सूक्ष्मजीवी उपापचय: ऊर्जिकी, केंद्रीय पथ, श्वसन व किण्वन, रसायन-अश्मपोषण, प्रकाश-संश्लेषण, जैवसंश्लेषण व नियमन

यह अध्याय XL3 सूक्ष्मजीव विज्ञान के खंड XL3.6, “सूक्ष्मजीवी उपापचय” का उत्तर है, जो जीवन विज्ञान (XL) पेपर के पाँच वैकल्पिक खंडों में से एक है: “ऊर्जिकी: रेडॉक्स अभिक्रियाएँ व इलेक्ट्रॉन वाहक; इलेक्ट्रॉन परिवहन व ऑक्सीकारी फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण; उपापचय का अवलोकन; ग्लाइकोलिसिस; पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ; एंटनर-डूडोरॉफ़ पथ; ग्लाइऑक्सिलेट पथ; सिट्रिक अम्ल चक्र; किण्वन; वायवीय व अवायवीय श्वसन; रसायन-अश्मपोषण (chemolithotrophy); प्रकाश-संश्लेषण; केल्विन चक्र; वसा-अम्ल संश्लेषण का जैवसंश्लेषी पथ; अमीनो अम्ल संश्लेषण की सामान्य नियामक क्रियाविधियाँ; प्रमुख उपापचयी पथों का नियमन।” यह पथों को सूक्ष्मजीव की दृष्टि से सिखाता है: रेडॉक्स विभव उपलब्ध ऊर्जा कैसे तय करते हैं, जीवाणु ग्लाइकोलिसिस, पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट व एंटनर–डूडोरॉफ़ मार्गों में से कैसे चुनते हैं, ग्लाइऑक्सिलेट उपमार्ग उन्हें ऐसीटेट पर कैसे जीने देता है, श्वसन, किण्वन, रसायन-अश्मपोषण व प्रकाशपोषण कैसे भिन्न हैं, और जैवसंश्लेषण कैसे नियंत्रित होता है। संख्यात्मक प्रश्न ΔE°′ से ΔG°′, घोषित P/O परिपाटी पर ATP लब्धि, तथा केल्विन चक्र व वसा-अम्ल संश्लेषण की सहकारक-लागत पर हैं।

1. ऊर्जिकी, रेडॉक्स अभिक्रियाएँ और इलेक्ट्रॉन वाहक

उपापचय अपचय है, जो ऊर्जा व अपचायक क्षमता मुक्त करता है, तथा उपचय, जो उन्हें व्यय करता है। केंद्रीय (उभयचयी) पथ दोनों की सेवा करते हैं: ग्लाइकोलिसिस, पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ और सिट्रिक अम्ल चक्र लगभग एक दर्जन पूर्ववर्ती उपापचयज (ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट, राइबोज़-5-फ़ॉस्फ़ेट, एरिथ्रोज़-4-फ़ॉस्फ़ेट, 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट, फ़ॉस्फ़ोइनॉलपाइरुवेट, पाइरुवेट, ऐसीटिल-CoA, 2-ऑक्सोग्लूटेरेट, ऑक्सैलोऐसीटेट व कुछ अन्य) देते हैं जिनसे प्रत्येक एकलक बनता है। सूक्ष्मजीव अपने ऊर्जा स्रोत (प्रकाश या रसायन), इलेक्ट्रॉन दाता (कार्बनिक या अकार्बनिक) व कार्बन स्रोत (कार्बनिक या CO₂) में भिन्न होते हैं, जिससे रसायन-कार्बनिक-परपोषी व प्रकाश-अश्म-स्वपोषी जैसी श्रेणियाँ बनती हैं।

प्रत्येक ऊर्जा-दायी अभिक्रिया एक रेडॉक्स युग्म है: अधिक ऋणात्मक मानक अपचयन विभव (E°′) वाला दाता अधिक धनात्मक विभव वाले ग्राही को इलेक्ट्रॉन देता है, और ΔG°′ = −nFΔE°′, जहाँ ΔE°′ = E°′(ग्राही) − E°′(दाता), n इलेक्ट्रॉनों की संख्या और F = 96.485 kJ V⁻¹ mol⁻¹ है। हल किया उदाहरण: NADH (NAD⁺/NADH का E°′ = −0.32 V) से O₂ (O₂/H₂O = +0.82 V): ΔE°′ = 1.14 V और ΔG°′ = −2 × 96.485 × 1.14 = −220 kJ mol⁻¹। इस रेडॉक्स मीनार पर दाता व ग्राही जितने दूर हों, ऊर्जा उतनी अधिक, इसीलिए O₂ से श्वसन सल्फ़ेट से श्वसन से बेहतर है।

इलेक्ट्रॉन वाहक या तो मुक्त विसरणशील सहएंज़ाइम हैं, NAD⁺ (अपचयी) व NADP⁺ (जैवसंश्लेषी), जिनमें प्रत्येक हाइड्राइड के रूप में दो इलेक्ट्रॉन व एक प्रोटॉन ढोता है, या झिल्ली-बद्ध: फ़्लेवोप्रोटीन (FMN, FAD; 2e⁻ + 2H⁺), आयरन–सल्फ़र प्रोटीन (1e⁻), क्विनोन (लिपिड-विलेय, 2e⁻ + 2H⁺: वायवीय E. coli में यूबिक्विनोन, अवायवीय में मेनाक्विनोन) और साइटोक्रोम (हीम लौह, 1e⁻)। झिल्ली में H-वाहकों व शुद्ध e⁻-वाहकों का बारी-बारी आना ही प्रोटॉन खिसकाता है। स्वयं ATP सब्सट्रेट-स्तरीय फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण (1,3-बिसफ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट या फ़ॉस्फ़ोइनॉलपाइरुवेट जैसे उच्च-ऊर्जा मध्यवर्ती से), ऑक्सीकारी फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण या प्रकाश-फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से बनता है।

2. ग्लाइकोलिसिस, पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ और एंटनर–डूडोरॉफ़ पथ

अनेक जीवाणुओं में ग्लूकोज़ फ़ॉस्फ़ोट्रांसफ़रेज़ तंत्र (PTS) से प्रवेश करता है, जो ATP के बजाय फ़ॉस्फ़ोइनॉलपाइरुवेट से अंतर्ग्रहण के दौरान ही उसे फ़ॉस्फ़ोरिलीकृत करता है। फिर ग्लाइकोलिसिस (एम्बडेन–मेयरहॉफ़–पारनास पथ) फ़्रक्टोज़-1,6-बिसफ़ॉस्फ़ेट (फ़ॉस्फ़ोफ़्रक्टोकाइनेज़ द्वारा निर्मित, प्रमुख नियंत्रण बिंदु) को दो ट्रायोज़ में तोड़ता है और प्रति ग्लूकोज़ 2 पाइरुवेट, शुद्ध 2 ATP व 2 NADH देता है। पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट का (ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट डिहाइड्रोजिनेज़, फिर 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट डिहाइड्रोजिनेज़ द्वारा) राइबुलोज़-5-फ़ॉस्फ़ेट + CO₂ में ऑक्सीकरण कर 2 NADPH बनाता है; इसकी अऑक्सीकारी शाखा (ट्रांसकीटोलेज़, ट्रांसऐल्डोलेज़) शर्कराओं का परस्पर रूपांतरण कर न्यूक्लियोटाइडों हेतु राइबोज़-5-फ़ॉस्फ़ेट और ऐरोमैटिक अमीनो अम्लों हेतु एरिथ्रोज़-4-फ़ॉस्फ़ेट देती है। Pseudomonas, Zymomonas व अनेक अन्य ग्राम-ऋणात्मकों द्वारा प्रयुक्त एंटनर–डूडोरॉफ़ (ED) पथ 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट का निर्जलीकरण कर 2-कीटो-3-डीऑक्सी-6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट (KDPG) बनाता है और उसे पाइरुवेट + ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट में विदलित करता है।

ग्लूकोज़ विघटन के तीन मार्गों की तुलना (प्रति ग्लूकोज़)
पथप्रमुख एंज़ाइमशुद्ध लब्धिमुख्य भूमिका
ग्लाइकोलिसिस (EMP)फ़ॉस्फ़ोफ़्रक्टोकाइनेज़, फ़्रक्टोज़-बिसफ़ॉस्फ़ेट ऐल्डोलेज़2 ATP, 2 NADH, 2 पाइरुवेटऊर्जा व पूर्ववर्ती
एंटनर–डूडोरॉफ़6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट डिहाइड्रेटेज़, KDPG ऐल्डोलेज़1 ATP, 1 NADH, 1 NADPH, 2 पाइरुवेटफ़ॉस्फ़ोफ़्रक्टोकाइनेज़-रहित जीवों में ऊर्जा; शर्करा-अम्ल
पेंटोज़ फ़ॉस्फ़ेट (ऑक्सीकारी शाखा)ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट डिहाइड्रोजिनेज़, 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट डिहाइड्रोजिनेज़प्रति ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट 2 NADPH व 1 CO₂NADPH, पेंटोज़, टेट्रोज़
⚠️ परीक्षा जाल
ED ग्लाइकोलिसिस का केवल आधा ATP देता है क्योंकि उसके दो उत्पादों में से केवल एक (ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट) ATP-निर्माता ट्रायोज़ चरणों से गुज़रता है; दूसरा सीधे पाइरुवेट होता है। ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट डिहाइड्रोजिनेज़ व 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ के साथ साझे हैं, अतः केवल डिहाइड्रेटेज़ व KDPG ऐल्डोलेज़ ही ED की पहचान हैं।

3. सिट्रिक अम्ल चक्र और ग्लाइऑक्सिलेट पथ

पाइरुवेट डिहाइड्रोजिनेज़ पाइरुवेट को ऐसीटिल-CoA + CO₂ + NADH में बदलता है। सिट्रिक अम्ल चक्र में ऐसीटिल-CoA ऑक्सैलोऐसीटेट से जुड़ता है (सिट्रेट सिंथेज़); दो विकार्बोक्सिलन (आइसोसिट्रेट डिहाइड्रोजिनेज़, 2-ऑक्सोग्लूटेरेट डिहाइड्रोजिनेज़) 2 CO₂ मुक्त करते हैं, और प्रत्येक चक्कर 3 NADH, 1 FADH₂ (अपचित क्विनोन के रूप में, सक्सिनेट डिहाइड्रोजिनेज़ द्वारा, जो झिल्ली में स्थित है) व 1 ATP या GTP (सक्सिनिल-CoA सिंथेटेज़) देता है। चक्र जैवसंश्लेषण को भी पोषित करता है, अतः अमीनो अम्लों हेतु निकाले गए मध्यवर्तियों की पूर्ति PEP कार्बोक्सिलेज़ या पाइरुवेट कार्बोक्सिलेज़ जैसी पूरक (anaplerotic) अभिक्रियाओं से होती है।

ऐसीटेट या वसा-अम्लों पर बढ़ती कोशिका के सामने समस्या है: चक्र में प्रवेश करने वाला प्रत्येक ऐसीटिल-CoA दो कार्बन CO₂ के रूप में खो देता है, अतः शर्करा या अमीनो अम्ल बनाने हेतु ऑक्सैलोऐसीटेट का कोई शुद्ध लाभ नहीं होता। ग्लाइऑक्सिलेट पथ इसे दो एंज़ाइमों से हल करता है: आइसोसिट्रेट लायेज़ आइसोसिट्रेट को सक्सिनेट + ग्लाइऑक्सिलेट में तोड़ता है, और मैलेट सिंथेज़ ग्लाइऑक्सिलेट को दूसरे ऐसीटिल-CoA से जोड़कर मैलेट देता है। दोनों विकार्बोक्सिलन लाँघ दिए जाते हैं, और शुद्ध 2 ऐसीटिल-CoA → 1 C₄ यौगिक (सक्सिनेट), जो ग्लूकोनियोजेनेसिस को पोषित करता है। E. coli में शाखा-बिंदु फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से नियंत्रित है: ऐसीटेट पर एक काइनेज़ (AceK) आइसोसिट्रेट डिहाइड्रोजिनेज़ को निष्क्रिय कर आइसोसिट्रेट को उपमार्ग में मोड़ देता है।

4. इलेक्ट्रॉन परिवहन, ऑक्सीकारी फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण, तथा वायवीय व अवायवीय श्वसन

जीवाणुओं में माइटोकॉन्ड्रिया नहीं होते: शृंखला कोशिकाद्रव्यी झिल्ली में स्थित है और प्रोटॉन बाहर परिद्रव्य (periplasm) में पंप करती है। E. coli में NADH डिहाइड्रोजिनेज़ I प्रोटॉन पंप करता है और NADH डिहाइड्रोजिनेज़ II नहीं; इलेक्ट्रॉन क्विनोन भंडार से होकर किसी अंतिम ऑक्सीडेज़ तक जाते हैं, या तो साइटोक्रोम bo₃ (कम O₂ बंधुता, प्रोटॉन पंप करता है, O₂ प्रचुर होने पर प्रयुक्त) या साइटोक्रोम bd (उच्च O₂ बंधुता, पंपन नहीं, कम O₂ पर प्रयुक्त)। इस प्रकार शृंखलाएँ शाखित व मॉड्यूलर होती हैं, और ATP लब्धि इस पर निर्भर है कि कौन-सी शाखाएँ प्रयोग में हैं। मिशेल के रसोपरासरणी सिद्धांत के अनुसार प्रोटॉन प्रेरक बल (झिल्ली विभव, भीतर ऋणात्मक, तथा pH प्रवणता, भीतर क्षारीय) प्रोटॉनों को F₀F₁ ATP सिंथेज़ से वापस भीतर धकेलता है; यही बल कशाभिका-घूर्णन व अनेक परिवाहकों को भी चलाता है। डाइनाइट्रोफ़ीनॉल जैसे अयुग्मक प्रोटॉनों को झिल्ली के पार ले जाते हैं, अतः इलेक्ट्रॉन परिवहन व O₂ उपभोग चलते रहते हैं जबकि ATP संश्लेषण रुक जाता है।

प्रति ग्लूकोज़ ATP लब्धि परिपाटी पर निर्भर है। प्रति NADH 2.5 ATP व प्रति FADH₂ 1.5 लेने पर, ग्लाइकोलिसिस व चक्र द्वारा वायवीय ऑक्सीकरण सब्सट्रेट-स्तरीय फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से 4 ATP (2 ग्लाइकोलिसिस में, 2 चक्र में) + 10 NADH × 2.5 + 2 FADH₂ × 1.5 = 32 ATP देता है; पुराने 3 व 2 से यह 38 है। जीवाणुओं को माइटोकॉन्ड्रियाई शटल का मूल्य नहीं चुकाना पड़ता, पर उनकी वास्तविक लब्धि प्रायः कम होती है और प्रयुक्त शृंखला-शाखाओं के साथ बदलती है। ग्लाइकोलिसिस के बजाय ED से ग्लूकोज़ एक ATP कम देता है।

अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही (ग्राही युग्म का लगभग E°′)
ग्राही → उत्पादE°′ (V)प्रक्रिया व उदाहरण जीव
O₂ → H₂O+0.82वायवीय श्वसन; वायुजीवी व विकल्पी अवायुजीवी
NO₃⁻ → NO₂⁻ → NO → N₂O → N₂+0.42 (NO₃⁻/NO₂⁻)नाइट्रेट श्वसन व विनाइट्रीकरण; Pseudomonas, Paracoccus
फ़्यूमेरेट → सक्सिनेट+0.03फ़्यूमेरेट श्वसन; अवायवीय E. coli
SO₄²⁻ → H₂S−0.22ATP से सल्फ़ेट के APS में सक्रियण के बाद सल्फ़ेट अपचयन; Desulfovibrio
CO₂ → CH₄−0.24आर्किया द्वारा मेथेनजनन, प्रायः H₂ दाता के साथ

अवायवीय श्वसन में भी झिल्ली शृंखला व ATP सिंथेज़ प्रयुक्त होते हैं, पर O₂ के अतिरिक्त किसी अन्य ग्राही के साथ; चूँकि इन ग्राहियों के विभव कम धनात्मक हैं, कम ऊर्जा मुक्त होती है। विकल्पी E. coli सर्वोत्तम उपलब्ध ग्राही प्रयोग करता है, नाइट्रेट से पहले O₂ और फ़्यूमेरेट से पहले नाइट्रेट, और ऑक्सीजन-संवेदी नियामकों FNR व ArcB–ArcA तथा नाइट्रेट-संवेदी NarX–NarL तंत्र से स्विच करता है।

5. किण्वन

किण्वन बिना बाहरी इलेक्ट्रॉन ग्राही का ऊर्जा उपापचय है: ग्लाइकोलिसिस में बना NADH पाइरुवेट या उससे व्युत्पन्न यौगिक को अपचित करके पुनः ऑक्सीकृत होता है, और ATP लगभग पूर्णतः सब्सट्रेट-स्तरीय फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से आता है। अतः लब्धि कम होती है (सामान्य प्रकारों में प्रति ग्लूकोज़ 1–2 ATP) और उत्पाद आंशिक अपचित यौगिक होते हैं जो भारी मात्रा में उत्सर्जित होते हैं, इसीलिए किण्वन निदान व उद्योग दोनों में उपयोगी हैं।

ग्लूकोज़ के प्रमुख सूक्ष्मजीवी किण्वन
प्रकारउत्पाद व प्रति ग्लूकोज़ ATPजीव व टिप्पणी
समलैक्टिक2 लैक्टेट; 2 ATP (ग्लाइकोलिसिस)Lactococcus, Streptococcus, अनेक Lactobacillus; दही
विषमलैक्टिकलैक्टेट + एथेनॉल + CO₂; 1 ATP (फ़ॉस्फ़ोकीटोलेज़ पथ)Leuconostoc, कुछ Lactobacillus
ऐल्कोहॉली2 एथेनॉल + 2 CO₂ (पाइरुवेट डीकार्बोक्सिलेज़, ऐल्कोहॉल डिहाइड्रोजिनेज़)Saccharomyces ग्लाइकोलिसिस से, 2 ATP; Zymomonas ED से, 1 ATP
मिश्रित अम्ललैक्टेट, ऐसीटेट, सक्सिनेट, एथेनॉल, फ़ॉर्मेट (फ़ॉर्मेट हाइड्रोजनलायेज़ द्वारा H₂ + CO₂ में विभक्त)E. coli, Salmonella; प्रबल अम्ल, मेथिल रेड धनात्मक
ब्यूटेनडाइऑलऐसीटोइन के माध्यम से 2,3-ब्यूटेनडाइऑल, कम अम्ल के साथEnterobacter, Serratia; वोगेस–प्रोस्काउर धनात्मक (ऐसीटोइन की पहचान)
ब्यूटिरिक, ऐसीटोन–ब्यूटेनॉलब्यूटिरेट, ब्यूटेनॉल, ऐसीटोन, H₂, CO₂Clostridium
प्रोपियोनिकप्रोपियोनेट, ऐसीटेट, CO₂Propionibacterium; CO₂ स्विस चीज़ के छिद्र बनाता है
⚠️ परीक्षा जाल
किण्वन को अवायवीय श्वसन से न मिलाएँ। दोनों O₂ के बिना चलते हैं, पर अवायवीय श्वसन बाहरी अकार्बनिक (या कार्बनिक) ग्राही व झिल्ली शृंखला प्रयोग करता है और अधिक ATP देता है; किण्वन आंतरिक कार्बनिक ग्राही प्रयोग करता है और कोई शृंखला नहीं।

6. रसायन-अश्मपोषण (chemolithotrophy)

रसायन-अश्मपोषी अकार्बनिक दाताओं का ऑक्सीकरण करते हैं और इलेक्ट्रॉन, प्रायः O₂ तक, झिल्ली शृंखला से पहुँचाते हैं; अधिकांश स्वपोषी भी हैं जो केल्विन चक्र से CO₂ स्थिर करते हैं। उदाहरण: हाइड्रोजन जीवाणु (H₂ → H⁺; Cupriavidus necator, पूर्व नाम Ralstonia eutropha); सल्फ़र ऑक्सीकारक (H₂S, S⁰, थायोसल्फ़ेट → सल्फ़ेट; Thiobacillus, Acidithiobacillus, Beggiatoa); लौह ऑक्सीकारक (लगभग pH 2 पर Fe²⁺ → Fe³⁺; Acidithiobacillus ferrooxidans, जैव-निक्षालन व अम्लीय खदान-अपवाह में महत्त्वपूर्ण); और नाइट्रीकारक, Nitrosomonas (NH₃ → NO₂⁻, अमोनिया मोनोऑक्सीजिनेज़ से आरंभ) तथा Nitrobacter (NO₂⁻ → NO₃⁻, नाइट्राइट ऑक्सीडोरिडक्टेज़)। ऐनामॉक्स जीवाणु एक झिल्ली-कक्ष, ऐनामॉक्सोसोम, के भीतर अवायवीय रूप से NH₄⁺ का NO₂⁻ से N₂ में ऑक्सीकरण करते हैं।

रेडॉक्स मीनार से दो परिणाम निकलते हैं। पहला, नाइट्राइट (NO₃⁻/NO₂⁻ लगभग +0.42 V) या Fe²⁺ जैसे दाता O₂ के निकट स्थित हैं, अतः प्रति इलेक्ट्रॉन कम ऊर्जा मुक्त होती है और इन जीवों को प्रति ग्राम कोशिका भारी मात्रा में सब्सट्रेट ऑक्सीकृत करना पड़ता है। दूसरा, इनके इलेक्ट्रॉन NAD⁺ (−0.32 V) को अपचित करने के लिए अत्यधिक धनात्मक हैं, अतः वे CO₂ स्थिरीकरण हेतु NADH प्रतिलोम इलेक्ट्रॉन परिवहन से बनाते हैं, प्रोटॉन प्रेरक बल व्यय करके इलेक्ट्रॉनों को ऊपर की ओर धकेलते हैं। हाइड्रोजन (2H⁺/H₂ = −0.42 V) अपवाद है: एक विलेय हाइड्रोजिनेज़ NAD⁺ को सीधे अपचित कर सकता है।

7. सूक्ष्मजीवी प्रकाश-संश्लेषण और केल्विन चक्र

प्रकाशपोषी जीवाणुओं के समूह
समूहवर्णक व अभिक्रिया केंद्रइलेक्ट्रॉन दाता; O₂ उत्सर्जन?CO₂ स्थिरीकरण
सायनोबैक्टीरियाक्लोरोफ़िल a; प्रकाशतंत्र I व IIH₂O; हाँ (ऑक्सीजनी)केल्विन चक्र (कार्बोक्सिसोम)
बैंगनी सल्फ़र (Chromatium)बैक्टीरियोक्लोरोफ़िल a या b; क्विनोन-प्रकार केंद्रH₂S, S⁰ (सल्फ़र कोशिका के भीतर संचित); नहींकेल्विन चक्र
बैंगनी असल्फ़र (Rhodobacter)बैक्टीरियोक्लोरोफ़िल a या b; क्विनोन-प्रकार केंद्रH₂ या कार्बनिक यौगिक, प्रायः प्रकाश-परपोषी; नहींकेल्विन चक्र
हरित सल्फ़र (Chlorobium)क्लोरोसोम में बैक्टीरियोक्लोरोफ़िल c, d, e; आयरन–सल्फ़र-प्रकार केंद्रH₂S, S⁰ (सल्फ़र कोशिका के बाहर जमा); नहींप्रतिलोम सिट्रिक अम्ल चक्र
तंतुमय अनॉक्सीजनी (Chloroflexus)क्लोरोसोम व बैक्टीरियोक्लोरोफ़िल a; क्विनोन-प्रकार केंद्रकार्बनिक यौगिक या H₂S; नहीं3-हाइड्रॉक्सीप्रोपियोनेट पथ
हीलियोबैक्टीरियाबैक्टीरियोक्लोरोफ़िल g; आयरन–सल्फ़र-प्रकार केंद्रकार्बनिक यौगिक; नहींकोई नहीं (प्रकाश-परपोषी)

अनॉक्सीजनी प्रकाशपोषियों में एक ही प्रकाशतंत्र होता है और वे जल नहीं तोड़ सकते। क्विनोन-प्रकार केंद्र वाले (बैंगनी जीवाणु) प्रोटॉन प्रेरक बल हेतु चक्रीय इलेक्ट्रॉन प्रवाह चलाते हैं और NAD(P)H बनाने हेतु प्रतिलोम इलेक्ट्रॉन परिवहन प्रयोग करना पड़ता है; आयरन–सल्फ़र-प्रकार केंद्र वाले (हरित सल्फ़र जीवाणु, हीलियोबैक्टीरिया) फ़ेरेडॉक्सिन को सीधे अपचित करते हैं। Halobacterium बैक्टीरियोरोडॉप्सिन, रेटिनल-युक्त प्रोटॉन पंप, से बिना क्लोरोफ़िल या इलेक्ट्रॉन परिवहन के प्रकाश से ATP बनाता है।

केल्विन चक्र के तीन चरण हैं। कार्बोक्सिलन: RuBisCO राइबुलोज़-1,5-बिसफ़ॉस्फ़ेट में CO₂ जोड़कर दो 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट देता है। अपचयन: 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट फ़ॉस्फ़ोरिलीकृत व अपचित होकर ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट बनता है। पुनर्जनन: शर्करा पुनर्व्यवस्थाएँ व फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ राइबुलोज़-1,5-बिसफ़ॉस्फ़ेट पुनः बनाते हैं। प्रति CO₂ लागत 3 ATP व 2 NADPH है; एक शुद्ध ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट (3 CO₂) की लागत 9 ATP व 6 NADPH, और एक हेक्सोज़ की 18 ATP व 12 NADPH। RuBisCO व फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ इस चक्र के विशिष्ट एंज़ाइम हैं, और सायनोबैक्टीरिया व अनेक रसायन-अश्मपोषी CO₂ सांद्रित करने हेतु RuBisCO को कार्बोनिक एनहाइड्रेज़ के साथ कार्बोक्सिसोम में बाँधते हैं।

8. वसा-अम्ल संश्लेषण

प्रतिबद्ध चरण ऐसीटिल-CoA कार्बोक्सिलेज़ है, एक बायोटिन एंज़ाइम: ऐसीटिल-CoA + HCO₃⁻ + ATP → मैलोनिल-CoA। फिर जीवाणु प्रकार II (विलग) सिंथेज़ प्रयोग करते हैं, अर्थात ऐसिल वाहक प्रोटीन (ACP) से जुड़े सब्सट्रेटों पर कार्य करने वाले अलग-अलग एंज़ाइम; यीस्ट व जंतु प्रकार I बहुकार्यी सिंथेज़ प्रयोग करते हैं। प्रत्येक दीर्घीकरण चक्र के चार चरण हैं: ऐसिल शृंखला का मैलोनिल-ACP से संघनन (CO₂ मुक्त होता है, जो अभिक्रिया को आगे धकेलता है), 3-कीटोऐसिल समूह का अपचयन, निर्जलीकरण, और इनॉयल समूह का अपचयन (इनॉयल-ACP रिडक्टेज़, FabI)। प्रत्येक चक्र दो कार्बन जोड़ता है और दो अपचित निकोटिनामाइड सहकारक प्रयोग करता है। पामिटेट (C16) हेतु 1 ऐसीटिल-CoA + 7 मैलोनिल-CoA चाहिए, अतः 7 चक्र, 7 ATP व 14 NAD(P)H।

E. coli बिना O₂ के असंतृप्त वसा-अम्ल बनाता है: C10 चरण पर डिहाइड्रेटेज़–आइसोमरेज़ FabA ट्रांस-2-डेसीनॉयल-ACP को सिस-3-डेसीनॉयल-ACP में बदलता है, जिसे इनॉयल रिडक्टेज़ अपचित नहीं कर सकता; संघनक एंज़ाइम FabB उसे लंबा करता है, अतः सिस द्विबंध पामिटोलिएट व सिस-वैक्सीनेट तक पहुँचता है और एक इनॉयल अपचयन छूट जाता है। चूँकि FabI अनिवार्य है, यह औषधि-लक्ष्य है: ट्राइक्लोसान इसे संदमित करता है, और आइसोनियाज़िड संगत माइकोबैक्टीरियाई एंज़ाइम InhA को।

9. अमीनो अम्ल संश्लेषण और प्रमुख पथों का नियमन

जैवसंश्लेषी पथ दो स्तरों पर नियंत्रित होते हैं। एंज़ाइम सक्रियता सेकंडों में प्रतिक्रिया करती है: पुनर्भरण (अंत्य-उत्पाद) संदमन में अंत्य उत्पाद पहले प्रतिबद्ध एंज़ाइम के अपरस्थानिक स्थल से बंधता है (आइसोल्यूसीन अपनी शाखा के पहले एंज़ाइम, थ्रियोनीन डीऐमिनेज़, को संदमित करता है)। जीन अभिव्यक्ति धीमे प्रतिक्रिया करती है: अंत्य उत्पाद सह-दमनकारी के रूप में कार्य करता है (ट्रिप्टोफ़ैन Trp दमनकारी को सक्रिय करता है) या क्षीणन (attenuation) नियंत्रित करता है। शाखित पथों को सूक्ष्मतर प्रतिरूप चाहिए, जो नीचे सूचीबद्ध हैं।

  • समएंज़ाइम (isoenzymes): एक ही चरण हेतु अलग-अलग एंज़ाइम, प्रत्येक भिन्न अंत्य उत्पाद से संदमित। E. coli में तीन ऐस्पार्टोकाइनेज़ (थ्रियोनीन या लाइसीन से संदमित, या मेथियोनीन से दमित) और तीन DAHP सिंथेज़ (क्रमशः फ़िनाइलऐलानीन, टायरोसीन व ट्रिप्टोफ़ैन के प्रति संवेदी) हैं, अतः एक उत्पाद की अधिकता कोशिका को अन्य से वंचित नहीं करती।
  • सम्मिलित (बहुसंयोजी) संदमन: साझा पहला एंज़ाइम तभी प्रबल रूप से संदमित होता है जब सभी अंत्य उत्पाद एक साथ अधिक हों।
  • संचयी संदमन: प्रत्येक अंत्य उत्पाद आंशिक संदमन करता है और प्रभाव जुड़ते हैं; E. coli का ग्लूटामीन सिंथेटेज़, जिसका उत्पाद अनेक पथों को पोषित करता है, उत्कृष्ट उदाहरण है (यह उत्क्रमणीय ऐडेनिलिलीकरण से भी नियंत्रित है)।
  • अनुक्रमिक संदमन: प्रत्येक अंत्य उत्पाद अपने शाखा-बिंदु के बाद के पहले एंज़ाइम को संदमित करता है; फिर शाखा-बिंदु मध्यवर्ती जमा होकर साझा पथ के पहले एंज़ाइम को संदमित करता है।

trp ओपेरॉन का क्षीणन। अग्र (leader) प्रतिलेख एक 14-अवशेषी पेप्टाइड कूटबद्ध करता है जिसमें दो सटे ट्रिप्टोफ़ैन कोडॉन हैं, और इसके चार क्षेत्र 1:2, 2:3 या 3:4 युग्मित हो सकते हैं; 3:4 हेयरपिन समापक है। प्रचुर ट्रिप्टोफ़ैन होने पर राइबोसोम अग्र को तेज़ी से अनूदित कर क्षेत्र 2 को ढक लेता है, अतः 3:4 बनता है और प्रतिलेखन रुक जाता है। ट्रिप्टोफ़ैन कम होने पर राइबोसोम क्षेत्र 1 पर Trp कोडॉनों पर अटक जाता है, क्षेत्र 2 क्षेत्र 3 से युग्मित होता है (प्रति-समापक), 3:4 नहीं बन पाता और RNA पॉलिमरेज़ संरचनात्मक जीनों में आगे बढ़ता है। his ओपेरॉन के अग्र में लगातार सात हिस्टिडीन कोडॉन हैं और वह इसी प्रकार कार्य करता है। प्रमुख पथ अपरस्थानिक रूप से भी समायोजित होते हैं (E. coli में फ़ॉस्फ़ोफ़्रक्टोकाइनेज़ ADP से सक्रिय व फ़ॉस्फ़ोइनॉलपाइरुवेट से संदमित होता है), सहसंयोजी रूपांतरण से (ऊपर आइसोसिट्रेट डिहाइड्रोजिनेज़), और वैश्विक रूप से अपचयज दमन से: PTS द्वारा लिया गया ग्लूकोज़ cAMP घटाता है, अतः cAMP–CRP सक्रियक अन्य शर्कराओं के ओपेरॉनों हेतु उपलब्ध नहीं रहता।

मुख्य बिंदु

  • ΔG°′ = −nFΔE°′ जहाँ ΔE°′ = E°′(ग्राही) − E°′(दाता); NADH → O₂ लगभग 220 kJ mol⁻¹ मुक्त करता है। वाहक NAD(P)⁺, फ़्लेविन, Fe–S प्रोटीन, क्विनोन व साइटोक्रोम हैं; ATP सब्सट्रेट-स्तरीय, ऑक्सीकारी या प्रकाश-फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से आता है।
  • ग्लाइकोलिसिस 2 ATP + 2 NADH देता है; ED (6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट डिहाइड्रेटेज़, KDPG ऐल्डोलेज़) 1 ATP + 1 NADH + 1 NADPH देता है; पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ NADPH, राइबोज़-5-फ़ॉस्फ़ेट व एरिथ्रोज़-4-फ़ॉस्फ़ेट देता है। ग्लाइऑक्सिलेट उपमार्ग (आइसोसिट्रेट लायेज़, मैलेट सिंथेज़) ऐसीटेट पर वृद्धि संभव करता है।
  • जीवाणु शृंखलाएँ शाखित हैं और कोशिकाद्रव्यी झिल्ली में स्थित हैं; प्रोटॉन प्रेरक बल ATP सिंथेज़, कशाभिका व परिवहन चलाता है। वायवीय ग्लूकोज़ ऑक्सीकरण 2.5/1.5 पर 32 ATP या 3/2 पर 38 देता है; अवायवीय श्वसन नाइट्रेट, फ़्यूमेरेट, सल्फ़ेट या CO₂ जैसे ग्राही प्रयोग करता है और कम देता है।
  • किण्वन आंतरिक कार्बनिक ग्राही से NAD⁺ पुनर्जनित करता है और ATP केवल सब्सट्रेट-स्तरीय फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से बनाता है; मिश्रित-अम्ल (मेथिल रेड धनात्मक) व ब्यूटेनडाइऑल (वोगेस–प्रोस्काउर धनात्मक) किण्वन आंत्र जीवाणुओं को अलग करते हैं।
  • रसायन-अश्मपोषी H₂, अपचित सल्फ़र, Fe²⁺, NH₃ या NO₂⁻ का ऑक्सीकरण करते हैं; उच्च-विभव दाताओं को NADH बनाने हेतु प्रतिलोम इलेक्ट्रॉन परिवहन चाहिए। अनॉक्सीजनी प्रकाशपोषी एक प्रकाशतंत्र व जल के अतिरिक्त दाता प्रयोग करते हैं; केल्विन चक्र (RuBisCO, फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़) की लागत प्रति CO₂ 3 ATP + 2 NADPH है।
  • प्रकार II वसा-अम्ल संश्लेषण प्रति चक्र मैलोनिल-ACP से दो कार्बन, दो NAD(P)H की लागत पर, जोड़ता है; FabA–FabB अवायवीय रूप से असंतृप्त शृंखलाएँ बनाते हैं। अमीनो अम्ल संश्लेषण पहले प्रतिबद्ध एंज़ाइम के पुनर्भरण संदमन (समएंज़ाइम, सम्मिलित, संचयी व अनुक्रमिक प्रतिरूप), दमन व क्षीणन से नियंत्रित होता है।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. कौन-सा एंज़ाइम युग्म एंटनर–डूडोरॉफ़ पथ का विशिष्ट है और उसे ग्लाइकोलिसिस व पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ दोनों से अलग करता है?

    1. 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट डिहाइड्रेटेज़ व 2-कीटो-3-डीऑक्सी-6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट ऐल्डोलेज़
    2. ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट डिहाइड्रोजिनेज़ व 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट डिहाइड्रोजिनेज़
    3. हेक्सोज़-विदलन चरणों के फ़ॉस्फ़ोफ़्रक्टोकाइनेज़ व फ़्रक्टोज़-1,6-बिसफ़ॉस्फ़ेट ऐल्डोलेज़
    4. उत्क्रमणीय शर्करा-पुनर्व्यवस्था अभिक्रियाओं के ट्रांसकीटोलेज़ व ट्रांसऐल्डोलेज़
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट डिहाइड्रेटेज़ व 2-कीटो-3-डीऑक्सी-6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट ऐल्डोलेज़

    ED 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट का निर्जलीकरण कर KDPG बनाता है और KDPG को पाइरुवेट व ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट में विदलित करता है; इनमें से कोई एंज़ाइम अन्य दो पथों में नहीं है। ग्लूकोज़-6-फ़ॉस्फ़ेट डिहाइड्रोजिनेज़ ED व पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ में साझा है, और 6-फ़ॉस्फ़ोग्लूकोनेट डिहाइड्रोजिनेज़ पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट पथ का है, अतः वह युग्म भ्रामक पर ग़लत विकल्प है। फ़ॉस्फ़ोफ़्रक्टोकाइनेज़ व ऐल्डोलेज़ ग्लाइकोलिसिस को, तथा ट्रांसकीटोलेज़ व ट्रांसऐल्डोलेज़ अऑक्सीकारी पेंटोज़-फ़ॉस्फ़ेट शाखा को परिभाषित करते हैं।
  2. एक E. coli उत्परिवर्ती में आइसोसिट्रेट लायेज़ नहीं है पर वह अन्यथा सामान्य है। किस एकमात्र कार्बन स्रोत पर वह नहीं बढ़ पाएगा?

    1. ग्लूकोज़, क्योंकि पाइरुवेट को ऐसीटिल-CoA में बदलने हेतु आइसोसिट्रेट लायेज़ आवश्यक है
    2. सक्सिनेट, क्योंकि सक्सिनेट केंद्रीय उपापचय में केवल ग्लाइऑक्सिलेट पथ से प्रवेश कर सकता है
    3. ऐसीटेट, क्योंकि उपमार्ग के बिना ऐसीटिल-CoA का प्रत्येक कार्बन CO₂ बनकर निकलता है और कोई ऑक्सैलोऐसीटेट संचित नहीं होता
    4. ग्लिसरॉल, क्योंकि ग्लिसरॉल सिट्रिक अम्ल चक्र में प्रवेश से पहले ग्लाइऑक्सिलेट में ऑक्सीकृत होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — ऐसीटेट, क्योंकि उपमार्ग के बिना ऐसीटिल-CoA का प्रत्येक कार्बन CO₂ बनकर निकलता है और कोई ऑक्सैलोऐसीटेट संचित नहीं होता

    ऐसीटेट पर शुद्ध C₄ यौगिक का एकमात्र मार्ग ग्लाइऑक्सिलेट उपमार्ग है: आइसोसिट्रेट लायेज़ व मैलेट सिंथेज़ दोनों विकार्बोक्सिलन लाँघते हैं। आइसोसिट्रेट लायेज़ के बिना चक्र ऊर्जा हेतु ऐसीटेट ऑक्सीकृत कर सकता है पर ग्लूकोनियोजेनेसिस व अमीनो अम्लों हेतु आवश्यक ऑक्सैलोऐसीटेट नहीं बना सकता। सक्सिनेट स्वयं चक्र मध्यवर्ती है और सीधे ऑक्सैलोऐसीटेट में बदलता है, अतः वह विकल्प ग़लत है; ग्लूकोज़ व ग्लिसरॉल ग्लाइकोलिसिस से प्रवेश करते हैं।
  3. एक Pseudomonas प्रभेद ग्लूकोकाइनेज़ (1 ATP) से ग्लूकोज़ को फ़ॉस्फ़ोरिलीकृत करता है, उसे केवल एंटनर–डूडोरॉफ़ पथ से विघटित करता है और दोनों पाइरुवेट को पाइरुवेट डिहाइड्रोजिनेज़ व सिट्रिक अम्ल चक्र से पूर्णतः ऑक्सीकृत करता है। प्रति NADH 2.5 ATP, प्रत्येक NADPH को एक NADH के तुल्य, प्रति FADH₂ 1.5 ATP, और प्रत्येक सक्सिनिल-CoA सिंथेटेज़ चरण से 1 ATP मानें। प्रति ग्लूकोज़ बने कुल ATP ____ हैं।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 31

    ED: −1 ATP (ग्लूकोकाइनेज़) + 2 ATP (एकमात्र ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट से) = शुद्ध 1 ATP, साथ में 1 NADPH व 1 NADH। पाइरुवेट डिहाइड्रोजिनेज़: 2 NADH। चक्र, दो चक्कर: 6 NADH, 2 FADH₂, 2 ATP। अपचित निकोटिनामाइड = 1 + 1 + 2 + 6 = 10, जो 25 ATP देते हैं; FADH₂ से 3 ATP; सब्सट्रेट-स्तरीय ATP = 1 + 2 = 3। कुल = 25 + 3 + 3 = 31, ग्लाइकोलिसिस मार्ग से मिलने वाले 32 से एक कम।
  4. सक्सिनेट पर बढ़ते एक वायवीय, कशाभिकायुक्त E. coli संवर्धन में एक प्रोटोनोफ़ोर मिलाया जाता है जो कोशिकाद्रव्यी झिल्ली को H⁺ के लिए मुक्त रूप से पारगम्य बना देता है। प्रभावों का कौन-सा संयोजन अपेक्षित है?

    1. O₂ उपभोग तुरंत रुक जाता है, क्योंकि प्रोटॉनों के झिल्ली के पार वापस रिसने पर इलेक्ट्रॉन परिवहन नहीं चल सकता
    2. O₂ उपभोग चलता रहता है या बढ़ता है, जबकि ऑक्सीकारी ATP संश्लेषण व कशाभिका-घूर्णन दोनों रुक जाते हैं
    3. ATP संश्लेषण सामान्य चलता है, क्योंकि जीवाणु ATP सिंथेज़ प्रोटॉनों से नहीं, इलेक्ट्रॉन प्रवाह से चलता है
    4. कशाभिकाएँ घूमती रहती हैं, क्योंकि जीवाणु कशाभिका मोटर सीधे ATP के जल-अपघटन से चलते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — O₂ उपभोग चलता रहता है या बढ़ता है, जबकि ऑक्सीकारी ATP संश्लेषण व कशाभिका-घूर्णन दोनों रुक जाते हैं

    प्रोटोनोफ़ोर प्रोटॉन प्रेरक बल को नष्ट कर देता है। इलेक्ट्रॉन परिवहन अब प्रोटॉनों के प्रति-दाब से नहीं रुकता, अतः O₂ उपभोग चलता या बढ़ता है, पर ATP सिंथेज़ व कशाभिका मोटर, दोनों प्रोटॉन प्रवाह से चालित, रुक जाते हैं। सक्सिनेट पर कोशिका ग्लाइकोलिटिक सब्सट्रेट-स्तरीय ATP का सहारा नहीं ले सकती। श्वसन का तुरंत रुकना भ्रामक भूल है: अयुग्मक इलेक्ट्रॉन प्रवाह को रोकते नहीं, फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से अलग करते हैं।
  5. एक सल्फ़ेट-अपचायक जीवाणु सल्फ़ेट से H₂ का ऑक्सीकरण करता है: 4 H₂ + SO₄²⁻ + H⁺ → HS⁻ + 4 H₂O। E°′(2H⁺/H₂) = −0.42 V, E°′(SO₄²⁻/HS⁻) = −0.22 V तथा F = 96.485 kJ V⁻¹ mol⁻¹ लें। अपचित प्रति मोल सल्फ़ेट ΔG°′ का परिमाण ____ kJ है (एक दशमलव स्थान तक)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 154.4

    ΔE°′ = E°′(ग्राही) − E°′(दाता) = −0.22 − (−0.42) = 0.20 V। सल्फ़ेट (S, +6) से HS⁻ (S, −2) तक 8 इलेक्ट्रॉन लगते हैं, जो 4 H₂ देते हैं। ΔG°′ = −nFΔE°′ = −8 × 96.485 × 0.20 = −154.38 kJ प्रति mol सल्फ़ेट, परिमाण 154.4। n = 2 (मानो एक H₂ हेतु) लेने पर 38.6 kJ आता है, जो प्रति मोल H₂ है, प्रति मोल सल्फ़ेट नहीं।
  6. जीवाणु श्वसन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. E. coli में श्वसन शृंखला कोशिकाद्रव्यी झिल्ली में स्थित है, और इसके द्वारा उत्पन्न प्रोटॉन प्रेरक बल कशाभिका-घूर्णन भी चलाता है
    2. अवायवीय श्वसन में अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही उसी अपचयी पथ में उत्पन्न कोई कार्बनिक मध्यवर्ती होता है
    3. एक ही इलेक्ट्रॉन दाता के साथ, नाइट्रेट से श्वसन सल्फ़ेट से श्वसन की अपेक्षा अधिक ऊर्जा मुक्त करता है, क्योंकि नाइट्रेट युग्म का E°′ अधिक धनात्मक है
    4. E. coli के साइटोक्रोम bd की O₂ बंधुता कम है और यह मुख्यतः तब प्रयुक्त ऑक्सीडेज़ है जब ऑक्सीजन प्रचुर हो
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — *E. coli* में श्वसन शृंखला कोशिकाद्रव्यी झिल्ली में स्थित है, और इसके द्वारा उत्पन्न प्रोटॉन प्रेरक बल कशाभिका-घूर्णन भी चलाता है; C — एक ही इलेक्ट्रॉन दाता के साथ, नाइट्रेट से श्वसन सल्फ़ेट से श्वसन की अपेक्षा अधिक ऊर्जा मुक्त करता है, क्योंकि नाइट्रेट युग्म का E°′ अधिक धनात्मक है

    जीवाणु शृंखलाएँ कोशिकाद्रव्यी झिल्ली में हैं और प्रोटॉन प्रेरक बल कशाभिका चलाता है; नाइट्रेट (लगभग +0.42 V) सल्फ़ेट (लगभग −0.22 V) से बहुत ऊपर है, अतः ΔE°′ व मुक्त ऊर्जा अधिक है। आंतरिक कार्बनिक ग्राही किण्वन की पहचान है, अवायवीय श्वसन की नहीं, जो बाहरी ग्राही व झिल्ली शृंखला प्रयोग करता है। साइटोक्रोम bd कम O₂ पर प्रयुक्त उच्च-बंधुता ऑक्सीडेज़ है; bo₃ कम-बंधुता वाला है जो O₂ प्रचुर होने पर प्रयुक्त होता है।
  7. एक ग्राम-ऋणात्मक आंत्र पृथक्कृत ग्लूकोज़ किण्वित करता है, मेथिल रेड परीक्षण ऋणात्मक व वोगेस–प्रोस्काउर परीक्षण धनात्मक देता है, और प्रचुर 2,3-ब्यूटेनडाइऑल बनाता है। वह कौन-सा किण्वन करता है?

    1. E. coli प्रकार का मिश्रित-अम्ल किण्वन, जो माध्यम का pH बहुत नीचे ले जाता है
    2. समलैक्टिक किण्वन, जिसमें पाइरुवेट केवल लैक्टेट डिहाइड्रोजिनेज़ द्वारा लैक्टेट में अपचित होता है
    3. प्रोपियोनिक अम्ल किण्वन, जिसमें पाइरुवेट कार्बोक्सिलीकृत होकर प्रोपियोनेट में बदलता है
    4. ब्यूटेनडाइऑल किण्वन, जिसमें पाइरुवेट संघनित होकर ऐसीटोइन और फिर डाइऑल में अपचित होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — ब्यूटेनडाइऑल किण्वन, जिसमें पाइरुवेट संघनित होकर ऐसीटोइन और फिर डाइऑल में अपचित होता है

    वोगेस–प्रोस्काउर परीक्षण 2,3-ब्यूटेनडाइऑल के पूर्ववर्ती ऐसीटोइन की पहचान करता है, और ब्यूटेनडाइऑल किण्वक (Enterobacter, Serratia) कम अम्ल बनाते हैं, अतः मेथिल रेड परीक्षण ऋणात्मक है। मिश्रित-अम्ल किण्वन इसका उलटा प्रतिरूप है: प्रबल अम्ल, मेथिल रेड धनात्मक, वोगेस–प्रोस्काउर ऋणात्मक। समलैक्टिक व प्रोपियोनिक किण्वन आंत्र जीवाणुओं के विशिष्ट नहीं हैं और ऐसीटोइन नहीं बनाते।
  8. सूक्ष्मजीवी किण्वनों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. किण्वन में ATP लगभग पूर्णतः सब्सट्रेट-स्तरीय फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से बनता है
    2. ग्लाइकोलिसिस में बना NADH पाइरुवेट या पाइरुवेट से व्युत्पन्न यौगिक को अपचित करके पुनः ऑक्सीकृत होता है
    3. फ़ॉस्फ़ोकीटोलेज़ पथ द्वारा विषमलैक्टिक किण्वन प्रति ग्लूकोज़ 2 ATP देता है, समलैक्टिक किण्वन के बराबर
    4. Zymomonas mobilis अपने एथेनॉल किण्वन में प्रति ग्लूकोज़ 2 ATP पाता है क्योंकि वह ग्लाइकोलिसिस प्रयोग करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — किण्वन में ATP लगभग पूर्णतः सब्सट्रेट-स्तरीय फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से बनता है; B — ग्लाइकोलिसिस में बना NADH पाइरुवेट या पाइरुवेट से व्युत्पन्न यौगिक को अपचित करके पुनः ऑक्सीकृत होता है

    किण्वन में बाहरी ग्राही नहीं होता, अतः NAD⁺ पाइरुवेट या उसके उत्पादों पर पुनर्जनित होता है और ATP सब्सट्रेट-स्तरीय फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण से आता है। विषमलैक्टिक किण्वन पेंटोज़ मार्ग में एक कार्बन CO₂ के रूप में खोता है, और केवल एक ट्रायोज़ ATP-निर्माता चरणों से गुज़रता है जबकि ऐसीटिल फ़ॉस्फ़ेट NADH को एथेनॉल के रूप में पुनः ऑक्सीकृत करने में लगता है, अतः यह 1 ATP देता है, 2 नहीं। Zymomonas एंटनर–डूडोरॉफ़ पथ प्रयोग करता है और प्रति ग्लूकोज़ 1 ATP पाता है, 2 नहीं।
  9. चार स्वपोषी रसायन-अश्मपोषी केल्विन चक्र से CO₂ स्थिर करते हैं और इस हेतु उन्हें NADH चाहिए। E°′(NAD⁺/NADH) = −0.32 V लें। इनमें से कौन अपने ऊर्जा स्रोत से, बिना प्रतिलोम इलेक्ट्रॉन परिवहन के, NAD⁺ को सीधे अपचित कर सकता है?

    1. Nitrobacter, नाइट्राइट का नाइट्रेट में ऑक्सीकरण (NO₃⁻/NO₂⁻ का E°′ लगभग +0.42 V)
    2. Cupriavidus necator, विलेय हाइड्रोजिनेज़ से H₂ का ऑक्सीकरण (2H⁺/H₂ का E°′ = −0.42 V)
    3. Acidithiobacillus ferrooxidans, pH 2 पर Fe²⁺ का Fe³⁺ में ऑक्सीकरण (Fe³⁺/Fe²⁺ का E°′ लगभग +0.77 V)
    4. Nitrosomonas, अमोनिया का नाइट्राइट में ऑक्सीकरण (NO₂⁻/NH₄⁺ का E°′ लगभग +0.34 V)
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — *Cupriavidus necator*, विलेय हाइड्रोजिनेज़ से H₂ का ऑक्सीकरण (2H⁺/H₂ का E°′ = −0.42 V)

    इलेक्ट्रॉन स्वतः केवल अधिक धनात्मक विभव की ओर बहते हैं। H₂ (−0.42 V) NAD⁺/NADH (−0.32 V) से अधिक ऋणात्मक है, अतः हाइड्रोजन जीवाणुओं का विलेय हाइड्रोजिनेज़ NAD⁺ को सीधे अपचित करता है। नाइट्राइट, Fe²⁺ व अमोनिया सभी के युग्म −0.32 V से कहीं अधिक धनात्मक हैं, अतः इन जीवों को प्रतिलोम इलेक्ट्रॉन परिवहन द्वारा इलेक्ट्रॉनों को NAD⁺ तक ऊपर धकेलने हेतु प्रोटॉन प्रेरक बल व्यय करना पड़ता है।
  10. एक प्रकाशपोषी प्रकाश में H₂S को इलेक्ट्रॉन दाता बनाकर अवायवीय रूप से बढ़ता है और O₂ नहीं छोड़ता। वह कोशिकाओं के बाहर सल्फ़र कणिकाएँ जमा करता है, उसमें बैक्टीरियोक्लोरोफ़िल c युक्त क्लोरोसोम हैं, और वह बिना RuBisCO के CO₂ स्थिर करता है। उसका सर्वोत्तम स्थान है

    1. बैंगनी सल्फ़र जीवाणु, जो क्विनोन-प्रकार अभिक्रिया केंद्र प्रयोग करते हैं और केल्विन चक्र से CO₂ स्थिर करते हैं
    2. सायनोबैक्टीरिया, जो दो प्रकाशतंत्र प्रयोग करते हैं और कार्बोक्सिसोम में केल्विन चक्र से CO₂ स्थिर करते हैं
    3. हरित सल्फ़र जीवाणु, जो आयरन–सल्फ़र-प्रकार अभिक्रिया केंद्र व प्रतिलोम सिट्रिक अम्ल चक्र प्रयोग करते हैं
    4. हीलियोबैक्टीरिया, जिनमें बैक्टीरियोक्लोरोफ़िल g है और जो कार्बनिक कार्बन यौगिकों पर प्रकाश-परपोषी के रूप में बढ़ते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — हरित सल्फ़र जीवाणु, जो आयरन–सल्फ़र-प्रकार अभिक्रिया केंद्र व प्रतिलोम सिट्रिक अम्ल चक्र प्रयोग करते हैं

    बैक्टीरियोक्लोरोफ़िल c वाले क्लोरोसोम, कोशिका के बाहर जमा सल्फ़र और बिना RuBisCO (प्रतिलोम सिट्रिक अम्ल चक्र से) CO₂ स्थिरीकरण मिलकर Chlorobium जैसे हरित सल्फ़र जीवाणुओं की पहचान कराते हैं। बैंगनी सल्फ़र जीवाणु भ्रामक विकल्प हैं क्योंकि वे भी अनॉक्सीजनी रूप से H₂S ऑक्सीकृत करते हैं, पर वे सल्फ़र कोशिका के भीतर संचित करते हैं, उनमें क्लोरोसोम नहीं होते और वे RuBisCO प्रयोग करते हैं। सायनोबैक्टीरिया O₂ छोड़ते हैं, और हीलियोबैक्टीरिया CO₂ स्थिर नहीं करते।
  11. एक स्वपोषी जीवाणु केल्विन चक्र से CO₂ स्थिर करता है। CO₂ से ग्लिसरैल्डिहाइड-3-फ़ॉस्फ़ेट का एक शुद्ध अणु बनाने में वह ATP के कितने अणु व्यय करता है?

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 9

    एक शुद्ध ट्रायोज़ फ़ॉस्फ़ेट हेतु 3 CO₂ चाहिए। प्रत्येक स्थिर CO₂ हेतु उससे बने दो 3-फ़ॉस्फ़ोग्लिसरेट के फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण में 2 ATP और राइबुलोज़-1,5-बिसफ़ॉस्फ़ेट पुनर्जनन हेतु फ़ॉस्फ़ोराइबुलोकाइनेज़ पर 1 ATP लगता है, अर्थात प्रति CO₂ 3 ATP (व 2 NADPH)। 3 × 3 = 9 ATP (6 NADPH के साथ)। 18 उत्तर देना ट्रायोज़ को हेक्सोज़ समझने की भूल है।
  12. ट्राइक्लोसान व क्षयरोग-रोधी औषधि आइसोनियाज़िड (अपने सक्रिय रूप द्वारा) दोनों जीवाणु वसा-अम्ल संश्लेषण रोकते हैं। वे प्रकार II दीर्घीकरण चक्र के किस चरण को संदमित करते हैं?

    1. बायोटिन-युक्त ऐसीटिल-CoA कार्बोक्सिलेज़ द्वारा ऐसीटिल-CoA का मैलोनिल-CoA में कार्बोक्सिलन
    2. बढ़ती ऐसिल शृंखला का मैलोनिल-ACP से संघनन, कार्बन डाइऑक्साइड मुक्त होने के साथ
    3. इनॉयल-ACP रिडक्टेज़ (FabI या InhA) द्वारा ट्रांस-2-इनॉयल-ACP मध्यवर्ती का अपचयन
    4. ट्रांस द्विबंध बनाने हेतु 3-हाइड्रॉक्सीऐसिल-ACP मध्यवर्ती का निर्जलीकरण
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — इनॉयल-ACP रिडक्टेज़ (FabI या InhA) द्वारा ट्रांस-2-इनॉयल-ACP मध्यवर्ती का अपचयन

    ट्राइक्लोसान इनॉयल-ACP रिडक्टेज़ FabI को, और सक्रिय आइसोनियाज़िड Mycobacterium tuberculosis के इनॉयल-ACP रिडक्टेज़ InhA को संदमित करता है, जो माइकोलिक अम्ल संश्लेषण हेतु आवश्यक है। संघनन चरण भ्रामक विकल्प है क्योंकि वह भी प्रसिद्ध प्रतिजैविक-लक्ष्य है (सेरुलेनिन व थायोलैक्टोमाइसिन का), पर न ट्राइक्लोसान न आइसोनियाज़िड वहाँ कार्य करते हैं।
  13. E. coli पामिटोलिऑयल-ACP (एक सिस द्विबंध वाला C16) अवायवीय मार्ग से बनाता है: C10 मध्यवर्ती बनाने वाले चक्र में FabA ट्रांस-2-डेसीनॉयल-ACP को सिस-3-डेसीनॉयल-ACP में समावयवित करता है, जो इनॉयल अपचयन से बच जाता है और बाद के चक्रों में लंबा होता है। एक ऐसीटिल-CoA व मैलोनिल इकाइयों से आरंभ करते हुए, तथा प्रत्येक 3-कीटोऐसिल अपचयन व प्रत्येक इनॉयल अपचयन हेतु एक अपचित निकोटिनामाइड सहकारक, NAD(P)H, गिनते हुए, प्रति पामिटोलिऑयल-ACP कितने NAD(P)H व्यय होते हैं?

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 13

    एक ऐसीटिल आरंभक से C16 शृंखला हेतु 7 मैलोनिल योग, अर्थात 7 दीर्घीकरण चक्र चाहिए। संतृप्त शृंखला प्रति चक्र 2 NAD(P)H, कुल 14, लेती। C10 बनाने वाले चक्र में सिस-3 समावयवी इनॉयल रिडक्टेज़ द्वारा अपचित नहीं होता, अतः वह चक्र केवल अपना 3-कीटोऐसिल अपचयन प्रयोग करता है: 14 − 1 = 13 NAD(P)H।
  14. E. coli के trp ओपेरॉन में एक बिंदु उत्परिवर्तन अग्र पेप्टाइड का आरंभ कोडॉन नष्ट कर देता है, जिससे राइबोसोम अग्र का अनुवाद नहीं कर पाते। अग्र RNA के क्षेत्र 1–4 अन्यथा अक्षत हैं। क्षीणक के आगे प्रतिलेखन का क्या होता है?

    1. यह सदैव उच्च हो जाता है, क्योंकि राइबोसोम के बिना अग्र RNA में 2:3 प्रति-समापक सदैव बनता है
    2. यह वन्य-प्रकार की ही भाँति ट्रिप्टोफ़ैन पर प्रतिक्रिया करता है, क्योंकि क्षीणन केवल Trp दमनकारी पर निर्भर है
    3. यह पूर्णतः रुक जाता है, क्योंकि अग्र पेप्टाइड का अनुवाद हुए बिना RNA पॉलिमरेज़ trp प्रवर्तक पर आरंभ नहीं कर सकता
    4. ट्रिप्टोफ़ैन कम होने पर भी यह अधिकतर समाप्त हो जाता है, क्योंकि 1:2 युग्मन बनता है और 3:4 समापक बनाने हेतु मुक्त रहता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — ट्रिप्टोफ़ैन कम होने पर भी यह अधिकतर समाप्त हो जाता है, क्योंकि 1:2 युग्मन बनता है और 3:4 समापक बनाने हेतु मुक्त रहता है

    प्रति-समापन हेतु क्षेत्र 1 पर Trp कोडॉनों पर अटका राइबोसोम चाहिए, जो क्षेत्र 2 को क्षेत्र 3 से युग्मित होने हेतु मुक्त करता है। अनुवाद न होने पर डिफ़ॉल्ट संरचना बनती है: क्षेत्र 1 क्षेत्र 2 से युग्मित होता है, क्षेत्र 3 व 4 समापक हेयरपिन बनाते हैं, और ट्रिप्टोफ़ैन स्तर कुछ भी हो, प्रतिलेखन क्षीणक पर समाप्त होता है। सदैव-उच्च अभिव्यक्ति वाला विकल्प सामान्य भूल है; वह 2:3 को डिफ़ॉल्ट मानता है, जबकि 2:3 तभी बनता है जब अटका राइबोसोम क्षेत्र 1 को घेर ले।
  15. E. coli को अतिरिक्त फ़िनाइलऐलानीन व टायरोसीन, पर बिना ट्रिप्टोफ़ैन, वाले न्यूनतम ग्लूकोज़ माध्यम में उगाया जाता है। ऐरोमैटिक अमीनो अम्ल संश्लेषण का पहला चरण (DAHP सिंथेज़) तीन समएंज़ाइमों द्वारा उत्प्रेरित होता है, प्रत्येक एक भिन्न ऐरोमैटिक अमीनो अम्ल से पुनर्भरण-संदमित। कौन-सा परिणाम अपेक्षित है?

    1. समस्त DAHP संश्लेषण रुक जाता है, क्योंकि दो अंत्य उत्पाद मिलकर प्रत्येक समएंज़ाइम को सम्मिलित रूप से संदमित करते हैं
    2. DAHP संश्लेषण ट्रिप्टोफ़ैन-संवेदी समएंज़ाइम से चलता रहता है, अतः कोशिका ट्रिप्टोफ़ैन बना सकती है
    3. ट्रिप्टोफ़ैन मिलाए जाने तक कोशिका ट्रिप्टोफ़ैन-विषमपोषी बन जाती है, क्योंकि साझा पथ बंद हो जाता है
    4. DAHP संश्लेषण सामान्य से ऊपर चला जाता है, क्योंकि फ़िनाइलऐलानीन व टायरोसीन DAHP सिंथेज़ के अपरस्थानिक सक्रियक हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — DAHP संश्लेषण ट्रिप्टोफ़ैन-संवेदी समएंज़ाइम से चलता रहता है, अतः कोशिका ट्रिप्टोफ़ैन बना सकती है

    समएंज़ाइमों में प्रत्येक अंत्य उत्पाद केवल अपना एंज़ाइम बंद करता है। अतिरिक्त फ़िनाइलऐलानीन व टायरोसीन अपने दो समएंज़ाइम संदमित करते हैं, पर ट्रिप्टोफ़ैन-संवेदी समएंज़ाइम असंदमित रहता है क्योंकि ट्रिप्टोफ़ैन अनुपस्थित है, अतः ट्रिप्टोफ़ैन संश्लेषण हेतु साझा पथ में पर्याप्त प्रवाह चलता रहता है। पूरे पथ का बंद होना ठीक वही विफलता है जिसे रोकने हेतु समएंज़ाइम नियंत्रण विकसित हुआ; सम्मिलित संदमन एक साझा एंज़ाइम का वर्णन है, इस स्थिति का नहीं।
  16. किसी शाखित जैवसंश्लेषी पथ का पहला एंज़ाइम किसी एक अंत्य उत्पाद की अकेली अधिकता से मुश्किल से प्रभावित होता है, पर दोनों अंत्य उत्पादों के एक साथ अधिक होने पर प्रबल रूप से संदमित होता है। नियंत्रण का यह प्रतिरूप कहलाता है

    1. संचयी पुनर्भरण संदमन, जिसमें प्रत्येक अंत्य उत्पाद आंशिक संदमन करता है और प्रभाव जुड़ते हैं
    2. अनुक्रमिक पुनर्भरण संदमन, जिसमें शाखा-बिंदु मध्यवर्ती पहले साझा एंज़ाइम को संदमित करता है
    3. सम्मिलित पुनर्भरण संदमन, जिसमें उल्लेखनीय संदमन हेतु सभी अंत्य उत्पाद एक साथ चाहिए
    4. समएंज़ाइम नियंत्रण, जिसमें एक ही चरण हेतु अलग-अलग एंज़ाइम भिन्न अंत्य उत्पादों पर प्रतिक्रिया करते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — सम्मिलित पुनर्भरण संदमन, जिसमें उल्लेखनीय संदमन हेतु सभी अंत्य उत्पाद एक साथ चाहिए

    सम्मिलित (बहुसंयोजी) संदमन सभी अंत्य उत्पादों की एक साथ आवश्यकता से परिभाषित है। संचयी संदमन में प्रत्येक अंत्य उत्पाद अकेले ही मापनीय आंशिक संदमन देता है, जो प्रश्न में वर्णित नहीं है; अनुक्रमिक संदमन शाखा-बिंदु मध्यवर्ती के माध्यम से होता है, और समएंज़ाइम नियंत्रण एक के बजाय अलग-अलग एंज़ाइम प्रयोग करता है।
  17. E. coli में केंद्रीय उपापचय के नियमन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. फ़ॉस्फ़ोफ़्रक्टोकाइनेज़ ADP से अपरस्थानिक रूप से सक्रिय और फ़ॉस्फ़ोइनॉलपाइरुवेट से संदमित होता है
    2. फ़ॉस्फ़ोट्रांसफ़रेज़ तंत्र द्वारा लिया गया ग्लूकोज़ cAMP घटाता है, जिससे अन्य शर्कराओं के ओपेरॉनों का cAMP–CRP सक्रियण कम होता है
    3. ऐसीटेट पर वृद्धि के दौरान फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण आइसोसिट्रेट डिहाइड्रोजिनेज़ को निष्क्रिय कर आइसोसिट्रेट को ग्लाइऑक्सिलेट उपमार्ग में मोड़ता है
    4. जैवसंश्लेषी पथों के अंत्य उत्पाद प्रायः अपने पथ के अंतिम एंज़ाइम को संदमित करते हैं, ताकि कोई मध्यवर्ती अप्रयुक्त न रहे
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — फ़ॉस्फ़ोफ़्रक्टोकाइनेज़ ADP से अपरस्थानिक रूप से सक्रिय और फ़ॉस्फ़ोइनॉलपाइरुवेट से संदमित होता है; B — फ़ॉस्फ़ोट्रांसफ़रेज़ तंत्र द्वारा लिया गया ग्लूकोज़ cAMP घटाता है, जिससे अन्य शर्कराओं के ओपेरॉनों का cAMP–CRP सक्रियण कम होता है; C — ऐसीटेट पर वृद्धि के दौरान फ़ॉस्फ़ोरिलीकरण आइसोसिट्रेट डिहाइड्रोजिनेज़ को निष्क्रिय कर आइसोसिट्रेट को ग्लाइऑक्सिलेट उपमार्ग में मोड़ता है

    PFK ऊर्जा आवेश भाँपता है (ADP बढ़े तो सक्रियता बढ़े) और उच्च PEP स्तर संकेत देता है कि निचला ग्लाइकोलिटिक पथ रुका हुआ है; PTS-मध्यस्थ ग्लूकोज़ अंतर्ग्रहण cAMP को कम रखता है (अपचयज दमन); और ऐसीटेट पर AceK आइसोसिट्रेट डिहाइड्रोजिनेज़ को फ़ॉस्फ़ोरिलीकृत कर आइसोसिट्रेट को आइसोसिट्रेट लायेज़ की ओर भेजता है। पुनर्भरण संदमन अंतिम नहीं, पहले प्रतिबद्ध एंज़ाइम पर कार्य करता है, ठीक इसलिए कि मध्यवर्ती जमा न हों और कार्बन व्यर्थ न जाए।