संरचना व आबंधन: आयनिक व सहसंयोजी आबंध, VB व MO सिद्धांत, आकृतियाँ, ध्रुवता, दुर्बल अन्योन्यक्रियाएँ, जालक ऊर्जा व HSAB
2. द्विपरमाणुक अणुओं के लिए संयोजकता-आबंध व आण्विक-कक्षक उपागम
संयोजकता-आबंध (VB) सिद्धांत, जो हाइटलर व लंदन द्वारा H₂ के विश्लेषण (1927) से आया, दो अर्ध-पूर्ण परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन से आबंध बनाता है जिनके इलेक्ट्रॉन विपरीत चक्रण से युग्मित होते हैं; आबंध दो परमाणुओं के बीच स्थानबद्ध रहता है। सिरे-से-सिरे अतिव्यापन σ आबंध देता है और p कक्षकों का पार्श्व अतिव्यापन π आबंध, अतः N≡N में एक σ और दो π हैं। VB परमाणुओं के बीच रेखाओं वाला रसायनज्ञ का चित्र बनाए रखता है, पर O₂ पर लागू करने पर वह हर इलेक्ट्रॉन को युग्मित कर देता है और अणु को प्रतिचुंबकीय बताता है।
आण्विक-कक्षक (MO) सिद्धांत परमाणु कक्षकों को (LCAO) पूरे अणु पर फैले कक्षकों में जोड़ता है: सम-कला संयोजन निचला आबंधी MO देता है, विषम-कला संयोजन ऊँचा प्रतिआबंधी (*) MO। इलेक्ट्रॉन ऑफ़बाउ, पाउली व हुंड के अनुसार MO भरते हैं, और आबंध कोटि = (N_b − N_a)/2। O₂ व F₂ के लिए संयोजी क्रम σ2s < σ2s < σ2p_z < π2p_x = π2p_y < π2p_x = π2p_y < σ2p_z है। B₂, C₂ व N₂ में s–p मिश्रण σ2p_z को π2p युग्म से ऊपर धकेल देता है। O₂ में 12 संयोजी इलेक्ट्रॉन हैं; अंतिम दो दोनों समभ्रंश π* कक्षकों में समांतर चक्रण से एक-एक करके जाते हैं, अतः O₂ की आबंध कोटि (8 − 4)/2 = 2 है और उसमें दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं: द्रव ऑक्सीजन चुंबक की ओर खिंचती है, जिसे MO सिद्धांत समझाता है और VB नहीं। B₂ (आबंध कोटि 1) केवल s–p मिश्रण के कारण अनुचुंबकीय है; N₂ (आबंध कोटि 3) प्रतिचुंबकीय है। He₂ की आबंध कोटि 0 है और वह अस्तित्व में नहीं है, जबकि He₂⁺ (0.5) है।
| स्पीशीज़ | संयोजी इलेक्ट्रॉन | आबंध कोटि | अयुग्मित इलेक्ट्रॉन |
|---|---|---|---|
| O₂⁺ (डाइऑक्सीजेनिल) | 11 | 2.5 | 1 |
| O₂ | 12 | 2 | 2 |
| O₂⁻ (सुपरऑक्साइड) | 13 | 1.5 | 1 |
| O₂²⁻ (परऑक्साइड) | 14 | 1 | 0 |
3. VSEPR सिद्धांत, संकरण व अणुओं की आकृतियाँ
VSEPR केंद्रीय परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉन डोमेन (आबंध युग्म और एकाकी युग्म; बहु-आबंध एक डोमेन गिना जाता है) गिनता है और उन्हें यथासंभव दूर रखता है। एकाकी युग्म एक ही नाभिक से बँधे होने के कारण अधिक फैलते हैं, अतः प्रतिकर्षण का क्रम एकाकी युग्म–एकाकी युग्म > एकाकी युग्म–आबंध युग्म > आबंध युग्म–आबंध युग्म है, और एकाकी युग्म आबंध कोणों को सिकोड़ते हैं। संकरण उसी ज्यामिति का VB वर्णन है: s व p (और d) कक्षकों के मिश्रण से समतुल्य संकर कक्षक बनते हैं जो डोमेनों की ओर इंगित करते हैं।
| डोमेन | संकरण | कोई एकाकी युग्म नहीं | एकाकी युग्मों सहित |
|---|---|---|---|
| 2 | sp | रैखिक, 180° (गैसीय BeCl₂, CO₂) | कोई नहीं |
| 3 | sp² | त्रिकोणीय समतली, 120° (BF₃) | 1 एकाकी युग्म: बंकित (SO₂) |
| 4 | sp³ | चतुष्फलकीय, 109.5° (CH₄) | 1: पिरामिडी NH₃, 107°; 2: बंकित H₂O, 104.5° |
| 5 | sp³d | त्रिकोणीय द्विपिरामिडी (PCl₅) | 1: सी-सॉ SF₄; 2: T-आकार ClF₃; 3: रैखिक XeF₂, I₃⁻ (एकाकी युग्म विषुवतीय) |
| 6 | sp³d² | अष्टफलकीय, 90° (SF₆) | 1: वर्ग पिरामिडी BrF₅; 2: वर्ग समतली XeF₄ |
आबंध कोण संकर लक्षण का भी अनुसरण करते हैं। अधिक s लक्षण का अर्थ चौड़ा कोण और छोटा, प्रबल आबंध है: sp (50 % s) 180°, sp² (33 %) 120°, sp³ (25 %) 109.5°। वर्ग में नीचे कोण सिकुड़ता है क्योंकि बड़ा केंद्रीय परमाणु आबंधन के लिए लगभग शुद्ध p कक्षक प्रयोग करता है: NH₃ 107° बनाम PH₃ लगभग 93.5°, और H₂O 104.5° बनाम H₂S लगभग 92°। विद्युतऋणात्मक प्रतिस्थापी भी आबंध युग्मों को केंद्र से दूर खींचकर कोण घटाते हैं (NF₃ लगभग 102° बनाम NH₃ 107°)।
4. अनुनाद व संरचना प्राचल: आबंध लंबाई, आबंध कोण व आबंध ऊर्जा
जब एक लूइस संरचना किसी अणु का वर्णन नहीं कर पाती, तो वास्तविक संरचना योगदानी संरचनाओं का अनुनाद संकर होती है, जो केवल इलेक्ट्रॉनों की स्थिति में भिन्न होती हैं, परमाणुओं की स्थिति में कभी नहीं। योगदानी संरचनाएँ एक-दूसरे में नहीं बदलतीं; संकर एक ही संरचना है, जो किसी भी योगदानी से कम ऊर्जा की है, और यह अंतर अनुनाद ऊर्जा है (बेंज़ीन में लगभग 150 kJ mol⁻¹)। प्रमुख योगदानी संरचनाओं में अधिक आबंध, पूर्ण अष्टक, कम आवेश-पृथक्करण और अधिक विद्युतऋणात्मक परमाणु पर ऋण आवेश होता है। कार्बोनेट में तीन समतुल्य संरचनाएँ एक द्वि-आबंध को तीन C–O आबंधों पर फैला देती हैं, अतः प्रत्येक की आबंध कोटि 4/3 है और तीनों की लंबाई समान है। पेप्टाइड समूह में नाइट्रोजन का एकाकी युग्म C=O में विस्थानित होता है, जिससे C–N आबंध को आंशिक द्वि-आबंध लक्षण मिलता है: वह C–N एकल आबंध के 147 pm के स्थान पर लगभग 132 pm है, और पेप्टाइड इकाई के छह परमाणु समतली रहते हैं तथा C–N के परितः घूर्णन नहीं करते।
अधिक आबंध कोटि का अर्थ छोटा व प्रबल आबंध है। कार्बन–कार्बन आबंधों में एकल, द्वि व त्रि-आबंध लगभग 154, 134 व 120 pm लंबे हैं, और उनकी औसत आबंध एन्थैल्पी लगभग 348, 614 व 839 kJ mol⁻¹ है; बेंज़ीन के छह समान आबंध (लगभग 139 pm) एकल व द्वि के बीच हैं। N₂, O₂ व F₂ के क्रम में आबंध कोटि 3, 2, 1 घटती है और आबंध एन्थैल्पी लगभग 945, 498 व 159 kJ mol⁻¹ घटती है। द्वि-आबंध एकल से प्रबल है पर दोगुना प्रबल नहीं, क्योंकि π अतिव्यापन σ अतिव्यापन से दुर्बल है। आबंध कोण VSEPR व संकरण से निकलता है (भाग 3)।
5. द्विध्रुव आघूर्ण, हाइड्रोजन आबंधन व वान्डरवाल्स अन्योन्यक्रियाएँ
द्विध्रुव आघूर्ण μ = q × d है, जिसे डिबाई में मापते हैं (1 D = 3.336 × 10⁻³⁰ C m)। अणु का द्विध्रुव उसके आबंध द्विध्रुवों और एकाकी युग्म योगदानों का सदिश योग है, अतः सममित अणुओं में ध्रुवीय आबंधों के बावजूद μ = 0 होता है: CO₂, BF₃, CCl₄, PCl₅, SF₆, XeF₄ और trans-1,2-डाइक्लोरोएथीन। H₂O, NH₃, SO₂, CHCl₃, SF₄ और cis समावयवी ध्रुवीय हैं। NH₃ (लगभग 1.47 D) NF₃ (लगभग 0.23 D) से कहीं अधिक ध्रुवीय है: NH₃ में N–H आबंध द्विध्रुव N की ओर इंगित होकर एकाकी युग्म आघूर्ण में जुड़ते हैं, जबकि NF₃ में N–F द्विध्रुव N से दूर इंगित होकर उसे काफ़ी हद तक निरस्त कर देते हैं। प्रतिशत आयनिक लक्षण = μ(प्रेक्षित)/μ(आयनिक) × 100, जहाँ μ(आयनिक) = e × d वह आघूर्ण है जो आबंध लंबाई पर पूरा इलेक्ट्रॉन आवेश होने पर होता।
हाइड्रोजन आबंध D–H···A तब बनता है जब H किसी छोटे विद्युतऋणात्मक दाता D (N, O या F) से आबंधित हो और ग्राही A (N, O या F) के एकाकी युग्म की ओर इंगित हो। लगभग रैखिक होने पर यह सबसे प्रबल होता है, और कुछ से लेकर कुछ दसियों kJ mol⁻¹ के साथ यह सहसंयोजी आबंध का मोटे तौर पर दसवाँ भाग है। यह बताता है कि H₂O 100 °C पर क्यों उबलता है जबकि भारी H₂S लगभग −60 °C पर, बर्फ़ जल से कम घनी क्यों है (खुला चतुष्फलकीय जाल), और अंतराअणुक (intramolecular) हाइड्रोजन आबंध वाला o-नाइट्रोफ़ीनॉल p-नाइट्रोफ़ीनॉल से अधिक वाष्पशील क्यों है, जिसके अंतरअणुक (intermolecular) हाइड्रोजन आबंध अणुओं को आपस में जोड़ते हैं। जीवविज्ञान में यह क्षारकों को युग्मित करता है (A·T में दो, G·C में तीन), α-हेलिक्स (अवशेष i का C=O से अवशेष i + 4 का N–H) व β-शीट को थामता है, और एंज़ाइमों को विशिष्टता देता है।
वान्डरवाल्स अन्योन्यक्रियाएँ सबसे दुर्बल हैं (प्रति संपर्क 5 kJ mol⁻¹ से काफ़ी कम) और सभी अणुओं के बीच कार्य करती हैं: स्थायी द्विध्रुवों के बीच कीसोम बल, द्विध्रुव और उसके द्वारा प्रेरित द्विध्रुव के बीच डिबाई बल, तथा तात्क्षणिक व प्रेरित द्विध्रुवों के बीच लंदन परिक्षेपण बल, जो अध्रुवीय परमाणुओं के बीच भी होते हैं और आकार व ध्रुवणीयता के साथ बढ़ते हैं। आकर्षण 1/r⁶ के अनुसार घटता है, और संपर्क पर तीव्र प्रतिकर्षण आरंभ होता है, जो वान्डरवाल्स त्रिज्या परिभाषित करता है। अकेले नगण्य, पर हज़ारों मिलकर मुड़े प्रोटीन के ठसाठस भरे क्रोड और DNA क्षारकों की परत-व्यवस्था को स्थिर करते हैं।
6. आयनिक ठोस, आयनिक त्रिज्याएँ व बॉर्न-हैबर चक्र से जालक ऊर्जा
आयनिक ठोस में प्रत्येक आयन के चारों ओर उतने विपरीत आयन होते हैं जितने उन विपरीत आयनों के आपस में छुए बिना समा सकें, अतः त्रिज्या अनुपात r₊/r₋ उपसहसंयोजन संख्या बताता है: 0.225–0.414 से 4 (चतुष्फलकीय, ZnS), 0.414–0.732 से 6 (अष्टफलकीय, NaCl) और 0.732 से ऊपर 8 (घनीय, CsCl)। NaCl के लिए 102/181 = 0.56 से 6:6 उपसहसंयोजन की भविष्यवाणी होती है, जैसा प्रेक्षित है। आयनिक त्रिज्याएँ मापी गई अंतर-आयनिक दूरियों का बँटवारा हैं, अतः वे उपसहसंयोजन संख्या और चुने गए संदर्भ पैमाने पर निर्भर करती हैं।
जालक एन्थैल्पी वह एन्थैल्पी है जो एक मोल आयनिक ठोस को गैसीय आयनों में अलग करने हेतु आवश्यक है। यह आयनिक आवेशों के गुणनफल के साथ बढ़ती है और उनके बीच की दूरी के साथ घटती है, मोटे तौर पर z₊z₋/(r₊ + r₋) के अनुसार, अतः MgO (2+, 2−) की जालक एन्थैल्पी NaF की लगभग चार गुनी है, और NaF > NaCl > KCl। इसे सीधे नहीं मापा जा सकता, अतः बॉर्न-हैबर चक्र इसे हेस के नियम से प्राप्त करता है। NaCl के लिए हल किया उदाहरण, kJ mol⁻¹ में: ΔfH(NaCl, s) = −411, Na का ऊर्ध्वपातन = +107, Na की प्रथम IE = +496, Cl₂ की ½ आबंध एन्थैल्पी = +122 और Cl की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी = −349। गैसीय आयनों से होकर जाने वाला मार्ग सीधे निर्माण के बराबर होना चाहिए, अतः गैसीय आयनों से जालक बनने की ऊर्जा −411 − (107 + 496 + 122 − 349) = −787 है, और जालक एन्थैल्पी +787 kJ mol⁻¹ है।
7. HSAB सिद्धांत
पियर्सन ने लूइस अम्लों व क्षारकों को कठोर (छोटे, उच्च आवेशित, अल्प ध्रुवणीय) और मृदु (बड़े, कम आवेश वाले, आसानी से ध्रुवणीय) में बाँटा। HSAB सिद्धांत कहता है कि कठोर अम्ल कठोर क्षारकों को और मृदु अम्ल मृदु क्षारकों को वरीयता देते हैं। कठोर–कठोर युग्म मुख्यतः स्थिरवैद्युत आकर्षण से बँधते हैं, मृदु–मृदु युग्म सहसंयोजी साझेदारी से। अतः AgF विलेय है पर AgI अत्यंत अविलेय (मृदु Ag⁺ के साथ मृदु I⁻), LiF सबसे कम विलेय लिथियम हैलाइड है (कठोर–कठोर), और प्रकृति में कठोर Al³⁺ व Fe³⁺ ऑक्साइड के रूप में मिलते हैं जबकि मृदु Hg²⁺ सल्फ़ाइड सिनाबार, HgS, के रूप में।
| वर्ग | अम्ल | क्षारक |
|---|---|---|
| कठोर | H⁺, Li⁺, Na⁺, K⁺, Mg²⁺, Ca²⁺, Al³⁺, Cr³⁺ व Fe³⁺ | F⁻, OH⁻, H₂O, NH₃, Cl⁻, कार्बॉक्सिलेट, फ़ॉस्फ़ेट |
| सीमांत | Fe²⁺, Co²⁺, Ni²⁺, Cu²⁺, Zn²⁺ व Pb²⁺ | Br⁻, N₃⁻, पिरिडीन, इमिडाज़ोल |
| मृदु | Cu⁺, Ag⁺, Au⁺, Hg²⁺, Cd²⁺, Pt²⁺ व Pd²⁺ | I⁻, RS⁻, R₂S, CN⁻, CO, R₃P, H⁻ |
मुख्य बिंदु
- फ़ायान्स के नियम आयनिक आबंधों को सहसंयोजी लक्षण देते हैं (छोटे, उच्च आवेशित धनायन; बड़े ऋणायन; 18-इलेक्ट्रॉन धनायन)। औपचारिक आवेश FC = V − N − B/2 सर्वोत्तम लूइस संरचना चुनता है और उसका योग कुल आवेश के बराबर होता है।
- आबंध कोटि = (N_b − N_a)/2। MO सिद्धांत, VB के विपरीत, O₂ का अनुचुंबकत्व (दो अयुग्मित π* इलेक्ट्रॉन) समझाता है; O₂⁺, O₂, O₂⁻ व O₂²⁻ की आबंध कोटि 2.5, 2, 1.5 व 1 है। N₂ तक s–p मिश्रण B₂ को अनुचुंबकीय बनाता है।
- VSEPR डोमेन गिनता है (2 से 6: रैखिक, त्रिकोणीय समतली, चतुष्फलकीय, त्रिकोणीय द्विपिरामिडी, अष्टफलकीय; sp से sp³d²); एकाकी युग्म सबसे अधिक प्रतिकर्षण करते हैं, त्रिकोणीय द्विपिरामिड में विषुवतीय स्थान लेते हैं और आबंध कोण घटाते हैं।
- अनुनाद आबंध कोटि को फैलाता है (कार्बोनेट में 4/3, समतली पेप्टाइड समूह में आंशिक द्वि-आबंध); अधिक आबंध कोटि का अर्थ छोटे, प्रबल आबंध हैं।
- द्विध्रुव आघूर्ण सदिश रूप में जुड़ते हैं; % आयनिक लक्षण = μ(प्रेक्षित)/(e·d) × 100। हाइड्रोजन आबंध (N, O, F दाता व ग्राही) और वान्डरवाल्स बल (कीसोम, डिबाई, लंदन; 1/r⁶) जल, DNA व प्रोटीन को आकार देते हैं।
- त्रिज्या अनुपात उपसहसंयोजन बताता है (0.414 व 0.732 सीमाएँ हैं); जालक एन्थैल्पी z₊z₋/(r₊ + r₋) के अनुपात में है और बॉर्न-हैबर चक्र से मिलती है; HSAB कठोर को कठोर से और मृदु को मृदु से जोड़ता है।
अभ्यास प्रश्न (18)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
द्रव ऑक्सीजन एक प्रबल चुंबक के ध्रुवों के बीच के रिक्त स्थान में खिंच जाती है। इस प्रेक्षण की कौन-सी व्याख्या सही है?
उत्तर देखें
उत्तर: D — आण्विक-कक्षक सिद्धांत: दो इलेक्ट्रॉन समभ्रंश π*2p कक्षकों में एक-एक करके, समांतर चक्रण से, हैं
O₂ में 12 संयोजी इलेक्ट्रॉन हैं: σ2s² σ2s² σ2p² π2p⁴ π2p²। हुंड के नियम से दोनों π* इलेक्ट्रॉन दो समभ्रंश π* कक्षकों में समांतर चक्रण से एक-एक करके जाते हैं, अतः O₂ अनुचुंबकीय है और उसकी आबंध कोटि (8 − 4)/2 = 2 है। संयोजकता-आबंध (और लूइस) O=O संरचना हर इलेक्ट्रॉन को युग्मित करती है और इसलिए प्रतिचुंबकीय अणु बताती है, यही वह प्रसिद्ध विफलता है जिसे MO सिद्धांत सुधारता है। O₂ में σ*2p खाली है, और s–p मिश्रण B₂, C₂ व N₂ के लिए महत्त्वपूर्ण है, O₂ के लिए नहीं; जहाँ लागू होता है वहाँ भी वह σ इलेक्ट्रॉनों को अयुग्मित नहीं करता।आण्विक-कक्षक सिद्धांत में आबंध कोटि = (आबंधी इलेक्ट्रॉनों की संख्या − प्रतिआबंधी इलेक्ट्रॉनों की संख्या)/2 का प्रयोग कर, सुपरऑक्साइड आयन O₂⁻ की आबंध कोटि, एक दशमलव स्थान तक, ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 1.5
O₂⁻ में 13 संयोजी इलेक्ट्रॉन हैं: σ2s² σ2s² σ2p² π2p⁴ π2p³। आबंधी इलेक्ट्रॉन = 2 + 2 + 4 = 8 और प्रतिआबंधी = 2 + 3 = 5, अतः आबंध कोटि = (8 − 5)/2 = 1.5। 1s इलेक्ट्रॉन भी गिनने पर दोनों पक्षों में दो-दो जुड़ते हैं और उत्तर नहीं बदलता। 2.5 लिखना सुपरऑक्साइड को O₂⁺ समझ लेना है, जिसमें O₂ से एक इलेक्ट्रॉन कम है, अधिक नहीं।B₂, C₂ व N₂ के लिए s–p मिश्रण वाला MO ऊर्जा क्रम (σ2p, π2p से ऊपर) और O₂ व F₂ के लिए उसके बिना वाला क्रम लीजिए। निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: B — B₂ अनुचुंबकीय है, जिसके दोनों π2p कक्षकों में एक-एक इलेक्ट्रॉन है; D — N₂ की आबंध कोटि 3 है और उसमें कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है
B₂ में 6 संयोजी इलेक्ट्रॉन हैं: σ2s² σ2s² और फिर, क्योंकि s–p मिश्रण π2p को σ2p से नीचे रखता है, प्रत्येक π2p कक्षक में एक इलेक्ट्रॉन, अतः वह अनुचुंबकीय है। N₂ में σ2s² σ2s² π2p⁴ σ2p² है, आबंध कोटि (8 − 2)/2 = 3, सभी युग्मित। He₂⁺ में σ1s² σ1s¹ है, आबंध कोटि 0.5, और यह ज्ञात स्पीशीज़ है। F₂ (14 संयोजी इलेक्ट्रॉन) में π कक्षक पूर्ण हैं और σ2p खाली है, अतः HOMO π2p है।VSEPR सिद्धांत के अनुसार ClF₃ अणु की आकृति क्या है?
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उत्तर: A — T-आकार, जिसमें दो एकाकी युग्म विषुवतीय स्थानों पर हैं
क्लोरीन में 7 संयोजी इलेक्ट्रॉन हैं; तीन Cl–F आबंध बनाते हैं और चार दो एकाकी युग्म बनाते हैं, जिससे पाँच डोमेन त्रिकोणीय द्विपिरामिड में व्यवस्थित होते हैं। एकाकी युग्म दो विषुवतीय स्थान लेते हैं, जहाँ उन्हें कम 90° प्रतिकर्षण झेलने पड़ते हैं, और अणु T-आकार का रह जाता है जिसके F–Cl–F कोण 90° से कुछ कम हैं। त्रिकोणीय समतली उत्तर एकाकी युग्मों की उपेक्षा करता है, और सी-सॉ SF₄ की आकृति है, जिसमें चार आबंध युग्म व एक एकाकी युग्म हैं।VSEPR सिद्धांत लागू कर, ClF₃, XeF₂ व SF₄ के केंद्रीय परमाणुओं पर कुल मिलाकर एकाकी युग्मों की संख्या (केवल Cl, Xe व S पर स्थित एकाकी युग्म गिनें) ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 6
एकाकी युग्म = (संयोजी इलेक्ट्रॉन − आबंधों में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉन)/2। ClF₃: (7 − 3)/2 = 2। XeF₂: (8 − 2)/2 = 3। SF₄: (6 − 4)/2 = 1। कुल = 2 + 3 + 1 = 6। इनसे क्रमशः T-आकार, रैखिक व सी-सॉ अणु बनते हैं, सभी पाँच इलेक्ट्रॉन डोमेन से।सल्फ़ेट आयन SO₄²⁻ की एक लूइस संरचना चार S–O एकल आबंधों और प्रत्येक परमाणु पर पूर्ण अष्टक के साथ बनाई गई है। औपचारिक आवेश = V − N − B/2 का प्रयोग कर, इस संरचना में सल्फ़र परमाणु पर औपचारिक आवेश ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 2
सल्फ़र में V = 6 संयोजी इलेक्ट्रॉन हैं; इस संरचना में उस पर कोई एकाकी युग्म नहीं (N = 0) और 8 आबंधी इलेक्ट्रॉन (B = 8) हैं, अतः FC = 6 − 0 − 4 = +2। प्रत्येक ऑक्सीजन के लिए V = 6, N = 6 व B = 2, अतः FC = −1, और 2 + 4(−1) = −2 आयन के आवेश से मेल खाता है। दो S=O आबंधों वाली विस्तारित-अष्टक संरचना सल्फ़र का औपचारिक आवेश 0 कर देती है।किस युग्म में केंद्रीय परमाणुओं का संकरण समान है?
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उत्तर: C — XeF₄ व SF₆
XeF₄ में चार आबंध युग्म व दो एकाकी युग्म हैं और SF₆ में छह आबंध युग्म: दोनों में छह डोमेन और sp³d² संकरण है। [PCl₄]⁺ sp³ है पर [PCl₆]⁻ sp³d²; SF₄ (चार आबंध व एक एकाकी युग्म) sp³d है जबकि CH₄ sp³; BF₃ sp² है जबकि एकाकी युग्म वाला NH₃ sp³। सामान्य भूल केवल आबंधित परमाणु गिनना और एकाकी युग्म भूलना है, जो SF₄ को CH₄ से गलत मिला देती है।कार्बन–ऑक्सीजन आबंध लंबाइयों का कौन-सा क्रम सही है?
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उत्तर: A — CO < CO₂ < CO₃²⁻ < CH₃OH
आबंध कोटि बढ़ने पर आबंध लंबाई घटती है। CO में त्रि-आबंध है (कोटि 3), CO₂ का प्रत्येक C=O द्वि-आबंध है (2), अनुनाद कार्बोनेट के तीन C–O आबंधों पर एक π आबंध फैला देता है (प्रत्येक 4/3), और मेथेनॉल में C–O एकल आबंध है (1)। अतः CO < CO₂ < CO₃²⁻ < CH₃OH। कार्बोनेट को CO₂ से पहले रखना यह भूलना है कि अनुनाद उसके एक π आबंध को तीन आबंधों पर बाँट देता है; पूरा उलटा क्रम लंबाई को प्रबलता समझ लेना है।प्रोटीनों में प्रत्येक पेप्टाइड समूह का C–N आबंध लगभग 132 pm लंबा है, जो लगभग 147 pm के सामान्य C–N एकल आबंध से छोटा है, और उसके परितः घूर्णन प्रतिबंधित है। इसका कारण क्या है?
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उत्तर: D — अनुनाद N के एकाकी युग्म को C=O में विस्थानित कर आंशिक द्वि-आबंध लक्षण देता है
नाइट्रोजन का एकाकी युग्म कार्बोनिल समूह से संयुग्मित होता है; योगदानी संरचना O⁻–C=N⁺ C–N आबंध को आंशिक द्वि-आबंध लक्षण देती है, अतः वह एकल आबंध से छोटा है और पेप्टाइड इकाई समतली व दृढ़ है। नाइट्रोजन sp² (समतली) है, sp³ नहीं, और sp³ में s लक्षण कम होता है, अधिक नहीं। हेलिक्स व शीट के हाइड्रोजन आबंध भिन्न पेप्टाइड समूहों को जोड़ते हैं, और पार्श्व शृंखलाओं की टक्कर N–Cα व Cα–C आबंधों के परितः घूर्णन सीमित करती है, C–N के परितः नहीं।HCl का द्विध्रुव आघूर्ण 1.03 D और आबंध लंबाई 127 pm है। e = 1.602 × 10⁻¹⁹ C और 1 D = 3.336 × 10⁻³⁰ C m लेकर, H–Cl आबंध का प्रतिशत आयनिक लक्षण, निकटतम पूर्णांक तक, ____ है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 17
पूर्णतः आयनिक H⁺Cl⁻ युग्म का μ(आयनिक) = e × d = 1.602 × 10⁻¹⁹ × 127 × 10⁻¹² = 2.035 × 10⁻²⁹ C m = 2.035 × 10⁻²⁹/3.336 × 10⁻³⁰ = 6.10 D होता। प्रतिशत आयनिक लक्षण = 1.03/6.10 × 100 = 16.9, अर्थात 17। pm को m में या C m को D में बदलना भूलने पर उत्तर दस की घातों से भटक जाते हैं।o-नाइट्रोफ़ीनॉल को भाप आसवन द्वारा p-नाइट्रोफ़ीनॉल से अलग किया जा सकता है क्योंकि ऑर्थो समावयवी अधिक वाष्पशील है। उसे अधिक वाष्पशील क्या बनाता है?
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उत्तर: C — अंतराअणुक हाइड्रोजन आबंध, जो पड़ोसियों से जुड़ने के लिए कोई O–H मुक्त नहीं छोड़ता
ऑर्थो समावयवी में O–H उसी अणु के पड़ोसी नाइट्रो समूह के एक ऑक्सीजन से हाइड्रोजन आबंध बनाकर छह-सदस्यीय वलय बंद करता है। O–H के उपयोग हो जाने पर अणु अपने पड़ोसियों या जल से मुश्किल से जुड़ता है, अतः वह वाष्पशील है। पैरा समावयवी ऐसा नहीं कर सकता, अतः उसका O–H अंतरअणुक हाइड्रोजन आबंध बनाता है जो उसका क्वथनांक बढ़ाते हैं। दोनों समावयवियों का मोलर द्रव्यमान समान है, बड़ा द्विध्रुव वाष्पशीलता घटाता, और लंदन बल सभी अणुओं के बीच कार्य करते हैं, ध्रुवीय हों या नहीं।हाइड्रोजन आबंधों व वान्डरवाल्स अन्योन्यक्रियाओं के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — लंदन परिक्षेपण बल सभी अणुओं के बीच कार्य करते हैं, CH₄ जैसे अध्रुवीय अणुओं के बीच भी; C — H₂S की तुलना में H₂O का कहीं अधिक क्वथनांक हाइड्रोजन आबंधन के कारण है
प्रत्येक इलेक्ट्रॉन मेघ में तात्क्षणिक द्विध्रुव बनते हैं, अतः परिक्षेपण बल सभी अणुओं के बीच कार्य करते हैं, और CH₄ अणुओं के बीच यही एकमात्र आकर्षण है। जल के O–H···O हाइड्रोजन आबंध उसका क्वथनांक 100 °C तक बढ़ाते हैं, जबकि अल्प विद्युतऋणात्मक S वाला H₂S अधिक द्रव्यमान के बावजूद लगभग −60 °C पर उबलता है। बर्फ़ जल से कम घनी है क्योंकि हाइड्रोजन आबंधन उसे खुले चतुष्फलकीय जाल में बाँध देता है। वान्डरवाल्स संपर्क हाइड्रोजन आबंध से दुर्बल होता है, प्रायः कई गुना।मैग्नीशियम क्लोराइड के आँकड़े, kJ mol⁻¹ में: MgCl₂(s) की निर्माण एन्थैल्पी = −641; Mg की ऊर्ध्वपातन एन्थैल्पी = +148; Mg की प्रथम व द्वितीय आयनन ऊर्जाएँ = +738 व +1451; Cl₂ की आबंध वियोजन एन्थैल्पी = +243; Cl की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी = −349 प्रति मोल Cl परमाणु। बॉर्न-हैबर चक्र का प्रयोग कर, MgCl₂(s) → Mg²⁺(g) + 2Cl⁻(g) के एन्थैल्पी परिवर्तन के रूप में परिभाषित MgCl₂ की जालक एन्थैल्पी, kJ mol⁻¹ में, ____ है।
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उत्तर: 2523
हेस के नियम से ΔfH = ΔsubH + IE₁ + IE₂ + D(Cl₂) + 2ΔegH − ΔH(जालक)। अतः ΔH(जालक) = 148 + 738 + 1451 + 243 + 2(−349) − (−641) = 148 + 738 + 1451 + 243 − 698 + 641 = 2523 kJ mol⁻¹। Cl₂ की पूरी आबंध एन्थैल्पी ली जाती है क्योंकि दो Cl परमाणु चाहिए। एक ही इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी लेने पर 2872, IE₂ छोड़ने पर 1072, और आधी आबंध एन्थैल्पी लेने पर 2401.5 आता है।जालक एन्थैल्पियों का कौन-सा क्रम सही है?
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उत्तर: B — MgO > NaF > NaCl > KCl, पहले अधिक आवेशों और फिर छोटे आयनों के कारण
जालक एन्थैल्पी मोटे तौर पर z₊z₋/(r₊ + r₋) के अनुपात में है। MgO के आवेश 2+ व 2− हैं, जिनका गुणनफल एकल आवेशित लवणों का चार गुना है, और आयन छोटे हैं, अतः उसका मान कहीं सबसे अधिक है। 1:1 लवणों में छोटा F⁻ NaF को NaCl से ऊपर रखता है, और बड़ा K⁺ KCl को सबसे नीचे। फ़्लुओराइड का छोटा होना MgO के चार गुने आवेश-गुणनफल पर भारी नहीं पड़ सकता; क्लोराइड की ध्रुवणीयता उसकी जालक एन्थैल्पी को फ़्लुओराइड से ऊपर नहीं ले जाती; और बड़े आयन अधिक नहीं, कम प्रबलता से बँधते हैं।एक आयनिक ठोस MX में r(M⁺) = 95 pm और r(X⁻) = 181 pm है। त्रिज्या-अनुपात नियम (0.225–0.414 चतुष्फलकीय, 0.414–0.732 अष्टफलकीय, 0.732 से ऊपर घनीय) का प्रयोग कर M⁺ के लिए कौन-सा उपसहसंयोजन अपेक्षित है?
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उत्तर: A — छह, अष्टफलकीय, जैसे रॉक-सॉल्ट (NaCl) संरचना में
r₊/r₋ = 95/181 = 0.525, जो 0.414 और 0.732 के बीच है, अतः प्रत्येक धनायन के अष्टफलक के कोनों पर छह ऋणायन पड़ोसी अपेक्षित हैं, जो रॉक-सॉल्ट व्यवस्था है। आठ गुना घनीय उपसहसंयोजन के लिए अनुपात 0.732 से अधिक चाहिए, और चार गुना के लिए 0.414 से कम। बारह गुना उपसहसंयोजन केवल समान गोलों में होता है, अपने ऋणायन से बहुत छोटे धनायन में नहीं।HSAB सिद्धांत के अनुसार कौन-सा धातु आयन सिस्टीन की थायोलेट (RS⁻) पार्श्व शृंखला से सबसे प्रबलता से जुड़ने की अपेक्षा है?
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उत्तर: B — Hg²⁺, एक बड़ा व ध्रुवणीय मृदु अम्ल जो मृदु क्षारक से मेल खाता है
थायोलेट सल्फ़र बड़ा व ध्रुवणीय, अर्थात मृदु क्षारक, है, अतः वह Hg²⁺ जैसे मृदु अम्ल से सर्वोत्तम जुड़ता है; इसीलिए पारा थायोल एंज़ाइमों को विषाक्त करता है। Mg²⁺, Ca²⁺ व Al³⁺ कठोर अम्ल हैं जो कठोर ऑक्सीजन दाताओं (जल, कार्बॉक्सिलेट, फ़ॉस्फ़ेट) को वरीयता देते हैं। उच्च आवेश वाले तर्क लुभाते हैं, पर HSAB केवल आवेश से नहीं, कठोरता से जोड़ता है: कठोर–कठोर आबंधन स्थिरवैद्युत है, मृदु–मृदु सहसंयोजी।निम्नलिखित में से कौन-से कथन HSAB सिद्धांत और अम्लों व क्षारकों के सामान्य वर्गीकरण से संगत हैं?
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उत्तर: A — सिल्वर आयोडाइड जल में सिल्वर फ़्लुओराइड से कहीं कम विलेय है; D — ATP के फ़ॉस्फ़ेट ऑक्सीजनों से Mg²⁺ का जुड़ना कठोर अम्ल–कठोर क्षारक युग्मन है
मृदु Ag⁺ मृदु I⁻ से सहसंयोजी रूप में जुड़ता है, अतः AgI अत्यंत अविलेय है, जबकि बेमेल AgF आसानी से घुलता है। Mg²⁺ छोटा, कठोर धनायन है और फ़ॉस्फ़ेट ऑक्सीजन कठोर क्षारक, अतः Mg²⁺–ATP कठोर–कठोर युग्म है। Fe³⁺ जैसा छोटा, उच्च आवेशित धनायन कठोर है, मृदु नहीं, और I⁻ जैसा बड़ा, ध्रुवणीय ऋणायन F⁻ से मृदु है, कठोर नहीं।ठोस अवस्था विनिमय LiI + CsF → LiF + CsI पर विचार कीजिए। कौन-सी भविष्यवाणी, अपने कारण सहित, सही है?
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उत्तर: B — यह होती है, क्योंकि कठोर Li⁺ कठोर F⁻ से और अपेक्षाकृत मृदु Cs⁺ मृदु I⁻ से जुड़ता है
Li⁺ सबसे छोटा, सबसे कठोर क्षार धनायन है और Cs⁺ सबसे बड़ा व सबसे ध्रुवणीय, अतः सबसे मृदु; F⁻ कठोर है और I⁻ मृदु। HSAB कठोर–कठोर LiF और मृदु–मृदु CsI के पक्ष में है। जालक के संदर्भ में, दो छोटे आयनों से बने LiF की अत्यधिक जालक एन्थैल्पी CsF से CsI में होने वाली हानि से अधिक की भरपाई करती है, अतः विनिमय ऊष्माक्षेपी है। Cs⁺, Li⁺ से मृदु है, कठोर नहीं, और दोनों पक्षों पर प्रत्येक आयन का आवेश एक है, अतः आवेश अभिक्रिया को नहीं चला सकता।