सामाजिक आंदोलन: प्रकृति, प्रकार, सिद्धांत, भारतीय आंदोलन एवं नागरिकता

यह अध्याय मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान (XH) पेपर के खंड XH6.7, “सामाजिक आंदोलन”, का उत्तर देता है — जो XH6 समाजशास्त्र के आठ खंडों में से एक है, और XH6 आवेदन के समय चुने जाने वाले छह वैकल्पिक खंडों में से एक है। यह बताता है कि सामाजिक आंदोलन क्या है और वह भीड़, फ़ैशन या दबाव-समूह से कैसे भिन्न है; सुधार, विद्रोह, पुनरुत्थान, क्रांति, सशस्त्र विप्लव (insurrection) व प्रति-आंदोलन का मानक वर्गीकरण, तथा आंदोलन व सामाजिक परिवर्तन का दुतरफ़ा संबंध; पाठ्यक्रम में नामित चार सिद्धांत — संरचनात्मक-प्रकार्यवादी, मार्क्सवादी, संसाधन-संघटन (McCarthy व Zald) व नवीन सामाजिक आंदोलन (Touraine, Melucci); भारत के किसान, श्रमिक, दलित, महिला व पर्यावरण आंदोलन, उनके सामाजिक आधार, नेतृत्व, विचारधारा व क्रिया-कलाप के माध्यम से; तथा आंदोलनों का राज्य, नागरिक समाज, भूमंडलीकरण व नागरिकता से संबंध।

1. प्रकृति, परिभाषाएँ व विशेषताएँ

सामाजिक आंदोलन अनेक लोगों का निरंतर, संगठित सामूहिक प्रयास है जो समाज में परिवर्तन लाने या उसका प्रतिरोध करने हेतु, मुख्यतः स्थापित संस्थागत मार्गों के बाहर, चलाया जाता है। यह एकल कार्य नहीं बल्कि अनेक का सामूहिक कार्य है; इसमें किसी एकबारगी दंगे या क्षणिक सनक के विपरीत निरंतरता व कुछ संगठन होता है; यह परिवर्तन की ओर उन्मुख होता है — उसे बढ़ाने या उसका विरोध करने; और यह साझी विचारधारा पर टिका होता है जो किसी शिकायत, लक्ष्य व प्रतिपक्षी को नामित करती है। Herbert Blumer ने आंदोलनों को “जीवन की नई व्यवस्था स्थापित करने के सामूहिक उपक्रम” कहा, जो अशांति से उपजते हैं, जबकि Rudolf Heberle ने बल दिया कि इनकी मूल प्रतिबद्धता सामाजिक व्यवस्था बदलने की होती है, जिसे समूह-चेतना, विचारधारा व कुछ संगठन का सहारा होता है।

  • अनेक लोगों द्वारा मिलकर किया गया सामूहिक कार्य, न कि अकेले व्यक्ति द्वारा उठाई गई शिकायत।
  • समय के साथ संगठन व निरंतरता — नेता, कार्यकर्ता, संसाधन व श्रम-विभाजन — जो आंदोलन को भीड़, आतंक या सनक से अलग करते हैं।
  • एक परिवर्तन-उन्मुखता: सामाजिक व्यवस्था के किसी अंश को बदलने, या उसके बदलने से बचाने, का लक्ष्य।
  • एक विचारधारा जो शिकायत, लक्ष्य व प्रतिपक्षी को परिभाषित करती है और क्रिया को वैधता देती है, तथा एक सामूहिक पहचान, प्रतिभागियों में साझे उद्देश्य का बोध।
  • क्रिया का एक संग्रह (repertoire) — अर्ज़ियाँ, जुलूस, हड़तालें, सत्याग्रह, बहिष्कार, कभी-कभी तोड़फोड़ — जो आंशिकतः नित्य संस्थागत राजनीति के बाहर होता है।
⚠️ आंदोलन न भीड़ है, न दबाव-समूह
भीड़, दंगा, आतंक, फ़ैशन व जनमत — सभी सामूहिक व्यवहार हैं, पर इनमें आंदोलन का संगठन, निरंतरता व विचारधारा नहीं होती। दबाव-समूह व्यवस्था बदलने के बजाय किसी मौजूदा हित की रक्षा हेतु संस्थागत मार्गों के भीतर काम करता है। आंदोलन संगठन बना या प्रयोग कर सकता है, पर वह उनमें से किसी एक से व्यापक होता है।

2. सामाजिक आंदोलनों के प्रकार व सामाजिक परिवर्तन

आंदोलनों को उस परिवर्तन की दिशा व गहराई से वर्गीकृत किया जाता है जिसकी वे माँग करते हैं। व्याप्ति सीमित, टुकड़ों में सुधार से लेकर किसी सामाजिक व्यवस्था के संपूर्ण रूपांतरण तक जाती है; रुख़ परिवर्तन को बढ़ाने से लेकर अतीत को लौटाने या परिवर्तन का पूरी तरह प्रतिरोध करने तक।

मानक वर्गीकरण
प्रकारक्या चाहता हैउदाहरण
सुधारमौजूदा व्यवस्था व उसके नियमों के भीतर सीमित, विशिष्ट परिवर्तनअस्पृश्यता या दहेज के विरुद्ध अभियान
क्रांतिसमूची राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था का मूलभूत, प्रायः तीव्र रूपांतरणकिसी शासन का उसके वर्ग-ढाँचे सहित तख़्तापलट
विद्रोहसमूची व्यवस्था बदलने की सुविचारित योजना के बिना, सत्तासीनों की खुली अवज्ञाकिसी शासक या ज़मींदार के विरुद्ध बग़ावत
पुनरुत्थान (पुनर्जीवन)किसी परंपरा या विलुप्त-सी प्रतीत होती अतीत की जीवन-शैली की ओर वापसी, या उसका शुद्धिकरणधार्मिक पुनरुत्थान या परंपरा-की-ओर-लौटो आंदोलन
सशस्त्र विप्लवसरकार या सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र, प्रायः स्थानीय उभारकिसी क्षेत्र में सत्ता पर सशस्त्र क़ब्ज़ा
प्रति-आंदोलनकिसी अन्य आंदोलन का विरोध कर उसकी उपलब्धियाँ पलटने हेतु उठा संघटनकिसी पूर्व आंदोलन द्वारा जीते गए सुधार का प्रतिरोध

आंदोलन सामाजिक परिवर्तन से दुतरफ़ा संबंध रखते हैं। वे उसके कारक हैं: सुधार आंदोलन व्यवस्था के भीतर क़ानून व प्रथा बदलता है, क्रांतिकारी आंदोलन व्यवस्था को ही बदल देता है। पर वे परिवर्तन के उत्पाद भी हैं — औद्योगीकरण, नगरीकरण, नए संचार-साधन व बढ़ती आकांक्षाएँ वे शिकायतें व संजाल रचते हैं जो आंदोलन को संभव बनाते हैं। हर आंदोलन परिवर्तन को आगे नहीं धकेलता: पुनरुत्थानवादी आंदोलन किसी खोई व्यवस्था को लौटाना चाहते हैं और प्रति-आंदोलन यथास्थिति की रक्षा हेतु संघटित होते हैं, अतः आंदोलन परिवर्तन का इंजन जितना, उस पर लगा ब्रेक भी हो सकता है। David Aberle ने आंदोलनों को दो अक्षों पर छाँटा — परिवर्तन का केंद्र (locus) (व्यक्ति या समूचा समाज) व उसकी मात्रा (आंशिक या संपूर्ण) — जिससे वैकल्पिक (alternative), उद्धारक (redemptive), सुधारवादी (reformative) व रूपांतरकारी (transformative) आंदोलन मिलते हैं।

3. संरचनात्मक-प्रकार्यवादी व मार्क्सवादी सिद्धांत

संरचनात्मक-प्रकार्यवादी दृष्टिकोण आंदोलन को किसी ऐसी सामाजिक व्यवस्था में, जो सामान्यतः संतुलन में रहती है, तनाव (strain) का लक्षण मानता है। जब तीव्र परिवर्तन व्यवस्था की लोगों को समेटने की क्षमता से आगे निकल जाता है, तो मानक कमज़ोर पड़ते हैं (Durkheim का अनोमी/आदर्शहीनता, anomie) और यह तनाव सामूहिक व्यवहार के रूप में फूटता है। Neil Smelser का मूल्य-वर्धित (value-added) सिद्धांत (1962) इसका प्रतिष्ठित कथन है: छह दशाएँ क्रम से मिलनी चाहिए — संरचनात्मक अनुकूलता (conduciveness), संरचनात्मक तनाव, समस्या को नामित करती सामान्यीकृत मान्यता, कोई उत्प्रेरक (precipitating) घटना, प्रतिभागियों का संघटन, तथा सामाजिक नियंत्रण का संचालन। एक सम्बद्ध धारा विद्रोह की व्याख्या सापेक्ष वंचन (relative deprivation) से करती है — लोगों की अपेक्षा व प्राप्ति के बीच अनुभूत अंतर (Ted Gurr) — एक अंतर जो तब तेज़ी से चौड़ा हो सकता है जब बढ़ती समृद्धि का दौर अचानक पलट जाता है (James Davies का J-वक्र)।

मार्क्सवादी विवरण उस चित्र को अस्वीकार करता है जिसमें संतुलन को केवल तनाव विचलित करता है। आंदोलन, विशेषकर श्रमिक आंदोलन, पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली में अंतर्निहित वर्गों के संरचनात्मक संघर्ष को व्यक्त करते हैं। मज़दूरी-श्रम का शोषण व अतिरिक्त मूल्य (surplus value) का निष्कर्षण वस्तुपरक वर्ग-हित उत्पन्न करते हैं; ज्यों-ज्यों मज़दूर स्वतः-वर्ग (class-in-itself) (महज़ एक आर्थिक कोटि) से स्व-हेतु-वर्ग (class-for-itself) (सचेत व संगठित) की ओर बढ़ते हैं, स्वतःस्फूर्त प्रतिरोध एक क्रांतिकारी आंदोलन बन सकता है जिसका लक्ष्य सुधार नहीं, उत्पादन-संबंधों का रूपांतरण होता है। यहाँ विचारधारा वर्ग-चेतना है जो शासक वर्ग के शासक विचारों के सम्मुख खड़ी होती है। Antonio Gramsci ने जोड़ा कि प्रभुत्वशाली वर्ग आंशिकतः वर्चस्व (hegemony) से शासन करता है — नागरिक समाज में जीती गई सहमति — अतः प्रति-वर्चस्वी आंदोलन को केवल राज्य नहीं, विचारों व संस्कृति को भी चुनौती देनी होती है।

🎯 दोनों विवरण क्यों असहमत हैं
प्रकार्यवादी आंदोलन को ऐसा विघटन मानता है जिसे पुनः समेटना है और पूछता है कि किस तनाव ने उसे जन्म दिया; मार्क्सवादी उसे वास्तविक वर्ग-हितों की तर्कसंगत खोज मानता है और पूछता है कि वह किसके हितों की सेवा करता है। पहला प्रतिरोध को असामान्य मानता है, दूसरा इतिहास का सामान्य इंजन।

4. संसाधन-संघटन व नवीन सामाजिक आंदोलन

1970 के दशक तक तनाव-सिद्धांत अपर्याप्त दिखने लगे: शिकायतें कमोबेश स्थिर रहती हैं, फिर भी आंदोलन उठते-गिरते हैं, अतः शिकायत अकेली यह नहीं बता सकती कि आंदोलन कब प्रकट होगा। संसाधन-संघटन सिद्धांत (resource mobilization theory), जिसे John McCarthy व Mayer Zald (1977) ने प्रस्तुत किया, प्रश्न को “लोग क्यों असंतुष्ट हैं” से हटाकर “वे कैसे संगठित होते हैं” पर ले जाता है। आंदोलन असंतोष से कम, उन संसाधनों से अधिक बनते हैं — धन, श्रम, समय, कौशल, नेतृत्व, मीडिया तक पहुँच, वैधता — जिन्हें संघटित किया जा सके, और उन सामाजिक आंदोलन संगठनों (SMOs) से जो उन्हें जुटाते व लगाते हैं। प्रतिभागियों को तर्कसंगत कर्ता माना जाता है, अतः बाहरी समर्थन, पेशेवर संगठक व मुफ़्तख़ोर समस्या (free-rider problem) (Mancur Olson की पहेली कि कोई तर्कसंगत व्यक्ति उस सामूहिक वस्तु के लिए क्यों चुकाए जो औरों को मुफ़्त मिलती है) केंद्रीय हो जाते हैं। एक परवर्ती धारा, राजनीतिक प्रक्रिया सिद्धांत (Charles Tilly, Doug McAdam, Sidney Tarrow), राजनीतिक अवसर-संरचना जोड़ती है: आंदोलन तब बढ़ता है जब व्यापक राजनीतिक व्यवस्था उसके लिए अवसर खोलती है।

नवीन सामाजिक आंदोलन (NSM) सिद्धांत यूरोप में उन आंदोलनों की व्याख्या हेतु उठा जो 1960 के दशक के बाद फैले — पर्यावरण, नारीवादी, शांति, छात्र व नागरिक-अधिकार आंदोलन — जो वर्ग-व-पुनर्वितरण के साँचे में नहीं बैठते थे। Alain Touraine हेतु उत्तर-औद्योगिक (क्रमादेशित, programmed) समाज का केंद्रीय संघर्ष अब उत्पादन के स्वामित्व पर नहीं बल्कि ऐतिहासिकता (historicity) पर है — समाज की स्वयं को उत्पादित करने की क्षमता — और नए आंदोलन उसे चुनौती देने वाले प्रमुख कर्ता हैं। Alberto Melucci ने ध्यान सामूहिक पहचान (collective identity) की ओर मोड़ा: जटिल समाजों में आंदोलन राज्य पर क़ब्ज़े से कम, रोज़मर्रा जीवन में नए अर्थ, संकेत व पहचान गढ़ने में अधिक लगे होते हैं, अतः उनके संजाल व सांकेतिक चुनौतियाँ उनके दृश्य प्रतिरोध जितनी ही महत्वपूर्ण हैं। लेखक NSM की जो विशेषताएँ गिनाते हैं वे हैं: मज़दूरी के बजाय पहचान, संस्कृति, जीवन-गुणवत्ता व स्वायत्तता की चिंता; एकल वर्ग के बजाय नए मध्यवर्ग में आधार; नौकरशाही दलों के बजाय ढीले, सहभागी, संजाल-रूप; और राज्य-सत्ता पर क़ब्ज़े के बजाय नागरिक समाज में क्रिया।

⚠️ भिन्न प्रश्न, प्रतिद्वंद्वी उत्तर नहीं
संसाधन-संघटन पूछता है कि आंदोलन कैसे संगठित होता है; नवीन सामाजिक आंदोलन सिद्धांत पूछता है कि वह अब किस बारे में है। आम भूल है पहचान व संस्कृति की ओर मोड़ का श्रेय संसाधन-संघटन सिद्धांत को देना — वह तो नवीन सामाजिक आंदोलनों का योगदान है — या नवीन सामाजिक आंदोलनों को संसाधन-संघटन का महज़ यूरोपीय नया नाम मान लेना।

5. भारत में सामाजिक आंदोलन: आधार, नेतृत्व, विचारधारा, क्रिया

भारतीय आंदोलनों को चार प्रश्नों से पढ़ा जाता है — उनका सामाजिक आधार (कौन भाग लेता है), उनका नेतृत्व, उनकी विचारधारा व उनके क्रिया-कलाप (जो संग्रह वे प्रयोग करते हैं)। पाठ्यक्रम में नामित पाँचों औपनिवेशिक व उत्तर-औपनिवेशिक दोनों कालों में फैले हैं।

पाँच आंदोलन एक दृष्टि में
आंदोलनसामाजिक आधार व नेतृत्वविचारधाराविशिष्ट क्रिया
किसानकाश्तकार, बटाईदार व छोटे किसान; आरंभिक विद्रोह स्थानीय, बाद में किसान सभाओं व 1970 के दशक के उत्तरार्ध से किसान संघों के नेतृत्व मेंज़मींदार-विरोधी व उपनिवेश-विरोधी माँगों से हरित-क्रांति-पश्चात् मूल्यों व ग्राम–नगर विभाजन के एजेंडे तकनील विद्रोह (1859–60), चंपारण (1917), बारदोली (1928), तेभागा (1946), तेलंगाना (1946–51); बाद में BKU व शेतकरी संगठन
श्रमिकमिलों, खदानों व कारखानों के औद्योगिक मज़दूर; ट्रेड-यूनियन नेता, प्रायः राष्ट्रवादी व वाम दलों से जुड़ेट्रेड-यूनियनवाद और, उसके वाम-पक्ष में, वर्ग-संघर्ष व समाजवादसंघीकरण, हड़तालें व सामूहिक सौदेबाज़ी; AITUC (1920) व बाद के महासंघ
दलितपूर्व-अस्पृश्य जातियाँ; ज्योतिराव फुले व B.R. आंबेडकर, बाद में दलित पैंथर्सजाति का उन्मूलन, स्वाभिमान, समानता व जाति-हिंदू धर्म से धर्मांतरणसत्यशोधक समाज (1873), महाड़ सत्याग्रह (1927), 1956 का बौद्ध धर्म में धर्मांतरण, पैंथर उग्रता (1972)
महिलापहले मध्यवर्गीय सुधारक, फिर एक व्यापक स्वायत्त आंदोलन; सुधारक, AIWC (1927), 1970–80 के दशक के समूहसामाजिक सुधार (सती, विधवा-पुनर्विवाह, शिक्षा) से अधिकार, समानता, स्वायत्तता व हिंसा तथा देह के प्रश्न तकविधिक सुधार, दहेज-विरोधी व बलात्कार-विरोधी अभियान, SEWA द्वारा निर्धन महिलाओं का संगठन
पर्यावरणवन व नदी समुदाय, प्रायः महिलाएँ व आदिवासी; बहुगुणा, भट्ट, पाटकर आदिविस्थापनकारी ‘विकास’ के सम्मुख जीविका व पारिस्थितिकी; निर्धनों का पर्यावरणवादचिपको (1973), अपिको (1983), नर्मदा बचाओ आंदोलन (1980 के दशक के मध्य से)

इनमें दो लंबी बहसें चलती हैं। पहली किसान पर है: क्या भारत के कृषि-संघर्ष A.R. देसाई के मार्क्सवादी दृष्टिकोण से वर्ग-संघर्ष के रूप में सबसे अच्छे पढ़े जाते हैं — D.N. धनगरे की ‘Peasant Movements in India, 1920–1950’ इन संघर्षों का मानक समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण है — बनाम वे पाठ जो जाति व समुदाय को बराबर भार देते हैं। दूसरी पारिस्थितिकी पर है: Ramachandra Guha का, Joan Martínez-Alier के साथ, तर्क है कि भारतीय पर्यावरणवाद मुख्यतः ‘निर्धनों का पर्यावरणवाद’ है — उन लोगों द्वारा जीविका की रक्षा जिन्हें कोई बड़ी परियोजना विस्थापित कर देती, न कि संपन्न पश्चिम की वन्य-संरक्षण चिंता।

ℹ️ चारों दृष्टियाँ साथ प्रयोग करें
एक ही घटना सामाजिक आधार से भिन्न पढ़ी जाती है: चिपको एक साथ पर्यावरण, महिला व जीविका आंदोलन है, और दलित तथा महिला दोनों आंदोलन अभिजन-नेतृत्व वाले सुधार से आरंभ होकर बाद में स्वायत्त, नीचे-से-ऊपर मुखरता की ओर मुड़े। आधार, नेतृत्व, विचारधारा व क्रिया को साथ प्रयोग करना है, किसी आंदोलन को एक ही ख़ाने में डालना नहीं।

6. आंदोलन, नागरिक समाज, भूमंडलीकरण व नागरिकता

आंदोलन राज्य व व्यक्ति के बीच की उस जगह में काम करता है जिसे नागरिक समाज (civil society) कहते हैं — स्वैच्छिक संगठनों, संघों, NGO, प्रेस व सार्वजनिक बहस का क्षेत्र। राज्य से उसका संबंध द्वैधपूर्ण है: आंदोलन राज्य पर माँगें रखते हैं, उससे दमित या समायोजित होते हैं, और तब आंशिकतः उसमें समा सकते हैं जब उनके नेता सरकार में जाएँ या उनका ध्येय क़ानून बन जाए। Gramsci के अनुसार नागरिक समाज वह भूमि है जिस पर वर्चस्व बनता भी है और लड़ा भी जाता है; Habermas के सार्वजनिक क्षेत्र (public sphere) के विचार के अनुसार आंदोलन वह तरीक़ा हैं जिससे एक स्वस्थ नागरिक समाज सार्वजनिक बहस को नवीकृत करता और राज्य व बाज़ार पर अंकुश रखता है।

भूमंडलीकरण (globalization) ने आंदोलनों के लक्ष्य व औज़ार दोनों बदल दिए हैं, और इस पर बहस दोतरफ़ा चलती है। एक ओर, वैश्विक व्यापार-नियम, बहुराष्ट्रीय पूँजी व अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ ऐसे नए प्रतिपक्षी बन जाती हैं जो किसी एक राज्य की पहुँच से परे हैं, अतः आंदोलन अंतरराष्ट्रीय संजालों में ऊपर की ओर फैलते (scale up) हैं — वैकल्पिक-भूमंडलीकरण आंदोलन का नारा कि ‘एक और दुनिया संभव है’, ऋण, जलवायु व मानवाधिकार पर वैश्विक अभियान, जिन्हें सस्ता संचार व सोशल मीडिया सहारा देते हैं। दूसरी ओर, आलोचक कहते हैं कि भूमंडलीकरण पुरानी वर्ग-एकजुटता को खंडित कर सकता है, कि भरपूर-वित्तपोषित अंतरराष्ट्रीय NGO ज़मीनी संघर्षों को दबा या पालतू बना सकते हैं (‘NGO-करण’), और कि कोई अंतरराष्ट्रीय अभियान उन्हीं लोगों से कट सकता है जिनके लिए बोलने का वह दावा करता है।

आंदोलन नागरिकता (citizenship) के संघर्ष भी हैं — कि राजनीतिक समुदाय में कौन शामिल है और सदस्यता उसे किसका हक़दार बनाती है। T.H. Marshall ने विस्तारशील नागरिकता को तीन क़िस्तों में दिखाया: नागरिक (civil) अधिकार (स्वतंत्रता, संपत्ति, न्याय), राजनीतिक अधिकार (मत व पद) व सामाजिक अधिकार (कल्याण, शिक्षा, सुरक्षा), प्रत्येक बारी-बारी से जीते गए। अनेक आंदोलन वस्तुतः इसी नागरिकता के विस्तार की माँगें हैं — श्रमिक आंदोलन सामाजिक अधिकारों के लिए, दलित व महिला आंदोलन उस नागरिक व राजनीतिक समानता के सार के लिए जिसका वादा औपचारिक क़ानून ने किया पर समाज ने रोक रखा। भूमंडलीकरण व प्रवास ने इस प्रश्न को फिर खोल दिया है, सांस्कृतिक व समूह-विभेदी अधिकारों तथा सीमाओं के आर-पार रहने-कमाने वालों के अधिकारों के दावे उठाकर, अतः नागरिकता कोई तय दर्जा नहीं बल्कि विवादित भूमि है।

मुख्य बिंदु

  • सामाजिक आंदोलन निरंतर, संगठित सामूहिक कार्य है, जिसे विचारधारा व सामूहिक पहचान वहन करती है, और जो मुख्यतः संस्थागत मार्गों के बाहर परिवर्तन को बढ़ाने या उसका प्रतिरोध करने हेतु चलता है — यही उसे भीड़, सनक या दबाव-समूह से अलग करता है।
  • प्रकार हैं सुधार, विद्रोह, पुनरुत्थान, क्रांति, सशस्त्र विप्लव व प्रति-आंदोलन। आंदोलन परिवर्तन को चलाते भी हैं और (पुनरुत्थानवादी, प्रति) उसका प्रतिरोध भी करते हैं, और स्वयं परिवर्तन के उत्पाद हैं; Aberle इन्हें केंद्र (व्यक्ति या समाज) व मात्रा (आंशिक या संपूर्ण) से छाँटते हैं।
  • संरचनात्मक-प्रकार्यवादी सिद्धांत आंदोलनों को तनाव व अनोमी की प्रतिक्रिया मानता है (Smelser का छह-चरणीय मूल्य-वर्धित मॉडल; सापेक्ष वंचन, Gurr); मार्क्सवादी सिद्धांत उन्हें अतिरिक्त मूल्य पर वर्ग-संघर्ष मानता है, स्वतः-वर्ग से स्व-हेतु-वर्ग तक, जहाँ Gramsci का वर्चस्व नागरिक समाज में लड़ा जाता है।
  • संसाधन-संघटन सिद्धांत (McCarthy व Zald) बताता है कि आंदोलन तर्कसंगत कर्ताओं द्वारा चलाए SMO के माध्यम से संसाधन कैसे संगठित करते हैं, जहाँ मुफ़्तख़ोर-समस्या व राजनीतिक अवसर केंद्रीय हैं; नवीन सामाजिक आंदोलन सिद्धांत (Touraine की ऐतिहासिकता, Melucci की सामूहिक पहचान) उत्तर-औद्योगिक समाज के पहचान-, संस्कृति- व स्वायत्तता-आधारित आंदोलनों की व्याख्या करता है।
  • भारत के किसान, श्रमिक, दलित, महिला व पर्यावरण आंदोलन सामाजिक आधार, नेतृत्व, विचारधारा व क्रिया से पढ़े जाते हैं — नील विद्रोह, AITUC, फुले व आंबेडकर और उन्नीसवीं सदी के सुधार से लेकर चिपको व नर्मदा बचाओ आंदोलन तक — और Guha (Martínez-Alier के साथ) भारतीय पर्यावरणवाद को मुख्यतः ‘निर्धनों का पर्यावरणवाद’ पढ़ते हैं।
  • आंदोलन राज्य व व्यक्ति के बीच नागरिक समाज में काम करते हैं (Gramsci; Habermas का सार्वजनिक क्षेत्र); भूमंडलीकरण उन्हें अंतरराष्ट्रीय संजालों में फैलाता है पर उन्हें खंडित व ‘NGO-कृत’ भी कर सकता है; और अनेक Marshall की नागरिक, राजनीतिक व सामाजिक नागरिकता के विस्तार के संघर्ष हैं।

अभ्यास प्रश्न (16)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. कौन-सी एक विशेषता सामाजिक आंदोलन को किसी क्षणिक फ़ैशन या एकबारगी दंगे से सबसे स्पष्टता से अलग करती है?

    1. एक ही क्षण किसी सार्वजनिक स्थान पर बहुत बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं
    2. समय के साथ साझी विचारधारा द्वारा वहन किया गया निरंतर व संगठित सामूहिक कार्य
    3. उपस्थित हर व्यक्ति द्वारा साझी की गई एक प्रबल भावनात्मक प्रतिक्रिया
    4. घटना के दौरान संपत्ति व सार्वजनिक अधिकारियों दोनों के विरुद्ध बल का सुनियोजित प्रयोग
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — समय के साथ साझी विचारधारा द्वारा वहन किया गया निरंतर व संगठित सामूहिक कार्य

    आंदोलन में निरंतरता, संगठन व विचारधारा होती है, जो दंगे, आतंक या फ़ैशन में तब भी नहीं होती जब बहुत लोग भाग लें। केवल संख्या, साझी भावना व बल-प्रयोग किसी ऐसी भीड़ में भी हो सकते हैं जो आंदोलन है ही नहीं, अतः इनमें से कोई निर्णायक लक्षण नहीं।
  2. एक वाणिज्य-मंडल अपनी सदस्य कंपनियों हेतु एक मौजूदा कर-रियायत बनाए रखने के लिए औपचारिक परामर्शों के ज़रिए मंत्रियों की पैरवी करता है। मानक समाजशास्त्रीय भेद पर, यह सामाजिक आंदोलन के बजाय दबाव-समूह क्यों है?

    1. इसके सदस्य किसी सामाजिक आंदोलन को प्रभावी होने के लिए जितने चाहिए, उससे कम हैं
    2. यह व्यवसायों का प्रतिनिधित्व करता है, और सामाजिक आंदोलन केवल निर्धन ही बना सकते हैं
    3. यह सामाजिक व्यवस्था बदलने के बजाय किसी मौजूदा हित की रक्षा हेतु संस्थागत मार्गों के भीतर काम करता है
    4. यह केवल शांतिपूर्ण व वैध तरीक़े अपनाता है, जबकि सामाजिक आंदोलन को विध्वंसकारी प्रतिरोध का सहारा लेना ही पड़ता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — यह सामाजिक व्यवस्था बदलने के बजाय किसी मौजूदा हित की रक्षा हेतु संस्थागत मार्गों के भीतर काम करता है

    दबाव-समूह किसी तय हित की रक्षा या वृद्धि हेतु नित्य संस्थागत राजनीति के भीतर काम करता है; आंदोलन परिवर्तन-उन्मुख होता है और बड़े पैमाने पर ऐसे मार्गों के बाहर काम करता है। संख्या, सदस्यों का वर्ग, व तरीक़े शांतिपूर्ण हैं या विध्वंसकारी — ये रेखा नहीं खींचते; आंदोलन बड़े या छोटे, धनी या निर्धन, शांत या विध्वंसकारी हो सकते हैं।
  3. वह आंदोलन जो लोगों से किसी पुरानी, खोई हुई मानी गई परंपरा के शुद्ध रूप की ओर लौटने का आह्वान करता है, किस प्रकार में सबसे उपयुक्त वर्गीकृत होगा?

    1. क्रांतिकारी, क्योंकि यह समूची सामाजिक व्यवस्था को एक साथ रूपांतरित करना चाहता है
    2. सुधार, क्योंकि यह वर्तमान नियमों के भीतर केवल छोटा समायोजन चाहता है
    3. सशस्त्र विप्लव, क्योंकि यह सरकार के विरुद्ध सशस्त्र उभार की योजना बनाता है
    4. पुनरुत्थान, क्योंकि यह किसी खोई-सी प्रतीत होती अतीत की जीवन-शैली की ओर वापसी चाहता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — पुनरुत्थान, क्योंकि यह किसी खोई-सी प्रतीत होती अतीत की जीवन-शैली की ओर वापसी चाहता है

    पुनरुत्थान या पुनर्जीवन आंदोलन पीछे की ओर देखता है, किसी क्षीण मानी गई परंपरा को पुनर्स्थापित या शुद्ध करना चाहता है। क्रांति संपूर्ण अग्रगामी रूपांतरण चाहती है, सुधार व्यवस्था के भीतर सीमित परिवर्तन, और सशस्त्र विप्लव एक सशस्त्र उभार है — इनमें से कोई अतीत की ओर वापसी को नहीं पकड़ता।
  4. एक लंबे अभियान द्वारा स्थानीय परिषदों में महिलाओं हेतु सीटें आरक्षित करने वाला क़ानून जीत लिए जाने के बाद, एक संगठित समूह ख़ास तौर पर उस आरक्षण को रद्द कराने की माँग हेतु बनता है। यह दूसरा समूह किसका उदाहरण है:

    1. प्रति-आंदोलन, क्योंकि यह किसी पूर्व आंदोलन की जीती बात का विरोध कर उसे पलटने हेतु संघटित होता है
    2. पुनरुत्थान आंदोलन, क्योंकि यह दूरस्थ अतीत की किसी परंपरा को पुनर्स्थापित करना चाहता है
    3. क्रांतिकारी आंदोलन, क्योंकि यह समूची राजनीतिक व्यवस्था का तख़्तापलट चाहता है
    4. सुधार आंदोलन, क्योंकि यह स्वीकृत तरीक़ों से मौजूदा क़ानून में क्रमिक व प्रगतिशील सुधार चाहता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — प्रति-आंदोलन, क्योंकि यह किसी पूर्व आंदोलन की जीती बात का विरोध कर उसे पलटने हेतु संघटित होता है

    प्रति-आंदोलन किसी अन्य आंदोलन की सीधी प्रतिक्रिया में उठता है, उसके लाए परिवर्तन का प्रतिरोध या उसे पलटने हेतु। यह किसी पूर्व आंदोलन के विरोध से परिभाषित है, न कि प्राचीन परंपरा लौटाने की इच्छा (पुनरुत्थान), व्यवस्था पलटने (क्रांति) या क़ानून सुधारने (सुधार) से।
  5. दो घटनाएँ वर्णित हैं। पहली में, किसी क्षेत्र के किसान हथियार उठाकर स्थानीय प्रशासनिक कार्यालय व पुलिस चौकियाँ अपने क़ब्ज़े में लेकर एक प्रशासन को खदेड़ देते हैं, पर व्यापक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ने की कोई योजना घोषित नहीं करते। दूसरी में, एक संगठित आंदोलन सरकार गिरा देता है और भू-स्वामी वर्ग तथा जिन संपत्ति-संबंधों पर वह टिका था, उन्हें समाप्त कर देता है। मानक वर्गीकरण पर दोनों को सबसे अच्छे किस रूप में नामित किया जाए?

    1. पहली सुधार आंदोलन और दूसरी प्रति-आंदोलन
    2. पहली सशस्त्र विप्लव और दूसरी क्रांति
    3. पहली क्रांति और दूसरी सशस्त्र विप्लव
    4. दोनों पुनरुत्थान हैं, क्योंकि प्रत्येक किसी पुरानी व्यवस्था की ओर देखती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — पहली सशस्त्र विप्लव और दूसरी क्रांति

    पहली सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र, स्थानीय उभार है जिसमें समूची व्यवस्था बदलने का कार्यक्रम नहीं — सशस्त्र विप्लव। दूसरी राजनीतिक व्यवस्था व उसके अंतर्निहित संपत्ति-संबंधों का मूलभूत रूपांतरण साध लेती है — क्रांति। संरचनात्मक परिवर्तन की गहराई भेद करती है: क्रांति व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ती है, सशस्त्र विप्लव सत्ता हथिया लेता है पर ज़रूरी नहीं कि ऐसा करे।
  6. सामाजिक आंदोलनों व सामाजिक परिवर्तन के संबंध के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. आंदोलन परिवर्तन के कारक होने के साथ-साथ उसके उत्पाद भी हो सकते हैं, क्योंकि औद्योगीकरण व नए संचार-साधन वे शिकायतें व संजाल रचते हैं जो उन्हें संभव बनाते हैं
    2. परिभाषा से हर सामाजिक आंदोलन परिवर्तन को बढ़ाता है, अतः कोई आंदोलन यथास्थिति की रक्षा नहीं कर सकता या किसी पुरानी व्यवस्था को लौटाने का प्रयास नहीं कर सकता
    3. पुनरुत्थानवादी व प्रति-आंदोलन परिवर्तन के इंजन के बजाय उस पर ब्रेक की तरह काम कर सकते हैं
    4. Aberle ने आंदोलनों को अभीष्ट परिवर्तन के केंद्र (व्यक्ति या समूचा समाज) व उसकी मात्रा (आंशिक या संपूर्ण) से विभेदित किया
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    उत्तर: A — आंदोलन परिवर्तन के कारक होने के साथ-साथ उसके उत्पाद भी हो सकते हैं, क्योंकि औद्योगीकरण व नए संचार-साधन वे शिकायतें व संजाल रचते हैं जो उन्हें संभव बनाते हैं; C — पुनरुत्थानवादी व प्रति-आंदोलन परिवर्तन के इंजन के बजाय उस पर ब्रेक की तरह काम कर सकते हैं; D — Aberle ने आंदोलनों को अभीष्ट परिवर्तन के केंद्र (व्यक्ति या समूचा समाज) व उसकी मात्रा (आंशिक या संपूर्ण) से विभेदित किया

    आंदोलन परिवर्तन के उत्पाद भी हैं और कारक भी; पुनरुत्थानवादी व प्रति-आंदोलन परिवर्तन का प्रतिरोध कर सकते हैं; और Aberle की योजना केंद्र व मात्रा के दो अक्ष लेती है। यह दावा कि हर आंदोलन परिवर्तन को बढ़ाता है, ग़लत है: प्रति-आंदोलन व पुनरुत्थानवादी आंदोलन ठीक यथास्थिति की रक्षा या अतीत को लौटाने हेतु ही संघटित होते हैं।
  7. संसाधन-संघटन सिद्धांत, जो आंदोलनों की व्याख्या केवल शिकायत से नहीं बल्कि उन संसाधनों व संगठनों से करता है जिन्हें वे जुटा सकते हैं, सबसे निकटता से किन लेखकों से जुड़ा है?

    1. Alain Touraine व Alberto Melucci
    2. John McCarthy व Mayer Zald
    3. Neil Smelser व Ted Gurr
    4. Karl Marx व Antonio Gramsci
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    उत्तर: B — John McCarthy व Mayer Zald

    संसाधन-संघटन सिद्धांत McCarthy व Zald ने प्रस्तुत किया। Touraine व Melucci नवीन सामाजिक आंदोलनों के सिद्धांतकार हैं; Smelser व Gurr तनाव व सापेक्ष-वंचन परंपरा के; और Marx व Gramsci मार्क्सवादी विवरण के।
  8. एक अध्ययन तर्क देता है कि प्रतिरोध की लहर इसलिए फूटी क्योंकि तीव्र औद्योगिक परिवर्तन ने स्थापित मानकों को कमज़ोर कर यह साझा बोध पैदा किया कि कुछ ग़लत हो गया है, जिसे फिर किसी उत्प्रेरक घटना ने भड़का दिया। यह व्याख्या किस सैद्धांतिक परंपरा की है?

    1. संसाधन-संघटन सिद्धांत, जो संगठनों व संसाधनों पर केंद्रित है
    2. नवीन सामाजिक आंदोलन सिद्धांत, जो पहचान व संस्कृति पर केंद्रित है
    3. संरचनात्मक-प्रकार्यवादी तनाव परंपरा, जैसे Smelser के मूल्य-वर्धित मॉडल में
    4. राजनीतिक प्रक्रिया सिद्धांत, जो राजनीतिक अवसर-संरचना पर केंद्रित है
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    उत्तर: C — संरचनात्मक-प्रकार्यवादी तनाव परंपरा, जैसे Smelser के मूल्य-वर्धित मॉडल में

    कमज़ोर मानक (अनोमी), संरचनात्मक तनाव, सामान्यीकृत मान्यता व उत्प्रेरक घटना — ये संरचनात्मक-प्रकार्यवादी तनाव परंपरा की शब्दावली हैं, जिसका प्रतिष्ठित रूप Smelser का मूल्य-वर्धित मॉडल है। संसाधन-संघटन व राजनीतिक प्रक्रिया सिद्धांत संसाधनों, संगठनों व अवसरों की ओर संकेत करते; नवीन सामाजिक आंदोलन सिद्धांत पहचान व संस्कृति की ओर।
  9. तनाव-सिद्धांतों के आलोचकों ने बताया कि किसी समाज में शिकायतें प्रायः स्थिर रहती हैं, फिर भी आंदोलन स्पष्टतः कुछ कालों में उठते और अन्य में मुरझाते हैं। इस विशिष्ट आपत्ति की सीधी प्रतिक्रिया में कौन-सा सैद्धांतिक क़दम उठाया गया?

    1. प्रश्न को ‘लोग क्यों असंतुष्ट हैं’ से ‘वे संसाधन कैसे संघटित करते हैं’ पर ले जाना, जैसे संसाधन-संघटन सिद्धांत में
    2. आंदोलनों की व्याख्या पूर्णतः उस अनोमी-स्तर व मानकीय विघटन से करना जो किसी क्षण समाज में मौजूद हो
    3. यह तर्क देना कि आंदोलन महज़ स्वतः-वर्ग के सचेत व संगठित स्व-हेतु-वर्ग बनने की अभिव्यक्ति हैं
    4. हर आंदोलन को किसी खोई परंपरा या पुरानी सामाजिक व्यवस्था को लौटाने का पश्चगामी प्रयास मानना
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    उत्तर: A — प्रश्न को ‘लोग क्यों असंतुष्ट हैं’ से ‘वे संसाधन कैसे संघटित करते हैं’ पर ले जाना, जैसे संसाधन-संघटन सिद्धांत में

    यदि शिकायत कमोबेश स्थिर है तो वह समय-निर्धारण नहीं समझा सकती, अतः संसाधन-संघटन सिद्धांत ने प्रश्न को इस ओर मोड़ा कि संसाधन व संगठन कैसे जुटते हैं — जो समय के साथ बदलते हैं और आंदोलन के उठने-गिरने की व्याख्या कर सकते हैं। अनोमी की दुहाई तो वही तनाव-विवरण है जिस पर आपत्ति है; वर्ग-निर्माण व पुनरुत्थान वाले उत्तर बिलकुल भिन्न प्रश्नों से जुड़े हैं।
  10. संसाधन-संघटन सिद्धांत में प्रतिभागियों को तर्कसंगत कर्ता मानने से लोगों के जुड़ने की व्याख्या में एक विशेष कठिनाई केंद्रीय हो जाती है। कौन-सी कठिनाई, और वह क्यों उठती है?

    1. अनोमी की समस्या, क्योंकि समाज के तेज़ी से बदलने पर तर्कसंगत कर्ता अपने साझा मानक खोकर दिशाहीन हो जाते हैं
    2. मुफ़्तख़ोर-समस्या, क्योंकि कोई तर्कसंगत व्यक्ति जुड़ने की लागत उठाए बिना आंदोलन की जीती सामूहिक वस्तु का लाभ ले सकता है
    3. मिथ्या-चेतना की समस्या, क्योंकि तर्कसंगत कर्ता शासक विचारधारा के कारण अपने वास्तविक हितों के प्रति अंधे हो जाते हैं
    4. ऐतिहासिकता की समस्या, क्योंकि तर्कसंगत कर्ताओं में अपना समाज स्वयं उत्पादित व निर्देशित करने की क्षमता नहीं होती
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    उत्तर: B — मुफ़्तख़ोर-समस्या, क्योंकि कोई तर्कसंगत व्यक्ति जुड़ने की लागत उठाए बिना आंदोलन की जीती सामूहिक वस्तु का लाभ ले सकता है

    यदि आंदोलन की सफलता ऐसी सामूहिक वस्तु देती है जिसका लाभ न-भाग लेने वाले भी उठाते हैं, तो विशुद्ध तर्कसंगत व्यक्ति चाहता है कि लागत औरों पर पड़े — मुफ़्तख़ोर-समस्या (Olson)। इसीलिए संसाधन-संघटन सिद्धांत चयनात्मक प्रोत्साहन, संगठन व बाहरी समर्थन पर बल देता है। अनोमी व मिथ्या-चेतना अन्य परंपराओं की हैं, और ऐतिहासिकता Touraine की संकल्पना है, तर्कसंगत क्रिया की समस्या नहीं।
  11. नवीन सामाजिक आंदोलनों के सिद्धांतकारों के अनुसार, ऐसे आंदोलनों की विशेषता सामान्यतः कौन-सी बातें होती हैं?

    1. केवल मज़दूरी व पुनर्वितरण के बजाय पहचान, संस्कृति, स्वायत्तता व जीवन-गुणवत्ता की चिंता
    2. एकल आर्थिक वर्ग के बजाय नए मध्यवर्ग व अन्य अंतर-वर्गीय समूहों में आधार
    3. राज्य पर नियंत्रण पाने हेतु वेतनभोगी पदाधिकारियों वाली एक कठोर नौकरशाही दल-संरचना
    4. ढीले, सहभागी संजाल-रूप और मुख्यतः नागरिक समाज में अवस्थित क्रिया
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    उत्तर: A — केवल मज़दूरी व पुनर्वितरण के बजाय पहचान, संस्कृति, स्वायत्तता व जीवन-गुणवत्ता की चिंता; B — एकल आर्थिक वर्ग के बजाय नए मध्यवर्ग व अन्य अंतर-वर्गीय समूहों में आधार; D — ढीले, सहभागी संजाल-रूप और मुख्यतः नागरिक समाज में अवस्थित क्रिया

    नवीन सामाजिक आंदोलनों के सिद्धांतकार (Touraine, Melucci व अन्य) उन्हें पहचान- व संस्कृति-उन्मुख, नए मध्यवर्ग में आधारित, ढीले संजाल वाले व नागरिक समाज में सक्रिय बताते हैं। राज्य हथियाने हेतु कसी नौकरशाही दल-संरचना वही पुराना, वर्ग-आधारित मॉडल है जिसके विरुद्ध NSM सिद्धांत गढ़ा गया, अतः वही अलग है।
  12. 1873 में स्थापित सत्यशोधक समाज और बाद में जाति-उन्मूलन व स्वाभिमान की माँग भारत में किस आंदोलन के मील के पत्थर हैं?

    1. श्रमिक आंदोलन
    2. पर्यावरण आंदोलन
    3. दलित आंदोलन
    4. किसान आंदोलन
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    उत्तर: C — दलित आंदोलन

    ज्योतिराव फुले का सत्यशोधक समाज (1873) और बाद में आंबेडकर का जाति-उन्मूलन व स्वाभिमान का आह्वान दलित आंदोलन के केंद्र में हैं। श्रमिक, पर्यावरण व किसान आंदोलनों की अपनी अलग परंपराएँ हैं — क्रमशः ट्रेड-यूनियन, वन व नदी संघर्ष, तथा कृषि-विद्रोह।
  13. Ramachandra Guha, Joan Martínez-Alier के साथ लिखते हुए, भारत के पर्यावरणवाद के बड़े हिस्से को ‘निर्धनों का पर्यावरणवाद’ बताते हैं। उनके पाठ पर, चिपको व नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे आंदोलनों को मुख्यतः क्या चलाता है?

    1. उन समुदायों की जीविका व संसाधनों की रक्षा जिन्हें कोई बड़ी परियोजना विस्थापित कर देती
    2. संपन्न शहरवासियों की यह इच्छा कि अछूते वन्य-क्षेत्र मनोरंजन हेतु अलग रखे जाएँ
    3. प्रकृति से किसी प्राचीन धार्मिक संबंध को उसी के लिए पुनर्स्थापित करने की पुनरुत्थानवादी इच्छा
    4. विशेषज्ञ एजेंसियों द्वारा जुटाए वैश्विक जैव-विविधता आँकड़ों की विशुद्ध वैज्ञानिक चिंता
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    उत्तर: A — उन समुदायों की जीविका व संसाधनों की रक्षा जिन्हें कोई बड़ी परियोजना विस्थापित कर देती

    उनका आशय है कि भारतीय पर्यावरण-संघर्ष प्रायः वन, पहाड़ व नदी समुदाय लड़ते हैं, जो उस जीविका व संसाधनों की रक्षा करते हैं जिन्हें विस्थापनकारी परियोजनाएँ ख़तरे में डालती हैं — निर्धनों का पर्यावरणवाद, जिसका वे संपन्न पश्चिम के वन्य-संरक्षण व मनोरंजन-केंद्रित पर्यावरणवाद से स्पष्ट अंतर करते हैं।
  14. किसी भारतीय आंदोलन का उसकी एक विशेषता से निम्नलिखित में से कौन-से मेल सही हैं?

    1. तेभागा आंदोलन (1946) बंगाल में बटाईदारों व किसानों का संघर्ष था
    2. 1920 में स्थापित AITUC भारतीय श्रमिक आंदोलन से संबंधित है
    3. 1972 में बना दलित पैंथर्स दलित आंदोलन के भीतर एक उग्र मुखरता था
    4. SEWA की स्थापना बड़े औद्योगिक कारखाना-मालिकों को नियोक्ता-महासंघ में संगठित करने हेतु हुई
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    उत्तर: A — तेभागा आंदोलन (1946) बंगाल में बटाईदारों व किसानों का संघर्ष था; B — 1920 में स्थापित AITUC भारतीय श्रमिक आंदोलन से संबंधित है; C — 1972 में बना दलित पैंथर्स दलित आंदोलन के भीतर एक उग्र मुखरता था

    तेभागा (1946) बंगाल का बटाईदार-किसान संघर्ष था, AITUC (1920) श्रमिक आंदोलन का मील का पत्थर है, और दलित पैंथर्स (1972) दलित आंदोलन में एक उग्र मोड़ था। SEWA वाला मेल ग़लत है: वह निर्धन स्व-रोज़गार व अनौपचारिक महिला श्रमिकों को संगठित करती है, कारखाना-मालिकों को नहीं।
  15. नागरिकता के विकास के T.H. Marshall के विवरण में, उनके क्रम में, क्रमिक कालों में कौन-से तीन तत्व खुलते हैं?

    1. राष्ट्रीय, क्षेत्रीय व स्थानीय अधिकार
    2. आर्थिक, सांस्कृतिक व पर्यावरणीय अधिकार
    3. विधिक, धार्मिक व भाषिक अधिकार
    4. नागरिक, राजनीतिक व सामाजिक अधिकार
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    उत्तर: D — नागरिक, राजनीतिक व सामाजिक अधिकार

    Marshall ने नागरिकता को नागरिक अधिकारों (स्वतंत्रता, संपत्ति, न्याय), फिर राजनीतिक अधिकारों (मत व पद), फिर सामाजिक अधिकारों (कल्याण, शिक्षा, सुरक्षा) के रूप में दिखाया, प्रत्येक क्रमिक काल में सुदृढ़ हुआ। अन्य त्रिक उनकी योजना नहीं हैं, यद्यपि परवर्ती लेखकों ने सांस्कृतिक व समूह-विभेदी अधिकार जोड़ने का तर्क दिया है।
  16. एक टिप्पणीकार का दावा है कि भूमंडलीकरण ने एक साथ सामाजिक आंदोलनों पर विपरीत प्रभाव डाले हैं। कौन-सा कथन इस दोतरफ़ा आकलन को सबसे अच्छे पकड़ता है?

    1. इसने आंदोलनों को अंतरराष्ट्रीय संजालों में फैलने दिया, पर साथ ही पुरानी वर्ग-एकजुटता को खंडित करता है और वित्तपोषित NGO को ज़मीनी संघर्षों को दबाने दे सकता है
    2. इसने हर देश में हर एक सामाजिक आंदोलन को एकसमान रूप से मज़बूत किया है, सभी को स्पष्ट लाभ दिए और उनमें से किसी के लिए कोई उल्लेखनीय हानि बिलकुल पैदा नहीं की
    3. इसने समकालीन समाज से शिकायत के सभी स्रोत हटाकर हर सामाजिक आंदोलन को समाप्त कर दिया है
    4. इसने सभी आंदोलनों को कठोरता से राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर बाँध दिया है और उनके बीच हर सीमा-पार संबंध काट दिया है
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    उत्तर: A — इसने आंदोलनों को अंतरराष्ट्रीय संजालों में फैलने दिया, पर साथ ही पुरानी वर्ग-एकजुटता को खंडित करता है और वित्तपोषित NGO को ज़मीनी संघर्षों को दबाने दे सकता है

    वास्तव में दोतरफ़ा दृष्टि लाभ — अंतरराष्ट्रीय संजाल व वैश्विक अभियान — और हानि — खंडित वर्ग-एकजुटता व NGO-करण का ख़तरा — दोनों को देखती है। अन्य विकल्प एकतरफ़ा या सीधे-सीधे असत्य हैं: भूमंडलीकरण न तो सभी शिकायतें हटाता है, न आंदोलनों को राष्ट्रीय सीमाओं में बंद करता है, और न बिना किसी क़ीमत के हर आंदोलन को लाभ पहुँचाता है।