पादप वर्गिकी: नामपद्धति, वर्गीकरण, APG, प्रमुख कुल, क्लैडिस्टिक्स व DNA बारकोडिंग

यह अध्याय जीवन विज्ञान (XL) पेपर के पाँच वैकल्पिक खंडों में से एक, XL2 वनस्पति विज्ञान, के खंड XL2.1 का उत्तर देता है: “वानस्पतिक नामपद्धति; पादप वर्गिकी का इतिहास; पादपों की विविधता व वर्गीकरण; पादप वर्गीकरण की APG पद्धति; प्रमुख कुल जैसे Apiaceae, Apocynaceae, Asteraceae, Lamiaceae, Myrtaceae, Solanaceae, Verbenaceae, Poaceae व Orchidaceae; जातिवृत्त विज्ञान व क्लैडिस्टिक्स; आणविक वर्गिकी व DNA बारकोडिंग; भारत में पादप वर्गिकी के केंद्र व हर्बेरियम।” यह वानस्पतिक संहिता व उसके प्रारूप, कृत्रिम से प्राकृतिक और फिर जातिवृत्तीय पद्धतियों तक की यात्रा, APG का ढाँचा, नौ नामित कुलों के नैदानिक लक्षण व पुष्प-सूत्र, क्लैडोग्राम कैसे बनाए व आँके जाते हैं, DNA बारकोड पादपों को कैसे पहचानते हैं, तथा भारत के संदर्भ-संग्रह रखने वाले संस्थान व हर्बेरियम पढ़ाता है। इसके संख्यात्मक प्रश्न पुष्प-सूत्र गणनाएँ, मितव्ययिता चरण-गणनाएँ, संगति सूचकांक और संभव वृक्षों की संख्या हैं।

1. वानस्पतिक नामपद्धति: संहिता, उसके सिद्धांत व प्रारूप

पादपों के नाम शैवाल, कवक व पादपों की अंतरराष्ट्रीय नामपद्धति संहिता (ICN) से नियंत्रित होते हैं, जिसे 2011 तक ICBN कहा जाता था और जो प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय वनस्पति कांग्रेस के बाद संशोधित होती है। यह छह सिद्धांतों पर टिकी है:
(I) वानस्पतिक नामपद्धति प्राणि-वैज्ञानिक व जीवाणु-वैज्ञानिक नामपद्धति से स्वतंत्र है;
(II) नाम नामपद्धतीय प्रारूपों (types) के माध्यम से लागू होते हैं;
(III) सही नाम प्रकाशन की प्राथमिकता पर आधारित है;
(IV) दिए गए परिसीमन, स्थिति व श्रेणी वाले टैक्सॉन का केवल एक सही नाम होता है, सबसे पहला वैध (legitimate) नाम;
(V) वैज्ञानिक नाम लैटिन माने जाते हैं;
(VI) नियम पूर्वव्यापी हैं। अधिकांश पादपों हेतु प्राथमिकता लिनियस की Species Plantarum (1 मई 1753) से आरंभ होती है।

जाति का नाम द्विनाम (binomial) होता है: बड़े अक्षर से आरंभ होने वाला वंश-नाम और छोटे अक्षर का जाति-विशेषण (specific epithet), तिरछे अक्षरों में, जिसके बाद लेखक-उद्धरण आता है, जैसे Mangifera indica L. (L. = लिनियस)। जब कोई जाति दूसरे वंश में ले जाई जाती है तो मूल लेखक कोष्ठक में और नए संयोजन का लेखक उसके बाद लिखा जाता है। नया नाम वैध रूप से प्रकाशित होना चाहिए: मान्य श्रेणी, लैटिन में या (2012 से) अंग्रेज़ी में विवरण या निदान, और नई जाति हेतु प्रारूप का निर्धारण। टॉटोनिम, जिसमें विशेषण वंश-नाम को हूबहू दोहराता है (Linaria linaria), वनस्पति विज्ञान में मान्य नहीं, यद्यपि प्राणि विज्ञान इन्हें स्वीकारता है। श्रेणी-प्रत्यय निश्चित हैं: गण -ales, कुल -aceae, उपकुल -oideae, जनजाति (tribe) -eae। आठ कुलों के संरक्षित वैकल्पिक नाम भी मान्य हैं: Compositae (Asteraceae), Umbelliferae (Apiaceae), Labiatae (Lamiaceae), Gramineae (Poaceae), Cruciferae (Brassicaceae), Leguminosae (Fabaceae), Palmae (Arecaceae) व Guttiferae (Clusiaceae)।

नामपद्धतीय प्रारूप
प्रारूपक्या है
होलोटाइपमूल प्रकाशन में लेखक द्वारा प्रारूप के रूप में निर्दिष्ट एकमात्र नमूना (या चित्र)
आइसोटाइपहोलोटाइप की द्विप्रति: उसी संग्रह का भाग, प्रायः किसी अन्य हर्बेरियम में रखा
सिनटाइपहोलोटाइप निर्दिष्ट न होने पर मूल प्रकाशन में उद्धृत दो या अधिक नमूनों में से कोई भी
लेक्टोटाइपहोलोटाइप निर्दिष्ट न होने या खो जाने पर मूल सामग्री में से बाद में चुना गया नमूना
नियोटाइपसमस्त मूल सामग्री नष्ट हो जाने पर चुना गया नमूना
एपिटाइपऐसे अस्पष्ट प्रारूप की व्याख्या निश्चित करने हेतु चुना गया नमूना जिससे टैक्सॉन पहचाना न जा सके
पैराटाइपमूल प्रकाशन में उद्धृत वह नमूना जो न होलोटाइप है न आइसोटाइप
⚠️ लेक्टोटाइप या नियोटाइप?
लेक्टोटाइप मूल सामग्री (वे नमूने या चित्र जो लेखक ने प्रयुक्त किए) में से चुना जाता है; नियोटाइप तभी चुना जा सकता है जब कोई मूल सामग्री शेष न हो। आइसोटाइप कभी ‘चुना’ नहीं जाता: वह होलोटाइप के ही संग्रह से उसकी द्विप्रति मात्र है।

2. पादप वर्गिकी का इतिहास व पादपों की विविधता

वर्गीकरण तीन चरणों से गुज़रा है। कृत्रिम पद्धतियों ने एक या कुछ सुविधाजनक लक्षण प्रयुक्त किए: थियोफ्रेस्टस, जिन्हें प्रायः वनस्पति विज्ञान का जनक कहा जाता है, ने स्वभाव के आधार पर पादपों को वृक्ष, झाड़ी, उपझाड़ी व शाक में बाँटा, और लिनियस की लैंगिक पद्धति ने मुख्यतः पुंकेसरों की संख्या, संयोजन व सापेक्ष लंबाई से पादपों को 24 वर्गों में रखा, जिनमें 24वाँ वर्ग (Cryptogamia) दृश्य पुष्पों से रहित पादपों का था। प्राकृतिक पद्धतियों ने अनेक लक्षणों की समग्र समानता से समूह बनाए; सर्वाधिक प्रभावशाली, बेंथम व हूकर की Genera Plantarum (1862–1883), ने द्विबीजपत्रियों को Polypetalae, Gamopetalae व Monochlamydeae में बाँटा, पर अनावृतबीजियों को द्विबीजपत्रियों व एकबीजपत्रियों के बीच रख दिया। जातिवृत्तीय पद्धतियाँ टैक्सा को अनुमानित वंशक्रम से व्यवस्थित करती हैं। एंगलर व प्रैंटल ने सरल, एकलिंगी, कैटकिन-धारी पुष्पों (Amentiferae) को आदिम माना; बेसी के सूत्रों (dicta) ने अनेक भागों वाले, सर्पिल रूप से व्यवस्थित, मैग्नोलिया-सदृश (Ranalian) पुष्प को आदिम ठहराया; तख्ताजान व क्रॉनक्विस्ट (जिनकी 1981 की पद्धति ने Magnoliopsida व Liliopsida माने) ने इसी दृष्टि को आगे बढ़ाया, और APG वर्गीकरणों ने इन सबको DNA से अनुमानित क्लेडों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया।

व्यापक अर्थ में पादप शैवालों से आरंभ होकर ब्रायोफ़ाइट (प्रभावी युग्मकोद्भिद, संवहन ऊतक नहीं), टेरिडोफ़ाइट (संवहनी व बीजाणु-धारी, स्वतंत्र बीजाणुद्भिद व युग्मकोद्भिद सहित) और अनावृतबीजी (नग्न बीजांड, फल नहीं) से होते हुए आवृतबीजी (अंडप में बंद बीजांड, द्विनिषेचन, फल) तक जाते हैं; आइकलर का पुराना क्रिप्टोगैम–फ़ैनरोगैम विभाजन पाठ्यपुस्तकों में अब भी मिलता है। आवृतबीजियों में तीन छिद्रों वाला (ट्राइकॉल्पेट) पराग यूडिकॉट नामक क्लेड का चिह्न है, जबकि शेष ‘द्विबीजपत्री’ (ANA श्रेणी व मैग्नोलिड) पहले ही अलग हो जाते हैं। अतः एकबीजपत्री पुराने द्विबीजपत्री समूह के भीतर आते हैं, और पुराने अर्थ में द्विबीजपत्री पैराफ़ाइलेटिक हैं।

3. APG पद्धति

आवृतबीजी जातिवृत्त समूह (Angiosperm Phylogeny Group) ने APG (1998), APG II (2003), APG III (2009) व APG IV (2016) प्रकाशित किए; APG IV 64 गण व 416 कुल मानता है। यह केवल एकस्रोती (monophyletic) गण व कुल स्वीकारता है, जो मुख्यतः लवक जीनों (rbcL, matK, atpB) व केंद्रकीय राइबोसोमीय DNA से अनुमानित हैं, और गण से ऊपर औपचारिक वर्गों के स्थान पर अनौपचारिक क्लेडों के नाम देता है। मूल से आरंभ कर इसका ढाँचा:

  • ANA श्रेणी (grade): Amborellales (Amborella trichopoda, शेष सभी जीवित आवृतबीजियों की सहोदर शाखा, वाहिकाविहीन), Nymphaeales (कुमुदिनी) व Austrobaileyales।
  • मैग्नोलिड: Magnoliales, Laurales, Piperales व Canellales।
  • एकबीजपत्री: Alismatales, Liliales, Asparagales (Orchidaceae) तथा कॉमेलिनिड, जिनमें Poales (Poaceae), Arecales व Zingiberales हैं।
  • यूडिकॉट: आधार पर Ranunculales, फिर कोर यूडिकॉट, जो सुपररोज़िड में बँटते हैं, जिनके रोज़िड में Myrtales (Myrtaceae) है, और सुपरऐस्टरिड में, जिनके ऐस्टरिड दो क्लेड बनाते हैं: लैमिइड, जिनमें Gentianales (Apocynaceae), Solanales (Solanaceae) व Lamiales (Lamiaceae, Verbenaceae) हैं, तथा कैम्पैनुलिड, जिनमें Asterales (Asteraceae) व Apiales (Apiaceae) हैं।

APG ने पाठ्यपुस्तकों के कई कुल फिर से परिभाषित किए क्योंकि वे एकस्रोती नहीं थे। Asclepiadaceae (Calotropis जैसे आक) अब Apocynaceae का उपकुल Asclepiadoideae है। Verbenaceae के अधिकांश काष्ठीय वंश, Tectona (सागौन), Vitex, Clerodendrum, Gmelina व Premna, Lamiaceae में चले गए, और मैंग्रोव Avicennia Acanthaceae में; संकीर्ण अर्थ में Verbenaceae में Verbena, Lantana, Lippia व Duranta रहे।

4. पाठ्यक्रम में नामित नौ कुल

प्रत्येक कुल को लक्षणों के ऐसे छोटे समूह के रूप में याद करें जो मिलकर उसकी पहचान दें। सूत्रों में ⊕ त्रिज्यसममित, % एकव्याससममित, ⚥ द्विलिंगी, K बाह्यदलपुंज, C दलपुंज, P परिदलपुंज, A पुमंग, G जायांग और ∞ असंख्य है, तथा कोष्ठक एक चक्र के भीतर संयोजन दर्शाता है। पाठ्यपुस्तकें ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय को G के नीचे रेखा से और अधोवर्ती को G के ऊपर रेखा से दिखाती हैं; यहाँ स्थिति शब्दों में लिखी है।

नामित कुलों के नैदानिक लक्षण (प्रतिनिधि सदस्य)
कुल (गण)नैदानिक लक्षणप्रतिनिधि पुष्प-सूत्रउदाहरण
Apiaceae (Apiales)तैल-नलिकाओं व खोखले तनों वाले सुगंधित शाक; आच्छदी आधार वाली बहु-विभाजित पत्तियाँ; संयुक्त छत्रक; ह्रासित बाह्यदलपुंज वाले छोटे अधिजायांगी पुष्प; मकरंद-चक्रिका (स्टाइलोपोडियम) पर दो वर्तिकाएँ; प्रति कोष्ठ एक लटकता बीजांड; फल क्रीमोकार्प, कार्पोफ़ोर से लटकते दो मेरिकार्पों का⊕ ⚥ K5 (अति सूक्ष्म) C5 A5 G(2), अधोवर्तीCoriandrum sativum, Daucus carota, Foeniculum vulgare, Cuminum cyminum, Conium maculatum (विषैला हेमलॉक)
Apocynaceae (Gentianales)दूधिया आक्षीर (latex); सम्मुख या चक्रिक, अनुपर्ण-रहित पत्तियाँ; व्यावर्तित (contorted) दलपुंज-विन्यास वाले पंचतयी पुष्प; दललग्न पुंकेसर; दो अंडप, अंडाशय-स्तर पर पृथक पर वर्तिका-शीर्ष से जुड़े; फल फ़ॉलिकल का जोड़ा, बीज प्रायः रोम-गुच्छी; Asclepiadoideae में कोरोना व परागपिंड (pollinia) भी⊕ ⚥ K(5) C(5) A5 G2, ऊर्ध्ववर्ती (अंडाशय पृथक)Catharanthus roseus (विनब्लास्टीन, विनक्रिस्टीन), Rauvolfia serpentina (रेसरपीन), Nerium oleander, Calotropis procera
Asteraceae (Asterales)सहपत्रों के निचक्र से घिरे साझा पुष्पासन पर अवृंत पुष्पकों का मुंडक (capitulum); बाहरी रश्मि-पुष्पक जिह्वाकार, एकव्याससममित, मादा या नपुंसक; केंद्रीय बिंब-पुष्पक नलिकाकार, द्विलिंगी; बाह्यदलपुंज पैपस या अनुपस्थित; परागकोश जुड़े (युक्तकोशी), पुतंतु पृथक; एक आधारी बीजांड वाला अधोवर्ती एककोष्ठी अंडाशय; फल सिप्सेलाबिंब-पुष्पक: ⊕ ⚥ K पैपस C(5) A5 (परागकोश जुड़े, दललग्न) G(2), अधोवर्तीHelianthus annuus, Carthamus tinctorius, Tagetes, Lactuca sativa, Artemisia annua (आर्टेमिसिनिन), Parthenium hysterophorus
Lamiaceae (Lamiales)ग्रंथिल रोमों वाले सुगंधित शाक या झाड़ियाँ; चतुष्कोणीय तने; सम्मुख-क्रॉसित पत्तियाँ; कूट-चक्रक (verticillaster); द्वि-ओष्ठी दलपुंज; चार द्विदीर्घी दललग्न पुंकेसर (Salvia में दो); पारंपरिक सदस्यों में गहराई से चार-पालित ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय व जायांगाधारी (gynobasic) वर्तिका; फल चार नटलेट का% ⚥ K(5) C(5) A4 (द्विदीर्घी) G(2), ऊर्ध्ववर्तीOcimum tenuiflorum (तुलसी), Mentha, Salvia, Leucas; APG के बाद Tectona grandis भी
Verbenaceae (Lamiales)सम्मुख पत्तियों वाले शाक या झाड़ियाँ, नए तने प्रायः चतुष्कोणीय; पुष्प शूकियों या मुंडकों में, किंचित एकव्याससममित; चार द्विदीर्घी दललग्न पुंकेसर; द्विअंडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय गहराई से पालित नहीं, प्रति कोष्ठ एक बीजांड, शीर्षस्थ वर्तिका; फल अष्ठिफल (drupe) या नटलेटों में विभाजित% ⚥ K(4–5) C(4–5) A4 (द्विदीर्घी) G(2), ऊर्ध्ववर्तीLantana camara (लैंटाना, एक आक्रामक खरपतवार), Verbena, Duranta erecta, Lippia
Myrtaceae (Myrtales)वृक्ष व झाड़ियाँ; अछिन्न, प्रायः सम्मुख, ग्रंथि-बिंदुकित सुगंधित पत्तियाँ; द्विपार्श्व पूल; असंख्य पुंकेसरों वाले 4–5 तयी पुष्प; स्तंभीय बीजांडन्यास वाला अधोवर्ती युक्तांडपी अंडाशय; फल बेरी (Syzygium, Psidium) या संपुट (Eucalyptus, जिसका परिदलपुंज एक टोपी, ऑपरकुलम, बनाता है जो पुष्पन पर गिरती है)⊕ ⚥ K4–5 C4–5 A∞ G(2–5), अधोवर्तीEucalyptus, Syzygium cumini (जामुन), S. aromaticum (लौंग: सूखी पुष्प-कलिकाएँ), Psidium guajava
Solanaceae (Solanales)एकांतर पत्तियों वाले शाक व झाड़ियाँ; द्विपार्श्व पूल; चिरलग्न बाह्यदलपुंज (Physalis में फल के चारों ओर बढ़ता) वाले पंचतयी पुष्प; पाँच दललग्न पुंकेसर; तिरछे पट व अनेक बीजांडों वाले फूले स्तंभीय बीजांडासनों सहित द्विअंडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय; फल बेरी या संपुट (Datura, कूट-पट से चार-कोष्ठी)⊕ ⚥ K(5) C(5) A5 G(2), ऊर्ध्ववर्तीSolanum tuberosum, S. lycopersicum, S. melongena, Capsicum annuum, Nicotiana tabacum, Atropa belladonna (एट्रोपीन), Withania somnifera
Poaceae (Poales)शाक (बाँस काष्ठीय); कल्म (culm) में खोखले पर्व व ठोस पर्वसंधियाँ (मक्का व गन्ने में पर्व ठोस); आच्छद, लिग्यूल व फलक वाली द्विपंक्तिक पत्तियाँ; पुष्पक्रम की इकाई स्पाइकिका (spikelet): दो तुष (glume) व पुष्पक, प्रत्येक लेमा व पेलिया के भीतर; परिदलपुंज लोडिक्यूल में ह्रासित; प्रायः तीन पुंकेसर (धान व बाँस में छह), मुक्तदोली परागकोश; एक बीजांड वाला अंडाशय, दो पिच्छाकार वर्तिकाग्र; वायु-परागित; फल कैरिऑप्सिस⚥ P2–3 (लोडिक्यूल) A3 (धान में 6) G(2–3) एक कोष्ठ सहित (प्रायः G1 लिखा जाता है), ऊर्ध्ववर्तीOryza sativa, Triticum aestivum, Zea mays (उभयलिंगाश्रयी), Saccharum officinarum, Bambusa
Orchidaceae (Asparagales)बहुवर्षी शाक, स्थलीय या अधिपादपी (वेलामेन युक्त वायवीय जड़ें); एकव्याससममित, अधिजायांगी, प्रायः पुनर्विन्यासी (resupinate) पुष्प (अंडाशय या वृंत 180° मुड़ा); छह परिदल, मध्य का भीतरी परिदल लेबेलम (ओष्ठक); पुंकेसर व वर्तिका जुड़कर स्तंभ (गाइनोस्टेमियम), अधिकांश ऑर्किडों में एक जनन-क्षम परागकोश (स्लिपर ऑर्किडों में दो); परागपिंड (pollinia); भित्तीय बीजांडन्यास वाला अधोवर्ती एककोष्ठी अंडाशय; भ्रूणपोष-रहित सूक्ष्म बीज, जिन्हें अंकुरण हेतु कवकमूल (mycorrhizal) कवक चाहिए% ⚥ P3+3 A1 G(3), अधोवर्तीVanda, Dendrobium, Cypripedium, Vanilla planifolia (संसाधित फलों से वनीला)
🧠 नौ एक-पंक्ति पहचान-सूत्र
छत्रक + क्रीमोकार्प: Apiaceae। आक्षीर + व्यावर्तित दलपुंज + दो पृथक अंडाशय: Apocynaceae। मुंडक + युक्तकोशी परागकोश + एक आधारी बीजांड: Asteraceae। चौकोर तना + द्वि-ओष्ठी दलपुंज + जायांगाधारी वर्तिका + चार नटलेट: Lamiaceae; यही योजना पर अपालित अंडाशय व शीर्षस्थ वर्तिका: Verbenaceae। ग्रंथि-बिंदु + असंख्य पुंकेसर + अधोवर्ती अंडाशय: Myrtaceae। तिरछा पट + फूला स्तंभीय बीजांडासन: Solanaceae। स्पाइकिका + लोडिक्यूल + कैरिऑप्सिस: Poaceae। स्तंभ + परागपिंड + लेबेलम: Orchidaceae।

5. जातिवृत्त विज्ञान व क्लैडिस्टिक्स

जातिवृत्त (phylogeny) वृक्ष के रूप में खींची गई वंशक्रम की परिकल्पना है; विली हेनिग द्वारा औपचारिक रूप दी गई क्लैडिस्टिक्स टैक्सा को केवल साझा व्युत्पन्न लक्षणों (synapomorphies) से समूहित करती है। किसी लक्षण की अवस्थाओं की ध्रुवता बाह्य-समूह तुलना (outgroup comparison) से तय होती है: अध्ययन-समूह से बाहर के निकट संबंधी में मिली अवस्था पूर्वज (प्लीसियोमॉर्फ़िक) और दूसरी व्युत्पन्न (एपोमॉर्फ़िक) मानी जाती है। साझा पूर्वज अवस्थाएँ (सिमप्लीसियोमॉर्फ़ी) और किसी एक टैक्सॉन तक सीमित अवस्थाएँ (ऑटएपोमॉर्फ़ी) समूहन के बारे में कुछ नहीं बतातीं, और अभिसरण, समांतरता या प्रत्यावर्तन से स्वतंत्र रूप से उपजी समानता होमोप्लेसी है। एकस्रोती (monophyletic) समूह (क्लेड) में एक पूर्वज व उसके सभी वंशज होते हैं, जैसे यूडिकॉट; पैराफ़ाइलेटिक समूह में पूर्वज व केवल कुछ वंशज, जैसे पारंपरिक द्विबीजपत्री; बहुस्रोती (polyphyletic) समूह भिन्न वंशक्रम के सदस्यों को किसी अभिसारी लक्षण से एकत्र करता है, जैसे एंगलर का Amentiferae।

दूरी विधियाँ (UPGMA, जो स्थिर दर मानती है, और नेबर-जॉइनिंग) युग्मवार अंतरों से टैक्सा को गुच्छित करती हैं, जैसे फ़ीनेटिक्स (संख्यात्मक वर्गिकी, स्नीथ व सोकाल) टैक्सा को समग्र समानता से समूहित करती थी। अधिकतम मितव्ययिता (maximum parsimony) उस वृक्ष को चुनती है जिसमें सबसे कम लक्षण-परिवर्तन (चरण, steps) लगें; अधिकतम संभाविता (maximum likelihood) व बेज़ियन अनुमान अनुक्रम-परिवर्तन के स्पष्ट मॉडल के अंतर्गत वृक्ष चुनते हैं। शाखा-समर्थन बूटस्ट्रैप प्रतिशत या पश्च प्रायिकताओं के रूप में बताया जाता है। किसी लक्षण का संगति सूचकांक (consistency index), CI = m/s, न्यूनतम संभव परिवर्तनों m (उसकी अवस्थाओं की संख्या से एक कम) को वृक्ष पर आवश्यक परिवर्तनों s से भाग देता है; CI = 1 का अर्थ है कोई होमोप्लेसी नहीं।

ℹ️ हल किया उदाहरण: चरणों की गणना
बाह्य-समूह O के साथ मूलित वृक्ष (O,(A,(B,(C,D)))) लें। दो अवस्थाओं वाला लक्षण जिसके अंक O 0, A 0, B 1, C 1, D 1 हैं, एक चरण माँगता है, (B,(C,D)) तक जाने वाली शाखा पर एक परिवर्तन, अतः वह उस क्लेड का सिनएपोमॉर्फ़ी है। अंक O 0, A 1, B 0, C 1, D 0 हों तो दो चरण लगते हैं (CI = 1/2 = 0.5): अवस्था 1 दो बार, A में व C में, उपजी, जो होमोप्लेसी है। वृक्षों की संख्या विस्फोटक रूप से बढ़ती है: n टैक्सा के (2n − 5)!! अमूलित व (2n − 3)!! मूलित द्विशाखी वृक्ष होते हैं, अतः 4 टैक्सा से 3 व 15, जबकि 10 टैक्सा से ही 2,027,025 अमूलित वृक्ष बनते हैं; इसीलिए अनुमानी (heuristic) खोज प्रयुक्त होती है।

6. आणविक वर्गिकी व DNA बारकोडिंग

आणविक वर्गिकी रसायन-वर्गिकी (द्वितीयक उपापचयज) व कोशिका-वर्गिकी (गुणसूत्र संख्या व आकृति) के क्रम में अणुओं को लक्षणों के रूप में लेती है। धीरे विकसित होने वाले जीन, जैसे लवक rbcL, गहरी शाखाएँ सुलझाते हैं (मार्क चेज़ के नेतृत्व में बीजी पादपों के 1993 के rbcL विश्लेषण ने APG की नींव रखी), जबकि तेज़ी से बदलने वाले क्षेत्र, जैसे केंद्रकीय राइबोसोमीय ITS, वंश व जाति स्तर सुलझाते हैं। फ़िंगरप्रिंटिंग चिह्नक (RAPD, AFLP, SSR या माइक्रोसैटेलाइट, SNP) उच्च टैक्सा के बजाय समष्टियों व किस्मों को अलग करते हैं।

DNA बारकोडिंग किसी नमूने को एक छोटे, मानकीकृत DNA क्षेत्र से पहचानती है, जिसे BOLD (Barcode of Life Data System) जैसे संदर्भ-पुस्तकालय से मिलाया जाता है। यह तभी कार्य करती है जब जातियों के बीच का अंतर जाति के भीतर की विविधता से अधिक हो, जिसे बारकोड अंतराल (barcode gap) कहते हैं। प्राणी माइटोकॉन्ड्रियल COI प्रयुक्त करते हैं, पर पादपों के माइटोकॉन्ड्रियल जीनों का अनुक्रम इतनी धीमी गति से बदलता है कि वे जातियों को अलग नहीं कर पाते; अतः CBOL Plant Working Group (2009) ने दो-लोकस लवक कोर बारकोड rbcL + matK चुना, जिसके पूरक ITS2 व trnH–psbA अंतरक हैं; कवकों हेतु ITS प्रयुक्त होता है। उपयोग: बंध्य, खंडित या संसाधित सामग्री (जड़, छाल, चूर्ण, बीज, इमारती लकड़ी) की पहचान, हर्बल औषधियों में मिलावट का पता लगाना, खाद्यों का प्रमाणीकरण, और मेटाबारकोडिंग द्वारा मिश्रित पर्यावरणीय नमूनों का सर्वेक्षण।

⚠️ बारकोड कहाँ विफल होते हैं
हाल में अलग हुई जातियाँ, संकर और अपूर्ण वंशावली-छँटाई (incomplete lineage sorting) एक ही बारकोड साझा कर सकते हैं। चूँकि अधिकांश आवृतबीजियों में लवक माता से वंशागत होते हैं, लवक बारकोड संकर के केवल मातृ-जनक का नाम बताता है। बारकोड किसी नमूने को ज्ञात जातियों के सापेक्ष पहचानता है; वह अपने-आप किसी नई जाति का परिसीमन नहीं करता।

7. भारत में पादप वर्गिकी के केंद्र व हर्बेरियम

हर्बेरियम (पादपालय) दबाकर सुखाए व कीट-रोधी बनाए गए नमूनों का संदर्भ-संग्रह है, जो मानक शीटों पर चिपकाए जाते हैं, जिनके लेबल पर नाम, स्थान, आवास, तिथि, संग्राहक व संख्या दर्ज होती है, और जो किसी वर्गीकरण पद्धति के अनुसार रखी जाती हैं; यह फ़्लोरा-लेखन, पहचान व प्रारूपों का साक्ष्य-आधार है। प्रत्येक हर्बेरियम का Index Herbariorum में पंजीकृत संक्षिप्त नाम होता है; रॉयल बॉटैनिक गार्डन्स, क्यू का संक्षिप्त नाम K है। भारत में भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (Botanical Survey of India, BSI), जिसकी स्थापना 13 फ़रवरी 1890 को हुई और जिसका मुख्यालय कोलकाता में है, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन वनस्पतियों का सर्वेक्षण व प्रलेखन करता है और क्षेत्रीय हर्बेरियम चलाता है। जे. डी. हूकर की Flora of British India (सात खंड, 1872–1897) आज भी क्लासिक क्षेत्रीय फ़्लोरा है, और विलियम रॉक्सबर्ग को प्रायः भारतीय वनस्पति विज्ञान का जनक कहा जाता है।

भारत के प्रमुख हर्बेरियम व उनके Index Herbariorum संक्षिप्त नाम
संक्षिप्त नामहर्बेरियम व स्थानसंस्थान
CALकेंद्रीय राष्ट्रीय हर्बेरियम, हावड़ा, आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान (स्थापना 1787) मेंBSI (राष्ट्रीय हर्बेरियम)
MHमद्रास हर्बेरियम, कोयंबटूरBSI दक्षिणी क्षेत्रीय केंद्र
ASSAMशिलांगBSI पूर्वी क्षेत्रीय केंद्र
BSDदेहरादूनBSI उत्तरी क्षेत्रीय केंद्र
DDदेहरादूनवन अनुसंधान संस्थान (FRI)
LWGलखनऊराष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI)
BLATब्लैटर हर्बेरियम, मुंबईसेंट ज़ेवियर्स कॉलेज
⚠️ एक शहर, दो संक्षिप्त नाम
DD व BSD दोनों देहरादून में हैं पर भिन्न संस्थाओं, FRI व BSI, के हैं। MH नाम के बावजूद चेन्नई में नहीं, कोयंबटूर में है, और CAL कोलकाता से नदी पार हावड़ा में है।

मुख्य बिंदु

  • ICN नामों को प्रारूप, प्राथमिकता (अधिकांश पादपों हेतु 1753 से) व एक सही नाम से निश्चित करती है; लेक्टोटाइप मूल सामग्री से आता है, नियोटाइप तभी जब कुछ शेष न हो; टॉटोनिम वर्जित हैं।
  • वर्गिकी कृत्रिम (लिनियस के पुंकेसर-आधारित 24 वर्ग) से प्राकृतिक (बेंथम व हूकर, अनावृतबीजी द्विबीजपत्रियों व एकबीजपत्रियों के बीच) और फिर जातिवृत्तीय पद्धतियों (एंगलर व प्रैंटल, बेसी, क्रॉनक्विस्ट) तक पहुँची, और अब APG IV है: 64 गण, 416 कुल।
  • APG: ANA श्रेणी, मैग्नोलिड, एकबीजपत्री (Orchidaceae, Poaceae) व यूडिकॉट; लैमिइड में Apocynaceae, Solanaceae, Lamiaceae व Verbenaceae, कैम्पैनुलिड में Asteraceae व Apiaceae; Myrtaceae रोज़िड है। सागौन Lamiaceae में और आक-वर्ग Apocynaceae में गए।
  • केवल सिनएपोमॉर्फ़ी क्लेड परिभाषित करते हैं; मितव्ययिता वृक्ष पर चरण गिनती है, CI = m/s होमोप्लेसी मापता है, और अमूलित वृक्षों की संख्या (2n − 5)!! के रूप में बढ़ती है।
  • पादपों का कोर बारकोड rbcL + matK (ITS2 व trnH–psbA सहित) है, COI नहीं। भारत के प्रमुख हर्बेरियम CAL (हावड़ा), MH (कोयंबटूर), ASSAM (शिलांग), BSD व DD (देहरादून), LWG (लखनऊ) और BLAT (मुंबई) हैं।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. एक जाति का वर्णन 1885 में तीन नमूनों से किया गया, जो सभी मूल प्रकाशन में उद्धृत थे, पर लेखक ने कभी होलोटाइप निर्दिष्ट नहीं किया। एक पुनरीक्षक वर्गिकीविद् अब उन तीन में से एक नमूने को एकमात्र नाम-धारक प्रारूप के रूप में चुनता है। ICN के अंतर्गत चुना गया नमूना है

    1. नियोटाइप, क्योंकि वह मूल विवरण प्रकाशित होने के बहुत बाद निर्दिष्ट किया गया
    2. आइसोटाइप, क्योंकि वह मूल लेखक द्वारा जाँचे गए नमूनों के समूह का है
    3. लेक्टोटाइप, क्योंकि होलोटाइप न होने पर वह बाद में मूल सामग्री से चुना गया
    4. एपिटाइप, क्योंकि वह यह तय करने हेतु चुना गया कि मूल नाम की व्याख्या कैसे हो
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — लेक्टोटाइप, क्योंकि होलोटाइप न होने पर वह बाद में मूल सामग्री से चुना गया

    लेक्टोटाइप वह नमूना है जो होलोटाइप निर्दिष्ट न होने या खो जाने पर प्रकाशन के बाद मूल सामग्री (यहाँ उद्धृत तीन सिनटाइप) से चुना जाता है। नियोटाइप भ्रामक उत्तर है क्योंकि वह भी बाद में चुना जाता है, पर उसकी अनुमति तभी है जब समस्त मूल सामग्री नष्ट हो चुकी हो, जो यहाँ नहीं है। आइसोटाइप होलोटाइप की द्विप्रति है, और एपिटाइप ऐसे प्रारूप का पूरक है जो स्वयं टैक्सॉन पहचानने हेतु अत्यधिक अस्पष्ट हो।
  2. निम्नलिखित में से कौन-सा जाति-नाम ICN के अंतर्गत टॉटोनिम होने के कारण अस्वीकृत होगा?

    1. Cajanus cajan, क्योंकि उसका विशेषण वंश-नाम से व्युत्पन्न है
    2. Linaria linaria, क्योंकि उसका विशेषण वंश-नाम को हूबहू दोहराता है
    3. Mangifera indica, क्योंकि उसका विशेषण एक भौगोलिक क्षेत्र को इंगित करता है
    4. Solanum lycopersicum, क्योंकि उसका विशेषण पहले एक वंश-नाम था
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — *Linaria linaria*, क्योंकि उसका विशेषण वंश-नाम को हूबहू दोहराता है

    वनस्पति विज्ञान ऐसे जाति-विशेषण को वर्जित करता है जो वंश-नाम को हूबहू दोहराए, अतः Linaria linaria टॉटोनिम है और मान्य नहीं (इसके विपरीत प्राणि विज्ञान Naja naja जैसे नाम स्वीकारता है)। Cajanus cajan भ्रामक विकल्प है, पर उसका विशेषण वर्तनी में वंश-नाम से भिन्न है, अतः वह टॉटोनिम नहीं, सही नाम है। indica जैसे भौगोलिक विशेषण और lycopersicum जैसे पूर्व वंश-नामों से बने विशेषण वैध हैं।
  3. ICN के अंतर्गत वानस्पतिक नामपद्धति के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. आइसोटाइप वह नमूना है जिसे बाद का लेखक नष्ट हो चुके होलोटाइप के स्थान पर चुनता है
    2. अधिकांश संवहनी पादपों हेतु नामों की प्राथमिकता लिनियस की 1753 की Species Plantarum से आरंभ होती है
    3. Gramineae एक अवैध कुल-नाम है जिसे सदा Poaceae से प्रतिस्थापित करना ही होगा
    4. 2020 में प्रकाशित नई पादप जाति अंग्रेज़ी में लिखे विवरण या निदान से वैध हो सकती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अधिकांश संवहनी पादपों हेतु नामों की प्राथमिकता लिनियस की 1753 की *Species Plantarum* से आरंभ होती है; D — 2020 में प्रकाशित नई पादप जाति अंग्रेज़ी में लिखे विवरण या निदान से वैध हो सकती है

    अधिकांश पादपों हेतु प्राथमिकता 1 मई 1753 से चलती है, और 1 जनवरी 2012 से लैटिन या अंग्रेज़ी विवरण या निदान नए नाम को वैध बनाता है। आइसोटाइप उसी संग्रह से होलोटाइप की द्विप्रति मात्र है; खोए प्रारूप के स्थान पर चुना नमूना लेक्टोटाइप (मूल सामग्री से) या नियोटाइप (यदि कुछ शेष न हो) होता है। Gramineae आठ संरक्षित वैकल्पिक कुल-नामों में से एक है और Poaceae के साथ प्रयुक्त हो सकता है।
  4. किस वर्गीकरण पद्धति ने अनावृतबीजियों को द्विबीजपत्रियों व एकबीजपत्रियों के बीच रखा, जिसे अब उसका मुख्य दोष माना जाता है?

    1. Die Natürlichen Pflanzenfamilien में एंगलर व प्रैंटल की पद्धति
    2. लिनियस की लैंगिक पद्धति, जो मुख्यतः पुंकेसरों पर आधारित है
    3. Magnoliopsida व Liliopsida वाली क्रॉनक्विस्ट की पद्धति
    4. Genera Plantarum में बेंथम व हूकर की पद्धति
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — *Genera Plantarum* में बेंथम व हूकर की पद्धति

    बेंथम व हूकर की प्राकृतिक पद्धति (Genera Plantarum, 1862–1883) ने Gymnospermae को द्विबीजपत्रियों व एकबीजपत्रियों के बीच रखकर पुष्पी पादपों के दो समूहों को अलग कर दिया। एंगलर व प्रैंटल भ्रामक विकल्प है क्योंकि वह दूसरी बड़ी पुरानी पद्धति है, पर उसने अनावृतबीजियों को सभी आवृतबीजियों से पहले रखा; उसकी कमी कैटकिन-धारी Amentiferae को आदिम मानना थी। लिनियस की कृत्रिम पद्धति और क्रॉनक्विस्ट की जातिवृत्तीय पद्धति ने ऐसा स्थान नहीं दिया।
  5. लिनियस की लैंगिक पद्धति को मुख्यतः कृत्रिम पद्धति इसलिए माना जाता है क्योंकि वह

    1. पादपों को मुख्यतः पुंकेसरों की संख्या, संयोजन व लंबाई से छाँटती थी, अतः समान पुंकेसर-संख्या वाले असंबंधित पादप एक वर्ग में आ गए
    2. पादपों को अनुमानित विकासीय वंशक्रम से समूहित करती थी, जिसे उस समय जीवाश्म-साक्ष्य के बिना परखा नहीं जा सकता था
    3. बहुत सारे लक्षणों की समग्र समानता पर निर्भर थी, जिससे उसके वर्ग व्यवहार में उपयोगी होने के लिए बहुत व्यापक हो गए
    4. कैटकिन-धारी वृक्षों के सरल, एकलिंगी पुष्पों को आदिम मानकर उन्हें आरंभ में रखती थी
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पादपों को मुख्यतः पुंकेसरों की संख्या, संयोजन व लंबाई से छाँटती थी, अतः समान पुंकेसर-संख्या वाले असंबंधित पादप एक वर्ग में आ गए

    कृत्रिम पद्धति एक या कुछ सुविधाजनक लक्षण प्रयुक्त करती है; लिनियस ने पादपों को पुंकेसरों की संख्या, संयोजन व सापेक्ष लंबाई से वर्गीकृत किया, जिससे असंबंधित पादप साथ आ गए और निकट संबंधी अलग हो गए। वंशक्रम से समूहन जातिवृत्तीय पद्धतियों की पहचान है, समग्र समानता बेंथम व हूकर जैसी प्राकृतिक पद्धतियों की, और कैटकिन-धारियों (Amentiferae) को आदिम मानना एंगलर व प्रैंटल का विचार था, जो भ्रामक मिश्रण है।
  6. APG IV में पाठ्यक्रम में नामित कुलों का कौन-सा युग्म ऐस्टरिड के कैम्पैनुलिड क्लेड में आता है?

    1. Lamiaceae व Verbenaceae
    2. Apiaceae व Asteraceae
    3. Apocynaceae व Solanaceae
    4. Myrtaceae व Apiaceae
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — Apiaceae व Asteraceae

    Asterales (Asteraceae) व Apiales (Apiaceae) कैम्पैनुलिड हैं। Lamiaceae व Verbenaceae (Lamiales), Apocynaceae (Gentianales) और Solanaceae (Solanales) लैमिइड हैं, जो दूसरा ऐस्टरिड क्लेड है; इसीलिए ये भ्रामक विकल्प हैं। Myrtaceae (Myrtales) ऐस्टरिड नहीं, रोज़िड है, अतः Apiaceae वाला वह युग्म एक सदस्य के कारण ग़लत है।
  7. चतुष्कोणीय नई टहनियों, बड़ी सम्मुख पत्तियों, बड़े पुष्पगुच्छों में छोटे पुष्पों और शीर्षस्थ वर्तिका वाले ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय वाले एक वृक्ष की पहचान Tectona grandis (सागौन) के रूप में होती है। APG IV वर्गीकरण में यह रखा गया है

    1. Verbenaceae में, क्योंकि अपालित अंडाशय पर शीर्षस्थ वर्तिका उस कुल का नैदानिक लक्षण है
    2. Acanthaceae में, पुराने Verbenaceae से हटाए गए मैंग्रोव वंश Avicennia के साथ
    3. Lamiaceae में, जिसे आणविक साक्ष्य पर Tectona, Vitex, Gmelina व अन्य पूर्व Verbenaceae वंश मिले
    4. Apocynaceae में, क्योंकि उसकी सम्मुख पत्तियाँ व ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय जेन्शियनेलीय पुष्प-योजना से मेल खाते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — Lamiaceae में, जिसे आणविक साक्ष्य पर *Tectona*, *Vitex*, *Gmelina* व अन्य पूर्व Verbenaceae वंश मिले

    आणविक जातिवृत्तों ने दिखाया कि पुराने Verbenaceae के काष्ठीय वंश (Tectona, Vitex, Clerodendrum, Gmelina, Premna) Lamiaceae के भीतर आते हैं, अतः APG सागौन को वहीं रखता है, यद्यपि उसमें वह शीर्षस्थ वर्तिका है जिससे कभी Verbenaceae परिभाषित होता था। Verbenaceae वाला उत्तर जाल है: वह पुरानी आकारिकीय पद्धतियों हेतु सही है, APG IV हेतु नहीं। केवल Avicennia Acanthaceae में गया, और आक्षीर, व्यावर्तित दलपुंज व पृथक युग्मित अंडाशयों के अभाव से Apocynaceae बाहर हो जाता है।
  8. एक नमूने में दूधिया आक्षीर, सम्मुख सरल पत्तियाँ, व्यावर्तित पुष्पदल-विन्यास वाला दलपुंज, पाँच दललग्न पुंकेसर, और दो अंडप हैं जिनके अंडाशय पृथक पर वर्तिकाएँ एक वर्तिकाग्र-शीर्ष में जुड़ी हैं; फल गुच्छेदार बीजों वाले फ़ॉलिकलों का जोड़ा है। यह नमूना संबंधित है

    1. Euphorbiaceae से, क्योंकि आक्षीर के साथ ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय इस कुल की पहचान है
    2. Solanaceae से, क्योंकि दललग्न पुंकेसरों सहित द्विअंडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय उसका चिह्न है
    3. Lamiaceae से, क्योंकि सम्मुख पत्तियाँ व भागों में बँटने वाला अंडाशय उसकी पहचान हैं
    4. Apocynaceae से, क्योंकि केवल वर्तिकाग्र-शीर्ष पर जुड़े पृथक युग्मित अंडाशय उसका चिह्न हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — Apocynaceae से, क्योंकि केवल वर्तिकाग्र-शीर्ष पर जुड़े पृथक युग्मित अंडाशय उसका चिह्न हैं

    आक्षीर, व्यावर्तित दलपुंज और अंडाशय-स्तर पर पृथक पर वर्तिका-शीर्ष से जुड़े दो अंडप, जो रोमिल बीजों वाले युग्मित फ़ॉलिकल बनाते हैं, Apocynaceae की योजना है। आक्षीर के कारण Euphorbiaceae भ्रामक विकल्प है, पर उसके पुष्प एकलिंगी होते हैं और त्रिअंडपी युक्तांडपी अंडाशय संपुट बनाता है। Solanaceae में आक्षीर नहीं और तिरछे पट वाला युक्तांडपी अंडाशय होता है, तथा Lamiaceae में आक्षीर नहीं और जायांगाधारी वर्तिका वाला चार-पालित अंडाशय नटलेट बनाता है।
  9. निम्नलिखित में से कौन-से कुल–लक्षण युग्म कुल के प्रतिनिधि सदस्यों हेतु सही हैं?

    1. Asteraceae: युक्तकोशी परागकोश और एक आधारी बीजांड वाला अधोवर्ती अंडाशय
    2. Myrtaceae: ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय और निश्चित पाँच पुंकेसर
    3. Poaceae: स्पाइकिकाएँ, लोडिक्यूल तक ह्रासित परिदलपुंज, और कैरिऑप्सिस
    4. Orchidaceae: स्तंभीय बीजांडन्यास वाला ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय और पृथक पुंकेसर
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Asteraceae: युक्तकोशी परागकोश और एक आधारी बीजांड वाला अधोवर्ती अंडाशय; C — Poaceae: स्पाइकिकाएँ, लोडिक्यूल तक ह्रासित परिदलपुंज, और कैरिऑप्सिस

    Asteraceae के पुष्पकों में जुड़े परागकोश और एक आधारी बीजांड वाला अधोवर्ती एककोष्ठी अंडाशय होता है, और घासों के पुष्पक स्पाइकिकाओं में होते हैं, जिनमें परिदलपुंज के स्थान पर लोडिक्यूल व फल कैरिऑप्सिस होता है। Myrtaceae में अधोवर्ती अंडाशय व असंख्य पुंकेसर होते हैं, और ऑर्किडों में भित्तीय बीजांडन्यास वाला अधोवर्ती एककोष्ठी अंडाशय होता है तथा पुंकेसर वर्तिका से जुड़कर स्तंभ बनाते हैं।
  10. बैंगन जैसे Solanaceae के प्रतिनिधि सदस्य में निम्नलिखित में से कौन-से लक्षण पाए जाते हैं?

    1. जायांगाधारी वर्तिका वाला गहराई से चार-पालित अंडाशय, जो चार नटलेट में पकता है
    2. द्विअंडपी अंडाशय जिसका पट पुष्प के मध्य तल से तिरछा स्थित है
    3. अधोवर्ती अंडाशय जो दो मेरिकार्पों में बँटने वाले क्रीमोकार्प में पकता है
    4. द्विपार्श्व संवहन पूल, जिनमें फ्लोएम जाइलम के दोनों ओर होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — द्विअंडपी अंडाशय जिसका पट पुष्प के मध्य तल से तिरछा स्थित है; D — द्विपार्श्व संवहन पूल, जिनमें फ्लोएम जाइलम के दोनों ओर होता है

    Solanaceae में फूले स्तंभीय बीजांडासन वाले तिरछे स्थित अंडप होते हैं, और उसके तनों में द्विपार्श्व पूल (आंतरिक फ्लोएम) होते हैं। जायांगाधारी वर्तिका व नटलेट वाला चार-पालित अंडाशय Lamiaceae का है, और क्रीमोकार्प बनाने वाला अधोवर्ती अंडाशय Apiaceae का।
  11. Solanum melongena (Solanaceae) के एक पुष्प में जनन-क्षम पुंकेसरों की संख्या, Ocimum tenuiflorum (Lamiaceae) के एक पुष्प में पुंकेसरों की संख्या और Vanda (Orchidaceae, एकपुंकेसरी ऑर्किड) के एक पुष्प में जनन-क्षम परागकोशों की संख्या जोड़िए। योग ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 10

    Solanum में पाँच दललग्न पुंकेसर, Ocimum में चार द्विदीर्घी पुंकेसर, और Vanda में, अधिकांश ऑर्किडों की तरह, स्तंभ पर एक जनन-क्षम परागकोश होता है: 5 + 4 + 1 = 10। छह परिदलों के अनुरूप ऑर्किड में छह पुंकेसर गिनना, या Lamiaceae हेतु दो (जो केवल Salvia में सत्य है) लेना प्रचलित भूलें हैं।
  12. मूलित वृक्ष (O,(A,(B,(C,D)))) पर, जहाँ O बाह्य-समूह है, दो अवस्थाओं वाले चार अक्रमित लक्षण इस प्रकार अंकित हैं (अवस्थाएँ क्रमशः O, A, B, C व D हेतु)। लक्षण 1: 0, 0, 1, 1, 1। लक्षण 2: 0, 1, 0, 1, 0। लक्षण 3: 0, 0, 0, 1, 1। लक्षण 4: 0, 1, 1, 0, 1। इस वृक्ष पर आवश्यक अवस्था-परिवर्तनों की न्यूनतम कुल संख्या (वृक्ष-लंबाई) ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 6

    लक्षण 1: (B,(C,D)) की शाखा पर एक परिवर्तन = 1। लक्षण 2: अवस्था 1, A व C में अलग-अलग उपजती है = 2। लक्षण 3: (C,D) की शाखा पर एक परिवर्तन = 1। लक्षण 4: (C,D) गाँठ अनिश्चित है और C, D से भिन्न है, अतः 1 लागत; B व D में 1 है जबकि बाह्य-समूह 0 है, अतः एक और परिवर्तन चाहिए, जैसे अंतःसमूह के आधार पर 0 से 1 और C में 1 से 0, कुल 2। वृक्ष-लंबाई = 1 + 2 + 1 + 2 = 6 (सभी पूर्वज अवस्थाओं के संपूर्ण पुनर्निर्माण से जाँचा)। न्यूनतम संभव 4 है, अतः समग्र CI 4/6 है।
  13. n नामांकित टैक्सा हेतु भिन्न अमूलित, पूर्णतः द्विशाखी वृक्षों की संख्या (2n − 5)!! है, अर्थात् 1 से 2n − 5 तक की सभी विषम संख्याओं का गुणनफल। 6 टैक्सा हेतु कितने अमूलित वृक्ष संभव हैं?

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 105

    n = 6 हेतु 2n − 5 = 7, अतः संख्या 7!! = 1 × 3 × 5 × 7 = 105 है। मूलित सूत्र (2n − 3)!! = 9!! = 945 लगाना प्रचलित भूल है; मूलन संख्या को गुणा कर देता है क्योंकि मूल अमूलित वृक्ष की 2n − 3 शाखाओं में से किसी पर भी हो सकता है (105 × 9 = 945)।
  14. निम्नलिखित में से कौन-सा समूह पैराफ़ाइलेटिक है?

    1. पारंपरिक अर्थ में द्विबीजपत्री, जो एकबीजपत्रियों को बाहर रखते हैं
    2. ट्राइकॉल्पेट पराग से परिभाषित यूडिकॉट
    3. अंडपों व द्विनिषेचन से परिभाषित आवृतबीजी
    4. एंगलर के Amentiferae, असंबंधित वंशों से लिए गए कैटकिन-धारी
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पारंपरिक अर्थ में द्विबीजपत्री, जो एकबीजपत्रियों को बाहर रखते हैं

    एकबीजपत्री पुराने द्विबीजपत्री समूह के भीतर से उपजे, अतः ‘द्विबीजपत्री’ में एक साझा पूर्वज है पर उसके सभी वंशज नहीं: यह पैराफ़ाइलेटिक है। Amentiferae भ्रामक विकल्प है, पर असंबंधित वंशों को अभिसारी लक्षण (कैटकिन) से समूहित करना उसे बहुस्रोती बनाता है, पैराफ़ाइलेटिक नहीं। यूडिकॉट व आवृतबीजी दोनों क्लेड हैं।
  15. चार जातियों P, Q, R व S और एक निकट संबंधी बाह्य-समूह के अध्ययन में P, Q व बाह्य-समूह में सम्मुख पत्तियाँ हैं, जबकि R व S में एकांतर पत्तियाँ हैं। P व Q की सम्मुख पत्तियाँ उनके संबंध के बारे में क्या दर्शाती हैं?

    1. वे सिनएपोमॉर्फ़ी हैं, अतः P व Q को एक क्लेड के रूप में साथ रखना चाहिए
    2. वे P की ऑटएपोमॉर्फ़ी हैं जो Q में बिना बदले वंशागत हुई
    3. वे होमोप्लेसी हैं, जो दर्शाती है कि P व Q ने सम्मुख पत्तियाँ स्वतंत्र रूप से पाईं
    4. वे सिमप्लीसियोमॉर्फ़ी हैं, अतः वे P व Q के क्लेड होने का कोई साक्ष्य नहीं देतीं
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — वे सिमप्लीसियोमॉर्फ़ी हैं, अतः वे P व Q के क्लेड होने का कोई साक्ष्य नहीं देतीं

    बाह्य-समूह तुलना सम्मुख पत्तियों को पूर्वज अवस्था बनाती है, अतः P व Q में इसकी उपस्थिति साझा पूर्वज लक्षण (सिमप्लीसियोमॉर्फ़ी) है और उन्हें समूहित नहीं कर सकती; R व S की एकांतर पत्तियाँ, एक साझा व्युत्पन्न अवस्था, R व S को जोड़ने वाली संभावित सिनएपोमॉर्फ़ी हैं। सम्मुख पत्तियों को सिनएपोमॉर्फ़ी कहना समग्र समानता से समूहन की क्लासिक भूल है। स्वतंत्र उत्पत्ति का कोई संकेत नहीं, अतः होमोप्लेसी असमर्थित है, और दो टैक्सा में साझा अवस्था ऑटएपोमॉर्फ़ी नहीं हो सकती।
  16. प्राणियों का मानक बारकोड, माइटोकॉन्ड्रियल COI जीन, स्थलीय पादपों हेतु कोर DNA बारकोड के रूप में क्यों नहीं अपनाया गया?

    1. नियमित प्रतिचयन में प्रयुक्त हरे ऊतकों की पादप कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया नहीं होते
    2. पादप माइटोकॉन्ड्रियल जीनों का अनुक्रम इतनी धीमी गति से बदलता है कि निकट संबंधी जातियाँ उसे साझा करती हैं
    3. पादपों में COI जीन केंद्रक में स्थानांतरित हो चुका है और वहाँ अनेक प्रतियों में मिलता है
    4. पादप COI दोनों जनकों से वंशागत होता है, अतः प्रत्येक संकर में मिश्रित अनुक्रम देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — पादप माइटोकॉन्ड्रियल जीनों का अनुक्रम इतनी धीमी गति से बदलता है कि निकट संबंधी जातियाँ उसे साझा करती हैं

    स्थलीय पादपों के माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम में पुनर्विन्यास तो बार-बार होता है पर न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम बहुत धीरे बदलता है, अतः एक ही वंश की जातियों के बीच COI इतना कम भिन्न होता है कि उन्हें पहचान नहीं सकता; इसीलिए लवक rbcL + matK कोर बारकोड चुना गया। पादप कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं, पादप COI जीन (cox1) अब भी माइटोकॉन्ड्रिया में कूटित है, और माइटोकॉन्ड्रिया प्रायः मातृवंशागत होते हैं, अतः अन्य विकल्प असत्य हैं। केंद्रक-स्थानांतरण वाला विकल्प भ्रामक है क्योंकि पादप विकास में कुछ माइटोकॉन्ड्रियल जीन केंद्रक में गए हैं, पर cox1 उनमें नहीं है।
  17. पादपों की DNA बारकोडिंग के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. बारकोडिंग जातियों को सबसे अच्छा तब अलग करती है जब जाति के भीतर की विविधता जातियों के बीच की विविधता से अधिक हो
    2. CBOL Plant Working Group द्वारा अनुशंसित कोर पादप बारकोड लवक क्षेत्रों rbcL व matK को जोड़ता है
    3. अधिकांश आवृतबीजियों में लवक बारकोड अंतरजातीय संकर के दोनों जनकों को सरलता से पहचान लेता है
    4. बारकोडिंग ऐसी चूर्णित हर्बल औषधि को पहचान सकती है जिसकी आकारिकी अब दिखाई नहीं देती
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — CBOL Plant Working Group द्वारा अनुशंसित कोर पादप बारकोड लवक क्षेत्रों rbcL व matK को जोड़ता है; D — बारकोडिंग ऐसी चूर्णित हर्बल औषधि को पहचान सकती है जिसकी आकारिकी अब दिखाई नहीं देती

    rbcL + matK दो-लोकस कोर बारकोड (2009) है, और चूँकि केवल DNA चाहिए, चूर्ण जैसी संसाधित सामग्री भी पहचानी जा सकती है। अधिकांश आवृतबीजियों में लवक मातृवंशागत होते हैं, अतः लवक बारकोड संकर की केवल माता बताता है। पहचान हेतु भीतर-बनाम-बीच वाले कथन का उलटा चाहिए: ऐसा बारकोड अंतराल जिसमें जातियों के बीच का विचलन उनके भीतर के विचलन से अधिक हो।
  18. हर्बेरियम के संक्षिप्त नाम व स्थान का निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही है?

    1. MH: भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण का मद्रास हर्बेरियम, चेन्नई में स्थित
    2. DD: भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के उत्तरी क्षेत्रीय केंद्र का हर्बेरियम
    3. CAL: केंद्रीय राष्ट्रीय हर्बेरियम, कोलकाता के निकट हावड़ा में स्थित
    4. LWG: देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान का हर्बेरियम
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — CAL: केंद्रीय राष्ट्रीय हर्बेरियम, कोलकाता के निकट हावड़ा में स्थित

    CAL हावड़ा स्थित BSI का केंद्रीय राष्ट्रीय हर्बेरियम है। नाम के कारण MH भ्रामक विकल्प है, पर मद्रास हर्बेरियम कोयंबटूर में है। DD देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान का है (BSI उत्तरी क्षेत्रीय केंद्र का हर्बेरियम BSD है), और LWG लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI) का हर्बेरियम है।