जीवन-पर्यंत विकास
2. जीवन-पर्यंत शारीरिक विकास
नवजात कुछ अनुकूली सहजक्रियाओं (reflexes) के साथ आते हैं (खोज, चूषण, पकड़, मोरो या चौंक सहजक्रिया), जिनमें से अधिकांश ऐच्छिक नियंत्रण विकसित होते ही लुप्त हो जाती हैं। आरंभिक शारीरिक वृद्धि दो दिशाओं में चलती है: शिरोपादीय (cephalocaudal) सिद्धांत, सिर से नीचे की ओर, अतः शिशु टाँगों से पहले सिर पर नियंत्रण पाता है; और समीपदूरस्थ (proximodistal) सिद्धांत, शरीर के केंद्र से बाहर की ओर, अतः धड़ व भुजाओं पर नियंत्रण अँगुलियों के सूक्ष्म नियंत्रण से पहले आता है। गत्यात्मक पड़ाव (बैठना, रेंगना, चलना) काफ़ी नियत क्रम में प्रकट होते हैं, यद्यपि उनका समय भिन्न होता है।
किशोरावस्था (adolescence) का आरंभ यौवनारंभ (puberty) से होता है, हार्मोनों का उछाल जो वृद्धि-उछाल, प्राथमिक लैंगिक लक्षण (जनन-अंगों का परिपक्वन) व द्वितीयक लैंगिक लक्षण (जैसे शरीर पर रोम व स्वर-परिवर्तन) लाता है; रजोदर्शन (menarche) व शुक्रदर्शन (spermarche) जनन-क्षमता दर्शाते हैं। वयस्कता (adulthood) में शारीरिक क्षमताएँ बीसवें दशक में शिखर पर होती हैं और फिर क्रमशः घटती हैं; मध्य वयस्कता में स्त्रियाँ रजोनिवृत्ति (menopause) पर पहुँचती हैं, मासिक-धर्म व प्रजनन-क्षमता का अंत। प्राथमिक वृद्धावस्था (primary ageing) — बढ़ती उम्र के अंतर्निहित, सार्वत्रिक जैविक परिवर्तन — को द्वितीयक वृद्धावस्था (secondary ageing) — रोग, अप्रयोग व जीवनशैली से हुए परिवर्तन, जो कहीं अधिक परिवर्तनशील व रोकथाम-योग्य हैं — से अलग करना उपयोगी है।
3. संज्ञानात्मक विकास: Piaget व Vygotsky
Jean Piaget ने बच्चे को ज्ञान का सक्रिय निर्माता देखा जो अनुभव को स्कीमा (schemas) में संगठित करता है और उन्हें आत्मसातीकरण (assimilation) (नए निवेश को किसी मौजूद स्कीमा में बिठाना) व समंजन (accommodation) (नए निवेश के अनुरूप स्कीमा बदलना) से संशोधित करता है, साम्यीकरण (equilibration) की ओर प्रेरित। उसने नियत क्रम में चार सार्वत्रिक चरण प्रस्तावित किए: संवेदी-प्रेरक (sensorimotor) चरण (लगभग जन्म से दो वर्ष), जो वस्तु-स्थायित्व (object permanence) पर समाप्त होता है; पूर्व-संक्रियात्मक (preoperational) चरण (लगभग दो से सात), जो प्रतीकों व भाषा से पर आत्मकेंद्रितता (egocentrism) व संरक्षण (conservation) की विफलता से भी चिह्नित है; मूर्त-संक्रियात्मक (concrete operational) चरण (लगभग सात से ग्यारह), जब बच्चा संरक्षण करता है व मूर्त वस्तुओं पर तार्किक रूप से सोचता है; और औपचारिक-संक्रियात्मक (formal operational) चरण (लगभग ग्यारह से आगे), जो अमूर्त व काल्पनिक तर्क लाता है।
Lev Vygotsky सहमत थे कि बच्चा सक्रिय है पर उन्होंने सामाजिक अंतःक्रिया व भाषा को केंद्र में रखा: उच्चतर चिंतन अधिक ज्ञानी दूसरों के साथ निर्देशित क्रिया से आंतरिकीकृत होता है। उनका मुख्य विचार, समीपस्थ विकास क्षेत्र (zone of proximal development, ZPD), वह अंतराल है जो इन दोनों के बीच पड़ता है: जो अधिगमकर्ता अकेले कर सकता है और जो वह सहायता से कर सकता है; अच्छा शिक्षण, scaffolding (पाड़-सहारा) के माध्यम से, इसी क्षेत्र में कार्य करता है, अतः Vygotsky हेतु अधिगम विकास का मात्र अनुसरण करने के बजाय उसका नेतृत्व कर सकता है। जहाँ Piaget ने सार्वत्रिक परिपक्वन-चरणों पर बल दिया, वहाँ Vygotsky ने संस्कृति व अनुदेशन पर। सूचना-प्रक्रमण विवरण एक तीसरी दृष्टि जोड़ते हैं, जो विकास को पृथक चरणों के बजाय ध्यान, स्मृति-क्षमता व प्रक्रमण-गति में क्रमिक वृद्धि मानते हैं।
5. नैतिक विकास: Piaget व Kohlberg
Piaget ने नैतिक तर्क के दो व्यापक चरण अलग किए। छोटे बच्चे परायत्त नैतिकता (heteronomous morality) (नैतिक यथार्थवाद) दिखाते हैं: नियम स्थिर व प्राधिकारी से प्राप्त होते हैं, और किसी कृत्य का दोष उसके परिणाम के आकार से आँका जाता है। बड़े बच्चे, लगभग दस से, स्वायत्त नैतिकता (autonomous morality) (नैतिक सापेक्षतावाद) दिखाते हैं: नियम ऐसे सामाजिक समझौते देखे जाते हैं जो बदल सकते हैं, और आशय (intention) परिणाम से अधिक मायने रखता है। यह परिवर्तन संज्ञानात्मक वृद्धि व सहपाठी-सहयोग के साथ आता है।
Lawrence Kohlberg ने इसे नैतिक दुविधाओं (प्रसिद्ध हाइंज़ दुविधा) से विस्तृत किया और तीन स्तर प्रस्तावित किए, प्रत्येक में दो चरण, कुल छह चरण। पूर्व-पारंपरिक (preconventional) स्तर पर नैतिकता स्वयं के परिणामों से आँकी जाती है: चरण 1 दंड-व-आज्ञापालन, चरण 2 साधनगत स्वार्थ व सरल विनिमय। पारंपरिक (conventional) स्तर पर यह सामाजिक अनुमोदन व व्यवस्था पर टिकी है: चरण 3 अनुमोदन चाहने वाला 'अच्छा बालक / अच्छी बालिका', चरण 4 कानून-व-व्यवस्था। उत्तर-पारंपरिक (postconventional) स्तर पर यह अमूर्त सिद्धांतों पर टिकी है: चरण 5 एक सामाजिक अनुबंध जो सामूहिक हित हेतु संशोधित किया जा सके, चरण 6 स्वयं-चयनित सार्वत्रिक नैतिक सिद्धांत। Carol Gilligan ने आपत्ति की कि पुरुष प्रतिदर्शों से बना Kohlberg का ढाँचा उनकी 'न्याय-नीति' के साथ-साथ 'देखभाल-नीति (ethic of care)' को कम आँकता है।
6. वृद्धावस्था के सिद्धांत
वृद्धावस्था के जैविक सिद्धांत दो परिवारों में आते हैं। क्रमादेशित सिद्धांत (programmed theories) वृद्धावस्था को एक आंतरिक जैविक समय-सारणी का अनुसरण मानते हैं — एक आनुवंशिक घड़ी, हार्मोनी व प्रतिरक्षा परिवर्तन, तथा कोशिकाओं के विभाजित हो सकने की सीमित संख्या (प्रत्येक विभाजन पर टेलोमियर छोटे होते हैं)। क्षति या त्रुटि सिद्धांत (damage or error theories) वृद्धावस्था को टूट-फूट का संचय मानते हैं: मुक्त मूलकों (free radicals) से ऑक्सीकारी क्षति, प्रोटीनों का आड़ा-बंधन (cross-linking), व यादृच्छिक उत्परिवर्तन तब तक जमा होते हैं जब तक कार्य विफल न हो। दोनों परस्पर अनन्य नहीं; अधिकांश शोधकर्ता वृद्धावस्था को क्रमादेशित सीमाओं व संचित क्षति दोनों का योग मानते हैं।
- विलगन सिद्धांत (disengagement theory) (Cumming व Henry): वृद्धावस्था में व्यक्ति व समाज का एक-दूसरे से स्वाभाविक, पारस्परिक विलगन शामिल है, जिसे सिद्धांत कार्यात्मक मानता है।
- सक्रियता सिद्धांत (activity theory) (Havighurst): उत्तर-जीवन में भलाई सक्रिय बने रहने तथा सामाजिक भूमिकाएँ व संलग्नता बनाए रखने पर निर्भर है, जो विलगन का लगभग उलटा है।
- सामाजिक-संवेगात्मक वरणात्मकता सिद्धांत (socioemotional selectivity theory) (Carstensen): जैसे-जैसे जीवन में बचा समय सीमित अनुभव होता है, लोग अपने नेटवर्क को सोच-समझकर संवेगात्मक रूप से सार्थक संबंधों तक सँकरा कर लेते हैं और सूचना-खोजी लक्ष्यों पर संवेगात्मक लक्ष्यों को प्राथमिकता देते हैं।
मुख्य बिंदु
- विकास अंतःक्रियावादी है: जीन एक परास तय करते हैं, वातावरण व्यक्ति को उसमें रखता है, और एपिजेनेटिक्स अनुभव को जीन चालू/बंद करने देता है। यमज व दत्तक अध्ययन वंशानुक्रम-वातावरण विभाजन आँकते हैं; वंशागतता विचरण के बारे में समष्टि-सांख्यिकी है, किसी एक व्यक्ति के बारे में दावा नहीं।
- मानव कोशिका में 23 जोड़ों में 46 गुणसूत्र (22 अलिंगसूत्र जोड़े व XX या XY); जीन प्रोटीन हेतु कूट रखने वाला DNA खंड है। प्रसवपूर्व विकास जननिक, भ्रूणीय (अंग बनते हैं, teratogen सर्वाधिक ख़तरनाक) व गर्भस्थ कालों में चलता है।
- शारीरिक वृद्धि शिरोपादीय (सिर से नीचे) व समीपदूरस्थ (केंद्र से बाहर) है; यौवनारंभ वृद्धि-उछाल व लैंगिक लक्षण लाता है, और रजोनिवृत्ति प्रजनन-क्षमता समाप्त करती है। प्राथमिक वृद्धावस्था अंतर्निहित व सार्वत्रिक है; द्वितीयक वृद्धावस्था रोग व जीवनशैली से आती है।
- Piaget के चार चरण हैं संवेदी-प्रेरक (वस्तु-स्थायित्व), पूर्व-संक्रियात्मक (आत्मकेंद्रितता, संरक्षण नहीं), मूर्त-संक्रियात्मक (संरक्षण, मूर्त वस्तुओं पर तर्क) व औपचारिक-संक्रियात्मक (अमूर्त तर्क)। Vygotsky ने सामाजिक अंतःक्रिया, भाषा व समीपस्थ विकास क्षेत्र पर बल दिया, जहाँ अधिगम विकास का नेतृत्व कर सकता है।
- Erikson के आठ मनोसामाजिक चरण शैशव के विश्वास-बनाम-अविश्वास से उत्तर-जीवन के समग्रता-बनाम-निराशा तक चलते हैं, जिसमें पहचान-बनाम-भूमिका-भ्रम किशोरावस्था का संकट है। अनुरक्ति (Bowlby) Ainsworth की अपरिचित-परिस्थिति से सुरक्षित, असुरक्षित-परिवर्जी, असुरक्षित-प्रतिरोधी या अव्यवस्थित के रूप में दिखती है।
- Piaget के नैतिक चरण परायत्त (नियम स्थिर, परिणाम आँका) फिर स्वायत्त (नियम परक्राम्य, आशय आँका) हैं। Kohlberg के तीन स्तर, छह चरण, पूर्व-पारंपरिक (दंड, स्वार्थ), पारंपरिक (अनुमोदन, कानून-व-व्यवस्था) व उत्तर-पारंपरिक (सामाजिक अनुबंध, सार्वत्रिक सिद्धांत) चलते हैं। वृद्धावस्था के सिद्धांत क्रमादेशित, क्षति/त्रुटि, तथा विलगन, सक्रियता व सामाजिक-संवेगात्मक वरणात्मकता के सामाजिक विवरण हैं।
अभ्यास प्रश्न (18)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
सामान्य मानव काय-कोशिका की आनुवंशिक सामग्री किस प्रकार संगठित होती है?
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उत्तर: A — 23 जोड़ों में, 22 जोड़े अलिंगसूत्र व एक जोड़ा लिंग गुणसूत्र मिलाकर
मानव काय (कायिक) कोशिका में 23 जोड़ों में 46 गुणसूत्र होते हैं: 22 अलिंगसूत्र जोड़े व एक लिंग-गुणसूत्र जोड़ा (XX या XY)। '46 जोड़े' संख्या दोगुनी कर देता है; 23 एकल गुणसूत्र युग्मक में होते हैं, काय-कोशिका में नहीं, अतः 23 एकल गुणसूत्रों वाला चयन संबंध उलट देता है; और DNA वास्तव में गुणसूत्रों में बँधा होता है।किसी मानव गुण में वंशानुक्रम व वातावरण के सापेक्ष योगदान का आकलन करने हेतु विकासात्मक मनोवैज्ञानिक सबसे सीधे किस पर निर्भर करते हैं?
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उत्तर: B — यमज अध्ययन व दत्तक अध्ययन, जो वंशानुक्रम को साझा वातावरण से अलग करने में सहायता करते हैं
समरूप व भ्रातृ यमजों की, तथा बच्चों की उनके जैविक बनाम दत्तक माता-पिता से तुलना वह तरीका है जिससे वंशानुक्रम-वातावरण योगदान अलग किए जाते हैं। एक अकेला वैयक्तिक अध्ययन दोनों को अलग नहीं कर सकता; अभिवृत्ति-सर्वेक्षण व मुक्त साहचर्य पूर्णतः भिन्न प्रश्नों से निपटते हैं।किस प्रसवपूर्व काल में प्रमुख अंग व शारीरिक तंत्र सर्वप्रथम आकार लेते हैं, जिससे यह teratogen के प्रति सर्वाधिक सुभेद्यता का समय बन जाता है?
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उत्तर: B — भ्रूणीय काल, लगभग सप्ताह दो से आठ, जब प्रमुख अंग सर्वप्रथम आकार लेते हैं
अंग-निर्माण (organogenesis) भ्रूणीय काल, सप्ताह दो से आठ में होता है, अतः तभी teratogen सर्वाधिक संरचनात्मक हानि करते हैं। जननिक काल रोपण है; गर्भस्थ काल पहले से बने अंगों की वृद्धि व परिष्करण है; प्रसवकालीन काल जन्म के आसपास है, organogenesis के बहुत बाद।यह सिद्धांत कि आरंभिक शारीरिक वृद्धि व गत्यात्मक नियंत्रण सिर से नीचे की ओर पैरों की ओर बढ़ते हैं, किस नाम से जाना जाता है?
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उत्तर: A — शिरोपादीय सिद्धांत, जिससे वृद्धि सिर से नीचे पैरों की ओर बढ़ती है
सिर-से-नीचे वृद्धि शिरोपादीय सिद्धांत है, इसीलिए सिर पर नियंत्रण चलने से पहले आता है। समीपदूरस्थ सिद्धांत केंद्र-से-बाहर वृद्धि है; साम्यीकरण व नालीकरण क्रमशः संज्ञानात्मक विकास व आनुवंशिकी की संकल्पनाएँ हैं, शारीरिक वृद्धि की दिशाएँ नहीं।वृद्धावस्था के अध्ययन में प्राथमिक वृद्धावस्था व द्वितीयक वृद्धावस्था को सही रूप में कैसे अलग किया जाता है?
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उत्तर: D — प्राथमिक वृद्धावस्था बढ़ती उम्र के अंतर्निहित, सार्वत्रिक जैविक परिवर्तनों को संदर्भित करती है, जबकि द्वितीयक वृद्धावस्था रोग, अप्रयोग या जीवनशैली से हुए परिवर्तनों को
प्राथमिक वृद्धावस्था अंतर्निहित, सार्वत्रिक जैविक ह्रास है जो सबके साथ होता है; द्वितीयक वृद्धावस्था रोग, अप्रयोग व जीवनशैली से हुआ परिवर्तनशील, प्रायः रोकथाम-योग्य ह्रास है। प्राथमिक वृद्धावस्था को रोग-व-जीवनशैली वाला अर्थ देने वाला चयन इन दोनों परिभाषाओं को उलट देता है; जन्म-से-पहले/बाल्यावस्था व संज्ञान/व्यक्तित्व वाले विकल्प किसी भी पद का वर्णन नहीं करते।Piaget के सिद्धांत में यह समझ कि वस्तुएँ दिखना बंद हो जाने पर भी अस्तित्व में बनी रहती हैं (वस्तु-स्थायित्व) किस चरण की मुख्य उपलब्धि है?
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उत्तर: C — संवेदी-प्रेरक चरण, जब शिशु यह समझने लगता है कि छिपी वस्तुएँ अब भी अस्तित्व में हैं
वस्तु-स्थायित्व संवेदी-प्रेरक चरण (जन्म से लगभग दो वर्ष) में विकसित होता है और उसकी विशिष्ट उपलब्धि है। पूर्व-संक्रियात्मक, मूर्त-संक्रियात्मक व औपचारिक-संक्रियात्मक चरण बाद के हैं और अन्य पड़ावों (क्रमशः प्रतीक, संरक्षण व अमूर्त तर्क) से परिभाषित होते हैं।एक बच्चा सहमत होता है कि दो समान गिलासों में समान मात्रा में रस है, पर एक का रस किसी अधिक ऊँचे, पतले गिलास में डालने के बाद ज़ोर देता है कि ऊँचे गिलास में अब अधिक है। Piaget इस बच्चे को किस चरण में रखेंगे?
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उत्तर: A — पूर्व-संक्रियात्मक चरण, जिसमें बच्चे आकार बदलने पर अभी मात्रा का संरक्षण नहीं कर पाते
संरक्षण में विफलता — यह सोचना कि ऊँचा गिलास अधिक है क्योंकि वह ऊँचा दिखता है — पूर्व-संक्रियात्मक चिंतन की पहचान है। मूर्त-संक्रियात्मक बच्चा संरक्षण कर कहेगा कि मात्रा अपरिवर्तित है; औपचारिक-संक्रियात्मक व संवेदी-प्रेरक अमूर्त तर्क व शिशु-संवेदी अधिगम से संबंधित हैं, इस भूल से नहीं।एक केंद्रीय तरीका जिससे Vygotsky का संज्ञानात्मक-विकास विवरण Piaget से भिन्न है, वह यह है कि Vygotsky:
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उत्तर: D — बल देते थे कि विकास सामाजिक अंतःक्रिया व भाषा से चलता है, जिसमें अधिगम समीपस्थ विकास क्षेत्र के भीतर विकास का नेतृत्व करता है
Vygotsky का विशिष्ट दावा है कि सामाजिक अंतःक्रिया व भाषा विकास चलाती हैं, और समीपस्थ विकास क्षेत्र के भीतर अनुदेशन विकास का नेतृत्व कर सकता है। हर संस्कृति में नियत सार्वत्रिक चरण Piaget की स्थिति है, Vygotsky की नहीं; दोनों सिद्धांतकार बच्चे को सक्रिय मानते हैं (अतः नकार असत्य है); और कोई नहीं कहता कि विकास शैशव में समाप्त हो जाता है।Erikson के मनोसामाजिक विकास सिद्धांत में किशोरावस्था का केंद्रीय संकट क्या है?
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उत्तर: B — पहचान बनाम भूमिका-भ्रम, स्वयं व दिशा के एक सुसंगत बोध की खोज
किशोरावस्था पहचान बनाम भूमिका-भ्रम पर केंद्रित है — यह एक स्थिर बोध बनाना कि कोई कौन है। विश्वास बनाम अविश्वास शैशव है, घनिष्ठता बनाम एकाकीपन तरुण वयस्कता, और समग्रता बनाम निराशा उत्तर वयस्कता, अतः इनमें से प्रत्येक जीवन-पर्यंत के किसी भिन्न चरण का है।Ainsworth की अपरिचित-परिस्थिति में एक शिशु जो पालक के उपस्थित रहते मुक्त रूप से अन्वेषण करता है, पालक के जाने पर व्यथित होता है, और पुनर्मिलन पर शीघ्र शांत होकर पुनः खेलने लगता है, किस रूप में वर्गीकृत होता है?
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उत्तर: A — सुरक्षित रूप से अनुरक्त, पालक को सुरक्षित आधार के रूप में उपयोग करता और उनके लौटने पर सहज शांत होता
सुरक्षित आधार से अन्वेषण, वियोग पर व्यथा, व पुनर्मिलन पर सहज शांति सुरक्षित अनुरक्ति का स्वरूप है। परिवर्जी शिशु थोड़ी व्यथा दिखाते व पालक की उपेक्षा करते हैं; प्रतिरोधी शिशु व्यथित रहते व शांत नहीं हो पाते; अव्यवस्थित शिशु कोई सुसंगत रणनीति नहीं दिखाते — वर्णित शीघ्र शांति किसी से मेल नहीं खाती।एक बच्चा कहता है कि चोरी नहीं करनी चाहिए 'क्योंकि पकड़े जाओगे और उसके लिए दंड मिलेगा'। Kohlberg के सिद्धांत में यह तर्क किस स्तर का है?
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उत्तर: C — पूर्व-पारंपरिक नैतिकता, दंड से बचने व शक्ति के आज्ञापालन से तर्क
दंड के भय से तर्क पूर्व-पारंपरिक स्तर का दंड-व-आज्ञापालन अभिविन्यास है, जहाँ नैतिकता स्वयं के परिणामों पर टिकती है। कानून-व-व्यवस्था की दुहाई पारंपरिक है; सामाजिक अनुबंध या सार्वत्रिक सिद्धांतों की दुहाई दो उत्तर-पारंपरिक चरण हैं, जो सभी पकड़े जाने के सरल भय से आगे जाते हैं।Piaget की चिरसम्मत कहानी-युग्म के एक रूप में एक बच्चा John के बारे में सुनता है, जो रात्रिभोज पर मदद करने आते हुए अनजाने में पंद्रह प्याले तोड़ देता है, और Henry के बारे में, जो जैम चुराने की कोशिश में एक प्याला तोड़ता है। एक छोटा बच्चा कहता है कि John अधिक शरारती है क्योंकि उसने अधिक प्याले तोड़े। Piaget के नैतिक निर्णय के विवरण में यह तर्क किसकी विशेषता है?
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उत्तर: C — परायत्त नैतिकता, क्योंकि बच्चा दोष को उसके पीछे के आशय के बजाय हानि के आकार से आँकता है
आशय की उपेक्षा कर हानि की मात्रा से आँकना Piaget की परायत्त नैतिकता (नैतिक यथार्थवाद) है, जो छोटे बच्चों की विशिष्टता है। आशयों को तौलना और नियमों को बदले जा सकने वाले समझौते मानना स्वायत्त नैतिकता का लक्षण है, जो बाद में आती है; यह बच्चा दोनों में से कुछ नहीं करता। सिद्धांतों पर अमूर्त तर्क औपचारिक-संक्रियात्मक चिंतन है, और उत्तर-पारंपरिक नैतिकता Kohlberg की योजना है, Piaget की नहीं, अतः टूटे प्यालों पर केंद्रित किसी छोटे बच्चे पर दोनों में से कुछ नहीं बैठता।सामाजिक-संवेगात्मक वरणात्मकता सिद्धांत (Carstensen) समझाता है कि अनेक वृद्ध वयस्क अपने सामाजिक दायरे को सोच-समझकर कुछ घनिष्ठ, संवेगात्मक रूप से सार्थक संबंधों तक क्यों सँकरा कर लेते हैं। इसका मूल प्रस्ताव है कि:
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उत्तर: D — जैसे-जैसे जीवन में बचा समय सीमित अनुभव होता है, लोग सूचना-खोजी लक्ष्यों पर संवेगात्मक रूप से सार्थक लक्ष्यों को उत्तरोत्तर प्राथमिकता देते हैं
सामाजिक-संवेगात्मक वरणात्मकता सिद्धांत सामाजिक नेटवर्कों के सँकरे होने को एक बदलते समय-क्षितिज से जोड़ता है: जब समय सीमित अनुभव होता है, संवेगात्मक रूप से सार्थक लक्ष्य सूचना-संग्रह लक्ष्यों पर जीत जाते हैं। पारस्परिक विलगन विलगन सिद्धांत है; सक्रिय बने रहना सक्रियता सिद्धांत है; मुक्त-मूलक क्षति वृद्धावस्था का जैविक सिद्धांत है, सामाजिक अभिप्रेरण का विवरण नहीं।विकास के जैविक आधार के बारे में इन कथनों पर विचार कीजिए, जो P, Q, R व S चिह्नित हैं। कौन-से सही हैं?
P: जीन DNA का वह खंड है जो किसी प्रोटीन के निर्माण के निर्देश रखता है।
Q: मनुष्यों में जैविक लिंग प्रायः लिंग गुणसूत्रों के प्रतिरूप, XX या XY, से निर्धारित होता है।
R: किसी गुण की वंशागतता हमें बताती है कि किसी एक व्यक्ति के गुण का कितना अनुपात उसके जीनों से उत्पन्न हुआ।
S: यमज व दत्तक अध्ययन वंशानुक्रम व वातावरण के सापेक्ष योगदानों का आकलन करने हेतु उपयोग होते हैं।उत्तर देखें
उत्तर: A — P; B — Q; D — S
P, Q व S सही हैं। R असत्य है: वंशागतता लोगों के बीच विचरण के उस अंश के बारे में समष्टि-सांख्यिकी है जो जीनों से जुड़ा हो, किसी एक व्यक्ति के गुण की संरचना के बारे में कथन नहीं। P जीन परिभाषित करता है, Q लिंग-निर्धारण बताता है, और S प्रकृति-पोषण प्रश्न की मानक विधियाँ नाम देता है।Piaget के संज्ञानात्मक-विकास चरणों के बारे में इन कथनों पर विचार कीजिए, जो P, Q, R व S चिह्नित हैं। कौन-से सही हैं?
P: संवेदी-प्रेरक चरण में शिशु वस्तु-स्थायित्व प्राप्त कर लेता है।
Q: आत्मकेंद्रितता व संरक्षण की विफलता पूर्व-संक्रियात्मक चरण की विशेषता है।
R: मूर्त, स्पर्शनीय समस्याओं पर तार्किक रूप से तर्क करने की क्षमता मूर्त-संक्रियात्मक चरण को चिह्नित करती है।
S: अमूर्त व काल्पनिक तर्क पूर्व-संक्रियात्मक चरण में ही पूर्णतः उपस्थित होता है।उत्तर देखें
उत्तर: A — P; B — Q; C — R
P, Q व R सही हैं। S असत्य है: अमूर्त व काल्पनिक तर्क औपचारिक-संक्रियात्मक चरण का है, पूर्व-संक्रियात्मक का नहीं, जहाँ चिंतन अभी भी दिखावे से बँधा रहता है। P, Q व R प्रत्येक किसी विशिष्टता को उसके चरण से सही मिलाते हैं।Erikson के सिद्धांत व अनुरक्ति के बारे में इन कथनों पर विचार कीजिए, जो P, Q, R व S चिह्नित हैं। कौन-से सही हैं?
P: Erikson के प्रत्येक चरण के केंद्र में एक मनोसामाजिक संकट होता है जिसका समाधान बाद के विकास को गढ़ता है।
Q: शैशव में पहला संकट विश्वास बनाम अविश्वास है।
R: Erikson की योजना में जननात्मकता बनाम ठहराव किशोरावस्था का केंद्रीय संकट है।
S: Bowlby ने तर्क दिया कि शिशु किसी पालक से अनुरक्ति बनाने हेतु जैविक रूप से प्रवृत्त होते हैं।उत्तर देखें
उत्तर: A — P; B — Q; D — S
P, Q व S सही हैं। R असत्य है: जननात्मकता बनाम ठहराव मध्य वयस्कता का संकट है, जबकि किशोरावस्था पहचान बनाम भूमिका-भ्रम है। P Erikson की संकट-संरचना बताता है, Q शिशु-चरण नाम देता है, और S अनुरक्ति पर Bowlby की जैविक दृष्टि बताता है।वृद्धावस्था के सिद्धांतों के बारे में इन कथनों पर विचार कीजिए, जो P, Q, R व S चिह्नित हैं। कौन-से सही हैं?
P: क्रमादेशित सिद्धांत वृद्धावस्था को किसी आंतरिक जैविक समय-सारणी या घड़ी का अनुसरण करता मानते हैं।
Q: क्षति या त्रुटि सिद्धांत वृद्धावस्था का कारण कोशिकीय क्षति के संचय, जैसे मुक्त मूलकों से होने वाली क्षति, को मानते हैं।
R: विलगन सिद्धांत मानता है कि वृद्ध वयस्क व समाज एक-दूसरे से पारस्परिक रूप से विलग होने की प्रवृत्ति रखते हैं।
S: सक्रियता सिद्धांत मानता है कि उत्तर-जीवन में भलाई सामाजिक भूमिकाओं व सक्रियता से विलग होने पर निर्भर है।उत्तर देखें
उत्तर: A — P; B — Q; C — R
P, Q व R सही हैं। S असत्य है और सक्रियता सिद्धांत को उलट देता है, जो मानता है कि भलाई सक्रिय व संलग्न बने रहने पर निर्भर है, विलग होने पर नहीं। P व Q जैविक सिद्धांत के दो परिवारों का सही विरोध करते हैं, और R विलगन सिद्धांत को सही बताता है।Kohlberg का नैतिक विकास सिद्धांत 3 व्यापक स्तरों में संगठित है, और प्रत्येक स्तर में 2 चरण होते हैं। पूरा सिद्धांत कुल कितने भिन्न चरण वर्णित करता है? अपना उत्तर पूर्ण संख्या में दीजिए।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 6
तीन स्तर (पूर्व-पारंपरिक, पारंपरिक, उत्तर-पारंपरिक) प्रत्येक में दो चरण मिलाकर कुल 3 x 2 = 6 चरण देते हैं: दंड-व-आज्ञापालन, साधनगत विनिमय, पारस्परिक अनुमोदन, कानून-व-व्यवस्था, सामाजिक अनुबंध, व सार्वत्रिक नैतिक सिद्धांत।