संसाधन भूविज्ञान: अयस्क व उनकी उत्पत्ति, तरल अंतर्विष्ट, कोयला व पेट्रोलियम, समुद्री संसाधन, अन्वेषण व भंडार-आकलन तथा भारतीय संसाधन

यह अध्याय भूविज्ञान एवं भूभौतिकी (GG) पेपर के भाग B1 के शीर्षक “Resource Geology” (संसाधन भूविज्ञान) का उत्तर देता है: “अयस्क-खनिज विज्ञान; अयस्क-निर्माण प्रक्रियाएँ - मैग्मीय, जलतापीय, अवसादी, सुपरजीन व कायांतरण-जनित अयस्क; अयस्क-उत्पत्ति में तरल अंतर्विष्ट; कोयला व पेट्रोलियम भूविज्ञान; समुद्री खनिज संसाधन; आर्थिक खनिज निक्षेपों का अन्वेषण - प्रतिचयन, अयस्क-भंडार आकलन, भू-सांख्यिकी व खनन विधियाँ; भारत में सामरिक, आवश्यक व क्रांतिक खनिजों तथा जीवाश्म ईंधन निक्षेपों का वितरण।” यह अयस्क खनिज व उनकी धातु-मात्रा, पाँच अयस्क-निर्माण प्रक्रियाएँ, तरल-अंतर्विष्ट माइक्रोथर्मोमेट्री, कोयला व पेट्रोलियम, समुद्री संसाधन, अन्वेषण व भंडार-आकलन, भू-सांख्यिकी तथा भारतीय वितरण पढ़ाता है। संख्यात्मक प्रश्न हैं: टनभार व धातु-मात्रा, कट-ऑफ ग्रेड, क्रिगिंग, अंतर्विष्ट-लवणता और कोयले का ईंधन अनुपात।

1. अयस्क खनिज-विज्ञान

अयस्क (ore) वह शैल है जिसका खनन लाभ पर हो सके; उसके मूल्यवान अयस्क खनिज क्वार्ट्ज़ व कैल्साइट जैसे निरर्थक गैंग (gangue) के साथ मिलते हैं। खनिज में धातु की मात्रा उसके सूत्र से मिलती है: धातु % = (परमाणु द्रव्यमान × परमाणु संख्या) ÷ सूत्र द्रव्यमान × 100। चैल्कोपाइराइट CuFeS₂ (सूत्र द्रव्यमान 183.5) में 63.5 / 183.5 = 34.6% Cu और गैलेना PbS में 207.2 / 239.3 = 86.6% Pb होता है। किसी निक्षेप का सांद्रण गुणांक उसके ग्रेड को उस धातु की औसत भू-पर्पटीय प्रचुरता से भाग देने पर मिलता है।

सामान्य अयस्क खनिज व उनमें धातु-मात्रा
धातुप्रमुख अयस्क खनिजशुद्ध खनिज में धातु (लगभग)
लोहामैग्नेटाइट Fe₃O₄, हेमेटाइट Fe₂O₃72% व 70%
ताँबाचैल्कोपाइराइट CuFeS₂, बोर्नाइट Cu₅FeS₄, चैल्कोसाइट Cu₂S35%, 63% व 80%
सीसा व जस्तागैलेना PbS, स्फ़ैलेराइट ZnS87% व 67%
टिनकैसिटेराइट SnO₂79%
मैंगनीज़पाइरोलुसाइट MnO₂63%
क्रोमियमक्रोमाइट FeCr₂O₄46% Cr (68% Cr₂O₃)
ऐलुमिनियमगिब्साइट, बोहमाइट व डायस्पोर (बॉक्साइट के खनिज)अयस्क का ग्रेड % Al₂O₃ में

अयस्क खनिज पॉलिश की गई काट में परावर्तित प्रकाश के अंतर्गत परावर्तनशीलता व वर्ण (गैलेना श्वेत, पाइराइट हल्का पीला, चैल्कोपाइराइट गाढ़ा पीतल-पीला, बोर्नाइट गुलाबी-भूरा), समदैशिकता या विषमदैशिकता (घनीय गैलेना, पाइराइट व मैग्नेटाइट क्रॉस्ड पोलर के बीच मंच घुमाने पर काले रहते हैं, हेमेटाइट नहीं) तथा कठोरता व विदलन (गैलेना में त्रिकोणीय विदलन-गर्त दिखते हैं) से पहचाने जाते हैं। गठन (textures) इतिहास दर्ज करते हैं: विमिश्रण (स्फ़ैलेराइट में चैल्कोपाइराइट बिंदु, पायरहोटाइट में पेंटलैंडाइट की लपटें), प्रतिस्थापन, कोलोफ़ॉर्म पट्टन और कटते हुए शिराकण। पैराजेनेटिक अनुक्रम (paragenetic sequence), यानी खनिज-निक्षेपण का क्रम, इन्हीं कर्तन व प्रतिस्थापन संबंधों से पढ़ा जाता है।

2. अयस्क-निर्माण प्रक्रियाएँ

अयस्क-निर्माण प्रक्रियाएँ एक नज़र में
प्रक्रियाधातु कैसे सांद्रित होती हैउदाहरण
मैग्मीयआरंभिक क्रिस्टलन व अवसादन (क्रोमाइट, मैग्नेटाइट परतें); सिलिकेट मैग्मा से सल्फ़ाइड गलित का अमिश्रण (Ni–Cu–PGE सल्फ़ाइड); अवशिष्ट गलित (पेग्मेटाइट, कार्बोनेटाइट); किम्बरलाइट हीरा लाता हैअतिमैफ़िक शैल में क्रोमाइट; Ni–Cu सल्फ़ाइड; हीरा-पाइप
जलतापीयतप्त जलीय तरल धातुओं को क्लोराइड या बाइसल्फ़ाइड संकुलों के रूप में ले जाते हैं और ठंडा होने, उबलने, मिश्रण या भित्ति-शैल से अभिक्रिया पर निक्षेपित करते हैंपॉर्फ़िरी Cu–Mo, स्कार्न, एपिथर्मल Au–Ag, लोड स्वर्ण, ज्वालामुखी-जनित विशाल सल्फ़ाइड, मिसीसिपी घाटी-प्रकार Pb–Zn
अवसादीरासायनिक अवक्षेपण (पट्टित लौह-संरचना, अवसादी मैंगनीज़, फ़ॉस्फ़ोराइट, वाष्पित) तथा भारी खनिजों का यांत्रिक छँटाव (प्लेसर)प्रीकैम्ब्रियन लौह-संरचनाएँ, समुद्र-तट बालू प्लेसर, विटवॉटर्सरैंड प्राचीन प्लेसर
सुपरजीनअपक्षय: अवशिष्ट संवर्धन (बॉक्साइट, निकल लैटेराइट) तथा ऊपर से निक्षालित ताँबे द्वारा जल-स्तर के नीचे सल्फ़ाइडों का संवर्धनबॉक्साइट; गॉसन के नीचे चैल्कोसाइट चादर
कायांतरण-जनितकायांतरण औद्योगिक खनिज बनाता है और पुराने अयस्क को वलन-कीलों व अपरूपण-क्षेत्रों में पुनर्गतिशील करता है; कायांतरित तरल लोड स्वर्ण जमा करते हैंग्रेफ़ाइट, काइनाइट–सिलिमेनाइट, गार्नेट; पुनर्गतिशील सल्फ़ाइड

जलतापीय निक्षेपण के चार प्रेरक हैं: ताप में गिरावट; उबलना, जो H₂S व CO₂ को वाष्प-प्रावस्था में खींच लेता है; ठंडे या ऑक्सीकृत जल से मिश्रण; तथा भित्ति-शैल से अभिक्रिया (उदासीनीकरण, लौह-युक्त खनिजों का सल्फ़ाइडीकरण)। पॉर्फ़िरी तंत्र में रूपांतरण-मंडल अंतर्वेधी से बाहर की ओर पोटैसिक, फ़ाइलिक (क्वार्ट्ज़–सेरिसाइट–पाइराइट), आर्जिलिक व प्रोपिलिटिक क्रम में चलते हैं, और ताँबा भीतरी पोटैसिक–फ़ाइलिक मंडलों में सांद्रित होता है।

⚠️ सुपरजीन चादर कहाँ स्थित होती है
जल-स्तर के ऊपर सल्फ़ाइड ऑक्सीकृत होते हैं, जिससे निक्षालित, लौह-ऑक्साइड-समृद्ध गॉसन बचता है, जो नीचे के अयस्क का सूचक है। घुला ताँबा नीचे जाकर जल-स्तर के नीचे द्वितीयक चैल्कोसाइट व कोवेलाइट के रूप में पुनः निक्षेपित होता है, अतः संवर्धित चादर निक्षालित टोपी के नीचे होती है, उसमें नहीं।

3. अयस्क-उत्पत्ति में तरल अंतर्विष्ट

तरल अंतर्विष्ट (fluid inclusion) किसी क्रिस्टल में फँसी अयस्क-तरल की बूँद है। प्राथमिक अंतर्विष्ट वृद्धि-मंडलों के साथ, द्वितीयक वृद्धि के बाद भरे दरारों के साथ और छद्म-द्वितीयक वृद्धि के दौरान भरे दरारों के साथ बनते हैं; केवल प्राथमिक व छद्म-द्वितीयक अंतर्विष्ट अयस्क-तरल का काल बताते हैं। कक्ष-ताप पर अंतर्विष्ट में तरल, वाष्प-बुलबुला और कभी हैलाइट डॉटर क्रिस्टल (लवणता लगभग 26 wt% NaCl से अधिक) या तरल CO₂ दिखता है।

तापन से समांगीकरण ताप Th मिलता है (बुलबुला लुप्त होता है), जो न्यूनतम फँसाव-ताप है और जब तक तरल उबल न रहा हो, दाब-संशोधन माँगता है। हिमीकरण से प्रथम-गलन ताप (H₂O–NaCl हेतु लगभग −21 °C, जो लवण-तंत्र पहचानता है) और अंतिम हिम-गलन ताप Tm मिलते हैं। θ = −Tm (°C में) लेने पर wt% NaCl समतुल्य में लवणता S = 1.78θ − 0.0442θ² + 0.000557θ³ है (बोडनार, यूटैक्टिक θ = 21.2 °C, S = 23.2 तक मान्य)। उदाहरण: Tm = −5.0 °C से S = 8.90 − 1.11 + 0.07 = 7.86 wt%।

  • पॉर्फ़िरी Cu–Mo: लगभग 300 से 600 °C, वाष्प-समृद्ध अंतर्विष्टों के पास दसियों wt% NaCl समतुल्य के लवणजल (उबलना)।
  • ओरोजेनिक (लोड) स्वर्ण: लगभग 250 से 400 °C, निम्न लवणता (कुछ wt% NaCl समतुल्य), H₂O–CO₂ तरल।
  • एपिथर्मल Au–Ag: लगभग 150 से 300 °C, निम्न लवणता, प्रायः उबलना।
  • मिसीसिपी घाटी-प्रकार Pb–Zn: लगभग 80 से 200 °C, लवणीय बेसिनी लवणजल।
⚠️ Th फ़र्श है, फँसाव-ताप नहीं
दाब में फँसा तरल एकल प्रावस्था होता है; स्थिर आयतन पर ठंडा होने पर वह तरल व वाष्प में अलग हो जाता है, अतः Th फँसाव का न्यूनतम ताप है। सहवर्ती वाष्प-समृद्ध व लवणजल अंतर्विष्ट, जो एक ही ताप पर भिन्न प्रावस्थाओं में समांगीकृत हों, दर्शाते हैं कि तरल उबल रहा था, और तब Th स्वयं फँसाव-ताप है।

4. कोयला भूविज्ञान

कोयला जल-भरे पीट में संरक्षित पादप-मलबे से बनता है और फिर दबाव से कोयलीकृत (coalified) होता है: रैंक केवल समय से नहीं, ताप से बढ़ता है, पीट, लिग्नाइट, उप-बिटुमिनस, बिटुमिनस और ऐंथ्रासाइट के क्रम में, जब कार्बन बढ़ता है और नमी व वाष्पशील पदार्थ घटते हैं। मैसरल (macerals) सूक्ष्म घटक हैं: विट्रिनाइट (काष्ठीय ऊतक), लिप्टिनाइट (बीजाणु, राल, क्यूटिकल, शैवाल; हाइड्रोजन-समृद्ध) तथा इनर्टिनाइट (जला या ऑक्सीकृत पदार्थ)। लिथोटाइप दृश्य पट्टियाँ हैं: विट्रेन, क्लैरेन, ड्यूरेन व फ़्यूसेन। विट्रिनाइट परावर्तनशीलता R₀ रैंक के साथ बढ़ती है और ऊष्मीय परिपक्वता मापती है।

सन्निकट विश्लेषण (proximate analysis) नमी M, वाष्पशील पदार्थ VM, राख A और स्थिर कार्बन FC प्रतिशत में देता है, जहाँ प्राप्त-अवस्था आधार पर FC = 100 − (M + VM + A); अंतिम विश्लेषण (ultimate analysis) C, H, N, S व O देता है। ईंधन अनुपात FC / VM है। उदाहरण: M = 8%, VM = 28% व A = 24% से FC = 100 − 60 = 40% और ईंधन अनुपात 40 / 28 = 1.43 आता है। कोकिंग कोयले को निम्न राख व सल्फ़र तथा अच्छा संसंजन-व्यवहार चाहिए।

⚠️ रैंक ग्रेड नहीं है, और आधार एक-सा होना चाहिए
रैंक कोयलीकरण की मात्रा है (कार्बन, ऊष्मीय मान); ग्रेड खनिज-पदार्थ की मात्रा है, जो राख से मापी जाती है। सन्निकट परिणाम प्राप्त-अवस्था, वायु-शुष्क या शुष्क-राखरहित आधार पर दिए जा सकते हैं, और FC = 100 − (M + VM + A) तभी चलता है जब चारों संख्याएँ एक ही आधार पर हों।

5. पेट्रोलियम भूविज्ञान

पेट्रोलियम तंत्र (petroleum system) को स्रोत शैल, भंडार, सील, ट्रैप और सही समय चाहिए, यानी तेल के प्रवास से पहले ट्रैप का अस्तित्व में होना। स्रोत शैल महीन-कणीय व कार्बनिक-समृद्ध होते हैं (TOC लगभग 0.5 wt% या अधिक)। केरोजन-प्रकार उत्पाद तय करता है: प्रकार I (शैवालीय, झीलीय; हाइड्रोजन-समृद्ध, तेल), प्रकार II (समुद्री; तेल व गैस) तथा प्रकार III (स्थलीय पादप; निम्न H/C, मुख्यतः गैस)। दबाव-तापन डायाजेनेसिस (जैविक मीथेन), कैटाजेनेसिस (तेल-विंडो, लगभग 60 से 120 °C या विट्रिनाइट परावर्तनशीलता लगभग 0.6 से 1.3%, आधार पर आर्द्र गैस) और मेटाजेनेसिस (शुष्क गैस) से गुज़रता है।

भंडार सरंध्र, पारगम्य बलुआ पत्थर व कार्बोनेट हैं; सील शेल या वाष्पित हैं; ट्रैप संरचनात्मक (अपनति, भ्रंश), स्तरिकीय (पिंच-आउट, असंगति, भित्ति) या संयुक्त हैं। तेल प्राथमिक प्रवास से स्रोत शैल छोड़ता है और द्वितीयक प्रवास से वाहक परतों में ऊपर जल पर तैरता हुआ तब तक बढ़ता है जब तक सील उसे रोक न दे; भरे ट्रैप में गैस तेल के ऊपर और तेल जल के ऊपर होता है। अपारंपरिक संसाधनों में कोयला-शैया मीथेन, शेल गैस व गैस हाइड्रेट आते हैं। सतही ताप 25 °C व प्रवणता 30 °C/km हो तो तेल-विंडो (60 से 120 °C) (60 − 25) / 30 = 1.2 km से (120 − 25) / 30 = 3.2 km के बीच होती है।

⚠️ समय ज्यामिति पर भारी है
अच्छे भंडार वाला बड़ा, सीलबंद अपनति, परिपक्व स्रोत-क्षेत्र के बगल में, तब भी रिक्त हो सकता है यदि वह तेल के निष्कासन व अन्यत्र प्रवास के बाद बना हो। ट्रैप-निर्माण की आयु की तुलना सदैव निष्कासन की आयु से करें।

6. समुद्री खनिज संसाधन

समुद्री संसाधन किसी देश के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) (200 समुद्री मील तक) के भीतर या राष्ट्रीय अधिकार-सीमा से परे के अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में होते हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल प्राधिकरण नियंत्रित करता है। मुख्य प्रकार ये हैं।

  • बहुधात्विक पिंड (polymetallic nodules): अतल मैदानों पर Ni, Cu व Co वाले Mn–Fe ऑक्साइड संग्रंथन; वे बहुत धीमे, मिलीमीटर प्रति मिलियन वर्ष की दर से, बढ़ते हैं। भारत के पास मध्य हिंद महासागर बेसिन में इनके लिए अन्वेषण अनुबंध है।
  • कोबाल्ट-समृद्ध फ़ेरोमैंगनीज़ पर्पटियाँ समुद्री पर्वतों को ढकती हैं, और समुद्र-तलीय विशाल सल्फ़ाइड प्रसारी कटकों व पश्च-चाप बेसिनों के जलतापीय छिद्रों पर बनते हैं।
  • तटीय निक्षेप: इल्मेनाइट, रूटाइल, ज़िरकॉन, मोनाज़ाइट व गार्नेट के प्लेसर, शेल्फ़ फ़ॉस्फ़ोराइट, तथा रेत, बजरी व चूना-पंक।
  • महाद्वीपीय-किनारे के अवसाद में गैस हाइड्रेट संभावित ईंधन हैं।

7. अन्वेषण, प्रतिचयन, भंडार-आकलन, भू-सांख्यिकी व खनन

अन्वेषण खोज को चरणों में संकुचित करता है: प्रादेशिक सर्वेक्षण (भूवैज्ञानिक मानचित्रण, धारा-अवसाद भू-रसायन, सुदूर संवेदन, वायुवाहित भूभौतिकी), लक्ष्य-परीक्षण (मृदा भू-रसायन, भूमि भूभौतिकी, खाई-खुदाई) और फिर निक्षेप की रूपरेखा हेतु ड्रिलिंग (डायमंड कोर, रिवर्स सर्कुलेशन)। प्रतिचयन अनभिनत होना चाहिए: सतह के आर-पार चैनल या चिप नमूने, विभाजित ड्रिल कोर, अनियमित अयस्क हेतु बल्क नमूने। सुरक्षित नमूना-भार सबसे बड़े कण के आमाप के वर्ग के साथ बढ़ता है (रिचर्ड्स–चेचॉट, Q = kd²), और स्वर्ण जैसे उच्च-नगेट अयस्क को बड़े या अधिक नमूने चाहिए।

संसाधन वे घटनाएँ हैं जिनके आर्थिक निष्कर्षण की तर्कसंगत संभावना हो, जिन्हें अनुमानित, संकेतित व मापित श्रेणी दी जाती है; आरक्षित भंडार (reserves) आर्थिक रूप से खनन-योग्य भाग हैं, जिन्हें संभावित व सिद्ध श्रेणी दी जाती है। टनभार = आयतन × स्थूल घनत्व, जहाँ टनभार गुणांक 1 / घनत्व m³ प्रति टन में है, और धातु-मात्रा = टनभार × ग्रेड। कई प्रतिच्छेदों पर ग्रेड भारित होता है, साधारण माध्य नहीं: 4% पर 2 m, 1% पर 6 m और 3% पर 2 m से (8 + 6 + 6) / 10 = 2.0% मिलता है। उदाहरण: 200 m × 50 m × 20 m = 200,000 m³, 3.2 t/m³ पर 640,000 t है, जिसमें 2.5% Cu पर 16,000 t Cu है। विधियाँ हैं: अनुप्रस्थ-काट, बहुभुज, त्रिभुज, व्युत्क्रम-दूरी भारण और क्रिगिंग।

कट-ऑफ ग्रेड (cut-off grade) वह ग्रेड है जिससे नीचे पदार्थ अपने खनन व प्रसंस्करण का व्यय नहीं चुकाता: कट-ऑफ = प्रति टन व्यय ÷ (धातु की प्रति इकाई कीमत × पुनर्प्राप्ति)। इसे बढ़ाने से टनभार घटता और औसत ग्रेड बढ़ता है (ग्रेड–टनभार वक्र)। उदाहरण: $48 प्रति टन, $60 प्रति ग्राम व 80% पुनर्प्राप्ति से 48 / (60 × 0.8) = 1.0 g/t। खुली खदान में स्ट्रिपिंग अनुपात अपशिष्ट ÷ अयस्क है, और खदान तब तक गहरी होती है जब तक वह उस सम-विच्छेद अनुपात तक न पहुँचे जिस पर एक टन अयस्क अपने अपशिष्ट हटाने का व्यय बस चुकाता है। भूमिगत विधियाँ गहरे, तीव्र ढाल या संकरे पिंडों के लिए हैं: रूम-एंड-पिलर, कट-एंड-फ़िल, श्रिंकेज व सबलेवल स्टोपिंग, ब्लॉक केविंग, और कोयले हेतु लॉन्गवॉल।

भू-सांख्यिकी (geostatistics) ग्रेड को क्षेत्रीकृत चर मानती है जो पृथक्करण h बढ़ने पर कम सदृश होता जाता है। प्रायोगिक सेमीवैरियोग्राम γ(h) = [1 / 2N(h)] Σ [z(xᵢ) − z(xᵢ + h)]² है। यह नगेट (निकट-शून्य अंतराल पर प्रसरण: मापन-त्रुटि व सूक्ष्म-पैमाने का विचलन) से सिल (कुल प्रसरण) तक परास (range) पर चढ़ता है, जिसके आगे नमूने असहसंबद्ध होते हैं। सामान्य क्रिगिंग किसी बिंदु या ब्लॉक का आकलन निकटवर्ती नमूनों के भारित योग के रूप में करती है जिनके भार का योग 1 होता है और जो आकलन-प्रसरण न्यूनतम करते हैं, जिसे वह बताती भी है। उदाहरण: 1 m अंतराल पर ग्रेड 2, 4, 3, 5, 6 से 1 m लैग पर वर्ग-अंतर 4, 1, 4, 1 आते हैं, अतः γ(1) = 10 / (2 × 4) = 1.25। 0 m व 10 m के नमूनों, नगेट-रहित रैखिक वैरियोग्राम और 2.5 m के आकलन हेतु क्रिगिंग भार 0.75 व 0.25 हैं।

8. भारत के सामरिक, आवश्यक व क्रांतिक खनिज तथा ईंधन

सामरिक खनिज रक्षा व नाभिकीय सुरक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण हैं (यूरेनियम, थोरियम, बेरिलियम, दुर्लभ मृदा); आवश्यक खनिज वे हैं जो उद्योग को थोक में चाहिए (लौह अयस्क, कोयला, चूना-पत्थर); क्रांतिक खनिज उच्च आर्थिक महत्त्व को आपूर्ति-जोखिम के साथ जोड़ते हैं (लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफ़ाइट, दुर्लभ मृदा तत्त्व आधिकारिक सूची में हैं)। ये लेबल उपयोग व आपूर्ति बताते हैं, भूविज्ञान नहीं, और एक खनिज पर कई लग सकते हैं। तालिका केवल सुविदित अवस्थितियाँ देती है।

सुविदित भारतीय अवस्थितियाँ
संसाधनमुख्य अवस्थितियाँ
लौह अयस्क (हेमेटाइट, मैग्नेटाइट)ओडिशा–झारखंड, छत्तीसगढ़ (बैलाडीला), कर्नाटक, गोवा की पट्टित लौह-संरचनाएँ
मैंगनीज़ओडिशा; मध्य प्रदेश–महाराष्ट्र (बालाघाट–नागपुर पट्टी); कर्नाटक
क्रोमाइटसुकिंदा अतिमैफ़िक पट्टी, ओडिशा, जिसमें भारतीय संसाधनों का बड़ा भाग है
बॉक्साइटओडिशा (सबसे बड़ा), गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़
ताँबाखेतड़ी (राजस्थान), मलाजखंड (मध्य प्रदेश), सिंहभूम (झारखंड)
सीसा–जस्ताराजस्थान: ज़ावर, रामपुरा आगूचा, राजपुरा–दरीबा
स्वर्णकर्नाटक (हट्टी; कोलार क्षेत्र अब बंद), आंध्र प्रदेश (रामगिरि)
यूरेनियमजादूगोड़ा (सिंहभूम, झारखंड), तुम्मलपल्ले (आंध्र प्रदेश), डोमियासियात (मेघालय)
समुद्र-तट बालू खनिज (इल्मेनाइट, रूटाइल, ज़िरकॉन, मोनाज़ाइट, गार्नेट)केरल, तमिलनाडु, ओडिशा व आंध्र प्रदेश के तट; मोनाज़ाइट थोरियम का स्रोत है
हीरापन्ना, मध्य प्रदेश
कोयलाअधिकांशतः पर्मियन गोंडवाना कोयला (दामोदर, सोन, महानदी, गोदावरी घाटियाँ), उच्च राख सहित; झरिया में प्राइम कोकिंग कोयला; असम व मेघालय में टर्शियरी कोयला; नेवेली (तमिलनाडु), राजस्थान व गुजरात में लिग्नाइट
पेट्रोलियम व गैसमुंबई अपतटीय (बॉम्बे हाई), असम (डिगबोई), खंभात (गुजरात), कृष्णा–गोदावरी, कावेरी, राजस्थान (बाड़मेर)

मुख्य बिंदु

  • खनिज में धातु = (परमाणु द्रव्यमान × परमाणु) ÷ सूत्र द्रव्यमान; चैल्कोपाइराइट 35% Cu, गैलेना 87% Pb। अयस्क-सूक्ष्मदर्शिकी परावर्तनशीलता, वर्ण, समदैशिकता, कठोरता व विदलन का उपयोग करती है; विमिश्रण व प्रतिस्थापन जैसे गठन पैराजेनेटिक अनुक्रम देते हैं।
  • मैग्मीय, जलतापीय, अवसादी, सुपरजीन व कायांतरण-जनित प्रक्रियाएँ धातुओं को सांद्रित करती हैं; जलतापीय अयस्क ठंडा होने, उबलने, मिश्रण या भित्ति-शैल अभिक्रिया से जमता है। सुपरजीन चादर जल-स्तर के नीचे, निक्षालित गॉसन के नीचे होती है।
  • जब तक तरल उबला न हो, Th न्यूनतम फँसाव-ताप है। अंतिम हिम-गलन से लवणता: S = 1.78θ − 0.0442θ² + 0.000557θ³ wt% NaCl समतुल्य। पॉर्फ़िरी तरल तप्त लवणजल हैं, ओरोजेनिक स्वर्ण तरल निम्न-लवणता H₂O–CO₂, MVT तरल ठंडे बेसिनी लवणजल।
  • कोयले का रैंक पीट से ऐंथ्रासाइट तक बढ़ता है; FC = 100 − (M + VM + A) और ईंधन अनुपात = FC / VM। पेट्रोलियम को स्रोत, भंडार, सील, ट्रैप व समय चाहिए; प्रकार III केरोजन गैस-प्रवण है; तेल-विंडो लगभग 60 से 120 °C है। पिंड, पर्पटियाँ, सल्फ़ाइड, प्लेसर व हाइड्रेट समुद्री संसाधन हैं।
  • टनभार = आयतन × घनत्व, ग्रेड मोटाई से भारित होता है, कट-ऑफ = व्यय ÷ (कीमत × पुनर्प्राप्ति), और स्ट्रिपिंग अनुपात अपशिष्ट ÷ अयस्क है। सेमीवैरियोग्राम में नगेट, सिल व परास होते हैं; क्रिगिंग भारों का योग 1 होता है और वे आकलन-प्रसरण देते हैं।
  • भारत: सुकिंदा क्रोमाइट, ओडिशा बॉक्साइट व लौह, खेतड़ी व मलाजखंड ताँबा, राजस्थान सीसा–जस्ता, हट्टी स्वर्ण, जादूगोड़ा यूरेनियम, पन्ना हीरा, समुद्र-तट मोनाज़ाइट, गोंडवाना कोयला (झरिया कोकिंग कोयला), नेवेली लिग्नाइट तथा मुंबई अपतटीय, असम, खंभात व कृष्णा–गोदावरी हाइड्रोकार्बन।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. परमाणु द्रव्यमान Cu 63.5, Fe 55.8, S 32.1, C 12.0, O 16.0 व H 1.0 लें। निम्नलिखित में से किस अयस्क खनिज में भार के अनुसार ताँबे का प्रतिशत सर्वाधिक है?

    1. चैल्कोपाइराइट, CuFeS₂
    2. बोर्नाइट, Cu₅FeS₄
    3. चैल्कोसाइट, Cu₂S
    4. मैलाकाइट, Cu₂CO₃(OH)₂
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — चैल्कोसाइट, Cu₂S

    Cu प्रतिशत: चैल्कोपाइराइट 63.5 / 183.5 = 34.6%; बोर्नाइट 317.5 / 501.7 = 63.3%; चैल्कोसाइट 127.0 / 159.1 = 79.8%; मैलाकाइट 127.0 / 221.0 = 57.5%। चैल्कोसाइट सबसे समृद्ध ताँबा खनिज है। बोर्नाइट भ्रामक दूसरा उत्तर है क्योंकि वह ताँबा-समृद्ध है, और चैल्कोपाइराइट सबसे आम ताँबा खनिज है पर यहाँ उसमें ताँबा सबसे कम है क्योंकि उसके द्रव्यमान का अधिकांश लोहा व सल्फ़र है।
  2. परावर्तित प्रकाश में जाँची गई पॉलिश की काट में एक मृदु कण श्वेत है, क्रॉस्ड पोलर के बीच मंच घुमाने पर काला रहता है, और उसमें त्रिकोणीय गर्त दिखते हैं जहाँ पॉलिश के दौरान विदलन-खंड उखड़ गए थे। यह सबसे संभावित कौन-सा खनिज है?

    1. गैलेना, PbS, जो श्वेत, समदैशिक व मृदु है और जिसमें पूर्ण घनीय विदलन है
    2. पाइराइट, FeS₂, जो हल्का पीला, समदैशिक व अत्यंत कठोर है, विदलन-गर्त रहित
    3. चैल्कोपाइराइट, CuFeS₂, जो गाढ़ा पीतल-पीला है और घुमाने पर दुर्बल विषमदैशिक है
    4. हेमेटाइट, Fe₂O₃, जो धूसर-श्वेत व प्रबल विषमदैशिक है, लाल आंतरिक परावर्तनों सहित
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — गैलेना, PbS, जो श्वेत, समदैशिक व मृदु है और जिसमें पूर्ण घनीय विदलन है

    त्रिकोणीय विदलन-गर्त वाला श्वेत, मृदु, समदैशिक खनिज गैलेना है, जिसका पूर्ण घनीय विदलन खंड उखड़ने पर वे गर्त छोड़ता है। पाइराइट भी समदैशिक है और भ्रामक विकल्प है, पर वह हल्का पीला, अत्यंत कठोर है और उसमें विदलन-गर्त नहीं होते। चैल्कोपाइराइट गाढ़ा पीला व दुर्बल विषमदैशिक है, और हेमेटाइट लाल आंतरिक परावर्तनों सहित प्रबल विषमदैशिक है।
  3. एक ताँबा निक्षेप में द्वितीयक चैल्कोसाइट व कोवेलाइट जल-स्तर के नीचे, निक्षालित लौह-ऑक्साइड-समृद्ध टोपी के नीचे एक मंडल बनाते हैं। चैल्कोसाइट मंडल किस प्रक्रिया से बना?

    1. मैग्मीय क्रिस्टलन, जिसमें सघन सल्फ़ाइड गलित परतदार अंतर्वेधी में सिलिकेट मैग्मा से गुरुत्व के अधीन अलग होकर बैठ गया
    2. जलतापीय उबाल, जिसमें ऊपर उठता लवणजल वाष्प खोकर ठंडा होते हुए ताँबा निक्षेपित कर गया
    3. प्रादेशिक कायांतरण, जिसमें ताँबा पुराने सल्फ़ाइडों से वलन-कीलों में पुनर्गतिशील हुआ
    4. सुपरजीन संवर्धन, जिसमें ऑक्सीकृत मंडल से निक्षालित ताँबा द्वितीयक सल्फ़ाइडों के रूप में पुनः निक्षेपित हुआ
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    उत्तर: D — सुपरजीन संवर्धन, जिसमें ऑक्सीकृत मंडल से निक्षालित ताँबा द्वितीयक सल्फ़ाइडों के रूप में पुनः निक्षेपित हुआ

    जल-स्तर के नीचे व निक्षालित गॉसन के नीचे चैल्कोसाइट व कोवेलाइट सुपरजीन सल्फ़ाइड संवर्धन के हस्ताक्षर हैं: जल-स्तर के ऊपर ऑक्सीकरण से घुला ताँबा नीचे जाकर उसके नीचे प्राथमिक सल्फ़ाइडों का स्थान लेता है। मैग्मीय अवसादन, जलतापीय उबाल व कायांतरी पुनर्गतिशीलता ऐसी चादर नहीं बनाते जिसकी स्थिति जल-स्तर और ऊपर की निक्षालित टोपी से बँधी हो।
  4. एक क्वार्ट्ज़ शिरा में स्वर्ण उस समय निक्षेपित हुआ जब ऊपर उठता तरल उबला और H₂S व CO₂ वाष्प-प्रावस्था में खो बैठा। बाइसल्फ़ाइड संकुल Au(HS)₂⁻ के रूप में ले जाया जा रहा स्वर्ण उबलने से क्यों अवक्षेपित होता है?

    1. उबलने से अवशिष्ट द्रव का ताप बढ़ता है, और अधिक गर्म द्रव कम स्वर्ण घोलता है
    2. H₂S का वाष्प-प्रावस्था में चला जाना वह सल्फ़र हटा देता है जो स्वर्ण को घुला रखता है, अतः संकुल टूट जाता है
    3. उबलने से द्रव में क्लोराइड सांद्रित होता है, जो स्वर्ण को अधिक घुलनशील क्लोराइड संकुल में बदल देता है
    4. उबलना वायु से ऑक्सीजन खींचता है, जो तरल को ऑक्सीकृत करता है और स्वर्ण को अविलेय बना देता है
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    उत्तर: B — H₂S का वाष्प-प्रावस्था में चला जाना वह सल्फ़र हटा देता है जो स्वर्ण को घुला रखता है, अतः संकुल टूट जाता है

    स्वर्ण-वाहक तरलों में अधिकांश स्वर्ण Au(HS)₂⁻ के रूप में चलता है, अतः वह घुले अपचयित सल्फ़र पर निर्भर है। उबलना H₂S व CO₂ को वाष्प में विभाजित करता है, जो बाइसल्फ़ाइड संकुल को अस्थिर कर स्वर्ण निक्षेपित करता है। उबलने के साथ ऊष्मा-हानि भी होती है, अतः द्रव गर्म नहीं, ठंडा होता है, गहराई पर तरल वायुमंडलीय ऑक्सीजन नहीं लेता, और वाष्प-हानि अधिक घुलनशील क्लोराइड संकुल नहीं बनाती।
  5. क्वार्ट्ज़ में एक प्राथमिक द्वि-प्रावस्था जलीय अंतर्विष्ट 240 °C पर तरल में समांगीकृत होता है। इस ताप के बारे में कौन-सा कथन सही है?

    1. यह न्यूनतम फँसाव-ताप है; सच्चा मान दाब-संशोधन से अधिक है जब तक कि तरल उबल न रहा हो
    2. यह वह उच्चतम ताप है जो क्रिस्टल ने फँसाव के बाद प्राप्त किया, क्योंकि इस मान से नीचे बुलबुला लुप्त नहीं हो सकता
    3. यह सदैव फँसाव-ताप के बराबर होता है, क्योंकि समांगीकरण अंतर्विष्ट के शीतलन को ठीक-ठीक उलट देता है
    4. यह वह ताप है जिस पर अंतिम हिम-क्रिस्टल पिघलता है, जिससे तरल की लवणता मिलती है
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    उत्तर: A — यह न्यूनतम फँसाव-ताप है; सच्चा मान दाब-संशोधन से अधिक है जब तक कि तरल उबल न रहा हो

    दाब में फँसा तरल एकल प्रावस्था होता है, और लगभग स्थिर आयतन पर ठंडा होने पर वह तरल व वाष्प में अलग हो जाता है। तापन पर बुलबुला Th पर लुप्त होता है, जो अतः न्यूनतम फँसाव-ताप है; दाब-संशोधन उसे बढ़ाता है जब तक तरल उबल न रहा हो, तब Th ही फँसाव-ताप है। अंतिम हिम-गलन ताप, जो हिमीकरण पर मापा जाता है, लवणता देता है, और Th अधिकतम नहीं है।
  6. एक स्रोत शैल स्थलीय पादपों के काष्ठीय मलबे से समृद्ध है, जिसमें विट्रिनाइट प्रचुर है और परमाणु H/C अनुपात निम्न है। यह किस केरोजन-प्रकार और मुख्य उत्पाद का संकेत देता है?

    1. प्रकार I केरोजन, जो मुख्यतः तेल-प्रवण है, जैसा शैवालीय झील निक्षेपों में
    2. प्रकार II केरोजन, जो तेल व गैस दोनों देता है, जैसा समुद्री शेलों में
    3. प्रकार III केरोजन, जो मुख्यतः गैस-प्रवण है क्योंकि वह हाइड्रोजन-विरल है
    4. प्रकार I केरोजन, क्योंकि काष्ठीय मलबा हाइड्रोजन-समृद्ध है और मुख्यतः तेल देता है
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    उत्तर: C — प्रकार III केरोजन, जो मुख्यतः गैस-प्रवण है क्योंकि वह हाइड्रोजन-विरल है

    स्थलीय उच्च-पादप पदार्थ विट्रिनाइट-समृद्ध व हाइड्रोजन-विरल होता है, जो प्रकार III केरोजन है, और वह मुख्यतः गैस तथा कम तेल उत्पन्न करता है। प्रकार I व II शैवालीय व समुद्री कार्बनिक पदार्थ से हाइड्रोजन-समृद्ध हैं और तेल देते हैं। जो विकल्प काष्ठीय मलबे को प्रकार I का स्रोत बताता है, वह यह मानकर प्रकार I की भूल दोहराता है कि काष्ठीय ऊतक हाइड्रोजन-समृद्ध है, जो वह नहीं है।
  7. एक बड़े, सीलबंद अपनति पर, अच्छे बलुआ पत्थर भंडार सहित, खोदा गया कूप केवल जल पाता है, यद्यपि संरचना के पास परिपक्व स्रोत शैल है। दबाव-इतिहास मॉडलन दिखाता है कि अपनति तेल-निष्कासन के मुख्य चरण के समाप्त होने के बाद बना। रिक्त कूप की सर्वोत्तम व्याख्या कौन-सी है?

    1. क्षेत्र में कोई स्रोत शैल नहीं है, अतः हाइड्रोकार्बन कभी उत्पन्न ही नहीं हुए
    2. सील बुरी तरह रिसने लगी, अतः हाइड्रोकार्बन ट्रैप से निकलकर समय के साथ सतह तक पहुँच गए
    3. भंडार अत्यधिक सरंध्र है, जिससे तेल नीचे की ओर ट्रैप से बह जाता है
    4. ट्रैप बहुत देर से बना: संरचना के अस्तित्व में आने से पहले ही तेल अन्यत्र प्रवास कर चुका था
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    उत्तर: D — ट्रैप बहुत देर से बना: संरचना के अस्तित्व में आने से पहले ही तेल अन्यत्र प्रवास कर चुका था

    पेट्रोलियम तंत्र तभी काम करता है जब ट्रैप प्रवास से पहले या उसके दौरान विद्यमान हो। स्रोत शैल परिपक्व है और संरचना बड़ी व सीलबंद है, अतः सर्वोत्तम व्याख्या समय की विफलता है: तेल अपनति बनने से पहले प्रवास कर गया और उसे छोड़ गया। प्रश्न-कथन अन्य कारणों को नकारता है, क्योंकि परिपक्व स्रोत शैल उपस्थित है और संरचना सीलबंद बताई गई है, और उच्च सरंध्रता सीलबंद ट्रैप से तेल नहीं बहाती।
  8. संसाधन व उसकी भारतीय अवस्थिति का कौन-सा युग्म सही है?

    1. क्रोमाइट, जिसका खनन मुख्यतः राजस्थान की खेतड़ी पट्टी में होता है
    2. जस्ता व सीसा, जिनका खनन राजस्थान के रामपुरा आगूचा में होता है
    3. प्राइम कोकिंग कोयला, जिसका खनन मुख्यतः तमिलनाडु के नेवेली में होता है
    4. हीरा, जिसका खनन मुख्यतः छत्तीसगढ़ की बैलाडीला पर्वतमाला में होता है
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    उत्तर: B — जस्ता व सीसा, जिनका खनन राजस्थान के रामपुरा आगूचा में होता है

    राजस्थान का रामपुरा आगूचा प्रमुख जस्ता–सीसा खदान है। क्रोमाइट ओडिशा की सुकिंदा पट्टी में केंद्रित है, जबकि खेतड़ी ताँबे की पट्टी है। प्राइम कोकिंग कोयला झरिया से जुड़ा है, जबकि नेवेली लिग्नाइट क्षेत्र है। हीरा मध्य प्रदेश के पन्ना से जुड़ा है, और बैलाडीला पर्वतमाला लौह अयस्क के लिए जानी जाती है।
  9. बहुधात्विक पिंडों के बारे में कौन-सा कथन सही है?

    1. वे जलतापीय अवक्षेप हैं जो प्रसारी कटकों पर ब्लैक स्मोकर में बनते हैं
    2. वे लौह–निकल सल्फ़ाइड संग्रंथन हैं जो नदी-मुखों के निकट छिछले शेल्फ़ पंक में बनते हैं
    3. वे अतल मैदानों पर धीमे बढ़ने वाले Mn–Fe ऑक्साइड संग्रंथन हैं, जो Ni, Cu व Co में समृद्ध हैं
    4. वे केवल 200 समुद्री मील के अनन्य आर्थिक क्षेत्र के भीतर मिलते हैं और इसलिए तटीय राज्यों के हैं
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    उत्तर: C — वे अतल मैदानों पर धीमे बढ़ने वाले Mn–Fe ऑक्साइड संग्रंथन हैं, जो Ni, Cu व Co में समृद्ध हैं

    बहुधात्विक पिंड Mn–Fe ऑक्साइड संग्रंथन हैं जो अतल मैदानों पर मिलीमीटर प्रति मिलियन वर्ष की दर से बढ़ते हैं और Ni, Cu व Co वहन करते हैं। कटक-छिद्रों के जलतापीय अवक्षेप समुद्र-तलीय विशाल सल्फ़ाइड हैं, पिंड नहीं। पिंड ऑक्साइड हैं, सल्फ़ाइड नहीं, और वे गहरे समुद्र-तल पर बड़े पैमाने पर EEZ के बाहर, अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल प्राधिकरण द्वारा नियंत्रित अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में मिलते हैं।
  10. अयस्क-निर्माण प्रक्रियाओं के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. पॉर्फ़िरी तंत्र में रूपांतरण-मंडल अंतर्वेधी से बाहर की ओर पोटैसिक, फ़ाइलिक, आर्जिलिक व प्रोपिलिटिक क्रम में चलते हैं
    2. पट्टित लौह-संरचनाएँ अधिकांशतः आर्कियन से पैलियोप्रोटेरोज़ोइक के रासायनिक अवसाद हैं
    3. सुपरजीन सल्फ़ाइड संवर्धन जल-स्तर के ऊपर, ऑक्सीकृत मंडल के भीतर ही होता है
    4. इल्मेनाइट व मोनाज़ाइट के समुद्र-तट प्लेसर भारी खनिजों के यांत्रिक सांद्रण से बनते हैं
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    उत्तर: A — पॉर्फ़िरी तंत्र में रूपांतरण-मंडल अंतर्वेधी से बाहर की ओर पोटैसिक, फ़ाइलिक, आर्जिलिक व प्रोपिलिटिक क्रम में चलते हैं; B — पट्टित लौह-संरचनाएँ अधिकांशतः आर्कियन से पैलियोप्रोटेरोज़ोइक के रासायनिक अवसाद हैं; D — इल्मेनाइट व मोनाज़ाइट के समुद्र-तट प्लेसर भारी खनिजों के यांत्रिक सांद्रण से बनते हैं

    पॉर्फ़िरी रूपांतरण पोटैसिक क्रोड से बाहर फ़ाइलिक व आर्जिलिक होते हुए प्रोपिलिटिक तक मंडलित होता है। पट्टित लौह-संरचनाएँ अधिकांशतः आर्कियन से पैलियोप्रोटेरोज़ोइक के रासायनिक अवसाद हैं, और समुद्र-तट प्लेसर तरंगों व धाराओं से बने भारी-खनिज सांद्रण हैं। सुपरजीन संवर्धन जल-स्तर के नीचे होता है, क्योंकि ऊपर के ऑक्सीकृत मंडल में घुला ताँबा उसके नीचे पुनः निक्षेपित होता है, इसलिए उसे ऊपर रखने वाला कथन गलत है।
  11. तरल अंतर्विष्टों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. ठीक हुए दरारों के साथ द्वितीयक अंतर्विष्ट उस तरल को दर्ज करते हैं जो धारक क्रिस्टल की वृद्धि के समय उपस्थित था
    2. कक्ष-ताप पर अंतर्विष्ट में हैलाइट डॉटर क्रिस्टल लगभग 26 wt% NaCl से अधिक लवणता दर्शाता है
    3. अधिक ऋणात्मक अंतिम हिम-गलन ताप जलीय तरल की निम्न लवणता दर्शाता है
    4. एक साथ फँसे वाष्प-समृद्ध व लवणजल अंतर्विष्ट जो एक ही ताप पर समांगीकृत हों, उबलना दर्शाते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — कक्ष-ताप पर अंतर्विष्ट में हैलाइट डॉटर क्रिस्टल लगभग 26 wt% NaCl से अधिक लवणता दर्शाता है; D — एक साथ फँसे वाष्प-समृद्ध व लवणजल अंतर्विष्ट जो एक ही ताप पर समांगीकृत हों, उबलना दर्शाते हैं

    H₂O–NaCl में हैलाइट संतृप्ति कक्ष-ताप पर लगभग 26 wt% NaCl है, अतः हैलाइट डॉटर क्रिस्टल अधिक लवणीय तरल का सूचक है। समान Th वाले सहवर्ती वाष्प-समृद्ध व लवणजल अंतर्विष्ट उबलने का मानक प्रमाण हैं। द्वितीयक अंतर्विष्ट बाद के तरलों को दर्ज करते हैं, वृद्धि के समय वाले को नहीं, और अधिक ऋणात्मक Tm बड़े हिमांक-अवनमन व अतः उच्च लवणता का सूचक है, इसलिए वे दोनों कथन गलत हैं।
  12. भंडार-आकलन व भू-सांख्यिकी के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. कट-ऑफ ग्रेड बढ़ाने से कट-ऑफ से ऊपर के अयस्क का टनभार घटता और औसत ग्रेड बढ़ता है
    2. सामान्य क्रिगिंग में भार स्वतंत्र रूप से चुने जाते हैं और उनका योग 1 होना आवश्यक नहीं
    3. नगेट प्रभाव वह प्रसरण है जो परास पर मिलता है, जहाँ नमूने असहसंबद्ध हो जाते हैं
    4. क्रिगिंग आकलन-प्रसरण देती है, जो सरल व्युत्क्रम-दूरी भारण नहीं देता
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — कट-ऑफ ग्रेड बढ़ाने से कट-ऑफ से ऊपर के अयस्क का टनभार घटता और औसत ग्रेड बढ़ता है; D — क्रिगिंग आकलन-प्रसरण देती है, जो सरल व्युत्क्रम-दूरी भारण नहीं देता

    कट-ऑफ बढ़ाने से निम्न-ग्रेड पदार्थ हट जाता है, अतः टनभार घटता है और शेष का माध्य ग्रेड बढ़ता है। क्रिगिंग आकलन के साथ आकलन-प्रसरण देती है, जो व्युत्क्रम-दूरी भारण नहीं दे सकता। सामान्य क्रिगिंग के भार अनभिनतता हेतु योग 1 होने तक प्रतिबंधित होते हैं, और नगेट निकट-शून्य अंतराल का प्रसरण है, परास का नहीं, इसलिए वे दोनों कथन गलत हैं।
  13. भारत में खनिज व ईंधन संसाधनों के वितरण के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. ओडिशा का सुकिंदा भारत की प्रमुख क्रोमाइट-धारी अतिमैफ़िक पट्टी है
    2. भारत में बॉक्साइट मुख्यतः जम्मू-कश्मीर व हिमाचल प्रदेश में मिलता है
    3. झारखंड का झरिया पर्मियन गोंडवाना आयु के प्राइम कोकिंग कोयले के लिए प्रसिद्ध है
    4. राजस्थान की खेतड़ी पट्टी भारत का मुख्य टिन प्रदेश है
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    उत्तर: A — ओडिशा का सुकिंदा भारत की प्रमुख क्रोमाइट-धारी अतिमैफ़िक पट्टी है; C — झारखंड का झरिया पर्मियन गोंडवाना आयु के प्राइम कोकिंग कोयले के लिए प्रसिद्ध है

    सुकिंदा में अधिकांश भारतीय क्रोमाइट है, और दामोदर घाटी का झरिया पर्मियन गोंडवाना मापक्रम से प्राइम कोकिंग कोयले का स्रोत है। भारतीय बॉक्साइट ओडिशा व पड़ोसी प्रायद्वीपीय राज्यों में केंद्रित है, हिमालय में नहीं, और खेतड़ी ताँबे की पट्टी है, टिन प्रदेश नहीं।
  14. एक पटलाकार ताँबा अयस्क-पिंड की माध्य मोटाई 25,000 m² के क्षेत्रफल पर 12 m है। अयस्क का स्थूल घनत्व 3.0 t/m³ और भार के अनुसार ग्रेड 2.4% Cu है, तथा खनन में 90% अयस्क पुनर्प्राप्त होता है। पुनर्प्राप्त अयस्क में ताँबे का द्रव्यमान ____ टन है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 19440

    आयतन = 12 × 25,000 = 300,000 m³। अयस्क-टनभार = 300,000 × 3.0 = 900,000 t। स्थान पर ताँबा = 900,000 × 0.024 = 21,600 t। 90% पुनर्प्राप्ति पर पुनर्प्राप्त अयस्क में ताँबा 21,600 × 0.90 = 19,440 t है। पुनर्प्राप्ति भूल जाने पर 21,600 आता है, और घनत्व भूलने पर 7,200।
  15. खनन व प्रसंस्करण का व्यय $30 प्रति टन अयस्क है, ताँबे की कीमत $8,000 प्रति टन धातु है और धातुकर्मीय पुनर्प्राप्ति 85% है। कट-ऑफ ग्रेड = प्रति टन अयस्क व्यय ÷ (प्रति टन धातु कीमत × पुनर्प्राप्ति) का उपयोग कर, कट-ऑफ ग्रेड ____ % Cu है (उत्तर दशमलव के दो स्थानों तक दें)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 0.44

    व्यय चुकाने हेतु प्रति टन अयस्क से जो धातु पुनर्प्राप्त होनी चाहिए, वह पुनर्प्राप्ति पूर्ण होने पर 30 / 8,000 = 0.00375 t प्रति टन अयस्क है। 85% पुनर्प्राप्ति पर ग्रेड 0.00375 / 0.85 = 0.004412 होना चाहिए, जो भार-भिन्न है, और प्रतिशत में यह 0.44% Cu है। पुनर्प्राप्ति छोड़ने पर 0.375% आता है, और भिन्न को प्रतिशत में बदलना भूलना दूसरी भूल है।
  16. दो नमूने एक रेखा पर हैं, एक 0 m पर 8 g/t ग्रेड का और एक 10 m पर 3 g/t ग्रेड का। सेमीवैरियोग्राम रैखिक है, γ(h) = 0.5h, नगेट रहित। सामान्य क्रिगिंग का उपयोग कर, 0 m वाले नमूने से 4 m दूर के बिंदु पर आकलित ग्रेड ____ g/t है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 6

    सामान्य क्रिगिंग समीकरण हैं λ₁γ(0) + λ₂γ(10) + μ = γ(4) और λ₁γ(10) + λ₂γ(0) + μ = γ(6), λ₁ + λ₂ = 1 के साथ। γ(h) = 0.5h से ये 5λ₂ + μ = 2 व 5λ₁ + μ = 3 बनते हैं। घटाने पर 5(λ₁ − λ₂) = 1, अतः λ₁ − λ₂ = 0.2, और λ₁ + λ₂ = 1 से भार λ₁ = 0.6 व λ₂ = 0.4 हैं। आकलन 0.6 × 8 + 0.4 × 3 = 4.8 + 1.2 = 6.0 g/t है। व्युत्क्रम-वर्ग-दूरी या समान भार लेने पर अन्य मान आते हैं।
  17. एक जलीय NaCl-प्रकार तरल अंतर्विष्ट में अंतिम हिम-गलन ताप −8.0 °C है। S = 1.78θ − 0.0442θ² + 0.000557θ³ का उपयोग करें, जहाँ θ °C में हिमांक-अवनमन है (यहाँ θ = 8.0) और S wt% NaCl समतुल्य में लवणता है। लवणता ____ wt% NaCl समतुल्य है (उत्तर दशमलव के दो स्थानों तक दें)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 11.70

    θ = 8.0 के साथ: 1.78 × 8.0 = 14.240; 0.0442 × 64 = 2.8288; 0.000557 × 512 = 0.2852। अतः S = 14.240 − 2.8288 + 0.2852 = 11.6964, यानी 11.70 wt% NaCl समतुल्य। θ = −8.0 को उसके परिमाण के बिना लेने पर ऋणात्मक निरर्थक मान आता है, और घन-पद छोड़ने पर 11.41 आता है।
  18. प्राप्त-अवस्था आधार पर विश्लेषित एक कोयला नमूने में नमी 7%, वाष्पशील पदार्थ 30% और राख 15% है। स्थिर कार्बन इन तीनों के बाद का शेष है, और ईंधन अनुपात स्थिर कार्बन ÷ वाष्पशील पदार्थ है। ईंधन अनुपात ____ है (उत्तर दशमलव के एक स्थान तक दें)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 1.6

    स्थिर कार्बन = 100 − (7 + 30 + 15) = 48%। ईंधन अनुपात 48 / 30 = 1.6 है। स्थिर कार्बन के रूप में 100 − (30 + 15) = 55 लेने पर, जो नमी को शामिल रखता है, 1.8 आता है, जो प्रचलित भूल है।