समाजशास्त्रीय सिद्धांत: चिरसम्मत, प्रकार्यवादी, व्याख्यात्मक, समकालीन व भारतीय परंपराएँ

यह अध्याय मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान (XH) पेपर के खंड XH6.1, "Sociological Theory" (समाजशास्त्रीय सिद्धांत), का उत्तर देता है। XH6 समाजशास्त्र छह वैकल्पिक खंडों में से एक है, जिसे आवेदन के समय चुना जाता है; यह उसका खंड XH6.1 है। अध्याय चिरसम्मत परंपराएँ (Durkheim का सामाजिक तथ्य, एकता, अनोमी, आत्महत्या व धर्म; Weber का सामाजिक क्रिया, सत्ता, प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र, नौकरशाही, आदर्श प्ररूप व पद्धति; Marx का वर्ग-संघर्ष, ऐतिहासिक भौतिकवाद, अधिशेष मूल्य व अलगाव), प्रकार्यवाद व संरचनावाद (Malinowski, Radcliffe-Brown, Parsons का AGIL, Merton का मध्य-स्तरीय सिद्धांत व प्रकट/प्रच्छन्न प्रकार्य, Levi-Strauss), व्याख्यात्मक परंपराएँ (Mead, Schutz, Garfinkel, Goffman, Geertz), हाल के विकास (Bourdieu, Foucault, Habermas, Giddens, Frankfurt School) व संघर्ष सिद्धांत (Dahrendorf, Coser, Althusser), तथा प्रमुख भारतीय विचारक (Gandhi, Ambedkar, Radhakamal Mukerjee, Ghurye, M.N. Srinivas, Irawati Karve, A.R. Desai, Andre Beteille) पढ़ाता है। परीक्षा में बार-बार आने वाला कौशल है किसी संकल्पना को सही सिद्धांतकार से जोड़ना और उसे उसी सिद्धांतकार की योजना के भीतर पढ़ना।

1. एमिल दुर्खीम: सामाजिक तथ्य, एकता, अनोमी, आत्महत्या व धर्म

दुर्खीम ने समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्य (social fact) पर आधारित किया: कार्य, विचार या अनुभव का वह ढंग जो व्यक्ति के लिए बाह्य हो, बाध्यकारी हो (वह विवश करता है, और प्रतिरोध पर बाध्यता प्रकट होती है) तथा समाज भर में सामान्य हो, और स्वयं अपने अधिकार में विद्यमान हो (sui generis)। उनकी पद्धति, The Rules of Sociological Method में, यह है कि "सामाजिक तथ्यों को वस्तु की तरह लो" — उन्हें अन्य सामाजिक तथ्यों से समझाओ, व्यक्तिगत मनोविज्ञान या जीवविज्ञान से नहीं। समाज अपने सदस्यों के योग से बड़ी एक वास्तविकता है।

The Division of Labour in Society में वे दो बंधनों का विरोधाभास रखते हैं। यांत्रिक एकता (mechanical solidarity) सरल समाजों को समानता व प्रबल सामूहिक चेतना (collective conscience) से जोड़ती है; उसका कानून दमनकारी है (दंड साझा भावना को पुनर्स्थापित करता है)। सावयवी एकता (organic solidarity) जटिल समाजों को विशेषीकृत, असमान अंगों की परस्पर-निर्भरता से जोड़ती है; उसका कानून प्रत्यास्थापक (restitutive) है (वह टूटे संबंध को पुनर्स्थापित करता है, जैसे संविदा में)। सामान्य श्रम-विभाजन एकीकृत करता है; उसके विकृत रूप नहीं — अनोमिक (तीव्र परिवर्तन नैतिक नियमन से आगे निकल जाता है, नियम अस्पष्ट रह जाते हैं) तथा बाध्य (स्थान योग्यता नहीं, जन्म या शक्ति से तय)।

Suicide पद्धति का प्रमाण है: एक प्रतीत होता निजी कार्य दो सामाजिक धाराओं से बदलता है — एकीकरण (व्यक्ति समूह से कितना बँधा है) व नियमन (उसकी इच्छाएँ कितनी शासित हैं)। बहुत कम एकीकरण अहंवादी (egoistic) आत्महत्या देता है; बहुत अधिक परार्थी (altruistic); बहुत कम नियमन अनोमिक; बहुत अधिक भाग्यवादी (fatalistic)। The Elementary Forms of Religious Life तर्क देता है कि धर्म संसार को पवित्र (sacred) व अपवित्र (profane) में बाँटता है, कि टोटेम कुल का प्रतीक है, और इस प्रकार पवित्र की पूजा में समाज स्वयं की पूजा करता है; कर्मकांड सामूहिक उद्वेलन (collective effervescence) द्वारा एकता नवीनीकृत करता है। अतः दुर्खीम का बार-बार का प्रश्न प्रकार्यात्मक है: कोई संस्था समग्र की संबद्धता के लिए क्या करती है?

2. मैक्स वेबर: सामाजिक क्रिया, सत्ता, प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र व नौकरशाही

जहाँ दुर्खीम सामाजिक तथ्यों का अध्ययन बाहर से करते हैं, वहीं वेबर आग्रह करते हैं कि समाजशास्त्र को वह व्यक्तिपरक अर्थ समझना चाहिए जो कर्ता अपने आचरण से जोड़ते हैं — व्याख्यात्मक बोध, Verstehen। सामाजिक क्रिया वह क्रिया है जो दूसरों के व्यवहार की ओर उन्मुख हो, और वे इसे इसके आधार से वर्गीकृत करते हैं: साधन-तर्कसंगत (zweckrational, लक्ष्य के अनुरूप साधन), मूल्य-तर्कसंगत (wertrational, सफलता की परवाह बिना किसी मूल्य हेतु), भावात्मक (affectual) तथा परंपरागत। आदर्श प्ररूप (ideal type) उनका प्रमुख उपकरण है: एकपक्षीय, जानबूझकर अतिरंजित मानसिक रचना (पूर्णतः तर्कसंगत नौकरशाही, प्रोटेस्टेंट उद्यमी) जिसके विरुद्ध अस्त-व्यस्त वास्तविकता को मापा जाता है। यह मापदंड है, वर्णन या औसत नहीं।

वेबर की वैध सत्ता (Herrschaft) के तीन प्रकार
प्रकारवैधता का आधारविशिष्ट रूप
परंपरागतदीर्घकालीन प्रथा की पवित्रताकुलपति, राजा, सामंत
करिश्माईनेता के असाधारण व्यक्तिगत गुणपैगंबर, क्रांतिकारी, युद्ध-नायक
वैध-तर्कसंगतअवैयक्तिक अधिनियमित नियम व पदआधुनिक राज्य, नौकरशाही

The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism में वेबर तर्क देते हैं कि तपस्वी प्रोटेस्टेंटवाद, विशेषकर पूर्वनियति की चिंता वाला Calvinism, ने बुलावे (calling) में सांसारिक सफलता को अनुग्रह का चिह्न बना दिया, जिससे भोग के बजाय व्यवस्थित श्रम व पुनर्निवेश को बढ़ावा मिला — आधुनिक पूँजीवाद की भावना से एक अनभिप्रेत वरणात्मक आत्मीयता। इसे प्रायः विशुद्ध आर्थिक इतिहास-व्याख्या के प्रत्युत्तर के रूप में पढ़ा जाता है: केवल अर्थतंत्र नहीं, विचार भी इतिहास गढ़ते हैं। नौकरशाही विशुद्धतम वैध-तर्कसंगत रूप है: पदों का सोपान, लिखित नियम, फ़ाइलें, निश्चित अधिकार-क्षेत्र, योग्यता से नियुक्ति व पद का व्यक्ति से पृथक्करण। यह तकनीकी रूप से श्रेष्ठ है फिर भी अवैयक्तिक तर्कीकरण के लौह-पिंजर (iron cage) का भय देती है। पद्धतिगत रूप से वेबर विश्लेषण में मूल्य-तटस्थता (Wertfreiheit) की माँग करते हैं यद्यपि मानते हैं कि मूल्य-सापेक्षता तय करती है कि विद्वान कौन-से प्रश्न चुनता है।

3. कार्ल मार्क्स: ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग, अधिशेष मूल्य व अलगाव

मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद इतिहास को इस दृष्टि से पढ़ता है कि लोग अपनी जीविका के साधन कैसे उत्पन्न करते हैं। उत्पादन की शक्तियाँ (औज़ार, तकनीक, श्रम) और उत्पादन के संबंध (किसका स्वामित्व) मिलकर आर्थिक आधार (base) बनाते हैं, जो विधिक, राजनीतिक व वैचारिक अधिरचना (superstructure) को अनुकूलित करता है। जब शक्तियाँ संबंधों से आगे बढ़ जाती हैं तो तनाव परिवर्तन के रूप में फूटता है — अंतर्विरोध की एक द्वंद्वात्मक (dialectical) गति। प्रत्येक युग (प्राचीन, सामंती, पूँजीवादी) का अपना विशिष्ट उत्पादन-प्रणाली (mode of production) व अपने शासक व अधीनस्थ वर्ग होते हैं।

पूँजीवाद में दो महान वर्ग हैं — बुर्जुआ (bourgeoisie) (उत्पादन-साधनों के स्वामी) व सर्वहारा (proletariat) (जिनके पास केवल अपनी श्रम-शक्ति है)। मार्क्स वर्ग "अपने में (in itself)" (समान स्थिति) को वर्ग "अपने लिए (for itself)" (सचेत व संगठित) से अलग करते हैं; वर्ग-चेतना का उदय संरचनात्मक संघर्ष को राजनीतिक संघर्ष में बदल देता है। उनकी अर्थशास्त्र लाभ को अधिशेष मूल्य (surplus value) में देखती है: श्रमिक को श्रम-शक्ति का मूल्य मिलता है पर वह कार्य-दिवस में उससे अधिक मूल्य उत्पन्न करता है, और स्वामी अंतर हड़प लेता है — शोषण मज़दूरी-संबंध में अंतर्निहित है, अनुचित लेन-देन में नहीं। संचय का अर्थ है अधिशेष मूल्य का नई पूँजी के रूप में पुनर्निवेश।

ℹ️ मार्क्स के अलगाव (alienation) के चार पहलू
आरंभिक Economic and Philosophic Manuscripts में मज़दूर विलग (estranged) होता है (1) उत्पाद से, जो किसी और का है; (2) श्रम की क्रिया से, जो बाहर से निर्देशित व असंतोषजनक है; (3) प्रजाति-सत्ता (Gattungswesen) से, अर्थात् स्वतंत्र सर्जनात्मक कार्य की मानवीय क्षमता से; तथा (4) सहकर्मियों से, जो प्रतिस्पर्धी बना दिए जाते हैं। अलगाव श्रम-संबंध की संरचनात्मक स्थिति है, कोई मनोदशा नहीं, और वह केवल उस संबंध को बदलने से समाप्त होती है।

4. संरचनात्मक-प्रकार्यवाद व संरचनावाद

  • Bronislaw Malinowski ने प्रकार्यवाद को व्यक्तिगत जैविक आवश्यकताओं पर आधारित किया जिन्हें संस्थाएँ पूरा करने हेतु विद्यमान हैं, और गहन सहभागी अवलोकन (participant observation) का सूत्रपात किया (ट्रोब्रिआंड द्वीप, Argonauts of the Western Pacific); आनुष्ठानिक विनिमय का kula चक्र दर्शाता है कि पारस्परिकता द्वीपों को आपस में बाँधती है।
  • A.R. Radcliffe-Brown ने, दुर्खीम का अनुसरण करते हुए, प्रकार्य को व्यक्ति में नहीं बल्कि सामाजिक संरचना में स्थित किया: किसी संस्था का प्रकार्य संरचना व उसकी एकता को बनाए रखने में उसका योगदान है। उन्होंने "समाज का प्राकृतिक विज्ञान" की माँग की और संरचनात्मक-प्रकार्यवाद के स्रोत हैं।
  • Talcott Parsons ने सामाजिक तंत्र (system) का वृहत् सिद्धांत बनाया: प्रत्येक तंत्र को चार प्रकार्यात्मक आवश्यकताएँ हल करनी होती हैं, AGIL — Adaptation/अनुकूलन (अर्थतंत्र), Goal attainment/लक्ष्य-प्राप्ति (राजतंत्र), Integration/एकीकरण (कानून, मानदंड) व Latency या प्रतिमान-अनुरक्षण (परिवार, संस्कृति)। उनकी बीमार-भूमिका (sick role) दर्शाती है कि बीमारी तक सामाजिक रूप से नियमित है।
  • Robert K. Merton ने Parsons को सुधारा: सर्वग्राही तंत्र नहीं, प्रमाण से जुड़े मध्य-स्तरीय सिद्धांत (middle-range theories) बनाओ। उन्होंने प्रकट (manifest) प्रकार्य (अभिप्रेत, मान्य) को प्रच्छन्न (latent) प्रकार्य (अनभिप्रेत, प्रायः अमान्य) से अलग किया व दुष्प्रकार्य (dysfunction) जोड़ा; उन्होंने संदर्भ-समूह (reference group) सिद्धांत व सापेक्ष वंचन (relative deprivation) विकसित किया, और अनोमी को सांस्कृतिक रूप से अनुमोदित लक्ष्यों व उपलब्ध वैध साधनों के बीच तनाव के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया।
  • Claude Levi-Strauss ने सामाजिक संरचनावाद की नींव रखी: अर्थ एकल वस्तुओं में नहीं बल्कि द्विआधारी विरोधों (binary oppositions) व चेतना के नीचे के संबंधों में निहित है, जिसका प्रतिमान संरचनात्मक भाषाविज्ञान है। The Elementary Structures of Kinship में विवाह-नियम समूहों के बीच स्त्रियों के विनिमय के तंत्र हैं (गठबंधन सिद्धांत), और विभिन्न संस्कृतियों के मिथक एक ही अंतर्निहित अंतर्विरोधों को सुलझाने वाले रूपांतर हैं।

5. व्याख्याशास्त्रीय व व्याख्यात्मक परंपराएँ

ये परंपराएँ समाजशास्त्र को संरचना से नीचे की ओर नहीं, अपितु अर्थ व अंतःक्रिया से ऊपर की ओर बनाती हैं। G.H. Mead ने दिखाया कि स्व (self) सामाजिक है और संप्रेषण में उत्पन्न होता है: स्वतःस्फूर्त "I" क्रिया करता है, "Me" वह स्व है जो दूसरों की दृष्टि से देखा जाता है, और बालक पहले किसी सार्थक अन्य (significant other) की भूमिका लेना सीखता है (खेल या play चरण) और फिर सामान्यीकृत अन्य (generalised other), समुदाय के दृष्टिकोण की (प्रतियोगी खेल या game चरण)। उनका विवरण प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद का बीज है। Alfred Schutz ने Husserl की परिघटनाविज्ञान (phenomenology) को समाजशास्त्र में लाया: रोज़मर्रा जीवन एक स्वतःसिद्ध मान लिए गए जीवन-जगत् (Lebenswelt), एक साझा ज्ञान-संचय व उन प्ररूपणों (typifications) पर टिका है जिनसे हम दूसरों को वर्गीकृत करते हैं, और यह सब अंतर्व्यक्तिपरकता (intersubjectivity) से बना रहता है।

  • Harold Garfinkel ने नृजातिपद्धतिविज्ञान (ethnomethodology) की नींव रखी: उन सामान्य विधियों का अध्ययन जिनसे सदस्य रोज़मर्रा गतिविधि को बोधगम्य व सुव्यवस्थित बनाते हैं। उनके उल्लंघन-प्रयोग (breaching experiments) स्वतःसिद्ध नियमों को भंग कर उन्हें दृश्यमान बनाते हैं; मुख्य विचार हैं संकेतनिर्भरता (indexicality) (अर्थ संदर्भ पर निर्भर) व प्रतिवर्तिता (reflexivity) (विवरण उसी स्थिति को गढ़ने में मदद करते हैं जिसका वे वर्णन करते हैं)।
  • Erving Goffman ने अंतःक्रिया को नाट्यशास्त्र (dramaturgy) की तरह पढ़ा: The Presentation of Self in Everyday Life में लोग अग्र-मंच (front stage) पर अभिनय करते हैं व पृष्ठ-मंच (back stage) पर विश्राम करते हैं, दर्शकों के लिए प्रभाव-प्रबंधन करते हुए। उन्होंने समग्र संस्थाओं (total institutions) (Asylums) व कलंक (stigma) का भी विश्लेषण किया।
  • Clifford Geertz ने संस्कृति को व्याख्यात्मक नृविज्ञान का विषय बनाया: संस्कृति वे अर्थ के जाल (webs of significance) हैं जिन्हें लोग बुनते हैं, और विश्लेषक का कार्य सघन वर्णन (thick description) है — किसी कृत्य को उसमें निहित अर्थ की परतों हेतु पढ़ना, जैसा उनके बालीद्वीपीय मुर्गे-लड़ाई निबंध में।

6. संघर्ष सिद्धांत व हाल के विकास

युद्धोत्तर संघर्ष सिद्धांत ने Marx की अर्थशास्त्र को ढीला करते हुए प्रभुत्व पर उनका ध्यान बनाए रखा। Ralf Dahrendorf ने संघर्ष को संपत्ति में नहीं बल्कि सत्ता (authority) में स्थित किया: प्रत्येक "अनिवार्यतः समन्वित संगठन" में कुछ आदेश देते हैं व कुछ पालन करते हैं, और यह विभाजन वहाँ भी संघर्ष उत्पन्न करता है जहाँ स्वामित्व नहीं करता। Lewis Coser ने, Simmel का अनुसरण करते हुए, सामाजिक संघर्ष के प्रकार्यों पर बल दिया — संघर्ष सीमाएँ स्पष्ट कर सकता है, सुरक्षा-वाल्व (safety valve) से तनाव निकाल सकता है, व समूह को शत्रु के विरुद्ध बाँध सकता है। Louis Althusser के संरचनात्मक मार्क्सवाद ने दमनकारी राज्य-तंत्र (RSA) (सेना, पुलिस) को उन वैचारिक राज्य-तंत्रों (ISA) (विद्यालय, चर्च, परिवार, मीडिया) से अलग किया जो अंतराह्वान (interpellation) द्वारा सहमति सुरक्षित करते हैं, व्यक्तियों को कर्ता-स्थितियों में पुकारते हुए; अधिरचना को आधार से सापेक्ष स्वायत्तता प्राप्त है।

  • Pierre Bourdieu ने संरचना व कर्तृत्व को तीन परस्पर-जुड़े विचारों से जोड़ा: हैबिटस (habitus) (पालन-पोषण से पड़ी टिकाऊ प्रवृत्तियाँ जो व्यवहार उत्पन्न करती हैं), क्षेत्र (field) (प्रतिस्पर्धा का संरचित मंच), व आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक व प्रतीकात्मक रूपों में पूँजी (capital)। वर्ग तब पुनरुत्पादित होता है जब सांस्कृतिक पूँजी लाभ में बदलती है; जिस शक्ति को स्वाभाविक मान लिया जाता है वह प्रतीकात्मक हिंसा (symbolic violence) है (Distinction)।
  • Michel Foucault ने शक्ति को ज्ञान से जोड़ा: शक्ति केवल दमन नहीं बल्कि उत्पादक है, जो विमर्श (discourse) व अनुशासन के माध्यम से कार्य करती है। Discipline and Punish सर्वदर्शी कारागार (panopticon) के द्वारा दिखाता है कि निगरानी कैसे कर्ताओं से स्वयं को अनुशासित करवाती है; बाद का कार्य जनसंख्या पर जैव-शक्ति (biopower) व शासनकला (governmentality) का सिद्धांत देता है।
  • दूसरी पीढ़ी के Frankfurt School के Jurgen Habermas ने मात्र रणनीतिक क्रिया के विरुद्ध पारस्परिक समझ की ओर उन्मुख संचारात्मक क्रिया (communicative action) का, व एक तर्कसंगत लोकवृत्त (public sphere) के आधुनिक ह्रास का सिद्धांत दिया; आधुनिकता का खतरा तंत्र (system) के धन-व-शक्ति संचालन द्वारा जीवन-जगत् का उपनिवेशीकरण है।
  • Anthony Giddens का संरचनायन (structuration) सिद्धांत संरचना-कर्तृत्व विभाजन को घोल देता है: संरचना क्रिया का माध्यम भी है व परिणाम भी (संरचना की द्वैतता); नियम व संसाधन केवल तभी अस्तित्व में हैं जब सुविज्ञ कर्ता उन्हें व्यवहार में उपयोग करें। पूर्ववर्ती Frankfurt School (Adorno, Horkheimer, Marcuse) ने आलोचनात्मक सिद्धांत विकसित किया, संस्कृति-उद्योग (culture industry) व साधनात्मक तर्क (instrumental reason) पर प्रहार करते हुए (Dialectic of Enlightenment; Marcuse का One-Dimensional Man)।

7. भारतीय विचारक

भारतीय विचारक: केंद्रीय विचार व प्रतिनिधि कृति
विचारककेंद्रीय योगदान
M.K. Gandhiसर्वोदय व न्यासिता; ग्राम स्वराज; आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की नैतिक आलोचना (Hind Swaraj); सामाजिक विधि के रूप में अहिंसा
B.R. Ambedkarअंतर्विवाह से टिकी श्रेणीबद्ध असमानता के रूप में जाति (Castes in India); जाति-उन्मूलन (Annihilation of Caste) का आह्वान; दलित मुक्ति व संवैधानिक सुरक्षोपाय
Radhakamal Mukerjeeसमाज को उसके प्रादेशिक पर्यावरण से जोड़ने वाली सामाजिक पारिस्थितिकी, व यह आग्रह कि मूल्य सामाजिक विज्ञानों के भीतर आते हैं
G.S. Ghuryeबंबई स्कूल के संस्थापक; भारतविद्यात्मक (पाठ-आधारित) पद्धति; जाति के छह लक्षण (Caste and Race in India)
M.N. Srinivasसंस्कृतीकरण, पश्चिमीकरण व प्रभुत्वशाली जाति; पुस्तक-दृष्टि पर क्षेत्र-दृष्टि (The Remembered Village)
Irawati Karveभारत भर की नातेदारी-व्यवस्था को व्यापक प्रादेशिक प्रतिमानों में मानचित्रित करना (Kinship Organisation in India)
A.R. Desaiभारतीय समाज का मार्क्सवादी, द्वंद्वात्मक पाठ (Social Background of Indian Nationalism)
Andre Beteilleएक ही गाँव में असमानता के भिन्न आयामों के रूप में जाति, वर्ग व शक्ति (Caste, Class and Power, श्रीपुरम)
🎯 Srinivas की संकल्पना-जोड़ी क्यों महत्त्वपूर्ण है
संस्कृतीकरण किसी निम्न जाति द्वारा किसी उच्च, प्रायः द्विज, जाति की प्रथाओं, कर्मकांड व विचारधारा को अपनाकर पीढ़ियों में उच्च स्थान का दावा करना है — जाति-व्यवस्था के भीतर गतिशीलता। पश्चिमीकरण पश्चिमी तकनीक, संस्थाओं व मूल्यों के प्रत्यक्ष प्रभाव में आया परिवर्तन है। दोनों विपरीत दिशाओं में खींच सकते हैं, और परीक्षक प्रायः जाँचता है कि वर्णित परिवर्तन इनमें से एक है, दूसरा है, या दोनों।

मुख्य बिंदु

  • दुर्खीम बाह्य, बाध्यकारी सामाजिक तथ्यों का अध्ययन वस्तु की तरह करते हैं; एकता यांत्रिक (समानता, दमनकारी कानून) से सावयवी (श्रम-विभाजन, प्रत्यास्थापक कानून) की ओर बढ़ती है; आत्महत्या एकीकरण व नियमन से बदलती है; धर्म स्वयं की पूजा करता समाज है।
  • वेबर समाजशास्त्र को व्यक्तिपरक अर्थ (Verstehen) व आदर्श प्ररूप में आधारित करते हैं; सामाजिक क्रिया के चार प्रकार व सत्ता के तीन प्रकार (परंपरागत, करिश्माई, वैध-तर्कसंगत); प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र दिखाता है कि विचार पूँजीवाद गढ़ते हैं; नौकरशाही तर्कसंगत लौह-पिंजर है।
  • मार्क्स इतिहास को उत्पादन-प्रणाली व आधार-अधिरचना संबंध से समझाते हैं; पूँजीवाद बुर्जुआ को सर्वहारा के विरुद्ध खड़ा करता है; लाभ हड़पा गया अधिशेष मूल्य है; अलगाव श्रमिक को उत्पाद, श्रम, प्रजाति-सत्ता व अन्यों से विलग करता है।
  • प्रकार्य सामाजिक संरचना (Radcliffe-Brown) या व्यक्तिगत आवश्यकताओं (Malinowski) में है; Parsons का तंत्र AGIL हल करे; Merton मध्य-स्तरीय सिद्धांत बनाते हैं व प्रकट को प्रच्छन्न प्रकार्य से अलग करते हैं; Levi-Strauss नातेदारी व मिथक को द्विआधारी विरोध की संरचना मानते हैं।
  • व्याख्यात्मक मोड़ अर्थ से बनता है: Mead का सामाजिक स्व (I/Me, सामान्यीकृत अन्य), Schutz का जीवन-जगत् व प्ररूपण, Garfinkel का नृजातिपद्धतिविज्ञान व उल्लंघन, Goffman का नाट्यशास्त्र, Geertz का सघन वर्णन।
  • संघर्ष सिद्धांत संघर्ष को सत्ता में पुनःस्थापित करता है (Dahrendorf), उसके एकीकारी प्रकार्य (Coser) व वैचारिक पुनरुत्पादन (Althusser) नोट करता है; Bourdieu का हैबिटस-क्षेत्र-पूँजी, Foucault का शक्ति/ज्ञान, Habermas की संचारात्मक क्रिया व Giddens का संरचनायन प्रमुख हाल के ढाँचे हैं। भारत में, प्रत्येक विचारक की विशिष्ट संकल्पना याद रखें।

अभ्यास प्रश्न (16)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. दुर्खीम के विवरण में, वह एकता जो एक जटिल, अत्यधिक विभेदित समाज को बाँधती है और प्रत्यास्थापक (संविदा-पुनर्स्थापक) कानून में झलकती है, वह है:

    1. यांत्रिक एकता, जो सदस्यों की समानता व प्रबल साझा सामूहिक चेतना से उत्पन्न होती है
    2. अनोमिक एकता, जो तीव्र सामाजिक परिवर्तन के दौरान नैतिक नियमन के ढहने से उत्पन्न होती है
    3. सावयवी एकता, जो विशेषीकृत, असमान अंगों की परस्पर-निर्भरता से उत्पन्न होती है
    4. बाध्य एकता, जो योग्यता के बजाय जन्म से तय सामाजिक स्थानों से उत्पन्न होती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — सावयवी एकता, जो विशेषीकृत, असमान अंगों की परस्पर-निर्भरता से उत्पन्न होती है

    सावयवी एकता श्रम-विभाजन पर टिकी है: असमान, विशेषीकृत सदस्य परस्पर निर्भर होते हैं, और इसका विशिष्ट कानून प्रत्यास्थापक है, जो टूटे संबंधों को पुनर्स्थापित करता है। यांत्रिक एकता भ्रामक उत्तर है, पर वह सरल समाजों को समानता व प्रबल सामूहिक चेतना से बाँधती है, और इसका कानून दमनकारी (दंडात्मक) है। 'अनोमिक' व 'बाध्य' श्रम-विभाजन के विकृत रूपों के नाम हैं, एकता के प्रकार नहीं।
  2. एक दीर्घकाल से बसा ग्रामीण समुदाय, एक आकस्मिक खनन-उछाल के बाद, कार्य, धन व विवाह संबंधी पुराने मानदंडों की पकड़ ढीली होते देखता है, और मानकों की उलझन के बीच आत्म-विनाश की दरें बढ़ती हैं। दुर्खीम की वर्गिकी में इसे सर्वोत्तम रूप से किसमें रखा जाएगा:

    1. अहंवादी आत्महत्या, व्यक्ति को आसपास के समूह से बाँधने वाले दुर्बल एकीकरण से
    2. अनोमिक आत्महत्या, तीव्र परिवर्तन के दौरान आदर्शात्मक नियमन के ढहने से
    3. परार्थी आत्महत्या, व्यक्ति के समूह में अत्यधिक एकीकरण से
    4. भाग्यवादी आत्महत्या, इच्छाओं के दमनकारी रूप से अत्यधिक नियमन से
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अनोमिक आत्महत्या, तीव्र परिवर्तन के दौरान आदर्शात्मक नियमन के ढहने से

    निर्णायक संकेत तीव्र परिवर्तन के दौरान आदर्शात्मक नियमन का आकस्मिक लोप है, जो ठीक दुर्खीम का अनोमिक प्रकार है। अहंवादी आत्महत्या बहुत कम एकीकरण (अलगाव) से आती है, नियमन-ढहने से नहीं; गद्यांश उलझे मानकों पर बल देता है, वियोग पर नहीं। परार्थी व भाग्यवादी उच्च-एकीकरण व उच्च-नियमन के ध्रुव हैं, जो वर्णित के विपरीत है।
  3. एक सिविल सेवक की पदोन्नति केवल लिखित परीक्षाओं पर होती है, वह फ़ाइलों में रखे संहिताबद्ध नियमों के अनुसार कार्य करता है, केवल एक निश्चित अधिकार-क्षेत्र के भीतर सत्ता का प्रयोग करता है, और पद को निजी संपत्ति से अलग रखता है। वेबर की शब्दावली में यह किस प्रकार की वैध सत्ता का उदाहरण है?

    1. परंपरागत सत्ता
    2. करिश्माई सत्ता
    3. मूल्य-तर्कसंगत सत्ता
    4. वैध-तर्कसंगत सत्ता
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — वैध-तर्कसंगत सत्ता

    अवैयक्तिक नियम, लिखित फ़ाइलें, योग्यता-आधारित नियुक्ति व निश्चित अधिकार-क्षेत्र वैध-तर्कसंगत प्रकार के लक्षण हैं, जो नौकरशाही में मूर्त हैं। परंपरागत सत्ता प्रथा की पवित्रता पर व करिश्माई किसी व्यक्ति के असाधारण गुणों पर टिकी है, इनमें से कोई उल्लिखित नहीं। 'मूल्य-तर्कसंगत' सामाजिक क्रिया का प्रकार है, सत्ता का नहीं, अतः यह इस त्रिआयामी योजना में नहीं आता।
  4. मार्क्स के लिए, पूँजीपति के लाभ का स्रोत सर्वोत्तम रूप से किससे वर्णित होता है:

    1. सस्ता खरीदकर महँगा बेचना, ऐसे दामों पर जो किसी वस्तु के वास्तविक बाज़ार-मूल्य से काफ़ी ऊपर हों
    2. अधिशेष मूल्य: श्रमिक मज़दूरी में चुकाई गई श्रम-शक्ति के मूल्य से अधिक मूल्य उत्पन्न करता है
    3. उसके लिए भुगतान को तैयार अनेक ऋणियों की तुलना में पूँजी की दुर्लभता
    4. धीमे व महँगे मानव श्रम पर मशीनों की श्रेष्ठ भौतिक उत्पादकता
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अधिशेष मूल्य: श्रमिक मज़दूरी में चुकाई गई श्रम-शक्ति के मूल्य से अधिक मूल्य उत्पन्न करता है

    मार्क्स लाभ को अधिशेष मूल्य में रखते हैं: श्रम-शक्ति उसके मूल्य पर खरीदी जाती है, फिर भी कार्य-दिवस में वह उससे अधिक मूल्य सृजित करती है, और स्वामी अधिशेष रख लेता है। 'सस्ता खरीदो, महँगा बेचो' वाला उत्तर वही है जिसे मार्क्स स्पष्टतः अस्वीकार करते हैं, क्योंकि उनके श्रम-मूल्य-सिद्धांत में मूल्य पर विनिमय भी अधिशेष देता है। पूँजी की दुर्लभता व मशीन-उत्पादकता उनकी व्याख्या नहीं; मशीनें अपना मूल्य अंतरित करती हैं पर अधिशेष मूल्य नहीं सृजतीं।
  5. एक अध्ययन पाता है कि सूखे में की गई वर्षा-नृत्य वस्तुतः वर्षा नहीं लाती, पर वह संकट के समय समुदाय को आश्वस्त करती है व उसकी एकता दृढ़ करती है। Merton के भेद का उपयोग करते हुए, आश्वासन-व-एकता प्रभाव को सर्वोत्तम रूप से इस प्रथा का क्या कहा जाएगा:

    1. प्रच्छन्न प्रकार्य
    2. प्रकट प्रकार्य
    3. दुष्प्रकार्य
    4. प्रकट दुष्प्रकार्य
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — प्रच्छन्न प्रकार्य

    नृत्य का अभिप्रेत, मान्य प्रयोजन वर्षा लाना है (उसका प्रकट प्रकार्य, जो विफल रहता है); एकता में अनभिप्रेत किंतु वास्तविक योगदान उसका प्रच्छन्न प्रकार्य है, जो ठीक Merton की उस श्रेणी के अनुरूप है जिसमें परिणाम अमान्य व अनभिप्रेत होकर भी तंत्र के लिए लाभकारी होते हैं। यह दुष्प्रकार्य नहीं है, क्योंकि प्रभाव संबद्धता को हानि नहीं, सहायता पहुँचाता है।
  6. दो विद्वान असहमत हैं। विद्वान P चाहते हैं कि समाजशास्त्र एक सर्वग्राही तंत्र के बजाय डेटा से निकटता से जुड़े सीमित, परीक्षणीय सिद्धांतों से आगे बढ़े; विद्वान Q किसी भी सामाजिक तंत्र पर लागू होने के लिए अभिप्रेत एक चार-प्रकार्य ढाँचा (अनुकूलन, लक्ष्य-प्राप्ति, एकीकरण, प्रतिमान-अनुरक्षण) बनाते हैं। दोनों विद्वानों का कौन-सा निर्धारण सही है?

    1. P हैं Parsons (AGIL); Q हैं Merton (मध्य-स्तरीय सिद्धांत)
    2. P हैं Radcliffe-Brown (संरचनात्मक प्रकार्य); Q हैं Malinowski (जैविक आवश्यकताएँ)
    3. P हैं Merton (मध्य-स्तरीय सिद्धांत); Q हैं Parsons (AGIL)
    4. P हैं Garfinkel (नृजातिपद्धतिविज्ञान); Q हैं Goffman (नाट्यशास्त्र)
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — P हैं Merton (मध्य-स्तरीय सिद्धांत); Q हैं Parsons (AGIL)

    सीमित, डेटा-बद्ध, परीक्षणीय सिद्धांत Merton का मध्य-स्तरीय कार्यक्रम है, जो वृहत् सिद्धांतन के विरुद्ध स्पष्ट प्रतिक्रिया है, अतः P Merton हैं; सार्वभौम चार-प्रकार्य ढाँचा Parsons का AGIL है, अतः Q Parsons हैं। उलटा निर्धारण प्रत्येक को ग़लत नाम देता है। Radcliffe-Brown व Malinowski दोनों वृहत् प्रकार्यवादी हैं और कोई 'मध्य-स्तरीय' वर्णन में नहीं बैठता; Garfinkel व Goffman व्याख्यात्मक सिद्धांतकार हैं, इस प्रकार्यवादी विवाद से बाहर।
  7. एक अभ्यर्थी साक्षात्कार से पहले अकेले उत्तरों का पूर्वाभ्यास करता है, फिर कक्ष में शांत, आत्मविश्वासी भाव प्रस्तुत करता है व घबराहट छिपाता है, और प्रदर्शन केवल बाद में मित्रों के बीच छोड़ता है। किस सिद्धांतकार का ढाँचा इसे अग्र-मंच व पृष्ठ-मंच प्रभाव-प्रबंधन के रूप में सर्वाधिक प्रत्यक्षतः विश्लेषित करता है?

    1. Harold Garfinkel
    2. Alfred Schutz
    3. Talcott Parsons
    4. Erving Goffman
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — Erving Goffman

    अग्र-मंच, पृष्ठ-मंच व प्रभाव-प्रबंधन Goffman की नाट्यशास्त्रीय संकल्पनाएँ हैं। Garfinkel का नृजातिपद्धतिविज्ञान उन विधियों का अध्ययन करता है जो गतिविधि को बोधगम्य बनाती हैं और उल्लंघन-प्रयोगों के लिए जाना जाता है, मंचित प्रदर्शन के लिए नहीं। Schutz जीवन-जगत् व प्ररूपण का सिद्धांत देते हैं, व Parsons सामाजिक तंत्र के स्तर पर कार्य करते हैं, इनमें से कोई इसे प्रबंधित प्रदर्शन के रूप में नहीं देखता।
  8. व्याख्यात्मक सांस्कृतिक विश्लेषण के लक्ष्य के रूप में "सघन वर्णन (thick description)" वाक्यांश सर्वाधिक निकटता से किससे जुड़ा है:

    1. Claude Levi-Strauss (लेवी-स्ट्रॉस)
    2. Clifford Geertz
    3. Bronislaw Malinowski
    4. G.H. Mead
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — Clifford Geertz

    Geertz ने सघन वर्णन को व्याख्यात्मक नृविज्ञान की विधि बनाया, किसी कृत्य को उसके परतदार अर्थों हेतु पढ़ते हुए। Levi-Strauss मिथक व नातेदारी में द्विआधारी विरोधों के संरचनावादी हैं; Malinowski ट्रोब्रिआंड के क्षेत्र-कार्य प्रकार्यवादी हैं; Mead स्व की सामाजिक उत्पत्ति का सिद्धांत देते हैं। इन तीनों में से किसी के पास 'सघन वर्णन' पद नहीं।
  9. एक शोधकर्ता तर्क देता है कि विद्यालय वे रुचियाँ, शिष्टाचार व बोलने के ढंग हस्तांतरित करता है जो उच्च-वर्गीय बच्चों के पास पहले से हैं, जिससे जो वस्तुतः वंशागत लाभ है उसे सभी शुद्ध योग्यता के रूप में अनुभव करते हैं, और वंचित परिणाम को न्यायसंगत मान लेते हैं। यह विश्लेषण सर्वाधिक प्रत्यक्षतः किस संकल्पना-समूह पर आधारित है?

    1. Bourdieu की सांस्कृतिक पूँजी व प्रतीकात्मक हिंसा
    2. Foucault का सर्वदर्शी कारागार, अनुशासनात्मक निगरानी व जनसंख्या पर जैव-शक्ति
    3. Habermas की आदर्श संभाषण-स्थिति व अविकृत संचारात्मक क्रिया
    4. Giddens की संरचना की द्वैतता व सुविज्ञ प्रतिवर्ती कर्ता
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Bourdieu की सांस्कृतिक पूँजी व प्रतीकात्मक हिंसा

    रुचियों व शिष्टाचार के हस्तांतरण द्वारा योग्यता के वेश में छिपा वंशागत लाभ सांस्कृतिक पूँजी है; उस शक्ति को स्वाभाविक व न्यायसंगत मान लेना, जिसे प्रभुत्वाधीन भी स्वीकार कर लें, प्रतीकात्मक हिंसा है — दोनों Bourdieu के। Foucault का सर्वदर्शी कारागार अनुशासनात्मक निगरानी के बारे में है, वंशागत रुचि के नहीं; Habermas की आदर्श संभाषण-स्थिति अविकृत संप्रेषण का मानक है; Giddens की संरचना की द्वैतता एक सामान्य संरचना-कर्तृत्व दावा है, इनमें से कोई इस योग्यता-छद्म तंत्र को इतनी सटीकता से नहीं पकड़ता।
  10. किसी भारतीय विचारक का उसकी विशिष्ट संकल्पना से कौन-सा युग्मन सही है?

    1. G.S. Ghurye — जाति-उन्मूलन व उसके उपचार के रूप में धर्मांतरण
    2. A.R. Desai — जाति-व्यवस्था के भीतर गतिशीलता के रूप में संस्कृतीकरण
    3. M.N. Srinivas — संस्कृतीकरण व प्रभुत्वशाली जाति
    4. Irawati Karve — सामाजिक सुधार के आधार के रूप में न्यासिता
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — M.N. Srinivas — संस्कृतीकरण व प्रभुत्वशाली जाति

    संस्कृतीकरण व प्रभुत्वशाली जाति M.N. Srinivas की संकल्पनाएँ हैं। 'जाति-उन्मूलन' Ambedkar का है, Ghurye का नहीं, जो भारतविद्यात्मक पद्धति व जाति के लक्षणों के लिए जाने जाते हैं। 'संस्कृतीकरण' Desai का नहीं हो सकता, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद का मार्क्सवादी पाठ दिया; और 'न्यासिता' Gandhi का है, Karve का नहीं, जिन्होंने नातेदारी-व्यवस्था का अध्ययन किया।
  11. श्रीपुरम का Andre Beteille का अध्ययन मुख्यतः यह दिखाने के लिए स्मरण किया जाता है कि:

    1. जाति-क्रम केवल कर्मकांडीय शुद्धता से तय होता है और समय के साथ कभी नहीं बदल सकता
    2. गाँव में वर्ग-स्थिति पूर्णतः व स्थायी रूप से जाति-स्थिति से निर्धारित होती है
    3. गाँवों में राजनीतिक शक्ति स्वतः व पूर्णतः उच्चतम कर्मकांडीय जाति-क्रम से व्युत्पन्न होती है
    4. जाति, वर्ग व शक्ति स्तरीकरण के भिन्न आयाम हैं जिनका संपाती होना आवश्यक नहीं
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — जाति, वर्ग व शक्ति स्तरीकरण के भिन्न आयाम हैं जिनका संपाती होना आवश्यक नहीं

    Beteille का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि जाति, वर्ग व शक्ति विश्लेषणात्मक रूप से भिन्न अक्ष हैं जो श्रीपुरम में परस्पर अलग हो रहे थे, अतः उच्च कर्मकांडीय क्रम अब आर्थिक वर्ग या राजनीतिक शक्ति की गारंटी नहीं देता। शेष विकल्प तीनों आयामों के उसी संपात का दावा करते हैं जिसे चुनौती देने के लिए उनका अध्ययन लिखा गया, अतः उनके तर्क को उलट देते हैं।
  12. The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism में वेबर का तर्क एक विशुद्ध भौतिकवादी इतिहास को चुनौती के रूप में सर्वोत्तम रूप से पढ़ा जाता है क्योंकि वह दावा करता है कि:

    1. धार्मिक विचारों की किसी आर्थिक व्यवस्था से अनभिप्रेत कारणात्मक आत्मीयता हो सकती है
    2. आर्थिक हित सदैव व सर्वत्र धार्मिक विश्वास के एकमात्र अंतर्निहित कारण होते हैं
    3. प्रोटेस्टेंट सिद्धांत व्यापारियों द्वारा अपने लाभ को उचित ठहराने हेतु जानबूझकर रचा गया था
    4. जहाँ भी कोई धर्म कठोर परिश्रम का उपदेश दे, वहाँ पूँजीवाद अनिवार्यतः उत्पन्न होगा
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — धार्मिक विचारों की किसी आर्थिक व्यवस्था से अनभिप्रेत कारणात्मक आत्मीयता हो सकती है

    वेबर का बिंदु एक वरणात्मक आत्मीयता है: तपस्वी प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र ने अनभिप्रेत रूप से उस अनुशासित, पुनर्निवेशी आचरण को पोषित किया जो आधुनिक पूँजीवाद के अनुकूल था, अतः विचार आर्थिक जीवन गढ़ सकते हैं — सब कुछ आर्थिक आधार में घटाने का प्रत्युत्तर। वे न यह कहते हैं कि हित विश्वास का कारण हैं (वही भौतिकवाद जिसका वे उत्तर दे रहे हैं), न यह कि सिद्धांत एक कुटिल रचना थी, न यह कि कोई भी परिश्रम-प्रशंसक धर्म पूँजीवाद की गारंटी देता है; उनका तर्क तपस्वी प्रोटेस्टेंटवाद तक विशिष्ट है।
  13. निम्नलिखित में से कौन-से कथन Marx व Weber के बीच सही विरोधाभास प्रस्तुत करते हैं?

    1. Marx सामाजिक व्यवस्था को मुख्यतः उत्पादन-संबंधों से समझाते हैं, जबकि Weber आग्रह करते हैं कि विचार व अर्थ भी इतिहास गढ़ते हैं
    2. Marx वर्ग को स्वामित्व में निहित मानते हैं, जबकि Weber स्तरीकरण के पृथक आयामों के रूप में स्थिति व दल जोड़ते हैं
    3. दोनों का मानना था कि नौकरशाही सर्वहारा क्रांति के बाद यूँ ही विलुप्त हो जाएगी
    4. Weber की पद्धति व्याख्यात्मक बोध (Verstehen) पर केंद्रित है, जो Marx का आरंभ-बिंदु नहीं है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Marx सामाजिक व्यवस्था को मुख्यतः उत्पादन-संबंधों से समझाते हैं, जबकि Weber आग्रह करते हैं कि विचार व अर्थ भी इतिहास गढ़ते हैं; B — Marx वर्ग को स्वामित्व में निहित मानते हैं, जबकि Weber स्तरीकरण के पृथक आयामों के रूप में स्थिति व दल जोड़ते हैं; D — Weber की पद्धति व्याख्यात्मक बोध (Verstehen) पर केंद्रित है, जो Marx का आरंभ-बिंदु नहीं है

    Marx का भौतिकवाद उत्पादन-संबंधों को अग्रभूमि में रखता है, Weber विचारों का कारणात्मक भार जोड़ते हैं (प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र); Marx का वर्ग स्वामित्व पर टिका है जबकि Weber की त्रिविध योजना वर्ग, स्थिति व दल को अलग करती है; और Verstehen विशिष्ट रूप से वेबरीय है। यह दावा कि दोनों नौकरशाही के विलुप्त होने की आशा रखते थे, असत्य है: Weber तर्कीकृत नौकरशाही को लगभग अपरिहार्य, एक लौह-पिंजर, मानते थे, ऐसा कुछ नहीं जिसे क्रांति घोल दे।
  14. निम्नलिखित में से कौन-से हाल के व संघर्ष सिद्धांत में किसी विचारक को किसी विचार से सही मिलाते हैं?

    1. Louis Althusser — वैचारिक राज्य-तंत्र व अंतराह्वान
    2. Ralf Dahrendorf — अनिवार्यतः समन्वित संगठनों में सत्ता पर आधारित संघर्ष
    3. Lewis Coser — सामाजिक संघर्ष के एकीकारी प्रकार्य
    4. Michel Foucault — सामाजिक तंत्र की AGIL प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षाएँ
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Louis Althusser — वैचारिक राज्य-तंत्र व अंतराह्वान; B — Ralf Dahrendorf — अनिवार्यतः समन्वित संगठनों में सत्ता पर आधारित संघर्ष; C — Lewis Coser — सामाजिक संघर्ष के एकीकारी प्रकार्य

    वैचारिक राज्य-तंत्र व अंतराह्वान Althusser के हैं; अनिवार्यतः समन्वित संगठनों में सत्ता पर आधारित संघर्ष Dahrendorf का है; सामाजिक संघर्ष के प्रकार्य Coser के हैं। Foucault वाला विकल्प असत्य है: AGIL Parsons की प्रकार्यवादी योजना है, जबकि Foucault शक्ति/ज्ञान, अनुशासन व सर्वदर्शी कारागार के लिए जाने जाते हैं।
  15. व्याख्यात्मक व परिघटनात्मक परंपराओं के बारे में कौन-से कथन सही हैं?

    1. Mead के लिए स्व में एक आवेगशील 'I' व एक सामाजिक रूप से परावर्तित 'Me' शामिल है, और बालक सामान्यीकृत अन्य का दृष्टिकोण लेना सीख जाता है
    2. Schutz मानते हैं कि रोज़मर्रा जीवन एक स्वतःसिद्ध जीवन-जगत् व साझा प्ररूपणों पर टिका है
    3. Garfinkel के उल्लंघन-प्रयोग अलक्षित पृष्ठभूमि-अपेक्षाओं को दृश्यमान बनाने हेतु रचे गए हैं
    4. Geertz संस्कृति को निश्चित जैविक आवश्यकताओं का समुच्चय मानते हैं जिन्हें प्रत्येक संस्था पूरा करे
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Mead के लिए स्व में एक आवेगशील 'I' व एक सामाजिक रूप से परावर्तित 'Me' शामिल है, और बालक सामान्यीकृत अन्य का दृष्टिकोण लेना सीख जाता है; B — Schutz मानते हैं कि रोज़मर्रा जीवन एक स्वतःसिद्ध जीवन-जगत् व साझा प्ररूपणों पर टिका है; C — Garfinkel के उल्लंघन-प्रयोग अलक्षित पृष्ठभूमि-अपेक्षाओं को दृश्यमान बनाने हेतु रचे गए हैं

    Mead का I/Me व सामान्यीकृत अन्य, Schutz का जीवन-जगत् व प्ररूपण, तथा Garfinkel का उल्लंघन-द्वारा-दृश्यता सभी सटीक हैं। Geertz वाला विकल्प दोहरे रूप से असत्य है: वह Malinowski के जैविक-आवश्यकता प्रकार्यवाद का वर्णन करता है, जबकि Geertz संस्कृति को अर्थ के जाल मानते हैं जिन्हें सघन वर्णन से पढ़ा जाए।
  16. भारतीय सामाजिक विचारकों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. Ambedkar ने तर्क दिया कि बहिर्विवाही समूहों पर आरोपित अंतर्विवाह वह तंत्र है जो जाति को रचता व बनाए रखता है
    2. जाति के प्रति Ghurye का अध्ययन भारतविद्यात्मक, पाठ-आधारित स्रोतों पर बहुत निर्भर था
    3. Gandhi की सामाजिक दृष्टि सर्वोदय, न्यासिता व ग्राम स्वराज पर केंद्रित थी
    4. Irawati Karve विकास के निर्भरता-सिद्धांत के सूत्रण के लिए सर्वाधिक जानी जाती हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Ambedkar ने तर्क दिया कि बहिर्विवाही समूहों पर आरोपित अंतर्विवाह वह तंत्र है जो जाति को रचता व बनाए रखता है; B — जाति के प्रति Ghurye का अध्ययन भारतविद्यात्मक, पाठ-आधारित स्रोतों पर बहुत निर्भर था; C — Gandhi की सामाजिक दृष्टि सर्वोदय, न्यासिता व ग्राम स्वराज पर केंद्रित थी

    Ambedkar का विश्लेषण बहिर्विवाही समूहों पर आरोपित अंतर्विवाह को जाति का रचक व अनुरक्षक तंत्र बनाता है; Ghurye भारतविद्यात्मक, पाठ-आधारित परंपरा में कार्यरत थे; Gandhi का कार्यक्रम सर्वोदय, न्यासिता व ग्राम स्वराज था। Karve वाला दावा असत्य है: वे भारत भर में नातेदारी-व्यवस्था के मानचित्रण के लिए जानी जाती हैं, जबकि निर्भरता-सिद्धांत लैटिन अमेरिकी विकास-विवादों का है, उनका नहीं।