंडल, क्योंकि ओज़ोन परत उसी में है और उसे भीतर से तप्त करती है
    4. ऊष्म मंडल, क्योंकि वहाँ नाइट्रोजन दृश्य प्रकाश को प्रबलता से अवशोषित करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — समताप मंडल, क्योंकि ओज़ोन परत उसी में है और उसे भीतर से तप्त करती है

    ओज़ोन परत (लगभग 15 से 35 km) समताप मंडल में है और पराबैंगनी सोखती है, इसलिए वहाँ ताप ऊँचाई के साथ बढ़ता है और परत स्थायी रहती है। क्षोभ मंडल नीचे से तप्त होता है और उसमें ताप ऊँचाई के साथ घटता है। ऊष्म मंडल को O₂ व N₂ द्वारा सोखी गई चरम पराबैंगनी तप्त करती है, दृश्य प्रकाश नहीं।
  2. उष्णकटिबंधीय क्षोभसीमा ध्रुवीय क्षोभसीमा से ऊँची व ठंडी क्यों होती है?

    1. ध्रुवों के ऊपर ओज़ोन परत मोटी है और क्षोभसीमा को नीचे धकेलती है
    2. गहरा उष्णकटिबंधीय संवहन घटते ताप वाली परत को अधिक ऊँचाई तक पहुँचा देता है
    3. विषुवत् रेखा पर वायुदाब कम है, इसलिए क्षोभ मंडल में द्रव्यमान कम और वह पतला है
    4. विषुवत् रेखा पर सूर्य सिर के ऊपर रहता है, इसलिए वहाँ समताप मंडल ऊपर से अधिक तप्त होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — गहरा उष्णकटिबंधीय संवहन घटते ताप वाली परत को अधिक ऊँचाई तक पहुँचा देता है

    उष्णकटिबंध में प्रबल धरातलीय तापन व गहरा आर्द्र संवहन ताप को 16 से 17 km तक घटाते रखते हैं, जहाँ वह लगभग 190 से 200 K हो जाता है। ध्रुवों पर संवहन दुर्बल है और क्षोभसीमा 8 से 9 km पर है। कम दाब वाला स्पष्टीकरण गलत है: उष्णकटिबंधीय क्षोभ मंडल अधिक गहरा है, पतला नहीं।
  3. Kirchhoff के नियम के अनुसार, किसी तरंगदैर्ध्य पर व ऊष्मीय साम्य में, जो सतह प्रबल अवशोषण करती है वह

    1. दुर्बल उत्सर्जन करेगी, क्योंकि अच्छे अवशोषक के पास विकिरित करने को कम ऊर्जा बचती है
    2. केवल उस छोटी तरंगदैर्ध्य पर उत्सर्जन करेगी जहाँ सूर्य का शिखर है
    3. उस तरंगदैर्ध्य पर प्रबल परावर्तन करेगी ताकि अवशोषित व उत्सर्जित का योग संरक्षित रहे
    4. उसी तरंगदैर्ध्य पर प्रबल उत्सर्जन करेगी, क्योंकि वहाँ उत्सर्जकता अवशोषकता के बराबर है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — उसी तरंगदैर्ध्य पर प्रबल उत्सर्जन करेगी, क्योंकि वहाँ उत्सर्जकता अवशोषकता के बराबर है

    Kirchhoff का नियम प्रत्येक तरंगदैर्ध्य पर ε_λ = a_λ है। अतः किसी तरंगदैर्ध्य पर अच्छा अवशोषक वहीं अच्छा उत्सर्जक होता है। उलटा विकल्प (दुर्बल उत्सर्जन) अवशोषित ऊर्जा को परावर्तित ऊर्जा से उलझाता है; अवशोषण वह भाग है जो परावर्तित नहीं होता।
  4. एक कृष्णिका का Planck वर्णक्रमीय शिखर (प्रति इकाई तरंगदैर्ध्य) 0.50 μm पर है। उसका ताप इतना बढ़ाया जाता है कि कुल उत्सर्जित फ्लक्स 16 गुना हो जाए। नया शिखर तरंगदैर्ध्य है

    1. 0.125 μm, क्योंकि λ_max ∝ 1/T⁴
    2. 0.25 μm, क्योंकि फ्लक्स ∝ T⁴ है अतः T दोगुना और λ_max ∝ 1/T आधा हो जाता है
    3. 0.50 μm, क्योंकि शिखर की स्थिति ताप पर निर्भर नहीं करती
    4. 1.00 μm, क्योंकि अधिक तप्त पिंड लंबी तरंगदैर्ध्य पर उत्सर्जन करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — 0.25 μm, क्योंकि फ्लक्स ∝ T⁴ है अतः T दोगुना और λ_max ∝ 1/T आधा हो जाता है

    फ्लक्स F = σT⁴ है, अतः 16 गुना फ्लक्स का अर्थ है T को 16^(1/4) = 2 से गुणा करना। Wien का नियम λ_max T = स्थिरांक तब शिखर तरंगदैर्ध्य को आधा करके 0.25 μm कर देता है। शिखर के लिए 1/T⁴ लेना Stefan–Boltzmann का घातांक गलत नियम पर लगाना है।
  5. वायुमंडल के शीर्ष पर वैश्विक औसत आपतित सौर फ्लक्स S₀ नहीं, S₀/4 है, क्योंकि

    1. लगभग तीन-चौथाई सूर्य-प्रकाश वायुमंडल के शीर्ष तक पहुँचने से पहले समताप मंडल में सोख लिया जाता है
    2. पृथ्वी औसतन किरण-पुंज से कोण पर है, जिसका माध्य कोज्या 0.25 है
    3. विषुवत् रेखा पर वर्ष का केवल एक-चौथाई भाग सूर्य-प्रकाश पाता है
    4. पृथ्वी पुंज को अपनी चकती πR² पर रोकती है जबकि उसका पृष्ठीय क्षेत्रफल 4πR² है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — पृथ्वी पुंज को अपनी चकती πR² पर रोकती है जबकि उसका पृष्ठीय क्षेत्रफल 4πR² है

    रोकी गई शक्ति S₀πR² है, जो 4πR² क्षेत्रफल के गोले पर फैलती है, अतः प्रति इकाई क्षेत्रफल S₀/4। ऐल्बिडो बाद में अलग से लगता है। अन्य कथन शीर्ष के ऊपर अवशोषण, माध्य कोज्या व मौसमी अंश गढ़ते हैं, जिनमें से कोई यह गुणनखंड तय नहीं करता।
  6. एक विद्यार्थी किसी ग्रह का प्रभावी ताप S₀(1 − α) = σT_e⁴ से निकालता है और गुणनखंड 4 भूल जाता है। S₀ = 1361 W/m², α = 0.30 व σ = 5.67×10⁻⁸ W m⁻² K⁻⁴ पर उत्तर 255 K के बजाय लगभग 360 K आता है। गलत व सही मान का अनुपात है

    1. ठीक 4, क्योंकि छूटा गुणनखंड 4 है
    2. 2, क्योंकि गुणनखंड 4 वर्गमूल के नीचे आता है
    3. 4^(1/4) ≈ 1.41, क्योंकि T_e फ्लक्स का चतुर्थ मूल है
    4. 4^(1/2) को 2 से भाग देने पर, जो 1 के बराबर है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — 4^(1/4) ≈ 1.41, क्योंकि T_e फ्लक्स का चतुर्थ मूल है

    T_e ∝ (फ्लक्स)^(1/4) है, अतः फ्लक्स में गुणनखंड 4 छोड़ने पर T_e में 4^(1/4) = √2 = 1.414 गुणक आता है। जाँच: 255 × 1.414 = 360 K। ताप में 4 या 2 गुना त्रुटि प्रेक्षण से कहीं अधिक होती, और इसी से भूल पकड़ी जाती है।
  7. कौन-सी गैसों का युग्म शुष्क वायु का लगभग 99% है फिर भी ऊष्मीय अवरक्त में लगभग कोई अवशोषण नहीं करता?

    1. ऑक्सीजन व आर्गन, क्योंकि आर्गन उत्कृष्ट गैस और ऑक्सीजन अनुचुंबकीय है
    2. नाइट्रोजन व ऑक्सीजन, क्योंकि उनके कंपन व घूर्णन द्विध्रुव आघूर्ण नहीं बदलते
    3. नाइट्रोजन व कार्बन डाइऑक्साइड, क्योंकि दोनों रैखिक अणु हैं
    4. ऑक्सीजन व ओज़ोन, क्योंकि दोनों केवल ऑक्सीजन परमाणुओं से बने हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — नाइट्रोजन व ऑक्सीजन, क्योंकि उनके कंपन व घूर्णन द्विध्रुव आघूर्ण नहीं बदलते

    N₂ (78%) व O₂ (21%) समनाभिकीय द्विपरमाणुक हैं: कोई कंपन या घूर्णन परिवर्ती द्विध्रुव नहीं बनाता, इसलिए वे ऊष्मीय अवरक्त में न अवशोषण करती हैं न उत्सर्जन। CO₂ व O₃ अवशोषण करती हैं, अतः उनवाले युग्म गलत हैं; रैखिक होना या एक ही तत्व का होना कसौटी नहीं है।
  8. एक-परत हरितगृह मॉडल में वायुमंडल समतापी है, सूर्य-प्रकाश के लिए पारदर्शी है, दीर्घतरंग उत्सर्जकता ε = 0.5 तथा T_e = 255 K है। T_s⁴ = 2T_e⁴/(2 − ε) से धरातलीय ताप निकटतम है

    1. 255 K, क्योंकि परत वही पुनः उत्सर्जित करती है जो धरातल विकिरित करता है
    2. 274 K, क्योंकि T_s = 255 × (4/3)^(1/4)
    3. 303 K, जैसा पूर्ण अवशोषक परत के लिए
    4. 312 K, क्योंकि T_s = 255 × (2 − 0.5)^(1/2)
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — 274 K, क्योंकि T_s = 255 × (4/3)^(1/4)

    T_s⁴ = 2T_e⁴/1.5 = (4/3)T_e⁴, अतः T_s = 255 × 1.0746 = 274 K। 303 K के लिए ε = 1 और 255 K के लिए ε = 0 चाहिए। 312 K वाला मान चौथे मूल की जगह वर्गमूल लेता है और उसका कोई भौतिक आधार नहीं है।
  9. CO₂ द्वारा विकिरण बलन ΔF = 5.35 ln(C/C₀) W/m² से आँका जाता है। 280 ppm वाले वायुमंडल में पहले जोड़े गए 100 ppm की तुलना में अगले 100 ppm जोड़ने पर बलन

    1. कम बलन देता है, क्योंकि निर्भरता सांद्रता में लघुगणकीय है
    2. वही बलन देता है, क्योंकि दोनों वृद्धियाँ 100 ppm हैं
    3. अधिक बलन देता है, क्योंकि अवशोषण बैंड अधिक पारदर्शी हो जाते हैं
    4. शून्य बलन देता है, क्योंकि बैंड पूर्णतः संतृप्त हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — कम बलन देता है, क्योंकि निर्भरता सांद्रता में लघुगणकीय है

    ln(380/280) = 0.305 से 1.63 W/m² और ln(480/380) = 0.234 से 1.25 W/m² मिलता है, अतः दूसरी वृद्धि कम बलन देती है। बैंड-केंद्र संतृप्त हैं पर पंख अवशोषण करते रहते हैं, इसलिए बलन शून्य नहीं होता।
  10. वायुमंडल के बारे में सभी सही कथन चुनिए।

    1. समरूप मंडल में N₂, O₂ व Ar के अनुपात ऊँचाई के साथ लगभग स्थिर रहते हैं
    2. मध्यसीमा वायुमंडल का सबसे ठंडा क्षेत्र है, लगभग 180 से 190 K
    3. अधिकांश वायुमंडलीय जलवाष्प समताप मंडल में है
    4. ऊष्म मंडल में ताप अधिक है पर कम घनत्व के कारण ऊष्मा-मात्रा बहुत कम
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — समरूप मंडल में N₂, O₂ व Ar के अनुपात ऊँचाई के साथ लगभग स्थिर रहते हैं; B — मध्यसीमा वायुमंडल का सबसे ठंडा क्षेत्र है, लगभग 180 से 190 K; D — ऊष्म मंडल में ताप अधिक है पर कम घनत्व के कारण ऊष्मा-मात्रा बहुत कम

    विक्षुब्ध मिश्रण शुष्क वायु के अनुपातों को लगभग 80 से 100 km तक स्थिर रखता है। मध्यसीमा सबसे ठंडा क्षेत्र है, ऊष्म मंडल तप्त पर लगभग रिक्त है। जलवाष्प क्षोभ मंडल के निचले कुछ किलोमीटर में केंद्रित है, अतः समताप मंडल वाला कथन असत्य है।
  11. 5800 K की एक कृष्णिका और 290 K की एक कृष्णिका की तुलना की जाती है। सभी सही कथन चुनिए।

    1. तप्त पिंड का शिखर तरंगदैर्ध्य ठंडे पिंड से 20 गुना छोटा है
    2. तप्त पिंड का उत्सर्जित फ्लक्स σT⁴ ठंडे पिंड से 20 गुना अधिक है
    3. तप्त पिंड का उत्सर्जित फ्लक्स ठंडे पिंड से 20⁴ = 160 000 गुना अधिक है
    4. ठंडा पिंड ऊष्मीय अवरक्त में लगभग 10 μm पर शिखर बनाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — तप्त पिंड का शिखर तरंगदैर्ध्य ठंडे पिंड से 20 गुना छोटा है; C — तप्त पिंड का उत्सर्जित फ्लक्स ठंडे पिंड से 20⁴ = 160 000 गुना अधिक है; D — ठंडा पिंड ऊष्मीय अवरक्त में लगभग 10 μm पर शिखर बनाता है

    ताप का अनुपात 20 है। Wien से λ_max, T का व्युत्क्रमानुपाती है, अतः शिखर 20 गुना छोटा है (0.50 μm बनाम 10.0 μm)। फ्लक्स T⁴ के अनुसार, 160 000 गुना, बदलता है, इसलिए 20 गुना वाला कथन असत्य है।
  12. वे सभी अणु चुनिए जो हरितगृह प्रभाव से संबंधित रूप में ऊष्मीय अवरक्त में प्रबल अवशोषण करते हैं।

    1. H₂O, कंपन-घूर्णन बैंडों व शुद्ध घूर्णन द्वारा
    2. N₂, अपने तनन कंपन द्वारा
    3. CO₂, अपने 15 μm बंकन बैंड द्वारा
    4. Ar, 10 μm पर इलेक्ट्रॉनिक संक्रमणों द्वारा
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — H₂O, कंपन-घूर्णन बैंडों व शुद्ध घूर्णन द्वारा; C — CO₂, अपने 15 μm बंकन बैंड द्वारा

    जलवाष्प व CO₂ की गतियाँ द्विध्रुव बदलती हैं। CO₂ का बंकन विधा लगभग 15 μm पर पृथ्वी के उत्सर्जन शिखर पर है। N₂ में द्विध्रुव परिवर्तन नहीं होता और Ar एकपरमाणुक है, जिसमें कंपन या घूर्णन होता ही नहीं।
  13. एक पिंड 300 K पर कृष्णिका की भाँति व्यवहार करता है। Wien का स्थिरांक λ_max T = 2898 μm·K लेकर उसकी शिखर उत्सर्जन तरंगदैर्ध्य μm में, दो दशमलव स्थानों तक, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 9.66

    λ_max = 2898 / 300 = 9.66 μm, ऊष्मीय अवरक्त में।
  14. एक ग्रह को अपने तारे से अपनी दूरी पर S₀ = 1361 W/m² मिलता है और उसका ग्रहीय ऐल्बिडो α = 0.25 है। σ = 5.67×10⁻⁸ W m⁻² K⁻⁴ लेकर, वायुमंडल-रहित मानते हुए, उसका प्रभावी ताप केल्विन में निकटतम पूर्णांक तक ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 259

    अवशोषित = S₀(1 − α)/4 = 1361 × 0.75 / 4 = 255.2 W/m²। T_e = (255.2 / 5.67×10⁻⁸)^(1/4) = (4.501×10⁹)^(1/4) = 259.0 K।
  15. एक-परत मॉडल में (समतापी परत, सूर्य-प्रकाश के लिए पारदर्शी, दीर्घतरंग उत्सर्जकता ε, T_s⁴ = 2T_e⁴/(2 − ε)) T_e = 255 K तथा धरातलीय ताप T_s = 288 K लें। ε दो दशमलव स्थानों तक ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 0.77

    पुनर्व्यवस्थित करने पर ε = 2[1 − (T_e/T_s)⁴] = 2[1 − (255/288)⁴] = 2(1 − 0.6146) = 0.77।
  16. ΔF = 5.35 ln(C/C₀) W/m² का उपयोग करके CO₂ के 280 ppm से 420 ppm होने पर विकिरण बलन W/m² में, दो दशमलव स्थानों तक, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 2.17

    ΔF = 5.35 × ln(420/280) = 5.35 × ln 1.5 = 5.35 × 0.4055 = 2.17 W/m²।
  17. किसी सतह से वाष्पन प्रतिदिन 3.0 mm द्रव जल हटाता है। वाष्पन की गुप्त ऊष्मा L_v = 2.5×10⁶ J/kg, जल का घनत्व 1000 kg/m³ व 1 दिन = 86 400 s लेकर समतुल्य गुप्त ऊष्मा फ्लक्स W/m² में, एक दशमलव स्थान तक, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 86.8

    प्रति m² प्रतिदिन द्रव्यमान = 0.003 m × 1000 = 3 kg। फ्लक्स = 3 × 2.5×10⁶ / 86 400 = 86.8 W/m²।