खाद्य घटक: कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, लिपिड, वर्णक, फ़्लेवर व एंज़ाइम

यह अध्याय जीवन विज्ञान (XL) पेपर के पाँच वैकल्पिक खंडों में से एक, XL5 खाद्य प्रौद्योगिकी (अभियांत्रिकी विज्ञान (XE) पेपर यही चार शीर्षक अपने नौ में से एक खंड XE6 खाद्य प्रौद्योगिकी के रूप में रखता है, अतः यह अध्याय दोनों पेपरों में से किसी के भी अभ्यर्थी के काम आता है), के खंड XL5.1 (खाद्य रसायन व पोषण) के पहले भाग का उत्तर देता है: “खाद्य घटकों के अभिलक्षणन व परिमाणन की तकनीकें”, कार्बोहाइड्रेट (“स्टार्च, सेलुलोज़, पेक्टिक पदार्थ व आहारीय रेशा, स्टार्च का जिलेटिनीकरण व रेट्रोग्रेडेशन”), प्रोटीन (“प्रोटीन विकृतीकरण, प्रोटीनों व स्टार्च के क्रियात्मक गुण”), लिपिड (“विकृतगंधिता, बहुलकीकरण व बहुरूपता”), वर्णक (“कैरोटिनॉयड, क्लोरोफ़िल, एंथोसायनिन, टैनिन व मायोग्लोबिन; करक्यूमिन, बीटालेन”), फ़्लेवर (“टर्पीन, एस्टर, ऐल्डिहाइड, कीटोन व क्विनीन”) तथा एंज़ाइम (“विशिष्टता, सरल व संदमन बलगतिकी, सहएंज़ाइम, एंज़ाइमी व अनएंज़ाइमी भूरापन, खाद्य एंज़ाइमिकी”)। संख्यात्मक प्रश्न केल्डाल प्रोटीन, आयोडीन, साबुनीकरण व परॉक्साइड मान तथा संदमित एंज़ाइम-दरें हैं। पोषण, अपमिश्रण व प्रसंस्करण-जनित परिवर्तन अगले अध्याय में हैं।

1. खाद्य घटकों का अभिलक्षणन व परिमाणन

समीपस्थ विश्लेषण (proximate analysis) प्रत्येक अंश को उसकी विधि से परिभाषित करता है। नमी लगभग 105 °C पर स्थिर भार तक ओवन में सुखाने पर हुई हानि है (शर्करा-समृद्ध खाद्यों हेतु कम ताप पर निर्वात ओवन; सूखे चूर्णों व तेलों हेतु कार्ल फ़िशर अनुमापन, जिसमें आयोडीन व SO₂ जल से अभिक्रिया करते हैं)। राख लगभग 550 °C पर दहन के बाद बचा अवशेष है। अपरिष्कृत वसा सॉक्सलेट उपकरण में पेट्रोलियम ईथर का निष्कर्ष है (दूध की वसा गर्बर विधि से)। अपरिष्कृत रेशा, यानी अम्ल और फिर क्षार में उबालने के बाद का अवशेष, आहारीय रेशे को कम आँकता है, जिसे एंज़ाइमी-भारात्मक विधि से मापा जाता है। कार्बोहाइड्रेट अंतर द्वारा लिया जाता है, 100 − (नमी + प्रोटीन + वसा + राख + रेशा), अतः अन्य सभी त्रुटियाँ इसी में आ गिरती हैं।

प्रोटीन केल्डाल नाइट्रोजन से मिलता है: उत्प्रेरक सहित सांद्र H₂SO₄ में पाचन अमोनियम सल्फ़ेट देता है; NaOH से मुक्त NH₃ को बोरिक अम्ल में आसवित कर मानक अम्ल से अनुमापित किया जाता है। %N = (नमूने का अनुमापांक − रिक्त अनुमापांक, mL) × अम्ल की नॉर्मलता × 1.4007 ÷ नमूने का द्रव्यमान (g), और प्रोटीन = %N × गुणक, सामान्यतः 6.25 क्योंकि प्रोटीनों में औसतन 16 % N होता है (दूध हेतु 6.38, गेहूँ के आटे हेतु 5.70)। हल किया उदाहरण: 0.500 g आटा, 0.1 N HCl का अनुमापांक 7.2 mL, रिक्त 0.2 mL: %N = 7.0 × 0.1 × 1.4007 ÷ 0.500 = 1.96, अतः प्रोटीन = 1.96 × 5.70 = 11.2 %। केल्डाल समस्त नाइट्रोजन गिनता है, अतः यूरिया या मेलामाइन “प्रोटीन” को बढ़ा देते हैं।

विशिष्ट विधियाँ: अपचायी शर्कराएँ लेन–आइनॉन अनुमापन (फ़ेलिंग विलयन) से या डाइनाइट्रोसैलिसिलिक अम्ल (DNS) के रंग से; वसा-अम्ल प्रोफ़ाइल मेथिल एस्टरों की गैस क्रोमैटोग्राफ़ी से; शर्कराएँ, विटामिन व वर्णक HPLC से; रंगीन उत्पाद स्पेक्ट्रमप्रकाशमिति (A = εcl) से, जैसे प्रोटीन की बाइयूरेट व लोरी परख में।

2. कार्बोहाइड्रेट: शर्कराएँ, स्टार्च, सेलुलोज़, पेक्टिन व रेशा

अपचायी शर्कराओं में मुक्त ऐनोमेरी कार्बन रहता है: ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़, गैलेक्टोज़, माल्टोज़ (ग्लूकोज़ α1→4 ग्लूकोज़) व लैक्टोज़ (गैलेक्टोज़ β1→4 ग्लूकोज़)। ये फ़ेलिंग विलयन को अपचयित करती हैं और मैलार्ड भूरेपन में भाग लेती हैं। सुक्रोज़ (ग्लूकोज़ α1→β2 फ्रक्टोज़) प्रतिलोमित होने तक अनपचायी है; प्रतिलोम शर्करा (invert sugar) अधिक मीठी है और क्रिस्टलन का प्रतिरोध करती है (जैम, फ़ोंडेंट)। दालों के ओलिगोसैकेराइड रैफ़िनोज़ व स्टैकियोज़ अपचित ही बृहदांत्र तक पहुँचते हैं, क्योंकि मनुष्य में α-गैलेक्टोसिडेज़ नहीं होता, और किण्वित होकर गैस बनाते हैं; फ्रक्टो- व गैलेक्टो-ओलिगोसैकेराइड भी पाचन से बचते हैं और प्रीबायोटिक का कार्य करते हैं।

पॉलीसैकेराइडसंरचनाखाद्य में कार्य
एमाइलोज़रैखिक α(1→4) ग्लूकन, अधिकांश स्टार्चों का लगभग 20–30 %; कुंडलियाँ आयोडीन के साथ गहरा नीला रंग देती हैंठंडा होने पर जेल बनाता है, तेज़ी से रेट्रोग्रेड होता है, फ़िल्म बनाता है
एमाइलोपेक्टिनα(1→6) शाखाओं वाली α(1→4) शृंखलाएँ; आयोडीन के साथ लाल-बैंगनी; मोमी (waxy) स्टार्च लगभग पूर्णतः एमाइलोपेक्टिन हैंपारदर्शी, श्यान लेई जो धीरे रेट्रोग्रेड होती है
सेलुलोज़क्रिस्टलीय सूक्ष्मतंतुओं में संकुलित रैखिक β(1→4) ग्लूकनअघुलनशील रेशा; CMC व मेथिलसेलुलोज़ जैसे व्युत्पन्न गाढ़ा करते व बाँधते हैं
पेक्टिक पदार्थआंशिक रूप से मेथिल-एस्टरीकृत α(1→4) D-गैलेक्टुरोनिक अम्ल; प्रोटोपेक्टिन (कच्चा फल) → पेक्टिन → पेक्टिक अम्ल (अधिपका फल)उच्च-मेथॉक्सिल पेक्टिन (DE > 50 %) लगभग pH 3 पर अधिक शर्करा के साथ जेल बनाता है; निम्न-मेथॉक्सिल पेक्टिन Ca²⁺ से (“अंडा-डिब्बा” सेतु)
आहारीय रेशाछोटी आँत में न पचने वाले पॉलीसैकेराइड व लिग्निन: घुलनशील (पेक्टिन, β-ग्लूकन, गोंद) व अघुलनशील (सेलुलोज़, हेमिसेलुलोज़, लिग्निन)घुलनशील रेशा ग्लूकोज़ व कोलेस्ट्रॉल का अवशोषण धीमा करता है; अघुलनशील रेशा आयतन बढ़ाता है

जिलेटिनीकरण: अधिक जल में प्रत्येक स्टार्च की विशिष्ट ताप-परास (मोटे तौर पर 50 से 80 °C) में गर्म करने पर कणिकाएँ क्रिस्टलीयता व द्विअपवर्तन खो देती हैं (ध्रुवित प्रकाश में दिखने वाला माल्टीज़ क्रॉस मिट जाता है), फूलती हैं, एमाइलोज़ छोड़ती हैं और श्यानता शिखर पर पहुँचती है; आगे ताप व अपरूपण उन्हें फाड़ देते हैं (ब्रेकडाउन), और ठंडा होने पर एमाइलोज़ के पुनः जुड़ने से लेई जम जाती है (सेटबैक)। शर्करा व कम जल, जल के लिए होड़ करके, जिलेटिनीकरण ताप बढ़ाते हैं। रेट्रोग्रेडेशन (प्रतिगमन) भंडारण में चलता रहने वाला यही पुनर्संयोजन है: एमाइलोज़ घंटों में, एमाइलोपेक्टिन दिनों में। यह ब्रेड का बासी होना, स्टार्च जेलों की सिनेरेसिस (पानी छोड़ना) और प्रतिरोधी स्टार्च उत्पन्न करता है, और रेफ़्रिजरेटर ताप पर सबसे तेज़ होता है, अतः ब्रेड ठंडे में कमरे के ताप या हिमीकृत अवस्था से जल्दी बासी होती है। रूपांतरित स्टार्च इन क्रियात्मक गुणों को साधते हैं: तिर्यक-बंधित (अम्ल, ताप व अपरूपण का प्रतिरोध), हाइड्रॉक्सीप्रोपिलित (रेट्रोग्रेडेशन धीमा, हिमीकरण–विगलन स्थायी), पूर्व-जिलेटिनीकृत (ठंडे जल में फूलता है)।

3. प्रोटीन: वर्ग, संरचना, विकृतीकरण व क्रियात्मकता

ऑसबॉर्न वर्ग विलेयता पर आधारित हैं: एल्ब्यूमिन (जल; ओवाल्ब्यूमिन), ग्लोब्युलिन (तनु लवण; सोया ग्लाइसिनिन), प्रोलैमिन (70 % एथेनॉल; गेहूँ का ग्लायडिन, मक्का का ज़ीन) तथा ग्लूटेलिन (तनु अम्ल या क्षार; गेहूँ का ग्लूटेनिन)। संयुग्मित प्रोटीनों में फ़ॉस्फ़ोप्रोटीन (केसीन), लाइपोप्रोटीन (अंडे की ज़र्दी) व क्रोमोप्रोटीन (मायोग्लोबिन) आते हैं। दूध का प्रोटीन लगभग 80 % केसीन है, जो κ-केसीन से स्थिर मिसेलों में रहता है और pH 4.6 पर अवक्षेपित होता है, तथा 20 % व्हे (β-लैक्टोग्लोब्युलिन, α-लैक्टाल्ब्यूमिन)। गेहूँ का ग्लूटेन तब बनता है जब जलयोजन व गूँधना ग्लायडिन (खिंचाव) को डाइसल्फ़ाइड-जुड़े ग्लूटेनिन (प्रत्यास्थता) से जोड़ते हैं। मांस के प्रोटीन मायोफ़ाइब्रिलर (ऐक्टिन, मायोसिन), सार्कोप्लाज़्मिक (मायोग्लोबिन) व स्ट्रोमल (कोलेजन) हैं।

संरचना अनुक्रम (प्राथमिक) से, α-हेलिक्स व β-शीट (द्वितीयक) तथा हाइड्रोजन बंधों, जलविरागी व आयनिक अन्योन्यक्रियाओं और डाइसल्फ़ाइडों से टिके वलन (तृतीयक) होते हुए, उपइकाई-संयोजन (चतुर्थक) तक जाती है। विकृतीकरण पेप्टाइड बंध तोड़े बिना मूल संरूपण की हानि है, जिसे ताप, pH की चरम सीमाएँ, उच्च दाब, हिमीकरण, अपरूपण, अंतरापृष्ठ, कार्बनिक विलायक, यूरिया व अपमार्जक उत्पन्न करते हैं। विलेयता घटती है, शृंखलाएँ समुच्चित होती या जेल बनाती हैं, एंज़ाइम व ट्रिप्सिन संदमक निष्क्रिय होते हैं, और पाच्यता प्रायः बढ़ती है क्योंकि खुली शृंखलाएँ प्रोटिएज़ों के लिए सुलभ होती हैं।

  • विलेयता समविभव बिंदु पर न्यूनतम है (केसीन pH 4.6 पर), जो अम्लीय दही-जमाव व प्रोटीन पृथक्कों का आधार है।
  • पायसीकरण व झाग: उभयरागी प्रोटीन तेल–जल व वायु–जल अंतरापृष्ठों पर खुलते हैं (केसीनेट, ज़र्दी के लाइपोप्रोटीन, अंडे की सफ़ेदी का झाग, जिसे ज़र्दी की ज़रा-सी वसा ढहा देती है)।
  • जेल-निर्माण ताप (अंडे की सफ़ेदी, व्हे), अम्ल या Ca²⁺ (CaSO₄ या MgCl₂ से जमाया टोफ़ू) या एंज़ाइमों (रेनेट, ट्रांसग्लूटामिनेज़) से; सॉसेज में जल व वसा बंधन; CO₂ रोकने वाले श्यान-प्रत्यास्थ ग्लूटेन जाल से गुँधा आटा।

4. लिपिड: वर्ग, वसा-स्थिरांक, विकृतगंधिता, बहुलकीकरण व बहुरूपता

सरल लिपिड वसा-अम्ल एस्टर हैं (ट्राइएसिलग्लिसरॉल, मोम); यौगिक लिपिडों में अतिरिक्त समूह होता है (लेसिथिन जैसे फ़ॉस्फ़ोलिपिड, ग्लाइकोलिपिड, लाइपोप्रोटीन); व्युत्पन्न लिपिड मुक्त वसा-अम्ल, स्टेरॉल व वसा-विलेय विटामिन हैं। वसा-अम्ल संतृप्त (पामिटिक C16:0, स्टियरिक C18:0), एकल-असंतृप्त (ओलीक C18:1 n-9) या बहु-असंतृप्त (लिनोलीक C18:2 n-6, α-लिनोलेनिक C18:3 n-3) होते हैं; प्राकृतिक द्विबंध सिस हैं, और आंशिक हाइड्रोजनीकरण ट्रांस समावयवी बनाता है। छोटी शृंखलाएँ व अधिक द्विबंध गलनांक घटाते हैं।

स्थिरांकपरिभाषाक्या बताता है
साबुनीकरण मान (SV)1 g वसा के साबुनीकरण हेतु KOH के mgशृंखला-लंबाई: SV = 3 × 56.1 × 1000 ÷ M(TAG); नारियल लगभग 250, अधिकांश बीज-तेल 185–200
आयोडीन मान (IV)100 g वसा द्वारा अवशोषित I₂ के g (विज़ अभिकर्मक, ICl)असंतृप्ति: नारियल लगभग 10, जैतून लगभग 80, सूरजमुखी लगभग 130, अलसी 170 से ऊपर
परॉक्साइड मान (PV)प्रति kg सक्रिय ऑक्सीजन के meq: हाइड्रोपरॉक्साइड KI को ऑक्सीकृत करते हैं, और I₂ थायोसल्फ़ेट से अनुमापित होता हैप्रारंभिक ऑक्सीकरण; हाइड्रोपरॉक्साइडों के टूटने पर पहले बढ़ता फिर घटता है
अम्ल मान (AV)1 g वसा के मुक्त वसा-अम्लों के उदासीनीकरण हेतु KOH के mgजलअपघटन; तलने के तेल की घिसावट
राइकर्ट–माइसल मान5 g वसा के भाप-वाष्पशील, जल-विलेय अम्लों हेतु 0.1 N क्षार के mLघी हेतु ऊँचा (ब्यूटिरिक अम्ल), अधिकांश वनस्पति तेलों हेतु 1 से कम

हल किया उदाहरण: ट्राइओलीन (M = 885.4 g/mol) में तीन C=C हैं, प्रत्येक एक I₂ (253.8 g/mol) जोड़ता है, अतः IV = 3 × 253.8 × 100 ÷ 885.4 = 86.0 तथा SV = 3 × 56.1 × 1000 ÷ 885.4 = 190। अनुमापन से, SV = (रिक्त − नमूना अनुमापांक, mL) × N(HCl) × 56.1 ÷ द्रव्यमान (g), और PV = (नमूना − रिक्त अनुमापांक, mL) × N(थायोसल्फ़ेट) × 1000 ÷ द्रव्यमान (g)।

जलअपघटनी विकृतगंधिता लाइपेज़ों द्वारा, या तलते समय ताप व जल द्वारा, मुक्त वसा-अम्ल निकालती है; दुर्गंध तभी आती है जब लघु-शृंखला अम्ल (ब्यूटिरिक, कैप्रोइक) मुक्त हों, जैसे मक्खन व घी में। स्वऑक्सीकरण मुक्त-मूलक शृंखला अभिक्रिया है। प्रारंभन: ताप, प्रकाश या Fe अथवा Cu के अंश द्विबंध के निकट वाले CH₂ से एक हाइड्रोजन हटाते हैं (सबसे आसानी से लिनोलिएट के दो द्विबंधों के बीच वाले CH₂ से), और L• बनता है। संचरण: L• + O₂ → LOO•, फिर LOO• + LH → LOOH + L•, अतः प्रेरण-काल के बाद अभिक्रिया तेज़ होती जाती है। समापन: मूलक आपस में जुड़ते हैं। स्वादहीन हाइड्रोपरॉक्साइड ऐल्डिहाइडों (हेक्सेनैल) व कीटोनों में टूटते हैं, जो दुर्गंध हैं, और दर असंतृप्ति के साथ तीव्रता से बढ़ती है। प्रकाश-ऑक्सीकरण सुग्राहीकारक (क्लोरोफ़िल, राइबोफ़्लेविन) द्वारा बनी एकक (singlet) ऑक्सीजन से होता है; यह कहीं तेज़ है, द्विबंधों से सीधे जुड़ता है, और इसे शृंखला-तोड़क प्रतिऑक्सीकारक नहीं रोकते बल्कि कैरोटिनॉयड शमित करते हैं। लाइपॉक्सीजिनेज़, दलहनों का एक लौह-एंज़ाइम, सोया की ‘बीनी’ गंध देता है।

  • प्रतिऑक्सीकारक: मूलक-अपमार्जक (टोकोफ़ेरॉल, BHA, BHT, TBHQ, प्रोपिल गैलेट) शृंखलाएँ समाप्त करते हैं; सहक्रियक (सिट्रिक अम्ल, EDTA, ऐस्कॉर्बिल पामिटेट) धातुओं को कीलेट करते या अपमार्जकों को पुनर्जीवित करते हैं।
  • प्रक्रम उपाय: O₂ व प्रकाश रोकें, ठंडा भंडारण करें, और पीसने से पहले दलहनों को ब्लांच करें।

लंबे तलने (लगभग 160 से 190 °C) में बहुलकीकरण मूलक व डील्स–ऐल्डर योगों द्वारा ट्राइएसिलग्लिसरॉलों को द्वितय व बहुलकों में जोड़ता है; जलअपघटन व ऑक्सीकरण के साथ यह तेल को गाढ़ा व गहरा करता, झाग उत्पन्न करता और धूम-बिंदु घटाता है, जिसे कुल ध्रुवीय यौगिकों से परखा जाता है। बहुरूपता: वसाएँ α (षट्कोणीय, सबसे अस्थायी, न्यूनतम गलनांक), β′ (विषमलंबाक्ष) या β (त्रिनताक्ष, सबसे स्थायी, उच्चतम गलनांक, मोटे क्रिस्टल) रूप में क्रिस्टलित होती हैं, और परिवर्तन केवल α → β′ → β दिशा में होता है। छोटे क्रिस्टलों व चिकनेपन हेतु मार्जरीन को β′ में रखा जाता है। कोको बटर के छह रूप हैं; टेम्परिंग चॉकलेट को रूप V में जमाती है (चमक, कड़क टूट, मुँह के ताप से ठीक नीचे गलन), और गर्म भंडारण उसे रूप VI व फ़ैट ब्लूम की ओर ले जाता है।

5. वर्णक: रसायन व प्रसंस्करण में व्यवहार

वर्णकरसायन व स्रोतप्रसंस्करण में व्यवहार
क्लोरोफ़िल a व bफ़ाइटॉल पूँछ वाले पोर्फ़िरिन वलय में Mg²⁺; वसा-विलेयताप व अम्ल Mg²⁺ को 2H⁺ से बदलकर जैतूनी फ़ियोफ़ाइटिन बनाते हैं; क्लोरोफ़िलेज़ फ़ाइटॉल हटाकर हरा क्लोरोफ़िलाइड बनाता है; Cu²⁺ या Zn²⁺ स्थायी चटक हरा देते हैं; क्षार हरापन बचाता है पर ऊतक नरम करता और विटामिन नष्ट करता है
कैरोटिनॉयडसंयुग्मित द्विबंधों वाले C40 टेट्राटर्पीन: कैरोटीन (β-कैरोटीन, लाइकोपीन) व ऑक्सीजनयुक्त ज़ैंथोफ़िल (ल्यूटिन, कैप्सैन्थिन); वसा-विलेयताप के प्रति अपेक्षाकृत स्थायी; ऑक्सीकरण से फीके पड़ते और तापन पर ट्रांस → सिस समावयवित होते हैं; प्रोविटामिन A केवल अप्रतिस्थापित β-आयोनोन वलय होने पर (β-कैरोटीन हाँ, लाइकोपीन नहीं)
एंथोसायनिनफ़्लेविलियम-आयन एंथोसायनिडिनों (सायनिडिन, पेलार्गोनिडिन, डेल्फ़िनिडिन) के ग्लाइकोसाइड; जल-विलेयलगभग pH 3 से नीचे लाल, pH 4–5 के पास लगभग रंगहीन, उदासीन की ओर बैंगनी-नीले; SO₂ से विरंजित; ताप व ऐस्कॉर्बिक अम्ल से अपघटित; टिन या लोहे के साथ नीले, अतः फल के डिब्बों पर लैकर चढ़ाया जाता है
टैनिनपॉलीफ़ीनॉल: जलअपघटनीय (ग्लूकोज़ के गैलिक या एलैजिक अम्ल एस्टर) व संघनित (प्रोएंथोसायनिडिन)कसैले (लार-प्रोटीन अवक्षेपित करते हैं); लोहे के साथ नीले-काले; प्रोटीन व लोहा बाँधते हैं; काली चाय में चाय के कैटेचिन थियाफ़्लेविन व थियारुबिजिन में ऑक्सीकृत होते हैं
मायोग्लोबिनग्लोबिन से बँधा हीम (पोर्फ़िरिन में Fe); मांस का वर्णकबैंगनी डीऑक्सीमायोग्लोबिन (Fe²⁺, निर्वात पैक), लाल ऑक्सीमायोग्लोबिन (Fe²⁺–O₂, ‘ब्लूम’), भूरा मेटमायोग्लोबिन (Fe³⁺, कम O₂ पर अधिक); पकाने पर भूरा हीमिक्रोम; नाइट्राइट क्योरिंग से नाइट्रोसिलमायोग्लोबिन, जो पकने पर गुलाबी रहता है
करक्यूमिनहल्दी प्रकंद का पीला डाइफ़ेरुलॉयलमीथेन; जल में अल्प-विलेयक्षार में लाल-भूरा; प्रकाश में फीका; बोरिक अम्ल के साथ लाल रोज़ोसायनिन (बोरेक्स हेतु हल्दी-कागज़ परीक्षण)
बीटालेननाइट्रोजनयुक्त, जल-विलेय: लाल-बैंगनी बीटासायनिन (चुकंदर का बीटानिन) व पीले बीटाज़ैंथिन; एक पौधे में एंथोसायनिनों के साथ कभी नहींलगभग pH 3 से 7 तक रंग बनाए रखते हैं, पर ताप, प्रकाश व O₂ से नष्ट होते हैं
⚠️ परीक्षा जाल
ढक्कन के नीचे देर तक पकी हरी सब्ज़ियाँ जैतूनी हो जाती हैं क्योंकि उनके वाष्पशील अम्ल भीतर रहकर फ़ियोफ़ाइटिन बनाते हैं; उन्हें थोड़ी देर, बिना ढके पकाएँ। पका क्योर्ड हैम गुलाबी रहता है क्योंकि नाइट्रोसिल हीमोक्रोम ताप-स्थायी है, जबकि पका ताज़ा मांस धूसर-भूरा हो जाता है।

6. फ़्लेवर यौगिक

फ़्लेवर स्वाद (अवाष्पशील: मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, उमामी) व सुगंध (वाष्पशील यौगिक) का योग है। सुगंध-यौगिक पौधे के जैवसंश्लेषण से, कटे ऊतक पर एंज़ाइमों की क्रिया से (कुचले लहसुन में एलिनेज़ एलिन को तीखे एलिसिन में बदलता है; लाइपॉक्सीजिनेज़ कटी पत्तियों के हरे हेक्सीनैल देता है), किण्वन से, और मैलार्ड व स्ट्रेकर अभिक्रियाओं से (पाइराज़ीन, फ़्यूरान) आते हैं। मोनोसोडियम ग्लूटामेट न्यूक्लियोटाइड IMP व GMP के साथ सहक्रियाशील उमामी देता है।

  • टर्पीन आइसोप्रीन (C5) इकाइयों से बनते हैं: मोनोटर्पीन (C10) जैसे खट्टे फलों के छिलके का लिमोनीन, मेन्थॉल, लिनालूल व सिट्रल; सेस्क्विटर्पीन (C15) जैसे अदरक का ज़िंजिबेरीन व ग्रेपफ़्रूट का नूटकाटोन।
  • एस्टर फल-सी सुगंध देते हैं: आइसोएमिल ऐसीटेट (केला), एथिल ब्यूटानोएट, मेथिल ऐंथ्रानिलेट (अंगूर); किण्वित पेयों में यीस्ट इन्हें बनाते हैं।
  • ऐल्डिहाइड: बेंज़ैल्डिहाइड (कड़वा बादाम), सिनैमैल्डिहाइड (दालचीनी), वैनिलिन, ऐसीटैल्डिहाइड (योगर्ट) व हेक्सेनैल (हरी गंध, तथा लिपिड ऑक्सीकरण का सूचक)।
  • कीटोन: डाइऐसिटिल (मक्खन की सुगंध, जिसे लैक्टिक अम्ल जीवाणु सिट्रेट से बनाते हैं) तथा ब्लू चीज़ के 2-हेप्टानोन जैसे मेथिल कीटोन।
  • क्विनोन (पाठ्यक्रम में “quinines” छपा है): ऑक्सीकृत फ़ीनॉल, जैसे कलौंजी के बीज का तीखा तत्व थाइमोक्विनोन, और एंज़ाइमी भूरेपन के o-क्विनोन। स्वयं क्विनीन टॉनिक जल का कड़वा सिनकोना ऐल्कलॉइड है।

7. खाद्य एंज़ाइम: विशिष्टता, बलगतिकी, संदमन व उपयोग

विशिष्टता निरपेक्ष (यूरिएज़ केवल यूरिया पर), समूह (ट्रिप्सिन लाइसीन या आर्जिनीन के बाद काटता है), बंध (α-एमाइलेज़ α-1,4 बंध तोड़ता है, α-1,6 नहीं) या त्रिविम (L-, न कि D-अमीनो अम्ल) हो सकती है। सहकारक धातु आयन (पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सीडेज़ में Cu, लाइपॉक्सीजिनेज़ में Fe, α-एमाइलेज़ को स्थिर करने वाला Ca²⁺) या विटामिन-व्युत्पन्न सहएंज़ाइम (NAD⁺, FAD, पिरिडॉक्सल फ़ॉस्फ़ेट, थायमीन पाइरोफ़ॉस्फ़ेट) होते हैं। मिकाएलिस–मेंटेन दर v = Vmax[S] ÷ (Km + [S]) है; Km वह [S] है जिस पर v = Vmax/2। हल किया उदाहरण: Km = 2 mM, Vmax = 100 इकाई व [S] = 2 mM पर v = 50; [I] = Ki पर प्रतिस्पर्धी संदमक आभासी Km को दोगुना करता है, अतः v = 100 × 2 ÷ (4 + 2) = 33 इकाई।

संदमनसंदमक जुड़ता हैआभासी Kmआभासी Vmaxलाइनवीवर–बर्क रेखाएँ
प्रतिस्पर्धीमुक्त एंज़ाइम से, सक्रिय स्थल परKm(1 + [I]/Ki), बढ़ा हुआअपरिवर्तित1/v अक्ष पर मिलती हैं
अप्रतिस्पर्धीकेवल ES संकुल से(1 + [I]/Ki′) से विभाजित(1 + [I]/Ki′) से विभाजितसमांतर
अस्पर्धी (शुद्ध)E व ES से समान रूप सेअपरिवर्तित(1 + [I]/Ki) से विभाजित1/[S] अक्ष पर −1/Km पर मिलती हैं
एंज़ाइमक्रियाउपयोग
α-एमाइलेज़α-1,4 बंधों का यादृच्छिक (आंतरिक) विदलन, डेक्सट्रिनस्टार्च द्रवीकरण, बेकिंग
β-एमाइलेज़; ग्लूकोएमाइलेज़अनपचायी सिरों से क्रमशः माल्टोज़; ग्लूकोज़ मुक्त करते हैंमाल्टोज़ व ग्लूकोज़ सिरप
ग्लूकोज़ आइसोमरेज़ग्लूकोज़ ⇌ फ्रक्टोज़उच्च-फ्रक्टोज़ सिरप
इनवर्टेज़; लैक्टेज़क्रमशः सुक्रोज़; लैक्टोज़ तोड़ते हैंप्रतिलोम सिरप; लैक्टोज़-मुक्त दूध
पेक्टिनेज़पेक्टिन से एस्टर हटाते व उसे तोड़ते हैंरस-उपज व स्वच्छीकरण
काइमोसिन (रेनेट)κ-केसीन को Phe105–Met106 पर काटता हैचीज़ का दही-जमाव
पपेन, ब्रोमेलेनपादप सिस्टीन प्रोटिएज़मांस मुलायम करना, बीयर की शीत-धुंध रोकना
ग्लूकोज़ ऑक्सीडेज़ व कैटालेज़ग्लूकोज़ + O₂ → ग्लूकोनिक अम्लअंडे की सफ़ेदी से शर्करा हटाना; O₂ हटाना

सूचक एंज़ाइम ताप-प्रक्रम का प्रमाण देते हैं: पाश्चरीकृत दूध में क्षारीय फ़ॉस्फ़ेटेज़ ऋणात्मक आना चाहिए, और सब्ज़ियों के सबसे ताप-स्थायी एंज़ाइमों में से एक, पेरॉक्सिडेज़, ब्लांचिंग जाँचता है (मटर व फलियों हेतु लाइपॉक्सीजिनेज़)।

8. एंज़ाइमी व अनएंज़ाइमी भूरापन

एंज़ाइमी भूरेपन हेतु फ़ीनॉल, ताम्र-एंज़ाइम पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सीडेज़ (PPO), O₂ व क्षतिग्रस्त ऊतक चाहिए। PPO मोनोफ़ीनॉलों को o-डाइफ़ीनॉलों में हाइड्रॉक्सिलित करता और इन्हें o-क्विनोनों में ऑक्सीकृत करता है, जो अनएंज़ाइमी रूप से बहुलकित होकर भूरे मेलानिन बनाते हैं। काली चाय, कोको व किशमिश में यह वांछित है, जबकि कटे सेब, आलू, मशरूम व झींगे में इससे ब्लांचिंग, अम्लकों (PPO का इष्टतम लगभग pH 5 से 7 है, और सिट्रिक अम्ल Cu को कीलेट भी करता है), ऐस्कॉर्बिक अम्ल (जो क्विनोनों को केवल स्वयं समाप्त होने तक अपचयित करता है), सल्फ़ाइटों, O₂ के बहिष्कार और झींगे में 4-हेक्सिलरिसॉर्सिनॉल से लड़ा जाता है।

मैलार्ड भूरापन: अपचायी शर्करा का कार्बोनिल किसी मुक्त अमीनो समूह (प्रायः लाइसीन का ε-NH₂) से संघनित होकर ग्लाइकोसिलऐमीन बनाता है, जो अमाडोरी पुनर्विन्यास (कीटोज़ों हेतु हेन्स) से गुज़रकर डाइकार्बोनिल, रिडक्टोन व हाइड्रॉक्सीमेथिलफ़र्फ़्यूरल (HMF) में टूटता है। स्ट्रेकर निम्नीकरण में डाइकार्बोनिल अमीनो अम्लों को एक कम कार्बन वाले ऐल्डिहाइडों व CO₂ में बदलते हैं, और बने ऐमीनोकीटोन संघनित होकर भुनी सुगंध वाले पाइराज़ीन बनाते हैं; अंत में भूरे मेलानॉइडिन बनते हैं। दर ताप व pH के साथ बढ़ती है, हेक्सोज़ की अपेक्षा पेंटोज़ के साथ तेज़ है, और मध्यम जल सक्रियता (लगभग 0.6 से 0.8) पर शिखर पर होती है, क्योंकि अधिक सूखे खाद्य अभिकारकों को जड़ कर देते हैं और अधिक गीले उन्हें तनु कर देते हैं। यह उपलब्ध लाइसीन नष्ट करता है और तले या बेक किए स्टार्च-युक्त खाद्यों में लगभग 120 °C से ऊपर ऐस्पैराजीन से ऐक्रिलैमाइड बनाता है। नियंत्रण: सल्फ़ाइट, कम pH व ताप, सुखाने से पहले अंडे की सफ़ेदी से ग्लूकोज़ हटाना, और ऐस्पैराजिनेज़।

कैरामलीकरण अमीनो यौगिकों के बिना शर्कराओं का तापअपघटन है; इसे अधिक ताप चाहिए, अम्ल या क्षार इसे उत्प्रेरित करते हैं, और यह निर्जलीकरण द्वारा HMF व फ़्यूरानों से होकर चलता है। कैरामल रंग वर्ग I से IV में हैं (सादा, कॉस्टिक सल्फ़ाइट, अमोनिया, सल्फ़ाइट अमोनिया)। ऐस्कॉर्बिक अम्ल भूरापन भंडारित खट्टे रस को गहरा करता है, जब डीहाइड्रोऐस्कॉर्बिक अम्ल फ़र्फ़्यूरलों में टूटकर बहुलकित होता है।

मुख्य बिंदु

  • समीपस्थ विश्लेषण अंशों को विधि से परिभाषित करता है: ओवन से नमी, मफ़ल से राख, सॉक्सलेट से वसा, केल्डाल से प्रोटीन (%N × 6.25; दूध हेतु 6.38) और अंतर द्वारा कार्बोहाइड्रेट। केल्डाल समस्त नाइट्रोजन गिनता है, अतः अप्रोटीन N उसे बढ़ा देता है।
  • स्टार्च गर्म जल में जिलेटिनीकृत होता है (फूलना, द्विअपवर्तन-हानि, शिखर श्यानता) और भंडारण में रेट्रोग्रेड होता है, सबसे तेज़ रेफ़्रिजरेटर ताप पर; उच्च-मेथॉक्सिल पेक्टिन शर्करा व अम्ल से, निम्न-मेथॉक्सिल Ca²⁺ से जेल बनाता है।
  • विकृतीकरण पेप्टाइड बंध तोड़े बिना प्रोटीन खोलता है: विलेयता घटती है, एंज़ाइम व ट्रिप्सिन संदमक निष्क्रिय होते हैं, पाच्यता प्रायः बढ़ती है; विलेयता समविभव बिंदु पर न्यूनतम है।
  • SV शृंखला-लंबाई, IV असंतृप्ति, PV प्रारंभिक ऑक्सीकरण और AV जलअपघटन बताता है। स्वऑक्सीकरण मूलक शृंखला है; तलना बहुलकीकरण जोड़ता है; वसाएँ α → β′ → β क्रम में क्रिस्टलित होती हैं, मार्जरीन में β′ और चॉकलेट में रूप V वांछित है।
  • ताप व अम्ल में क्लोरोफ़िल Mg²⁺ खोकर फ़ियोफ़ाइटिन बनता है; एंथोसायनिन केवल अम्ल में लाल हैं; मायोग्लोबिन डीऑक्सी, ऑक्सी या मेट रूप में बैंगनी, लाल या भूरा है; केवल अप्रतिस्थापित β-आयोनोन वलय वाले कैरोटिनॉयड प्रोविटामिन A हैं।
  • प्रतिस्पर्धी संदमक आभासी Km बढ़ाते हैं, अस्पर्धी Vmax घटाते हैं, अप्रतिस्पर्धी दोनों घटाते हैं। एंज़ाइमी भूरेपन हेतु PPO, फ़ीनॉल व O₂ चाहिए; मैलार्ड भूरेपन हेतु अपचायी शर्करा व अमीनो समूह चाहिए और यह मध्यम जल सक्रियता पर शिखर पर होता है।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. केल्डाल विधि में अपरिष्कृत प्रोटीन प्रायः % नाइट्रोजन × 6.25 के रूप में परिकलित होता है। गुणक 6.25 के पीछे कौन-सी मान्यता है?

    1. खाद्य प्रोटीनों में द्रव्यमान से औसतन 16 % नाइट्रोजन होता है, और 100 ÷ 16 = 6.25
    2. पाचन के दौरान कुछ अमोनिया उड़ जाती है, और गुणक खोए नाइट्रोजन की पूर्ति करता है
    3. गुणक बने अमोनियम सल्फ़ेट के द्रव्यमान को आसवित अमोनिया के द्रव्यमान में बदलता है
    4. यूरिया जैसा अप्रोटीन नाइट्रोजन गुणक द्वारा बाहर हो जाता है और केवल प्रोटीन नाइट्रोजन बचता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — खाद्य प्रोटीनों में द्रव्यमान से औसतन 16 % नाइट्रोजन होता है, और 100 ÷ 16 = 6.25

    गुणक 100/16 है: विधि नाइट्रोजन मापती है, और औसत प्रोटीन में 16 % N माना जाता है, अतः प्रोटीन = N × 6.25 (दूध हेतु 6.38 व गेहूँ के आटे हेतु 5.70, जिनके प्रोटीनों में N का अनुपात भिन्न है)। यह भ्रामक विचार कि गुणक अप्रोटीन नाइट्रोजन हटाता है, सत्य का उलटा है: केल्डाल यूरिया व अन्य अप्रोटीन N को भी प्रोटीन गिनता है। सही ढंग से किए पाचन में अमोनिया नहीं उड़ती, और गुणक का अमोनियम सल्फ़ेट के द्रव्यमान से कोई संबंध नहीं।
  2. दाल के आटे के 0.800 g नमूने का केल्डाल विधि से विश्लेषण किया गया। बोरिक अम्ल में आसवित अमोनिया को 0.1000 N HCl के 14.20 mL लगते हैं, और अभिकर्मक-रिक्त को 0.20 mL। नाइट्रोजन का परमाणु द्रव्यमान 14.007 व नाइट्रोजन-से-प्रोटीन गुणक 6.25 लेकर आटे में अपरिष्कृत प्रोटीन, % (w/w) में एक दशमलव स्थान तक, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 15.3

    शुद्ध अनुमापांक = 14.20 − 0.20 = 14.00 mL, अर्थात 14.00 × 0.1000 = 1.400 mmol N = 1.400 × 14.007 = 19.61 mg N। %N = 19.61 ÷ 800 × 100 = 2.451 %। प्रोटीन = 2.451 × 6.25 = 15.32 %, यानी 15.3। रिक्त भूल जाने पर 15.5 % आता है, और गेहूँ का गुणक 5.70 लेने पर 14.0 %।
  3. सफ़ेद ब्रेड की तीन एक-समान लोफ़ अच्छी तरह लपेटकर −18 °C, 4 °C व 25 °C पर रखी गईं। दो दिन बाद किस लोफ़ का गूदा सबसे कड़ा व बासी होगा, और क्यों?

    1. 25 °C वाली, क्योंकि बासीपन मुख्यतः नमी-हानि से होता है, जो कमरे के ताप पर सबसे तेज़ है
    2. −18 °C वाली, क्योंकि बर्फ़ के क्रिस्टल ग्लूटेन से पानी निचोड़कर गूदे को कड़ा कर देते हैं
    3. 4 °C वाली, क्योंकि एमाइलोपेक्टिन रेफ़्रिजरेटर ताप पर सबसे तेज़ी से पुनःक्रिस्टलित होता है
    4. तीनों समान, क्योंकि रेट्रोग्रेडेशन केवल समय पर निर्भर है, भंडारण ताप पर नहीं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — 4 °C वाली, क्योंकि एमाइलोपेक्टिन रेफ़्रिजरेटर ताप पर सबसे तेज़ी से पुनःक्रिस्टलित होता है

    बासीपन मुख्यतः गूदे में एमाइलोपेक्टिन का रेट्रोग्रेडेशन है, एक क्रिस्टलन जो हिमांक से थोड़ा ऊपर सबसे तेज़ होता है: नाभिकन हेतु पर्याप्त ठंडा, पर शृंखलाओं के हिलने हेतु पर्याप्त गर्म। हिमीकरण शृंखलाओं को जड़ कर उसे लगभग रोक देता है, और कमरे का ताप रेफ़्रिजरेटर से धीमा है। नमी-हानि, जो भ्रामक उत्तर है, अच्छी तरह लपेटी ब्रेड में नगण्य है; बासीपन इसके बिना भी होता है, और दोबारा गर्म करने से काफ़ी हद तक उलट जाता है, जिसे नमी-हानि नहीं समझा सकती।
  4. खाद्य कार्बोहाइड्रेटों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. जिलेटिनीकरण पर स्टार्च कणिकाएँ द्विअपवर्तन खो देती हैं क्योंकि उनके क्रिस्टलीय क्षेत्र पिघल जाते हैं
    2. एमाइलोपेक्टिन एमाइलोज़ से तेज़ रेट्रोग्रेड होता है क्योंकि उसके अनेक शाखा-बिंदु क्रिस्टलों का नाभिकन करते हैं
    3. निम्न-मेथॉक्सिल पेक्टिन कम शर्करा होने पर भी कैल्सियम आयनों के साथ जेल बना सकता है
    4. सुक्रोज़ फ़ेलिंग विलयन को अपचयित करता है क्योंकि उसकी फ्रक्टोज़ इकाई का ऐनोमेरी कार्बन मुक्त रहता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — जिलेटिनीकरण पर स्टार्च कणिकाएँ द्विअपवर्तन खो देती हैं क्योंकि उनके क्रिस्टलीय क्षेत्र पिघल जाते हैं; C — निम्न-मेथॉक्सिल पेक्टिन कम शर्करा होने पर भी कैल्सियम आयनों के साथ जेल बना सकता है

    जिलेटिनीकरण व्यवस्थित क्षेत्रों को पिघला देता है, अतः ध्रुवित प्रकाश में माल्टीज़ क्रॉस मिट जाता है। निम्न-मेथॉक्सिल पेक्टिन में अनेक मुक्त कार्बॉक्सिल समूह हैं जिन्हें Ca²⁺ अंडा-डिब्बा जेल में जोड़ता है, इसीलिए वह कम-शर्करा जैम में प्रयुक्त होता है। एमाइलोपेक्टिन नहीं, एमाइलोज़ तेज़ी से (घंटों में) रेट्रोग्रेड होता है; एमाइलोपेक्टिन की छोटी बाहरी शाखाएँ दिनों में धीरे क्रिस्टलित होती हैं। सुक्रोज़ अनपचायी है क्योंकि उसका ग्लाइकोसाइडी बंध ग्लूकोज़ व फ्रक्टोज़ दोनों के ऐनोमेरी कार्बनों को जोड़ता है।
  5. कच्चा सोयाबीन आटा खाने वाले चूहे ठीक से नहीं बढ़ते और उनका अग्न्याशय बढ़ जाता है, जबकि नम-ताप से भुना वही आटा खाने वाले चूहे सामान्य रूप से बढ़ते हैं। कौन-सी व्याख्या सबसे उपयुक्त है?

    1. भूनना सोया प्रोटीन को मुक्त अमीनो अम्लों में जलअपघटित करता है, जो अक्षत प्रोटीन से तेज़ अवशोषित होते हैं
    2. भूनना शर्कराओं व लाइसीन की मैलार्ड अभिक्रियाओं से आवश्यक अमीनो अम्ल बनाता है
    3. भूनना सोया के फ़ाइटिक अम्ल को वाष्पित कर देता है, जिससे बँधा ज़िंक व लोहा अवशोषण हेतु मुक्त होता है
    4. भूनना ट्रिप्सिन संदमकों व लेक्टिनों को विकृत करता है और प्रोटीनों को प्रोटिएज़ों हेतु खोल देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — भूनना ट्रिप्सिन संदमकों व लेक्टिनों को विकृत करता है और प्रोटीनों को प्रोटिएज़ों हेतु खोल देता है

    कुनित्ज़ व बोमन–बर्क ट्रिप्सिन संदमक आंत्र ट्रिप्सिन को रोकते हैं, अतः प्रोटीन ठीक से नहीं पचता और अधिक स्राव करते-करते अग्न्याशय बढ़ जाता है; लेक्टिन आंत्र-भित्ति को क्षति पहुँचाते हैं। दोनों प्रोटीन हैं और नम-ताप विकृतीकरण से निष्क्रिय होते हैं, जो अन्य प्रोटीनों को भी पाचन हेतु खोल देता है। भूनना पेप्टाइड बंधों को मुक्त अमीनो अम्लों में नहीं तोड़ता, मैलार्ड अभिक्रियाएँ अमीनो अम्ल बनाती नहीं बल्कि लाइसीन नष्ट करती हैं, और फ़ाइटिक अम्ल वाष्पशील नहीं है।
  6. एक वसा-नमूने का साबुनीकरण मान 255 mg KOH g⁻¹ और आयोडीन मान 9 g I₂ प्रति 100 g है। यह सबसे संभवतः कौन-सी वसा है?

    1. मूँगफली तेल, जो दीर्घ-शृंखला ट्राइएसिलग्लिसरॉलों में एस्टरीकृत ओलीक व लिनोलीक अम्लों से समृद्ध है
    2. नारियल तेल, जिसमें मध्यम शृंखला-लंबाई के संतृप्त लॉरिक व मिरिस्टिक अम्ल प्रधान हैं
    3. अलसी तेल, एक शोषी तेल जिसमें α-लिनोलेनिक अम्ल का अंश सबसे बड़ा है
    4. कोको बटर, जो मुख्यतः सममित ट्राइएसिलग्लिसरॉलों में पामिटिक, स्टियरिक व ओलीक अम्लों से बना है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — नारियल तेल, जिसमें मध्यम शृंखला-लंबाई के संतृप्त लॉरिक व मिरिस्टिक अम्ल प्रधान हैं

    ऊँचा SV कम औसत मोलर द्रव्यमान, यानी लघु या मध्यम शृंखलाएँ, दर्शाता है, और अति निम्न IV लगभग शून्य द्विबंध: नारियल तेल (लॉरिक C12:0 व मिरिस्टिक C14:0) दोनों पर खरा उतरता है। मूँगफली तेल व कोको बटर में C16–C18 शृंखलाएँ हैं (SV लगभग 190) और IV 9 से बहुत ऊपर (मूँगफली लगभग 90, कोको बटर लगभग 35); अलसी का IV 170 से ऊपर है। कोको बटर भ्रामक है क्योंकि वह ठोस व संतृप्त अम्लों से समृद्ध है, पर उसकी लंबी शृंखलाएँ SV को निम्न रखती हैं।
  7. शुद्ध ट्रिलिनोलीन, अर्थात लिनोलीक अम्ल (C18:2) के ट्राइएसिलग्लिसरॉल, का आयोडीन मान परिकलित कीजिए, जिसका आणविक सूत्र C₅₇H₉₈O₆ व M = 879.4 g mol⁻¹ है। M(I₂) = 253.8 g mol⁻¹ लीजिए और मानिए कि प्रत्येक C=C द्विबंध I₂ का एक अणु जोड़ता है। उत्तर निकटतम पूर्णांक में दीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 173

    प्रत्येक लिनोलियॉयल शृंखला में 2 C=C हैं, अतः एक अणु में 6, जो 879.4 g वसा पर 6 I₂ = 6 × 253.8 = 1522.8 g सोखता है। IV = 1522.8 ÷ 879.4 × 100 = 173.2, यानी 173। प्रति शृंखला एक द्विबंध गिनने पर 86.6 आता है, जो ट्राइओलीन के 86.0 के निकट है; यही सबसे आम भूल है।
  8. एक तेल के 2.000 g नमूने को लगभग 0.5 N ऐल्कोहॉली KOH के 25.0 mL के साथ साबुनीकरण पूर्ण होने तक पश्चवाहित किया गया। बचे क्षार का 0.500 N HCl से पश्च-अनुमापन करने पर 12.0 mL लगते हैं; तेल के बिना रिक्त में 25.4 mL लगते हैं। M(KOH) = 56.1 g mol⁻¹ लेकर तेल का साबुनीकरण मान (mg KOH g⁻¹), निकटतम पूर्णांक तक, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 188

    तेल द्वारा खपत KOH = (रिक्त − नमूना) अनुमापांक = 25.4 − 12.0 = 13.4 mL, 0.500 N का = 6.70 meq, अर्थात 2.000 g तेल हेतु 6.70 × 56.1 = 375.9 mg KOH। SV = 375.9 ÷ 2.000 = 187.9, यानी 188, जो C18-समृद्ध बीज-तेल हेतु सामान्य है। अंतर के स्थान पर केवल नमूना-अनुमापांक लेने पर 168 आता है, जो आम भूल है।
  9. भंडारित मूँगफली तेल का परॉक्साइड मान ज्ञात करने हेतु 5.00 g तेल को ऐसीटिक अम्ल–क्लोरोफ़ॉर्म व संतृप्त KI के साथ उपचारित किया गया, और मुक्त आयोडीन को 0.0100 N सोडियम थायोसल्फ़ेट से अनुमापित करने पर 3.10 mL लगे। रिक्त में 0.10 mL लगते हैं। प्रति kg तेल सक्रिय ऑक्सीजन के मिलीतुल्यांकों में परॉक्साइड मान ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 6

    PV = (S − B) × N × 1000 ÷ W = (3.10 − 0.10) × 0.0100 × 1000 ÷ 5.00 = 6 meq kg⁻¹। 0.01 N थायोसल्फ़ेट का प्रत्येक mL हाइड्रोपरॉक्साइडों द्वारा मुक्त आयोडीन का 0.01 meq है, और गुणक 1000 प्रति ग्राम को प्रति किलोग्राम में बदलता है। हाइड्रोपरॉक्साइडों के टूटने पर PV फिर घटता है, अतः एकल मान को तेल के इतिहास के साथ परखा जाता है।
  10. वसाओं के ह्रास व क्रिस्टलन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. पीसने से पहले सोयाबीन को ब्लांच करना लाइपॉक्सीजिनेज़ से बनने वाली ‘बीनी’ गंध रोकता है
    2. मक्खन की जलअपघटनी विकृतगंधिता उसके आयोडीन मान में वृद्धि से पहचानी जाती है
    3. मार्जरीन में β′ क्रिस्टल वांछित हैं क्योंकि वे छोटे होते हैं और चिकनी बनावट देते हैं
    4. क्लोरोफ़िल से सुग्राहीकृत प्रकाश-ऑक्सीकरण तेल में BHT मिलाने से पूर्णतः रुक जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पीसने से पहले सोयाबीन को ब्लांच करना लाइपॉक्सीजिनेज़ से बनने वाली ‘बीनी’ गंध रोकता है; C — मार्जरीन में β′ क्रिस्टल वांछित हैं क्योंकि वे छोटे होते हैं और चिकनी बनावट देते हैं

    लाइपॉक्सीजिनेज़ ताप-अस्थायी है, अतः कोशिकाएँ टूटने से पहले ब्लांचिंग उन हाइड्रोपरॉक्साइडों को रोकती है जो सोया को बीनी गंध देते हैं। β′ क्रिस्टल छोटे होते हैं और सुघट्यता व चिकनापन देते हैं, जबकि β क्रिस्टल बड़े होकर मार्जरीन को दानेदार बनाते हैं। जलअपघटन द्विबंधों को छुए बिना वसा-अम्ल मुक्त करता है, अतः अम्ल मान बढ़ाता है, आयोडीन मान नहीं। क्लोरोफ़िल-सुग्राहीकृत प्रकाश-ऑक्सीकरण एकक ऑक्सीजन से चलता है, जो द्विबंधों से सीधे जुड़ती है; BHT जैसे शृंखला-तोड़क प्रतिऑक्सीकारक इसे नहीं रोकते, जबकि कैरोटिनॉयड व अपारदर्शी पैक रोकते हैं।
  11. ठीक से टेम्पर की गई चॉकलेट की एक बार गर्म कार में छूट गई, आंशिक रूप से पिघली और फिर जम गई। अब उस पर धूसर, बेचमक सतही परत है जो गर्म उँगली के नीचे फैलकर पिघल जाती है और जल में नहीं घुलती। सबसे संभवतः क्या हुआ है?

    1. बार पर नमी संघनित हुई, सतह की शर्करा घोली, और शर्करा सफ़ेद पपड़ी के रूप में पुनःक्रिस्टलित हुई
    2. लिपिड ऑक्सीकरण से बने हाइड्रोपरॉक्साइड सतह पर बहुलक की धूसर, मोमी परत के रूप में चढ़ गए
    3. कोको बटर अस्थायी रूपों में पुनःक्रिस्टलित हुआ जो रूप VI की ओर बदले, जिससे फ़ैट ब्लूम बना
    4. पुनः तापन पर दुग्ध-प्रोटीनों व लैक्टोज़ की मैलार्ड अभिक्रियाओं ने सतह पर मेलानॉइडिन बनाए
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — कोको बटर अस्थायी रूपों में पुनःक्रिस्टलित हुआ जो रूप VI की ओर बदले, जिससे फ़ैट ब्लूम बना

    जो परत उँगली के नीचे फैलकर पिघले वह वसा है; जो जल में घुले और किरकिरी लगे वह शुगर ब्लूम होती, जो भ्रामक विकल्प है। पिघलने से टेम्परिंग द्वारा बने रूप V क्रिस्टल नष्ट हो गए; अनियंत्रित पुनः जमाव पर कोको बटर अस्थायी रूपों में क्रिस्टलित हुआ जो बड़े, प्रकाश-प्रकीर्णक क्रिस्टलों वाले स्थायी रूप VI की ओर बढ़ते हैं, और सतह तक खिंची द्रव वसा वहीं पुनःक्रिस्टलित हुई। ऑक्सीकरण दुर्गंध देता है, क्रिस्टलीय परत नहीं, और कार में कुछ घंटे दृश्य मैलार्ड भूरापन नहीं लाते।
  12. ढके बर्तन में 20 मिनट उबाली गई हरी फलियाँ जैतूनी-भूरी हो जाती हैं, जबकि वही फलियाँ खुले बर्तन के खौलते जल में 5 मिनट पकाने पर चटक हरी रहती हैं। क्लोरोफ़िल में कौन-सा परिवर्तन जैतूनी रंग समझाता है?

    1. क्लोरोफ़िलेज़ ने फ़ाइटॉल पूँछ हटाकर जल-विलेय क्लोरोफ़िलाइड बनाया जो पानी में घुलकर निकल गया
    2. बर्तन के ताँबे ने मैग्नीशियम आयन को हटाकर स्थायी जैतूनी ताम्र–क्लोरोफ़िल संकुल बनाया
    3. ताप ने क्लोरोफ़िल को ढकने वाले कैरोटिनॉयडों को ऑक्सीकृत किया और उनके विघटन-उत्पाद भूरे हो गए
    4. ढक्कन से रुके पादप अम्लों ने Mg²⁺ को दो H⁺ से बदलकर क्लोरोफ़िल को फ़ियोफ़ाइटिन बना दिया
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — ढक्कन से रुके पादप अम्लों ने Mg²⁺ को दो H⁺ से बदलकर क्लोरोफ़िल को फ़ियोफ़ाइटिन बना दिया

    तापन से पादप अम्ल निकलते हैं; ढक्कन वाष्पशील अम्लों को भीतर रखता है, और लंबा पकाना H⁺ को केंद्रीय Mg²⁺ हटाने देता है, जिससे जैतूनी-भूरा फ़ियोफ़ाइटिन बनता है। क्लोरोफ़िलाइड हरा ही रहता है, अतः उसके घुलकर निकलने से फलियाँ फीकी होतीं, जैतूनी नहीं। ताम्र–क्लोरोफ़िल संकुल चटक हरे होते हैं, इसीलिए पुनः हरा करने हेतु ताँबा या ज़िंक प्रयुक्त होता है, और कैरोटिनॉयड क्लोरोफ़िल को नहीं ढकते; क्लोरोफ़िल उन्हें ढकता है।
  13. खाद्य वर्णकों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. निर्वात-पैक ताज़ा गोमांस बैंगनी दिखता है क्योंकि उसका मायोग्लोबिन डीऑक्सीजनित Fe²⁺ रूप में है
    2. फल-पेय के एंथोसायनिन उदासीन pH पर सबसे गहरे लाल होते हैं और अम्ल मिलाने पर फीके पड़ते हैं
    3. टमाटर के लाइकोपीन में प्रोविटामिन A सक्रियता नहीं है क्योंकि उसमें β-आयोनोन वलय नहीं है
    4. चुकंदर का लाल रंग उन एंथोसायनिनों से है जो उसकी कोशिकाओं में बीटालेनों के साथ पाए जाते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — निर्वात-पैक ताज़ा गोमांस बैंगनी दिखता है क्योंकि उसका मायोग्लोबिन डीऑक्सीजनित Fe²⁺ रूप में है; C — टमाटर के लाइकोपीन में प्रोविटामिन A सक्रियता नहीं है क्योंकि उसमें β-आयोनोन वलय नहीं है

    ऑक्सीजन के बिना मायोग्लोबिन बैंगनी डीऑक्सीमायोग्लोबिन (Fe²⁺) रहता है; पैक खुलने पर O₂ जुड़ती है और मांस लाल हो उठता है। लाइकोपीन अचक्रीय कैरोटीन है, और विटामिन A सक्रियता हेतु कम से कम एक अप्रतिस्थापित β-आयोनोन वलय चाहिए। एंथोसायनिन निम्न pH पर फ़्लेविलियम धनायन के रूप में लाल होते हैं और pH बढ़ने पर रंगहीन फिर नीले होते हैं, जो कथन का उलटा है। चुकंदर का रंग बीटालेनों (बीटानिन) से है, और बीटालेन व एंथोसायनिन एक ही पौधे में कभी नहीं मिलते।
  14. संतरे के छिलके के तेल का मुख्य घटक लिमोनीन सबसे उपयुक्त रूप से किस वर्ग में आता है?

    1. दो आइसोप्रीन इकाइयों से बना मोनोटर्पीन हाइड्रोकार्बन
    2. तीन आइसोप्रीन इकाइयों से बना सेस्क्विटर्पीन कीटोन
    3. C10 ऐल्कोहॉल व ऐसीटिक अम्ल से बना फल-गंधी एस्टर
    4. स्ट्रेकर निम्नीकरण से बना फ़ीनॉलिक ऐल्डिहाइड
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — दो आइसोप्रीन इकाइयों से बना मोनोटर्पीन हाइड्रोकार्बन

    लिमोनीन, C₁₀H₁₆, एक चक्रीय मोनोटर्पीन है: दो C5 आइसोप्रीन इकाइयाँ और ऑक्सीजन नहीं। सेस्क्विटर्पीनों में 15 कार्बन होते हैं; ग्रेपफ़्रूट का नूटकाटोन सेस्क्विटर्पीन कीटोन है, जो खट्टे फल की सुगंध के कारण भ्रम पैदा करता है। आइसोएमिल ऐसीटेट जैसे एस्टर फल-सी सुगंध देते हैं, और स्ट्रेकर ऐल्डिहाइड तापन के दौरान अमीनो अम्लों से बनते हैं।
  15. हिमीकरण से पहले सब्ज़ियों की पर्याप्त ब्लांचिंग के सूचक के रूप में सबसे सामान्यतः कौन-सा एंज़ाइम प्रयुक्त होता है?

    1. क्षारीय फ़ॉस्फ़ेटेज़, क्योंकि वह पादप ऊतक का सबसे ताप-स्थायी एंज़ाइम है
    2. पेरॉक्सिडेज़, क्योंकि वह सब्ज़ियों के सबसे ताप-स्थायी एंज़ाइमों में से एक है
    3. पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सीडेज़, क्योंकि हिमीकृत सब्ज़ियों में केवल वही सक्रिय रहता है
    4. इनवर्टेज़, क्योंकि हिमीकृत सब्ज़ियों में फ़्लेवर-हानि का वही मुख्य कारण है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — पेरॉक्सिडेज़, क्योंकि वह सब्ज़ियों के सबसे ताप-स्थायी एंज़ाइमों में से एक है

    पेरॉक्सिडेज़ सब्ज़ियों के सबसे ताप-प्रतिरोधी एंज़ाइमों में से एक है और उसकी जाँच आसान है (ग्वायकॉल व H₂O₂ के साथ रंग), अतः उसका नष्ट होना दर्शाता है कि कम स्थायी एंज़ाइम भी नष्ट हो चुके हैं; मटर व फलियों हेतु कभी-कभी दुर्गंध का कारण लाइपॉक्सीजिनेज़ लिया जाता है। क्षारीय फ़ॉस्फ़ेटेज़ दूध-पाश्चरीकरण का सूचक है, इसीलिए वह भ्रामक विकल्प है। हिमीकृत सब्ज़ियों में पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सीडेज़ अकेला सक्रिय एंज़ाइम नहीं, और इनवर्टेज़ ब्लांचिंग का सूचक नहीं है।
  16. एक एंज़ाइम Km = 2.0 mM व Vmax = 120 µmol min⁻¹ के साथ मिकाएलिस–मेंटेन बलगतिकी का पालन करता है। उसकी परख [S] = 3.0 mM पर एक प्रतिस्पर्धी संदमक की उपस्थिति में की जाती है, जिसकी [I] = 4.0 µM व Ki = 2.0 µM है। उसी [S] पर असंदमित दर की तुलना में दर का प्रतिशत संदमन, एक दशमलव स्थान तक, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 44.4

    असंदमित: v₀ = 120 × 3.0 ÷ (2.0 + 3.0) = 72.0। प्रतिस्पर्धी संदमन Km को (1 + [I]/Ki) = 1 + 4.0/2.0 = 3 से गुणा करता है, अतः आभासी Km = 6.0 mM और vᵢ = 120 × 3.0 ÷ (6.0 + 3.0) = 40.0। संदमन = (72.0 − 40.0) ÷ 72.0 × 100 = 44.4 %। इसे अस्पर्धी मानने पर (Vmax ÷ 3) 66.7 % आता।
  17. फुहार-सुखाई अंडे की सफ़ेदी भंडारण में भूरी होकर विलेयता खो देती है, पर सुखाने से पहले ग्लूकोज़ ऑक्सीडेज़ व कैटालेज़ से उपचारित सफ़ेदी नहीं। कौन-सा भूरापन हो रहा था?

    1. एंज़ाइमी भूरापन, जिसमें पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सीडेज़ अंडा-प्रोटीनों के टायरोसीन अवशेषों को ऑक्सीकृत करता है
    2. अल्प मुक्त ग्लूकोज़ व प्रोटीनों के अमीनो समूहों के बीच मैलार्ड भूरापन
    3. मुक्त ग्लूकोज़ का कैरामलीकरण, जिसे ग्लूकोज़ ऑक्सीडेज़ सुखाने का ताप घटाकर रोकता है
    4. ऐस्कॉर्बिक अम्ल भूरापन, क्योंकि ग्लूकोज़ ऑक्सीडेज़ विटामिन C को नष्ट करने वाली ऑक्सीजन हटाता है
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    उत्तर: B — अल्प मुक्त ग्लूकोज़ व प्रोटीनों के अमीनो समूहों के बीच मैलार्ड भूरापन

    अंडे की सफ़ेदी में थोड़ा मुक्त ग्लूकोज़, एक अपचायी शर्करा, होता है जो चूर्ण की निम्न जल सक्रियता पर प्रोटीन के अमीनो समूहों से अभिक्रिया करता है: मैलार्ड भूरापन, विलेयता-हानि सहित। ग्लूकोज़ ऑक्सीडेज़ ग्लूकोज़ को ग्लूकोनिक अम्ल में बदल देता है (कैटालेज़ H₂O₂ हटाता है), अतः अभिक्रिया को शर्करा नहीं मिलती। सफ़ेदी में पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सीडेज़ हेतु फ़ीनॉलिक सब्सट्रेट का भंडार नहीं है, कैरामलीकरण को भंडारण से कहीं अधिक ताप चाहिए, और सफ़ेदी में विटामिन C होता ही नहीं।
  18. ताज़ा कटी सेब की फाँकों को कुछ घंटों तक भूरा होने से बचाना है। निम्नलिखित में से कौन-से उपाय भूरापन धीमा करेंगे?

    1. फाँकों को ऐस्कॉर्बिक अम्ल विलयन में डुबोना, जो o-क्विनोनों को वापस डाइफ़ीनॉलों में अपचयित करता है
    2. सिट्रिक अम्ल से डुबोने वाले विलयन का pH लगभग 3 तक घटाना
    3. ऑक्सीजन से संपर्क सीमित करने हेतु फाँकों को शर्करा-सिरप में डुबोए रखना
    4. एंज़ाइम को उसकी धातु से संतृप्त करने हेतु विलयन में थोड़ा कॉपर सल्फ़ेट मिलाना
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    उत्तर: A — फाँकों को ऐस्कॉर्बिक अम्ल विलयन में डुबोना, जो o-क्विनोनों को वापस डाइफ़ीनॉलों में अपचयित करता है; B — सिट्रिक अम्ल से डुबोने वाले विलयन का pH लगभग 3 तक घटाना; C — ऑक्सीजन से संपर्क सीमित करने हेतु फाँकों को शर्करा-सिरप में डुबोए रखना

    पॉलीफ़ीनॉल ऑक्सीडेज़ को O₂, फ़ीनॉलिक सब्सट्रेट व उसका ताम्र-केंद्र चाहिए, और वह pH 5 से 7 के पास सबसे अच्छा काम करता है। ऐस्कॉर्बिक अम्ल क्विनोनों को बहुलकित होने से पहले अपचयित करता है (स्वयं समाप्त होने तक), सिट्रिक अम्ल pH को इष्टतम से नीचे ले जाता है व ताँबे को कीलेट करता है, और सिरप ऑक्सीजन सीमित करता है। Cu²⁺ मिलाने से एंज़ाइम निष्क्रिय नहीं होता; ताम्र आयन उलटे ऑक्सीकरण व भूरेपन को बढ़ावा देते हैं।