स्तरिकी व भूवैज्ञानिक काल-मापनी: सिद्धांत, रेडियोमितीय आयु-निर्धारण, रेडियोधर्मी साम्य तथा भारत की स्तरिकी व संसाधन
2. भूवैज्ञानिक काल-मापनी
भूवैज्ञानिक काल-मापनी पृथ्वी के 4.54 Ga के इतिहास को महाकल्पों, कल्पों व कालों में बाँटती है। फैनेरोज़ोइक के विभाजन जीवाश्मों से (सापेक्ष काल) परिभाषित होते हैं और जीवाश्म-युक्त परतों को घेरने वाली ज्वालामुखीय राख-परतों व अंतर्वेधनों की रेडियोमितीय आयु से संख्यात्मक आयु पाते हैं। नीचे की आयु पूर्णांकित व “लगभग” हैं; मापनी के संस्करणों में एक-दो Ma का अंतर रहता है। महाकल्प हैं हेडियन (निर्माण से लगभग 4.0 Ga तक), आर्कियन (लगभग 4.0 से 2.5 Ga), प्रोटेरोज़ोइक (2.5 Ga से लगभग 540 Ma) तथा फैनेरोज़ोइक (लगभग 540 Ma से आज तक)। पहले तीन मिलकर प्री-कैम्ब्रियन बनाते हैं, जो पृथ्वी के इतिहास का लगभग 88 प्रतिशत है। फैनेरोज़ोइक के कल्प हैं पैलियोज़ोइक (लगभग 540 से 250 Ma), मेसोज़ोइक (लगभग 250 से 66 Ma) तथा सेनोज़ोइक (66 Ma से आज तक)।
| काल | आरंभ (Ma) | एक उपयोगी चिह्न |
|---|---|---|
| कैम्ब्रियन | 540 | ट्राइलोबाइट जैसे कवचधारी जीवों की अचानक प्रचुरता; फैनेरोज़ोइक का आधार |
| ऑर्डोविशियन | 485 | समुद्री अकशेरुकियों का विविधीकरण; ऑर्डोविशियन-अंत का हिमन व विलोपन |
| सिलूरियन | 445 | सबसे पहले संवहनी स्थलीय पादप |
| डेवोनियन | 420 | मत्स्यों का युग; प्रथम वन व आरंभिक चतुष्पाद |
| कार्बोनीफ़ेरस | 360 | उत्तरी महाद्वीपों के कोयला-दलदली वन; गोंडवाना हिमन का आरंभ |
| परमियन | 300 | दक्षिण में ग्लॉसॉप्टेरिस वनस्पति व हिमन; लगभग 252 Ma पर परमियन-अंत का सामूहिक विलोपन |
| ट्राइऐसिक | 252 | विलोपन से पुनरुद्धार; डायनासोर व आरंभिक स्तनधारी प्रकट होते हैं |
| जुरैसिक | 200 | डायनासोरों का प्रभुत्व; ऐमोनाइट प्रचुर; गोंडवाना का विखंडन आरंभ |
| क्रिटेशियस | 145 | पुष्पी पादपों का प्रसार; 66 Ma पर इसके अंत के निकट दक्कन विस्फोट व डायनासोर विलोपन |
| पैलियोजीन | 66 | स्तनधारियों का प्रसार; लगभग 50 से 55 Ma पर भारत-एशिया टक्कर |
| नियोजीन | 23 | हिमालय का उत्थान व शिवालिक मोलास; घास-मैदानों का प्रसार |
| क्वाटरनरी | 2.6 | हिमनद व अंतर्हिमनद चक्र; मानव; जलोढ़ |
3. निरपेक्ष काल: क्षय-नियम व रेडियोमितीय आयु
प्रत्येक अस्थिर नाभिक यादृच्छिक रूप से क्षय होता है, पर प्रति इकाई समय उसके क्षय की प्रायिकता नियत होती है, यही क्षय-स्थिरांक (decay constant) λ है (मात्रक: प्रति वर्ष)। अतः क्षय-दर उपस्थित परमाणुओं की संख्या के अनुपात में होती है, dN/dt = −λN, और समाकलन से N = N₀e^(−λt) मिलता है। आयु-निर्धारण में प्रयुक्त क्षयों के लिए ताप, दाब व रासायनिक अवस्था λ को मापने योग्य रूप से नहीं बदलते, इसीलिए क्षय एक भरोसेमंद घड़ी है। अर्ध-आयु (half-life) वह समय है जिसमें N घटकर N₀/2 रह जाए: t½ = ln 2/λ = 0.693/λ। माध्य आयु τ = 1/λ = 1.443 t½ है। सक्रियता (activity) A = λN प्रति इकाई समय क्षयों की संख्या है। n अर्ध-आयु बाद शेष अंश (½)ⁿ है: ½, ¼, ⅛ तथा n = 4 पर 6.25 प्रतिशत।
आयु-समीकरण। यदि किसी नमूने में अब N जनक परमाणु व D* रेडियोजनित जनित परमाणु हैं, तो D* = N₀ − N = N(e^(λt) − 1), अतः t = (1/λ) ln(1 + D*/N)। हल उदाहरण: t½ = 1.25 Ga वाले युग्म के लिए λ = 0.693/1.25 = 0.554 प्रति Ga। D*/N = 0.25 वाले खनिज की आयु t = ln(1.25)/0.554 = 0.223/0.554 = 0.40 Ga है।
| जनक → जनित | अर्ध-आयु | विशिष्ट उपयोग |
|---|---|---|
| U-238 → Pb-206 | लगभग 4.47 Ga | ज़िरकॉन व अन्य यूरेनियम खनिज; सबसे पुरानी चट्टानें व उल्काएँ |
| U-235 → Pb-207 | लगभग 0.70 Ga | U-238 के साथ युग्मित जाँच के रूप में |
| Th-232 → Pb-208 | लगभग 14 Ga | मोनाज़ाइट जैसे थोरियम-समृद्ध खनिज |
| Rb-87 → Sr-87 | लगभग 49 Ga | पुराने ग्रेनाइट व कायांतरित चट्टानों के संपूर्ण-शैल व खनिज आइसोक्रॉन |
| K-40 → Ar-40 | लगभग 1.25 Ga | ज्वालामुखीय चट्टानें व अभ्रक की शीतलन-आयु; K-40 के लगभग 11 प्रतिशत क्षय ही Ar-40 देते हैं, शेष Ca-40 |
| C-14 → N-14 | 5730 वर्ष | लगभग 50,000 वर्ष से नया कार्बनिक पदार्थ |
विधि का चयन। अर्ध-आयु मापी जाने वाली आयु के तुलनीय या उससे अधिक होनी चाहिए: C-14 100 Ma की चट्टान के लिए बेकार है, और Rb-87 की 49 Ga अर्ध-आयु युवा चट्टान में बहुत कम जनित परमाणु बनाती है। खनिज उस क्षण की आयु बताता है जब वह संवृत तंत्र (closed system) बना: ज़िरकॉन में क्रिस्टलन, अभ्रक में आर्गन हेतु संवरण-ताप (closure temperature) से नीचे ठंडा होना। मान्यताएँ हैं: संवरण के बाद जनक या जनित का न लाभ न हानि, तथा प्रारंभिक जनित ज्ञात या शून्य।
आइसोक्रॉन (isochron)। Rb–Sr के लिए ⁸⁷Sr/⁸⁶Sr = (⁸⁷Sr/⁸⁶Sr)₀ + (⁸⁷Rb/⁸⁶Sr)(e^(λt) − 1)। भिन्न Rb/Sr वाले सहजात नमूने एक सरल रेखा, आइसोक्रॉन, पर आते हैं जिसकी ढाल e^(λt) − 1 है और जिसका अंतःखंड प्रारंभिक अनुपात है, इसलिए प्रारंभिक अनुपात मानना नहीं पड़ता। λ = 1.42 × 10⁻¹¹ प्रति वर्ष लेने पर 0.0143 की ढाल से t = ln(1.0143)/(1.42 × 10⁻¹¹) = 1.0 Ga मिलता है।
4. रेडियोधर्मी साम्य: दीर्घकालिक व क्षणिक
क्षय-श्रृंखला में जनित (N₂, λ₂) को उसका जनक (N₁, λ₁) पोषित करता है और वह स्वयं क्षय होता है, dN₂/dt = λ₁N₁ − λ₂N₂। परिणाम इस पर निर्भर है कि किसकी अर्ध-आयु अधिक है।
| प्रकरण | शर्त | दीर्घकालिक परिणाम |
|---|---|---|
| दीर्घकालिक साम्य (secular) | जनक की अर्ध-आयु जनित से बहुत अधिक (λ₁ ≪ λ₂) | सक्रियताएँ बराबर, λ₂N₂ = λ₁N₁, अतः N₂/N₁ = λ₁/λ₂ = t½(जनित)/t½(जनक); लगभग 5 से 7 जनित अर्ध-आयु बाद प्राप्त |
| क्षणिक साम्य (transient) | जनक जनित से दीर्घजीवी पर तुलनीय रूप से (λ₁ < λ₂) | N₂/N₁ = λ₁/(λ₂ − λ₁); सक्रियता-अनुपात A₂/A₁ = λ₂/(λ₂ − λ₁) > 1; फिर दोनों जनक की अर्ध-आयु से घटते हैं |
| कोई साम्य नहीं | जनक जनित से अल्पजीवी (λ₁ > λ₂) | जनक पहले समाप्त हो जाता है और अनुपात कभी नियत नहीं होता |
दीर्घकालिक साम्य का हल उदाहरण: संवृत U-238 तंत्र (t½ = 4.47 × 10⁹ वर्ष) में Ra-226 (t½ = 1600 वर्ष) समान सक्रियताओं के साथ N(Ra)/N(U) = 1600/(4.47 × 10⁹) = 3.6 × 10⁻⁷ पर स्थिर होता है। पुराने, संवृत यूरेनियम अयस्क में श्रृंखला का प्रत्येक सदस्य U-238 के साथ दीर्घकालिक साम्य में होता है, इसीलिए Bi-214 की गामा-किरणों से “समतुल्य यूरेनियम” आँका जाता है। रेडॉन गैस के निकलने या यूरेनियम के निक्षालन से साम्य बिगड़ता है, और यह असाम्य स्वयं युवा (क्वाटरनरी) घटनाओं की आयु बता सकता है। क्षणिक साम्य का हल उदाहरण: जनक t½ = 10 h व जनित t½ = 2 h से A₂/A₁ = (1/2)/(1/2 − 1/10) = 1.25 मिलता है।
5. भारत के प्रमुख स्तरिकीय विभाजन (रूपरेखा)
प्रायद्वीपीय भारत पुराने क्रेटॉनों से बना है, जिन्हें गतिशील पट्टियाँ जोड़ती हैं, उन पर अल्प-विरूपित प्रोटेरोज़ोइक बेसिन, फिर महाद्वीपीय गोंडवाना बेसिन, दक्कन लावा और उत्तर में युवा हिमालयी अनुक्रम हैं। सारणी को ऊपर से नीचे पढ़ना मोटे तौर पर पुराने से नए की ओर पढ़ना है (आयु अनुमानित है और कुछ पंक्तियाँ समय में अतिव्यापी हैं)।
| विभाजन | मोटी आयु | लक्षण व उदाहरण |
|---|---|---|
| आर्कियन क्रेटॉन: धारवाड़, बस्तर, सिंहभूम, बुंदेलखंड, अरावली | 2.5 Ga से पुराने; कुछ नाइस 3 Ga से अधिक | ग्रीनस्टोन पट्टियों सहित नाइस व ग्रैनिटॉइड क्षेत्र; आयरन ओर ग्रुप की पट्टित लौह-शैल; स्वर्ण वाली धारवाड़ पट्टियाँ |
| प्रोटेरोज़ोइक गतिशील व वलित पट्टियाँ: अरावली–दिल्ली, सतपुड़ा, पूर्वी घाट, दक्षिणी ग्रैनुलाइट | मुख्यतः प्रोटेरोज़ोइक (अरावली दिल्ली से पुरानी) | विरूपित, कायांतरित ऊपरी-भूपर्पटीय (सुप्राक्रस्टल) चट्टानें; ग्रैनुलाइट पट्टियों में खोंडालाइट व चार्नोकाइट |
| पुराण बेसिन: कडप्पा, विंध्य, छत्तीसगढ़, कलादगी, भीमा | प्रोटेरोज़ोइक | मोटे, लगभग अकायांतरित बलुआ पत्थर, शेल व चूनापत्थर; विंध्य के समूह सेमरी, कैमूर, रीवा, भांडेर |
| गोंडवाना महासमूह (दामोदर, सोन, महानदी, गोदावरी घाटियाँ) | उत्तर कार्बोनीफ़ेरस या परमियन से आरंभिक क्रिटेशियस | भ्रंश-परिबद्ध बेसिनों में मुख्यतः अ-समुद्री चट्टानें; आधार पर हिमनदीय तालचेर, बराकर व रानीगंज में कोयला, ग्लॉसॉप्टेरिस वनस्पति |
| दक्कन ट्रैप (पूर्व में पुराने राजमहल ट्रैप) | लगभग 66 Ma (राजमहल: आरंभिक क्रिटेशियस) | थोलीआइटी बाढ़ बेसाल्ट प्रवाह; प्रवाहों के बीच अंतर-ट्रैपी परतें; नीचे डायनासोर-युक्त लमेटा परतें; लैटेराइट व बॉक्साइट टोपियाँ |
| किनारों का समुद्री मेसोज़ोइक व टर्शियरी: कच्छ, कावेरी, नर्मदा, असम | जुरैसिक से नियोजीन | जीवाश्म-युक्त समुद्री परतें, कच्छ के जुरैसिक ऐमोनाइट सहित; टर्शियरी बेसिनों में तेल व गैस |
| हिमालय: टेथिस, उच्च, लघु, शिवालिक (उप-हिमालय) | प्रोटेरोज़ोइक से प्लायस्टोसीन; टक्कर लगभग 50 से 55 Ma | उत्तर से दक्षिण क्षेत्र दक्षिण तिब्बत विलगन, मुख्य केंद्रीय क्षेप, मुख्य सीमा क्षेप व मुख्य अग्र क्षेप से पृथक; मायोसीन से प्लायस्टोसीन आयु का शिवालिक मोलास |
| क्वाटरनरी | पिछले 2.6 Ma | सिंधु-गंगा जलोढ़ (पुराना भांगर, नया खादर), मरुस्थलीय व तटीय निक्षेप |
6. भारत के धात्विक अयस्क, कोयला व पेट्रोलियम (रूपरेखा)
संसाधन भूविज्ञान का अनुसरण करते हैं। धातुएँ पुराने प्री-कैम्ब्रियन क्षेत्रों (आर्कियन ग्रीनस्टोन पट्टियाँ, सिंहभूम व अरावली पट्टियाँ, अतिमैफ़िक पिंड) में हैं; कोयला परमियन गोंडवाना बेसिनों में है; लिग्नाइट व पेट्रोलियम युवा टर्शियरी बेसिनों में हैं। नाइस के क्रेटॉन में न कोयला होता है न तेल, क्योंकि दोनों को अवसादी बेसिन व दबे कार्बनिक पदार्थ की आवश्यकता है।
| संसाधन | प्रमुख क्षेत्र | भूवैज्ञानिक परिवेश |
|---|---|---|
| लोहा (हेमेटाइट, मैग्नेटाइट) | ओडिशा व झारखंड (सिंहभूम), छत्तीसगढ़ (बैलाडीला), कर्नाटक (बेल्लारी–होस्पेट) | आयरन ओर ग्रुप व धारवाड़ पट्टियों की पट्टित लौह-शैल |
| मैंगनीज़ | महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश (नागपुर–बालाघाट), ओडिशा, कर्नाटक | कायांतरित प्री-कैम्ब्रियन मैंगनीज़ अवसाद (सौसर समूह का गोंडाइट); लैटेराइटी संवर्धन |
| क्रोमाइट | सुकिंदा, ओडिशा | प्री-कैम्ब्रियन चट्टानों में परतदार अतिमैफ़िक पिंड |
| ताँबा | खेतड़ी (राजस्थान), सिंहभूम (झारखंड), मलाजखंड (मध्य प्रदेश) | दिल्ली पट्टी के कायांतरित अवसाद; सिंहभूम अपरूपण-क्षेत्र; मलाजखंड में ग्रेनाइट में पोर्फ़िरी-प्रकार का ताँबा |
| सीसा व जस्ता | राजस्थान: जावर, राजपुरा–दरीबा, रामपुरा–आगूचा | अरावली क्षेत्र के प्री-कैम्ब्रियन कायांतरित अवसादों में स्तर-बद्ध सल्फ़ाइड |
| सोना | कोलार (अब बंद) व हट्टी, कर्नाटक | धारवाड़ ग्रीनस्टोन पट्टियों में क्वार्ट्ज़ शिराएँ |
| बॉक्साइट | ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, छत्तीसगढ़ | खोंडालाइट व दक्कन बेसाल्ट का लैटेराइटी अपक्षय (सुपरजीन निक्षेप) |
| यूरेनियम व तट-बालू खनिज | जादूगुड़ा (सिंहभूम अपरूपण-क्षेत्र); केरल, तमिलनाडु, ओडिशा के तट | अपरूपण-क्षेत्र यूरेनियम; इल्मेनाइट, मोनाज़ाइट, ज़िरकॉन, रूटाइल के तटीय प्लेसर |
कोयला। भारत का अधिकांश कोयला (भंडार का नौ-दशमांश से कहीं अधिक) परमियन गोंडवाना कोयला है, जो बिटुमिनी से उप-बिटुमिनी और प्रायः उच्च राख वाला है और बराकर व रानीगंज संरचनाओं में मिलता है: दामोदर घाटी (रानीगंज, मुख्य कोकिंग कोयले वाला झरिया, बोकारो, करनपुरा), सोन व महानदी घाटियाँ (सिंगरौली, कोरबा, तालचेर) तथा गोदावरी–वर्धा घाटी (सिंगरेनी, वर्धा)। उत्तर-पूर्व (असम, मेघालय) के टर्शियरी कोयले युवा व उच्च गंधक वाले हैं, और लिग्नाइट नेवेली (तमिलनाडु), गुजरात व राजस्थान में है। कोटि पीट, लिग्नाइट, उप-बिटुमिनी, बिटुमिनी, एंथ्रेसाइट के क्रम में बढ़ती है, कार्बन-मात्रा बढ़ते हुए।
पेट्रोलियम। भारत का तेल व गैस टर्शियरी अवसादी बेसिनों से आते हैं, कुछ पुराने बेसिनों के साथ: असम–अराकान (डिगबोई, सबसे पुराना उत्पादक क्षेत्र, उन्नीसवीं सदी के अंत में खोजा गया), कैम्बे (गुजरात), पश्चिमी अपतट (मुंबई हाई), कृष्णा–गोदावरी, कावेरी व राजस्थान (बाड़मेर)। क्षेत्र को स्रोत शैल, सरंध्र भंडार शैल, अपारगम्य आवरण तथा अपनति जैसा पाश चाहिए, सही समय-क्रम में।
मुख्य बिंदु
- सापेक्ष क्रम अध्यारोपण, मूल क्षैतिजता, पार्श्विक सातत्य, प्रतिच्छेदन, समावेशन व जीवावशेष-अनुक्रम से मिलता है; असंगतियाँ लुप्त काल दर्शाती हैं, और अंतर्वेधनों की आयु उनकी स्थिति से नहीं, उनके काटे हुए पिंडों से तय होती है।
- मुख्य सीमाएँ: आर्कियन–प्रोटेरोज़ोइक लगभग 2.5 Ga, प्रोटेरोज़ोइक–फैनेरोज़ोइक लगभग 540 Ma, परमियन-अंत विलोपन लगभग 252 Ma, क्रिटेशियस–पैलियोजीन लगभग 66 Ma। अवसादों की आयु घेरने वाली राख-परतों, लावा व अंतर्वेधनों से निकलती है।
- क्षय: N = N₀e^(−λt), t½ = 0.693/λ, माध्य आयु 1/λ, n अर्ध-आयु बाद अंश (½)ⁿ। आयु t = (1/λ) ln(1 + D/N), तथा D/N = 2ⁿ − 1। Rb–Sr आइसोक्रॉन की ढाल e^(λt) − 1 और अंतःखंड प्रारंभिक अनुपात के बराबर होता है।
- दीर्घकालिक साम्य (दीर्घजीवी जनक): समान सक्रियताएँ व N₂/N₁ = λ₁/λ₂। क्षणिक साम्य (जनक दीर्घजीवी पर तुलनीय): A₂/A₁ = λ₂/(λ₂ − λ₁) > 1। अल्पजीवी जनक से कोई साम्य नहीं बनता।
- भारत पुराने से नए क्रम में: आर्कियन क्रेटॉन, प्रोटेरोज़ोइक गतिशील पट्टियाँ व पुराण बेसिन, गोंडवाना (उत्तर पैलियोज़ोइक से आरंभिक क्रिटेशियस, आधार पर हिमनदीय तालचेर), दक्कन ट्रैप (लगभग 66 Ma), शिवालिक मोलास सहित हिमालय, क्वाटरनरी जलोढ़।
- धातुएँ प्री-कैम्ब्रियन क्षेत्रों में हैं (पट्टित शैलों में लोहा, सुकिंदा में क्रोमाइट, धारवाड़ पट्टियों में सोना, राजस्थान में आधार धातुएँ), कोयला मुख्यतः परमियन गोंडवाना बेसिनों में, तथा लिग्नाइट व पेट्रोलियम टर्शियरी बेसिनों में।
अभ्यास प्रश्न (18)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
एक बेसाल्ट डाइक वलित बलुआ पत्थर को काटता है, पर उस संगुटिकाश्म में नहीं दिखता जो अपरदित बलुआ पत्थर व डाइक पर कोणीय असंगति सहित टिका है। पुराने से नए का सही सापेक्ष आयु-क्रम क्या है?
उत्तर देखें
उत्तर: A — बलुआ पत्थर, फिर डाइक, फिर संगुटिकाश्म, क्योंकि डाइक बलुआ पत्थर को काटता है और पहले अपरदन से कट चुका था
डाइक बलुआ पत्थर को काटता है, अतः वह उससे नया है (प्रतिच्छेदन)। वह अपरदन-सतह पर कटा हुआ है और संगुटिकाश्म में अनुपस्थित है, अतः संगुटिकाश्म से पुराना है। भ्रामक विकल्प डाइक को इसलिए अंत में रखता है कि वह ऊपरी परतों के साथ उद्भासित है; ढेर में स्थिति परतों की आयु बताती है, अंतर्वेधनों की नहीं। कोई नियम आग्नेय चट्टान को उसके भेदे अवसादी शैल से पुराना नहीं बनाता।दो दूर-दूर के अवसादी बेसिनों की परतों के सहसंबंध हेतु कौन-सा जीवाश्म सबसे उपयोगी सूचक जीवाश्म है?
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उत्तर: B — अल्प भूवैज्ञानिक अवधि की ऐसी जाति जो प्रचुर, सरलता से पहचानी जाने योग्य और अनेक बेसिनों में फैली हो
अच्छे सूचक जीवाश्म की स्तरिकीय अवधि अल्प होती है, जो सूक्ष्म काल-विभेदन देती है, साथ ही व्यापक भौगोलिक प्रसार, प्रचुरता व सरल पहचान होती है, ताकि दूर के बेसिनों में उसी काल-खंड को पहचाना जा सके। लंबे समय तक चलने वाली व्यापक जाति भ्रामक उत्तर है पर परत को केवल मोटे अंतराल तक आँकती है; दुर्लभ या स्थानीय जाति बेसिनों के पार सहसंबंध नहीं बना सकती।सापेक्ष आयु-निर्धारण के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर देखें
उत्तर: A — भ्रंश उस सबसे नई परत से नया होता है जिसे वह विस्थापित करता है; B — ऊपर के संगुटिकाश्म में ग्रेनाइट के गोलाश्म दर्शाते हैं कि ग्रेनाइट संगुटिकाश्म से पुराना है
भ्रंश को हर उस परत से नया होना चाहिए जिसे वह काटता है, और गोलाश्म अपने समाविष्ट करने वाले संगुटिकाश्म से पहले अस्तित्व में होना चाहिए, अतः ग्रेनाइट पुराना है। सिल पहले से बनी चट्टान में अंतःक्षेपित होता है, अतः वह दोनों परतों से नया है, निचली के समकालीन नहीं। नई क्षैतिज अवसादी परतों के नीचे झुकी परतें कोणीय असंगति बनाती हैं; नॉनकन्फ़ॉर्मिटी में अवसादी चट्टान आग्नेय या कायांतरित चट्टान पर टिकी होती है।एक काष्ठ-कोयला नमूने में उसकी मूल C-14 सक्रियता का 12.5 प्रतिशत शेष है। C-14 की अर्ध-आयु 5730 वर्ष लेने पर नमूने की आयु, वर्षों में, ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 17190
शेष अंश = (1/2)ⁿ = 0.125 = 1/8, अतः n = 3 अर्ध-आयु। आयु = 3 × 5730 = 17190 वर्ष। क्षय-नियम से जाँच: t = ln(1/0.125)/λ = 2.0794/(ln 2/5730) = 17190 वर्ष।यदि किसी रेडियोधर्मी नाभिक का क्षय-स्थिरांक दूसरे नाभिक से दुगुना हो, तो उसकी अर्ध-आयु दूसरे की तुलना में कैसी होगी?
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उत्तर: D — यह आधी होगी, क्योंकि अर्ध-आयु स्थिरांक के व्युत्क्रमानुपाती होती है
t½ = 0.693/λ, अतः λ दुगुना करने पर अर्ध-आयु आधी हो जाती है: नाभिक तेज़ी से क्षय होता है। भ्रामक उत्तर अनुपात को उलट देता है। आयु-निर्धारण में प्रयुक्त क्षयों के लिए अर्ध-आयु ताप से प्रभावित नहीं होती, और वह λ के वर्ग से संबंधित नहीं है।एक खनिज में रेडियोजनित जनित परमाणु व शेष जनक परमाणु D*/N = 0.5 के अनुपात में हैं। जनक की अर्ध-आयु 1.25 Ga है। ln 2 = 0.693 तथा ln 1.5 = 0.405 लीजिए। खनिज की आयु Ga में, दो दशमलव स्थानों तक, ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 0.73
λ = 0.693/1.25 = 0.5544 प्रति Ga। t = (1/λ) ln(1 + D/N) = ln(1.5)/0.5544 = 0.405/0.5544 = 0.7305, जो 0.73 Ga है। यथार्थ लघुगणकों से 0.7312 मिलता है, फिर भी 0.73। प्रचलित भूल ln(0.5) लेना है, या D/N = 0.5 को जनक का आधा क्षयित होना मान लेना, जिससे एक अर्ध-आयु मिलती।एक ग्रेनाइट में ज़िरकॉन, जिनमें पुरानी विरासती क्रोड नहीं हैं, U–Pb आयु 1.8 Ga देते हैं, संपूर्ण-शैल Rb–Sr आइसोक्रॉन लगभग 1.8 Ga देता है, और बायोटाइट K–Ar आयु 1.0 Ga देता है। सबसे उचित निर्वचन क्या है?
उत्तर देखें
उत्तर: C — ग्रेनाइट लगभग 1.8 Ga पूर्व क्रिस्टलित हुआ, और बाद के पुनः-तापन में बायोटाइट का आर्गन तब तक निकलता रहा जब तक खनिज लगभग 1.0 Ga पूर्व ठंडा नहीं हुआ
भिन्न तंत्र भिन्न तापों पर संवृत होते हैं। विरासती क्रोड-रहित ज़िरकॉन व संपूर्ण-शैल आइसोक्रॉन दोनों क्रिस्टलन-आयु देते हैं, जबकि आर्गन बायोटाइट से कहीं कम ताप पर निकलता है, अतः K–Ar आयु पुनः-तापन या मंद उत्थान के बाद आर्गन-संवरण-ताप से नीचे ठंडा होने को दर्ज करती है। अन्य विकल्प विफल हैं: विरासती क्रोड-रहित ज़िरकॉन 1.0 Ga पर क्रिस्टलन को अस्वीकार करते हैं, तापन से क्षय-स्थिरांक नहीं बदलते, और ग्रेनाइट में अभ्रक ज़िरकॉन से पहले क्रिस्टलित नहीं होता।सहजात चट्टानों के एक समूह के Rb–Sr आइसोक्रॉन की ढाल 0.0288 है। Rb-87 का क्षय-स्थिरांक 1.42 × 10⁻¹¹ प्रति वर्ष लीजिए। चट्टानों की आयु, Ma में, निकटतम 100 Ma तक, ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 2000
ढाल = e^(λt) − 1, अतः λt = ln(1.0288) = 0.02839 तथा t = 0.02839/(1.42 × 10⁻¹¹) = 1.9995 × 10⁹ वर्ष, लगभग 2000 Ma। आइसोक्रॉन की ढाल e^(λt) − 1 है, स्वयं आयु नहीं, अतः λ से भाग देने से पहले लघुगणक लेना आवश्यक है।रेडियोमितीय आयु-निर्धारण के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर देखें
उत्तर: A — आयु-निर्धारण में प्रयुक्त क्षयों के लिए अर्ध-आयु ताप या मेज़बान खनिज की रासायनिक अवस्था से नहीं बदलती; C — Rb–Sr आइसोक्रॉन का अंतःखंड सहजात नमूनों का प्रारंभिक ⁸⁷Sr/⁸⁶Sr अनुपात देता है
इन क्षयों के लिए क्षय-स्थिरांक ताप व रसायन के प्रति असंवेदी होते हैं, और आइसोक्रॉन का अंतःखंड प्रारंभिक अनुपात है। दो अर्ध-आयु बाद जनक का एक-चौथाई शेष रहता है, शून्य नहीं। C-14 कुछ दसियों हज़ार वर्षों में चुक जाता है और करोड़ों वर्ष पुरानी चट्टान की आयु नहीं बता सकता।एक पुराने, अविक्षुब्ध, संवृत यूरेनियम अयस्क में Ra-226 (अर्ध-आयु 1600 वर्ष) अपने दीर्घजीवी पूर्वज U-238 (अर्ध-आयु 4.47 अरब वर्ष) के साथ साम्य में है। कौन-सा कथन सही है?
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उत्तर: C — दोनों की सक्रियताएँ समान हैं, और Ra-226 के परमाणु U-238 के परमाणुओं से उनकी अर्ध-आयु के अनुपात में कम हैं
जनक की अर्ध-आयु जनित से कहीं अधिक होने के कारण तंत्र दीर्घकालिक साम्य में है: λ₂N₂ = λ₁N₁, अतः सक्रियताएँ समान हैं और N₂/N₁ = λ₁/λ₂ = 1600/(4.47 × 10⁹) ≈ 3.6 × 10⁻⁷। क्षणिक गुणक λ₂/(λ₂ − λ₁) भ्रामक है पर λ₁ के λ₂ के सामने नगण्य होने पर वह 1 की ओर जाता है। परमाणुओं की समान संख्या जनित को कहीं अधिक सक्रियता देती, जिसे साम्य अस्वीकार करता है।4.0 × 10⁹ वर्ष अर्ध-आयु का एक जनक नाभिक 8.0 × 10⁴ वर्ष अर्ध-आयु के जनित में क्षयित होता है, और तंत्र बहुत लंबे समय से संवृत है। प्रति 10⁹ जनक परमाणुओं पर उपस्थित जनित परमाणुओं की संख्या ____ है।
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उत्तर: 20000
जनक कहीं अधिक दीर्घजीवी है, अतः दीर्घकालिक साम्य लागू है: N₂/N₁ = λ₁/λ₂ = t½(जनित)/t½(जनक) = 8.0 × 10⁴/4.0 × 10⁹ = 2.0 × 10⁻⁵। प्रति 10⁹ जनक परमाणु, N₂ = 2.0 × 10⁻⁵ × 10⁹ = 20000। अनुपात उलटने पर 5 × 10¹³ जनित परमाणु आते, जो असंभव है क्योंकि दीर्घकालिक साम्य में अल्पजीवी जनित अपने जनक से अधिक नहीं हो सकता।12 h अर्ध-आयु का एक जनक 4 h अर्ध-आयु के जनित में क्षयित होता है, और क्षणिक साम्य स्थापित हो चुका है। जनित की सक्रियता व जनक की सक्रियता का अनुपात A₂/A₁, एक दशमलव स्थान तक, ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 1.5
क्षणिक साम्य में A₂/A₁ = λ₂/(λ₂ − λ₁) = अर्ध-आयुओं के पदों में T₁/(T₁ − T₂) = 12/(12 − 4) = 1.5। λ ∝ 1/T से जाँच: λ₁ = 1/12 व λ₂ = 1/4, अतः (1/4)/(1/4 − 1/12) = 0.25/0.1667 = 1.5। अनुपात 1 से अधिक है क्योंकि जनित की सक्रियता में पोषक क्षय भी सम्मिलित हैं।गोंडवाना महासमूह के आधार पर स्थित तालचेर संरचना किस प्रकार के निक्षेप से अभिलक्षित है?
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उत्तर: D — उत्तर पैलियोज़ोइक गोंडवाना हिमन के हिमनदीय गोलाश्म-स्तर (टिलाइट)
तालचेर संरचना हिमनदीय उत्पत्ति के गोलाश्म-स्तर (टिलाइट) व शेलों से आरंभ होती है, जो उत्तर पैलियोज़ोइक के गोंडवाना हिमन को दर्ज करती है। कोयला-युक्त इकाइयाँ उसके ऊपर की बराकर व रानीगंज संरचनाएँ हैं, जो भ्रामक उलझन है; जुरैसिक समुद्री परतें कच्छ में हैं, और बाढ़ बेसाल्ट दक्कन ट्रैप हैं।निम्नलिखित भारतीय इकाइयों को पुराने से नए के सही क्रम में कौन-सा विकल्प रखता है: शिवालिक समूह, दक्कन ट्रैप, विंध्य महासमूह, धारवाड़ ग्रीनस्टोन पट्टियाँ?
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उत्तर: A — धारवाड़ ग्रीनस्टोन पट्टियाँ, विंध्य महासमूह, दक्कन ट्रैप, शिवालिक समूह
धारवाड़ पट्टियाँ आर्कियन से आरंभिक प्रोटेरोज़ोइक की हैं, विंध्य बेसिन प्रोटेरोज़ोइक व अकायांतरित है, दक्कन ट्रैप लगभग 66 Ma के हैं और शिवालिक मोलास मायोसीन से प्लायस्टोसीन का है। विंध्य महासमूह पुराने आधार पर टिका है और आर्कियन ग्रीनस्टोन पट्टियों से नया है, तथा शिवालिक चारों में सबसे नए हैं क्योंकि वे हिमालय के उत्थान को दर्ज करते हैं।हिमालयी विभाजनों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — शिवालिक समूह मुख्य अग्र क्षेप व मुख्य सीमा क्षेप के बीच स्थित है; B — मुख्य केंद्रीय क्षेप लघु हिमालय को उच्च हिमालय से पृथक करता है; C — टेथिस हिमालय उच्च हिमालय के उत्तर में स्थित है और उसमें मोटे समुद्री अवसादी अनुक्रम हैं
दक्षिण से उत्तर क्षेत्र हैं शिवालिक (मुख्य अग्र व मुख्य सीमा क्षेपों के बीच), लघु हिमालय (मुख्य सीमा व मुख्य केंद्रीय क्षेपों के बीच), उच्च हिमालय (मुख्य केंद्रीय क्षेप व दक्षिण तिब्बत विलगन के बीच) तथा समुद्री अनुक्रमों सहित टेथिस हिमालय। लघु हिमालय को दक्षिण तिब्बत विलगन के पास रखने वाला कथन वस्तुतः उच्च हिमालय का वर्णन है।एक सर्वेक्षण को कोयले की प्रथम खोज के लिए भूवैज्ञानिक दृष्टि से सर्वाधिक संभावनाशील क्षेत्र चुनना है। उसे कौन-सा चुनना चाहिए?
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उत्तर: B — बराकर-प्रकार की संरचनाओं वाला भ्रंश-परिबद्ध परमियन गोंडवाना बेसिन, जैसे दामोदर घाटी
कोयले को ऐसा अवसादी बेसिन चाहिए जिसमें वनस्पति-पदार्थ जमा होकर दबा हो, और दामोदर घाटी जैसे परमियन गोंडवाना बेसिनों में भारत का अधिकांश कोयला है। नाइस क्षेत्र और उच्च हिमालय की क्रिस्टलीय चट्टानें कायांतरित हैं और उनमें कोयला नहीं होता; लावा प्रवाह वनस्पति-पदार्थ को नष्ट करते हैं, कोयला नहीं बचाते, यद्यपि उनके नीचे कोयला-युक्त अवसाद हो सकते हैं।एक संवृत खनिज में अब उपस्थित प्रत्येक एक जनक परमाणु के सापेक्ष रेडियोजनित मूल के सात जनित परमाणु हैं, और आरंभ में कोई जनित नहीं था। जनक की कितनी अर्ध-आयु बीत चुकी हैं?
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उत्तर: B — 3 अर्ध-आयु, क्योंकि जनक अब अपनी मूल मात्रा का एक-आठवाँ है
D/N = 7 का अर्थ है कि मूलतः 7 + 1 = 8 जनक-समतुल्य थे, अतः N/N₀ = 1/8 = (1/2)³ और तीन अर्ध-आयु बीत चुकी हैं; व्यापक रूप में D/N = 2ⁿ − 1। log₂ 7 = 2.8 लेना शेष जनक को भूल जाना है, जो प्रचलित भूल है। चार अर्ध-आयु से D*/N = 15 मिलता, और प्रत्येक अर्ध-आयु प्रति जनक एक जनित उत्पन्न नहीं करती।भारत के संसाधन व उसके प्रमुख भूवैज्ञानिक आश्रय की निम्नलिखित जोड़ियों में से कौन-सी सही हैं?
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उत्तर: A — सुकिंदा (ओडिशा) का क्रोमाइट: प्री-कैम्ब्रियन क्षेत्र के भीतर अतिमैफ़िक पिंड; B — झरिया का कोकिंग कोयला: दामोदर घाटी के परमियन गोंडवाना कोयला-स्तर; C — कोलार (कर्नाटक) का सोना: आर्कियन धारवाड़ ग्रीनस्टोन पट्टी की क्वार्ट्ज़ शिराएँ
सुकिंदा क्रोमाइट प्री-कैम्ब्रियन चट्टानों के अतिमैफ़िक पिंडों में है, झरिया कोकिंग कोयला परमियन गोंडवाना कोयला-स्तरों में, और कोलार सोना आर्कियन ग्रीनस्टोन पट्टी की क्वार्ट्ज़ शिराओं में। पेट्रोलियम को स्रोत, भंडार व आवरण सहित अवसादी बेसिन चाहिए; मुंबई हाई पश्चिमी अपतट के टर्शियरी अवसादी बेसिन में है, क्रिस्टलीय नाइस में नहीं।