ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: सूक्ष्म ‘प्राणियों’ से रोगाणु सिद्धांत व आणविक युग तक

यह अध्याय जीवन विज्ञान (XL) पेपर के पाँच वैकल्पिक खंडों में से एक, XL3 सूक्ष्मजीव विज्ञान, के खंड XL3.1 का उत्तर है: “Discovery of microbial world; Landmark discoveries relevant to the field of microbiology; Controversy over spontaneous generation; Role of microorganisms in transformation of organic matter and in the causation of diseases.” यह विषय को सूक्ष्मजीवों के प्रथम दर्शन से आरंभ कर उन प्रयोगों तक ले जाता है जिन्होंने स्वतःजनन का अंत किया, फिर उन प्रमाणों तक जिनसे सिद्ध हुआ कि किण्वन व तत्वों का चक्रण सूक्ष्मजीव चलाते हैं और विशिष्ट सूक्ष्मजीव विशिष्ट रोग उत्पन्न करते हैं, और अंत में आणविक युग तक की युगांतरकारी खोजें देता है। जहाँ स्रोत सहमत हैं वहाँ वर्ष दिए गए हैं और जहाँ भिन्न हैं वहाँ दशक तक पूर्णांकित किए गए हैं; GATE किसी प्रयोग के वर्ष से कहीं अधिक उसका तर्क पूछता है। आंकिक प्रश्न सरल लेंस का आवर्धन, प्रायोगिक आँकड़ों से दरें व प्रतिशत, तथा सूक्ष्मजीवी खनिजीकरण की रससमीकरणमिति हैं।

1. सूक्ष्मजीव जगत की खोज

रॉबर्ट हुक की Micrographia (1665) ने संयुक्त सूक्ष्मदर्शी से अन्य अनेक वस्तुओं के साथ फफूँदों की फलन-संरचनाएँ चित्रित कीं, और कॉर्क में देखे खानों के लिए जीवविज्ञान को कोशिका (cell) शब्द दिया। डेल्फ़्ट के एक वस्त्र-व्यापारी एंटोनी वॉन ल्यूवेनहुक ने अति सूक्ष्म एकल लेंस घिसे और 1670 के दशक से रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन को लिखे पत्रों में वर्षा-जल, काली मिर्च के आसव व अपने दाँतों की खुरचन में देखे “एनिमलक्यूल” (सूक्ष्म प्राणी) वर्णित किए। उनके चित्रों में दंड, गोलाणु, सर्पिल व प्रोटोज़ोआ दिखते हैं, इसलिए उन्हें सूक्ष्मजीव विज्ञान का जनक कहा जाता है: वे पहले ज्ञात व्यक्ति थे जिन्होंने जीवाणु व प्रोटोज़ोआ देखे और उन्हें सावधानी से दर्ज किया।

काँच का एक मनका यह कैसे कर सका? फ़ोकस दूरी f वाला सरल लेंस लगभग M = D/f का कोणीय आवर्धन देता है, जहाँ D = 250 mm आँख का निकट बिंदु है। f = 1 mm वाला मनका-लेंस लगभग 250 गुना आवर्धन करता है; ल्यूवेनहुक के सर्वोत्तम लेंस कुछ सौ गुना तक पहुँचे। यह 1–2 µm के जीवाणु को चलते बिंदु के रूप में देखने के लिए पर्याप्त है, किंतु उसका आंतरिक विवरण विभेदित करने के लिए नहीं, क्योंकि आवर्धन व विभेदन भिन्न बातें हैं (विभेदन XL3.2 में सूक्ष्मदर्शिकी के साथ पढ़ाया गया है)।

🎯 सूक्ष्मजीव देखने और उन्हें दोषी ठहराने के बीच दो शताब्दियाँ क्यों बीतीं
देखना सिद्ध करना नहीं है। एक प्रकार के सूक्ष्मजीव को अकेले उगाने का कोई उपाय नहीं था, न अभिरंजक थे न निर्जर्म तकनीक, और जब तक माना जाता रहा कि सूक्ष्मजीव सड़ते पदार्थ से स्वतः उत्पन्न होते हैं, तब तक वे सड़न व रोग का कारण नहीं, उनका परिणाम प्रतीत होते रहे। इसलिए रोगाणु सिद्धांत के टिकने से पहले स्वतःजनन का विवाद सुलझना आवश्यक था।

2. स्वतःजनन पर विवाद

स्वतःजनन (abiogenesis) का मत था कि जीव निर्जीव पदार्थ से उत्पन्न होते हैं; जीवात्जनन (biogenesis) कहता है कि जीवन केवल पूर्ववर्ती जीवन से आता है। नीचे का प्रत्येक प्रयोग अपने पिछले प्रयोग पर उठी आपत्ति का उत्तर था, और GATE इस विषय पर प्रश्न ठीक इसी रूप में बनाता है।

क्रमवार प्रयोग
वैज्ञानिकअभिकल्पनापरिणाम व क्या अनुत्तरित रहा
फ़्रांसेस्को रेडी (1668)खुले जारों में व जाली से ढके जारों में मांसइल्लियाँ केवल वहीं जहाँ मक्खियाँ अंडे दे सकीं; दृश्य प्राणियों के लिए प्रश्न सुलझा, सूक्ष्मजीवों के लिए नहीं
जॉन नीडहम (1740 का दशक)शोरबा थोड़ी देर उबालकर कॉर्क से बंदशोरबा धुँधला हुआ, जिससे स्वतःजनन का समर्थन प्रतीत हुआ; उबालना बहुत कम था और बंदी अपूर्ण
लाज़ारो स्पैलान्ज़ानी (1760 का दशक)काँच पिघलाकर बंद फ्लास्कों में अधिक देर उबाले आसवस्वच्छ रहे; आलोचकों ने कहा कि ताप ने “जीवनी शक्ति” नष्ट कर दी और बंदी ने जीवन हेतु आवश्यक वायु रोक दी
लुई पाश्चर (1861)लंबी S-आकार की ग्रीवा से वायु हेतु खुले हंस-ग्रीवा फ्लास्कों में उबला शोरबानिर्जर्म रहा; ग्रीवा तोड़ने या शोरबे को उसमें झुकाने पर वृद्धि हुई। वायु मुक्त रूप से आई, अतः जीवनी-शक्ति की आपत्ति गिर गई; रोगाणु धूल पर चलते हैं
जॉन टिंडल (1870 का दशक)धूल-रहित कक्ष में शोरबे; देर तक उबाले घास के आसवधूल-रहित शोरबे निर्जर्म रहे, पर कुछ घास-आसव देर तक उबलने पर भी बचे: ताप-प्रतिरोधी रूप होते हैं

टिंडल की पहेली तब सुलझी जब फ़र्डिनैंड कोन ने 1870 के दशक में Bacillus के ताप-प्रतिरोधी अंतःबीजाणुओं का वर्णन किया। टिंडल का उपाय, आंतरायिक तापन (टिंडलीकरण), पदार्थ को उबालता है, बचे बीजाणुओं को रात भर में अंकुरित होकर ताप-संवेदी कोशिकाएँ बनने देता है, और फिर उबालता है; यह लगातार तीन दिन दोहराया जाता है। पाश्चर ने वायु को रुई के प्लग से छानकर सूक्ष्मदर्शी में यह भी पाया कि रुकी धूल पर वैसे ही कण थे जैसे बिगड़े शोरबों में उगते थे।

⚠️ हंस-ग्रीवा ने वायु नहीं रोकी, और यही उसकी विशेषता है
स्पैलान्ज़ानी के बंद फ्लास्क ठीक इसीलिए विश्वास नहीं दिला सके कि उन्होंने वायु रोक दी थी। पाश्चर की खुली, मुड़ी ग्रीवा ने वायु अंदर आने दी पर धूल को अपने मोड़ में रोक लिया, अतः निर्जर्म और बिगड़े फ्लास्क के बीच एकमात्र अंतर धूल-वाहित रोगाणुओं से संपर्क था। जो विकल्प कहें कि ग्रीवा ने “वायु बाहर रखी” या फ्लास्क “बंद” था, वे गलत हैं।

3. सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थ का रूपांतरण करते हैं

किण्वन। 1830 के दशक में कान्यार द ला तूर, थियोडोर श्वान व फ़्रीड्रिख़ क्यूट्ज़िंग ने स्वतंत्र रूप से निष्कर्ष निकाला कि यीस्ट एक जीवित जीव है जो ऐल्कोहॉली किण्वन करता है, जबकि यूस्टस फ़ॉन लीबिग व अन्य रसायनज्ञ मानते थे कि किण्वन शुद्ध रासायनिक विघटन है। पाश्चर ने 1850 और 1860 के दशकों में दिखाया कि हर किण्वन का अपना सूक्ष्मजीव होता है: यीस्ट एथेनॉल बनाता है, एक भिन्न जीव लैक्टिक अम्ल बनाता है, और ब्यूटिरिक किण्वन ऐसे जीव करते हैं जो वायु के बिना जीते हैं, जिन्हें उन्होंने अवायुजीवी कहा। मदिरा के “रोग” संदूषक सूक्ष्मजीवों से होते थे और हल्के तापन से रोके जा सकते थे, यही पाश्चरीकरण का उद्गम है। 1897 में एडुआर्ड बुख़नर ने कोशिका-मुक्त यीस्ट निष्कर्ष से शर्करा का किण्वन कराया: उत्प्रेरक एंज़ाइम हैं जो जीवित कोशिका के बाहर भी कार्य करते हैं, और इस परिणाम ने विवाद सुलझाकर जैवरसायन की नींव रखने में सहायता की।

तत्वों का चक्रण। सर्गेई विनोग्रैडस्की ने 1880 और 1890 के दशकों में दिखाया कि Beggiatoa ऊर्जा के लिए H₂S का सल्फ़र तक ऑक्सीकरण करता है और नाइट्रीकारी जीवाणु CO₂ स्थिर करते हुए अमोनिया का नाइट्राइट व नाइट्राइट का नाइट्रेट तक ऑक्सीकरण करते हैं: रसअकार्बनिकपोषण (chemolithotrophy), अकार्बनिक ऊर्जा-स्रोतों पर जीवन। उन्होंने कार्बनिक पदार्थ-रहित माध्यमों पर नाइट्रीकारकों को पृथक किया और विनोग्रैडस्की स्तंभ बनाया। मार्टिनस बेयरिंक ने संवर्धन-समृद्धि (enrichment culture) विकसित की, जिससे उन्होंने मूल-ग्रंथिका जीवाणु और 1901 में मुक्तजीवी नाइट्रोजन-स्थिरक Azotobacter पृथक किए; हेलरीगेल व विलफ़ार्थ 1880 के दशक में दिखा चुके थे कि फलीदार पौधे वायुमंडलीय नाइट्रोजन तभी स्थिर करते हैं जब उनकी जड़ों पर ग्रंथिकाएँ हों। इन सबने मिलकर सूक्ष्मजीवी पारिस्थितिकी की नींव रखी: सूक्ष्मजीव मृत पदार्थ के C, N, S व P का CO₂, NH₄⁺, SO₄²⁻ व PO₄³⁻ में खनिजीकरण करते हैं, जिन्हें पौधे पुनः प्रयोग करते हैं।

🧠 हल किया उदाहरण: खनिजीकरण कितनी CO₂ मुक्त करता है?
पूर्ण वायवीय ऑक्सीकरण: C₆H₁₂O₆ + 6 O₂ → 6 CO₂ + 6 H₂O। 18 g ग्लूकोज़ (M = 180 g mol⁻¹) = 0.1 mol लें। इससे 0.6 mol CO₂ = 0.6 × 44 = 26.4 g बनती है और 0.6 mol O₂ = 0.6 × 32 = 19.2 g खर्च होती है। यही ऑक्सीजन-माँग कारण है कि नदी में छोड़ा गया कार्बनिक अपशिष्ट, सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटित होते समय, उसकी घुली ऑक्सीजन घटा देता है।

4. रोग के कारण के रूप में सूक्ष्मजीव

पहले संकेत मिले। अगोस्तीनो बासी ने 1830 के दशक में दिखाया कि रेशम-कीट का मस्कार्डीन रोग एक कवक से होता है, यह पहला प्रमाण था कि कोई सूक्ष्मजीव प्राणी में रोग उत्पन्न करता है। इग्नाज़ सेमेल्वाइस (वियना, 1847) ने प्रसूति-ज्वर (puerperal fever) से होने वाली मृत्यु घटाई, डॉक्टरों से स्त्रियों की जाँच से पहले क्लोरीनयुक्त चूने से हाथ धुलवाकर; जॉन स्नो (लंदन, 1854) ने एक हैज़ा प्रकोप का स्रोत ब्रॉड स्ट्रीट के पंप में खोजा और रोगाणु ज्ञात होने से पहले ही महामारी-विज्ञान की नींव रखी। जोसेफ़ लिस्टर (1867) ने घावों, पट्टियों व उपकरणों को कार्बोलिक अम्ल (फ़ीनॉल) से उपचारित कर पूतिरोधी शल्य-चिकित्सा आरंभ की। पाश्चर रेशम-कीट रोग से आगे बढ़कर चिकन हैज़ा, ऐन्थ्रैक्स (1881) व रेबीज़ (1885) के क्षीणीकृत टीकों तक पहुँचे।

रॉबर्ट कॉख ने प्रमाण दिया। 1876 में उन्होंने Bacillus anthracis को ऐन्थ्रैक्स से जोड़ा: ये दंड हर रोगी पशु के रक्त में थे, शरीर के बाहर उगे, चूहों में अंतःक्षेपित करने पर अब भी ऐन्थ्रैक्स उत्पन्न करते थे, और ऐसे बीजाणु बनाते थे जो मिट्टी में बने रहते हैं। 1882 में उन्होंने Mycobacterium tuberculosis और बाद में Vibrio cholerae की पहचान की। उनकी प्रयोगशाला ने ठोस माध्यम (पहले जिलेटिन, फिर फ़ैनी हेसे के सुझाए अगार), उनके सहायक जूलियस पेट्री की डिश (1887) तथा जीवाणुओं का अभिरंजन व फ़ोटोग्राफ़ी दी। कॉख की अभिधारणाएँ:

  • सूक्ष्मजीव रोग के प्रत्येक मामले में मिलता है और स्वस्थ परपोषियों में नहीं।
  • उसे रोगी परपोषी से पृथक कर शुद्ध संवर्धन में उगाया जाता है।
  • शुद्ध संवर्धन स्वस्थ, सुग्राही परपोषी में संरोपित करने पर वही रोग उत्पन्न करता है।
  • प्रायोगिक रूप से संक्रमित परपोषी से वही सूक्ष्मजीव पुनः पृथक किया जाता है।
⚠️ अभिधारणाएँ कहाँ विफल होती हैं
स्वस्थ वाहक (Vibrio cholerae या Salmonella Typhi के) पहली अभिधारणा तोड़ते हैं। जो रोगजनक कोशिका-मुक्त माध्यम में नहीं उगाए जा सकते (Mycobacterium leprae, Treponema pallidum, सभी विषाणु) वे दूसरी तोड़ते हैं। जिस रोग का कोई प्राणी-मॉडल न हो, या जिसे मनुष्यों में उत्पन्न करना अनैतिक हो, वह तीसरी को रोकता है, और जिन रोगों में दो जीव साथ चाहिए वे एक-सूक्ष्मजीव तर्क को नहीं मानते। आणविक कॉख अभिधारणाएँ (स्टैनली फ़ॉकाउ, 1988) यही तर्क किसी उग्रता-जीन पर लगाती हैं: वह रोगजनक उपभेदों में मिलता है, उसे निष्क्रिय करने पर उग्रता घटती है, और उसे लौटाने पर उग्रता लौट आती है।
ℹ️ कहानी का भारतीय अध्याय
अल्फ़ोंस लावेरां ने 1880 में मानव रक्त में मलेरिया परजीवी देखा। भारत में कार्य करते हुए रोनाल्ड रॉस ने 1897 में दिखाया कि वह Anopheles मच्छरों में विकसित होता है, और उन्हें 1902 में नोबेल पुरस्कार मिला। वाल्डेमार हैफ़किन ने 1890 के दशक में भारत में हैज़ा व प्लेग के टीके विकसित किए; मुंबई का हैफ़किन संस्थान उन्हीं के नाम पर है।

5. युगांतरकारी खोजें

रोगाणु सिद्धांत के बाद यह क्षेत्र प्रतिरक्षाविज्ञान, विषाणुविज्ञान, रसायन-चिकित्सा और बीसवीं शताब्दी में सूक्ष्मजीवी आनुवंशिकी में शाखित हुआ। तालिका में केवल वे खोजें हैं जिन पर GATE प्रश्न बनाता है; प्रत्येक उस पाठ्यक्रम-शीर्षक में है जो उसे विस्तार से पढ़ाता है।

रोगाणु सिद्धांत के बाद की युगांतरकारी खोजें
कबखोज व खोजकर्तामहत्व
1796काउपॉक्स पदार्थ से चेचक टीकाकरण (एडवर्ड जेनर)पहला टीका, रोगाणुओं के ज्ञात होने से बहुत पहले
1880 का दशकभक्षकाणुक्रिया (एली मेचनिकोव); ग्राम अभिरंजन, 1884 (हैंस क्रिश्चियन ग्राम)कोशिकीय प्रतिरक्षा; भित्ति-प्रकार से जीवाणुओं का मुख्य विभाजन
1890डिफ़्थीरिया व टिटनेस के विरुद्ध प्रतिविष (एमिल फ़ॉन बेहरिंग, कितासातो शिबासाबुरो)तरल प्रतिरक्षा व सीरम द्वारा निष्क्रिय प्रतिरक्षीकरण
1892, 1898तंबाकू मोज़ेक कारक जीवाणु-रोधी फ़िल्टरों से पार होता है (दिमित्री इवानोव्स्की); “contagium vivum fluidum” (मार्टिनस बेयरिंक); खुरपका-मुँहपका कारक भी फ़िल्टर-पारगामी (लॉफ़्लर व फ़्रॉश, 1898)पादप व प्राणी विषाणुओं की खोज
1915, 1917जीवाणुभोजी (फ़्रेडरिक ट्वॉर्ट; फ़ेलिक्स देरेल)फ़ेज आणविक जीवविज्ञान का मॉडल तंत्र बना
1910 से 1940 का दशकसाल्वर्सन (पॉल एर्लिख़, 1910); पेनिसिलिन (अलेक्ज़ेंडर फ़्लेमिंग, 1928; फ़्लोरी व चेन द्वारा शुद्धीकृत); प्रोंटोसिल (गेरहार्ड डोमाक, 1930 का दशक); स्ट्रेप्टोमाइसिन (सेल्मन वैक्समैन की प्रयोगशाला, 1940 का दशक)रसायन-चिकित्सा: पहले संश्लेषित औषधियाँ, फिर प्रतिजैविक; स्ट्रेप्टोमाइसिन क्षयरोग के विरुद्ध पहली प्रभावी औषधि थी
1928, 1944न्यूमोकोकाई का रूपांतरण (फ़्रेडरिक ग्रिफ़िथ); रूपांतरक तत्व DNA है (एवरी, मैकलॉयड व मैकार्टी)DNA आनुवंशिक पदार्थ है
1946, 1961जीवाणु संयुग्मन (जोशुआ लेडरबर्ग व एडवर्ड टैटम); ओपेरॉन (फ़्रांस्वा जैकब व जाक मोनो)जीवाणुओं में आनुवंशिकी है; जीनों का नियमन होता है
1977, 199016S rRNA तुलनाओं से आर्किया की पहचान (कार्ल वोज़ व जॉर्ज फ़ॉक्स); तीन डोमेन प्रस्तावित (वोज़ व सहयोगी)आणविक जातिवृत्त ने आकृति-आधारित वर्गीकरण का स्थान लिया
1980 का दशक, 2012PCR (कैरी मुलिस); प्रोग्राम-योग्य DNA कर्तक के रूप में CRISPR-Cas9 (इमैनुएल शार्पेंतिए व जेनिफ़र डूडना)दोनों सूक्ष्मजीवों से लिए गए उपकरण हैं: एक तापस्थायी पॉलिमरेज़ और एक जीवाणु प्रतिरक्षा तंत्र
⚠️ जोड़ियाँ जिन्हें परीक्षक अदल-बदल देते हैं
पेनिसिलिन फ़्लेमिंग ने खोजा; स्ट्रेप्टोमाइसिन वैक्समैन की प्रयोगशाला ने। एर्लिख़ का साल्वर्सन एक संश्लेषित आर्सेनिक यौगिक है, प्रतिजैविक नहीं। इवानोव्स्की ने फ़िल्टर-पारगामिता दिखाई पर फिर भी किसी विष या अति सूक्ष्म जीवाणु की कल्पना की; बेयरिंक ने एक नए प्रकार के जीवित कारक का तर्क दिया। ग्रिफ़िथ ने रूपांतरण देखा; एवरी के समूह ने यह दिखाकर DNA को उसका कारण पहचाना कि यह सक्रियता डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिएज़ से नष्ट होती है, प्रोटिएज़ों या राइबोन्यूक्लिएज़ से नहीं।

मुख्य बिंदु

  • हुक (Micrographia, 1665) ने फफूँदें चित्रित कीं व कोशिका को नाम दिया; ल्यूवेनहुक ने 1670 के दशक से, कुछ सौ गुना आवर्धन वाले एकल लेंसों से (M ≈ 250 mm / f), सबसे पहले जीवाणु व प्रोटोज़ोआ देखे और दर्ज किए।
  • स्वतःजनन क्रमशः गिरा: रेडी (दृश्य प्राणी), नीडहम के त्रुटिपूर्ण शोरबे, स्पैलान्ज़ानी के बंद फ्लास्क (वायु की आपत्ति), पाश्चर के खुले हंस-ग्रीवा फ्लास्क (1861) और टिंडल के ताप-प्रतिरोधी रूप, जिन्हें कोन के अंतःबीजाणुओं ने समझाया।
  • पाश्चर ने हर किण्वन को उसके अपने सूक्ष्मजीव से जोड़ा और पाश्चरीकरण दिया; बुख़नर के कोशिका-मुक्त निष्कर्ष (1897) ने दिखाया कि उत्प्रेरक एंज़ाइम हैं।
  • विनोग्रैडस्की (रसअकार्बनिकपोषण, विनोग्रैडस्की स्तंभ) व बेयरिंक (संवर्धन-समृद्धि, Azotobacter) ने दिखाया कि सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थ का खनिजीकरण करते हैं और C, N व S चक्र चलाते हैं; 1 mol ग्लूकोज़ के ऑक्सीकरण से 6 mol CO₂ बनती है और 6 mol O₂ लगती है।
  • रोगाणु सिद्धांत: बासी, सेमेल्वाइस (1847), स्नो (1854), लिस्टर (1867), फिर कॉख का ऐन्थ्रैक्स (1876) व क्षयरोग (1882) हेतु प्रमाण। चारों अभिधारणाएँ वाहकों, असंवर्धनीय रोगजनकों और मॉडल-रहित रोगों में विफल होती हैं; आणविक अभिधारणाएँ उन्हें जीनों पर लगाती हैं।
  • युगांतरकारी खोजें: जेनर (1796), विषाणु (इवानोव्स्की 1892, बेयरिंक 1898), फ़ेज (ट्वॉर्ट, देरेल), एर्लिख़, फ़्लेमिंग (1928), डोमाक, वैक्समैन, ग्रिफ़िथ व एवरी (DNA), लेडरबर्ग व टैटम, जैकब व मोनो, वोज़ (आर्किया, 1977), PCR और CRISPR-Cas9।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. किस वैज्ञानिक ने हाथ से घिसे एकल-लेंस सूक्ष्मदर्शियों से देखे जीवाणुओं व प्रोटोज़ोआ का सबसे पहले वर्णन, रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन को लिखे पत्रों में, किया?

    1. रॉबर्ट हुक, जिनकी Micrographia ने संयुक्त सूक्ष्मदर्शी से देखी फफूँदें व कॉर्क कोशिकाएँ चित्रित कीं
    2. लुई पाश्चर, जिन्होंने किण्वन तथा बिगड़ी मदिरा व शोरबे के सूक्ष्मजीवों का अध्ययन किया
    3. एंटोनी वॉन ल्यूवेनहुक, डेल्फ़्ट के वस्त्र-व्यापारी जो अपने सूक्ष्म मनका-लेंस स्वयं घिसते थे
    4. लाज़ारो स्पैलान्ज़ानी, जिन्होंने स्वतःजनन जाँचने हेतु बंद फ्लास्कों में आसव उबाले
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — एंटोनी वॉन ल्यूवेनहुक, डेल्फ़्ट के वस्त्र-व्यापारी जो अपने सूक्ष्म मनका-लेंस स्वयं घिसते थे

    1670 के दशक से रॉयल सोसाइटी को लिखे ल्यूवेनहुक के पत्र वर्षा-जल, आसवों व दाँतों की खुरचन में दंड, गोलाणु व सर्पिल सहित सूक्ष्म प्राणियों का वर्णन करते हैं। हुक लुभावना विकल्प है: उन्होंने संयुक्त सूक्ष्मदर्शी प्रयोग किया और फफूँदें व कॉर्क कोशिकाएँ चित्रित कीं, पर जीवाणुओं की सूचना नहीं दी। पाश्चर व स्पैलान्ज़ानी ने एक शताब्दी या उससे अधिक बाद कार्य किया।
  2. आरंभिक एकल-लेंस सूक्ष्मदर्शियों जैसे एक मनका-लेंस की फ़ोकस दूरी 1.25 mm है। सरल लेंस का आवर्धन M = D/f मानते हुए, जहाँ D = 250 mm (आँख का निकट बिंदु) है, यह लेंस ____ गुना आवर्धन करता है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 200

    M = D/f = 250 mm ÷ 1.25 mm = 200। फ़ोकस दूरी जितनी छोटी (मनका जितना छोटा व अधिक वक्र), आवर्धन उतना अधिक; इसी कारण ल्यूवेनहुक के सूक्ष्म मनके अपने समय के संयुक्त सूक्ष्मदर्शियों से बेहतर थे।
  3. रॉबर्ट हुक की Micrographia (1665) सूक्ष्मजीव विज्ञान में इसलिए स्मरण की जाती है क्योंकि उसने

    1. एक फफूँद की फलन-संरचनाएँ चित्रित कीं और कोशिका (cell) शब्द दिया
    2. मानव दाँतों की खुरचन में जीवाणुओं की पहली सूचना दी
    3. मांस के जारों को ढककर इल्लियों के स्वतःजनन का खंडन किया
    4. ठोस माध्यम पर किसी जीवाणु का पहला शुद्ध संवर्धन वर्णित किया
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — एक फफूँद की फलन-संरचनाएँ चित्रित कीं और कोशिका (cell) शब्द दिया

    Micrographia ने संयुक्त सूक्ष्मदर्शी से अन्य वस्तुओं के साथ एक फफूँद की बीजाणुधानियाँ और कॉर्क के खाली खाने चित्रित किए, जिन्हें हुक ने कोशिकाएँ कहा। दाँतों की खुरचन में जीवाणु ल्यूवेनहुक की सूचना है, ढके जार रेडी के (1668) हैं, और ठोस माध्यम पर शुद्ध संवर्धन दो शताब्दी बाद कॉख की प्रयोगशाला से आया।
  4. पाश्चर के हंस-ग्रीवा फ्लास्क प्रयोग ने स्पैलान्ज़ानी के बंद-फ्लास्क परिणामों पर उठी आपत्ति का उत्तर क्यों दिया?

    1. उबालने के बाद ग्रीवा पिघलाकर बंद कर दी गई, अतः ठंडे शोरबे तक कोई सूक्ष्मजीव कभी नहीं पहुँच सका
    2. शोरबा पहले से कहीं अधिक देर उबाला गया, जिससे सबसे ताप-प्रतिरोधी बीजाणु भी मर गए
    3. मुड़ी ग्रीवा में रुई भरी गई, अतः शोरबे तक पहुँचने वाली वायु छनकर निर्जर्म हो चुकी थी
    4. खुली ग्रीवा से वायु शोरबे तक मुक्त रूप से पहुँची जबकि धूल व रोगाणु उसके मोड़ में बैठ गए
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — खुली ग्रीवा से वायु शोरबे तक मुक्त रूप से पहुँची जबकि धूल व रोगाणु उसके मोड़ में बैठ गए

    स्पैलान्ज़ानी के आलोचकों ने कहा था कि बंदी ने जीवन हेतु आवश्यक वायु (व जीवनी शक्ति) रोक दी। पाश्चर की ग्रीवा खुली रही, अतः वायु आई, फिर भी शोरबा तब तक निर्जर्म रहा जब तक मोड़ में फँसी धूल उस तक नहीं पहुँची। बंद या रुई-भरी ग्रीवा वही आपत्ति फिर खड़ी कर देती जिसका वे उत्तर दे रहे थे, और देर तक उबालना इस अभिकल्पना का मूल नहीं था।
  5. धूल-रहित कक्ष में रखे फ्लास्क में एक घंटे उबाला गया घास का आसव दो दिन बाद धुँधला हो जाता है, जबकि उसी कक्ष में पाँच मिनट उबाला गया मांस का शोरबा स्वच्छ रहता है। कौन-सी व्याख्या दोनों परिणामों से मेल खाती है और उपाय भी सुझाती है?

    1. घास में ऐसी जीवनी शक्ति है जो उबाल सह लेती है और स्थिर वायु में आसव ठंडा होने पर नए सूक्ष्मजीव उत्पन्न करती है
    2. घास पर ताप-प्रतिरोधी अंतःबीजाणु हैं; उनके अंकुरित होने के बाद लगातार दिनों तक उबालना उसे निर्जर्म कर देगा
    3. धूल-रहित वायु भी कायिक जीवाणु ले जाती है, और ये अधिक पोषक घास-आसव में अधिमान्य रूप से बैठते हैं
    4. देर तक उबालना घास की शर्कराओं को ऐसे उत्पादों में तोड़ता है जो बाद में बिना किसी सूक्ष्मजीव के धुँधले पदार्थ में बहुलकित होते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — घास पर ताप-प्रतिरोधी अंतःबीजाणु हैं; उनके अंकुरित होने के बाद लगातार दिनों तक उबालना उसे निर्जर्म कर देगा

    घास पर Bacillus के अंतःबीजाणु होते हैं जो एक घंटे का उबाल सह लेते हैं; मांस के शोरबे में वे नहीं होते, अतः थोड़ा उबालना उसे निर्जर्म कर देता है। आंतरायिक तापन (टिंडलीकरण) बीजाणुओं को दो उबालों के बीच अंकुरित होने देता है और बनी ताप-संवेदी कोशिकाओं को मार देता है। वायुवाहित जीवाणु कारण नहीं हो सकते, क्योंकि उसी धूल-रहित वायु में मांस का शोरबा स्वच्छ रहता है, और जीवनी-शक्ति वाला विचार ठीक वही दावा है जिसका यह प्रयोग खंडन करता है।
  6. पोषक शोरबे के साथ पाश्चर के हंस-ग्रीवा प्रयोग को दोहराने पर निम्नलिखित में से कौन-से परिणाम अपेक्षित हैं?

    1. जिस फ्लास्क की मुड़ी ग्रीवा अक्षत छोड़ी गई है उसमें उबला शोरबा महीनों तक स्वच्छ रहता है
    2. फ्लास्क के निकट ग्रीवा तोड़ देने पर उबला शोरबा कुछ दिनों में धुँधला हो जाता है
    3. अक्षत मुड़ी ग्रीवा वाले फ्लास्क में बिना उबाला शोरबा स्वच्छ रहता है, क्योंकि ग्रीवा सारी धूल रोक लेती है
    4. फ्लास्क को इस प्रकार झुकाने पर कि शोरबा ग्रीवा के मोड़ तक जाकर लौट आए, उबला शोरबा धुँधला हो जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — जिस फ्लास्क की मुड़ी ग्रीवा अक्षत छोड़ी गई है उसमें उबला शोरबा महीनों तक स्वच्छ रहता है; B — फ्लास्क के निकट ग्रीवा तोड़ देने पर उबला शोरबा कुछ दिनों में धुँधला हो जाता है; D — फ्लास्क को इस प्रकार झुकाने पर कि शोरबा ग्रीवा के मोड़ तक जाकर लौट आए, उबला शोरबा धुँधला हो जाता है

    अक्षत ग्रीवा वायु आने देती है पर धूल रोक लेती है, अतः उबला शोरबा निर्जर्म रहता है; ग्रीवा हटाने पर, या झुकाकर फँसी धूल को शोरबे में बहा देने पर, रोगाणु पहुँचते हैं और शोरबा बिगड़ जाता है। बिना उबाले शोरबे में उसके अवयवों से आए जीवित सूक्ष्मजीव पहले से होते हैं, अतः ग्रीवा उसे स्वच्छ नहीं रख सकती; प्रयोग पहले उबालने पर निर्भर है।
  7. एडुआर्ड बुख़नर ने पिसे यीस्ट से निचोड़े और अक्षत कोशिकाओं से मुक्त किए गए रस से शर्करा का ऐल्कोहॉली किण्वन प्राप्त किया। इस परिणाम ने क्या दिखाया?

    1. किण्वन ऐसे एंज़ाइमों से उत्प्रेरित होता है जो जीवित कोशिका के बाहर भी सक्रिय रहते हैं
    2. किण्वन को अक्षत जीवित यीस्ट कोशिकाएँ चाहिए, ठीक जैसा पाश्चर ने तर्क दिया था
    3. किण्वन शर्करा का अनुत्प्रेरित क्षय है जिसमें कोई यीस्ट पदार्थ नहीं चाहिए
    4. यीस्ट रस में जीवित जीवाणु होते हैं जो यीस्ट टूटने पर किण्वन सँभाल लेते हैं
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    उत्तर: A — किण्वन ऐसे एंज़ाइमों से उत्प्रेरित होता है जो जीवित कोशिका के बाहर भी सक्रिय रहते हैं

    कोशिका-मुक्त निष्कर्ष ने भी किण्वन किया, अतः सक्रियता जीवित कोशिका में नहीं, अणुओं (बुख़नर का ज़ाइमेज़, एंज़ाइमों का मिश्रण) में है। इसने पाश्चर की कठोर जीवनवादी व्याख्या का खंडन किया, जो लुभावना विकल्प है, और साथ ही दिखाया कि यीस्ट पदार्थ आवश्यक है, अतः अनुत्प्रेरित क्षय का विचार भी गलत है। रस कोशिकाओं से छाना गया था, अतः संदूषक जीवित जीवाणु बाहर हैं।
  8. Beggiatoa व नाइट्रीकारी जीवाणुओं पर विनोग्रैडस्की के अध्ययनों ने कौन-सी अवधारणा स्थापित की?

    1. किण्वन, जिसमें एक कार्बनिक यौगिक इलेक्ट्रॉन दाता व ग्राही दोनों होता है
    2. सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण, मूल-ग्रंथिकाओं में N₂ का अमोनिया में अपचयन
    3. रसअकार्बनिकपोषण, अकार्बनिक H₂S, NH₃ या NO₂⁻ के ऑक्सीकरण से ऊर्जा पाना
    4. तालाबों में बैंगनी व हरे सल्फ़र जीवाणुओं द्वारा अनॉक्सीजनी प्रकाश-संश्लेषण
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    उत्तर: C — रसअकार्बनिकपोषण, अकार्बनिक H₂S, NH₃ या NO₂⁻ के ऑक्सीकरण से ऊर्जा पाना

    Beggiatoa H₂S का और नाइट्रीकारक अमोनिया व नाइट्राइट का ऑक्सीकरण करते हैं और उस ऊर्जा से CO₂ स्थिर करते हैं: रसअकार्बनिकपोषण, जिसकी खोज विनोग्रैडस्की ने की। बैंगनी व हरे सल्फ़र जीवाणु भी H₂S प्रयोग करते हैं, इसलिए अनॉक्सीजनी प्रकाश-संश्लेषण लुभावना विकल्प है, पर वे उसे प्रकाश-चालित वृद्धि में इलेक्ट्रॉन दाता के रूप में प्रयोग करते हैं, अँधेरे में ऊर्जा-स्रोत के रूप में नहीं। ग्रंथिका नाइट्रोजन स्थिरीकरण अन्य वैज्ञानिकों ने दिखाया।
  9. मिट्टी को वायु में, मैनिटॉल व खनिज लवणों वाले ऐसे तरल माध्यम में ऊष्मायित किया जाता है जिसमें कोई संयुक्त नाइट्रोजन नहीं है। ताज़े माध्यम में कई बार स्थानांतरण के बाद N₂ स्थिर कर सकने वाली बड़ी वायुजीवी कोशिकाएँ प्रबल हो जाती हैं। यह विधि और सबसे संभावित समृद्ध जीव हैं

    1. कॉख की शुद्ध-संवर्धन रेखन विधि, अवायुजीवी नाइट्रोजन-स्थिरक Clostridium pasteurianum को समृद्ध करती हुई
    2. विनोग्रैडस्की स्तंभ, प्रकाश-आश्रित हेटेरोसिस्टयुक्त सायनोजीवाणु Anabaena को समृद्ध करता हुआ
    3. पाश्चर की किण्वन विधि, अम्ल-सहिष्णु लैक्टिक अम्ल जीवाणु Lactobacillus को समृद्ध करती हुई
    4. बेयरिंक की संवर्धन-समृद्धि, मुक्तजीवी वायुजीवी नाइट्रोजन-स्थिरक Azotobacter को समृद्ध करती हुई
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    उत्तर: D — बेयरिंक की संवर्धन-समृद्धि, मुक्तजीवी वायुजीवी नाइट्रोजन-स्थिरक Azotobacter को समृद्ध करती हुई

    संयुक्त नाइट्रोजन-रहित माध्यम N₂-स्थिरकों के अनुकूल है; कार्बनिक कार्बन-स्रोत के साथ वायवीय ऊष्मायन वायुजीवी परपोषियों के अनुकूल है; क्रमिक स्थानांतरण बेयरिंक की संवर्धन-समृद्धि की पहचान है, जिससे उन्होंने 1901 में Azotobacter पृथक किया। Clostridium pasteurianum N₂ स्थिर करता है पर कठोर अवायुजीवी है और वातित माध्यम में नहीं पनपेगा; Anabaena को प्रकाश चाहिए, और Lactobacillus N₂ स्थिर नहीं कर सकता।
  10. मिट्टी के सूक्ष्मजीव वायवीय परिस्थितियों में 45 g ग्लूकोज़ (C₆H₁₂O₆) का CO₂ व जल तक पूर्ण ऑक्सीकरण करते हैं। C = 12, H = 1 व O = 16 लेते हुए, मुक्त CO₂ का द्रव्यमान ____ g है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 66

    C₆H₁₂O₆ + 6 O₂ → 6 CO₂ + 6 H₂O। M(ग्लूकोज़) = 6(12) + 12(1) + 6(16) = 180 g mol⁻¹, अतः 45 g = 0.25 mol। बनी CO₂ = 6 × 0.25 = 1.5 mol, और M(CO₂) = 44 g mol⁻¹, अतः 1.5 × 44 = 66 g। गुणक 6 भूलने पर 11 g आता है।
  11. कौन-सा प्रेक्षण विशेष रूप से कॉख की पहली अभिधारणा का विरोध करता है, न कि दूसरी, तीसरी या चौथी का?

    1. प्रकोप के दौरान स्वस्थ लोग बिना लक्षणों के आँत में Vibrio cholerae वहन करते हैं
    2. Mycobacterium leprae किसी भी कोशिका-मुक्त प्रयोगशाला संवर्धन माध्यम पर नहीं उगाया जा सकता
    3. संवर्धित जीव से संरोपित करने पर किसी भी प्राणी-जाति में वह मानव रोग विकसित नहीं होता
    4. संरोपित प्राणी से पुनः प्राप्त जीव उस जीव से भिन्न है जिसे संरोपित किया गया था
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    उत्तर: A — प्रकोप के दौरान स्वस्थ लोग बिना लक्षणों के आँत में Vibrio cholerae वहन करते हैं

    पहली अभिधारणा माँगती है कि सूक्ष्मजीव रोग के हर मामले में हो और स्वस्थ परपोषियों में न हो; लक्षणहीन वाहक इस शर्त का दूसरा भाग तोड़ते हैं। M. leprae को संवर्धन में न उगा पाना दूसरी अभिधारणा का, प्राणी-मॉडल का अभाव तीसरी का, और पुनः पृथक्करण पर भिन्न जीव मिलना चौथी का उल्लंघन है।
  12. एक उदाहरणात्मक वार्ड-अभिलेख में, डॉक्टरों के क्लोरीनयुक्त चूने से हाथ धोना आरंभ करने से पहले के वर्ष 5000 में से 600 माताओं की प्रसूति-ज्वर से मृत्यु हुई, और बाद के वर्ष 4500 में से 90 की। मृत्यु-दर में आपेक्षिक कमी ____ % है (एक दशमलव स्थान तक)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 83.3

    पहले की दर = 600/5000 = 0.12 (12%)। बाद की दर = 90/4500 = 0.02 (2%)। आपेक्षिक कमी = (12 − 2)/12 × 100 = 83.33%, जो एक दशमलव स्थान तक 83.3 है। निरपेक्ष कमी 10 प्रतिशत-अंक है, जो सामान्य भूल है; केवल मृत्यु-संख्याओं की तुलना (600 से 90, 85%) प्रसवों की भिन्न संख्या की उपेक्षा करती है।
  13. शल्य-क्रिया के बाद संक्रमण रोकने हेतु घावों, पट्टियों व शल्य उपकरणों को कार्बोलिक अम्ल से उपचारित करना किसने आरंभ किया?

    1. इग्नाज़ सेमेल्वाइस
    2. जोसेफ़ लिस्टर
    3. जॉन स्नो
    4. रॉबर्ट कॉख
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    उत्तर: B — जोसेफ़ लिस्टर

    लिस्टर ने कार्बोलिक अम्ल (फ़ीनॉल) से अपनी पूतिरोधी विधि 1867 में प्रकाशित की। सेमेल्वाइस लुभावना विकल्प है, पर उनका उपाय (1847) प्रसूति-वार्ड में स्त्रियों की जाँच से पहले क्लोरीनयुक्त चूने से हाथ धोना था, शल्य घावों का उपचार नहीं। स्नो ने हैज़े को एक जल-पंप से जोड़ा, और कॉख ने ऐन्थ्रैक्स व क्षयरोग के विशिष्ट कारण सिद्ध किए।
  14. मूल रूप में कही गई कॉख की अभिधारणाओं की वास्तविक सीमाएँ निम्नलिखित में से कौन-सी हैं?

    1. Mycobacterium leprae व Treponema pallidum कोशिका-मुक्त संवर्धन माध्यमों में नहीं उगाए जा सकते
    2. कुछ रोगजनक ऐसे स्वस्थ लोगों द्वारा वहन किए जाते हैं जिनमें रोग कभी विकसित नहीं होता
    3. Bacillus anthracis बीजाणु बनाता है और ठोस माध्यम पर संवर्धित कर चूहों में अंतःक्षेपित किया जा सकता है
    4. केवल मनुष्य को संक्रमित करने वाले रोगजनक हेतु तीसरी अभिधारणा जाँचने के लिए लोगों को जान-बूझकर संक्रमित करना अनैतिक है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Mycobacterium leprae व Treponema pallidum कोशिका-मुक्त संवर्धन माध्यमों में नहीं उगाए जा सकते; B — कुछ रोगजनक ऐसे स्वस्थ लोगों द्वारा वहन किए जाते हैं जिनमें रोग कभी विकसित नहीं होता; D — केवल मनुष्य को संक्रमित करने वाले रोगजनक हेतु तीसरी अभिधारणा जाँचने के लिए लोगों को जान-बूझकर संक्रमित करना अनैतिक है

    असंवर्धनीय रोगजनक दूसरी अभिधारणा को, स्वस्थ वाहक पहली को, और मनुष्यों में संरोपण की नैतिकता तीसरी को रोकते हैं। ऐन्थ्रैक्स दंडाणु कोई सीमा नहीं है: उसने हर अभिधारणा पूरी की और 1876 में वह कॉख का अपना आदर्श उदाहरण था।
  15. इवानोव्स्की की 1892 की यह खोज कि मोज़ेक-रोगी तंबाकू का रस जीवाणु रोकने वाले फ़िल्टर से गुज़रने के बाद भी संक्रामक रहा, महत्वपूर्ण थी क्योंकि उसने

    1. सिद्ध किया कि रोग पत्तियों में बढ़ते जीवाणुओं द्वारा स्रावित किसी विष से होता है
    2. दिखाया कि कारक प्रोटीन उपइकाइयों के आवरण में बंद एक न्यूक्लिक अम्ल है
    3. जीवाणु से भी छोटा एक संक्रामक कारक प्रकट किया, जिसे बाद में विषाणु पहचाना गया
    4. दिखाया कि कारक को जीवाणु की भाँति पोषक अगार पर शुद्ध संवर्धन में उगाया जा सकता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — जीवाणु से भी छोटा एक संक्रामक कारक प्रकट किया, जिसे बाद में विषाणु पहचाना गया

    जीवाणु-रोधी फ़िल्टर पार करना जीवाणु से छोटे कारक का संकेत था; फिर बेयरिंक (1898) ने तर्क दिया कि यह एक नए प्रकार का कारक है जो केवल जीवित ऊतक में गुणित होता है, और विषाणु (virus) शब्द प्रचलित हुआ। विष वाला विचार लुभावना विकल्प है क्योंकि स्वयं इवानोव्स्की ने उस पर विचार किया था, पर उनके निस्यंद में विष कभी सिद्ध नहीं हुआ। उसकी न्यूक्लिक अम्ल व प्रोटीन संरचना दशकों बाद ज्ञात हुई, और यह कारक अगार पर नहीं उगता।
  16. निम्नलिखित में से कौन-से खोजकर्ता–खोज युग्म सही सुमेलित हैं?

    1. पॉल एर्लिख़: साल्वर्सन, सिफ़िलिस के विरुद्ध संश्लेषित आर्सेनिक औषधि
    2. सेल्मन वैक्समैन की प्रयोगशाला: Penicillium फफूँद से पेनिसिलिन
    3. गेरहार्ड डोमाक: प्रोंटोसिल, नैदानिक रूप से प्रयुक्त पहली सल्फ़ोनामाइड औषधि
    4. एमिल फ़ॉन बेहरिंग व कितासातो शिबासाबुरो: डिफ़्थीरिया व टिटनेस के विरुद्ध प्रतिविष
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पॉल एर्लिख़: साल्वर्सन, सिफ़िलिस के विरुद्ध संश्लेषित आर्सेनिक औषधि; C — गेरहार्ड डोमाक: प्रोंटोसिल, नैदानिक रूप से प्रयुक्त पहली सल्फ़ोनामाइड औषधि; D — एमिल फ़ॉन बेहरिंग व कितासातो शिबासाबुरो: डिफ़्थीरिया व टिटनेस के विरुद्ध प्रतिविष

    एर्लिख़ का साल्वर्सन (1910), डोमाक का प्रोंटोसिल (1930 का दशक) और बेहरिंग व कितासातो का प्रतिविष (1890) सही सुमेलित हैं। पेनिसिलिन फ़्लेमिंग की खोज (1928) था; वैक्समैन की प्रयोगशाला ने 1940 के दशक में Streptomyces से स्ट्रेप्टोमाइसिन खोजा।
  17. ताप से मारे गए चिकने (S) न्यूमोकोकाई का निष्कर्ष जीवित खुरदरी (R) कोशिकाओं को S कोशिकाओं में बदल देता है। निष्कर्ष के भागों को R कोशिकाओं में मिलाने से पहले एक-एक एंज़ाइम से उपचारित किया जाता है। कौन-सा परिणाम DNA को रूपांतरक तत्व पहचानता है?

    1. प्रोटिएज़ उपचार के बाद सक्रियता नष्ट होती है पर डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिएज़ उपचार के बाद बनी रहती है
    2. डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिएज़ के बाद सक्रियता नष्ट होती है पर प्रोटिएज़ व राइबोन्यूक्लिएज़ के बाद बनी रहती है
    3. राइबोन्यूक्लिएज़ उपचार के बाद सक्रियता नष्ट होती है पर डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिएज़ उपचार के बाद बनी रहती है
    4. सक्रियता तीनों एंज़ाइमों के बाद बनी रहती है पर निष्कर्ष उबालने पर नष्ट हो जाती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिएज़ के बाद सक्रियता नष्ट होती है पर प्रोटिएज़ व राइबोन्यूक्लिएज़ के बाद बनी रहती है

    यदि सक्रियता DNA में है तो केवल DNA नष्ट करने वाला एंज़ाइम उसे समाप्त करेगा, और प्रोटीन या RNA नष्ट करने वाले एंज़ाइम उसे अक्षत छोड़ेंगे; यही एवरी, मैकलॉयड व मैकार्टी (1944) का तर्क था। प्रोटिएज़ के बाद हानि प्रोटीन की ओर और राइबोन्यूक्लिएज़ के बाद हानि RNA की ओर संकेत करती। उबालने पर हानि भेद नहीं कर सकती, और निष्कर्ष तो बना ही ताप से मारी कोशिकाओं से था।