रबर व जैव-बहुलक: प्राकृतिक व कृत्रिम रबर, खाद-योग्य व प्राकृतिक बहुलक

यह अध्याय XE5 बहुलक विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के खंड XE5.3, “संश्लेषण, विनिर्माण एवं गुणधर्म”, के रबर व जैव-बहुलक वाले भाग का उत्तर देता है। XE5 अभियांत्रिकी विज्ञान (XE) पेपर के नौ वैकल्पिक खंडों में से एक है, जिनमें से परीक्षा में कोई भी दो चुने जाते हैं। शीर्षक है: “प्राकृतिक व कृत्रिम रबर: लेटेक्स से NR हाइड्रोकार्बन की प्राप्ति; SBR; नाइट्राइल; CR; CSM; EPDM; IIR; BR; सिलिकोन; TPE; … जैव-खाद-योग्य बहुलक जैसे PCL, PLA, PBAT, PHA/PHB, प्राकृतिक व जैव-अपघटनीय बहुलक जैसे सेलुलोज़, स्टार्च, ऐल्जिनेट।” प्रत्येक पदार्थ हेतु अध्याय स्रोत या एकलक, विधि, संरचना से निकलने वाले गुण, उपयोग तथा जैव-बहुलकों के लिए उनके जैव-अपघटन का ढंग देता है। संख्यात्मक प्रश्न द्रव्यमान के आधार पर क्लोरीन व सहएकलक की मात्रा, जल निकलने के साथ उपज, बहुलकन की डिग्री और शुष्क रबर मात्रा हैं।

1. प्राकृतिक रबर तथा लेटेक्स से हाइड्रोकार्बन की प्राप्ति

प्राकृतिक रबर (NR) cis-1,4-पॉलीआइसोप्रीन, –CH₂–C(CH₃)=CH–CH₂–, है जिसे रबर वृक्ष Hevea brasiliensis बनाता है। टैपिंग से मिला क्षेत्र-लेटेक्स एक कोलॉइड है: लगभग 30–35 % रबर हाइड्रोकार्बन (शुष्क रबर मात्रा, DRC) लगभग 0.1–1 µm के कणों के रूप में, जल तथा थोड़े प्रोटीन, लिपिड व शर्करा के साथ। प्रत्येक कण ऋण-आवेशित प्रोटीन–लिपिड परत से अलग रहता है। प्राप्ति का अर्थ उस स्थायित्व को तोड़कर रबर को एकत्र करना है।

  • स्कंदन: लेटेक्स को लगभग 15 % DRC तक तनु कर उसमें फ़ॉर्मिक या ऐसीटिक जैसा दुर्बल अम्ल मिलाया जाता है। pH लगभग 5 तक गिरता है, जो रक्षी प्रोटीन के समविद्युत बिंदु के निकट है; आवेश निष्प्रभावित होता है और कण मिलकर स्कंद बना लेते हैं।
  • शीट: स्कंद को चिकने व फिर धारीदार बेलनों में बेलकर पतली शीटों में बदला जाता है, जिन्हें धूम्र-कक्ष में लगभग 50–60 °C पर कुछ दिन सुखाया जाता है। परिणाम पसलीदार धूम्रित शीट (RSS) है; धुआँ परिरक्षक फ़ीनॉल छोड़ता है।
  • क्रेप: स्कंद को जल-फुहार के नीचे खाँचेदार बेलनों से निकाला जाता है, जो सीरम को धो देता है और पतली सिलवटदार शीट देता है जिसे हवा में सुखाया जाता है। पेल क्रेप विरंजित लेटेक्स से शुरू होता है और सबसे हल्के रंग का होता है; निम्न श्रेणियाँ कतरन का उपयोग करती हैं।
  • सांद्र: अमोनिया से परिरक्षित लेटेक्स को अपकेंद्रित कर डुबोई वस्तुओं (दस्ताने, गुब्बारे) व फ़ोम हेतु लगभग 60 % DRC तक लाया जाता है। क्रंब या ब्लॉक रबर (तकनीकी विनिर्देशित) स्कंद को कणित, धोकर व सुखाकर बनता है।

NR का Tg लगभग −70 °C है, प्रत्यास्थता उच्च और ऊष्मा-संचय कम है। इसकी नियमित cis शृंखला खिंचने पर क्रिस्टलित होती है, जिससे भराव के बिना भी उच्च तनन व विदारण सामर्थ्य तथा तीव्र चिपचिपाहट मिलती है। C=C बंध सल्फ़र वल्कनीकरण संभव बनाते हैं पर ओज़ोन, ऊष्मीय जरण तथा हाइड्रोकार्बन तेलों के विरुद्ध दुर्बल भी करते हैं। उपयोग: ट्रक व वायुयान टायर, इंजन माउंट, बेयरिंग, दस्ताने।

⚠️ वही एकलक, भिन्न बहुलक
गटा-पर्चा व बलाटा trans-1,4-पॉलीआइसोप्रीन हैं। trans शृंखला कमरे के ताप पर क्रिस्टल में संकुलित होती है, इसलिए वे कठोर व चर्मिल होते हैं, रबरी नहीं। केवल cis-1,4 (NR तथा कृत्रिम पॉलीआइसोप्रीन, IR) प्रत्यास्थक है।

2. डाइईन कृत्रिम रबर: SBR, BR, नाइट्राइल, CR व IIR

प्रत्यास्थक को लचीली शृंखला (निम्न Tg), उपयोग-ताप पर अक्रिस्टलीयता तथा प्रवाह रोकने हेतु अनुप्रस्थ-बंध चाहिए। कृत्रिम रबर इसमें भिन्न हैं कि कौन-सा एकलक ये गुण तय करता है। अधिकांश सारणी तीन नियमों से समझी जाती है: ध्रुवीय समूह (नाइट्राइल, क्लोरीन) तेल-प्रतिरोध देते हैं; मेरुदंड में असंतृप्तता सल्फ़र-क्योर योग्य स्थल देती है पर ओज़ोन को शृंखला काटने देती है; अत्यंत लचीली या अत्यंत कठोर शृंखला Tg व प्रत्यास्थता को खिसकाती है।

डाइईन व संबद्ध रबर
रबरएकलक व विधिमुख्य गुणउपयोग
SBRब्यूटाडाईन + लगभग 23 % स्टाइरीन (द्रव्यमान); मुक्त-मूलक पायस (शीत, रेडॉक्स प्रारंभक, लगभग 5 °C) या ऋणायनिक विलयनखिंचाव से क्रिस्टलित नहीं होता, अतः प्रबलक भराव चाहिए; अच्छा घर्षण व जरण प्रतिरोध; Tg लगभग −55 °Cकार टायर ट्रेड, पट्टे, पादुका
BRब्यूटाडाईन; ज़िग्लर–नाटा (Ni, Co, Nd) से उच्च cis-1,4न्यूनतम Tg (लगभग −100 °C), सर्वोत्तम प्रत्यास्थता व घर्षण प्रतिरोध, कम ऊष्मा-संचय; विदारण व आर्द्र पकड़ दुर्बलटायर ट्रेड व पार्श्व-भित्ति में NR या SBR से मिश्रित; HIPS हेतु आघात-रूपांतरक
नाइट्राइल (NBR)ब्यूटाडाईन + 18–50 % ऐक्रिलोनाइट्राइल; पायसध्रुवीय नाइट्राइल तेल व ईंधन प्रतिरोध देता है जो ऐक्रिलोनाइट्राइल बढ़ने पर बढ़ता है, जबकि निम्न-ताप लचीलापन घटता हैईंधन नलियाँ, तेल सील, गैस्केट, रोलर
CR (पॉलीक्लोरोप्रीन)2-क्लोरोब्यूटा-1,3-डाईन (क्लोरोप्रीन); पायस, अधिकांशतः trans-1,4द्विबंध पर क्लोरीन ज्वाला, तेल, मौसम व ओज़ोन प्रतिरोध देती है; खिंचाव पर क्रिस्टलित; ZnO व MgO से क्योरवेटसूट, कन्वेयर पट्टे, केबल आवरण, चिपकाने वाले पदार्थ
IIR (ब्यूटिल)आइसोब्यूटिलीन + 1–2 mol % आइसोप्रीन; धनायनिक, मेथिल क्लोराइड में AlCl₃, लगभग −90 से −100 °Cअत्यंत कम गैस पारगम्यता (मेथिल समूहों से संकुलित शृंखला), अच्छा ओज़ोन व ऊष्मा प्रतिरोध; कम प्रत्यास्थता; कम C=C के कारण धीमा क्योरइनर ट्यूब, ट्यूबरहित टायर के आंतरिक अस्तर, औषध डाट
🧠 सारणी पढ़ने की युक्ति
किसी भी रबर से दो प्रश्न पूछें। क्या वह ध्रुवीय है (NBR, CR: तेल में कम फूलता है)? क्या उसके मेरुदंड में C=C है (NR, SBR, BR, NBR: ओज़ोन-संवेदी; CR को उसकी क्लोरीन बचाती है और IIR में C=C बहुत कम हैं)? यही दो प्रश्न अगले खंड में EPDM, CSM व सिलिकोन को स्थान देते हैं।

3. संतृप्त व विशिष्ट रबर: EPDM, CSM, सिलिकोन व TPE

EPDM एथिलीन, प्रोपिलीन तथा कुछ प्रतिशत असंयुग्मित डाईन (एथिलिडीन नॉरबॉर्नीन, डाइसाइक्लोपेंटाडाईन या 1,4-हेक्साडाईन) का टर्पॉलिमर है जो विलेय वैनेडियम ज़िग्लर–नाटा या मेटैलोसीन उत्प्रेरक से बनता है। प्रोपिलीन इकाइयाँ एथिलीन की क्रिस्टलीयता तोड़ती हैं, अतः शृंखला अक्रिस्टलीय व रबरी है। डाईन अपने केवल एक द्विबंध से अभिक्रिया करता है, जिससे सल्फ़र क्योर हेतु पार्श्व C=C बचता है; इस प्रकार मेरुदंड संतृप्त रहता है और ओज़ोन, मौसम व ऊष्मा प्रतिरोध उत्कृष्ट है। यह अध्रुवीय है, इसलिए तेल में फूलता है। उपयोग: छत झिल्लियाँ, दरवाज़ा व खिड़की सील, रेडिएटर नलियाँ, केबल विद्युतरोधन। डाईन-रहित EPM को परॉक्साइड से क्योर करना पड़ता है।

CSM (क्लोरोसल्फ़ोनित पॉलीएथिलीन) पॉलीएथिलीन को विलयन में क्लोरीन व सल्फ़र डाइऑक्साइड से उपचारित कर बनता है: इसमें लगभग 25–43 % क्लोरीन और –SO₂Cl समूहों के रूप में लगभग 1 % सल्फ़र होता है। क्लोरीन PE की क्रिस्टलीयता तोड़कर रबर बनाती है; –SO₂Cl समूह क्योर-स्थल हैं (धातु ऑक्साइड)। मेरुदंड संतृप्त है, अतः ओज़ोन, मौसम, रासायनिक व ज्वाला प्रतिरोध उत्कृष्ट हैं। उपयोग: छत शीट, नली आवरण, टंकी व तालाब अस्तर।

सिलिकोन रबर का मेरुदंड –Si(CH₃)₂–O– है, जो डाइमेथिलडाइक्लोरोसिलेन के जल-अपघटन से बने सिलेनॉलों के रैखिक बहुलक में संघनन से या चक्रीय चतुर्थक से बनता है, जिसे फिर अम्ल या क्षार से वलय-विवृत किया जाता है। लंबे, लचीले Si–O बंध Tg लगभग −125 °C देते हैं, इसलिए यह लगभग −55 से 250 °C तक रबरी रहता है; यह अक्रिय, जैव-संगत और उच्च गैस पारगम्यता वाला है। भराव-रहित गम दुर्बल है, अतः धूमित सिलिका मिलाई जाती है। क्योर परॉक्साइड, प्लैटिनम-उत्प्रेरित योग या नमी (कक्ष-ताप वल्कनीकरण) से होता है। उपयोग: गैस्केट, चिकित्सा नलियाँ, प्रत्यारोपण, सीलेंट, बेकिंग-पात्र।

ऊष्मसुघट्य प्रत्यास्थक (TPE) उपयोग-ताप पर रबरी पर गलित-संसाध्य होते हैं, क्योंकि वे रासायनिक अनुप्रस्थ-बंधों के स्थान पर भौतिक बंध रखते हैं: कोमल रबरी आव्यूह में जड़े कठोर काचीय या क्रिस्टलीय डोमेन। उदाहरण: SBS (पॉलीस्टाइरीन–पॉलीब्यूटाडाईन–पॉलीस्टाइरीन, क्रमिक ऋणायनिक बहुलकन से; पॉलीस्टाइरीन डोमेन, Tg लगभग 100 °C, रबर मध्य-खंडों को बाँधते हैं), उसका हाइड्रोजनित रूप SEBS (बेहतर जरण), ऊष्मसुघट्य पॉलीयूरिथेन, कोपॉलीएस्टर व पॉलीऐमाइड ब्लॉक कोपॉलीमर, तथा TPV, जिसमें पॉलीप्रोपिलीन में सूक्ष्म विस्थापित, गतिक रूप से वल्कनित EPDM होता है। ये कठोर-प्रावस्था के Tg या Tm से ऊपर नरम होते हैं, अतः कतरन पुनः-संसाध्य है पर कार्य-ताप वल्कनीकृत की तुलना में कम है तथा विसर्पण व संपीडन-स्थिरांक अधिक हैं।

4. जैव-खाद-योग्य पॉलीएस्टर: PCL, PLA, PBAT व PHA/PHB

इनके एस्टर बंध जल-अपघटित हो सकते हैं और फिर सूक्ष्मजीवों द्वारा उपयोग किए जा सकते हैं। जैव-आधारित (जैवद्रव्यमान से बना) व जैव-अपघटनीय भिन्न बातें हैं: PBAT जीवाश्म-आधारित होकर भी खाद-योग्य है, जैव-पॉलीएथिलीन जैव-आधारित होकर भी जैव-अपघटनीय नहीं है।

खाद-योग्य पॉलीएस्टर
बहुलकस्रोत व विधिगुणउपयोग
PCLε-कैप्रोलैक्टोन (पेट्रोरसायन); वलय-विवृत बहुलकन, ऐल्कोहॉल प्रारंभक सहित टिन ऑक्टोएटअर्धक्रिस्टलीय, Tm लगभग 60 °C, Tg लगभग −60 °C; मृदु, दृढ़; लाइपेज़ व कवकों से अपघटितऔषध-वाहन, टाँके, 3D-प्रिंटिंग तंतु, मिश्रण-साझेदार
PLAशर्करा या स्टार्च के किण्वन से लैक्टिक अम्ल → लैक्टाइड (चक्रीय द्विक) → टिन ऑक्टोएट से वलय-विवृति; सीधा संघनन केवल निम्न मोलर द्रव्यमान देता हैTg लगभग 55–60 °C, Tm लगभग 150–180 °C (PLLA); कठोर, पारदर्शी, भंगुर; लगभग 60 °C पर नरमकप, फ़िल्म, तंतु, 3D प्रिंटिंग, अवशोष्य प्रत्यारोपण
PBAT1,4-ब्यूटेनडाइऑल + ऐडिपिक अम्ल + टेरेफ़्थैलिक अम्ल (या DMT); गलित बहुसंघनन; जीवाश्म-आधारितयादृच्छिक ऐलिफ़ैटिक–ऐरोमैटिक कोपॉलीएस्टर: लचीला, Tg लगभग −30 °C, Tm लगभग 110–120 °C; खाद-योग्यखाद थैले, मल्च फ़िल्म; PLA व स्टार्च को दृढ़ बनाता है
PHA, PHBजीवाणुओं (जैसे Cupriavidus necator) द्वारा ऊर्जा-भंडार के रूप में बनता है जब शर्कराएँ या तेल अधिक तथा N या P कम हो; कोशिकाओं से निष्कर्षितPHB (3-हाइड्रॉक्सीब्यूटिरेट): Tm लगभग 175 °C, अत्यधिक क्रिस्टलीय, कठोर व भंगुर; 3-हाइड्रॉक्सीवैलरेट वाला PHBV Tm व क्रिस्टलीयता घटाकर दृढ़ बनाता हैपैकेजिंग, फेंकने योग्य छुरी-काँटे, चिकित्सा टाँके; मृदा व समुद्री जल में भी अपघटित
🎯 खाद-ढेर ही क्यों, मिट्टी का ढेर नहीं?
PLA का Tg लगभग 60 °C है। औद्योगिक खाद-ढेर लगभग 55–60 °C पर और नम रहता है, इसलिए शृंखलाएँ इतनी गतिशील होती हैं कि जल एस्टर बंधों को शीघ्र काट देता है। 20 °C पर, Tg से नीचे, PLA काचीय है और जल-अपघटन अत्यंत धीमा, इसलिए बगीचे में PLA कप लंबे समय तक बना रहता है। इसके विपरीत PCL (Tm 60 °C) और PHB पर परिवेश ताप पर भी मृदा सूक्ष्मजीव आक्रमण करते हैं।

5. प्राकृतिक बहुलक: सेलुलोज़, स्टार्च व ऐल्जिनेट

सेलुलोज़ सर्वाधिक प्रचुर बहुलक है: सीधी, चपटी शृंखला में β-1,4-बद्ध ग्लूकोज़ इकाइयाँ (ऐनहाइड्रोग्लूकोज़, C₆H₁₀O₅, 162.14 g/mol), जिसकी बहुलकन की डिग्री कपास में लगभग 10⁴ तक है। प्रत्येक इकाई में तीन –OH समूह हैं, अतः व्यापक हाइड्रोजन बंधन इसे क्रिस्टलीय, सुदृढ़ तथा अगलनीय व जल में अविलेय बनाता है: यह पिघलने से पहले अपघटित होता है। इसे व्युत्पन्नों या विशेष विलायकों से संसाधित किया जाता है: सेलुलोज़ ऐसीटेट (प्लास्टिक, फ़िल्म, तंतु), सेलुलोज़ नाइट्रेट तथा पुनर्जनित सेलुलोज़ (सेलुलोज़ ज़ैन्थेट से विस्कोस, या ऐमीन-ऑक्साइड विलायक से लायोसेल)। प्राकृतिक स्रोत काष्ठ-लुगदी, कपास व जूट हैं।

स्टार्च पादपों का ऊर्जा-भंडार है, जो α-ग्लूकोज़ से बना है: ऐमाइलोज़ (रैखिक, α-1,4, लगभग 20–30 %) तथा ऐमाइलोपेक्टिन (α-1,4 शृंखलाएँ व α-1,6 शाखन-बिंदु, शेष भाग)। यह अर्धक्रिस्टलीय कणिकाओं में संचित रहता है। जल के साथ गर्म कर व अपरूपित करने पर कणिकाएँ जेलैटिनीकृत होती हैं (फूलती हैं, क्रिस्टलीयता खोती हैं) और ग्लिसरॉल जैसे सुघट्यकारी के साथ ऊष्मसुघट्य स्टार्च (TPS) बनाती हैं। TPS सस्ता व जैव-अपघटनीय है पर जल-संवेदी है और समय के साथ पुनः-क्रिस्टलित (retrogradation) होकर भंगुर हो जाता है, अतः उसे PBAT, PCL या PLA से मिश्रित किया जाता है।

ऐल्जिनेट भूरी समुद्री शैवाल से निष्कर्षित होता है: β-D-मैन्युरोनिक (M) तथा α-L-गुलुरोनिक (G) अम्ल का रैखिक कोपॉलीमर, जिसमें M-खंड, G-खंड व मिश्रित खंड होते हैं। Ca²⁺ जैसे द्विसंयोजी धनायन पास की शृंखलाओं के G-खंडों के बीच बंधकर (“अंडा-पेटी” मॉडल) सोडियम-ऐल्जिनेट विलयन को कमरे के ताप पर जेल में बदल देते हैं। उपयोग: घाव की पट्टियाँ, खाद्य गाढ़ाकारी व जेल, कोशिका व औषध का आवरणन। Ca²⁺ हटाने पर, जैसे चिलेटकारी से, जेल घुल जाता है।

6. जैव-बहुलक कैसे जैव-अपघटित होते हैं

जैव-अपघटन तत्काल लोप नहीं है। इसके चरण हैं। खंडन: जल, ऊष्मा या बाह्यकोशिकीय एंज़ाइम (पॉलीएस्टरों हेतु लाइपेज़ व एस्टरेज़, सेलुलोज़ हेतु सेलुलेज़, स्टार्च हेतु ऐमाइलेज़, PHB हेतु PHA डिपॉलिमरेज़) सतह पर शृंखलाएँ काटते हैं; कोशिका में प्रवेश न कर पाने वाले बड़े बहुलक को पहले कटना पड़ता है, इसलिए अपघटन पृष्ठ-अपक्षरण है जो मोलर द्रव्यमान घटाता है। स्वांगीकरण: सूक्ष्मजीव छोटे खंड ग्रहण करते हैं। खनिजीकरण: वे वायु में CO₂ व H₂O तथा जैवद्रव्यमान में, और वायु के बिना CO₂ व CH₄ में बदल जाते हैं।

  • क्रिस्टलीयता: एंज़ाइम व जल पहले अक्रिस्टलीय क्षेत्रों में पहुँचते हैं, अतः अधिक क्रिस्टलीय ग्रेड (PHB, PLLA, PCL) अक्रिस्टलीय या कोपॉलीमर ग्रेड से धीमे अपघटित होते हैं।
  • रसायन: जल-अपघट्य बंध (एस्टर, ग्लाइकोसिडिक) आवश्यक हैं; पॉलीएथिलीन या पॉलीप्रोपिलीन जैसा पूर्ण-कार्बन मेरुदंड व्यवहार में आक्रांत नहीं होता। जलरागी बहुलक (स्टार्च, ऐल्जिनेट) जल सोखकर जलविरागी बहुलकों से शीघ्र अपघटित होते हैं।
  • पर्यावरण: ताप, नमी, pH व सूक्ष्मजीव समष्टि। PLA को गर्म खाद चाहिए; PCL, PHB व सेलुलोज़ मृदा में परिवेश ताप पर अपघटित होते हैं।
  • आकार: बड़े पृष्ठ-आयतन अनुपात वाली पतली फ़िल्म मोटी ढलाई से कहीं शीघ्र अपघटित होती है।
⚠️ लेबल नहीं, दावा परखें
माध्यम व समय के बिना “जैव-अपघटनीय” कोई गुण नहीं है। कोई बहुलक औद्योगिक खाद में जैव-अपघटनीय होकर भी समुद्री जल में बना रह सकता है। “जैव-आधारित” जीवन-अंत के बारे में कुछ नहीं कहता, और केवल पॉलीओलेफ़िन को सूक्ष्म-प्लास्टिक में तोड़ने वाला ऑक्सो-योज्य उसे जैव-अपघटनीय नहीं बनाता।

7. हल किए गए संख्यात्मक प्रश्न

प्रयुक्त मोलर द्रव्यमान (g/mol): H 1.008, C 12.011, N 14.007, O 15.999, Cl 35.45। दोहराव इकाई से द्रव्यमान संघटन: पॉलीक्लोरोप्रीन की दोहराव इकाई C₄H₅Cl = 4(12.011) + 5(1.008) + 35.45 = 88.53 g/mol है, अतः क्लोरीन 35.45/88.53 = 40.0 % द्रव्यमान है। CSM में क्लोरीन का आँकड़ा प्रक्रम से तय होता है, किसी निश्चित दोहराव इकाई से नहीं।

मोल अंश से द्रव्यमान अंश (नाइट्राइल रबर)। 30 mol % ऐक्रिलोनाइट्राइल (C₃H₃N, 53.06 g/mol) व 70 mol % ब्यूटाडाईन (C₄H₆, 54.09 g/mol) वाले कोपॉलीमर में प्रति 100 mol इकाइयों: ऐक्रिलोनाइट्राइल द्रव्यमान = 30 × 53.06 = 1591.8 g तथा ब्यूटाडाईन द्रव्यमान = 70 × 54.09 = 3786.3 g, अतः ऐक्रिलोनाइट्राइल का द्रव्यमान अंश = 1591.8/5378.1 = 29.6 %। चूँकि दोनों द्रव्यमान निकट हैं, यहाँ mol % व द्रव्यमान % लगभग मेल खाते हैं; जब एकलक द्रव्यमान भिन्न हों, जैसे स्टाइरीन (104.15) व ब्यूटाडाईन, तब ऐसा न मानें।

जल निकलने के साथ उपज। लैक्टिक अम्ल C₃H₆O₃ = 90.08 g/mol; प्रत्येक संघनन चरण एक H₂O छोड़ता है, अतः लंबी शृंखला की दोहराव इकाई C₃H₄O₂ = 72.06 g/mol है। पूर्ण परिवर्तन पर 100 kg लैक्टिक अम्ल से PLA का द्रव्यमान = 100 × 72.06/90.08 = 80.0 kg, और 20.0 kg जल निकलता है। लैक्टाइड विधि में वलय-विवृति चरण में जल नहीं निकलता।

बहुलकन की डिग्री व DRC। Mₙ = 486,000 g/mol वाले सेलुलोज़ की DP = 486,000/162.14 ≈ 3000 है (अंत्य समूह उपेक्षित)। 35 % DRC का लेटेक्स प्रति 1000 kg 350 kg शुष्क रबर देता है; यदि 5 % सीरम व धुलाई में खो जाए तो शीट 0.95 × 350 = 332.5 kg है।

मुख्य बिंदु

  • NR cis-1,4-पॉलीआइसोप्रीन है जो लेटेक्स के अम्ल-स्कंदन (pH लगभग 5) से शीट (RSS) या क्रेप के रूप में प्राप्त होता है; यह खिंचाव से क्रिस्टलित होता है, अतः भराव बिना सुदृढ़ है, पर C=C बंध इसे ओज़ोन व तेल के प्रति संवेदी बनाते हैं; trans समावयवी कठोर गटा-पर्चा है।
  • SBR (पायस या विलयन, खिंचाव-क्रिस्टलन नहीं, भराव चाहिए), BR (न्यूनतम Tg, सर्वोत्तम प्रत्यास्थता व घिसाव), NBR (ध्रुवीय, तेल-प्रतिरोधी), CR (क्लोरीन: ज्वाला, तेल, मौसम प्रतिरोध) तथा IIR (अल्प असंतृप्तता, अत्यंत कम गैस पारगम्यता) डाईन रबर हैं; ध्रुवीय समूह तेल-प्रतिरोध देते हैं, मेरुदंड C=C ओज़ोन-संवेदनशीलता।
  • EPDM, CSM व सिलिकोन के मेरुदंड संतृप्त या अकार्बनिक हैं: उत्कृष्ट ओज़ोन, मौसम व ऊष्मा प्रतिरोध। EPDM सल्फ़र क्योर हेतु पार्श्व डाईन रखता है; CSM –SO₂Cl से क्योर होने वाला क्लोरोसल्फ़ोनित PE है; सिलिकोन (Tg लगभग −125 °C) को सिलिका भराव चाहिए।
  • TPE कठोर डोमेनों से भौतिक अनुप्रस्थ-बंध लेते हैं (SBS: पॉलीब्यूटाडाईन आव्यूह में पॉलीस्टाइरीन डोमेन); ये पुनः-संसाध्य हैं पर कठोर-प्रावस्था के Tg या Tm से सीमित हैं।
  • PCL (वलय-विवृत, Tm लगभग 60 °C), PLA (लैक्टाइड वलय-विवृति, Tg लगभग 60 °C, गर्म खाद चाहिए), PBAT (जीवाश्म-आधारित पर खाद-योग्य, लचीला) तथा PHA/PHB (जीवाणु-जनित, भंगुर PHB, दृढ़तर PHBV) खाद-योग्य पॉलीएस्टर हैं; जैव-आधारित का अर्थ जैव-अपघटनीय नहीं।
  • सेलुलोज़ (β-1,4, H-बद्ध, अगलनीय), स्टार्च (ऐमाइलोज़ व ऐमाइलोपेक्टिन, TPS पुनः-क्रिस्टलित होता है) और ऐल्जिनेट (M/G खंड, Ca²⁺ अंडा-पेटी जेल) जल-अपघटक एंज़ाइमों से जैव-अपघटित होते हैं; अपघटन पृष्ठ-अपक्षरण है, अक्रिस्टलीय, जलरागी, पतले नमूनों में तेज़।

अभ्यास प्रश्न (16)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. Hevea brasiliensis का क्षेत्र-लेटेक्स शीट रबर बनाने हेतु स्कंदित किया जाता है। कौन-सा उपचार यह करता है और क्यों?

    1. अमोनिया मिलाना, जो pH बढ़ाकर रबर कणों का आवेश निष्प्रभावित करती है जिससे वे मिल जाते हैं
    2. फ़ॉर्मिक जैसा दुर्बल अम्ल मिलाना, जो pH को लगभग 5 पर लाकर प्रोटीन परत का आवेश निष्प्रभावित करता है
    3. बहुत जल से तनु करना, जो सीरम धो देता है और cis-पॉलीआइसोप्रीन शृंखलाओं को अनुप्रस्थ-बद्ध करता है
    4. लेटेक्स को 200 °C से ऊपर गर्म करना, जो बिना रासायनिक परिवर्तन कणों को एक पिंड में पिघला देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — फ़ॉर्मिक जैसा दुर्बल अम्ल मिलाना, जो pH को लगभग 5 पर लाकर प्रोटीन परत का आवेश निष्प्रभावित करता है

    रबर कण ऋण-आवेशित प्रोटीन–लिपिड परत से अलग रहते हैं। दुर्बल अम्ल pH को प्रोटीनों के समविद्युत बिंदु के निकट लाता है, अतः प्रतिकर्षण मिट जाता है और कण मिल जाते हैं। अमोनिया इसका उलटा करती है: वह लेटेक्स को स्थिर रखती है और सांद्र का परिरक्षक है। तनुकरण शृंखलाओं को अनुप्रस्थ-बद्ध नहीं करता (उसके लिए वल्कनीकरण चाहिए), और 200 °C तक गर्म करने से रबर अपघटित हो जाएगा।
  2. अरक्षित डाईन रबर से बनी टायर की पार्श्व-भित्ति में खुली हवा में महीनों बाद, बिना तेल या ऊष्मा के, विकृति के लंबवत महीन दरारें बन जाती हैं। बिना प्रति-ओज़ोनक के कौन-सा रबर सर्वाधिक संभवतः ऐसा व्यवहार करेगा?

    1. SBR, जिसका ब्यूटाडाईन–स्टाइरीन मेरुदंड C=C बंधों से भरा है जिन पर ओज़ोन आक्रमण करती है
    2. EPDM, जिसका मेरुदंड संतृप्त है और C=C केवल पार्श्व समूह में है
    3. सिलिकोन रबर, जिसका मेरुदंड सिलिकन व ऑक्सीजन परमाणुओं की एकांतर शृंखला है
    4. CSM, जिसका मेरुदंड संतृप्त कार्बन शृंखला वाला क्लोरीनित पॉलीएथिलीन है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — SBR, जिसका ब्यूटाडाईन–स्टाइरीन मेरुदंड C=C बंधों से भरा है जिन पर ओज़ोन आक्रमण करती है

    ओज़ोन-दरार हेतु मेरुदंड C=C बंध चाहिए, जिन्हें विकृत रबर पर ओज़ोन काट देती है। SBR में ये बहुत हैं। EPDM, CSM व सिलिकोन के मेरुदंड संतृप्त या अकार्बनिक हैं, अतः वे ओज़ोन सह लेते हैं; बाहरी सीलों में EPDM द्वारा डाईन रबरों का स्थान लेने का यही मुख्य कारण है।
  3. एक सील को वर्षों तक पेट्रोल व खनिज तेल के संपर्क में काम करना है। निम्नलिखित में से कौन-सा रबर उचित चयन है?

    1. EPDM, क्योंकि उसका संतृप्त मेरुदंड उसे सभी रबरों में, तेलों सहित, सबसे अधिक रासायनिक रूप से प्रतिरोधी बनाता है
    2. प्राकृतिक रबर, क्योंकि उसकी cis-1,4 शृंखला खिंचाव पर क्रिस्टलित होकर ईंधन को रोकती है
    3. ब्यूटिल रबर, क्योंकि उसकी उच्च आइसोब्यूटिलीन मात्रा उसे हाइड्रोकार्बन-प्रतिरोधी बनाती है
    4. नाइट्राइल रबर, क्योंकि ध्रुवीय नाइट्राइल समूह उसे अध्रुवीय हाइड्रोकार्बनों में कहीं कम फूलने वाला बनाते हैं
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    उत्तर: D — नाइट्राइल रबर, क्योंकि ध्रुवीय नाइट्राइल समूह उसे अध्रुवीय हाइड्रोकार्बनों में कहीं कम फूलने वाला बनाते हैं

    तेल-प्रतिरोध ध्रुवता का अनुसरण करता है: समान समान को घोलता है, अतः अध्रुवीय रबर (NR, EPDM, ब्यूटिल) हाइड्रोकार्बनों में फूलते हैं, जबकि ध्रुवीय NBR नहीं। EPDM ओज़ोन, भाप व ध्रुवीय तरलों के विरुद्ध उत्कृष्ट है पर पेट्रोल व तेल में फूलता है, जो लुभावना गलत उत्तर है; उसकी संतृप्तता ओज़ोन-प्रतिरोध में सहायक है, तेल-प्रतिरोध में नहीं।
  4. आइसोब्यूटिलीन–आइसोप्रीन रबर में केवल लगभग 1–2 mol % आइसोप्रीन होता है। कौन-सा परिणाम सही है?

    1. इसे सल्फ़र से बिल्कुल अनुप्रस्थ-बद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके थोड़े द्विबंध बहुत कम अभिक्रियाशील हैं, अतः केवल परॉक्साइड या रेज़िन क्योर संभव है
    2. इसकी गैस पारगम्यता उच्च है क्योंकि आइसोप्रीन इकाइयाँ शृंखला-संकुलन खोल देती हैं और गैस अणुओं को विसरित होने देती हैं
    3. कम क्योर-स्थल सल्फ़र क्योर को धीमा करते हैं, जबकि ओज़ोन व ऊष्मा प्रतिरोध NR से अधिक है
    4. यह NR से अधिक प्रबलता से खिंचाव-क्रिस्टलित होता है, अतः इसकी प्रत्यास्थता किसी भी रबर में सर्वाधिक और फटन-सामर्थ्य सर्वोत्तम है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — कम क्योर-स्थल सल्फ़र क्योर को धीमा करते हैं, जबकि ओज़ोन व ऊष्मा प्रतिरोध NR से अधिक है

    थोड़ी-सी आइसोप्रीन इकाइयाँ ही सल्फ़र वल्कनीकरण हेतु एकमात्र C=C देती हैं, अतः क्योर धीमा है और रबर ओज़ोन व ऑक्सीजन के प्रति निष्क्रिय है। सल्फ़र क्योर संभव है (ब्यूटिल इनर ट्यूब सल्फ़र-क्योर होते हैं), अतः यह दावा कि इसे सल्फ़र से क्योर नहीं किया जा सकता, असत्य है। ब्यूटिल अत्यंत कम गैस पारगम्यता व कम प्रत्यास्थता के लिए जाना जाता है, जो शेष दोनों को निरस्त करता है।
  5. SBS ब्लॉक कोपॉलीमर कमरे के ताप पर वल्कनित रबर जैसा व्यवहार क्यों करता है पर लगभग 100 °C से ऊपर गर्म करने पर बहने क्यों लगता है?

    1. गर्म करने पर पॉलीब्यूटाडाईन में सल्फ़र अनुप्रस्थ-बंध बनते हैं और ठंडा करने पर फिर टूट जाते हैं, इसीलिए पदार्थ कमरे के ताप पर नरम पर गर्म होने पर बहने वाला है
    2. पॉलीस्टाइरीन अंत्य-खंड काचीय डोमेनों में एकत्र होकर पॉलीब्यूटाडाईन मध्य-खंडों को बाँधते हैं, और वे डोमेन अपने Tg से ऊपर नरम हो जाते हैं
    3. पॉलीब्यूटाडाईन खंड कमरे के ताप पर क्रिस्टलित होते हैं और लगभग 100 °C पर पिघलते हैं
    4. पॉलीस्टाइरीन सतत रबरी आव्यूह बनाता है और पॉलीब्यूटाडाईन काचीय भराव
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — पॉलीस्टाइरीन अंत्य-खंड काचीय डोमेनों में एकत्र होकर पॉलीब्यूटाडाईन मध्य-खंडों को बाँधते हैं, और वे डोमेन अपने Tg से ऊपर नरम हो जाते हैं

    काचीय पॉलीस्टाइरीन डोमेन (Tg लगभग 100 °C) रबरी पॉलीब्यूटाडाईन शृंखलाओं के बीच भौतिक अनुप्रस्थ-बंध का काम करते हैं। पॉलीस्टाइरीन के Tg से ऊपर डोमेन नरम होकर पदार्थ बहने लगता है और ठंडा होने पर वे पुनः बनते हैं, अतः कतरन पुनः-संसाध्य है। इसमें सल्फ़र नहीं है और पॉलीब्यूटाडाईन (Tg लगभग −100 °C) उल्लेखनीय क्रिस्टलित नहीं होता; काचीय प्रावस्था अल्प, परिक्षिप्त प्रावस्था है।
  6. बगीचे की सतह पर छोड़े PLA कप में एक वर्ष बाद भी लगभग कोई परिवर्तन नहीं दिखता, पर गर्म औद्योगिक खाद-ढेर में वह सप्ताहों में टूट जाता है। कौन-सा स्पष्टीकरण सही है?

    1. PLA अपने Tg (लगभग 60 °C) से नीचे काचीय है, अतः बगीचे में एस्टर जल-अपघटन अत्यंत धीमा है; गर्म, नम खाद-ढेर उस Tg पर या उससे ऊपर रहता है
    2. PLA में कोई जल-अपघट्य बंध नहीं है, और खाद उसके पूर्ण-कार्बन मेरुदंड का ऊष्मीय ऑक्सीकरण कर देती है, जो ठंडी बगीचे की सतह एक वर्ष में नहीं कर पाती
    3. बगीचे की मिट्टी में कोई सूक्ष्मजीव होते ही नहीं, जबकि प्रत्येक खाद-ढेर में बड़ी व विविध समष्टि होती है
    4. PLA खाद की 60 °C ऊष्मा से पिघल जाता है, और गलित पदार्थ को फिर सूक्ष्मजीव तोड़ देते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — PLA अपने Tg (लगभग 60 °C) से नीचे काचीय है, अतः बगीचे में एस्टर जल-अपघटन अत्यंत धीमा है; गर्म, नम खाद-ढेर उस Tg पर या उससे ऊपर रहता है

    जल-अपघटनी शृंखला-छेदन हेतु गतिशील शृंखलाएँ व जल चाहिए। Tg से नीचे PLA काचीय है और एस्टर बंध केवल धीरे-धीरे आक्रांत होते हैं, इसलिए कप बाहर बना रहता है; नम खाद में 55–60 °C पर शृंखलाएँ गतिशील होती हैं, जल-अपघटन तेज़ होता है और सूक्ष्मजीव खंडों को खा लेते हैं। PLA जल-अपघट्य बंधों वाला पॉलीएस्टर है, मिट्टी में प्रचुर सूक्ष्मजीव हैं, और PLLA लगभग 150–180 °C पर पिघलता है, 60 °C पर नहीं।
  7. 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटिरेट को कुछ मोल प्रतिशत 3-हाइड्रॉक्सीवैलरेट के साथ सहबहुलकित कर PHB से PHBV बनाने का क्या प्रभाव होता है?

    1. Tm व क्रिस्टलीयता बढ़ते हैं, अतः पदार्थ PHB से अधिक कठोर व भंगुर हो जाता है, क्योंकि वैलरेट इकाइयाँ क्रिस्टल में अधिक कसकर संकुलित होती हैं
    2. एस्टर बंध हट जाते हैं, अतः कोपॉलीमर पर जीवाणु डिपॉलिमरेज़ का प्रभाव नहीं रहता
    3. अतिरिक्त एथिल पार्श्व समूह क्रिस्टल-संकुलन बिगाड़ते हैं, अतः Tm व क्रिस्टलीयता घटते हैं और बहुलक दृढ़तर व गलित-संसाधन में सरल हो जाता है
    4. कोपॉलीमर ऊष्मदृढ़ बन जाता है क्योंकि वैलरेट इकाइयाँ दूसरा अभिक्रियाशील समूह रखती हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — अतिरिक्त एथिल पार्श्व समूह क्रिस्टल-संकुलन बिगाड़ते हैं, अतः Tm व क्रिस्टलीयता घटते हैं और बहुलक दृढ़तर व गलित-संसाधन में सरल हो जाता है

    वैलरेट इकाई ब्यूटिरेट के मेथिल के स्थान पर एथिल पार्श्व समूह रखती है। यह अनियमितता संकुलन को बाधित करती है, क्रिस्टलीयता व Tm घटाती है और भंगुरता कम करती है। एस्टर बंध बने रहते हैं, अतः जैव-अपघटन चलता रहता है, और कुछ भी शृंखला को अनुप्रस्थ-बद्ध नहीं करता। अधिक क्रिस्टलीयता PHB समबहुलक की होती है, कोपॉलीमर की नहीं।
  8. स्टार्च में ऐमाइलोपेक्टिन के शाखन-बिंदु कौन-सा बंध बनाता है?

    1. ऐनहाइड्रोग्लूकोज़ इकाइयों के बीच β-1,4 ग्लाइकोसिडिक बंध, जैसा सेलुलोज़ में
    2. α-1,4-बद्ध मुख्य शृंखलाओं से निकलने वाले α-1,6 ग्लाइकोसिडिक बंध
    3. ग्लूकोज़ व वसा-अम्लों के बीच एस्टर बंध
    4. पड़ोसी शृंखलाओं के बीच डाइसल्फ़ाइड सेतु
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — α-1,4-बद्ध मुख्य शृंखलाओं से निकलने वाले α-1,6 ग्लाइकोसिडिक बंध

    ऐमाइलोज़ तथा ऐमाइलोपेक्टिन की मुख्य शृंखलाएँ दोनों α-1,4 बद्ध हैं; ऐमाइलोपेक्टिन में लगभग प्रत्येक 20 इकाइयों पर α-1,6 बंध होते हैं जो शाखाएँ आरंभ करते हैं। β-1,4 बंध सेलुलोज़ का है, और स्टार्च में न वसा-अम्ल एस्टर हैं न डाइसल्फ़ाइड सेतु।
  9. सेलुलोज़ को पॉलीएथिलीन की तरह गलित-संसाधित क्यों नहीं किया जा सकता, और इसके स्थान पर इसे कैसे आकार दिया जाता है?

    1. इसका मोलर द्रव्यमान गलित बनाने हेतु बहुत कम है, इसलिए रबर की तरह सल्फ़र से अनुप्रस्थ-बंधन के बाद ही आकार दिया जाता है
    2. इसमें हाइड्रॉक्सिल समूह नहीं हैं, इसलिए इसे घोला नहीं जा सकता और केवल यांत्रिक रूप से काटा जा सकता है
    3. इसके –OH समूहों का हाइड्रोजन बंधन इसे पिघलने से पहले अपघटित कर देता है, इसलिए इसे व्युत्पन्न के रूप में या पुनर्जनन के बाद आकार दिया जाता है
    4. यह 60 °C पर पिघलता है पर गलित अस्थिर है, इसलिए उससे नीचे संपीडन द्वारा आकार दिया जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — इसके –OH समूहों का हाइड्रोजन बंधन इसे पिघलने से पहले अपघटित कर देता है, इसलिए इसे व्युत्पन्न के रूप में या पुनर्जनन के बाद आकार दिया जाता है

    प्रत्येक ऐनहाइड्रोग्लूकोज़ इकाई में तीन –OH समूह हैं जो दृढ़, क्रिस्टलीय शृंखला में प्रबल हाइड्रोजन बंध बनाते हैं, अतः अपघटन ताप किसी भी गलनांक से नीचे है। सेलुलोज़ ऐसीटेट ऊष्मसुघट्य व विलेय है, और विस्कोस या लायोसेल विलयन से सेलुलोज़ पुनर्जनित करते हैं। सेलुलोज़ की DP बहुत उच्च है, हाइड्रॉक्सिल समूह अनेक हैं, और 60 °C का कोई गलनांक नहीं है।
  10. कृत्रिम रबरों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. पॉलीक्लोरोप्रीन में क्लोरीन द्विबंध पर होती है, जो ज्वाला, तेल, मौसम व ओज़ोन प्रतिरोध देती है
    2. EPDM सल्फ़र-क्योर योग्य है क्योंकि तृतीय एकलक डाईन पार्श्व C=C छोड़ता है जबकि मेरुदंड संतृप्त रहता है
    3. पॉलीब्यूटाडाईन का Tg सामान्य डाईन रबरों में सर्वाधिक है, इसलिए वह सबसे कम प्रत्यास्थ है
    4. SBR, NR की तरह खिंचाव-क्रिस्टलित होता है, इसलिए अभरित SBR उतना ही सुदृढ़ है जितना अभरित NR
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पॉलीक्लोरोप्रीन में क्लोरीन द्विबंध पर होती है, जो ज्वाला, तेल, मौसम व ओज़ोन प्रतिरोध देती है; B — EPDM सल्फ़र-क्योर योग्य है क्योंकि तृतीय एकलक डाईन पार्श्व C=C छोड़ता है जबकि मेरुदंड संतृप्त रहता है

    पॉलीक्लोरोप्रीन व EPDM वाले कथन मानक हैं। पॉलीब्यूटाडाईन का Tg समूह में न्यूनतम (लगभग −100 °C) और प्रत्यास्थता सर्वाधिक है, और SBR अनियमित होने से खिंचाव-क्रिस्टलित नहीं होता, अतः अभरित SBR दुर्बल है और प्रबलक भराव चाहिए।
  11. सिलिकोन रबर व CSM के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. सिलिकोन रबर का Tg लगभग −125 °C है क्योंकि उसका Si–O मेरुदंड अत्यंत लचीला है, अतः वह 0 °C से बहुत नीचे भी प्रत्यास्थ रहता है
    2. CSM क्लोरोप्रीन को सल्फ़र डाइऑक्साइड के साथ सहबहुलकित कर बनाया जाता है
    3. भराव-रहित सिलिकोन गम दुर्बल है, इसलिए उसे प्रबलित करने हेतु धूमित सिलिका मिलाई जाती है
    4. CSM का मेरुदंड संतृप्त कार्बन है, इसलिए वह ओज़ोन व मौसम का अच्छा प्रतिरोध करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — सिलिकोन रबर का Tg लगभग −125 °C है क्योंकि उसका Si–O मेरुदंड अत्यंत लचीला है, अतः वह 0 °C से बहुत नीचे भी प्रत्यास्थ रहता है; C — भराव-रहित सिलिकोन गम दुर्बल है, इसलिए उसे प्रबलित करने हेतु धूमित सिलिका मिलाई जाती है; D — CSM का मेरुदंड संतृप्त कार्बन है, इसलिए वह ओज़ोन व मौसम का अच्छा प्रतिरोध करता है

    सिलिकोन बहुत निम्न ताप तक लचीला है और सामर्थ्य हेतु सिलिका चाहता है, तथा CSM संतृप्त मेरुदंड के कारण ओज़ोन सह लेता है। CSM विलयन में पॉलीएथिलीन को Cl₂ व SO₂ से क्लोरोसल्फ़ोनित कर बनता है, क्लोरोप्रीन के सहबहुलकन से नहीं।
  12. बहुलकों के जैव-अपघटन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. एंज़ाइम व जल पहले अक्रिस्टलीय क्षेत्रों में पहुँचते हैं, अतः उसी पॉलीएस्टर का अधिक क्रिस्टलीय ग्रेड धीमे अपघटित होता है
    2. बड़े पृष्ठ-आयतन अनुपात वाली पतली फ़िल्म उसी बहुलक की मोटी ढलाई से शीघ्र अपघटित होती है
    3. PBAT जैव-अपघटनीय नहीं हो सकता क्योंकि वह जीवाश्म कच्चे माल से बनता है
    4. बायोमास से बना कोई भी बहुलक, मेरुदंड व माध्यम चाहे जो हो, जैव-अपघटनीय होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — एंज़ाइम व जल पहले अक्रिस्टलीय क्षेत्रों में पहुँचते हैं, अतः उसी पॉलीएस्टर का अधिक क्रिस्टलीय ग्रेड धीमे अपघटित होता है; B — बड़े पृष्ठ-आयतन अनुपात वाली पतली फ़िल्म उसी बहुलक की मोटी ढलाई से शीघ्र अपघटित होती है

    जैव-अपघटन पृष्ठ-अपक्षरण है जो अक्रिस्टलीय क्षेत्रों से आरंभ होता है, अतः क्रिस्टलीयता इसे धीमा और बड़ा पृष्ठ क्षेत्रफल तेज़ करता है। जैव-अपघटनीयता रासायनिक बंधों व माध्यम पर निर्भर है, कच्चे माल के उद्गम पर नहीं: PBAT जीवाश्म-आधारित होकर भी खाद-योग्य है, और जैव-पॉलीएथिलीन जैव-आधारित होकर भी जैव-अपघटनीय नहीं।
  13. पॉलीक्लोरोप्रीन की दोहराव इकाई C₄H₅Cl है। C = 12.011, H = 1.008 तथा Cl = 35.45 g/mol लें। बहुलक में क्लोरीन की मात्रा द्रव्यमान प्रतिशत में कितनी है? उत्तर निकटतम पूर्ण संख्या में दें।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 40

    दोहराव इकाई का द्रव्यमान = 4(12.011) + 5(1.008) + 35.45 = 48.044 + 5.040 + 35.45 = 88.534 g/mol। Cl अंश = 35.45/88.534 = 0.4004, अर्थात् 40 द्रव्यमान प्रतिशत।
  14. पॉली(लैक्टिक अम्ल) लैक्टिक अम्ल, C₃H₆O₃ (M = 90.08 g/mol), के सीधे गलित बहुसंघनन से बनता है, जिसमें प्रत्येक बने एस्टर बंध पर एक जल अणु निकलता है। लंबी शृंखला की दोहराव इकाई C₃H₄O₂ (M = 72.06 g/mol) है। पूर्ण परिवर्तन पर 100 kg लैक्टिक अम्ल से कितने किलोग्राम PLA मिलता है? उत्तर निकटतम पूर्ण संख्या में दें।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 80

    प्रति मोल खपत लैक्टिक अम्ल से बहुलक का द्रव्यमान = 72.06 g (90.08 − 18.02)। PLA = 100 × 72.06/90.08 = 80.0 kg; शेष 20.0 kg जल है।
  15. एक नाइट्राइल रबर 30 mol % ऐक्रिलोनाइट्राइल (C₃H₃N, M = 53.06 g/mol) तथा 70 mol % ब्यूटाडाईन (C₄H₆, M = 54.09 g/mol) का यादृच्छिक कोपॉलीमर है। ऐक्रिलोनाइट्राइल की मात्रा द्रव्यमान प्रतिशत में कितनी है? उत्तर एक दशमलव स्थान तक दें।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 29.6

    100 mol इकाइयाँ लें: ऐक्रिलोनाइट्राइल = 30 × 53.06 = 1591.8 g, ब्यूटाडाईन = 70 × 54.09 = 3786.3 g। ऐक्रिलोनाइट्राइल द्रव्यमान % = 1591.8/(1591.8 + 3786.3) × 100 = 1591.8/5378.1 × 100 = 29.6।
  16. एक PHBV कोपॉलीमर में 80 mol % 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटिरेट इकाइयाँ (C₄H₆O₂, M = 86.09 g/mol) तथा 20 mol % 3-हाइड्रॉक्सीवैलरेट इकाइयाँ (C₅H₈O₂, M = 100.12 g/mol) हैं। बहुलक में वैलरेट इकाइयों का द्रव्यमान प्रतिशत कितना है? उत्तर एक दशमलव स्थान तक दें।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 22.5

    प्रति 100 mol इकाइयाँ: ब्यूटिरेट = 80 × 86.09 = 6887.2 g, वैलरेट = 20 × 100.12 = 2002.4 g, कुल 8889.6 g। वैलरेट द्रव्यमान % = 2002.4/8889.6 × 100 = 22.5। द्रव्यमान प्रतिशत मोल प्रतिशत से अधिक है क्योंकि वैलरेट इकाई भारी है।