व्यवहार का जैविक एवं विकासवादी आधार

यह अध्याय मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान (XH) पेपर के खंड XH5.3, “Biological and Evolutionary Basis of Behaviour” (व्यवहार का जैविक एवं विकासवादी आधार), का उत्तर देता है, जो XH5 मनोविज्ञान का खंड XH5.3 है — आवेदन के समय चुने जाने वाले छह वैकल्पिक खंडों में से एक। यह आनुवंशिकता व व्यवहार, विकास व प्राकृतिक वरण; न्यूरॉन तथा तंत्रिका आवेग, सिनैप्टिक संचरण व तंत्रिकाप्रेषक; तंत्रिका तंत्र का संगठन, मस्तिष्क की संरचनाएँ व उनके कार्य, तथा गोलार्ध-पार्श्वीकरण; अंतःस्रावी तंत्र व व्यवहार का हार्मोनी नियमन; अभिप्रेरणा, संवेग (लिंबिक तंत्र) व स्मृति का जैविक आधार; क्षेत्र की शरीरक्रियात्मक विधियाँ, आक्रामक व अनाक्रामक दोनों; तथा आनुवंशिकी व व्यवहार, गुणसूत्रीय विसंगतियों व जुड़वाँ तथा दत्तकग्रहण द्वारा अध्ययनित प्रकृति–पालन विवाद सहित पढ़ाता है। दो संख्यात्मक प्रश्न आते हैं: जुड़वाँ-आँकड़ों से वंशागतिता आकलन व एक गुणसूत्र-गणना।

1. आनुवंशिकता, विकास व प्रकृति–पालन प्रश्न

आनुवंशिकता जीनों के माध्यम से कार्य करती है, जो गुणसूत्रों पर वहित DNA के खंड हैं; प्रारूपिक मानव कोशिका में 23 युग्मों में 46 गुणसूत्र होते हैं — 22 अलिंगसूत्र व एक लिंग-गुणसूत्र युग्म (XX स्त्री, XY पुरुष)। जीनप्ररूप (genotype) आनुवंशिक संरचना है, समलक्षणी (phenotype) अभिव्यक्त लक्षण, और अधिकांश व्यवहार बहुजीनी (polygenic) है (अनेक जीनों व पर्यावरण द्वारा मिलकर आकारित)। Darwin का प्राकृतिक वरण द्वारा विकास का सिद्धांत तीन तथ्यों पर टिका है: वंशागत विभिन्नता होती है, जीवित रहने योग्य से अधिक संतति उत्पन्न होती है, और जिन व्यक्तियों के लक्षण उत्तरजीविता व प्रजनन सुधारें वे अधिक वंशज छोड़ते हैं, अतः वे लक्षण फैलते हैं। किसी लक्षण की प्रजनन-सफलता उसकी सुयोग्यता (fitness) है, और इस प्रकार आकारित लक्षण अनुकूलन (adaptations) हैं। विकासवादी मनोविज्ञान इस तर्क को मन व व्यवहार पर लागू करता है।

व्यवहार आनुवंशिकी पूछती है कि किसी समष्टि में किसी लक्षण की विभिन्नता का कितना अंश आनुवंशिक है। वंशागतिता (h²) समलक्षणी प्रसरण का वह अनुपात है जो आनुवंशिक प्रसरण के कारण है — यह समष्टि-सांख्यिकी है, किसी एक व्यक्ति के बारे में कथन नहीं। जुड़वाँ अध्ययन एकयुग्मजी (MZ, समरूप) जुड़वों की, जो अपने लगभग सभी जीन साझा करते हैं, तुलना द्वियुग्मजी (DZ, भ्रातृ) जुड़वों से करते हैं, जो लगभग आधे साझा करते हैं; DZ की अपेक्षा MZ में कहीं अधिक समानता आनुवंशिक प्रभाव की ओर संकेत करती है, और Falconer का आकलन h² = 2(r_MZ − r_DZ) है। दत्तकग्रहण अध्ययन दत्तक बच्चों की तुलना उनके जैविक व पालक माता-पिता से करके दोनों प्रभावों को अलग करते हैं।

  • गुणसूत्रीय विसंगतियाँ व्यवहार व विकास को बदल देती हैं। डाउन सिंड्रोम त्रिसूत्रता 21 है (गुणसूत्र 21 की एक अतिरिक्त प्रति, कुल 47 देती है)। टर्नर सिंड्रोम स्त्रियों में एकल X है (45,X); क्लाइनफ़ेल्टर सिंड्रोम पुरुषों में एक अतिरिक्त X है (47,XXY); फ़्रैजाइल X बौद्धिक अक्षमता का एक प्रमुख वंशागत कारण है।
  • प्रकृति–पालन विवाद का उत्तर अब अंतःक्रिया से मिलता है: जीन व पर्यावरण मिलकर कार्य करते हैं, जीनप्ररूप एक परास तय करता है जिसे अनुभव भरता है, और एपिजेनेटिक परिवर्तन पर्यावरण को जीन-अभिव्यक्ति चालू व बंद करने देते हैं।

2. न्यूरॉन, तंत्रिका आवेग व सिनैप्टिक संचरण

एक न्यूरॉन में द्रुमिकाएँ (dendrites) होती हैं जो निवेश ग्रहण करती हैं, एक कोशिकाकाय (soma) जो उसे समेकित करता है, और एक अक्षतंतु (axon) जो निर्गत को अपने अंतस्थों तक ले जाता है, जो अगली कोशिका से सिनैप्स बनाते हैं। अनेक अक्षतंतु एक वसीय मायेलिन आच्छद धारण करते हैं जो रैनवियर के पर्व (nodes of Ranvier) से खंडित होता है, जो संचालन को तेज़ करता है। कार्यात्मक रूप से संवेदी (अभिवाही) न्यूरॉन, प्रेरक (अपवाही) न्यूरॉन व अंतरान्यूरॉन होते हैं; ग्लियल कोशिकाएँ इन्हें आधार, विद्युतरोधन व पोषण देती हैं।

विश्राम में अक्षतंतु का भीतरी भाग बाहर की तुलना में लगभग −70 mV होता है (विश्राम विभव), जिसे सोडियम–पोटैशियम पंप बनाए रखता है। जो उद्दीपक झिल्ली को देहली (लगभग −55 mV) से आगे विध्रुवित करे वह एक क्रिया विभव (action potential) प्रेरित करता है: वोल्टता-गेटित Na⁺ चैनल खुलते हैं और Na⁺ भीतर दौड़ता है (आरोही प्रावस्था), फिर K⁺ चैनल खुलते हैं और K⁺ बाहर बहता है (पुनर्ध्रुवण), उसके बाद एक संक्षिप्त दुर्दम्य काल (refractory period)। आवेग सर्व-या-अभाव नियम का पालन करता है — वह या तो पूर्णतः स्फुटित होता है या बिल्कुल नहीं, और तीव्रता स्फुटन-दर से कूटित होती है। मायेलिनित अक्षतंतुओं में आवेग पर्व-से-पर्व कूदता है, जिसे लंघक संचालन (saltatory conduction) कहते हैं, जो तेज़ है।

जब क्रिया विभव अंतस्थ तक पहुँचता है तो वह वोल्टता-गेटित Ca²⁺ चैनल खोलता है; कैल्शियम-अंतर्वाह से सिनैप्टिक पुटिकाएँ तंत्रिकाप्रेषक को सिनैप्टिक विदर (synaptic cleft) में मुक्त करती हैं। प्रेषक अगली कोशिका के ग्राहियों से जुड़कर उत्तेजक पश्च-सिनैप्टिक विभव (EPSP) या निरोधक (IPSP) उत्पन्न करता है; कोशिका तभी स्फुटित होती है जब योगित EPSP देहली तक पहुँचें। संकेत पुनर्ग्रहण, एंज़ाइमी विघटन या विसरण से समाप्त होता है। प्रमुख प्रेषक: ऐसिटिलकोलीन (पेशी-क्रिया व स्मृति; Alzheimer में क्षीण), डोपामीन (पुरस्कार व गति; Parkinson में निम्न, स्किज़ोफ़्रीनिया में संलिप्त), सेरोटोनिन (मनोदशा, निद्रा, भूख; अवसाद में निम्न), नॉरएपिनेफ़्रीन (जागृति), GABA (मुख्य निरोधक प्रेषक) व ग्लूटामेट (मुख्य उत्तेजक प्रेषक)।

3. तंत्रिका तंत्र, मस्तिष्क-संरचनाएँ व पार्श्वीकरण

तंत्रिका तंत्र केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क व मेरुरज्जु) और परिधीय तंत्रिका तंत्र में बँटता है, जिसकी स्वायत्त (autonomic) शाखा अनैच्छिक अंगों को एक अनुकंपी (sympathetic) विभाग (जागृति, लड़ो-या-भागो) से चलाती है जिसका विरोध परानुकंपी (parasympathetic) विभाग (विश्राम-व-पाचन) करता है। मस्तिष्क में पश्चमस्तिष्क में मेडुला (हृदय-स्पंदन, श्वसन), पोंस व अनुमस्तिष्क (cerebellum) (संतुलन, समन्वय, प्रेरक अधिगम) होते हैं; जालिकाकार संरचना (reticular formation) (जागृति व अवधान) मस्तिष्क-स्तंभ से ऊपर चढ़ती हुई मध्यमस्तिष्क तक जाती है; और अग्रमस्तिष्क में थैलेमस (गंध को छोड़ सभी इंद्रियों हेतु संवेदी प्रसारक), हाइपोथैलेमस (समस्थापन, भूख, प्यास, ताप व पीयूष ग्रंथि का नियंत्रण), लिंबिक तंत्र व प्रमस्तिष्क वल्कुट होते हैं।

  • वल्कुट में चार पालियाँ हैं: ललाट (frontal) (प्रेरक वल्कुट, कार्यकारी नियोजन, व वाणी-उत्पादन हेतु ब्रोका क्षेत्र), भित्तीय (parietal) (कायसंवेदी वल्कुट व दिक्स्थानिक संसाधन), शंख (temporal) (श्रवण वल्कुट व भाषा-अवबोधन हेतु वर्निक क्षेत्र) तथा पश्चकपाल (occipital) (दृष्टि वल्कुट)।
  • प्रत्येक गोलार्ध शरीर के विपरीत पक्ष को नियंत्रित करता है (विपरीत-पार्श्वीय, contralateral नियंत्रण)। अधिकांश लोगों में बायाँ गोलार्ध भाषा, तर्क व अनुक्रमिक विश्लेषण में, दायाँ दिक्स्थानिक संबंधों, चेहरों व समग्र संसाधन में विशिष्ट होता है; कॉर्पस कैलोसम इन्हें जोड़ता है, और विभक्त-मस्तिष्क (split-brain) अध्ययनों (उसे काटकर) ने इस पार्श्वीकरण को उजागर किया।

4. अंतःस्रावी तंत्र व हार्मोनी नियमन

अंतःस्रावी तंत्र रक्तप्रवाह से हार्मोन भेजता है; यह तंत्रिका तंत्र से अधिक धीरे कार्य करता है पर इसके प्रभाव अधिक समय तक रहते हैं। हाइपोथैलेमस द्वारा निर्देशित पीयूष ग्रंथि (pituitary) प्रमुख ग्रंथि है: यह वृद्धि-हार्मोन व उन पोषी हार्मोनों को मुक्त करती है जो अन्य ग्रंथियों को चलाते हैं। थायरॉइड थायरॉक्सिन स्रावित करती है, जो उपापचय-दर तय करता है। अधिवृक्क ग्रंथियों में एक वल्कुट (cortex) (कॉर्टिसोल, तनाव-हार्मोन) व एक मध्यांश (medulla) (एड्रेनलीन/एपिनेफ़्रीन व नॉरएड्रेनलीन, जो अनुकंपी तंत्रिका तंत्र के साथ लड़ो-या-भागो अनुक्रिया चलाते हैं) होते हैं। अग्न्याशय इंसुलिन व ग्लूकागॉन से रक्त-ग्लूकोज़ संतुलित करता है; जननग्रंथियाँ लिंग-हार्मोन स्रावित करती हैं — वृषण से टेस्टोस्टेरोन, अंडाशय से एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरोन; और पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन स्रावित करती है, जो निद्रा–जागरण चक्र का नियमन करता है।

🧠 दो संदेशवाहक, दो गतियाँ
तंत्रिका संकेत तेज़ व संक्षिप्त होते हैं और एक निश्चित तारयुक्त पथ पर चलते हैं; हार्मोनी संकेत धीमे व निरंतर होते हैं और रक्त के माध्यम से उपयुक्त ग्राही वाले किसी भी ऊतक तक प्रसारित होते हैं। अधिवृक्क मध्यांश दोनों की संधि पर बैठा है: वह अनुकंपी तंत्रिका तंत्र से प्रेरित होता है फिर भी हार्मोन मुक्त कर कार्य करता है, इसीलिए कोई चौंकाने वाली घटना तत्क्षण स्फुटित भी करती है और आपको कुछ मिनटों तक काँपता हुआ छोड़ देती है।

5. अभिप्रेरणा, संवेग व स्मृति का जैविक आधार

  • भूख का नियमन हाइपोथैलेमस करता है: पार्श्व हाइपोथैलेमस भोजन को प्रेरित करता है (इसकी क्षति खाने से इनकार कराती है) और अधोमध्य हाइपोथैलेमस तृप्ति संकेत देता है (इसकी क्षति अतिभोजन कराती है), जिसमें रक्त-ग्लूकोज़, भूख-हार्मोन घ्रेलिन व वसा-संकेत लेप्टिन योगदान देते हैं।
  • प्यास कोशिकीय निर्जलीकरण से व रक्त-आयतन में गिरावट से उठती है, जिसे पुनः हाइपोथैलेमस भाँपता है। निद्रा एक दैनिक लय का अनुसरण करती है जिसे हाइपोथैलेमस का सुप्राकायज़्मैटिक केंद्रक व मेलाटोनिन तय करते हैं, जो NREM व REM अवस्थाओं से चक्रित होती है, जबकि जालिकाकार संरचना समग्र जागृति को नियंत्रित करती है। यौन व्यवहार हाइपोथैलेमस व लिंग-हार्मोनों द्वारा संगठित होता है।

संवेग लिंबिक तंत्र पर केंद्रित है — अमिग्डाला (जो घटनाओं को संवेगात्मक, विशेषकर भयपूर्ण, महत्व देता है), हिप्पोकैम्पस, हाइपोथैलेमस (जो संवेग की शारीरिक अभिव्यक्ति चलाता है) व सिंगुलेट गाइरस। स्मृति अनेक संरचनाओं पर आधारित है: हिप्पोकैम्पस नई घोषणात्मक (सुस्पष्ट) स्मृतियों का समेकन करता है, अतः इसकी क्षति अग्रगामी स्मृतिलोप (anterograde amnesia) कराती है — नई दीर्घकालिक स्मृतियाँ बनाने में अक्षमता — जबकि पुरानी स्मृतियाँ व कौशल बचे रहते हैं; अमिग्डाला स्मृतियों को संवेगात्मक रंग देने में योगदान करता है, और अनुमस्तिष्क व आधारीय गुच्छिकाएँ प्रक्रियात्मक (कौशल) स्मृति धारण करती हैं। कोशिकीय स्तर पर, बार-बार प्रयोग सिनैप्सों को दीर्घकालिक पोटेंशियेशन (LTP) के माध्यम से सुदृढ़ करता है, जो अधिगम का एक आधार है।

📖 H.M. का प्रकरण
हिप्पोकैम्पस व नई स्मृति के बीच का संबंध H.M. नामक रोगी ने स्पष्ट कर दिया, जिसके मध्य शंख-पालि (medial temporal lobes), हिप्पोकैम्पस के अधिकांश भाग सहित, गंभीर मिर्गी के उपचार हेतु दोनों ओर से हटा दिए गए थे। उसके बाद वह बातचीत कर सकता था व अपने सुदूर अतीत को स्मरण कर सकता था, पर वह लोगों या घटनाओं की नई दीर्घकालिक स्मृतियाँ नहीं बना पाता था — एक गहन अग्रगामी स्मृतिलोप जिसने दिखाया कि नई घोषणात्मक स्मृतियाँ बिठाने हेतु हिप्पोकैम्पस आवश्यक है, पुरानी संचित करने हेतु नहीं।

6. शरीरक्रियात्मक विधियाँ: आक्रामक व अनाक्रामक

  • आक्रामक विधियाँ शरीर या मस्तिष्क में प्रवेश करती हैं। शारीरिक (anatomical) विधियाँ ऊतक को अभिरंजित व खंडित कर संरचना का मानचित्रण करती हैं; अपह्रासन (degeneration) तकनीकें कटे अक्षतंतु के अपह्रास का अनुसरण कर पथों का अनुरेखण करती हैं; क्षति (lesion) तकनीकें किसी क्षेत्र को नष्ट या हटा (उच्छेदन) देती हैं और व्यवहारगत हानि देखती हैं; रासायनिक विधियाँ औषधि या तंत्रिकाविषों का सूक्ष्मअंतःक्षेपण करती हैं; और सूक्ष्मइलेक्ट्रोड अध्ययन एकल न्यूरॉन के स्फुटन को अभिलेखित करते हैं।
  • अनाक्रामक विधियाँ बाहर से कार्य करती हैं। EEG खोपड़ी के इलेक्ट्रोडों से मस्तिष्क की विद्युत लय अभिलेखित करता है और उत्कृष्ट समय-विभेदन रखता है। स्कैनिंग विधियों में CT (संरचना का X-किरण चित्र), MRI (संरचना का सूक्ष्म विवरण में चुंबकीय चित्र), fMRI (जो रक्त-ऑक्सीजन परिवर्तन का अनुसरण कर कार्य का मानचित्रण करता है) व PET (जो उपापचय व कार्य के चित्रण हेतु रेडियोसक्रिय अनुरेखक प्रयोग करता है) सम्मिलित हैं। पेशीय व ग्रंथिल तंत्र EMG (पेशी-सक्रियता) व गैल्वेनिक त्वचा अनुक्रिया (स्वेद-ग्रंथि सक्रियता) से पढ़े जाते हैं।
⚠️ संरचना स्कैन बनाम कार्य स्कैन
CT व सामान्य MRI दिखाते हैं कि मस्तिष्क कैसा दिखता है (संरचना); fMRI व PET दिखाते हैं कि वह क्या कर रहा है (कार्य), रक्त-ऑक्सीजन या उपापचयी अनुरेखक का अनुसरण करके। EEG भी कार्य दिखाता है और उसका समय-विभेदन सर्वाधिक तीक्ष्ण है पर स्थान-निर्धारण दुर्बल, जबकि MRI सूक्ष्मता से स्थान बताता है पर अकेले सक्रियता के बारे में कुछ नहीं कहता। प्रश्न को विधि से मिलाना — संरचना या कार्य, समय या स्थान — सामान्य परीक्षा-बिंदु है।

मुख्य बिंदु

  • गुणसूत्रों (मनुष्य में 46, 23 युग्म) पर जीन आनुवंशिकता वहन करते हैं; प्राकृतिक वरण को वंशागत विभिन्नता, अति-उत्पादन व विभेदी प्रजनन-सफलता (सुयोग्यता) चाहिए। वंशागतिता h² समष्टि-सांख्यिकी है; जुड़वाँ व दत्तकग्रहण अध्ययन जीन को पर्यावरण से अलग करते हैं, और प्रकृति व पालन अंतःक्रिया करते हैं।
  • विश्राम विभव (−70 mV) को सोडियम–पोटैशियम पंप बनाए रखता है; देहली के बाद Na⁺ भीतर फिर K⁺ बाहर एक सर्व-या-अभाव क्रिया विभव बनाता है, मायेलिनित अक्षतंतुओं में लंघक संचालन सहित। सिनैप्टिक संचरण Ca²⁺ अंतर्वाह, पुटिका-मोचन, ग्राही-बंधन (EPSP/IPSP), फिर पुनर्ग्रहण या विघटन है।
  • CNS व PNS (अनुकंपी व परानुकंपी स्वायत्त शाखाओं सहित); पश्चमस्तिष्क (मेडुला, अनुमस्तिष्क), जालिकाकार संरचना (मस्तिष्क-स्तंभ से मध्यमस्तिष्क तक), अग्रमस्तिष्क (थैलेमस, हाइपोथैलेमस, वल्कुट)। पालियाँ: ललाट (प्रेरक, ब्रोका), भित्तीय (कायसंवेदी), शंख (श्रवण, वर्निक), पश्चकपाल (दृष्टि); नियंत्रण विपरीत-पार्श्वीय है और बायाँ गोलार्ध प्रायः भाषा-गोलार्ध है।
  • पीयूष ग्रंथि हाइपोथैलेमस के अधीन प्रमुख ग्रंथि है; थायरॉइड उपापचय तय करती है, अधिवृक्क मध्यांश एड्रेनलीन से लड़ो-या-भागो चलाता है, अग्न्याशय ग्लूकोज़ नियंत्रित करता है, जननग्रंथियाँ लिंग-हार्मोन बनाती हैं, पीनियल मेलाटोनिन बनाती है। हार्मोन तंत्रिका संकेतों से धीमे व अधिक दीर्घस्थायी हैं।
  • हाइपोथैलेमस भूख (पार्श्व भोजन प्रेरित करता है, अधोमध्य तृप्ति संकेत देता है), प्यास, निद्रा (सुप्राकायज़्मैटिक केंद्रक, मेलाटोनिन) व यौनता चलाता है। लिंबिक तंत्र (भय हेतु अमिग्डाला) संवेग का आधार है; हिप्पोकैम्पस घोषणात्मक स्मृति का समेकन करता है, अतः इसकी क्षति अग्रगामी स्मृतिलोप कराती है, और LTP अधिगम का कोशिकीय आधार है।
  • आक्रामक विधियाँ — शारीरिक, अपह्रासन, क्षति/उच्छेदन, रासायनिक व सूक्ष्मइलेक्ट्रोड — ऊतक में प्रवेश करती हैं; अनाक्रामक विधियाँ — EEG (समय), CT व MRI (संरचना), fMRI व PET (कार्य) — बाहर से कार्य करती हैं। संरचना-बनाम-कार्य व समय-बनाम-स्थान को सही उपकरण से मिलाइए।

अभ्यास प्रश्न (16)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. किसी समष्टि में प्राकृतिक वरण द्वारा विकास होने के लिए कौन-सा शर्तों का त्रिक एक साथ आवश्यक है?

    1. व्यक्तियों में वंशागत विभिन्नता, जीवित रहने योग्य से अधिक संतति, व विभेदी प्रजनन-सफलता
    2. समरूप व्यक्ति, सबके लिए असीमित संसाधन, व ऐसा प्रजनन जो किसी भी लक्षण से पूर्णतः स्वतंत्र हो
    3. व्यक्ति के जीवनकाल में अर्जित लक्षण जो फिर सीधे उस व्यक्ति की संतति को हस्तांतरित हो जाते हैं
    4. एक अपरिवर्ती पर्यावरण, एक स्थिर समष्टि-आकार, व समय के साथ किसी भी आनुवंशिक उत्परिवर्तन का पूर्ण अभाव
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — व्यक्तियों में वंशागत विभिन्नता, जीवित रहने योग्य से अधिक संतति, व विभेदी प्रजनन-सफलता

    प्राकृतिक वरण को वंशागत विभिन्नता, संतति का अति-उत्पादन, व उस विभिन्नता से जुड़ी विभेदी प्रजनन-सफलता चाहिए। समरूप व्यक्ति वरण हेतु कुछ नहीं छोड़ते; अर्जित लक्षणों की वंशागति त्यक्त लैमार्कवादी विचार है, डार्विनवादी वरण नहीं; और बिना उत्परिवर्तन वाला अपरिवर्ती पर्यावरण ऐसी दशाएँ बताता है जिनमें वरण के पास कार्य करने को कुछ न होगा।
  2. किसी दिए गए लक्षण के लिए एकयुग्मजी जुड़वाँ परस्पर द्वियुग्मजी जुड़वों की तुलना में कहीं अधिक समान हैं। यह मानते हुए कि जुड़वाँ अपना पालन-पर्यावरण समान रूप से साझा करते हैं, यह प्रतिरूप सर्वाधिक सीधे क्या सुझाता है?

    1. कि लक्षण पूर्णतः पर्यावरणीय है, क्योंकि जुड़वाँ एक ही घर में पलते हैं और अपना परिवेश साझा करते हैं
    2. कि जीन लक्षण में योगदान देते हैं, क्योंकि आनुवंशिक रूप से अधिक समान जोड़ी ही अधिक समानता वाली जोड़ी है
    3. कि लक्षण का कोई आनुवंशिक आधार ही नहीं है, क्योंकि दोनों प्रकार के जुड़वाँ एक ही दो माता-पिता से आते हैं
    4. कि वंशागतिता का पता लगाने में सक्षम एकमात्र विधि किसी जुड़वाँ-तुलना के बजाय दत्तकग्रहण है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — कि जीन लक्षण में योगदान देते हैं, क्योंकि आनुवंशिक रूप से अधिक समान जोड़ी ही अधिक समानता वाली जोड़ी है

    MZ जुड़वाँ अपने लगभग सभी जीन साझा करते हैं और DZ लगभग आधे, अतः जब समान पर्यावरण में आनुवंशिक रूप से अधिक समान जोड़ी ही अधिक समानता वाली हो, तो जीन संलिप्त होते हैं। पूर्णतः-पर्यावरणीय विकल्प का MZ–DZ अंतर खंडन करता है; दोनों जुड़वाँ-प्रकार समान जीन साझा नहीं करते (तुलना का यही मर्म है); और वंशागतिता का आकलन केवल दत्तकग्रहण ही नहीं, जुड़वाँ अध्ययन भी करते हैं।
  3. सिनैप्टिक संचरण की प्रमुख घटनाओं को उनके सही कालक्रम में व्यवस्थित कीजिए:
    (P) तंत्रिकाप्रेषक पश्च-सिनैप्टिक झिल्ली के ग्राहियों से जुड़ता है;
    (Q) क्रिया विभव अक्षतंतु-अंतस्थ पर पहुँचता है;
    (R) वोल्टता-गेटित कैल्शियम चैनल खुलते हैं व Ca²⁺ प्रवेश करता है;
    (S) सिनैप्टिक पुटिकाएँ संगलित होकर तंत्रिकाप्रेषक को विदर में मुक्त करती हैं।

    1. P, फिर Q, फिर S, फिर R
    2. Q, फिर P, फिर R, फिर S
    3. Q, फिर R, फिर S, फिर P
    4. R, फिर Q, फिर P, फिर S
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — Q, फिर R, फिर S, फिर P

    क्रिया विभव पहले पहुँचता है (Q), जो कैल्शियम चैनल खोलता है जिससे Ca²⁺ प्रवेश करता है (R), जो पुटिकाओं से प्रेषक को विदर में मुक्त कराता है (S), जो फिर पश्च-सिनैप्टिक ग्राहियों से जुड़ता है (P)। बंधन या कैल्शियम-प्रवेश से आरंभ होने वाले क्रम इस कारण-शृंखला को उलट देते हैं — आवेग के पहुँचने व कैल्शियम के प्रवेश से पहले कुछ भी मुक्त या बद्ध नहीं होता।
  4. किसी क्रिया विभव की आरोही प्रावस्था के दौरान अक्षतंतु का भीतरी भाग लगभग −70 mV से किसी धनात्मक मान की ओर झूलता है। इस तीव्र विध्रुवण के लिए कौन-सी आयनिक गति सीधे उत्तरदायी है?

    1. अभी-अभी खुले वोल्टता-गेटित पोटैशियम चैनलों से पोटैशियम आयनों (K⁺) का अक्षतंतु से बाहर बहना
    2. क्लोराइड आयनों (Cl⁻) का अक्षतंतु में बाढ़-सा आना और भीतरी भाग को विश्राम से भी अधिक ऋणात्मक बनाना
    3. सोडियम–पोटैशियम पंप का प्रत्येक दो आयातित पोटैशियम आयनों के बदले तीन सोडियम आयनों का सक्रिय विनिमय करना
    4. देहली पर खुलने वाले वोल्टता-गेटित सोडियम चैनलों से सोडियम आयनों (Na⁺) का अक्षतंतु में तीव्रता से भीतर आना
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — देहली पर खुलने वाले वोल्टता-गेटित सोडियम चैनलों से सोडियम आयनों (Na⁺) का अक्षतंतु में तीव्रता से भीतर आना

    देहली पर वोल्टता-गेटित सोडियम चैनल खुलते हैं और Na⁺ भीतर दौड़ता है, जो भीतरी भाग को धनात्मक की ओर तीव्र वृद्धि देता है। पोटैशियम का बहिर्वाह बाद के पुनर्ध्रुवण का कारण है, वृद्धि का नहीं; क्लोराइड-अंतर्वाह अतिध्रुवित करेगा; और सोडियम–पोटैशियम पंप प्रवणताओं को धीरे पुनर्स्थापित करता है और तीव्र शिखर उत्पन्न नहीं करता।
  5. एक आघात के बाद एक रोगी वाणी को भली-भाँति समझ लेता है पर केवल धीमी, रुक-रुककर, श्रमसाध्य वाणी उत्पन्न करता है। किस क्षेत्र की क्षति इस प्रतिरूप की सर्वोत्तम व्याख्या करती है?

    1. ललाट पालि में ब्रोका क्षेत्र, जो प्रवाही, उच्चारित वाणी के उत्पादन में संलग्न है
    2. शंख पालि में वर्निक क्षेत्र, जिसकी क्षति के बजाय भाषा के अवबोधन को क्षीण करती है
    3. पश्चकपाल पालि, जिसकी क्षति वाणी के उत्पादन या अवबोधन के बजाय दृष्टि को क्षीण करती है
    4. अनुमस्तिष्क, जिसकी क्षति भाषा के प्रयोग के बजाय संतुलन व प्रेरक समन्वय को क्षीण करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — ललाट पालि में ब्रोका क्षेत्र, जो प्रवाही, उच्चारित वाणी के उत्पादन में संलग्न है

    संरक्षित अवबोधन के साथ श्रमसाध्य, अप्रवाही वाणी ब्रोका क्षेत्र की क्षति का उत्कृष्ट चित्र है, जो वाणी-उत्पादन का समर्थन करता है। वर्निक की क्षति अवबोधन को क्षीण करेगी (इस स्थिति का उलटा); पश्चकपाल क्षति दृष्टि को प्रभावित करती है; और अनुमस्तिष्क क्षति संतुलन व समन्वय को, जिनमें से कोई भी विशुद्ध वाणी-निर्गत समस्या से मेल नहीं खाता।
  6. एक प्रारूपिक विभक्त-मस्तिष्क रोगी में (कॉर्पस कैलोसम कटा हुआ), कोई वस्तु केवल बाएँ दृष्टि-क्षेत्र में दिखाई जाती है, जो दाएँ गोलार्ध को प्रक्षेपित होती है। रोगी प्रायः वस्तु का नाम ज़ोर से नहीं बता पाता। क्यों?

    1. क्योंकि दायाँ गोलार्ध पूर्णतः अंधा है, अतः वस्तु के बारे में कोई दृष्टि-सूचना मस्तिष्क के किसी भी ओर पहुँचती ही नहीं
    2. क्योंकि दृष्टि-सूचना दाएँ गोलार्ध तक पहुँचती है पर, कैलोसम कटा होने से, बाएँ गोलार्ध के भाषा-केंद्रों तक पार नहीं जा सकती
    3. क्योंकि वस्तुओं का नामकरण एक ऐसा कार्य है जिसे दोनों गोलार्ध समान रूप से भली-भाँति करते हैं, अतः कैलोसम काटने से वह रोगी से पूर्णतः हट जाता है
    4. क्योंकि बायाँ दृष्टि-क्षेत्र बाएँ गोलार्ध को प्रक्षेपित होता है, जिसने इन रोगियों में अपनी समस्त भाषा-क्षमता खो दी है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — क्योंकि दृष्टि-सूचना दाएँ गोलार्ध तक पहुँचती है पर, कैलोसम कटा होने से, बाएँ गोलार्ध के भाषा-केंद्रों तक पार नहीं जा सकती

    बायाँ दृष्टि-क्षेत्र दाएँ गोलार्ध को जाता है; भाषा बाएँ गोलार्ध में है; कॉर्पस कैलोसम कटा होने से सूचना अंतरित नहीं हो सकती, अतः वाचिक बायाँ गोलार्ध उसे कभी नहीं पाता और वस्तु का नाम नहीं बता सकता। दायाँ गोलार्ध अंधा नहीं है, नामकरण गोलार्धों में समान रूप से साझा नहीं है, और बायाँ क्षेत्र बाएँ गोलार्ध को प्रक्षेपित नहीं होता।
  7. किस ग्रंथि को ‘प्रमुख ग्रंथि’ कहा जाता है क्योंकि हाइपोथैलेमस के निर्देशन में वह ऐसे हार्मोन मुक्त करती है जो कई अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों की सक्रियता को नियंत्रित करते हैं?

    1. थायरॉइड ग्रंथि, जो थायरॉक्सिन स्रावित करती है और इस प्रकार शरीर की समग्र उपापचय-दर तय करती है
    2. अधिवृक्क मध्यांश, जो एड्रेनलीन स्रावित करता है और शरीर की तीव्र लड़ो-या-भागो अनुक्रिया चलाता है
    3. पीयूष ग्रंथि, जो पोषी हार्मोन मुक्त करती है जो बदले में कई अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों का नियमन करते हैं
    4. पीनियल ग्रंथि, जो मेलाटोनिन स्रावित करती है और ऐसा करते हुए दैनिक निद्रा–जागरण चक्र का नियमन करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — पीयूष ग्रंथि, जो पोषी हार्मोन मुक्त करती है जो बदले में कई अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों का नियमन करते हैं

    पीयूष ग्रंथि प्रमुख ग्रंथि है: हाइपोथैलेमस द्वारा निर्देशित, इसके पोषी हार्मोन थायरॉइड, अधिवृक्क वल्कुट, जननग्रंथियों व अन्य को नियंत्रित करते हैं। थायरॉइड उपापचय तय करती है, अधिवृक्क मध्यांश लड़ो-या-भागो चलाता है, और पीनियल निद्रा-चक्र नियंत्रित करती है — प्रत्येक महत्वपूर्ण ग्रंथि, पर उनमें से कोई वह नहीं जो अन्य को शासित करे।
  8. एक व्यक्ति अचानक भयभीत होता है और उसका हृदय तेज़ धड़कता है, पुतलियाँ चौड़ी होती हैं व उसे ऊर्जा का एक उछाल अनुभव होता है जो कुछ मिनटों तक बना रहता है। कौन-सी संरचना वह हार्मोन मुक्त करती है जो इस निरंतर शारीरिक जागृति को सर्वाधिक सीधे उत्पन्न करता है?

    1. अग्न्याशय, इंसुलिन मुक्त करके, जो तीव्र मनोवैज्ञानिक तनाव के क्षणों में रक्त-ग्लूकोज़ घटाता है
    2. पीनियल ग्रंथि, मेलाटोनिन मुक्त करके, जो अचानक भय के प्रत्युत्तर में सतर्कता व हृदय-दर बढ़ाती है
    3. थायरॉइड ग्रंथि, संकट की तात्कालिक माँग पूरी करने हेतु सेकंडों में अतिरिक्त थायरॉक्सिन मुक्त करके
    4. अधिवृक्क मध्यांश, एड्रेनलीन (एपिनेफ़्रीन) मुक्त करके, जो लड़ो-या-भागो जागृति को बनाए रखता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — अधिवृक्क मध्यांश, एड्रेनलीन (एपिनेफ़्रीन) मुक्त करके, जो लड़ो-या-भागो जागृति को बनाए रखता है

    अधिवृक्क मध्यांश एड्रेनलीन मुक्त करता है, जो अनुकंपी तंत्रिकाओं के स्फुटन के बाद कुछ मिनटों तक तेज़ हृदय-गति व ऊर्जा-उछाल को बनाए रखता है। इंसुलिन ग्लूकोज़ घटाता है और जागृत नहीं करेगा; मेलाटोनिन निद्रा को बढ़ावा देती है, सतर्कता को नहीं; और थायरॉक्सिन अचानक आपात-उछाल के बजाय दीर्घकालिक उपापचय-दर तय करता है।
  9. लिंबिक तंत्र में कौन-सी संरचना घटनाओं को संवेगात्मक महत्व देने, विशेषकर संकट व भय की पहचान, से सर्वाधिक प्रबलता से संबद्ध है?

    1. अमिग्डाला, जो किसी उद्दीपक के संवेगात्मक व विशेषकर संकटपूर्ण महत्व को चिह्नित करता है
    2. अनुमस्तिष्क, जो संतुलन व ऐच्छिक गतियों के सहज समयन का समन्वय करता है
    3. मेडुला ऑब्लांगेटा, जो हृदय-स्पंदन व श्वसन जैसे स्वचालित जैविक कार्यों का नियमन करती है
    4. पश्चकपाल वल्कुट, जो दृष्टि-सूचना के संसाधन के आरंभिक चरण संपन्न करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — अमिग्डाला, जो किसी उद्दीपक के संवेगात्मक व विशेषकर संकटपूर्ण महत्व को चिह्नित करता है

    अमिग्डाला संवेग तथा भय व संकट की पहचान हेतु केंद्रीय लिंबिक संरचना है। अनुमस्तिष्क संतुलन व गति-समयन सँभालता है, मेडुला जैविक स्वायत्त कार्यों को नियंत्रित करती है, और पश्चकपाल वल्कुट दृष्टि सँभालता है — इनमें से कोई संवेगात्मक-महत्व संरचना नहीं।
  10. एक शोधकर्ता खोपड़ी में प्रवेश किए बिना यह मानचित्रित करना चाहता है कि कोई स्वस्थ स्वयंसेवक मानसिक अंकगणित कार्य करते समय मस्तिष्क के कौन-से क्षेत्र अधिक सक्रिय होते हैं। कौन-सी विधि सर्वाधिक उपयुक्त है?

    1. संदिग्ध क्षेत्र का त्रिविमनिर्देशांक क्षति, उसके बाद परिणामी अंकगणित-क्षमता-हानि का अवलोकन
    2. क्रियात्मक MRI (fMRI), जो रक्त-ऑक्सीजनन में परिवर्तनों का अनुसरण कर दिखाती है कि कार्य के दौरान कौन-से क्षेत्र सक्रिय हैं
    3. स्वयंसेवक के वल्कुट के एकल न्यूरॉनों में डाला गया सूक्ष्मइलेक्ट्रोड जो उनकी व्यक्तिगत स्फुटन-दर अभिलेखित करे
    4. एक अपह्रासन अध्ययन जो किसी पथ को काटकर अपह्रासित अक्षतंतुओं का अनुसरण कर अंकगणित-पथ का अनुरेखण करे
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — क्रियात्मक MRI (fMRI), जो रक्त-ऑक्सीजनन में परिवर्तनों का अनुसरण कर दिखाती है कि कार्य के दौरान कौन-से क्षेत्र सक्रिय हैं

    fMRI रक्त-ऑक्सीजन परिवर्तनों के माध्यम से कार्य-संबंधी सक्रियता मानचित्रित करती है और अनाक्रामक है, जो किसी स्वस्थ स्वयंसेवक से ठीक मेल खाती है। त्रिविमनिर्देशांक क्षति, सूक्ष्मइलेक्ट्रोड-प्रवेश व अपह्रासन अध्ययन सभी आक्रामक प्रक्रियाएँ हैं जिन्हें सामान्य कार्य मानचित्रित करने हेतु किसी स्वस्थ व्यक्ति पर नैतिक रूप से नहीं किया जा सकता।
  11. गुणसूत्रीय विसंगतियों व वंशागतिता के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. डाउन सिंड्रोम गुणसूत्र 21 की एक अतिरिक्त प्रति (त्रिसूत्रता 21) से होता है
    2. टर्नर सिंड्रोम में स्त्रियों में एकल X गुणसूत्र (45,X) होता है
    3. वंशागतिता किसी समष्टि के भीतर विभिन्नता के बारे में एक सांख्यिकी है, किसी एक व्यक्ति हेतु निश्चित आँकड़ा नहीं
    4. किसी लक्षण हेतु 0.5 वंशागतिता का अर्थ है कि किसी एकल व्यक्ति के लक्षण का ठीक आधा उसके जीनों से होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — डाउन सिंड्रोम गुणसूत्र 21 की एक अतिरिक्त प्रति (त्रिसूत्रता 21) से होता है; B — टर्नर सिंड्रोम में स्त्रियों में एकल X गुणसूत्र (45,X) होता है; C — वंशागतिता किसी समष्टि के भीतर विभिन्नता के बारे में एक सांख्यिकी है, किसी एक व्यक्ति हेतु निश्चित आँकड़ा नहीं

    डाउन सिंड्रोम त्रिसूत्रता 21 है, टर्नर सिंड्रोम 45,X है, और वंशागतिता किसी समष्टि में विभिन्नता का वर्णन करती है। यह दावा कि 0.5 वंशागतिता का अर्थ है किसी एकल व्यक्ति के लक्षण का आधा आनुवंशिक होना, प्रसिद्ध ग़लत-पाठ है: वंशागतिता प्रसरण का समष्टि-स्तरीय अनुपात है और किसी एक व्यक्ति के भीतर नहीं बाँटी जा सकती।
  12. तंत्रिकाप्रेषकों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. GABA केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में मुख्य निरोधक तंत्रिकाप्रेषक है
    2. डोपामीन पुरस्कार व गति में संलग्न है और Parkinson रोग में क्षीण हो जाता है
    3. ऐसिटिलकोलीन पेशी-क्रिया व स्मृति में भूमिका निभाता है और Alzheimer रोग में घट जाता है
    4. ग्लूटामेट प्रमुख निरोधक तंत्रिकाप्रेषक है और सदा अगले न्यूरॉन को अतिध्रुवित करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — GABA केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में मुख्य निरोधक तंत्रिकाप्रेषक है; B — डोपामीन पुरस्कार व गति में संलग्न है और Parkinson रोग में क्षीण हो जाता है; C — ऐसिटिलकोलीन पेशी-क्रिया व स्मृति में भूमिका निभाता है और Alzheimer रोग में घट जाता है

    GABA मुख्य निरोधक प्रेषक है, डोपामीन पुरस्कार व गति से जुड़ा है और Parkinson में घटता है, और ऐसिटिलकोलीन पेशी-क्रिया व स्मृति की सेवा करता है और Alzheimer में घटता है। ग्लूटामेट वाला कथन असत्य व उलटा है: ग्लूटामेट मुख्य उत्तेजक प्रेषक है, जो अगले न्यूरॉन को अतिध्रुवित करने के बजाय विध्रुवित करता है।
  13. अभिप्रेरणा व स्मृति के जैविक आधार के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. हिप्पोकैम्पस की क्षति अग्रगामी स्मृतिलोप करा सकती है, जो नई दीर्घकालिक स्मृतियाँ बनाने में अक्षमता है
    2. पार्श्व हाइपोथैलेमस भोजन आरंभ करने में संलग्न है, और इसकी क्षति खाने में विफलता की ओर ले जा सकती है
    3. हाइपोथैलेमस का सुप्राकायज़्मैटिक केंद्रक दैनिक निद्रा–जागरण लय के नियमन में सहायता करता है
    4. अनुमस्तिष्क वह संरचना है जो नए तथ्यों व घटनाओं का घोषणात्मक दीर्घकालिक स्मृति में समेकन करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — हिप्पोकैम्पस की क्षति अग्रगामी स्मृतिलोप करा सकती है, जो नई दीर्घकालिक स्मृतियाँ बनाने में अक्षमता है; B — पार्श्व हाइपोथैलेमस भोजन आरंभ करने में संलग्न है, और इसकी क्षति खाने में विफलता की ओर ले जा सकती है; C — हाइपोथैलेमस का सुप्राकायज़्मैटिक केंद्रक दैनिक निद्रा–जागरण लय के नियमन में सहायता करता है

    हिप्पोकैम्पस की क्षति अग्रगामी स्मृतिलोप कराती है, पार्श्व हाइपोथैलेमस भोजन आरंभ करता है, और सुप्राकायज़्मैटिक केंद्रक दैनिक लय का नियमन करता है। अनुमस्तिष्क वाला कथन असत्य है: अनुमस्तिष्क प्रक्रियात्मक (कौशल) स्मृति का समर्थन करता है, जबकि हिप्पोकैम्पस घोषणात्मक स्मृति का समेकन करता है।
  14. मस्तिष्क व व्यवहार के अध्ययन हेतु प्रयुक्त शरीरक्रियात्मक विधियों का निम्नलिखित में से कौन-से सही वर्णन करते हैं?

    1. EEG खोपड़ी के इलेक्ट्रोडों से मस्तिष्क की विद्युत सक्रियता अभिलेखित करता है और उसका समय-विभेदन बहुत अच्छा है
    2. किसी क्षेत्र को नष्ट कर परिणामी व्यवहार-परिवर्तन देखने वाली क्षति-तकनीक एक आक्रामक विधि है
    3. PET प्रतिबिंबन उपापचयी सक्रियता दिखाने हेतु रेडियोसक्रिय अनुरेखक प्रयोग करता है और कार्यात्मक विधि में वर्गीकृत है
    4. एक सादा संरचनात्मक MRI, अकेले, किसी कार्य के दौरान न्यूरॉनों की क्षण-प्रति-क्षण सक्रियता को सीधे मापता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — EEG खोपड़ी के इलेक्ट्रोडों से मस्तिष्क की विद्युत सक्रियता अभिलेखित करता है और उसका समय-विभेदन बहुत अच्छा है; B — किसी क्षेत्र को नष्ट कर परिणामी व्यवहार-परिवर्तन देखने वाली क्षति-तकनीक एक आक्रामक विधि है; C — PET प्रतिबिंबन उपापचयी सक्रियता दिखाने हेतु रेडियोसक्रिय अनुरेखक प्रयोग करता है और कार्यात्मक विधि में वर्गीकृत है

    EEG उत्कृष्ट समयन के साथ विद्युत सक्रियता अभिलेखित करता है, क्षति एक आक्रामक तकनीक है, और PET रेडियोसक्रिय अनुरेखक प्रयोग करने वाली कार्यात्मक विधि है। MRI वाला कथन असत्य है: सादा संरचनात्मक MRI शारीरिकी दिखाता है, क्षण-प्रति-क्षण तंत्रिका सक्रियता नहीं — वह fMRI देता है, सामान्य MRI नहीं।
  15. एक निश्चित लक्षण के लिए एकयुग्मजी (समरूप) जुड़वों के बीच सहसंबंध r_MZ = 0.80 और द्वियुग्मजी (भ्रातृ) जुड़वों के बीच r_DZ = 0.50 है। Falconer के सूत्र, वंशागतिता h² = 2(r_MZ − r_DZ), का प्रयोग कर h² परिकलित कीजिए। उत्तर एक दशमलव स्थान तक दीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 0.6

    h² = 2(r_MZ − r_DZ) = 2(0.80 − 0.50) = 2(0.30) = 0.60। यह आकलन करता है कि इस समष्टि में लक्षण के प्रसरण का 60% आनुवंशिक प्रसरण के कारण है।
  16. एक प्रारूपिक मानव देह-कोशिका में 46 गुणसूत्र होते हैं। डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्ति में गुणसूत्र 21 की एक अतिरिक्त प्रति (त्रिसूत्रता 21) होती है। ऐसे व्यक्ति की प्रत्येक देह-कोशिका में कितने गुणसूत्र होते हैं?

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 47

    त्रिसूत्रता 21 सामान्य 46 में एक अतिरिक्त गुणसूत्र जोड़ती है, जिससे प्रति देह-कोशिका 46 + 1 = 47 गुणसूत्र होते हैं।