जैवअणुओं का रसायन: संरचना, अनुक्रमण, शोधन व स्पेक्ट्रमिकी
2. न्यूक्लियोटाइड व न्यूक्लिक अम्ल
न्यूक्लियोटाइड के तीन भाग हैं: नाइट्रोजनी क्षार, एक पेंटोज़ और एक या अधिक फ़ॉस्फ़ेट समूह। प्यूरिन ऐडेनीन व ग्वानीन तथा पिरिमिडीन साइटोसीन, थाइमीन (DNA) व यूरैसिल (RNA) शर्करा के C1′ से प्यूरिन के N9 या पिरिमिडीन के N1 तक β-N-ग्लाइकोसिडिक बंध द्वारा जुड़ते हैं। क्षार व शर्करा मिलकर न्यूक्लियोसाइड (ऐडेनोसीन) हैं; उसका C5′ पर फ़ॉस्फ़ेट एस्टर न्यूक्लियोटाइड (AMP, ATP) है। RNA में राइबोज़ और DNA में 2′-डीऑक्सीराइबोज़ है। न्यूक्लियोटाइड 3′→5′ फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर बंधों से शर्करा–फ़ॉस्फ़ेट मेरुदंड में जुड़ते हैं, जिसका एक सिरा 5′-फ़ॉस्फ़ेट और दूसरा 3′-OH है, और अनुक्रम 5′→3′ लिखे जाते हैं। क्षार में RNA का 2′-OH पड़ोसी फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर पर आक्रमण कर 2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट बनाता है और शृंखला तोड़ देता है, अतः RNA क्षार-अस्थिर है जबकि DNA नहीं।
B-DNA द्विकुंडली में दो प्रतिसमांतर रज्जुक लगभग 10.5 क्षार-युग्म प्रति घुमाव और 0.34 nm प्रति क्षार-युग्म उठान वाली दक्षिणावर्ती कुंडली में लिपटते हैं। A, T से दो हाइड्रोजन बंधों द्वारा और G, C से तीन द्वारा युग्मित होता है, जिससे द्विरज्जुकी DNA हेतु शारगाफ़ नियम मिलते हैं: A = T, G = C, और प्यूरिन = पिरिमिडीन। अतः 30% A वाले द्विरज्जुक में 30% T है, और शेष 40% बराबर बँटकर 20% G व 20% C बनता है। ढेर लगे क्षार मुक्त क्षारों से कम पराबैंगनी प्रकाश अवशोषित करते हैं, अतः द्विरज्जुक पिघलाने पर उसका A260 बढ़ता है (अतिवर्णी प्रभाव); गलन ताप Tm, GC मात्रा व आयनी सामर्थ्य के साथ बढ़ता है।
3. रासायनिक व एंज़ाइमी विधियों से पेप्टाइड अनुक्रमण
प्रोटीन का रासायनिक अनुक्रमण एक निश्चित योजना से चलता है। (1) डाइसल्फ़ाइड तोड़ें, परफ़ॉर्मिक अम्ल से ऑक्सीकरण (सिस्टेइक अम्ल तक) द्वारा, या 2-मरकैप्टोएथेनॉल अथवा डाइथायोथ्रेइटॉल से अपचयन के बाद थायोल समूहों को आयोडोऐसीटेट से अवरुद्ध करके। (2) 6 M HCl में 110 °C पर लगभग 24 h जल-अपघटन से अमीनो अम्ल संघटन ज्ञात करें; Trp नष्ट हो जाता है, और Asn व Gln, Asp व Glu में बदल जाते हैं। (3) सिरे पहचानें: N-अंतस्थ अवशेष को 1-फ़्लुओरो-2,4-डाइनाइट्रोबेंज़ीन (सैंगर अभिकर्मक, पीला DNP-अमीनो अम्ल देता है) या डैन्सिल क्लोराइड (प्रतिदीप्त व्युत्पन्न देता है) से, दोनों के बाद पूर्ण जल-अपघटन; C-अंतस्थ अवशेष को कार्बॉक्सीपेप्टिडेज़ों से या हाइड्राज़िनोलिसिस से। (4) शृंखला को खंडों में काटें और प्रत्येक का अनुक्रमण करें। (5) दूसरे, भिन्न विदलन के अतिव्यापनों से खंडों का क्रम तय करें।
एडमन निम्नीकरण शेष शृंखला का जल-अपघटन किए बिना एक बार में एक अवशेष हटाता है। फ़ेनिल आइसोथायोसायनेट (PITC) हल्की क्षारीय परिस्थिति में मुक्त N-अंतस्थ ऐमीनो समूह से जुड़ता है; फिर निर्जल ट्राइफ़्लुओरोऐसीटिक अम्ल N-अंतस्थ अवशेष को ऐनिलिनोथायाज़ोलिनोन के रूप में काट देता है, जो स्थायी फ़ेनिलथायोहाइडैन्टॉइन (PTH) अमीनो अम्ल में बदलकर वर्णलेखन से पहचाना जाता है, जबकि छोटा हुआ पेप्टाइड अगले चक्र में जाता है। कोई चक्र 100% दक्ष नहीं होता, अतः क्रम से पिछड़ी शृंखलाएँ जमा होती हैं: प्रति चक्र 98% लब्धि पर 50 चक्रों के बाद केवल 0.98⁵⁰ ≈ 36% शृंखलाएँ क्रम में रहती हैं। इसलिए एक बार में कुछ दर्जन अवशेष ही पढ़े जाते हैं, और लंबे प्रोटीन पहले काटने पड़ते हैं।
| कारक | प्रकार | कहाँ काटता है | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| ट्रिप्सिन | एंज़ाइम (एंडोपेप्टिडेज़) | Lys व Arg की कार्बॉक्सिल ओर | अगला अवशेष Pro हो तो नहीं |
| काइमोट्रिप्सिन | एंज़ाइम (एंडोपेप्टिडेज़) | Phe, Tyr व Trp की कार्बॉक्सिल ओर | अगला अवशेष Pro हो तो नहीं |
| सायनोजन ब्रोमाइड (CNBr) | रासायनिक | Met की कार्बॉक्सिल ओर | Met, C-अंतस्थ होमोसेरीन लैक्टोन बन जाता है |
| कार्बॉक्सीपेप्टिडेज़ A या B | एंज़ाइम (एक्सोपेप्टिडेज़) | C-अंतस्थ अवशेष एक-एक कर मुक्त करता है | A, C-अंतस्थ Arg, Lys व Pro नहीं हटाता; B, Arg व Lys हटाता है |
हल किया उदाहरण। एक हेप्टापेप्टाइड पहले एडमन चक्र में PTH-Leu देता है। ट्रिप्सिन Leu-Ala-Lys, Gly-Met-Arg व मुक्त Tyr देता है; CNBr होमोसेरीन लैक्टोन पर समाप्त होने वाला एक पेंटापेप्टाइड और डाइपेप्टाइड Arg-Tyr देता है। Leu-Ala-Lys में N-सिरा है, अतः वह पहले आता है, और Arg-Tyr दिखाता है कि Tyr, Gly-Met-Arg के Arg के बाद आता है, अतः अनुक्रम Leu-Ala-Lys-Gly-Met-Arg-Tyr है।
4. रासायनिक व एंज़ाइमी विधियों से DNA अनुक्रमण
रासायनिक (मैक्सम–गिल्बर्ट) विधि। DNA खंड को एक सिरे पर ³²P से चिह्नित किया जाता है (उदाहरणार्थ 5′ सिरे पर, पॉलिन्यूक्लियोटाइड काइनेज़ से) और चार भागों में बाँटा जाता है। प्रत्येक को ऐसे अभिकर्मक से उपचारित किया जाता है जो विशेष क्षारों को रूपांतरित करे, ऐसी परिस्थिति में कि प्रति अणु लगभग एक रूपांतरण हो: डाइमेथिल सल्फ़ेट G का मेथिलीकरण करता है; फ़ॉर्मिक अम्ल प्यूरिन A व G पर आक्रमण करता है; हाइड्राज़ीन C व T पर; और उच्च लवण में हाइड्राज़ीन केवल C पर। फिर गर्म पिपेरिडीन हर रूपांतरित क्षार पर मेरुदंड काट देता है, और विकृतीकारी जेल व स्वविकिरणचित्रण केवल चिह्नित खंड दिखाते हैं। सबसे छोटे से ऊपर पढ़ते हुए: G, G लेन में पट्टी देता है; A, A+G में पर G में नहीं; C, C व C+T दोनों में; और T केवल C+T में।
एंज़ाइमी (सैंगर डाइडीऑक्सी, शृंखला-समापन) विधि। एकरज्जुकी टेम्पलेट, प्राइमर, DNA पॉलिमरेज़ व चारों dNTP के साथ किसी एक 2′,3′-डाइडीऑक्सीन्यूक्लियोसाइड ट्राइफ़ॉस्फ़ेट (ddNTP) का छोटा अनुपात दिया जाता है। ddNTP सामान्य रूप से जुड़ जाता है पर उसमें 3′-OH नहीं होता, अतः आगे कोई न्यूक्लियोटाइड नहीं जुड़ सकता और शृंखला रुक जाती है। इसलिए प्रत्येक अभिक्रिया में नीडित खंड-समूह होता है, सभी प्राइमर से आरंभ होकर उस क्षार की प्रत्येक स्थिति पर समाप्त। चार लेनों में, या स्वचालित अनुक्रमण में भिन्न प्रतिदीप्त रंजकों वाले चार ddNTP के साथ एक केशिका में चलाकर, सबसे छोटे से सबसे लंबे तक पढ़े गए खंड नवसंश्लेषित रज्जुक, 5′→3′ देते हैं; टेम्पलेट उसका प्रतिसमांतर पूरक है। हल किया उदाहरण: यदि उत्पाद, सबसे छोटे से सबसे लंबे तक, ddG, ddA, ddT, ddC व ddC पर समाप्त हों, तो नया रज्जुक 5′-GATCC-3′ और टेम्पलेट क्षेत्र 5′-GGATC-3′ है।
5. हेक्सोज़ तक के कार्बोहाइड्रेट
मोनोसैकेराइड पॉलिहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड (ऐल्डोस) या कीटोन (कीटोस) हैं, (CH₂O)ₙ। ग्लिसरैल्डिहाइड व डाइहाइड्रॉक्सीऐसीटोन ट्रायोस हैं, राइबोज़ ऐल्डोपेंटोस, ग्लूकोज़, मैनोज़ व गैलेक्टोज़ ऐल्डोहेक्सोस, और फ्रक्टोज़ कीटोहेक्सोस। ऐल्डोहेक्सोस में चार किरेल केंद्र (C2 से C5) हैं, अतः 2⁴ = 16 त्रिविम समावयवी, आठ D व आठ L; कीटोहेक्सोस में तीन, अतः आठ। D या L कार्बोनिल से सबसे दूर के किरेल कार्बन (हेक्सोस में C5) को D-ग्लिसरैल्डिहाइड से तुलना कर बताता है; यह घूर्णन का चिह्न नहीं बताता (D-फ्रक्टोज़ वामावर्ती है)। केवल एक किरेल केंद्र पर भिन्न शर्कराएँ एपिमर हैं: ग्लूकोज़ व मैनोज़ C2 पर, ग्लूकोज़ व गैलेक्टोज़ C4 पर।
विलयन में पेंटोस व हेक्सोस चक्रीकृत होते हैं जब कोई OH कार्बोनिल से जुड़ता है, जिससे हेमिऐसीटल (ऐल्डोस से) या हेमिकीटल (कीटोस से) बनता है। ग्लूकोज़ C1 को C5-OH से जोड़कर छह-सदस्यीय पाइरानोस बनाता है; फ्रक्टोज़ C2 को C5-OH से जोड़कर पाँच-सदस्यीय फ़्यूरानोस (या C6-OH से पाइरानोस) बनाता है। पूर्व कार्बोनिल कार्बन नया किरेल केंद्र, ऐनोमरी कार्बन, बन जाता है, जिससे α व β ऐनोमर मिलते हैं। ताज़ा घोला गया शुद्ध ऐनोमर वलय के खुलने व पुनः बंद होने से धीरे-धीरे अपना ध्रुवण घूर्णन बदलता है, जब तक साम्य मिश्रण न बन जाए: परिवर्ती घूर्णन (mutarotation)। α-D-ग्लूकोपाइरानोस हेतु [α]D = +112.2°, β हेतु +18.7° और साम्य पर +52.7° लेकर, α अंश x समीकरण 112.2x + 18.7(1 − x) = 52.7 को संतुष्ट करता है, अतः x = 0.36: लगभग 36% α और 64% β।
प्रत्येक मोनोसैकेराइड अपचायक शर्करा है: उसका खुली-शृंखला ऐल्डिहाइड (कीटोस में क्षार में एनडायोल से बना ऐल्डिहाइड) फ़ेलिंग या बेनेडिक्ट अभिकर्मक के Cu²⁺ को लाल Cu₂O में अपचयित करता है। जब ऐनोमरी OH को O-ऐल्किल समूह से बदला जाए, जैसे मेथिल α-D-ग्लूकोपाइरानोसाइड में, तो उत्पाद ऐसीटल (ग्लाइकोसाइड) है: वह खुल नहीं सकता, परिवर्ती घूर्णन नहीं दिखाता और अनपचायक है। ब्रोमीन जल ग्लूकोज़ को ग्लूकोनिक अम्ल (ऐल्डोनिक अम्ल) में, नाइट्रिक अम्ल ग्लूकेरिक अम्ल में ऑक्सीकृत करता है, और अपचयन सॉर्बिटॉल (ऐल्डिटॉल) देता है। ग्लूकोज़, मैनोज़ व फ्रक्टोज़ एक ही ओसाज़ोन देते हैं, क्योंकि केवल C1 व C2 अभिक्रिया करते हैं और ये केवल वहीं भिन्न हैं।
6. लिपिड: ट्राइग्लिसराइड
ट्राइग्लिसराइड (ट्राइऐसिलग्लिसरॉल) ग्लिसरॉल का तीन वसा-अम्लों के साथ ट्राइएस्टर है: तीनों समान हों तो सरल (ट्राइस्टियरिन), अन्यथा मिश्रित। सामान्य वसा-अम्ल अशाखित और सम संख्या कार्बन वाले हैं: पामिटिक (16:0), स्टियरिक (18:0), ओलीक (18:1, सिस-Δ9) व लिनोलीक (18:2, सिस-Δ9,12)। प्रत्येक सिस द्विबंध शृंखला में मोड़ लाता है और सघन संकुलन रोकता है, जिससे गलनांक घटता है; अतः संतृप्त शृंखलाओं से भरपूर वसाएँ कक्ष-ताप पर ठोस और असंतृप्त शृंखलाओं वाले तेल द्रव होते हैं; निकेल पर उत्प्रेरकी हाइड्रोजनीकरण तेलों को कठोर बनाता है। ट्राइग्लिसराइड उदासीन व अध्रुवीय हैं, झिल्ली बनाने के बजाय ऊर्जा-भंडारण के उपयुक्त।
साबुनीकरण क्षारीय जल-अपघटन है: ट्राइग्लिसराइड + 3 KOH → ग्लिसरॉल + 3 पोटैशियम साबुन। साबुनीकरण मान, यानी 1 g वसा के साबुनीकरण हेतु आवश्यक KOH के mg, SV = 3 × 56.1 × 1000/M है, जो औसत मोलर द्रव्यमान M के व्युत्क्रमानुपाती है और इसलिए लघु-शृंखला वसाओं में अधिक। ट्राइस्टियरिन (C₅₇H₁₁₀O₆, M = 891.5 g mol⁻¹) का SV = 168,300/891.5 = 189 है। आयोडीन मान, यानी 100 g वसा द्वारा ग्रहण किए गए I₂ के ग्राम, असंतृप्ति मापता है, प्रत्येक C=C पर एक I₂ जुड़ता है। वसाएँ जल-अपघटनी विकृतगंधिता (लाइपेज़ मुक्त वसा-अम्ल छोड़ते हैं) व ऑक्सीकारी विकृतगंधिता (ऑक्सीजन द्विबंधों पर आक्रमण करती है) से बिगड़ती हैं।
7. शोधन: आयन-विनिमय व जेल-निस्यंदन वर्णलेखन
आयन-विनिमय वर्णलेखन आवेश के आधार पर पृथक्करण करता है। आधात्री पर स्थिर आवेशित समूह और ढीले बँधे प्रति-आयन होते हैं। धनायन विनिमायक पर ऋणात्मक समूह होते हैं, दुर्बल कार्बॉक्सीमेथिल (CM) या प्रबल सल्फ़ोप्रोपिल (SP); ऋणायन विनिमायक पर धनात्मक समूह, दुर्बल डाइएथिलऐमीनोएथिल (DEAE) या प्रबल चतुष्क अमोनियम (Q)। प्रोटीन अपने pI से नीचे के pH पर, जहाँ वह धनात्मक है, धनायन विनिमायक से बंधता है, और pI से ऊपर के pH पर ऋणायन विनिमायक से। अबंधित प्रोटीन बहकर निकल जाते हैं; बँधे प्रोटीन लवण-सांद्रता बढ़ाकर, जिसके आयन स्थिर आवेशों हेतु होड़ करते हैं, या pH को उनके pI की ओर खिसकाकर निक्षालित (eluted) होते हैं, और सर्वाधिक आवेशित सबसे अंत में निकलते हैं। हल किया उदाहरण: pH 7.0 पर DEAE पर pI 5.0 वाला (ऋणात्मक) प्रोटीन बंधता है, और pI 8.5 वाला (धनात्मक) सीधे निकल जाता है।
जेल-निस्यंदन (आकार-अपवर्जन) वर्णलेखन तिर्यक-बंधित डेक्सट्रान (Sephadex), ऐगारोज़ या पॉलिऐक्रिलैमाइड के सरंध्र मनकों पर आकार व आकृति के आधार पर पृथक्करण करता है। रंध्रों में न घुस पाने वाले बड़े अणु केवल मनकों के बीच के द्रव में चलते हैं और सबसे पहले, रिक्त आयतन V₀ पर, निकलते हैं; छोटे अणु रंध्रों के भीतर समय बिताकर बाद में निकलते हैं, सबसे छोटे कुल आयतन Vt के निकट। गोलाकार प्रोटीनों हेतु निक्षालन आयतन Ve विभाजन-परास में log M के साथ रैखिक रूप से घटता है, अतः अंशांकित स्तंभ प्राकृत मोलर द्रव्यमान देता है; Kav = (Ve − V₀)/(Vt − V₀) का मान 0 (अपवर्जित) से 1 (पूर्णतः समाविष्ट) तक है। SDS-PAGE, जो उपइकाई द्रव्यमान देता है, से तुलना ओलिगोमर प्रकट करती है।
8. अवशोषण व प्रतिदीप्ति स्पेक्ट्रमिकी
अवशोषकता A = log₁₀(I₀/I) = εcl (बियर–लैम्बर्ट नियम), जहाँ ε मोलर अवशोषण गुणांक (M⁻¹ cm⁻¹), c सांद्रता और l पथ-लंबाई है, प्रायः 1 cm। प्रोटीन 280 nm पर मुख्यतः अपनी Trp व Tyr पार्श्व शृंखलाओं से अवशोषण करते हैं, डाइसल्फ़ाइडों का थोड़ा योगदान रहता है; प्रचलित आकलन ε280 = 5500 nW + 1490 nY + 125 nSS है, जहाँ n क्रमशः Trp, Tyr व डाइसल्फ़ाइड बंधों की संख्याएँ हैं। पेप्टाइड बंध 190 से 220 nm पर अवशोषण करते हैं। न्यूक्लिक अम्ल क्षार 260 nm के निकट अवशोषण करते हैं; DNA हेतु लगभग 1.8 (RNA हेतु लगभग 2.0) का A260/A280 अनुपात शुद्धता की प्रचलित जाँच है। NADH, 340 nm पर अवशोषण करता है (ε = 6220 M⁻¹ cm⁻¹) और NAD⁺ नहीं, अतः डिहाइड्रोजिनेज़ की परख 340 nm पर होती है। हल किया उदाहरण: एक Trp व दो Tyr से ε280 = 5500 + 2 × 1490 = 8480 M⁻¹ cm⁻¹, अतः 1 cm सेल में A280 = 0.424 का अर्थ c = 0.424/8480 = 50 µM है।
प्रतिदीप्ति में उत्तेजित एकक अवस्था तक पहुँचा अणु कंपनिक विश्रांति से कुछ ऊर्जा खोता है और फिर अवशोषित प्रकाश से लंबी तरंगदैर्घ्य पर उत्सर्जन करता है (स्टोक्स विस्थापन)। उत्सर्जन अँधेरी पृष्ठभूमि के विरुद्ध समकोण पर मापा जाता है, जिससे प्रतिदीप्ति अवशोषकता से कहीं अधिक संवेदनशील है। प्रोटीन प्रतिदीप्ति पर Trp हावी है (उत्तेजन 280 nm के निकट, या केवल Trp को उत्तेजित करने हेतु 295 nm); जल के संपर्क में वह 350 nm के निकट उत्सर्जन करता है, जबकि अध्रुवीय भीतरी भाग में दबा होने पर उसका उत्सर्जन छोटी तरंगदैर्घ्य की ओर खिसकता है, अतः नीला विस्थापन वलन या लिगैंड-बंधन बताता है। NADH प्रतिदीप्त होता है (उत्तेजन 340 nm, उत्सर्जन 460 nm के निकट) और NAD⁺ नहीं। बाह्य प्रोब वहाँ प्रतिदीप्ति जोड़ते हैं जहाँ वह नहीं है: डैन्सिल व्युत्पन्न ऐमीनो समूहों को चिह्नित करते हैं, और एथिडियम ब्रोमाइड केवल DNA में अंतर्वेशित होने पर प्रबल प्रतिदीप्ति देता है।
मुख्य बिंदु
- pI उदासीन रूप के दोनों ओर के दो pKa मानों का माध्य है (Gly 5.97, Lys 9.74); अपने pI से नीचे अणु धनात्मक, ऊपर ऋणात्मक है।
- न्यूक्लियोटाइड: क्षार N9 (प्यूरिन) या N1 (पिरिमिडीन) से C1′ पर जुड़ता है, शृंखलाएँ 3′→5′; द्विरज्जुकी DNA में A = T व G = C; RNA अपने 2′-OH के कारण क्षार-अस्थिर है।
- पेप्टाइड: एडमन का PITC चक्र-दर-चक्र PTH-अमीनो अम्ल मुक्त करता है; ट्रिप्सिन Lys व Arg के बाद, काइमोट्रिप्सिन Phe, Tyr व Trp के बाद, CNBr, Met के बाद काटता है; अतिव्यापन टुकड़ों का क्रम तय करते हैं।
- DNA: मैक्सम–गिल्बर्ट अंत-चिह्नित DNA को चुने क्षारों पर रासायनिक रूप से काटता है; सैंगर के ddNTP पॉलिमरेज़ प्रतियाँ रोकते हैं, और पठन नया रज्जुक 5′→3′ है, टेम्पलेट का पूरक।
- सभी मोनोसैकेराइड अपचायक हैं, ग्लाइकोसाइड नहीं; एपिमर एक केंद्र पर, ऐनोमर ऐनोमरी कार्बन पर भिन्न होते हैं। वसा का साबुनीकरण मान मोलर द्रव्यमान के साथ घटता है; आयोडीन मान असंतृप्ति मापता है।
- आयन विनिमय pI के सापेक्ष आवेश से, जेल निस्यंदन आकार से (सबसे बड़ा पहले) पृथक करता है। A = εcl, 280 nm (Trp, Tyr), 260 nm (क्षार) व 340 nm (NADH) पर; Trp प्रतिदीप्ति का नीला विस्थापन दबे होने का संकेत है।
अभ्यास प्रश्न (18)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
प्रोटीनों में पाए जाने वाले मानक अमीनो अम्लों में से किसमें कोई किरेल कार्बन परमाणु नहीं है?
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उत्तर: D — ग्लाइसीन
ग्लाइसीन की पार्श्व शृंखला एक हाइड्रोजन परमाणु है, अतः उसके α-कार्बन पर दो समान H परमाणु हैं और वह त्रिविम केंद्र नहीं है। ऐलानीन, प्रोलीन व सिस्टीन, सभी के α-कार्बन पर चार भिन्न समूह हैं; सिस्टीन लुभावना है क्योंकि वह S के बजाय R होने में असामान्य है, पर फिर भी किरेल है।कौन-सा अभिकर्मक पेप्टाइड को उसके N-सिरे से प्रति चक्र एक अवशेष के हिसाब से अनुक्रमित करने देता है, शेष शृंखला को अगले चक्र हेतु अक्षुण्ण छोड़ते हुए?
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उत्तर: A — फ़ेनिल आइसोथायोसायनेट, जो N-अंतस्थ अवशेष को फ़ेनिलथायोहाइडैन्टॉइन व्युत्पन्न के रूप में मुक्त करता है
एडमन निम्नीकरण में PITC, N-अंतस्थ ऐमीनो समूह से जुड़ता है और निर्जल अम्ल केवल वही अवशेष हटाता है, जो बाद में PTH-अमीनो अम्ल में बदलता है, और छोटा हुआ पेप्टाइड अगले चक्र हेतु बचता है। FDNB व डैन्सिल क्लोराइड भी N-सिरे को चिह्नित करते हैं, पर चिह्न पहचानने हेतु पूरी शृंखला का जल-अपघटन करना पड़ता है, अतः प्रति नमूना केवल एक अवशेष मिलता है। CNBr भीतर Met पर काटता है और अनुक्रम नहीं पढ़ता।एक ऑक्टापेप्टाइड पहले एडमन चक्र में PTH-Gly देता है, और हाइड्राज़िनोलिसिस उसके C-सिरे पर Ser दिखाता है। ट्रिप्सिन (Gly, Tyr, Arg), (Met, Ala, Lys) व (Phe, Ser) संघटन वाले तीन पेप्टाइड देता है। सायनोजन ब्रोमाइड दो पेप्टाइड देता है, एक में Gly, Tyr, Arg व होमोसेरीन लैक्टोन और दूसरे में Ala, Lys, Phe व Ser। N- से C-सिरे की ओर एक-अक्षरी कूट (G Gly, Y Tyr, R Arg, M Met, A Ala, K Lys, F Phe, S Ser) में लिखा ऑक्टापेप्टाइड का अनुक्रम क्या है?
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उत्तर: C — GYRMAKFS
ट्रिप्सिन Lys व Arg के बाद काटता है, अतः (Gly, Tyr, Arg) Arg पर समाप्त होता है और Gly होने से N-अंतस्थ है: Gly-Tyr-Arg। Ser के C-सिरा होने से (Phe, Ser) C-अंतस्थ है: Phe-Ser। Gly, Tyr, Arg व होमोसेरीन लैक्टोन वाला CNBr खंड Met को Arg के ठीक बाद रखता है, अतः बीच का ट्रिप्टिक पेप्टाइड Met-Ala-Lys है और अनुक्रम GYRMAKFS है। Met-Lys-Ala (GYRMKAFS) होने पर ट्रिप्सिन Met-Lys व Ala-Phe-Ser देता; Ser-Phe पर अंत C-अंतस्थ Ser का खंडन करता है; और Lys व Arg की अदला-बदली ट्रिप्टिक संघटन बदल देती है।एकरज्जुकी टेम्पलेट पर प्राइम की गई सैंगर डाइडीऑक्सी अनुक्रमण अभिक्रिया में समापित उत्पाद, सबसे छोटे से सबसे लंबे क्रम में (प्रत्येक पिछले से एक न्यूक्लियोटाइड लंबा), ddC, ddG, ddA, ddT, ddT, ddC, ddA व ddG पर समाप्त होते हैं। टेम्पलेट के संगत क्षेत्र का अनुक्रम, 5′→3′ लिखकर, क्या है?
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उत्तर: B — 5′-CTGAATCG-3′
उत्पादों को सबसे छोटे से सबसे लंबे तक पढ़ने पर नया रज्जुक 5′-CGATTCAG-3′ मिलता है। टेम्पलेट उससे प्रतिसमांतर युग्मित है: 3′-GCTAAGTC-5′, जो 5′→3′ लिखने पर 5′-CTGAATCG-3′ है। 5′-CGATTCAG-3′ स्वयं नया रज्जुक है, 5′-GCTAAGTC-3′ दिशा उलटे बिना पूरक है, और 5′-GACTTAGC-3′ केवल उलटा गया नया रज्जुक है।D-ग्लूकोज़ व D-गैलेक्टोज़ परस्पर किस प्रकार संबंधित हैं?
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उत्तर: D — C-4 एपिमर
D-ग्लूकोज़ व D-गैलेक्टोज़ केवल C4 के विन्यास में भिन्न हैं, अतः वे C4 एपिमर हैं। ग्लूकोज़ का C2 एपिमर मैनोज़ है; ऐनोमर केवल वलय रूप के ऐनोमरी कार्बन (α व β) पर भिन्न होते हैं; और D-ग्लूकोज़ का प्रतिबिंबरूपी L-ग्लूकोज़ है, जो हर किरेल केंद्र पर भिन्न है।निम्नलिखित में से कौन बेनेडिक्ट अभिकर्मक के साथ गर्म करने पर उसे अपचयित नहीं करता?
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उत्तर: A — मेथिल α-D-ग्लूकोसाइड
मेथिल α-D-ग्लूकोसाइड में ऐनोमरी कार्बन ऐसीटल है: वह खुलकर मुक्त ऐल्डिहाइड नहीं बना सकता, अतः न परिवर्ती घूर्णन दिखाता है न Cu²⁺ को अपचयित करता है। फ्रक्टोज़ लुभावना विकल्प है क्योंकि वह कीटोन है, पर गर्म क्षार में वह एनडायोल द्वारा ऐल्डोसों में समावयवीकृत होकर बेनेडिक्ट अभिकर्मक को अपचयित करता है। ग्लिसरैल्डिहाइड व 2-डीऑक्सीराइबोज़ में मुक्त ऐल्डिहाइड समूह हैं।तीन प्रोटीन, X (pI 4.8), Y (pI 7.6) व Z (pI 9.8), pH 6.0 वाले अल्प-लवण बफ़र में कार्बॉक्सीमेथिल (CM) सेलुलोज़ स्तंभ पर डाले जाते हैं, जिसे फिर धोकर क्रमशः बढ़ती NaCl सांद्रता से निक्षालित किया जाता है। मान लें कि प्रोटीन का कुल आवेश, और इसलिए उसकी बंधन-शक्ति, उसके pI व बफ़र pH के अंतर के साथ बढ़ती है। प्रोटीन स्तंभ से किस क्रम में निकलते हैं?
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उत्तर: A — X, फिर Y, फिर Z
CM-सेलुलोज़ धनायन विनिमायक है (स्थिर –CH₂COO⁻ समूह)। pH 6.0 पर X (pI 4.8) ऋणात्मक है और नहीं बंधता, अतः धुलाई में निकल जाता है। Y (pI 7.6) व Z (pI 9.8) धनात्मक हैं और बंधते हैं; Y, जो अपने pI से 1.6 इकाई दूर है, Z (3.8 इकाई दूर) से कम लवण पर मुक्त होता है। CM को ऋणायन विनिमायक समझने पर उलटा क्रम अपेक्षित लगता।एक शोधित एंज़ाइम अंशांकित जेल-निस्यंदन स्तंभ से 120 kDa गोलाकार प्रोटीन हेतु अपेक्षित स्थिति पर निकलता है, जबकि 2-मरकैप्टोएथेनॉल की उपस्थिति में SDS-PAGE, 60 kDa पर एक ही पट्टी दिखाता है। सबसे उचित व्याख्या क्या है?
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उत्तर: B — यह 60 kDa उपइकाइयों का द्वितय है, जिन्हें SDS व थायोल अभिकर्मक अलग कर देते हैं
जेल निस्यंदन प्राकृत संयोजन (लगभग 120 kDa) मापता है, जबकि अपचायक सहित SDS प्रोटीन को अवलित कर उसकी पॉलिपेप्टाइड शृंखलाएँ, असहसंयोजी या डाइसल्फ़ाइड-जुड़ी, अलग करता है, जो 60 kDa पर चलती हैं। दो 60 kDa शृंखलाएँ द्वितय बनाती हैं। जेल निस्यंदन आकार से पृथक करता है, आवेश से नहीं; SDS विकृत करता है पर पेप्टाइड बंधों का जल-अपघटन नहीं करता; और 30 kDa उपइकाइयाँ 60 पर नहीं, 30 kDa पर चलतीं।एक विकृत प्रोटीन को पुनः वलित होने दिया जाता है। 295 nm पर उत्तेजन के साथ उसका ट्रिप्टोफ़ैन प्रतिदीप्ति उत्सर्जन उच्चिष्ठ लगभग 350 nm से लगभग 330 nm पर खिसक जाता है। यह विस्थापन सबसे सीधे क्या बताता है?
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उत्तर: C — उसकी ट्रिप्टोफ़ैन पार्श्व शृंखलाएँ कम ध्रुवीय, दबे हुए परिवेश में चली गई हैं
Trp उत्सर्जन ध्रुवता के प्रति संवेदनशील है: जल में उसका शिखर 350 nm के निकट है, और अध्रुवीय प्रोटीन-अंतर्भाग में वह छोटी तरंगदैर्घ्य की ओर खिसकता है, अतः पुनर्वलन पर नीला विस्थापन बताता है कि Trp अवशेष दब गए हैं। अधिक अनावरण उत्सर्जन को लंबी तरंगदैर्घ्य की ओर ले जाता, 295 nm पर उत्तेजन Tyr को लगभग उत्तेजित नहीं करता, और अवशोषकता में परिवर्तन तीव्रता बदलता है, उत्सर्जन उच्चिष्ठ की स्थिति नहीं।न्यूक्लियोटाइड व न्यूक्लिक अम्लों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: B — तनु क्षार RNA का जल-अपघटन करता है पर DNA का नहीं, उसके 2′-OH समूहों के कारण; C — द्विरज्जुकी DNA में प्यूरिनों का मोल-अंश पिरिमिडीनों के मोल-अंश के बराबर होता है
RNA का 2′-OH क्षार में पड़ोसी फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर पर आक्रमण करता है (2′,3′-चक्रीय फ़ॉस्फ़ेट द्वारा), जो DNA में नहीं है; और चूँकि हर A, T से तथा हर G, C से युग्मित है, द्विरज्जुक में प्यूरिन = पिरिमिडीन। पिरिमिडीन N1 द्वारा जुड़ते हैं (N9 प्यूरिन की स्थिति है), और गलन A260 बढ़ाता है, अतिवर्णी प्रभाव, क्योंकि अलग हुए क्षार अधिक अवशोषण करते हैं।DNA अनुक्रमण विधियों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — सैंगर विधि में ddNTP जुड़ने के बाद शृंखला रुक जाती है, क्योंकि ddNTP में अगले फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर बंध हेतु आवश्यक 3′-OH नहीं होता; D — मैक्सम–गिल्बर्ट विधि में डाइमेथिल सल्फ़ेट ग्वानीन को रूपांतरित करता है, और पिपेरिडीन रूपांतरित क्षारों पर मेरुदंड काटता है
डाइडीऑक्सीन्यूक्लियोटाइड में 3′-OH नहीं होता, अतः पॉलिमरेज़ अगला न्यूक्लियोटाइड नहीं जोड़ सकता; और रासायनिक विधि में DMS, G का मेथिलीकरण करता है, जिसके बाद पिपेरिडीन वहाँ रज्जुक तोड़ता है। मैक्सम–गिल्बर्ट में न पॉलिमरेज़ है न प्राइमर, केवल अंत-चिह्नित DNA पर क्षार-विशिष्ट रसायन। सैंगर विधि में संश्लेषण प्राइमर से 5′→3′ चलता है, अतः सबसे छोटे खंड नए रज्जुक का 5′ सिरा देते हैं।आयन-विनिमय व जेल-निस्यंदन वर्णलेखन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: C — जेल निस्यंदन में रंध्रों में न घुस पाने वाला बड़ा प्रोटीन छोटे प्रोटीनों से पहले, रिक्त आयतन में निकलता है; D — प्रोटीन अपने pI से ऊपर के बफ़र pH पर DEAE (ऋणायन) विनिमायक से बंधता है
अपवर्जित अणु केवल मनकों के बाहर चलते हैं और सबसे पहले, V₀ पर, निकलते हैं; और अपने pI से ऊपर प्रोटीन ऋणात्मक होकर धनावेशित DEAE समूहों से बंधता है। बँधे प्रोटीन लवण-सांद्रता घटाकर नहीं, बढ़ाकर निक्षालित होते हैं, क्योंकि लवण के आयन स्थिर आवेशों हेतु होड़ करते हैं। जेल निस्यंदन केवल आकार व आकृति से पृथक करता है, अतः केवल आवेश में भिन्न प्रोटीनों को अलग नहीं कर सकता।जैवअणुओं की अवशोषण व प्रतिदीप्ति स्पेक्ट्रमिकी के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — प्रतिदीप्ति उत्सर्जन अवशोषित प्रकाश से लंबी तरंगदैर्घ्य पर होता है; C — नियत तरंगदैर्घ्य व सांद्रता पर पथ-लंबाई दुगुनी करने से अवशोषकता दुगुनी होती है
उत्सर्जन से पहले कंपनिक विश्रांति में ऊर्जा खोती है, अतः प्रतिदीप्ति लंबी तरंगदैर्घ्य पर दिखती है (स्टोक्स विस्थापन), और A = εcl, l के समानुपाती है। 340 nm पर केवल अपचयित NADH अवशोषण करता है, इसीलिए डिहाइड्रोजिनेज़ परख वहाँ होती है। 280 nm पर प्रोटीन अवशोषकता Trp व Tyr पार्श्व शृंखलाओं से आती है; पेप्टाइड बंध 190 से 220 nm पर अवशोषण करते हैं।लाइसीन के pKa मान 2.18 (α-COOH), 8.95 (α-NH₃⁺) व 10.53 (पार्श्व-शृंखला ε-NH₃⁺) हैं। इसका समविभव बिंदु ____ है (दो दशमलव स्थानों तक)।
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उत्तर: 9.74
पूर्ण प्रोटॉनित लाइसीन का आवेश +2 है; α-COOH का प्रोटॉन (2.18) खोने पर +1, α-NH₃⁺ का प्रोटॉन (8.95) खोने पर उदासीन रूप, और ε-NH₃⁺ का प्रोटॉन (10.53) खोने पर −1। उदासीन रूप 8.95 व 10.53 के बीच है, अतः pI = (8.95 + 10.53)/2 = 9.74। उदासीन अमीनो अम्ल की तरह 2.18 व 8.95 का माध्य (5.57) लेना जाल है।एक प्रोटीन में 3 Trp व 6 Tyr अवशेष और एक डाइसल्फ़ाइड बंध में जुड़े 2 Cys अवशेष हैं। 280 nm पर मोलर अवशोषण गुणांक प्रति Trp 5500 M⁻¹ cm⁻¹, प्रति Tyr 1490 M⁻¹ cm⁻¹ व प्रति डाइसल्फ़ाइड 125 M⁻¹ cm⁻¹ लें, और मानें कि वे जुड़ते हैं। प्रोटीन के एक विलयन का 1.00 cm क्यूवेट में A280 = 0.767 है। इसकी सांद्रता ____ µM है (निकटतम पूर्णांक तक)।
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उत्तर: 30
ε280 = 3(5500) + 6(1490) + 1(125) = 16,500 + 8940 + 125 = 25,565 M⁻¹ cm⁻¹। बियर–लैम्बर्ट से c = A/(εl) = 0.767/(25,565 × 1.00) = 3.00 × 10⁻⁵ M = 30 µM। Tyr का योगदान छोड़ देना प्रचलित भूल है; उससे 0.767/16,625 = 46 µM आता है।ट्राइओलीन (ग्लिसरिल ट्राइओलिएट, M = 885.4 g mol⁻¹) में प्रति अणु तीन C=C द्विबंध हैं, जिनमें से प्रत्येक पर I₂ (M = 253.8 g mol⁻¹) का एक अणु जुड़ता है। इसका आयोडीन मान, यानी प्रति 100 g वसा द्वारा ग्रहण किए गए I₂ के ग्राम, ____ है (निकटतम पूर्णांक तक)।
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उत्तर: 86
ट्राइओलीन का एक मोल (885.4 g) 3 mol I₂ = 3 × 253.8 = 761.4 g ग्रहण करता है। प्रति 100 g वसा: 761.4 × 100/885.4 = 86.0, अतः आयोडीन मान 86 है। गुणक 3 भूलने पर 29 आता है; बिना द्विबंध वाले ट्राइस्टियरिन का आयोडीन मान 0 होता।α-D-गैलेक्टोपाइरानोस व β-D-गैलेक्टोपाइरानोस के विशिष्ट घूर्णन +150.7° व +52.8° तथा जल में उनके साम्य मिश्रण का +80.2° लें। खुली-शृंखला व फ़्यूरानोस रूपों को नगण्य मानकर, साम्य पर α ऐनोमर का प्रतिशत ____ % है (निकटतम पूर्णांक तक)।
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उत्तर: 28
यदि x, α अंश है, तो 150.7x + 52.8(1 − x) = 80.2, अतः 97.9x = 27.4 और x = 0.280, यानी 28% α व 72% β। अंश को ग़लत सिरे से निकालना, (150.7 − 80.2)/97.9 = 72%, β का प्रतिशत दे देता है।पेप्टाइड Gly-Leu-Lys-Ala-Arg-Pro-Glu-Phe-Lys-Ser-Met-Arg-Trp-Tyr-Lys-Asp-Ala को ट्रिप्सिन से पूर्णतः पचाया जाता है। उत्पन्न पेप्टाइडों की संख्या ____ है।
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उत्तर: 5
ट्रिप्सिन Lys व Arg की कार्बॉक्सिल ओर काटता है, जब तक अगला अवशेष Pro न हो। Lys-3, Lys-9, Arg-12 व Lys-15 के बाद कटाव होता है, पर Arg-5 के बाद नहीं, जिसके बाद Pro है। चार कटाव पाँच पेप्टाइड देते हैं: Gly-Leu-Lys, Ala-Arg-Pro-Glu-Phe-Lys, Ser-Met-Arg, Trp-Tyr-Lys व Asp-Ala। Arg-Pro बंध पर भी काटने से छह आते।