जैवअणुओं की संरचना व कार्य: जल, वृहदणु, प्रोटीन वलन तथा छह आदर्श प्रोटीन

यह अध्याय जीवन विज्ञान (XL) पेपर के पाँच वैकल्पिक खंडों में से एक, XL1 जैव रसायन, के खंड XL1.1 का उत्तर देता है: “जीवन का संगठन; जल का महत्व; जैवअणुओं की संरचना व कार्य: कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, प्रोटीन व न्यूक्लिक अम्ल; प्रोटीन संरचना, वलन/गलत वलन तथा कार्य; मायोग्लोबिन, हीमोग्लोबिन, लाइसोज़ाइम, राइबोन्यूक्लिएज़ A, कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ व काइमोट्रिप्सिन।” जैवअणुओं का रसायन XL0 रसायन विज्ञान में है; यहाँ प्रश्न सदा यह है कि कोई संरचना अपना कार्य कैसे करती है। अध्याय जैविक संगठन व जल से आरंभ कर चारों वर्गों के जैवअणुओं से होते हुए प्रोटीन संरचना, वलन व गलत वलन तक जाता है, और छह उदाहरण-प्रोटीनों पर समाप्त होता है: दो ऑक्सीजन-वाहक व चार एंज़ाइम। संख्यात्मक प्रश्न मायोग्लोबिन व हीमोग्लोबिन की आंशिक संतृप्ति, ऑक्सीजन-आपूर्ति, हिल गुणांक तथा शारगाफ़ नियमों से क्षार-संघटन पर हैं।

1. जीवन का संगठन व जल का महत्व

जीवन स्तरों में संगठित है, और प्रत्येक स्तर में ऐसे गुण होते हैं जो उसके घटकों में नहीं होते। कुछ तत्व (C, H, O, N, P, S) कोशिका के अधिकांश द्रव्यमान का निर्माण करते हैं। इनसे छोटे अणु (शर्कराएँ, अमीनो अम्ल, न्यूक्लियोटाइड, वसा-अम्ल) बनते हैं, जो जल निकलने वाले संघनन से वृहदणुओं में जुड़ते हैं और जल-अपघटन से टूटते हैं: पॉलीसैकेराइड, प्रोटीन व न्यूक्लिक अम्ल बहुलक हैं, जबकि लिपिड बहुलक नहीं हैं, वे असहसंयोजी रूप से जुड़कर झिल्लियाँ बनाते हैं। वृहदणुओं से अधिआणविक संकुल (राइबोसोम, क्रोमैटिन, झिल्लियाँ), फिर कोशिकांग, कोशिकाएँ, ऊतक व जीव बनते हैं। कोशिका एक खुला तंत्र है जो मुक्त ऊर्जा ग्रहण करके ही साम्य से दूर बनी रहती है।

जल इन सबका माध्यम है, और उसके गुण एक तथ्य से आते हैं: मुड़ा हुआ (104.5°) ध्रुवीय अणु दो हाइड्रोजन बंध दे सकता है और दो ग्रहण कर सकता है। इसी से उसकी उच्च विशिष्ट ऊष्मा व वाष्पन-ऊष्मा (ताप-स्थिरीकरण), संसंजन तथा उच्च परावैद्युत स्थिरांक (25 °C पर लगभग 78) आते हैं, जो आयनों के बीच आकर्षण को दुर्बल करता है, जिससे लवण व ध्रुवीय अणु घुलते व जलयोजित होते हैं। जल अल्प मात्रा में आयनित भी होता है (25 °C पर Kw = 1.0 × 10⁻¹⁴), अतः pH तथा अम्लीय व क्षारीय समूहों का आयनन प्रत्येक प्रोटीन व न्यूक्लिक अम्ल का आवेश तय करता है।

जलविरागी प्रभाव संरचना को जल की सबसे बड़ी देन है। अध्रुवीय समूह हाइड्रोजन बंध नहीं बना सकता, अतः उसके चारों ओर का जल एक व्यवस्थित पिंजरे में बँध जाता है; अध्रुवीय समूहों के एक साथ आने पर वह जल मुक्त होता है और उसकी एन्ट्रॉपी बढ़ती है। यही अध्रुवीय पार्श्व-शृंखलाओं को भीतर दबाता है, मिसेल व द्विस्तर बनवाता है और DNA में क्षारकों का संचयन कराता है।

⚠️ परीक्षा जाल
एक प्रचलित गलत उत्तर कहता है कि जल में अध्रुवीय समूह एक-दूसरे को “आकर्षित” करते हैं; उनके वान्डर वाल्स संपर्क दुर्बल हैं। प्रेरक बल मुक्त हुए जल की एन्ट्रॉपी-वृद्धि है, जबकि वलन में शृंखला स्वयं एन्ट्रॉपी खोती है।

2. कार्बोहाइड्रेट व लिपिड

मोनोसैकेराइड ऐल्डोज़ या कीटोज़ होते हैं; D या L का निर्णय कार्बोनिल से सबसे दूर वाला किरेल कार्बन करता है, और प्राकृतिक शर्कराएँ अधिकतर D हैं। पेन्टोज़ व हेक्सोज़ पाँच-सदस्यीय (फ़्यूरेनोज़) या छह-सदस्यीय (पाइरेनोज़) वलयों में बंद होते हैं, जिससे एक नया किरेल एनोमरी कार्बन (α या β) बनता है। दोनों एनोमर खुली शृंखला के माध्यम से परस्पर बदलते हैं (म्यूटारोटेशन); जल में D-ग्लूकोज़ लगभग एक-तिहाई α व दो-तिहाई β होता है। जिस शर्करा का एनोमरी कार्बन मुक्त हो वह अपचायक है। ग्लाइकोसिडिक बंध एनोमरी कार्बन को दूसरी शर्करा से जोड़ता है: माल्टोज़ Glc(α1→4)Glc व लैक्टोज़ Gal(β1→4)Glc हैं, दोनों अपचायक, जबकि सुक्रोज़, Glc(α1↔2β)Fru, दोनों एनोमरी कार्बनों को जोड़ता है और अनपचायक है।

पॉलीसैकेराइड: बंध ही कार्य तय करता है
बहुलकइकाई व बंधआकृति व भूमिका
ऐमाइलोज़ग्लूकोज़, α(1→4)अशाखित कुंडली; पादप भंडार
ऐमाइलोपेक्टिनα(1→4), प्रत्येक 24–30 अवशेषों पर α(1→6) शाखाएँशाखित; पादप भंडार
ग्लाइकोजनα(1→4), प्रत्येक 8–12 अवशेषों पर α(1→6) शाखाएँतीव्र मुक्ति हेतु अनेक अनपचायक सिरे; प्राणी भंडार
सेलुलोज़ग्लूकोज़, β(1→4)सीधी शृंखलाएँ, हाइड्रोजन बंधों से रेशे; पादप कोशिका-भित्ति
काइटिनN-ऐसीटिलग्लूकोसैमीन, β(1→4)संधिपाद बाह्यकंकाल, कवक भित्ति
पेप्टिडोग्लाइकनGlcNAc व MurNAc एकांतर, β(1→4), पेप्टाइडों से तिर्यक-बद्धजीवाणु कोशिका-भित्ति; लाइसोज़ाइम का क्रियाधार

शर्कराएँ सूचना भी ढोती हैं: सल्फ़ेटित ग्लाइकोसैमिनोग्लाइकन आधात्री के प्रोटियोग्लाइकन बनाते हैं, और ग्लाइकोप्रोटीनों व ग्लाइकोलिपिडों पर लगे ऑलिगोसैकेराइड पहचान में काम आते हैं, जैसे ABO रक्त-समूहों में। लिपिड की परिभाषा जल में अघुलनशीलता है। वसा-अम्ल संतृप्त (सीधे) या असंतृप्त होते हैं (सिस द्विबंध मोड़ डालते हैं जो गलनांक घटाते हैं)। ट्राइऐसिलग्लिसरॉल ऊर्जा को सघन रूप में संचित करते हैं, क्योंकि वे अधिक अपचित हैं और बिना जल के संचित होते हैं। ग्लिसरोफ़ॉस्फ़ोलिपिड व स्फ़िंगोलिपिड उभयरागी हैं: दो पुच्छ वाले, बेलनाकार अणु द्विस्तर बनाते हैं, जबकि एक पुच्छ वाले, शंक्वाकार अणु मिसेल बनाते हैं। कोलेस्ट्रॉल झिल्ली की तरलता को संतुलित रखता है और स्टेरॉयड हॉर्मोनों, पित्त-अम्लों व विटामिन D का पूर्ववर्ती है; ऐरेकिडोनेट से आइकोसैनॉयड और इनोसिटॉल फ़ॉस्फ़ोलिपिडों से द्वितीयक संदेशवाहक बनते हैं।

3. न्यूक्लिक अम्ल

न्यूक्लियोटाइड में पेन्टोज़ के C1′ पर एक क्षारक (प्यूरीन A या G; पिरिमिडीन C, T या U) और फ़ॉस्फ़ेट होता है। 3′→5′ फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर बंध प्रत्येक रज्जुक को 5′ से 3′ की ध्रुवता देते हैं। B-DNA में दो प्रतिसमांतर रज्जुक दक्षिणावर्ती कुंडली में लिपटते हैं, जिसमें प्रति घुमाव लगभग 10.5 क्षार-युग्म, उनके बीच 0.34 nm की दूरी, लगभग 2 nm व्यास और एक बड़ा व एक छोटा खाँचा होता है; प्रोटीन अनुक्रम को अधिकतर बड़े खाँचे में पढ़ते हैं। G·C युग्म तीन व A·T युग्म दो हाइड्रोजन बंध बनाते हैं, पर स्थायित्व में सबसे बड़ा योगदान क्षारक-संचयन का है, अतः GC अंश के साथ गलन-ताप बढ़ता है, और गलन से 260 nm पर अवशोषण बढ़ता है (हाइपरक्रोमिकता)। A-DNA दक्षिणावर्ती है, प्रति घुमाव लगभग 11 bp; Z-DNA वामावर्ती है, प्रति घुमाव लगभग 12 bp, और एकांतर प्यूरीन–पिरिमिडीन अनुक्रम इसे बढ़ावा देते हैं।

शारगाफ़ के नियम युग्मन से निकलते हैं: द्विरज्जुकी DNA में A = T व G = C, अतः प्यूरीन = पिरिमिडीन। उदाहरण: 30% A वाले 5,000 bp द्विरज्जुक में 10,000 न्यूक्लियोटाइड हैं, जिनमें A = T = 3,000 व G = C = 2,000। RNA का 2′-OH सब बदल देता है: द्विरज्जुकी RNA A-रूप अपनाता है, और क्षार में 2′-OH पड़ोसी फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर पर आक्रमण कर 2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट बनाता है, अतः RNA क्षार में टूटता है जबकि DNA नहीं। न्यूक्लियोटाइड ऊर्जा-मुद्रा (ATP), सहएंज़ाइमों के अंश (NAD⁺, FAD, CoA) व संकेत (cAMP) भी हैं, और कुछ RNA उत्प्रेरक हैं।

⚠️ परीक्षा जाल
शारगाफ़ की समताएँ केवल द्विरज्जुकी DNA पर लागू होती हैं। एकरज्जुकी विषाणु-जीनोम में A = T आवश्यक नहीं, और एकरज्जुकी DNA का “% A” देकर G पूछने वाला प्रश्न हल नहीं हो सकता।

4. प्रोटीन संरचना: चार स्तर

प्रोटीन 20 मानक L-α-अमीनो अम्लों की शृंखलाएँ हैं। पेप्टाइड बंध में आंशिक द्विबंध गुण होता है, अतः उसके आसपास के छह परमाणु समतलीय और लगभग सदा ट्रांस होते हैं (सिस मुख्यतः प्रोलीन से पहले मिलता है)। मुख्य शृंखला की स्वतंत्रता केवल घूर्णन φ (N–Cα) व ψ (Cα–C) में है; रामचंद्रन आलेख त्रिविम रूप से अनुमत φ/ψ युग्म दिखाता है, जो ग्लाइसीन के लिए सबसे विस्तृत व प्रोलीन के लिए सबसे संकीर्ण है। प्राथमिक संरचना अनुक्रम है; द्वितीयक संरचना मुख्य शृंखला का स्थानीय हाइड्रोजन बंधन है; तृतीयक संरचना एक शृंखला का पूर्ण वलन है; चतुष्क संरचना उप-इकाइयों की व्यवस्था है, जैसे हीमोग्लोबिन का α₂β₂।

नियमित द्वितीयक संरचनाएँ
तत्वज्यामितिहाइड्रोजन बंध व अवशेष
α-हेलिक्सदक्षिणावर्ती; प्रति घुमाव 3.6 अवशेष; प्रति अवशेष 0.15 nm उठान; पिच 0.54 nmअवशेष n का C=O अवशेष n + 4 के N–H से, अक्ष के समांतर; पार्श्व-शृंखलाएँ बाहर; प्रोलीन इसे तोड़ता, ग्लाइसीन अस्थिर करता है
β-शीटपास-पास फैले रज्जुक, समांतर या प्रतिसमांतर; चुन्नटदारआसन्न रज्जुकों के बीच; पार्श्व-शृंखलाएँ बारी-बारी से शीट के ऊपर व नीचे
β-मोड़चार अवशेष शृंखला की दिशा उलटते हैंअवशेष 1 का C=O अवशेष 4 के N–H से; ग्लाइसीन व प्रोलीन सामान्य

तृतीयक वलन अध्रुवीय पार्श्व-शृंखलाओं को एक क्रोड में दबाता है और ध्रुवीय शृंखलाओं को सतह पर छोड़ता है; इसे जलविरागी प्रभाव, हाइड्रोजन बंध, आयन-युग्म, वान्डर वाल्स संपर्क तथा अनेक बाह्यकोशिकीय प्रोटीनों में डाइसल्फ़ाइड बंध थामे रखते हैं। बार-बार मिलने वाले मोटिफ़ (β-α-β, हेलिक्स-टर्न-हेलिक्स) मिलकर डोमेन बनाते हैं जो स्वतंत्र रूप से वलित होते हैं। रेशेदार प्रोटीन यांत्रिक कार्य करते हैं: α-केराटिन α-हेलिक्सों की कुंडलित कुंडली है; कोलेजन तीन वामावर्ती शृंखलाओं की त्रिकुंडली है जिसमें Gly-X-Y दोहराव होते हैं (X प्रायः Pro, Y प्रायः 4-हाइड्रॉक्सीप्रोलीन), और प्रोलिल हाइड्रॉक्सिलन को ऐस्कॉर्बेट चाहिए, अतः स्कर्वी संयोजी ऊतक को दुर्बल करता है।

5. वलन व गलत वलन

राइबोन्यूक्लिएज़ A पर ऐनफ़िन्सन के प्रयोग ने दिखाया कि अनुक्रम संरचना तय करता है। RNase A (124 अवशेष, चार डाइसल्फ़ाइड बंध) को 8 M यूरिया व β-मर्केप्टोएथेनॉल में अवलित किया गया, जो डाइसल्फ़ाइड बंधों को अपचित करता है, और सक्रियता समाप्त हो गई। डायलिसिस से दोनों कारकों को एक साथ हटाने पर लगभग पूर्ण सक्रियता लौट आई, और आठ सिस्टीनों के 105 संभव युग्मनों (7 × 5 × 3 × 1) में से सही चार बने। यदि अपचित प्रोटीन को यूरिया में रहते हुए ही ऑक्सीकृत किया गया और यूरिया बाद में हटाया गया, तो लगभग 1% सक्रियता वाला “अव्यवस्थित (scrambled)” RNase बना; β-मर्केप्टोएथेनॉल की अल्प मात्रा से डाइसल्फ़ाइड पुनर्व्यवस्थित हुए और सक्रियता लौट आई। अतः शारीरिक परिस्थितियों में मूल संरचना ही ऊष्मागतिक रूप से सर्वाधिक स्थिर संरचना है।

सभी संरूपणों की यादृच्छिक खोज में ब्रह्मांड की आयु से अधिक समय लगेगा (लेविन्थल विरोधाभास), अतः वलन एक कीप का अनुसरण करता है: जलविरागी संकुचन से पर्याप्त द्वितीयक संरचना वाला सघन मोल्टन ग्लोब्यूल, फिर तृतीयक संपर्कों का धीमा स्थिरीकरण। धीमे चरणों को प्रोटीन डाइसल्फ़ाइड आइसोमरेज़ व पेप्टिडिल-प्रोलिल सिस–ट्रांस आइसोमरेज़ उत्प्रेरित करते हैं। आणविक चैपेरोन समुच्चयन रोकते हैं पर कोई वलन-सूचना नहीं रखते: Hsp70 ATP-चालित चक्र में नई शृंखलाओं के खुले जलविरागी खंडों से जुड़ता है, और जीवाणु के GroEL–GroES जैसे चैपेरोनिन एक शृंखला को ऐसे कक्ष में बंद करते हैं जहाँ वह अकेले वलित हो सके।

गलत वलन के नैदानिक रूप हैं। अनेक प्रोटीन ऐमिलॉइड में बदल सकते हैं, जो क्रॉस-β संरचना वाले प्रोटिएज़-प्रतिरोधी तंतु हैं: ऐल्ज़ाइमर रोग में ऐमिलॉइड-β पट्टिकाएँ व पार्किन्सन रोग में α-सिन्यूक्लीन। प्रिऑन रोगों (क्रॉयट्सफ़ेल्ट–याकोब रोग, बोवाइन स्पॉन्जिफ़ॉर्म एन्सेफ़ैलोपैथी) में α-हेलिक्स-प्रधान सामान्य PrP^C को β-प्रधान PrP^Sc अनुक्रम बदले बिना और PrP^Sc में बदल देता है, अतः गलत वलित रूप स्वयं को फैलाता है। सिस्टिक फ़ाइब्रोसिस में ΔF508 CFTR ठीक से वलित नहीं होता और झिल्ली तक पहुँचने से पहले ही ER गुणवत्ता-नियंत्रण द्वारा नष्ट कर दिया जाता है।

⚠️ परीक्षा जाल
सिकल-सेल हीमोग्लोबिन गलत वलित प्रोटीन नहीं है। HbS सामान्य रूप से वलित होता है; β6 Glu→Val परिवर्तन एक चिपचिपा जलविरागी स्थल बनाता है, अतः विऑक्सीजनित HbS चतुष्क तंतुओं में बहुलित होकर लाल कोशिका को विकृत करते हैं।

6. मायोग्लोबिन व हीमोग्लोबिन: बंधन व सहकारिता

मायोग्लोबिन 153 अवशेषों की एक शृंखला है जो हीम के चारों ओर आठ हेलिक्सों (A–H) में वलित है। हीम का Fe²⁺ चार पाइरोल नाइट्रोजनों व समीपस्थ His (F8) से जुड़ता है; O₂ छठे स्थान पर जुड़ता है, जहाँ दूरस्थ His (E7) उससे हाइड्रोजन बंध बनाता है और CO को त्रिविम रूप से बाधित करता है, जिससे मुक्त हीम में दिखने वाली O₂ पर CO की बड़ी बढ़त घट जाती है। ऑक्सीकृत Fe³⁺ (मेट-रूप) O₂ नहीं बाँध सकता। एक ही स्थल होने से बंधन अतिपरवलयिक है: θ = pO₂/(P50 + pO₂), जहाँ P50 अर्ध-संतृप्ति वाला pO₂ है, जो मायोग्लोबिन के लिए केवल कुछ torr है। उदाहरण: P50 = 2.8 torr हो तो 20 torr पर θ = 20/22.8 = 0.88, अतः पेशी के O₂-भंडार के रूप में मायोग्लोबिन भरा रहता है।

हीमोग्लोबिन α₂β₂ चतुष्क है (α 141, β 146 अवशेष), जिसकी प्रत्येक उप-इकाई का वलन मायोग्लोबिन जैसा है। यह कम बंधुता वाली T अवस्था व उच्च बंधुता वाली R अवस्था के बीच बदलता है। O₂ बंधन Fe को हीम-तल में खींचता है, जो समीपस्थ His व हेलिक्स F को खींचता है; इससे α₁β₂ अंतरापृष्ठ के आयन-युग्म टूटते हैं और शेष उप-इकाइयों में R को बढ़ावा मिलता है: सहकारिता से सिग्मॉइड वक्र बनता है, लाल कोशिकाओं में P50 लगभग 26 torr। हिल समीकरण, log[θ/(1 − θ)] = n log pO₂ − n log P50, से हीमोग्लोबिन का हिल गुणांक n लगभग 3 (चार स्थलों से कम, क्योंकि सहकारिता अनंत नहीं) व मायोग्लोबिन का 1 आता है। संगठित (MWC) मॉडल सभी उप-इकाइयों को एक साथ T से R में ले जाता है; अनुक्रमिक (KNF) मॉडल प्रत्येक उप-इकाई को बंधन पर अलग-अलग बदलने देता है।

हीमोग्लोबिन का ऐलोस्टेरिक नियंत्रण
प्रभावकक्रिया-विधिवक्र पर प्रभाव
H⁺ (बोर प्रभाव)प्रोटॉनित β-His146, Asp94 से लवण-सेतु बनाकर T को स्थिर करता हैअम्लीय, सक्रिय ऊतक में दाईं ओर विस्थापन
CO₂N-सिरों पर कार्बामेट बनाकर T को स्थिर करता है, साथ ही pH घटाता हैदाईं ओर विस्थापन
2,3-BPGप्रति चतुष्क एक, T अवस्था में β उप-इकाइयों के बीच धनावेशित केंद्रीय गुहा मेंP50 बढ़ाता है; ऊँचाई पर बढ़ता है
भ्रूणीय γ शृंखलाएँγ143 पर His के स्थान पर Ser, 2,3-BPG बंधन घटाता हैउच्च O₂ बंधुता, अतः HbF मातृ-रक्त से O₂ खींचता है
COहीम से O₂ की तुलना में 200 गुना से अधिक दृढ़ता से जुड़ता है और शेष स्थलों को R की ओर धकेलता हैबाईं ओर विस्थापन; बची O₂ मुक्त नहीं होती
🧠 याद रखने की ट्रिक
आपूर्ति फेफड़ों व ऊतकों के बीच θ का अंतर है। n = 3 व P50 = 26 torr के साथ 100 torr पर θ 0.98 व 20 torr पर 0.31 है, अतः बँधी O₂ का 67% मुक्त होता है; इसी P50 वाला असहकारी वाहक केवल लगभग 36% मुक्त करता।

7. चार आदर्श एंज़ाइम: लाइसोज़ाइम, राइबोन्यूक्लिएज़ A, कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ A व काइमोट्रिप्सिन

प्रत्येक एंज़ाइम एक अलग उत्प्रेरक रणनीति दर्शाता है
एंज़ाइमतोड़ा जाने वाला बंधमुख्य समूह व रणनीति
लाइसोज़ाइम (मुर्गी अंडे की सफ़ेदी, 129 अवशेष)पेप्टिडोग्लाइकन में MurNAc के C1 व GlcNAc के C4 के बीच β(1→4) बंधसामान्य अम्ल उत्प्रेरण, क्रियाधार विकृति, सहसंयोजी मध्यवर्ती
राइबोन्यूक्लिएज़ A (गोजातीय अग्न्याशय, 124 अवशेष)पिरिमिडीन न्यूक्लियोटाइडों की 3′ ओर का RNA फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टरदो His द्वारा संगठित सामान्य अम्ल–क्षार उत्प्रेरण; Lys41 संक्रमण-अवस्था स्थिर करता है
कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ A (अग्न्याशय)C-सिरे का पेप्टाइड बंध; ऐरोमैटिक या भारी ऐलिफ़ैटिक C-सिरा अवशेष पसंद, Arg, Lys या Pro नहींZn²⁺ द्वारा धातु-आयन उत्प्रेरण; Glu270 सामान्य क्षार; प्रेरित संगति
काइमोट्रिप्सिन (अग्न्याशय)Phe, Tyr, Trp (कम सीमा तक Leu, Met) की कार्बॉक्सिल ओर का पेप्टाइड बंधSer–His–Asp त्रयी द्वारा सहसंयोजी व अम्ल–क्षार उत्प्रेरण; ऑक्सीऐनायन छिद्र

आँसू, लार व अंडे की सफ़ेदी में मिलने वाला लाइसोज़ाइम जीवाणुओं, विशेषकर खुले पेप्टिडोग्लाइकन वाले ग्राम-धनात्मक जीवाणुओं, का लयन करता है। एक दरार में छह शर्कराएँ (स्थल A–F) जुड़ती हैं और स्थल D व E के बीच का बंध कटता है। अध्रुवीय कोटर में होने से प्रोटॉनित Glu35 ग्लाइकोसिडिक ऑक्सीजन को प्रोटॉन देता है; स्थल D की शर्करा अर्ध-कुर्सी की ओर विकृत होती है; Asp52 सहसंयोजी ग्लाइकोसिल-एंज़ाइम मध्यवर्ती बनाता है, जिसे फिर जल, Glu35 के क्षार की भूमिका में रहते, जल-अपघटित करता है और β विन्यास बना रहता है। RNase A दो हिस्टिडीनों का उपयोग करता है: His12 2′-OH से प्रोटॉन हटाता है, जो फ़ॉस्फ़ोरस पर आक्रमण करता है जबकि His119 निकलते 5′-ऑक्सीजन को प्रोटॉन देता है, जिससे 2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट बनता है; फिर भूमिकाएँ उलटकर इसे 3′-फ़ॉस्फ़ेट में जल-अपघटित करती हैं। चूँकि एक His क्षारीय व दूसरा अम्लीय होना चाहिए, pH के साथ सक्रियता घंटी-आकार की होती है, और 2′-OH के बिना DNA नहीं कटता।

कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ A एक ज़िंक बहिःपेप्टिडेज़ है: Arg145 मुक्त C-सिरे के कार्बॉक्सिलेट को थामता है, अतः केवल अंतिम अवशेष हटता है, और अवशेष की पार्श्व-शृंखला को जलविरागी कोटर में समाना चाहिए; लिप्सकॉम्ब की संरचनाओं ने क्रियाधार बंधन पर Tyr248 को भीतर आते दिखाया, जो प्रेरित संगति का शास्त्रीय उदाहरण है। काइमोट्रिप्सिन आदर्श सेरीन प्रोटिएज़ है। Asp102 द्वारा उन्मुख His57, Ser195 से प्रोटॉन लेता है, जिसका ऑक्सीजन कार्बोनिल पर आक्रमण करता है; चतुष्फलकीय ऑक्सीऐनायन को Gly193 व Ser195 के मुख्य-शृंखला N–H समूह (ऑक्सीऐनायन छिद्र) स्थिर करते हैं; ऐमीन भाग निकल जाता है और ऐसिल-एंज़ाइम बचता है, जिसे फिर जल अपघटित करता है। p-नाइट्रोफ़ेनिल ऐसीटेट के साथ, सक्रिय स्थलों के बराबर p-नाइट्रोफ़ीनोलेट का तीव्र विस्फोट (burst) उस धीमी स्थिर दर से पहले आता है जो विऐसिलन तय करता है। गहरा जलविरागी S1 कोटर विशिष्टता समझाता है; ट्रिप्सिन के S1 के तल पर Asp189, Lys व Arg चुनता है। काइमोट्रिप्सिनोजन तब सक्रिय होता है जब ट्रिप्सिन Arg15–Ile16 काटता है; नया N-सिरा Ile16, Asp194 से युग्म बनाकर ऑक्सीऐनायन छिद्र व S1 कोटर गढ़ता है। DIFP, Ser195 का फ़ॉस्फ़ोरिलन कर निष्क्रिय करता है, और TPCK His57 का ऐल्किलन करता है।

मुख्य बिंदु

  • वृहदणु संघनन से बनते व जल-अपघटन से टूटते हैं; लिपिड बहुलित नहीं, संयोजित होते हैं। जल का उच्च परावैद्युत स्थिरांक आयनों को घोलता है, और मुक्त जल की एन्ट्रॉपी-वृद्धि रूपी जलविरागी प्रभाव वलन व द्विस्तर चलाता है।
  • बंध कार्य तय करता है: α(1→4)/α(1→6) ग्लूकोज़ ईंधन संचित करता है (ग्लाइकोजन में प्रत्येक 8–12 अवशेषों पर शाखा), β(1→4) रेशे बनाता है; सुक्रोज़ अनपचायक है। द्विरज्जुकी DNA में A = T व G = C; RNA का 2′-OH उसे क्षार में अस्थिर बनाता है।
  • α-हेलिक्स में प्रति घुमाव 3.6 अवशेष, प्रति अवशेष 0.15 nm तथा i→i+4 हाइड्रोजन बंध हैं; β-शीट में बंध रज्जुकों के बीच हैं। ऐनफ़िन्सन का RNase A प्रयोग दिखाता है कि मूल वलन अनुक्रम द्वारा तय मुक्त-ऊर्जा न्यूनतम है; चैपेरोन केवल समुच्चयन रोकते हैं।
  • गलत वलन से ऐमिलॉइड (ऐल्ज़ाइमर, पार्किन्सन), स्वयं फैलने वाले प्रिऑन तथा ER में नष्ट होने वाला ΔF508 CFTR बनते हैं; सिकल-सेल रोग सामान्य रूप से वलित HbS का बहुलन है।
  • मायोग्लोबिन O₂ को अतिपरवलयिक रूप से बाँधता है (n = 1); हीमोग्लोबिन T→R परिवर्तन से सहकारी है (n ≈ 3, P50 ≈ 26 torr)। H⁺, CO₂ व 2,3-BPG, T को स्थिर कर वक्र को दाईं ओर ले जाते हैं; HbF व CO बाईं ओर।
  • लाइसोज़ाइम (Glu35, Asp52, विकृति), RNase A (His12, His119, 2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट), कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ A (Zn²⁺, Glu270, प्रेरित संगति) व काइमोट्रिप्सिन (Ser195–His57–Asp102, ऑक्सीऐनायन छिद्र, ऐसिल-एंज़ाइम) अम्ल–क्षार, धातु-आयन व सहसंयोजी उत्प्रेरण के आदर्श हैं।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. जैवअणुओं का कौन-सा वर्ग दोहराई जाने वाली एकलक इकाइयों के संघनन से बना बहुलक नहीं है, बल्कि असहसंयोजी अन्योन्यक्रियाओं से बड़ी संरचनाओं में संयोजित होता है?

    1. प्रोटीन, जो पेप्टाइड बंधों से जुड़े अमीनो अम्लों से बनते हैं
    2. न्यूक्लिक अम्ल, जो फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर बंधों से जुड़े न्यूक्लियोटाइडों से बनते हैं
    3. पॉलीसैकेराइड, जो ग्लाइकोसिडिक बंधों से जुड़े मोनोसैकेराइडों से बनते हैं
    4. झिल्ली लिपिड, जो जलविरागी प्रभाव से द्विस्तर बनाते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — झिल्ली लिपिड, जो जलविरागी प्रभाव से द्विस्तर बनाते हैं

    लिपिड बहुलक नहीं हैं: फ़ॉस्फ़ोलिपिड व कोलेस्ट्रॉल अलग-अलग अणु हैं जो जलविरागी प्रभाव से असहसंयोजी रूप से द्विस्तर में जुड़ते हैं। प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल व पॉलीसैकेराइड वास्तविक बहुलक हैं जो संघनन (जल निकलना) से बनते व जल-अपघटन से टूटते हैं। पॉलीसैकेराइड भ्रामक विकल्प है क्योंकि ग्लाइकोजन एक बड़े समूह जैसा दिखता है, पर उसकी ग्लूकोज़ इकाइयाँ सहसंयोजी रूप से जुड़ी हैं।
  2. प्रोटीन के वलन में उसकी अध्रुवीय पार्श्व-शृंखलाएँ क्रोड में दब जाती हैं। जल में यह दबना अनुकूल होने का मुख्य ऊष्मागतिक कारण क्या है?

    1. खुले अध्रुवीय समूहों के चारों ओर व्यवस्थित जल-अणु मुक्त होते हैं, अतः जल की एन्ट्रॉपी बढ़ती है
    2. अध्रुवीय पार्श्व-शृंखलाएँ एक-दूसरे को प्रबलता से आकर्षित करती हैं, अतः उनके संयोजन की एन्थैल्पी बड़ी व ऋणात्मक है
    3. क्रोड में पहुँचने पर अध्रुवीय पार्श्व-शृंखलाएँ मुख्य शृंखला के ऐमाइड समूहों से हाइड्रोजन बंध बनाती हैं
    4. सघन वलित अवस्था में सिमटते समय पॉलीपेप्टाइड शृंखला संरूपणीय एन्ट्रॉपी प्राप्त करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — खुले अध्रुवीय समूहों के चारों ओर व्यवस्थित जल-अणु मुक्त होते हैं, अतः जल की एन्ट्रॉपी बढ़ती है

    यह जलविरागी प्रभाव है: अध्रुवीय समूह हाइड्रोजन बंध नहीं बना सकते, अतः उनके चारों ओर का जल व्यवस्थित पिंजरों में बँधा रहता है; समूहों के एकत्र होने पर वह जल मुक्त होता है और उसकी एन्ट्रॉपी बढ़ती है। अध्रुवीय समूहों के बीच वान्डर वाल्स आकर्षण है, पर दुर्बल है और मुख्य प्रेरक बल नहीं। वलन में शृंखला संरूपणीय एन्ट्रॉपी खोती है, पाती नहीं, जो वलन का विरोध करती है; अध्रुवीय पार्श्व-शृंखलाओं में ऐमाइड से हाइड्रोजन बंध बनाने वाले समूह नहीं होते।
  3. एक डाइसैकेराइड बेनेडिक्ट अभिकर्मक से ऋणात्मक परीक्षण देता है और विलयन में म्यूटारोटेशन नहीं दिखाता। कौन-सा डाइसैकेराइड इन प्रेक्षणों से मेल खाता है?

    1. माल्टोज़, Glc(α1→4)Glc
    2. लैक्टोज़, Gal(β1→4)Glc
    3. सुक्रोज़, Glc(α1↔2β)Fru
    4. सेलोबायोज़, Glc(β1→4)Glc
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — सुक्रोज़, Glc(α1↔2β)Fru

    सुक्रोज़ में ग्लाइकोसिडिक बंध ग्लूकोज़ के एनोमरी C1 को फ़्रक्टोज़ के एनोमरी C2 से जोड़ता है, अतः कोई वलय खुल नहीं सकता: Cu²⁺ को अपचित करने या α व β के बीच बदलने हेतु कोई मुक्त एनोमरी कार्बन नहीं है। माल्टोज़, लैक्टोज़ व सेलोबायोज़ केवल एक अवशेष का एनोमरी कार्बन प्रयोग करते हैं; दूसरे ग्लूकोज़ का एनोमरी कार्बन मुक्त रहता है, अतः वे अपचायक हैं और म्यूटारोटेशन दिखाते हैं।
  4. ग्लाइकोजन व ऐमाइलोज़ दोनों ग्लूकोज़ के बहुलक हैं। व्यायाम के आरंभ में पेशी में ग्लूकोज़ को तेज़ी से मुक्त करने के लिए ग्लाइकोजन ऐमाइलोज़ से अधिक उपयुक्त क्यों है?

    1. इसकी ग्लूकोज़ इकाइयाँ β(1→4) बंधों से जुड़ी हैं, जो α(1→4) बंधों से तेज़ी से जल-अपघटित होते हैं
    2. प्रत्येक 8–12 अवशेषों पर इसकी α(1→6) शाखाएँ अनेक अनपचायक सिरे बनाती हैं जिन पर एंज़ाइम एक साथ कार्य करते हैं
    3. इसका एकमात्र अपचायक सिरा वह स्थान है जहाँ ग्लूकोज़ मुक्त होता है, और यह सिरा ऐमाइलोज़ से अधिक खुला है
    4. यह सघन अशाखित कुंडली के रूप में संचित है, अतः अपघटन से पहले कम जल हटाना पड़ता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — प्रत्येक 8–12 अवशेषों पर इसकी α(1→6) शाखाएँ अनेक अनपचायक सिरे बनाती हैं जिन पर एंज़ाइम एक साथ कार्य करते हैं

    ग्लाइकोजन फ़ॉस्फ़ोरिलेज़ अनपचायक सिरों से ग्लूकोज़ हटाता है। प्रत्येक 8–12 अवशेषों पर शाखाएँ ग्लाइकोजन को ऐसे बहुत अधिक सिरे देती हैं, अतः अनेक एंज़ाइम अणु एक साथ कार्य करते हैं; शाखन बहुलक को अधिक घुलनशील भी बनाता है। ग्लाइकोजन के मुख्य बंध α(1→4) हैं, β(1→4) नहीं; उसका केवल एक अपचायक सिरा है, जहाँ अपघटन नहीं होता; और वह अत्यधिक शाखित है, अशाखित कुंडली नहीं (वह ऐमाइलोज़ का वर्णन है)।
  5. न्यूक्लिक अम्ल संरचना के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. जिस द्विरज्जुकी DNA में 30% क्षारक A हैं उसमें 30% G अवश्य होगा
    2. तनु क्षार RNA को काटता है, DNA को नहीं, क्योंकि उसका 2′-OH पड़ोसी फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर पर आक्रमण कर 2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट बनाता है
    3. Z-DNA दक्षिणावर्ती कुंडली है जिसे एकांतर प्यूरीन–पिरिमिडीन अनुक्रम बढ़ावा देते हैं
    4. B-DNA में प्रति घुमाव लगभग 10.5 क्षार-युग्म होते हैं और आसन्न क्षार-युग्म 0.34 nm दूर होते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — तनु क्षार RNA को काटता है, DNA को नहीं, क्योंकि उसका 2′-OH पड़ोसी फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर पर आक्रमण कर 2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट बनाता है; D — B-DNA में प्रति घुमाव लगभग 10.5 क्षार-युग्म होते हैं और आसन्न क्षार-युग्म 0.34 nm दूर होते हैं

    2′-OH, 2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट के माध्यम से RNA को क्षार में अस्थिर बनाता है, और B-DNA में प्रति घुमाव लगभग 10.5 bp व 0.34 nm उठान है। 30% A के साथ शारगाफ़ नियमों से T = 30% व G = C = 20% आते हैं, 30% G नहीं। Z-DNA वामावर्ती है, दक्षिणावर्ती नहीं, यद्यपि एकांतर प्यूरीन–पिरिमिडीन अनुक्रम सचमुच उसे बढ़ावा देते हैं।
  6. 5,000 क्षार-युग्मों के एक रेखीय द्विरज्जुकी DNA अणु में 30% ऐडेनीन है (उसके सभी क्षारकों के प्रतिशत के रूप में)। दोनों रज्जुकों को गिनते हुए अणु में कुल कितने ग्वानीन अवशेष हैं?

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 2000

    अणु में 2 × 5,000 = 10,000 न्यूक्लियोटाइड हैं। A = 30% = 3,000, और शारगाफ़ नियम से T = A = 3,000। शेष 10,000 − 6,000 = 4,000, G + C हैं, और G = C, अतः G = 2,000। 3,000 (G = A मान लेना) या 1,000 (एक ही रज्जुक गिनना) प्रचलित भूलें हैं।
  7. दक्षिणावर्ती α-हेलिक्स में अवशेष n का मुख्य-शृंखला C=O समूह किस अवशेष के मुख्य-शृंखला N–H समूह से हाइड्रोजन बंध बनाता है?

    1. उसी शृंखला का अवशेष n + 3, जिससे प्रति घुमाव ठीक तीन अवशेषों वाली अधिक कसी कुंडली बनती है
    2. उसी शृंखला का अवशेष n + 2, जिससे हर दूसरा अवशेष एक छोटा वलय बंद करता है
    3. उसी शृंखला का अवशेष n + 4, और बंध लगभग हेलिक्स-अक्ष के समांतर चलता है
    4. पड़ोसी पॉलीपेप्टाइड रज्जुक पर स्थित कोई अवशेष, लगभग शृंखला के लंबवत
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — उसी शृंखला का अवशेष n + 4, और बंध लगभग हेलिक्स-अक्ष के समांतर चलता है

    α-हेलिक्स में प्रत्येक C=O(n), N–H(n + 4) से उसी शृंखला के भीतर और लगभग अक्ष के समांतर बंध बनाता है, जिससे प्रति घुमाव 3.6 अवशेष होते हैं। n + 3 का प्रतिरूप अधिक कसी 3₁₀ कुंडली का है। पड़ोसी रज्जुकों के बीच, शृंखलाओं के लंबवत हाइड्रोजन बंध β-शीट को परिभाषित करते हैं, हेलिक्स को नहीं।
  8. राइबोन्यूक्लिएज़ A को β-मर्केप्टोएथेनॉल युक्त 8 M यूरिया में पूर्णतः अवलित किया जाता है। प्रयोग X में यूरिया व β-मर्केप्टोएथेनॉल को डायलिसिस से एक साथ हटाया जाता है और फिर प्रोटीन को वायु में रखा जाता है। प्रयोग Y में अपचित प्रोटीन को पहले 8 M यूरिया में रहते हुए ही वायु से ऑक्सीकृत किया जाता है और उसके बाद ही यूरिया हटाया जाता है। कौन-सा परिणाम व निष्कर्ष सही है?

    1. X व Y दोनों पूर्ण सक्रियता पाते हैं, क्योंकि डाइसल्फ़ाइड बंध बनते ही वे अकेले मूल वलन तय कर देते हैं
    2. X निष्क्रिय रहता है जबकि Y सक्रियता पाता है, क्योंकि मूल वलन के लिए शृंखला के वलित होने से पहले उसके डाइसल्फ़ाइड बंधों का बनना आवश्यक है
    3. किसी में सक्रियता नहीं लौटती, क्योंकि वलन-सूचना चैपेरोन देते हैं जो शुद्ध तंत्र में अनुपस्थित हैं
    4. X लगभग पूर्ण सक्रियता पाता है पर Y लगभग 1% सक्रिय अव्यवस्थित प्रोटीन देता है: मूल युग्मन ही अनुक्रम द्वारा तय सर्वाधिक स्थिर युग्मन है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — X लगभग पूर्ण सक्रियता पाता है पर Y लगभग 1% सक्रिय अव्यवस्थित प्रोटीन देता है: मूल युग्मन ही अनुक्रम द्वारा तय सर्वाधिक स्थिर युग्मन है

    X में शृंखला पहले मूल परिस्थितियों में वलित होती है और फिर सही चार डाइसल्फ़ाइड बनते हैं, जिससे लगभग पूर्ण सक्रियता लौटती है। Y में डाइसल्फ़ाइड तब बनते हैं जब शृंखला अभी अवलित है, अतः वे 105 संभावनाओं में लगभग यादृच्छिक युग्मित होकर गलत संरचनाएँ जड़ देते हैं जिनमें लगभग 1% सक्रियता है (और थायॉल की अल्प मात्रा उन्हें मूल रूप में पुनर्व्यवस्थित होने देती है)। अतः मूल संरचना ही अनुक्रम में कूटित ऊष्मागतिक रूप से अनुकूल संरचना है। केवल डाइसल्फ़ाइड से वलन तय होने का विचार Y से खंडित होता है, और X में किसी चैपेरोन की आवश्यकता नहीं पड़ी।
  9. प्रोटीन वलन व गलत वलन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. GroEL–GroES जैसे चैपेरोनिन ATP का उपयोग कर पॉलीपेप्टाइड को ऐसे कक्ष में बंद करते हैं जहाँ वह समुच्चयन के बिना वलित हो सके
    2. आणविक चैपेरोन वह संरचनात्मक सूचना रखते हैं जो उनके क्रियाधारों का अंतिम त्रिविम वलन तय करती है
    3. प्रिऑन रोग में β-शीट-प्रधान PrP^Sc, α-हेलिक्स-प्रधान PrP^C को अमीनो अम्ल अनुक्रम बदले बिना और PrP^Sc में बदलता है
    4. सिकल-सेल हीमोग्लोबिन एक गलत वलित प्रोटीन है जिसे लाल कोशिकाओं के भीतर प्रोटिएसोम तेज़ी से नष्ट कर देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — GroEL–GroES जैसे चैपेरोनिन ATP का उपयोग कर पॉलीपेप्टाइड को ऐसे कक्ष में बंद करते हैं जहाँ वह समुच्चयन के बिना वलित हो सके; C — प्रिऑन रोग में β-शीट-प्रधान PrP^Sc, α-हेलिक्स-प्रधान PrP^C को अमीनो अम्ल अनुक्रम बदले बिना और PrP^Sc में बदलता है

    चैपेरोनिन एक बंद, ATP-चालित वलन-कक्ष देते हैं, और प्रिऑन समान अनुक्रम वाले PrP^C के PrP^Sc में साँचा-आधारित रूपांतरण से फैलते हैं। चैपेरोन केवल समुच्चयन रोकते हैं और शृंखला को बार-बार अवसर देते हैं; वलन की सूचना अनुक्रम में है, जैसा ऐनफ़िन्सन ने दिखाया। HbS सामान्य रूप से वलित होता है; सतह पर β6 Glu→Val परिवर्तन विऑक्सी-HbS को तंतुओं में बहुलित करता है, जो गलत वलन के बाद अपघटन नहीं है।
  10. लाल कोशिकाओं के भीतर भ्रूणीय हीमोग्लोबिन (α₂γ₂) की O₂ बंधुता वयस्क हीमोग्लोबिन (α₂β₂) से अधिक है, जिससे भ्रूण मातृ-रक्त से O₂ ले पाता है। इसका आणविक आधार क्या है?

    1. γ शृंखलाओं में स्थान 143 पर His के स्थान पर Ser है, जो केंद्रीय गुहा में 2,3-BPG बंधन को दुर्बल करता है
    2. γ शृंखलाओं में समीपस्थ हिस्टिडीन नहीं है, अतः हीम का लौह O₂ को अधिक दृढ़ता से बाँधने हेतु मुक्त रहता है
    3. भ्रूणीय लाल कोशिकाओं में 2,3-BPG होता ही नहीं, अतः हीमोग्लोबिन उच्च बंधुता वाली R अवस्था में बँधा रहता है
    4. HbF मायोग्लोबिन की तरह एकलकों में टूट जाता है, अतः उसका O₂ बंधन असहकारी व उच्च बंधुता वाला हो जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — γ शृंखलाओं में स्थान 143 पर His के स्थान पर Ser है, जो केंद्रीय गुहा में 2,3-BPG बंधन को दुर्बल करता है

    2,3-BPG दो β शृंखलाओं के बीच धनावेशित गुहा में जुड़कर T अवस्था को स्थिर करता है। γ शृंखलाओं में His143 के स्थान पर Ser है, जिससे धनावेश हट जाते हैं, अतः HbF 2,3-BPG को दुर्बलता से बाँधता है और उसका P50 कम है। भ्रूणीय लाल कोशिकाओं में 2,3-BPG होता है, अतः उसके अभाव का दावा भ्रामक पर गलत विकल्प है। γ शृंखलाओं में समीपस्थ His बना रहता है, और HbF सहकारी चतुष्क ही रहता है।
  11. रोगी X में उसके 50% हीम स्थलों पर कार्बन मोनोऑक्साइड है; रोगी Y रक्ताल्पता-ग्रस्त है, जिसमें सामान्य से आधा हीमोग्लोबिन है और CO नहीं है। दोनों के धमनी रक्त में प्रति लीटर लगभग समान O₂ है, फिर भी X के ऊतकों में ऑक्सीजन-अभाव कहीं अधिक गंभीर है। क्यों?

    1. CO शेष उप-इकाइयों में हीम लौह को Fe³⁺ में ऑक्सीकृत करता है, अतः रक्त के ऊतकों तक पहुँचने से पहले ही ये उप-इकाइयाँ अपनी बँधी O₂ प्लाज़्मा में छोड़ देती हैं
    2. CO, 2,3-BPG से जुड़कर उसे केंद्रीय गुहा से हटा देता है, जिससे रोगी X का O₂ वक्र दाईं ओर विस्थापित होता है
    3. कुछ उप-इकाइयों से बँधा CO चतुष्क को R अवस्था की ओर ले जाता है, जिससे शेष हीमों की बंधुता बढ़ती है और वे ऊतकों में अपनी O₂ थामे रहते हैं
    4. CO लाल कोशिकाओं में 2,3-BPG संश्लेषण रोकता है, अतः रोगी X का हीमोग्लोबिन असहकारी होकर O₂ बहुत जल्दी छोड़ देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — कुछ उप-इकाइयों से बँधा CO चतुष्क को R अवस्था की ओर ले जाता है, जिससे शेष हीमों की बंधुता बढ़ती है और वे ऊतकों में अपनी O₂ थामे रहते हैं

    CO एक बँधे लिगैंड की तरह R अवस्था को बढ़ावा देता है: आंशिक रूप से CO-बद्ध चतुष्क में शेष हीमों की O₂ बंधुता बढ़ जाती है, अतः वक्र बाईं ओर खिसकता और कम सिग्मॉइड होता है, और ऊतक pO₂ पर बहुत कम O₂ मुक्त होती है। रक्ताल्पता में बचा हीमोग्लोबिन सामान्य है और सामान्य रूप से O₂ छोड़ता है। CO लौह का ऑक्सीकरण नहीं करता (उससे मेटहीमोग्लोबिन बनता है, जो O₂ बाँध ही नहीं सकता), और दाईं ओर विस्थापन तो O₂ मुक्ति बढ़ाता, घटाता नहीं।
  12. मायोग्लोबिन एक स्थल पर O₂ बाँधता है और उसका P50 2.8 torr है। 20 torr के pO₂ पर मायोग्लोबिन अणुओं का कितना अंश O₂ वहन करता है? उत्तर अंश के रूप में दो दशमलव स्थानों तक दें।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 0.88

    एक स्थल के लिए θ = pO₂/(P50 + pO₂) = 20/(2.8 + 20) = 20/22.8 = 0.877, अर्थात 0.88। वक्र अतिपरवलयिक है, अतः कोई हिल घातांक नहीं आता।
  13. हीमोग्लोबिन बंधन को हिल समीकरण θ = pO₂ⁿ/(P50ⁿ + pO₂ⁿ) से वर्णित किया जाता है, जहाँ n = 3.0 व P50 = 26 torr। रक्त फेफड़ों से pO₂ = 100 torr पर निकलता है और सक्रिय पेशी की केशिकाओं में pO₂ = 20 torr है। फेफड़ों व पेशी के बीच हीमोग्लोबिन के कितने प्रतिशत बंधन-स्थल O₂ छोड़ते हैं, अर्थात 100 × (100 torr पर θ − 20 torr पर θ)? निकटतम पूर्णांक दें।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 67

    26³ = 17,576। 100 torr पर θ = 1,000,000/(17,576 + 1,000,000) = 0.983। 20 torr पर θ = 8,000/(17,576 + 8,000) = 0.313। अंतर = 0.670, अर्थात 67%। n = 1 लेने पर केवल लगभग 36% आता है, इसीलिए आपूर्ति हेतु सहकारिता महत्वपूर्ण है।
  14. एक ऑक्सीजन-बंधक प्रोटीन pO₂ = 15 torr पर 20% व pO₂ = 40 torr पर 80% संतृप्त है। यह मानते हुए कि इस परास में वह हिल समीकरण का पालन करता है, उसका हिल गुणांक क्या है? उत्तर दो दशमलव स्थानों तक दें।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 2.83

    log[θ/(1 − θ)] = n log pO₂ − n log P50 से n = Δlog[θ/(1 − θ)]/Δlog pO₂। 80% पर: log(0.8/0.2) = log 4 = 0.6021; 20% पर: log(0.25) = −0.6021; अंतर 1.2041। log(40/15) = log 2.667 = 0.4260। n = 1.2041/0.4260 = 2.83, जो हीमोग्लोबिन जैसा सहकारी प्रोटीन है।
  15. काइमोट्रिप्सिन में किस अवशेष की पार्श्व-शृंखला नाभिकस्नेही के रूप में कटने वाले पेप्टाइड बंध के कार्बोनिल कार्बन पर आक्रमण करती है?

    1. His57, जो अभिक्रिया के दौरान प्रोटॉन ग्रहण करता है
    2. Ser195, जो ऐसिल-एंज़ाइम मध्यवर्ती बनाता है
    3. Asp102, जो त्रयी को स्थान पर थामे रखता है
    4. Gly193, जो ऑक्सीऐनायन छिद्र को आस्तरित करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — Ser195, जो ऐसिल-एंज़ाइम मध्यवर्ती बनाता है

    Ser195 का हाइड्रॉक्सिल ऑक्सीजन, His57 द्वारा प्रोटॉन लिए जाने पर प्रबल नाभिकस्नेही बनकर कार्बोनिल कार्बन पर आक्रमण करता है और ऐसिल-एंज़ाइम का एस्टर बनता है। His57 सामान्य क्षार (और बाद में सामान्य अम्ल) है, नाभिकस्नेही नहीं; Asp102, His57 को उन्मुख करता है; Gly193 ऑक्सीऐनायन छिद्र को मुख्य-शृंखला N–H देता है।
  16. काइमोट्रिप्सिन को p-नाइट्रोफ़ेनिल ऐसीटेट की बहुत अधिक मात्रा के साथ मिलाया जाता है। पीला p-नाइट्रोफ़ीनोलेट एक तीव्र आरंभिक विस्फोट में प्रकट होता है जिसका आकार सक्रिय एंज़ाइम की सांद्रता के बराबर है, और उसके बाद धीमी, रैखिक मुक्ति होती है। यह बलगतिक प्रतिरूप क्या दर्शाता है?

    1. एंज़ाइम में दो प्रकार के सक्रिय स्थल हैं, एक तीव्र व एक धीमा, जो समान मात्रा में हैं
    2. उत्पाद p-नाइट्रोफ़ीनोलेट धीरे-धीरे एंज़ाइम को संदमित करता है जब तक कम स्थिर दर न आ जाए
    3. क्रियाधार का बंधन धीमा व दर-सीमक है, जबकि उसके बाद के सभी रासायनिक चरण बहुत तीव्र हैं
    4. एंज़ाइम का ऐसिलन तीव्र है और सहसंयोजी ऐसिल-एंज़ाइम का विऐसिलन धीमा, दर-सीमक चरण है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — एंज़ाइम का ऐसिलन तीव्र है और सहसंयोजी ऐसिल-एंज़ाइम का विऐसिलन धीमा, दर-सीमक चरण है

    प्रत्येक सक्रिय स्थल Ser195 के ऐसीटिलन के साथ तुरंत एक p-नाइट्रोफ़ीनोलेट मुक्त करता है, जिससे एंज़ाइम-सांद्रता के बराबर विस्फोट मिलता है; फिर दोबारा अभिक्रिया से पहले प्रत्येक स्थल को ऐसीटिल-एंज़ाइम का जल-अपघटन करना होता है, अतः स्थिर दर धीमे विऐसिलन को दर्शाती है। यह सहसंयोजी मध्यवर्ती व दो-चरणीय (पिंग-पोंग) क्रियाविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण है। यदि बंधन दर-सीमक होता तो विस्फोट होता ही नहीं, और उत्पाद-संदमन एक वक्र देता, एंज़ाइम के अनुपात वाला विस्फोट नहीं।
  17. आदर्श एंज़ाइमों लाइसोज़ाइम, राइबोन्यूक्लिएज़ A, कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ A व काइमोट्रिप्सिन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. राइबोन्यूक्लिएज़ A, DNA व RNA को समान दर से काटता है, क्योंकि वह दोनों में समान फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर मुख्य शृंखला पर आक्रमण करता है
    2. कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ A में Zn²⁺ कटने वाले कार्बोनिल को ध्रुवित करता है और आक्रमण करने वाले जल-अणु को सक्रिय करने में सहायता करता है
    3. लाइसोज़ाइम N-ऐसीटिलम्यूरैमिक अम्ल के C1 व N-ऐसीटिलग्लूकोसैमीन के C4 के बीच β(1→4) बंध का जल-अपघटन करता है
    4. काइमोट्रिप्सिनोजन तब सक्रिय होता है जब एंटेरोपेप्टिडेज़ उसे C-सिरे के पास एक लाइसीन के बाद काटता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ A में Zn²⁺ कटने वाले कार्बोनिल को ध्रुवित करता है और आक्रमण करने वाले जल-अणु को सक्रिय करने में सहायता करता है; C — लाइसोज़ाइम N-ऐसीटिलम्यूरैमिक अम्ल के C1 व N-ऐसीटिलग्लूकोसैमीन के C4 के बीच β(1→4) बंध का जल-अपघटन करता है

    कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ A में Zn²⁺ कार्बोनिल को ध्रुवित करता है और बँधे जल का pKa घटाता है, और लाइसोज़ाइम पेप्टिडोग्लाइकन का MurNAc(C1)–GlcNAc(C4) β(1→4) बंध काटता है। RNase A को अपना 2′,3′-चक्रीय मध्यवर्ती बनाने हेतु RNA का 2′-OH चाहिए, अतः DNA क्रियाधार नहीं है। काइमोट्रिप्सिनोजन को ट्रिप्सिन N-सिरे के पास Arg15–Ile16 बंध काटकर सक्रिय करता है; एंटेरोपेप्टिडेज़ ट्रिप्सिनोजन को सक्रिय करता है।
  18. कौन-सा प्रेक्षण-समूह उस क्रियाविधि का सबसे अच्छा समर्थन करता है जिसमें राइबोन्यूक्लिएज़ A, His12 व His119 का उपयोग कर 2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट मध्यवर्ती से RNA काटता है?

    1. सक्रियता को Zn²⁺ चाहिए और EDTA से समाप्त होती है, तथा पाचन के सभी उत्पादों पर 5′-फ़ॉस्फ़ेट समूह होते हैं
    2. pH 11 तक pH के साथ सक्रियता लगातार बढ़ती है, क्योंकि दोनों हिस्टिडीनों को अप्रोटॉनित होना चाहिए ताकि प्रत्येक क्षार के रूप में कार्य कर सके
    3. 2′,3′-चक्रीय न्यूक्लियोटाइड पहले प्रकट होकर बाद में 3′-फ़ॉस्फ़ेट बनता है; DNA नहीं कटता; pH–सक्रियता वक्र घंटी-आकार का है
    4. डाइआइसोप्रोपिल फ़्लोरोफ़ॉस्फ़ेट सक्रिय स्थल के एकल, असामान्य रूप से अभिक्रियाशील सेरीन को सहसंयोजी रूप से चिह्नित कर एंज़ाइम को निष्क्रिय करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — 2′,3′-चक्रीय न्यूक्लियोटाइड पहले प्रकट होकर बाद में 3′-फ़ॉस्फ़ेट बनता है; DNA नहीं कटता; pH–सक्रियता वक्र घंटी-आकार का है

    चक्रीय मध्यवर्ती का संचय और फिर 3′-फ़ॉस्फ़ेट में खुलना दो-चरणीय ट्रांसफ़ॉस्फ़ोरिलन व जल-अपघटन दिखाता है; DNA का न कटना दिखाता है कि आक्रमण करने वाला समूह 2′-OH है; घंटी-आकार का pH प्रोफ़ाइल दिखाता है कि एक His क्षारीय (His12) व दूसरा अम्लीय (His119) होना चाहिए। RNase A धातु-एंज़ाइम नहीं है और 3′-फ़ॉस्फ़ेट उत्पाद देता है; pH 11 तक बढ़ता प्रोफ़ाइल दो क्षारों का संकेत होता, अम्ल–क्षार युग्म का नहीं; सेरीन का DIFP से चिह्नन काइमोट्रिप्सिन जैसे सेरीन प्रोटिएज़ों की पहचान है।