अभिप्रेरणा, संवेग, तनाव व सामना

यह अध्याय मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान (XH) पेपर के XH5 मनोविज्ञान के खंड XH5.7 का उत्तर देता है, जो आवेदन के समय चुने जाने वाले छह वैकल्पिक खंडों में से एक है: “अभिप्रेरणा को समझने के उपागम: मूलप्रवृत्ति, प्रणोद-न्यूनीकरण (drive-reduction), उत्तेजन, प्रलोभन, मानवतावादी, उपलब्धि अभिप्रेरणा, अंतःप्रेरणा, आक्रामकता, जिज्ञासा व अन्वेषण। संवेग: संवेगों की प्रकृति; संवेग के सिद्धांत। तनाव की परिभाषा, तनावकारक क्या हैं, तनाव में संज्ञानात्मक कारक। तनाव-प्रतिक्रिया के कारक: सामान्य अनुकूलन संलक्षण, तनाव का प्रभाव। तनाव का सामना: समस्या-केंद्रित सामना व संवेग-केंद्रित सामना।” यह पढ़ाता है कि व्यवहार को क्या ऊर्जा व दिशा देता है, संवेग के प्रमुख सिद्धांत उत्तेजन, संज्ञान व अनुभूति के क्रम पर कैसे असहमत हैं, तथा तनाव का मूल्यांकन कैसे होता है, शरीर उस पर कैसे प्रतिक्रिया करता है और लोग उसका सामना कैसे करते हैं।

1. अभिप्रेरणा के उपागम: मूलप्रवृत्ति, प्रणोद, उत्तेजन व प्रलोभन

अभिप्रेरणा वह प्रक्रिया है जो व्यवहार को किसी लक्ष्य की ओर आरंभ करती, दिशा देती और बनाए रखती है। आरंभिक मूलप्रवृत्ति उपागम (instinct approach) (William McDougall द्वारा, तथा भिन्न रूप में William James द्वारा समर्थित) मानता था कि व्यवहार जन्मजात, अनधिगत, जाति-विशिष्ट प्रतिरूपों से संचालित होता है। यह अप्रचलित हुआ क्योंकि हर व्यवहार के लिए एक मूलप्रवृत्ति नाम दे देना कुछ नहीं समझाता, पर यह विचार एथोलॉजी के स्थिर क्रिया-प्रतिरूपों (fixed action patterns) में बना रहा। प्रणोद-न्यूनीकरण उपागम (drive-reduction approach) (Clark Hull) ने इसका स्थान लिया: एक जैविक आवश्यकता (need) अप्रिय आंतरिक तनाव उत्पन्न करती है जिसे प्रणोद (drive) कहते हैं, और व्यवहार उस प्रणोद को घटाकर समस्थापन (homeostasis), यानी शरीर की स्थिर आंतरिक अवस्था, पुनः स्थापित करता है। खाना भूख के प्रणोद को घटाता है; यह न्यूनीकरण पुनर्बलक है।

प्रणोद-न्यूनीकरण यह नहीं समझा सकता कि कोई आवश्यकता न होने पर भी लोग उद्दीपन क्यों खोजते हैं। उत्तेजन उपागम (arousal approach) इस कमी को भरता है: जीव अपने उत्तेजन को इष्टतम स्तर (optimal level) के निकट रखने हेतु कार्य करते हैं, ऊब में उसे बढ़ाते और अतिभार में घटाते हैं। यर्कीज़-डॉडसन नियम (Yerkes-Dodson law) कहता है कि निष्पादन उत्तेजन के मध्यम स्तर पर सर्वोत्तम होता है, जो उलटे-U वक्र का अनुसरण करता है, और कठिन कार्यों हेतु इष्टतम स्तर सरल कार्यों की अपेक्षा निम्न होता है। प्रलोभन उपागम (incentive approach) वातावरण का आकर्षण जोड़ता है: व्यवहार केवल आंतरिक प्रणोदों से धकेला नहीं जाता, बाह्य लक्ष्य-वस्तुओं (प्रलोभनों) के पुरस्कार-मूल्य से खींचा भी जाता है, इसीलिए भरा हुआ व्यक्ति भी आकर्षक मिष्ठान्न खा लेता है।

⚠️ धक्का बनाम खिंचाव
दिशा स्पष्ट रखें: प्रणोद (drive) भीतर से धकेलता है (आवश्यकता-अवस्था), जबकि प्रलोभन (incentive) बाहर से खींचता है (लक्ष्य का पुरस्कार-मूल्य)। खाने का वही कार्य भूख से धकेला (push) जा सकता है या लुभावने केक से खींचा (pull) जा सकता है। जो मद किसी आंतरिक अभाव के बिना बाह्य पुरस्कार से ऊर्जावान व्यवहार का वर्णन करे वह प्रलोभन है, प्रणोद-न्यूनीकरण नहीं।

2. मानवतावादी, उपलब्धि, अंतःप्रेरणा, आक्रामकता व जिज्ञासा

मानवतावादी उपागम (humanistic approach) (Abraham Maslow) आवश्यकताओं को एक सोपान में सजाता है: शारीरिक, सुरक्षा, संबद्धता व प्रेम, सम्मान, और शीर्ष पर आत्म-सिद्धि (self-actualisation)। नीचे की चार अभाव आवश्यकताएँ (deficiency needs) हैं, जो कमी के रूप में अनुभव होती हैं और प्रायः प्राथमिकता पाती हैं; आत्म-सिद्धि एक संवृद्धि (being) आवश्यकता है, अपनी संभाव्यता को साकार करने की प्रेरणा। Carl Rogers का मानवतावादी सिद्धांत भी इसी प्रकार एक जन्मजात सिद्धि-प्रवृत्ति (actualising tendency) मानता है। उपलब्धि अभिप्रेरणा (achievement motivation) (David McClelland व John Atkinson द्वारा अध्ययनित, तथा Thematic Apperception Test के अस्पष्ट चित्रों पर कही गई कहानियों के अंकन से मापित) उत्कृष्टता के मानक को पूरा करने की आवश्यकता है; उच्च-nAch व्यक्ति मध्यम-कठिन कार्य पसंद करते हैं जहाँ परिणाम प्रयास से तय हो।

अभिप्रेरणा के अंतःप्रेरित व बाह्यप्रेरित रूप भी होते हैं। अंतःप्रेरणा (intrinsic motivation) किसी गतिविधि को उसकी अपनी अंतर्निहित संतुष्टि हेतु करती है; बाह्यप्रेरणा (extrinsic motivation) उसे किसी पृथक पुरस्कार हेतु करती है। पहले से आनंददायक गतिविधि को पुरस्कृत करना अति-औचित्य प्रभाव (overjustification effect) से उलटा पड़ सकता है: बाह्य पुरस्कार ही कार्य का कारण समझा जाने लगता है, और पुरस्कार रुकते ही अंतःरुचि घट जाती है। जिज्ञासा व अन्वेषण (curiosity and exploration) अंतःप्रेरित व्यवहार हैं जिन्हें जैविक प्रणोद का न्यूनीकरण नहीं समझा सकता — जीव नवीनता व जानकारी स्वयं हेतु खोजते हैं, जो इष्टतम-उत्तेजन दृष्टि के अनुरूप है।

🎯 कुंठा आक्रामकता को क्यों प्रेरित कर सकती है
कुंठा-आक्रामकता परिकल्पना (frustration-aggression hypothesis) (Dollard व सहयोगी, 1939) ने प्रस्तावित किया कि लक्ष्योन्मुख व्यवहार का अवरोध आक्रमण की तत्परता उत्पन्न करता है। Leonard Berkowitz ने इसे संशोधित किया: कुंठा अपने उत्पन्न नकारात्मक भाव के माध्यम से आक्रामक आवेग पैदा करती है, और यह आक्रामकता में तभी बदलता है जब स्थिति में आक्रामक संकेत उपस्थित हों। पुराने मूलप्रवृत्ति विचार (Freud की मृत्यु-प्रवृत्ति, Lorenz का एथोलॉजिकल विवरण) आक्रामकता को इसके बजाय जन्मजात प्रणोद मानते थे।

3. संवेग: प्रकृति व सिद्धांत

संवेग (emotion) एक संक्षिप्त, प्रतिरूपित प्रतिक्रिया है जिसके तीन घटक हैं: शारीरिक उत्तेजन (हृदय-गति, हार्मोन), एक संज्ञानात्मक-आत्मनिष्ठ अनुभूति, तथा अभिव्यंजक-व्यवहारात्मक प्रदर्शन (चेहरा, मुद्रा, स्वर)। चेहरे की अभिव्यक्ति पर शोध (Paul Ekman) कुछ आधारभूत संवेगों (basic emotions) के समुच्चय का समर्थन करता है — प्रसन्नता, दुःख, भय, क्रोध, आश्चर्य व घृणा — जो सभी संस्कृतियों में पहचाने जाते हैं। संवेग के सिद्धांत इन घटकों के घटित होने के क्रम पर असहमत हैं।

संवेग के चार सिद्धांत व उनके द्वारा प्रस्तावित क्रम
सिद्धांतप्रस्तावित क्रममुख्य दावा
James-Langeउद्दीपक → शारीरिक परिवर्तन → संवेगसंवेग शारीरिक परिवर्तन का हमारा प्रत्यक्षण है; हम डरते हैं क्योंकि हम काँपते हैं
Cannon-Bardउद्दीपक → उत्तेजन व संवेग साथ-साथउत्तेजन व अनुभूत संवेग एक साथ व स्वतंत्र रूप से घटित होते हैं
Schachter-Singer (द्विकारक)उद्दीपक → उत्तेजन + संज्ञानात्मक लेबल → संवेगएक ही उत्तेजन को स्थितिजन्य संकेतों से लेबल कर विशिष्ट संवेग बनाया जाता है
संज्ञानात्मक मूल्यांकन (Lazarus)उद्दीपक → मूल्यांकन → संवेग व उत्तेजनस्थिति की व्याख्या तय करती है कि कौन-सा संवेग उत्पन्न होता है

Cannon ने James-Lange सिद्धांत पर कई तर्कों से आक्रमण किया, जिनमें यह भी था कि आंतरांगीय परिवर्तन प्रायः इतने धीमे व संवेगों में इतने समान होते हैं कि भय को क्रोध से अलग न किया जा सके, अतः केवल शारीरिक प्रतिपुष्टि संवेग को निर्दिष्ट नहीं कर सकती। Schachter व Singer का द्विकारक सिद्धांत (two-factor theory) इसका उत्तर संज्ञान जोड़कर देता है: उत्तेजन तीव्रता देता है, और स्थिति द्वारा दिया गया संज्ञानात्मक लेबल गुण देता है। Lazarus ने संज्ञान को और आगे बढ़ाया, यह तर्क देते हुए कि स्थिति के अर्थ का मूल्यांकन (appraisal) संवेग से पहले आकर उसे गढ़ता है।

4. तनाव, तनावकारक व संज्ञानात्मक मूल्यांकन

संव्यवहारात्मक मॉडल (transactional model) (Richard Lazarus व Susan Folkman) में तनाव (stress) किसी घटना का गुण नहीं, एक संबंध है: यह तब उत्पन्न होता है जब व्यक्ति किसी स्थिति की माँगों को अपने संसाधनों पर भारी या उनसे अधिक और अपनी भलाई हेतु संकटकारी आँकता है। तनावकारक (stressor) कोई भी घटना या अवस्था है जो ऐसी माँग रखती है। तनावकारक पैमाने में भिन्न होते हैं: बड़ी जीवन-घटनाएँ (Holmes व Rahe द्वारा अध्ययनित, जिन्होंने एक सामाजिक-पुनःसमायोजन मापनी पर जीवन-परिवर्तन इकाइयाँ दीं), दीर्घकालिक दबाव, तथा रोज़मर्रा की दैनिक झंझटें (daily hassles) जिनके बारे में Lazarus ने दिखाया कि वे दुर्लभ विपत्तियों जितना या उनसे अधिक अच्छा कष्ट का पूर्वानुमान देती हैं।

तनावकारकों को अवधि व विस्तार से छाँटा जा सकता है। तीव्र (acute) तनावकारक छोटे व नुकीले होते हैं (सड़क पर बाल-बाल बचना); दीर्घकालिक (chronic) तनावकारक बने रहते हैं (देखभाल, निर्धनता, शत्रुतापूर्ण कार्यस्थल) और सर्वाधिक स्थायी हानि करते हैं। विपत्तिमूलक (cataclysmic) घटनाएँ एक साथ अनेक लोगों पर पड़ती हैं (कोई आपदा), वैयक्तिक जीवन-घटनाएँ किसी व्यक्ति पर (शोक, विवाह-विच्छेद), और पृष्ठभूमि तनावकारक या दैनिक झंझटें सामान्य जीवन की निम्न-स्तरीय, बारंबार घर्षण हैं। शोर व भीड़ जैसे परिवेशी (ambient) तनावकारक ध्यान का केंद्र हुए बिना असर करते हैं।

क्योंकि तनाव व्याख्या पर निर्भर है, संज्ञानात्मक कारक केंद्रीय हैं। Lazarus प्राथमिक मूल्यांकन (primary appraisal) — यह आँकना कि घटना अप्रासंगिक है, सौम्य है, या तनावपूर्ण (और यदि तनावपूर्ण, तो क्षति/हानि, संकट, या चुनौती) — को द्वितीयक मूल्यांकन (secondary appraisal), यानी यह आँकने से कि कौन-से सामना-संसाधन व विकल्प उपलब्ध हैं, अलग करते हैं। वही परीक्षा अतैयार विद्यार्थी हेतु संकट और आत्मविश्वासी हेतु चुनौती है, इसीलिए मूल्यांकन, न कि अकेली घटना, तनाव-प्रतिक्रिया चलाता है। अनुभूत नियंत्रण, पूर्वानुमेयता व सामाजिक समर्थन सभी आँके गए संकट को घटाते हैं।

5. तनाव-प्रतिक्रिया: सामान्य अनुकूलन संलक्षण व तनाव के प्रभाव

Hans Selye ने किसी भी दीर्घकालिक तनावकारक के प्रति शरीर की अविशिष्ट शारीरिक प्रतिक्रिया को सामान्य अनुकूलन संलक्षण (general adaptation syndrome, GAS) कहा, जो तीन चरणों में प्रकट होता है। सचेतावस्था प्रतिक्रिया (alarm reaction) में शरीर आपात के लिए संगठित होता है — अनुकंपी तंत्रिका तंत्र व अधिवृक्क ग्रंथियाँ एड्रेनलिन छोड़ती हैं, हृदय-गति बढ़ाती हैं और लड़ो-या-भागो हेतु तैयार करती हैं। प्रतिरोध अवस्था (stage of resistance) में उत्तेजन उच्च बना रहता है जबकि शरीर जारी तनावकारक का सामना कॉर्टिसोल जैसे हार्मोनों के सहारे करता है। यदि तनावकारक बना रहे, तो संसाधन चुक जाते हैं और परिश्रांति अवस्था (stage of exhaustion) आती है, जिसमें रोग के प्रति सुभेद्यता बढ़ती है। Selye ने बल दिया कि यह क्रम तनावकारक चाहे जो हो, वही रहता है।

  • शारीरिक प्रभाव: दीर्घकालिक तनाव हृदय-संवहनी जोखिम बढ़ाता है और, निरंतर कॉर्टिसोल के माध्यम से, प्रतिरक्षा-कार्य को दबा सकता है (मनोतंत्रिकाप्रतिरक्षा-विज्ञान का क्षेत्र), जिससे उपचार धीमा होता है और संक्रमण की सुभेद्यता बढ़ती है।
  • मनोवैज्ञानिक प्रभाव: चिंता, चिड़चिड़ाहट, और दीर्घकालिक कार्य-तनाव में बर्नआउट (burnout) — संवेगात्मक परिश्रांति, निराशावाद व घटी हुई उपलब्धि।
  • वैयक्तिक भिन्नता: टाइप A व्यवहार-प्रतिरूप (Type A behaviour pattern) (Friedman व Rosenman) — प्रतिस्पर्धिता, समय-तात्कालिकता व शत्रुता — को उच्चतर हृद्-धमनी रोग जोखिम से जोड़ा गया, जिसमें शत्रुता को बाद में सर्वाधिक हानिकारक घटक माना गया।
⚠️ सचेतावस्था परिश्रांति नहीं है
एक सामान्य भूल तनाव-हार्मोनों के उछाल को परिश्रांति अवस्था में रख देना है। वह सचेतावस्था प्रतिक्रिया (alarm reaction) में आता है: शरीर पहले अचानक माँग पूरी करने हेतु एड्रेनलिन छोड़ता है। परिश्रांति वह अंतिम अवस्था है जिसमें वे संसाधन चुक जाते हैं और रोग संभावित हो जाता है।

6. तनाव का सामना: समस्या-केंद्रित व संवेग-केंद्रित

सामना (coping) तनावपूर्ण आँकी गई माँगों को प्रबंधित करने का बदलता प्रयास है। Lazarus व Folkman केंद्रीय भेद इस आधार पर करते हैं कि प्रयास किसे लक्ष्य करता है। समस्या-केंद्रित सामना (problem-focused coping) तनावकारक को ही लक्ष्य करता है: योजना बनाना, जानकारी जुटाना, बाधा हटाना, या माँग पर पुनः बातचीत करना। संवेग-केंद्रित सामना (emotion-focused coping) तनावकारक के प्रति संवेगात्मक प्रतिक्रिया को लक्ष्य करता है: विश्रांति, सांत्वना खोजना, स्थिति का पुनर्मूल्यांकन, या स्वीकृति। कोई सदैव श्रेष्ठ नहीं। समस्या-केंद्रित सामना नियंत्रणीय तनावकारकों हेतु उपयुक्त है, जहाँ कार्य स्थिति बदल सके; संवेग-केंद्रित सामना अनियंत्रणीय तनावकारकों (शोक, असाध्य रोग) हेतु, जहाँ स्थिति बदली नहीं जा सकती और भावनाओं को सँभालना होता है।

🧠 आराम से नहीं, लक्ष्य से वर्गीकृत करें
किसी सामना-कार्य को वर्गीकृत करने हेतु पूछें कि वह क्या बदलने का प्रयास कर रहा है। यदि वह स्थिति पर कार्य करे (समय-सारणी, बॉस से बातचीत, तथ्य पता करना), तो वह समस्या-केंद्रित है भले ही वह आपको शांत भी करे। यदि वह आपकी भावनाओं पर कार्य करे (पुनर्रूपण, विश्रांति, स्वीकृति, ध्यान-विचलन), तो वह संवेग-केंद्रित है भले ही स्थिति वही रहे।

मुख्य बिंदु

  • अभिप्रेरणा के उपागम धक्के से खिंचाव तक बढ़ते हैं: मूलप्रवृत्ति (जन्मजात प्रतिरूप), प्रणोद-न्यूनीकरण (समस्थापन हेतु आंतरिक आवश्यकता घटाना), उत्तेजन (उद्दीपन इष्टतम रखना; Yerkes-Dodson का उलटा U, कठिन कार्यों हेतु निम्न इष्टतम) व प्रलोभन (बाह्य पुरस्कार-मूल्य से खिंचाव)।
  • Maslow के सोपान में एक संवृद्धि आवश्यकता (आत्म-सिद्धि) के नीचे चार अभाव आवश्यकताएँ हैं; उपलब्धि अभिप्रेरणा (McClelland, TAT) मानक पूरा करने की आवश्यकता है; अंतःप्रेरणा, जिज्ञासा व अन्वेषण को किसी जैविक प्रणोद की आवश्यकता नहीं, और आनंददायक गतिविधि को पुरस्कृत करना अति-औचित्य प्रभाव से रुचि घटा सकता है।
  • संवेग के चार सिद्धांत क्रम से भिन्न हैं: James-Lange (पहले शारीरिक परिवर्तन, संवेग उसका प्रत्यक्षण), Cannon-Bard (उत्तेजन व संवेग साथ), Schachter-Singer द्विकारक (उत्तेजन के साथ स्थिति से संज्ञानात्मक लेबल) व संज्ञानात्मक मूल्यांकन (व्याख्या संवेग गढ़ती है)।
  • Lazarus व Folkman के मॉडल में तनाव व्यक्ति-वातावरण संव्यवहार है: प्राथमिक मूल्यांकन हानि, संकट या चुनौती आँकता है; द्वितीयक मूल्यांकन सामना-संसाधन आँकता है। तनावकारक बड़ी जीवन-घटनाओं से दैनिक झंझटों तक फैले हैं, और मूल्यांकन, न कि अकेली घटना, प्रतिक्रिया चलाता है।
  • Selye का सामान्य अनुकूलन संलक्षण सचेतावस्था (हार्मोन-उछाल, लड़ो-या-भागो), प्रतिरोध (निरंतर सामना) व परिश्रांति (संसाधन चुके, रोग संभावित) से चलता है, हर तनावकारक हेतु वही क्रम। दीर्घकालिक तनाव प्रतिरक्षा दबाता व हृदय-संवहनी जोखिम बढ़ाता है; टाइप A का शत्रुता घटक हृदय-रोग से जुड़ा है।
  • सामना अपने लक्ष्य से वर्गीकृत होता है: समस्या-केंद्रित सामना तनावकारक पर कार्य करता है (योजना, जानकारी, बातचीत) और नियंत्रणीय स्थितियों हेतु उपयुक्त है; संवेग-केंद्रित सामना भावनाओं पर कार्य करता है (पुनर्मूल्यांकन, विश्रांति, स्वीकृति) और अनियंत्रणीय हेतु।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. एक व्यक्ति भूख अनुभव करता है, और यह अप्रिय आंतरिक तनाव उसे तब तक खाने को प्रेरित करता है जब तक तनाव शांत होकर आंतरिक संतुलन पुनः स्थापित न हो जाए। यह अभिप्रेरणा के किस उपागम को सर्वोत्तम रूप में दर्शाता है?

    1. प्रलोभन उपागम, जिसमें व्यवहार किसी लक्ष्य-वस्तु के बाह्य पुरस्कार-मूल्य से खींचा जाता है
    2. उत्तेजन उपागम, जिसमें व्यवहार उद्दीपन को मध्यम, इष्टतम स्तर पर रखने का लक्ष्य रखता है
    3. मूलप्रवृत्ति उपागम, जिसमें व्यवहार मात्र उन स्थिर जन्मजात प्रतिरूपों का अनुसरण करता है जो जाति के प्रत्येक सदस्य में साझा होते हैं
    4. प्रणोद-न्यूनीकरण उपागम, जिसमें आवश्यकता एक प्रणोद उत्पन्न करती है और व्यवहार उसे घटाने हेतु कार्य कर समस्थापन पुनः स्थापित करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — प्रणोद-न्यूनीकरण उपागम, जिसमें आवश्यकता एक प्रणोद उत्पन्न करती है और व्यवहार उसे घटाने हेतु कार्य कर समस्थापन पुनः स्थापित करता है

    आवश्यकता (भूख) एक आंतरिक प्रणोद उत्पन्न करती है जिसका न्यूनीकरण समस्थापन पुनः स्थापित करता है — यही प्रणोद-न्यूनीकरण उपागम की परिभाषा है। प्रलोभन उपागम भ्रामक चयन है क्योंकि खाना शामिल है, पर प्रलोभन उस व्यवहार का वर्णन करता है जो किसी आंतरिक अभाव के बिना बाह्य पुरस्कार से खींचा जाए (भरे होने पर केक खाना); यहाँ धक्का एक आंतरिक आवश्यकता है। उत्तेजन व मूलप्रवृत्ति पूर्णतः भिन्न क्रियाविधियों का वर्णन करते हैं।
  2. यर्कीज़-डॉडसन नियम के अनुसार उत्तेजन का निष्पादन से क्या संबंध है, और कार्य की कठिनाई इसे कैसे बदलती है?

    1. निष्पादन उत्तेजन के साथ लगातार बढ़ता है, अतः कार्य चाहे जो हो, सर्वाधिक उत्तेजित व्यक्ति सदैव सर्वोत्तम निष्पादन करते हैं
    2. निष्पादन उत्तेजन के मध्यम स्तर पर सर्वोत्तम होता है (उलटा U), और इष्टतम स्तर कठिन कार्यों हेतु सरल कार्यों की अपेक्षा निम्न होता है
    3. निष्पादन तब सर्वोत्तम होता है जब उत्तेजन न्यूनतम हो, और कठिन कार्यों हेतु अच्छे निष्पादन को और भी निम्न उत्तेजन चाहिए
    4. निष्पादन उत्तेजन से असंबंधित है और केवल कार्य से जुड़े प्रलोभन-मूल्य पर निर्भर करता है, अतः उत्तेजन में परिवर्तन से कोई अंतर नहीं पड़ता
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — निष्पादन उत्तेजन के मध्यम स्तर पर सर्वोत्तम होता है (उलटा U), और इष्टतम स्तर कठिन कार्यों हेतु सरल कार्यों की अपेक्षा निम्न होता है

    यर्कीज़-डॉडसन नियम उलटे-U का वर्णन करता है: बहुत कम या बहुत अधिक उत्तेजन दोनों निष्पादन को हानि पहुँचाते हैं, जो मध्यम स्तर पर शिखर पर होता है। इष्टतम स्तर कठिन या जटिल कार्यों हेतु निम्न और सरल, सुसीखे कार्यों हेतु उच्च होता है। लगातार वृद्धि वाला विकल्प प्रचलित भूल है — अधिक उत्तेजन सदैव बेहतर नहीं।
  3. उपलब्धि की आवश्यकता, जिसे अस्पष्ट चित्रों के बारे में लोगों द्वारा गढ़ी गई कहानियों के विषयों के अंकन (Thematic Apperception Test) से आँका जाता है, मुख्यतः किस मनोवैज्ञानिक से जुड़ी एक शोध-परंपरा है?

    1. Clark Hull, जो अभिप्रेरणा के प्रणोद-न्यूनीकरण सिद्धांत हेतु विख्यात हैं
    2. Konrad Lorenz, जो मूलप्रवृत्तिक व्यवहार के एथोलॉजिकल अध्ययनों हेतु विख्यात हैं
    3. David McClelland, जो उपलब्धि अभिप्रेरणा व उपलब्धि की आवश्यकता पर शोध हेतु विख्यात हैं
    4. Abraham Maslow, जो आत्म-सिद्धि में परिणत होने वाले आवश्यकताओं के मानवतावादी सोपान हेतु विख्यात हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — David McClelland, जो उपलब्धि अभिप्रेरणा व उपलब्धि की आवश्यकता पर शोध हेतु विख्यात हैं

    David McClelland (John Atkinson के साथ) ने उपलब्धि अभिप्रेरणा का अध्ययन विकसित किया और Thematic Apperception Test का उपयोग लोगों की कहानियों के विषयों से उपलब्धि की आवश्यकता मापने हेतु किया। Hull प्रणोद-न्यूनीकरण, Lorenz मूलप्रवृत्ति/एथोलॉजी, और Maslow मानवतावादी सोपान हैं।
  4. James-Lange संवेग सिद्धांत घटनाओं का कौन-सा क्रम प्रस्तावित करता है?

    1. संवेग-जगाने वाला उद्दीपक पहले एक सचेत संवेग उत्पन्न करता है, जो फिर उसके साथ आने वाले शारीरिक परिवर्तन उत्पन्न करता है
    2. संवेग-जगाने वाला उद्दीपक शारीरिक परिवर्तन उत्पन्न करता है, और संवेग उन्हीं शारीरिक परिवर्तनों का हमारा प्रत्यक्षण है
    3. संवेग-जगाने वाला उद्दीपक शारीरिक उत्तेजन व सचेत संवेग एक ही समय पर व स्वतंत्र रूप से उत्पन्न करता है
    4. संवेग-जगाने वाला उद्दीपक उत्तेजन उत्पन्न करता है जिसे कोई संवेग अनुभव होने से पहले स्थिति का उपयोग कर संज्ञानात्मक रूप से लेबल करना आवश्यक है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — संवेग-जगाने वाला उद्दीपक शारीरिक परिवर्तन उत्पन्न करता है, और संवेग उन्हीं शारीरिक परिवर्तनों का हमारा प्रत्यक्षण है

    James-Lange सामान्य बुद्धि को उलट देता है: शारीरिक परिवर्तन पहले आता है और संवेग उसका प्रत्यक्षण है — हम डरते हैं क्योंकि हम काँपते हैं, उलटा नहीं। एक-साथ-व-स्वतंत्र वाला विकल्प Cannon-Bard है; लेबल वाला Schachter-Singer है; संवेग-फिर-शरीर वाला वह रोज़मर्रा का सहज-बोध है जिसे यह सिद्धांत नकारता है।
  5. Schachter व Singer के द्विकारक सिद्धांत में क्या तय करता है कि व्यक्ति कौन-सा विशिष्ट संवेग अनुभव करता है?

    1. उद्दीपक जिन चेहरे की पेशियों को सक्रिय करता है उनका विशिष्ट प्रतिरूप, जिसे सीधे अनुभूत संवेग के रूप में पढ़ लिया जाता है
    2. अकेला शारीरिक उत्तेजन का प्रतिरूप, जो एक संवेग से दूसरे में तीव्र रूप से भिन्न होता है
    3. एक संज्ञानात्मक लेबल जिसे व्यक्ति सामान्य शारीरिक उत्तेजन पर स्थिति के संकेतों का उपयोग कर लगाता है
    4. एक जन्मजात भाव-कार्यक्रम जो किसी भी उत्तेजन से पहले ही संवेग को नियत कर देता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — एक संज्ञानात्मक लेबल जिसे व्यक्ति सामान्य शारीरिक उत्तेजन पर स्थिति के संकेतों का उपयोग कर लगाता है

    दो कारक हैं (1) सामान्य शारीरिक उत्तेजन और (2) स्थिति से लिया गया संज्ञानात्मक लेबल; वही उत्तेजन व्याख्या के अनुसार भय या उल्लास बन जाता है। केवल-उत्तेजन वाला विकल्प गलत है क्योंकि सिद्धांत मानता है कि उत्तेजन काफ़ी अविभेदित होता है, अतः संवेग निर्दिष्ट करने हेतु संज्ञान आवश्यक है।
  6. Lazarus व Folkman के संव्यवहारात्मक मॉडल में प्राथमिक मूल्यांकन किसे आँकने की प्रक्रिया है?

    1. क्या कोई घटना अपनी भलाई हेतु प्रासंगिक है और यदि है, तो वह हानि, संकट या चुनौती है
    2. घटना से निपटने हेतु व्यक्ति के पास कौन-से सामना-संसाधन व कौन-से प्रतिक्रिया-विकल्प वास्तव में उपलब्ध हैं
    3. क्या घटना समाप्त होने के बाद शरीर शारीरिक रूप से समस्थापन पर लौट आया है
    4. उसी स्थिति में उपस्थित अन्य लोग घटना पर कैसे प्रतिक्रिया कर रहे हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — क्या कोई घटना अपनी भलाई हेतु प्रासंगिक है और यदि है, तो वह हानि, संकट या चुनौती है

    प्राथमिक मूल्यांकन पूछता है ‘क्या यह मेरे लिए प्रासंगिक व संकटकारी है?’ और तनावपूर्ण घटना को हानि/क्षति, संकट या चुनौती में वर्गीकृत करता है। उपलब्ध सामना-संसाधनों को आँकना द्वितीयक मूल्यांकन की परिभाषा है — भ्रामक विकर्षक — जो प्राथमिक मूल्यांकन होने के बजाय उसके बाद आता है।
  7. Selye के सामान्य अनुकूलन संलक्षण में कौन-सी अवस्था निरंतर उच्च उत्तेजन से युक्त होती है जबकि शरीर किसी जारी तनावकारक का सामना करता रहता है, इससे पूर्व कि उसके संसाधन अंततः चुक जाएँ?

    1. सचेतावस्था प्रतिक्रिया
    2. प्रतिरोध अवस्था
    3. परिश्रांति अवस्था
    4. मूल्यांकन अवस्था
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — प्रतिरोध अवस्था

    प्रतिरोध मध्य अवस्था है: आरंभिक सचेतावस्था उछाल के बाद शरीर संगठित बना रहता है और जारी तनावकारक का सामना करता है जब तक, यदि वह बना रहे, परिश्रांति न आ जाए। सचेतावस्था आरंभिक संगठन है और परिश्रांति संसाधनों का चुकना। ‘मूल्यांकन’ Lazarus का पद है, GAS की अवस्था नहीं, अतः वह सही नहीं हो सकता।
  8. आगामी परीक्षा को लेकर चिंतित एक विद्यार्थी एक विस्तृत पुनरावृत्ति समय-सारणी बनाता है और सबसे कठिन विषयों से काम आरंभ करता है। Lazarus व Folkman के ढाँचे में यह किसका उदाहरण है?

    1. संवेग-केंद्रित सामना, क्योंकि यह विद्यार्थी की चिंता की भावनाओं को घटाने की ओर निर्देशित है
    2. समस्या-केंद्रित सामना, क्योंकि यह तनावकारक को ही बदलने या प्रबंधित करने की ओर निर्देशित है
    3. सामान्य अनुकूलन संलक्षण की सचेतावस्था, क्योंकि उत्तेजन तीव्रता से बढ़ गया है
    4. द्वितीयक मूल्यांकन, क्योंकि विद्यार्थी केवल उपलब्ध सामना-संसाधनों को सूचीबद्ध कर रहा है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — समस्या-केंद्रित सामना, क्योंकि यह तनावकारक को ही बदलने या प्रबंधित करने की ओर निर्देशित है

    योजना बनाना व सामग्री पर कार्य करना तनावकारक को ही सँभालता है, जो समस्या-केंद्रित सामना है। इसे संवेग-केंद्रित कहना लुभावना है क्योंकि विद्यार्थी चिंतित है, पर कार्य स्थिति (परीक्षा-तैयारी) को लक्ष्य करता है, भावना को नहीं, और वर्गीकरण लक्ष्य से होता है। संसाधन सूचीबद्ध करना द्वितीयक मूल्यांकन होता, पर विद्यार्थी केवल आँक नहीं रहा, कार्य कर रहा है।
  9. निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य संवेग-केंद्रित सामना के रूप में सर्वोत्तम वर्गीकृत होता है?

    1. अपने प्रबंधक के साथ समय-सीमा पर पुनः बातचीत करना ताकि असह्य कार्यभार प्रबंधनीय हो जाए
    2. एक बड़े, भयप्रद कार्य को छोटे चरणों में बाँटकर उन्हें एक-एक करके निपटाना
    3. अपने कष्ट को कम करने हेतु विश्रांति का अभ्यास करना और किसी विफलता को सीखने के अवसर के रूप में पुनर्रूपित करना
    4. उपचार-योजना चुनने हेतु किसी चिकित्सीय स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाना
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — अपने कष्ट को कम करने हेतु विश्रांति का अभ्यास करना और किसी विफलता को सीखने के अवसर के रूप में पुनर्रूपित करना

    विश्रांति व पुनर्मूल्यांकन तनावकारक के बजाय संवेगात्मक प्रतिक्रिया पर कार्य करते हैं, जो संवेग-केंद्रित सामना है। समय-सीमा पर पुनः बातचीत, कार्य को चरणों में बाँटना व जानकारी जुटाना सभी स्थिति पर ही कार्य करते हैं और समस्या-केंद्रित हैं, भले ही वे शांतिदायक भी लगें।
  10. जो बच्चे अपने खाली समय में पहले से चित्र बनाने का आनंद लेते हैं, उन्हें कई सप्ताह तक हर बार चित्र बनाने पर एक प्रमाणपत्र दिया जाता है। जब प्रमाणपत्र रोक दिए जाते हैं, तो वे उस तुलना-समूह की अपेक्षा स्पष्ट रूप से कम चित्र बनाते हैं जिसे कभी पुरस्कृत नहीं किया गया। कौन-सा विवरण इस परिणाम को सर्वोत्तम समझाता है?

    1. अति-औचित्य प्रभाव, जिसमें पहले से आनंददायक गतिविधि हेतु पुरस्कार ही कार्य का अनुभूत कारण बन जाता है, अतः पुरस्कार रुकते ही रुचि घट जाती है
    2. प्रणोद-न्यूनीकरण, क्योंकि प्रमाणपत्र समाप्त होते ही चित्र बनाने का कार्य किसी जारी जैविक आवश्यकता को घटाने का काम नहीं करता रहा
    3. यर्कीज़-डॉडसन नियम, क्योंकि प्रमाणपत्र हटाने से बच्चों का उत्तेजन उस स्तर से नीचे चला गया जिसे चित्र बनाने जैसी गतिविधि हेतु इष्टतम कहा जाता है
    4. मूलप्रवृत्तिक विचलन, क्योंकि चित्र बनाना जाति के स्थिर जन्मजात क्रिया-प्रतिरूपों का भाग नहीं है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — अति-औचित्य प्रभाव, जिसमें पहले से आनंददायक गतिविधि हेतु पुरस्कार ही कार्य का अनुभूत कारण बन जाता है, अतः पुरस्कार रुकते ही रुचि घट जाती है

    पहले से आनंददायक गतिविधि को पुरस्कृत करना व्यवहार के अनुभूत कारण को आंतरिक रुचि से बाह्य पुरस्कार की ओर खिसका सकता है; पुरस्कार रुकते ही अंतःप्रेरणा पहले से कम रह जाती है — अति-औचित्य प्रभाव। चित्र बनाना किसी जैविक आवश्यकता को नहीं घटाता, अतः प्रणोद-न्यूनीकरण लागू नहीं; यर्कीज़-डॉडसन उत्तेजन व निष्पादन के बारे में है, पुरस्कार व रुचि के नहीं; मूलप्रवृत्तिक विचलन अनुकूलित पशुओं के मूलप्रवृत्ति की ओर लौटने से संबंधित है।
  11. अलग-अलग पगडंडियों पर दो पदयात्रियों में से प्रत्येक की ओर एक बड़ा कुत्ता दौड़ता है और दोनों के हृदय ठीक एक समान धड़कते हैं। पहला, हिलती पूँछ व पीछे दौड़ता मालिक देखकर, आनंद अनुभव करता है; दूसरा, खुले दाँत व कोई मालिक न देखकर, आतंक अनुभव करता है। कौन-सा सिद्धांत सबसे सीधे समझाता है कि यहाँ एक समान उत्तेजन विपरीत संवेग क्यों उत्पन्न करता है?

    1. James-Lange सिद्धांत, क्योंकि प्रत्येक पदयात्री एक समान शारीरिक अवस्था से सीधे संवेग पढ़ लेता है
    2. Cannon-Bard सिद्धांत, क्योंकि दोनों में से प्रत्येक पदयात्री में उत्तेजन व संवेग एक ही समय पर व पूर्णतः स्वतंत्र रूप से उत्पन्न होते हैं
    3. संज्ञानात्मक-मूल्यांकन विवरण, जिसमें प्रत्येक पदयात्री स्थिति की जैसी व्याख्या करता है वही तय करती है कि साझा उत्तेजन कौन-सा संवेग बनता है
    4. विरोधी-प्रक्रिया सिद्धांत, क्योंकि पहली प्रतिक्रिया के बाद स्वतः उसका संवेगात्मक विपरीत आता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — संज्ञानात्मक-मूल्यांकन विवरण, जिसमें प्रत्येक पदयात्री स्थिति की जैसी व्याख्या करता है वही तय करती है कि साझा उत्तेजन कौन-सा संवेग बनता है

    उत्तेजन एक समान है, अतः अंतर व्याख्या से ही आना चाहिए — ठीक वही जो संज्ञानात्मक-मूल्यांकन (व संबंधित द्विकारक) विवरण दावा करते हैं। James-Lange विफल है क्योंकि उस दृष्टि से एक समान शारीरिक अवस्थाओं को एक समान संवेग देने चाहिए; Cannon-Bard यह नहीं कहता कि व्याख्याएँ क्यों भिन्न होती हैं; विरोधी-प्रक्रिया एक प्रतिक्रिया व उसके बाद के प्रतिक्षेप से संबंधित है, एक घटना को दो लोगों द्वारा भिन्न पढ़ने से नहीं।
  12. कुंठा-आक्रामकता परिकल्पना के Berkowitz के संशोधन में कुंठा के वास्तविक आक्रामकता की ओर ले जाने की सर्वाधिक संभावना कब होती है?

    1. कुंठा नकारात्मक भाव उत्पन्न करे और स्थिति में आक्रामक संकेत उपस्थित हों
    2. कुंठित व्यक्ति में दूसरों के साथ संबद्धता की असामान्य रूप से उच्च आवश्यकता हो
    3. शारीरिक उत्तेजन यर्कीज़-डॉडसन नियम द्वारा नियत इष्टतम स्तर से नीचे रखा जाए
    4. अवरुद्ध लक्ष्य का व्यक्ति हेतु केवल बाह्य मूल्य हो और कोई अंतःमूल्य न हो
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — कुंठा नकारात्मक भाव उत्पन्न करे और स्थिति में आक्रामक संकेत उपस्थित हों

    मूल परिकल्पना कहती थी कि कुंठा आक्रामकता की ओर ले जाती है; Berkowitz ने इसे सीमित किया: कुंठा नकारात्मक भाव उत्पन्न करती है जो आक्रमण की तत्परता बनाता है, और यह मुख्यतः तब प्रकट आक्रामकता बनता है जब आक्रामक संकेत उपस्थित हों। संबद्धता की आवश्यकता, यर्कीज़-डॉडसन उत्तेजन व लक्ष्य का अंतः/बाह्य मूल्य इस विवरण के भाग नहीं हैं।
  13. इन चार कथनों पर विचार कीजिए, जो P, Q, R व S चिह्नित हैं। अभिप्रेरणा के उपागमों के बारे में कौन-से सही हैं?
    P: मूलप्रवृत्ति सिद्धांत व्यवहार को जन्मजात, जाति-विशिष्ट प्रतिरूपों से समझाते हैं और William McDougall जैसे आरंभिक सिद्धांतकारों द्वारा समर्थित थे।
    Q: प्रलोभन सिद्धांत में अभिप्रेरणा बाह्य लक्ष्य-वस्तुओं के खिंचाव के बजाय आंतरिक आवश्यकता-अवस्थाओं का धक्का है।
    R: Maslow का मानवतावादी उपागम आवश्यकताओं को एक सोपान में सजाता है, जिसमें निम्न अभाव आवश्यकताएँ प्रायः उच्च संवृद्धि आवश्यकताओं पर प्राथमिकता पाती हैं।
    S: जिज्ञासा व अन्वेषी व्यवहार दर्शाते हैं कि जीव तब भी अभिप्रेरित हो सकते हैं जब कोई जैविक प्रणोद न घट रहा हो।

    1. P
    2. Q
    3. R
    4. S
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — P; C — R; D — S

    P, R व S सही हैं। Q परिभाषा उलट देता है: प्रलोभन सिद्धांत ठीक बाह्य लक्ष्यों का खिंचाव है, जबकि आंतरिक आवश्यकताओं का धक्का प्रणोद सिद्धांत है। P मूलप्रवृत्ति उपागम व McDougall को सही नाम देता है; R Maslow के सोपान का सही वर्णन करता है जिसमें अभाव आवश्यकताएँ प्राथमिकता पाती हैं; S सही बताता है कि जिज्ञासा व अन्वेषण को प्रणोद-न्यूनीकरण की आवश्यकता नहीं।
  14. संवेग के सिद्धांतों के बारे में इन कथनों पर विचार कीजिए, जो P, Q, R व S चिह्नित हैं। कौन-से सही हैं?
    P: James-Lange सिद्धांत मानता है कि हम किसी संवेग को उन शारीरिक परिवर्तनों के अपने प्रत्यक्षण के रूप में अनुभव करते हैं जिन्हें उद्दीपक पहले ही उत्पन्न कर चुका है।
    Q: Cannon-Bard सिद्धांत प्रस्तावित करता है कि शारीरिक उत्तेजन व आत्मनिष्ठ संवेग एक-दूसरे का कारण बनने के बजाय एक ही समय पर घटित होते हैं।
    R: Schachter-Singer द्विकारक सिद्धांत दावा करता है कि अकेला शारीरिक उत्तेजन का प्रतिरूप, बिना किसी संज्ञानात्मक व्याख्या के, तय कर देता है कि कौन-सा विशिष्ट संवेग अनुभव होता है।
    S: संज्ञानात्मक-मूल्यांकन सिद्धांत मानते हैं कि व्यक्ति स्थिति की जैसी व्याख्या करता है वही परिणामी संवेग को गढ़ती है।

    1. P
    2. Q
    3. R
    4. S
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — P; B — Q; D — S

    P, Q व S सही हैं। R असत्य है: द्विकारक सिद्धांत मानता है कि उत्तेजन काफ़ी सामान्य होता है और विशिष्ट संवेग बनने हेतु स्थिति से संज्ञानात्मक लेबल चाहिए, अतः अकेला उत्तेजन उसे तय नहीं कर सकता। P James-Lange को सटीक बताता है, Q Cannon-Bard की एक-समयता बताता है, और S संज्ञानात्मक-मूल्यांकन स्थिति बताता है।
  15. तनाव व सामान्य अनुकूलन संलक्षण के बारे में इन कथनों पर विचार कीजिए, जो P, Q, R व S चिह्नित हैं। कौन-से सही हैं?
    P: सामान्य अनुकूलन संलक्षण सचेतावस्था, प्रतिरोध व परिश्रांति का एक अविशिष्ट क्रम वर्णित करता है जो तनावकारक चाहे जो हो, घटित होता है।
    Q: दीर्घकालिक तनाव प्रतिरक्षा-कार्य को दबा सकता है और हृदय-संवहनी समस्याओं में योगदान कर सकता है।
    R: सामान्य अनुकूलन संलक्षण में परिश्रांति अवस्था वह है जहाँ शरीर किसी अचानक माँग को पूरा करने हेतु सर्वप्रथम तनाव-हार्मोन छोड़ता है।
    S: केवल बड़ी जीवन-घटनाएँ ही नहीं, दैनिक झंझटें भी तनाव का एक मान्य स्रोत हैं।

    1. P
    2. Q
    3. R
    4. S
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — P; B — Q; D — S

    P, Q व S सही हैं। R असत्य है: तनाव-हार्मोनों का आरंभिक उछाल सचेतावस्था प्रतिक्रिया का भाग है, परिश्रांति अवस्था का नहीं, जो चुके हुए संसाधनों की अंतिम अवस्था है। P अविशिष्ट त्रि-चरण क्रम सही बताता है, Q दीर्घकालिक तनाव की शारीरिक क्षति, और S कि बड़ी घटनाओं के साथ-साथ दैनिक झंझटें भी तनावकारक हैं।
  16. तनाव के सामना के बारे में इन कथनों पर विचार कीजिए, जो P, Q, R व S चिह्नित हैं। कौन-से सही हैं?
    P: समस्या-केंद्रित सामना तनावकारक को ही बदलने या हटाने की ओर निर्देशित है।
    Q: संवेग-केंद्रित सामना तनावकारक के प्रति संवेगात्मक प्रतिक्रिया को प्रबंधित करने की ओर निर्देशित है।
    R: जिन तनावकारकों को व्यक्ति नियंत्रित नहीं कर सकता, उनके लिए संवेग-केंद्रित सामना समस्या-केंद्रित सामना की अपेक्षा अधिक उपयोगी होता है।
    S: जो भी कार्य संयोगवश किसी व्यक्ति को शांत कर दे, वह केवल इसी कारण से संवेग-केंद्रित सामना के रूप में वर्गीकृत होता है।

    1. P
    2. Q
    3. R
    4. S
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — P; B — Q; C — R

    P, Q व R सही हैं। S असत्य है: सामना अपने लक्ष्य से वर्गीकृत होता है, इस आधार पर नहीं कि वह संयोगवश शांतिदायक है या नहीं — योजना बनाने जैसा समस्या-केंद्रित कार्य व्यक्ति को शांत कर सकता है फिर भी समस्या-केंद्रित ही रहता है। P व Q दो परिभाषाएँ बताते हैं, और R सही बताता है कि संवेग-केंद्रित सामना अनियंत्रणीय तनावकारकों हेतु और समस्या-केंद्रित सामना नियंत्रणीय हेतु उपयुक्त है।
  17. Maslow के सुप्रसिद्ध आवश्यकता-सोपान में पाँच स्तर हैं। सर्वोच्च को छोड़कर प्रत्येक स्तर एक अभाव आवश्यकता (D-need) है, जबकि सर्वोच्च स्तर, आत्म-सिद्धि, एक संवृद्धि या being आवश्यकता है। पाँच में से कितने स्तर अभाव आवश्यकताएँ हैं? अपना उत्तर पूर्ण संख्या में दीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 4

    पाँच स्तर हैं शारीरिक, सुरक्षा, संबद्धता व प्रेम, सम्मान, तथा आत्म-सिद्धि। पहले चार अभाव आवश्यकताएँ हैं और केवल आत्म-सिद्धि एक संवृद्धि (being) आवश्यकता है, अतः 5 - 1 = 4 स्तर अभाव आवश्यकताएँ हैं।