समाजभाषाविज्ञान: विचरण, पिजिन व क्रिओल, बहुभाषिता तथा भाषा-नीति

यह अध्याय XH3 भाषाविज्ञान के खंड XH3.4, "समाजभाषाविज्ञान (भाषा एवं समाज)" का उत्तर देता है, जो मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान (XH) पेपर के छह वैकल्पिक खंडों में से एक है और आवेदन के समय चुना जाता है। शीर्षक में भाषा-विचरण (सामाजिक-बोलियाँ, बोलियाँ, बोली-भूगोल, पिजिन व क्रिओल, भाषिक चर व संप्रेषणीय दक्षता), द्वि- व बहुभाषिता (कोड-स्विचिंग व कोड-मिश्रण), तथा भाषा व नीति (विशेषकर भारत में राजभाषा-नीति, EGIDS से मापी गई संकटग्रस्तता, भाषा-हानि, अनुरक्षण, प्रलेखन व पुनरुज्जीवन, तथा अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक भाषाएँ) सम्मिलित हैं। अध्याय भाषा को एक सामाजिक वस्तु के रूप में देखता है: वह समूहों व परिस्थितियों में कैसे विचरती है, संपर्क नई भाषाएँ कैसे उत्पन्न करता है, द्विभाषी कई कोड कैसे सँभालते हैं, और राज्य व समुदाय भाषाओं की रक्षा या संवर्धन कैसे करते हैं।

1. विचरण का परिसर: बोली, सामाजिक-बोली, प्रयुक्ति व मानक

कोई भी भाषा केवल एक ही ढंग से नहीं बोलता। विचरण दो अक्षों पर संगठित है: प्रयोक्ता (user) के अनुसार और प्रयोग (use) के अनुसार। वक्ता से जुड़ी किस्में हैं बोलियाँ (dialects) (उच्चारण, शब्दावली व व्याकरण में भिन्न क्षेत्रीय किस्में), सामाजिक-बोलियाँ (sociolects) (किसी सामाजिक वर्ग या समूह की किस्में), तथा व्यक्ति-बोलियाँ (idiolects) (किसी एक व्यक्ति की वाणी); उच्चारण-भेद (accent) केवल उच्चारण है, अतः वह बोली से संकीर्ण है। परिस्थिति से जुड़ी किस्में हैं प्रयुक्तियाँ (registers) (प्रकार्यात्मक किस्में, जैसे विधिक या खेल-विवरण भाषा) तथा शैलियाँ (styles) (औपचारिकता की मात्राएँ)। मानक (standard) केवल वह बोली है जिसे संहिताबद्ध कर शासकीय व शैक्षिक समर्थन दिया गया है; वह भाषिक दृष्टि से किसी अन्य से श्रेष्ठ नहीं है।

  • शब्दजाल (jargon) किसी व्यवसाय या क्षेत्र की विशेषज्ञ शब्दावली है, और अपभाषा (slang) अनौपचारिक, प्रायः अंतर-समूह शब्दावली है जो जल्दी पुरानी पड़ जाती है; दोनों को प्रायः क्षेत्रीय बोली के बजाय प्रयोग (प्रयुक्ति व शैली) के अनुसार विचरण माना जाता है।
  • शैली (style) अनौपचारिक से सावधान वाणी तक औपचारिकता के एक पैमाने पर चलती है, और कोई एक वक्ता परिस्थिति, श्रोता व विषय के अनुसार शैली बदलता है, बिना बोली बदले।
ℹ️ डिग्लॉसिया
डिग्लॉसिया (diglossia, चार्ल्स फ़र्ग्युसन, 1959) एक स्थिर व्यवस्था है जिसमें किसी भाषा की दो किस्में काम बाँट लेती हैं: औपचारिक, लिखित व सार्वजनिक प्रकार्यों हेतु एक प्रतिष्ठित उच्च (High, H) किस्म, और घर व रोज़मर्रा की बातचीत हेतु एक निम्न (Low, L) किस्म, प्रत्येक अपने क्षेत्रों में प्रयुक्त और शायद ही अदला-बदली। शास्त्रीय बनाम बोलचाल की अरबी, तथा साहित्यिक बनाम बोलचाल की तमिल, मानक उदाहरण हैं। फ़िशमैन ने बाद में इस विचार को किसी समुदाय की दो अलग भाषाओं तक विस्तृत किया।

2. दिक् में विचरण: बोली-भूगोल

बोली-भूगोल (dialect geography / dialectology) यह मानचित्रित करता है कि विशेषताएँ भू-क्षेत्र में कहाँ बदलती हैं। मानचित्र पर एक प्रकार (variant) का उपयोग करने वाले स्थानों को दूसरे से अलग करने वाली रेखा समलेख (isogloss) है; जहाँ अनेक समलेख साथ चलते हैं वे एक गुच्छ (bundle) बनाते हैं जो किसी अनुभूत बोली-सीमा को चिह्नित करता है। फिर भी प्रायः किस्में बिना किसी तीखे विच्छेद के एक-दूसरे में घुलती हैं: बोली-सातत्य (dialect continuum) एक शृंखला है जिसमें प्रत्येक गाँव अपने पड़ोसियों को समझता है, पर दोनों सिरे परस्पर अबोधगम्य होते हैं (जैसे उत्तर भारत के मैदानों में, या महाद्वीपीय पश्चिमी जर्मानिक व रोमांस क्षेत्रों में)। प्रवास व संपर्क प्रकारों को नए क्षेत्रों में ले जाते हैं, अतः मानचित्र सदा प्रगति-में-परिवर्तन का एक क्षण-चित्र है।

इसीलिए भाषा-बनाम-बोली प्रश्न का कोई विशुद्ध भाषिक उत्तर नहीं है। परस्पर बोधगम्यता एक भाषिक कसौटी है, पर राजनीति व पहचान उसे नियमित रूप से अधिक्रमित कर देती हैं: परस्पर बोधगम्य किस्में अलग भाषाएँ कही जा सकती हैं (राजनीतिक कारणों से), जबकि परस्पर अबोधगम्य किस्में एक ही 'भाषा' के अंतर्गत समूहित की जा सकती हैं। यह बात इस कथन में निहित है, जिसे मैक्स वाइनराइख ने प्रसिद्ध रूप से उद्धृत किया: 'भाषा वह बोली है जिसके पास सेना और नौसेना हो'।

⚠️ उच्चारण-भेद बोली नहीं है
उच्चारण-भेद केवल उच्चारण का अंतर है। बोली उच्चारण के साथ-साथ शब्दों व व्याकरण में भी भिन्न होती है। दो व्यक्ति एक ही बोली साझा कर सकते हैं पर उनके उच्चारण-भेद अलग हों; प्रत्येक उच्चारण-अंतर को 'बोली' कहना उनके बीच की दूरी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है।

3. पिजिन व क्रिओल

जब बिना किसी साझा भाषा वाले समूहों को संवाद करना पड़े (प्रायः व्यापार, बागान या बंदरगाह-परिवेश में), तो एक पिजिन (pidgin) उत्पन्न हो सकता है: सरलीकृत व्याकरण, छोटी शब्दावली व किसी मातृभाषी के बिना एक लघुकृत संपर्क-भाषा, जो केवल सीमित प्रयोजनों हेतु प्रयुक्त होती है। उसकी शब्दावली मुख्यतः प्रभावी शब्द-दाता (lexifier, अधिस्तर) भाषा से आती है, जबकि व्याकरण वक्ताओं की मातृ अधःस्तर (substrate) भाषाओं से आकार पाता है। पिजिन किसी की मातृभाषा नहीं होती।

जब पिजिन मातृभाषियों का समुदाय पा लेती है और एक पूर्ण भाषा में विस्तृत होती है जो वह सब कर सके जो भाषा को करना चाहिए, तो वह क्रिओल (creole) बन जाती है (यह प्रक्रिया क्रिओलीकरण (creolization) है); हैतियाई क्रिओल एक मानक उदाहरण है; टोक पिसिन पिजिन के रूप में आरंभ हुई और अब अनेक वक्ताओं की प्रथम भाषा भी है; और पूर्वोत्तर भारत की नागामीज़ को व्यापक रूप से असमिया-आधारित क्रिओल कहा जाता है। जहाँ क्रिओल अपने शब्द-दाता के संपर्क में रहती है, वक्ता एक क्रिओल-सातत्य (creole continuum) पर फैलते हैं, निम्नस्तरीय (basilect, मानक से सर्वाधिक दूर) से मध्यस्तरीय (mesolect) होते हुए उच्चस्तरीय (acrolect, मानक के सर्वाधिक निकट) तक; समूचे समुदाय का शब्द-दाता की ओर खिसकना विक्रिओलीकरण (decreolization) है।

⚠️ मातृभाषी वाली रेखा
पिजिन को क्रिओल से अलग करने वाली एकमात्र सबसे स्पष्ट कसौटी मातृभाषी हैं: पिजिन के कोई नहीं, क्रिओल के पास एक समुदाय है जिसके लिए वह प्रथम भाषा है। क्रिओल को इसलिए 'पिजिन' कहना कि वह सरल दिखती है, या उसके आरंभ के कारण, इस बात को चूक जाता है कि वह अब एक पूर्ण, मातृभाषीकृत भाषा है।

4. भाषिक चर व संप्रेषणीय दक्षता

विलियम लैबॉव द्वारा स्थापित विचरणवादी समाजभाषाविज्ञान भाषिक चर (linguistic variable) का अध्ययन करता है: दो या अधिक प्रकारों (variants) वाली एक विशेषता जिसका चयन सामाजिक कारकों (वर्ग, आयु, लिंग, जातीयता) व शैली से सहसंबद्ध होता है। लैबॉव का न्यूयॉर्क विभागीय-भंडार अध्ययन (स्वरोत्तर (r) का) तथा (ing) चर (walking बनाम walkin') ने दिखाया कि प्रकार वर्ग के अनुसार प्रतिरूपित होते हैं और वक्ता वाणी पर जितना अधिक ध्यान देते हैं उतना प्रतिष्ठित प्रकार अधिक प्रयोग करते हैं। उपयोगी संकल्पनाएँ: प्रकट प्रतिष्ठा (overt prestige) (खुलेआम सराहा गया मानक) बनाम प्रच्छन्न प्रतिष्ठा (covert prestige) (किसी समूह के भीतर किसी अमानक रूप का छिपा मूल्य), अतिशुद्धि (hypercorrection) (कोई निम्न-स्तरीय समूह सावधान वाणी में प्रतिष्ठा-लक्ष्य से आगे निकल जाना), प्रेक्षक-विरोधाभास (observer's paradox) (हम यह दर्ज करना चाहते हैं कि लोग अप्रेक्षित होने पर कैसे बोलते हैं), तथा आभासी-काल (apparent-time) अध्ययन (परिवर्तन का अनुमान लगाने हेतु आयु-समूहों की तुलना)।

संप्रेषणीय दक्षता (communicative competence, डेल हाइम्स, 1972) वह ज्ञान है जो वक्ता को व्याकरण से परे चाहिए: यह जानना कि क्या कहें, किससे, कब, कहाँ व कैसे, ताकि वाणी केवल सुगठित ही नहीं बल्कि समुचित (appropriate) भी हो। हाइम्स ने इसे चॉम्स्की के संकीर्ण दक्षता/निष्पादन भेद के उत्तर में प्रस्तावित किया, यह तर्क देते हुए कि किसी भाषा को जानने में उसके प्रयोग के सामाजिक नियम जानना भी शामिल है। उनका SPEAKING ढाँचा (setting, participants, ends, act sequence, key, instrumentalities, norms, genre) संप्रेषण की नृजातिवर्णन में किसी वाक्-घटना के वर्णन हेतु एक जाँच-सूची है।

📖 विभागीय-भंडार परीक्षण
अपने न्यूयॉर्क अध्ययन में, लैबॉव ने भिन्न प्रतिष्ठा के तीन विभागीय भंडारों के कर्मचारियों से बस एक ऐसा प्रश्न पूछा जिसका उत्तर 'fourth floor' था, फिर दर्ज किया कि प्रत्येक (r) कितनी बार उच्चारित करता है। अधिक-प्रतिष्ठा वाले भंडार के कर्मचारियों ने प्रतिष्ठित (r) अधिक प्रयोग किया, और तीनों ने पदबंध सावधानी से दोहराने को कहे जाने पर उसे अधिक प्रयोग किया, चर को सामाजिक वर्ग व वाणी पर ध्यान दोनों से सफ़ाई से जोड़ते हुए।

5. द्विभाषिता, कोड-स्विचिंग व कोड-मिश्रण

द्विभाषिता (bilingualism) व्यक्तिगत हो सकती है (किसी एक व्यक्ति का दो भाषाओं पर अधिकार) या सामाजिक (किसी एक समुदाय में दो भाषाओं का प्रयोग)। द्विभाषी किसी एक भाषा में संतुलित (balanced) से प्रभावी (dominant) तक होते हैं। लैम्बर्ट ने योगात्मक (additive) द्विभाषिता में भेद किया, जहाँ दूसरी भाषा पहली की कोई हानि किए बिना अर्जित होती है (प्रायः प्रतिष्ठा सहित), और व्यवकलनात्मक (subtractive) द्विभाषिता में, जहाँ दूसरी भाषा पहली को विस्थापित कर देती है (प्रायः अल्पसंख्यक परिवेशों में)। हर किसी की एक मातृभाषा (mother tongue, प्रथम भाषा) होती है, साथ में बाद में सीखी गई अन्य भाषाएँ।

  • कोड-स्विचिंग (code-switching) एक ही बातचीत के भीतर भाषाओं या किस्मों के बीच अदला-बदली है। पॉपलैक के प्रकार हैं टैग-स्विचिंग (दूसरी भाषा से कोई टैग या भराव), अंतर-वाक्यीय (inter-sentential) (वाक्य-सीमा पर अदला-बदली) तथा अंतर्वाक्यीय (intra-sentential) (एक ही उपवाक्य के भीतर अदला-बदली)।
  • कोड-मिश्रण (code-mixing) प्रायः दो कोडों के तत्वों के अंतर्वाक्यीय मिश्रण को कहता है। ब्लॉम व गम्पर्ज़ ने परिस्थितिजन्य (situational) स्विचिंग (परिवेश या संबोधित व्यक्ति के बदलने से प्रेरित) को रूपकात्मक (metaphorical) स्विचिंग (एक ही परिवेश में किसी मनोवृत्ति या पहचान का संकेत देने हेतु प्रयुक्त) से अलग किया।
  • कोड-स्विचिंग व्याकरणीय प्रतिबंधों से शासित है (मायर्स-स्कॉटन का मैट्रिक्स-भाषा ढाँचा एक भाषा को आधार-ढाँचा मानता है), और यह उधार के समान नहीं है: उधार लिया शब्द दूसरी भाषा में समाहित हो जाता है, जबकि स्विच अपनी ही भाषा का व्याकरण बनाए रखता है।

6. भाषा-नीति, संकटग्रस्तता व पुनरुज्जीवन

भाषा-नीति व नियोजन (language policy and planning) की तीन शास्त्रीय शाखाएँ हैं: प्रतिष्ठा-नियोजन (status planning) (किसी भाषा की शासकीय भूमिकाएँ तय करना), कॉर्पस-नियोजन (corpus planning) (उसकी वर्तनी, व्याकरण व शब्दावली नियत करना) तथा अर्जन-नियोजन (acquisition planning) (कौन उसे सीखे इसे बढ़ावा देना, मुख्यतः विद्यालयी शिक्षा द्वारा)। भारत ऐसी नीति की एक सक्रिय प्रयोगशाला है: उसके राज्य मुख्यतः भाषिक आधार पर पुनर्गठित हुए (1956), संविधान अपनी आठवीं अनुसूची में अनुसूचित भाषाएँ सूचीबद्ध करता है और हिंदी को (अंग्रेज़ी के साथ) संघ की राजभाषा बनाता है, और त्रिभाषा सूत्र विद्यालयी शिक्षा को आकार देता है। एक बार-बार आने वाला परीक्षा-बिंदु यह है कि संविधान संघ की राजभाषा (official) का नाम लेता है, किसी 'राष्ट्रभाषा (national)' का नहीं।

कोई भाषा तब संकटग्रस्त (endangered) होती है जब वह वक्ता खो रही होती है, और सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी-संकेत है अंतर-पीढ़ीगत संप्रेषण (intergenerational transmission) में विच्छेद (माता-पिता का उसे बच्चों तक न पहुँचाना)। फ़िशमैन के GIDS ने इसका श्रेणीकरण किया, और एथ्नोलॉग द्वारा प्रयुक्त EGIDS (Expanded Graded Intergenerational Disruption Scale, लूइस व साइमन्स) किसी भाषा को एक क्रमांकित पैमाने पर रखता है जिसमें ऊँची संख्या दुर्बल जीवनी-शक्ति दर्शाती है: स्तर 6a सशक्त (vigorous) है, 6b संकटग्रस्त (threatened) है (बच्चे जनने वाली पीढ़ी में से कुछ, सब नहीं, उसे आगे बढ़ाते हैं), 7 स्थानांतरणशील (shifting) है (बच्चे जनने वाली पीढ़ी उसे आपस में बोलती है पर बच्चों तक नहीं पहुँचाती), 8a मृतप्राय (moribund) है (केवल दादा-दादी की पीढ़ी व उससे बड़े उसे बोलते हैं), और उसके बाद के चरण लगभग-विलुप्त (nearly extinct) व सुप्त (dormant) से होते हुए विलुप्त (extinct) तक जाते हैं। जब संप्रेषण पूर्णतः रुक जाता है तो भाषा स्थानांतरण (shift) और फिर मृत्यु (हानि) झेलती है। दो प्रतिक्रियाएँ उद्देश्य में भिन्न हैं: प्रलेखन (documentation) किसी भाषा को (रिकॉर्डिंग, व्याकरण, शब्दकोश, अनुबद्ध कॉर्पस) एक स्थायी अभिलेख के रूप में दर्ज करता है, जबकि पुनरुज्जीवन (revitalization) उसे फिर से बुलवाने का प्रयास करता है (जैसे हिब्रू का पुनरुद्धार, या माओरी हेतु निमज्जन 'भाषा-नीड़')। अनुरक्षण (maintenance) किसी स्वस्थ भाषा को फिसलने से रोकता है, और अल्पसंख्यक (minority) बनाम बहुसंख्यक (majority) स्थिति शक्ति व प्रतिष्ठा दर्शाती है, केवल संख्या नहीं।

⚠️ प्रलेखन पुनरुज्जीवन नहीं है
प्रलेखन किसी भाषा का अभिलेख संग्रहालय व विद्वत्ता हेतु सुरक्षित रखता है; पुनरुज्जीवन का लक्ष्य नए वक्ताओं द्वारा जीवंत, रोज़मर्रा का प्रयोग लौटाना है। पूर्णतः प्रलेखित भाषा भी मर सकती है यदि कोई बच्चा उसे न सीखे, और पुनरुज्जीवित भाषा का प्रलेखन कमज़ोर हो सकता है। परीक्षा प्रायः प्रयोजन के इसी विरोध को जाँचती है।

भारत का त्रिभाषा सूत्र, राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गढ़ा गया, यह परिकल्पित करता है कि बच्चा क्षेत्रीय भाषा, हिंदी व अंग्रेज़ी सीखे (हिंदीभाषी राज्यों में तीसरी भाषा कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा, अधिमानतः दक्षिण की)। इसके साथ, राज्यों का भाषिक आधार पर पुनर्गठन अनेक बड़ी भाषाओं को एक गृह-राज्य देकर उनकी स्थिति सुदृढ़ करता है, जबकि बिखरी हुई अल्पसंख्यक व जनजातीय भाषाएँ इसके बजाय अलग संरक्षणों तथा समुदाय-नेतृत्व वाले अनुरक्षण व पुनरुज्जीवन पर निर्भर रहती हैं।

मुख्य बिंदु

  • विचरण प्रयोक्ता के अनुसार (बोली, सामाजिक-बोली, व्यक्ति-बोली; उच्चारण-भेद केवल उच्चारण है) और प्रयोग के अनुसार (प्रयुक्ति, शैली) चलता है। मानक एक संहिताबद्ध, समर्थित बोली है, श्रेष्ठ नहीं। डिग्लॉसिया (फ़र्ग्युसन) प्रकार्यों का स्थिर उच्च/निम्न विभाजन है।
  • बोली-भूगोल विशेषताओं को समलेखों व गुच्छों से मानचित्रित करता है; बोली-सातत्य बोधगम्य पड़ोसियों पर क्रमशः घुलता है पर सिरे अबोधगम्य होते हैं। भाषा-बनाम-बोली रेखा सामाजिक व राजनीतिक है, विशुद्ध भाषिक नहीं (सेना व नौसेना)।
  • पिजिन बिना मातृभाषी, शब्द-दाता शब्दावली व अधःस्तर व्याकरण वाली लघुकृत संपर्क-भाषा है; क्रिओल मातृभाषीकृत, विस्तृत पिजिन है। क्रिओल-सातत्य निम्नस्तरीय से उच्चस्तरीय तक चलता है, और शब्द-दाता की ओर खिसकना विक्रिओलीकरण है।
  • लैबॉव के भाषिक चर के प्रकार वर्ग, आयु, लिंग व शैली से सहसंबद्ध होते हैं; मुख्य विचार हैं प्रकट बनाम प्रच्छन्न प्रतिष्ठा, अतिशुद्धि, प्रेक्षक-विरोधाभास व आभासी-काल। हाइम्स की संप्रेषणीय दक्षता व्याकरणीय ज्ञान में समुचित प्रयोग जोड़ती है।
  • द्विभाषिता व्यक्तिगत या सामाजिक, संतुलित या प्रभावी, योगात्मक या व्यवकलनात्मक होती है (लैम्बर्ट)। कोड-स्विचिंग भाषाओं की अदला-बदली करता है (टैग, अंतर- व अंतर्वाक्यीय; परिस्थितिजन्य बनाम रूपकात्मक) और उधार से भिन्न है, जो किसी शब्द को दूसरी भाषा में समाहित कर लेता है।
  • भाषा-नियोजन प्रतिष्ठा, कॉर्पस व अर्जन नियोजन है; भारत ने राज्यों को भाषिक आधार पर पुनर्गठित किया और हिंदी को (अंग्रेज़ी के साथ) राजभाषा बनाता है, राष्ट्रभाषा नहीं। संकटग्रस्तता अंतर-पीढ़ीगत संप्रेषण पर टिकी है; EGIDS जीवनी-शक्ति का श्रेणीकरण करता है; प्रलेखन दर्ज करता है जबकि पुनरुज्जीवन जीवंत प्रयोग लौटाता है।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. समाजभाषाविज्ञान में, कौन-सा पद ऐसी भाषा-किस्म का नाम है जो वक्ता के बजाय प्रयोग की परिस्थिति से परिभाषित होती है, जैसे विधिक दस्तावेज़ों या खेल-विवरण की विशेष भाषा?

    1. प्रयुक्ति (register), प्रयोग की किसी विशिष्ट परिस्थिति या क्रियाकलाप से जुड़ी प्रकार्यात्मक किस्म
    2. बोली (dialect), वक्ता के भौगोलिक मूल-स्थान से जुड़ी क्षेत्रीय किस्म
    3. सामाजिक-बोली (sociolect), वक्ता के सामाजिक वर्ग या समूह से जुड़ी किस्म
    4. व्यक्ति-बोली (idiolect), किसी एकल व्यक्ति की विशिष्ट वाक्-प्रणाली
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — प्रयुक्ति (register), प्रयोग की किसी विशिष्ट परिस्थिति या क्रियाकलाप से जुड़ी प्रकार्यात्मक किस्म

    प्रयोग की परिस्थिति से परिभाषित किस्म प्रयुक्ति है। बोली, सामाजिक-बोली व व्यक्ति-बोली सभी प्रयोक्ता से परिभाषित किस्में हैं (वह कहाँ से है, उसका सामाजिक समूह, या व्यक्ति), क्रियाकलाप से नहीं, जो ठीक वही विरोध है जो प्रश्न खींचता है।
  2. कोई समुदाय उपदेशों, लेखन व औपचारिक भाषणों हेतु एक प्रतिष्ठित उच्च किस्म, और घर व बाज़ार हेतु एक निम्न किस्म का उपयोग करता है, प्रत्येक अपने क्षेत्रों तक सीमित। फ़र्ग्युसन ने इस स्थिर व्यवस्था को क्या कहा?

    1. विक्रिओलीकरण, जहाँ समूचा वाक्-समुदाय अपनी शब्द-दाता भाषा की ओर खिसकता है
    2. डिग्लॉसिया, क्षेत्र के अनुसार एक उच्च व एक निम्न किस्म के बीच श्रम का स्थिर विभाजन
    3. अतिशुद्धि, जहाँ वक्ता अपनी सावधान वाणी में प्रतिष्ठा-लक्ष्य से आगे निकल जाते हैं
    4. कोड-मिश्रण, दो कोडों से लिए गए तत्वों का अंतर्वाक्यीय मिश्रण
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — डिग्लॉसिया, क्षेत्र के अनुसार एक उच्च व एक निम्न किस्म के बीच श्रम का स्थिर विभाजन

    क्षेत्र के अनुसार स्थिर उच्च/निम्न विभाजन डिग्लॉसिया है, फ़र्ग्युसन का पद। विक्रिओलीकरण किसी क्रिओल का शब्द-दाता की ओर खिसकना है; अतिशुद्धि किसी प्रतिष्ठा-मानक से आगे निकलना है; कोड-मिश्रण एक वाक्य में दो कोडों का मिश्रण है। केवल डिग्लॉसिया पूरक प्रकार्यात्मक क्षेत्रों वाली दो किस्मों का वर्णन करता है।
  3. बोली-मानचित्र पर, किसी विशेषता के एक प्रकार का उपयोग करने वाले स्थानों को दूसरे का उपयोग करने वाले स्थानों से अलग करने हेतु खींची गई रेखा को क्या कहते हैं?

    1. एक निम्नस्तरीय (basilect), वह किस्म चिह्नित करती जो मान्य मानक से सर्वाधिक दूर है
    2. एक मैट्रिक्स-भाषा, वह भाषा जो कोड-स्विचिंग के किसी प्रसंग में मुख्य व्याकरणीय ढाँचा प्रदान करती है
    3. एक समलेख (isogloss), चुनी गई भाषिक विशेषता में भिन्न क्षेत्रों को अलग करती रेखा
    4. एक वाक्-समुदाय, वे लोग जो किसी भाषा के प्रयोग के मानक साझा करते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — एक समलेख (isogloss), चुनी गई भाषिक विशेषता में भिन्न क्षेत्रों को अलग करती रेखा

    समलेख वह मानचित्र-रेखा है जो क्षेत्रों को किसी भाषिक प्रकार से विभाजित करती है, और समलेखों का गुच्छ बोली-सीमा चिह्नित करता है। निम्नस्तरीय क्रिओल-सातत्य का एक बिंदु है, मैट्रिक्स-भाषा कोड-स्विचिंग की संकल्पना है, और वाक्-समुदाय वक्ताओं का समूह है, इनमें से कोई मानचित्र-रेखा नहीं।
  4. दो पड़ोसी किस्में पूर्णतः परस्पर बोधगम्य हैं, फिर भी किसी राष्ट्रीय सीमा के आर-पार प्रत्येक को आधिकारिक रूप से अलग 'भाषा' कहा जाता है। कौन-सा कथन यहाँ भाषा-बनाम-बोली भेद की भाषाविदों की समझ को सर्वोत्तम रूप से दर्शाता है?

    1. जिसके अधिक वक्ता हों वही भाषा होगी और दूसरी उसकी बोली होगी
    2. जिस किस्म के पास लेखन-प्रणाली हो वही भाषा है और केवल-बोली जाने वाली बोली है
    3. परस्पर बोधगम्यता स्वयं ही निस्संदेह सिद्ध करती है कि वे एक ही और समान भाषा हैं, अतः आधिकारिक लेबल केवल कोई भूल ही होनी चाहिए
    4. यह भेद प्रायः सामाजिक व राजनीतिक है; राजनीतिक स्थिति बोधगम्यता की भाषिक कसौटी को अधिक्रमित कर सकती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — यह भेद प्रायः सामाजिक व राजनीतिक है; राजनीतिक स्थिति बोधगम्यता की भाषिक कसौटी को अधिक्रमित कर सकती है

    भाषाविदों का मत है कि भाषा/बोली रेखा बड़े पैमाने पर सामाजिक व राजनीतिक है: परस्पर बोधगम्य किस्में राजनीतिक कारणों से अलग भाषाएँ गिनी जा सकती हैं ('सेना व नौसेना' बिंदु)। वक्ता-संख्या व लेखन की उपस्थिति परिभाषक कसौटियाँ नहीं हैं, और आधिकारिक लेबलों को महज़ भूल कहना इस तथ्य की उपेक्षा है कि यह भेद मूलतः विशुद्ध भाषिक है ही नहीं।
  5. भाषा-किस्मों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. उच्चारण-भेद केवल उच्चारण का अंतर है, बोली से संकीर्ण
    2. मानक किस्म एक संहिताबद्ध बोली है, वह किस्म नहीं जो भाषिक दृष्टि से अन्य से श्रेष्ठ हो
    3. बोली-सातत्य में, निकटवर्ती किस्में बोधगम्य होती हैं पर दोनों दूरस्थ सिरे शायद न हों
    4. बोली अन्य किस्मों से केवल उच्चारण में भिन्न होती है, कभी शब्दों या व्याकरण में नहीं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उच्चारण-भेद केवल उच्चारण का अंतर है, बोली से संकीर्ण; B — मानक किस्म एक संहिताबद्ध बोली है, वह किस्म नहीं जो भाषिक दृष्टि से अन्य से श्रेष्ठ हो; C — बोली-सातत्य में, निकटवर्ती किस्में बोधगम्य होती हैं पर दोनों दूरस्थ सिरे शायद न हों

    उच्चारण-भेद केवल उच्चारण है; मानक शासकीय समर्थन वाली संहिताबद्ध किस्म है, स्वतः बेहतर नहीं; और सातत्य में पड़ोसी बोधगम्य पर सिरे अबोधगम्य होते हैं। अंतिम दावा असत्य है: बोली उच्चारण के साथ-साथ शब्दावली व व्याकरण में भी भिन्न होती है, जो ठीक वही है जो उसे महज़ उच्चारण-भेद से अलग करता है।
  6. क्रिओल के विपरीत, कौन-सी विशेषता पिजिन का परिभाषक लक्षण है?

    1. उसके कोई मातृभाषी नहीं होते और वह केवल सीमित प्रयोजनों हेतु प्रयुक्त होती है
    2. वह सदा अपनी शब्द-दाता भाषा की लिपि में लिखी जाती है
    3. वह अपना व्याकरण पूरी तरह किसी एक प्रतिष्ठा-भाषा से लेती है
    4. वह किसी बसे हुए, स्थापित समुदाय में पल रहे बच्चों द्वारा मातृभाषा के रूप में बोली जाती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उसके कोई मातृभाषी नहीं होते और वह केवल सीमित प्रयोजनों हेतु प्रयुक्त होती है

    पिजिन के कोई मातृभाषी नहीं होते और वह सीमित, प्रायः व्यावहारिक, प्रकार्य निभाती है; यही उसे क्रिओल से अलग करने वाली सबसे तीखी रेखा है। पिजिन का लिखा होना आवश्यक नहीं; उसका व्याकरण अधःस्तर भाषाओं से आकार पाता है, किसी एक भाषा से पूरा नहीं लिया जाता; और बच्चों द्वारा मातृभाषा के रूप में बोला जाना क्रिओल का वर्णन है, पिजिन का नहीं।
  7. एक संपर्क-भाषा जो सरलीकृत व्यापारिक शब्दजाल के रूप में आरंभ हुई थी, अब बच्चों के समूचे समुदाय की प्रथम भाषा है, पूर्ण व विस्तृत व्याकरण सहित। इस भाषा का सर्वोत्तम वर्णन क्या है?

    1. एक पिजिन, क्योंकि उसका मूल स्रोत किसी पूर्ववर्ती सरलीकृत व्यापारिक शब्दजाल में है
    2. एक क्रिओल, क्योंकि कोई पिजिन किसी समुदाय की मातृभाषा बन गई है
    3. एक प्रयुक्ति, क्योंकि वह व्यापार के विशेष प्रयोजन हेतु प्रयुक्त है
    4. एक समलेख, क्योंकि वह दो व्यापारिक क्षेत्रों के बीच सीमा चिह्नित करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — एक क्रिओल, क्योंकि कोई पिजिन किसी समुदाय की मातृभाषा बन गई है

    जो पिजिन मातृभाषी पा ले और पूर्ण भाषा में विस्तृत हो जाए वह क्रिओल है; यही क्रिओलीकरण है। उसका व्यापारिक उद्गम उसे अब पिजिन नहीं बनाए रखता जब उसके मातृभाषी हैं। प्रयुक्ति एक परिस्थितिजन्य किस्म है, और समलेख मानचित्र की रेखा है, अतः कोई भी मातृभाषीकृत संपर्क-भाषा पर नहीं बैठता।
  8. पिजिन के निर्माण में, शब्द-दाता (अधिस्तर) व अधःस्तर का कौन-सा वर्णन सही है?

    1. शब्द-दाता अधिकांश व्याकरण देता है, जबकि अधःस्तर अधिकांश शब्दावली देता है
    2. शब्दावली व व्याकरण दोनों केवल अधःस्तर भाषाओं से समान रूप से आते हैं
    3. शब्द-दाता अधिकांश शब्दावली देता है, जबकि अधःस्तर भाषाएँ व्याकरण को आकार देती हैं
    4. शब्दावली व व्याकरण दोनों केवल शब्द-दाता भाषा से समान रूप से आते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — शब्द-दाता अधिकांश शब्दावली देता है, जबकि अधःस्तर भाषाएँ व्याकरण को आकार देती हैं

    परिभाषा से शब्द-दाता (प्रायः सामाजिक रूप से प्रभावी भाषा) अधिकांश शब्द देता है, जबकि वक्ताओं की अपनी अधःस्तर भाषाएँ व्याकरण व ध्वनिविज्ञान को प्रभावित करती हैं। इन भूमिकाओं को उलटने वाले, या सब कुछ एक ही पक्ष को देने वाले वर्णन, पिजिन के निर्माण के मानक विवरण को ग़लत बताते हैं।
  9. लैबॉवीय विचरणवादी समाजभाषाविज्ञान में, 'भाषिक चर' की सर्वोत्तम परिभाषा क्या है?

    1. एक व्याकरणीय नियम जो भाषा के प्रत्येक एकल शब्द पर बिना किसी अपवाद लागू माना जाता है
    2. एक शब्द जो किसी प्रतिष्ठा-भाषा से उधार लेकर पूर्णतः समाहित किया गया है
    3. मानक किस्म के प्रत्येक वक्ता द्वारा साझा एक निश्चित उच्चारण
    4. दो या अधिक प्रकारों वाली एक विशेषता जिसका प्रयोग सामाजिक व शैलीगत कारकों से सहसंबद्ध होता है
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    उत्तर: D — दो या अधिक प्रकारों वाली एक विशेषता जिसका प्रयोग सामाजिक व शैलीगत कारकों से सहसंबद्ध होता है

    भाषिक चर विकल्पी प्रकारों वाली एक विशेषता है (जैसे -ing बनाम -in') जिसका वितरण वर्ग, आयु, लिंग व शैली से सहसंबद्ध होता है। अपवाद-रहित नियम ध्वनि-नियम है; समाहित उधार-शब्द उधार है; और एक निश्चित उच्चारण चर का विलोम है, जो परिभाषा से विचरता है।
  10. डेल हाइम्स ने 'संप्रेषणीय दक्षता' मुख्यतः यह तर्क देने हेतु प्रस्तुत की कि किसी भाषा को जानने में शामिल है:

    1. न केवल उसका व्याकरण जानना बल्कि संदर्भ हेतु उसे समुचित रूप से प्रयोग करना भी जानना
    2. केवल उन औपचारिक नियमों में निपुणता जो उसके सभी और केवल व्याकरणसम्मत वाक्य उत्पन्न करते हैं
    3. मानक लिखित रूप की संपूर्ण शब्दावली व वर्तनी कंठस्थ करना
    4. वह आद्य-भाषा पुनर्निर्मित करना जिससे आधुनिक भाषा उतरी है
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    उत्तर: A — न केवल उसका व्याकरण जानना बल्कि संदर्भ हेतु उसे समुचित रूप से प्रयोग करना भी जानना

    संप्रेषणीय दक्षता व्याकरणीय ज्ञान में समुचित प्रयोग का ज्ञान (किससे, कब, कहाँ, कैसे) जोड़ती है, जो चॉम्स्की की विशुद्ध व्याकरणीय दक्षता का उत्तर है। केवल व्याकरणीय नियम ही वह थे जिन्हें हाइम्स ने बहुत संकीर्ण पाया; शब्दावली कंठस्थ करना व आद्य-भाषा पुनर्निर्माण उनकी संकल्पना से असंबद्ध हैं।
  11. लैबॉव के विचरणवादी निष्कर्षों व विधियों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. वक्ता वाणी पर जितना अधिक ध्यान देते हैं, प्रकट-प्रतिष्ठा प्रकार उतना अधिक प्रयोग करते हैं
    2. अतिशुद्धि किसी निम्न-स्तरीय समूह को सावधान शैलियों में किसी प्रतिष्ठा-प्रकार पर उच्च-स्तरीय वक्ताओं से आगे ले जा सकती है
    3. प्रेक्षक-विरोधाभास यह कठिनाई है कि लोग अप्रेक्षित होने पर कैसे बोलते हैं इसे दर्ज करना
    4. कोई अमानक रूप कभी प्रतिष्ठा धारण नहीं कर सकता, क्योंकि प्रतिष्ठा केवल मानक रूपों की होती है
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    उत्तर: A — वक्ता वाणी पर जितना अधिक ध्यान देते हैं, प्रकट-प्रतिष्ठा प्रकार उतना अधिक प्रयोग करते हैं; B — अतिशुद्धि किसी निम्न-स्तरीय समूह को सावधान शैलियों में किसी प्रतिष्ठा-प्रकार पर उच्च-स्तरीय वक्ताओं से आगे ले जा सकती है; C — प्रेक्षक-विरोधाभास यह कठिनाई है कि लोग अप्रेक्षित होने पर कैसे बोलते हैं इसे दर्ज करना

    पहले तीन विचरणवादी कार्य के मानक परिणाम हैं: वाणी पर ध्यान बढ़ने से प्रतिष्ठा-प्रकार बढ़ते हैं; निम्न-मध्यवर्ग की अतिशुद्धि औपचारिक शैलियों में उच्च-स्तरीय प्रयोग से आगे निकल सकती है; और प्रेक्षक-विरोधाभास रिकॉर्डिंग-समस्या का नाम है। अंतिम दावा असत्य है: प्रच्छन्न प्रतिष्ठा दिखाती है कि अमानक रूप खुली स्वीकृति के अभाव में भी किसी समूह के भीतर मूल्यवान हो सकता है, इसीलिए ऐसे रूप बने रहते हैं।
  12. एक द्विभाषी वक्ता किसी हिंदी उपवाक्य के बीच में एक अंग्रेज़ी संज्ञा-पदबंध डाल देता है, उपवाक्य को शेष रूप से हिंदी में रखते हुए। इस उपवाक्य-भीतरी अदला-बदली का सर्वोत्तम वर्णन क्या है?

    1. अंतर-वाक्यीय कोड-स्विचिंग, क्योंकि अदला-बदली दो पूर्ण वाक्यों के बीच होती है
    2. अंतर्वाक्यीय कोड-स्विचिंग (कोड-मिश्रण), क्योंकि अदला-बदली एक ही उपवाक्य के भीतर होती है
    3. विक्रिओलीकरण, क्योंकि वक्ता किसी अधिक प्रतिष्ठित शब्द-दाता की ओर बढ़ रहा है
    4. डिग्लॉसिया, क्योंकि दोनों भाषाएँ अलग प्रकार्यात्मक क्षेत्रों को सौंपी गई हैं
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    उत्तर: B — अंतर्वाक्यीय कोड-स्विचिंग (कोड-मिश्रण), क्योंकि अदला-बदली एक ही उपवाक्य के भीतर होती है

    एक ही उपवाक्य के भीतर की अदला-बदली अंतर्वाक्यीय कोड-स्विचिंग है, जिसे प्रायः कोड-मिश्रण कहते हैं। अंतर-वाक्यीय अदला-बदली वाक्य-सीमाओं पर होती है, उपवाक्य के भीतर नहीं। विक्रिओलीकरण किसी क्रिओल का शब्द-दाता की ओर खिसकना है, और डिग्लॉसिया दो किस्मों का क्षेत्र-आधारित विभाजन है, इनमें से कोई एकल उपवाक्य-भीतरी स्विच नहीं।
  13. द्विभाषिता व कोड-स्विचिंग के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. योगात्मक द्विभाषिता पहली भाषा की हानि के बिना दूसरी जोड़ती है, व्यवकलनात्मक द्विभाषिता के विपरीत
    2. कोड-स्विचिंग यादृच्छिक है और किसी भी व्याकरणीय प्रतिबंध का पालन नहीं करती
    3. उधार किसी शब्द को ग्राही भाषा में समाहित कर लेता है, जबकि स्विच अपना ही व्याकरण बनाए रखता है
    4. सामाजिक द्विभाषिता किसी एक ही समुदाय के भीतर दो भाषाओं के प्रयोग को कहती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — योगात्मक द्विभाषिता पहली भाषा की हानि के बिना दूसरी जोड़ती है, व्यवकलनात्मक द्विभाषिता के विपरीत; C — उधार किसी शब्द को ग्राही भाषा में समाहित कर लेता है, जबकि स्विच अपना ही व्याकरण बनाए रखता है; D — सामाजिक द्विभाषिता किसी एक ही समुदाय के भीतर दो भाषाओं के प्रयोग को कहती है

    योगात्मक द्विभाषिता दूसरी जोड़ते हुए पहली भाषा बनाए रखती है; उधार किसी शब्द को समाहित करता है जबकि स्विचिंग प्रत्येक भाषा का व्याकरण सुरक्षित रखती है; और सामाजिक द्विभाषिता समुदाय-स्तरीय है। यह दावा कि कोड-स्विचिंग यादृच्छिक है, असत्य है: वह नियम-शासित है, जैसा मैट्रिक्स-भाषा ढाँचा व अन्य प्रतिबंध-मॉडल दिखाते हैं।
  14. ब्लॉम व गम्पर्ज़ ने दो प्रकार की स्विचिंग में भेद किया। जो वक्ता केवल एकजुटता या मनोवृत्ति-परिवर्तन का संकेत देने हेतु भाषाएँ बदलता है, बिना परिवेश या संबोधित व्यक्ति में किसी बदलाव के, वह कर रहा है:

    1. परिस्थितिजन्य स्विचिंग, क्योंकि यह बाह्य परिस्थिति के बदलाव से उत्प्रेरित होती है
    2. विक्रिओलीकरण, क्योंकि वक्ता निम्नस्तरीय छोड़कर उच्चस्तरीय अपना रहा है
    3. रूपकात्मक स्विचिंग, क्योंकि यह एक ही परिवेश में सामाजिक अर्थ संप्रेषित करने हेतु प्रयुक्त होती है
    4. कॉर्पस-नियोजन, क्योंकि वक्ता दोनों कोडों का व्याकरण मानकीकृत कर रहा है
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    उत्तर: C — रूपकात्मक स्विचिंग, क्योंकि यह एक ही परिवेश में सामाजिक अर्थ संप्रेषित करने हेतु प्रयुक्त होती है

    बिना परिवेश-परिवर्तन के मनोवृत्ति या एकजुटता संकेत देने हेतु स्विचिंग रूपकात्मक स्विचिंग है; इसके विपरीत परिस्थितिजन्य स्विचिंग परिवेश या संबोधित व्यक्ति के बदलाव से प्रेरित होती है। विक्रिओलीकरण क्रिओल-परिघटना है और कॉर्पस-नियोजन नीति-क्रियाकलाप है, अतः कोई भी इस वाक्-क्रिया का वर्णन नहीं करता।
  15. EGIDS पर व फ़िशमैन के ढाँचे में, किसी भाषा के संकटग्रस्त होने के सबसे निर्णायक चेतावनी-संकेत के रूप में किस एकल कारक को माना जाता है?

    1. किसी मानकीकृत वर्तनी-प्रणाली या दीर्घ लिखित साहित्यिक परंपरा का अभाव
    2. किसी पड़ोसी बहुसंख्यक भाषा से बड़ी संख्या में शब्दों का उधार
    3. भाषा के भीतर कई ऐसी क्षेत्रीय बोलियों का अस्तित्व जो स्पष्टतः एक-दूसरे से भिन्न हों
    4. अंतर-पीढ़ीगत संप्रेषण में विच्छेद, जहाँ बच्चे अब उसे घर पर अर्जित नहीं करते
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — अंतर-पीढ़ीगत संप्रेषण में विच्छेद, जहाँ बच्चे अब उसे घर पर अर्जित नहीं करते

    फ़िशमैन का कार्य व EGIDS दोनों अंतर-पीढ़ीगत संप्रेषण को केंद्रीय सूचक बनाते हैं: भाषा जीवित रहती है यदि बच्चे उसे घर पर सीखें। मानक वर्तनी या लिखित परंपरा का अभाव, शब्दों का उधार, या भीतरी बोलियाँ होना स्वयं संकटग्रस्तता के संकेत नहीं हैं, क्योंकि अनेक सशक्त भाषाएँ तीनों दिखाती हैं।
  16. भाषा-नीति, संकटग्रस्तता व प्रलेखन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. प्रतिष्ठा-नियोजन किसी भाषा की शासकीय भूमिकाओं से संबंधित है, जबकि कॉर्पस-नियोजन उसके रूप, जैसे वर्तनी व व्याकरण, नियत करता है
    2. प्रलेखन का लक्ष्य किसी भाषा को दर्ज करना है, जबकि पुनरुज्जीवन का लक्ष्य उसका जीवंत रोज़मर्रा का प्रयोग लौटाना है
    3. अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक स्थिति विशुद्ध रूप से वक्ता-संख्या का मामला है, जिसमें शक्ति व प्रतिष्ठा की कोई भूमिका नहीं
    4. कोई भाषा पूरी तरह प्रलेखित हो सकती है फिर भी मर सकती है यदि कोई नई पीढ़ी उसे बोलना न सीखे
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — प्रतिष्ठा-नियोजन किसी भाषा की शासकीय भूमिकाओं से संबंधित है, जबकि कॉर्पस-नियोजन उसके रूप, जैसे वर्तनी व व्याकरण, नियत करता है; B — प्रलेखन का लक्ष्य किसी भाषा को दर्ज करना है, जबकि पुनरुज्जीवन का लक्ष्य उसका जीवंत रोज़मर्रा का प्रयोग लौटाना है; D — कोई भाषा पूरी तरह प्रलेखित हो सकती है फिर भी मर सकती है यदि कोई नई पीढ़ी उसे बोलना न सीखे

    प्रतिष्ठा- व कॉर्पस-नियोजन सही रूप से अलग किए गए हैं; प्रलेखन व पुनरुज्जीवन उद्देश्य में भिन्न हैं; और केवल प्रलेखन नए वक्ताओं के बिना किसी भाषा को जीवित नहीं रख सकता। अल्पसंख्यक/बहुसंख्यक दावा असत्य है: ये स्थितियाँ शक्ति व प्रतिष्ठा दर्शाती हैं, केवल संख्या नहीं, अतः संख्या में छोटा समूह सामाजिक रूप से प्रभावी हो सकता है।
  17. EGIDS-शैली के श्रेणीकरण में, कोई भाषा माता-पिता (बच्चे जनने वाली) पीढ़ी द्वारा आपस में बोली जाती है, पर वह पीढ़ी उसे अपने बच्चों तक नहीं पहुँचाती। यह वर्णन किस स्तर पर बैठता है?

    1. स्तर 6a (सशक्त), क्योंकि सभी पीढ़ियाँ उसका प्रयोग करती हैं और बच्चे उसे अब भी घर पर अर्जित करते हैं
    2. स्तर 6b (संकटग्रस्त), क्योंकि बच्चे जनने वाली पीढ़ी में से कुछ, सब नहीं, उसे अब भी आगे बढ़ाते हैं
    3. स्तर 7 (स्थानांतरणशील), क्योंकि माता-पिता की पीढ़ी उसका प्रयोग करती है पर बच्चों तक नहीं पहुँचाती
    4. स्तर 8a (मृतप्राय), क्योंकि केवल दादा-दादी की पीढ़ी व उससे बड़े अब भी उसका प्रयोग करते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — स्तर 7 (स्थानांतरणशील), क्योंकि माता-पिता की पीढ़ी उसका प्रयोग करती है पर बच्चों तक नहीं पहुँचाती

    माता-पिता का आपस में भाषा बोलना पर बच्चों तक पहुँचाना बंद कर देना स्तर 7, स्थानांतरणशील, का परिभाषक चिह्न है। स्तर 6a का अर्थ है कि बच्चे उसे अब भी अर्जित करते हैं; 6b का अर्थ है कि बच्चे जनने वाली पीढ़ी में से कुछ अब भी उसे आगे बढ़ाते हैं, जबकि यहाँ कोई नहीं बढ़ाता; और 8a का अर्थ है कि माता-पिता की पीढ़ी उसे बिल्कुल प्रयोग नहीं करती, केवल दादा-दादी की पीढ़ी व उससे बड़े बचे हैं, जो माता-पिता के जारी प्रयोग का खंडन करता है।