ऐतिहासिक भाषाविज्ञान: ध्वनि-नियम, व्याकरणीकरण, पुनर्निर्माण व भाषा-संपर्क
2. ग्रिम का नियम: प्रथम जर्मानिक व्यंजन-स्थानांतरण
ग्रिम का नियम, जिसे जेकब ग्रिम ने 1822 में प्रस्तुत किया (और जिसकी पूर्वछाया रास्मस रास्क में थी), बताता है कि आद्य-भारोपीय (Proto-Indo-European, PIE) स्पर्श व्यंजन कैसे स्थानांतरित हुए जब आद्य-जर्मानिक शेष भारोपीय से अलग हुई। यह तीन श्रेणियों में एक शृंखला-स्थानांतरण (chain shift) है, अतः स्पर्शों का प्रत्येक वर्ग उस स्थान में चला गया जिसे अगला खाली कर चुका था। इसीलिए जर्मानिक शब्द अपने लैटिन, ग्रीक या संस्कृत समकक्षों से इतने भिन्न दिखते हुए भी उनके नियमित अनुरूपी हैं।
| PIE ध्वनि | जर्मानिक में बनती है | उदाहरण (लैटिन — अंग्रेज़ी) |
|---|---|---|
| अघोष स्पर्श p, t, k | अघोष संघर्षी f, th, h | pater — father (पिता), tres — three (तीन), cornu — horn (सींग) |
| घोष स्पर्श b, d, g | अघोष स्पर्श p, t, k | decem — ten (दस), genu — knee (घुटना) |
| घोष महाप्राण bh, dh, gh | घोष स्पर्श b, d, g | frater (bh) — brother (भाई), foris (dh) — door (दरवाज़ा) |
लैटिन पुराने PIE स्पर्शों को सुरक्षित रखती है, अतः लैटिन शब्द PIE रूप का सुविधाजनक प्रतिनिधि है। pater > father में p व t दोनों स्थानांतरित होते हैं (p से f, t से th)। decem > ten में d, t बनता है और k, h बनता है (जो अंग्रेज़ी में बाद में लुप्त हो गया)। महत्वपूर्ण बात: ग्रिम का नियम केवल स्पर्शों को छूता है: नासिक्य (m, n), पार्श्विक/लुंठित (l, r) व स्वर अपरिवर्तित निकल जाते हैं, इसीलिए mater अपना m mother में रखता है और noct- का n night में बचा रहता है।
3. वर्नर का नियम व अन्य परिष्करण
ग्रिम के नियम के कुछ हठीले अपवाद थे: कभी-कभी PIE अघोष स्पर्श ग्रिम द्वारा अनुमानित अघोष के बजाय जर्मानिक घोष संघर्षी बन जाता था। 1875 में कार्ल वर्नर ने दिखाया कि ये अपवाद थे ही नहीं, बल्कि एक दूसरा नियमित नियम थे। वर्नर का नियम: ग्रिम के नियम से बने अघोष संघर्षी (तथा उत्तराधिकार में मिला s) (प्रायः स्वरों के बीच) घोष हो जाते थे, जब PIE शब्द-स्वराघात ठीक पूर्ववर्ती अक्षर पर नहीं पड़ता था। जब बाद में जर्मानिक स्वराघात एकसमान रूप से प्रथम अक्षर पर खिसक गया, तो मूल परिवेश-शर्त दृष्टि से ओझल हो गई, इसीलिए वर्नर द्वारा पुराने स्वराघात-स्थान को पुनर्स्थापित करने तक प्रतिरूप अव्यवस्थित दिखता था।
वर्नर के नियम से बना घोष z बाद में उत्तरी व पश्चिमी जर्मानिक में r बन गया (रेफीकरण / rhotacism), जो was/were में s/r विकल्पन का स्रोत है। दो और नामित नियम जानने योग्य हैं। संस्कृत व ग्रीक में ग्रासमान का नियम (Grassmann's Law) (महाप्राणों का विषमीकरण) लगातार अक्षरों में आए दो महाप्राण व्यंजनों में से पहले का महाप्राणत्व हटा देता है। लैटिन में भी रेफीकरण लगा (honos > honor)। प्रत्येक वही सीख देता है: स्पष्ट अनियमितता प्रायः किसी और नियमित नियम में घुल जाती है।
4. व्याकरणीकरण व अर्थ-परिवर्तन
व्याकरणीकरण (grammaticalization) (यह पद आंत्वान मेये, 1912 से) वह प्रक्रिया है जिससे कोई शाब्दिक शब्द व्याकरणीय चिह्न बन जाता है, या व्याकरणीय मद और अधिक व्याकरणीय हो जाता है, इस शृंखला (cline) के अनुदिश: अर्थवान शब्द > प्रकार्यात्मक शब्द > आश्रित रूप (clitic) > प्रत्यय। इसके साथ अर्थ-विरंजन (semantic bleaching) (मूर्त अर्थ की हानि), ध्वन्यात्मक अपरदन (erosion) (छोटा होना) तथा विवर्गीकरण (decategorialization) चलते हैं। अंग्रेज़ी will (कभी 'चाहना' अर्थ की क्रिया) भविष्यत् सहायक बनी; गति-पदबंध going to भविष्यत्-चिह्न gonna बना; रोमांस क्रियाविशेषण प्रत्यय -ment(e) लैटिन mente 'मन से' से आया। प्रक्रिया को बड़े पैमाने पर एकदिश (unidirectional) माना जाता है, विपरीत (विव्याकरणीकरण) विरल है।
अर्थ-परिवर्तन (semantic change) शब्द-अर्थों को नया आकार देता है। मुख्य प्रतिरूप हैं अर्थ-विस्तार (broadening) (अर्थ चौड़ा होना: holiday 'पवित्र दिन' से किसी भी अवकाश-दिन तक), अर्थ-संकोच (narrowing) (अर्थ सिकुड़ना: meat कभी सामान्य भोजन, deer कभी कोई भी पशु, hound कोई भी कुत्ता), अर्थ-उत्कर्ष (amelioration) (अर्थ बेहतर होना: knight 'सेवक/बालक' से, nice लैटिन nescius 'अज्ञानी' से), तथा अर्थापकर्ष (pejoration) (अर्थ बिगड़ना: silly पुरानी अंग्रेज़ी sǣlig 'धन्य, सुखी' से, villain 'खेत-मज़दूर' से)। सामान्य युक्तियाँ रूपक (किसी विचार को grasp करना) व लक्षणा/उपलक्षण (राजतंत्र हेतु the crown) हैं।
5. तुलनात्मक विधि व पुनर्निर्माण
तुलनात्मक विधि (comparative method) अपनी वंशज भाषाओं से किसी अलिखित जनक भाषा का पुनर्निर्माण करती है। विलियम जोन्स की 1786 की यह टिप्पणी कि संस्कृत, ग्रीक व लैटिन किसी साझा स्रोत से उपजी प्रतीत होती हैं, सामान्यतः इसका प्रारंभ-बिंदु मानी जाती है। विधि चरणों में चलती है:
(1) सजात-समुच्चय (cognate sets) एकत्र करना — वंशज भाषाओं में समान रूप व अर्थ वाले शब्द;
(2) उनमें दिखने वाली नियमित ध्वनि-अनुरूपताएँ स्थापित करना;
(3) प्रत्येक अनुरूपता हेतु आद्य-ध्वनि का पुनर्निर्माण, पुनर्निर्मित रूप को तारांकन (asterisk, *) के साथ लिखना;
(4) जाँचना कि पुनर्निर्मित प्रणाली ध्वन्यात्मक रूप से स्वाभाविक व आंतरिक रूप से संगत है।
- बहुमत व दिशात्मकता मानदंड: जहाँ वंशज असहमत हों, पुनर्निर्माण उस ध्वनि को वरीयता देता है जो अधिकांश में दिखे, पर स्वाभाविकता कोरे बहुमत पर भारी पड़ती है — प्रचलित व एकदिश सिद्ध परिवर्तन (जैसे अग्र स्वर से पूर्व k > ch) उसी दिशा में पुनर्निर्मित होता है, गिनती के विरुद्ध भी।
- आंतरिक पुनर्निर्माण (internal reconstruction) किसी एक ही भाषा के भीतर के विकल्पनों (जैसे वर्नर-प्रकार के युग्म) का उपयोग कर, अन्य भाषाओं से तुलना किए बिना, पूर्ववर्ती अवस्था पुनः प्राप्त करता है।
- संकट: संयोगवश समानता, ध्वन्यनुकरण (onomatopoeia) व उधार सजात शब्दों की नक़ल कर सकते हैं। केवल वही अनुरूपता साझा वंश का प्रमाण मानी जाती है जो अनेक समुच्चयों में नियमित रूप से दोहराई जाए।
6. भाषा-संपर्क व उधार
जब भिन्न भाषाओं के वक्ता संपर्क में आते हैं, तो विशेषताएँ भाषाओं के बीच जाती हैं। सर्वाधिक सामान्य है शाब्दिक उधार — एक ऋण-शब्द (loanword) जो अपनाया जाता है और ग्राही भाषा की ध्वनि-प्रणाली के अनुरूप ढाला जाता है (देशीकरण)। अनुवाद-ऋण (calque) ध्वनियों के बजाय संरचना की नक़ल करता है, प्रत्येक अंश का अनुवाद करते हुए (अंग्रेज़ी skyscraper अनेक भाषाओं में अंश-दर-अंश अनुवाद के रूप में प्रकट होता है; loanword स्वयं जर्मन Lehnwort का अनुवाद-ऋण है)। उधार एक मोटी उधार-योग्यता पदानुक्रम से क्रमित है: संज्ञाएँ व अन्य अर्थवान शब्द सबसे सहजता से, प्रकार्यात्मक शब्द व बद्ध रूपिम सबसे कम उधार लिए जाते हैं।
| पद | अर्थ |
|---|---|
| अधःस्तर (substratum) | विस्थापित या त्यागी गई भाषा का प्रभावी भाषा पर प्रभाव |
| अधिस्तर (superstratum) | आगंतुक प्रभावी भाषा का बनी रही स्थानीय भाषा पर प्रभाव |
| संस्तर (adstratum) | समान स्तर की पड़ोसी भाषाओं के बीच पारस्परिक प्रभाव |
लंबा, गहन संपर्क असंबंधित भाषाओं को भी संरचना में अभिसरित (converge) कर सकता है, जिससे एक भाषिक क्षेत्र (linguistic area, Sprachbund) बनता है जिसमें पड़ोसी भाषाएँ वंश के बजाय विसरण से विशेषताएँ साझा करने लगती हैं। दक्षिण एशिया शास्त्रीय उदाहरण है: मूर्धन्य व्यंजन व क्रिया-अंत क्रम इंडो-आर्य, द्रविड़ व मुंडा परिवारों में दोहराए जाते हैं, एक अभिसरण जिसे प्ररूपविज्ञान अध्याय में आगे लिया गया है।
मुख्य बिंदु
- ध्वनि-परिवर्तन नियमित है (नवव्याकरणविद सिद्धांत): ध्वनि-नियम प्रत्येक योग्य शब्द पर लागू होता है, परिवेश-बद्ध या रहित। स्पष्ट अपवाद अन्य नियमों, सादृश्य या उधार से आते हैं। प्रकारों में समीकरण, विषमीकरण, दुर्बलन, ध्वनि-विपर्यय, लोप, उमलाउट व अब्लाउट हैं।
- ग्रिम का नियम PIE स्पर्शों को तीन श्रेणियों में स्थानांतरित करता है: अघोष स्पर्श से संघर्षी (p,t,k > f,th,h), घोष स्पर्श से अघोष (b,d,g > p,t,k), घोष महाप्राण से घोष स्पर्श (bh,dh,gh > b,d,g)। यह केवल स्पर्शों को प्रभावित करता है, नासिक्य, पार्श्विक/लुंठित या स्वरों को नहीं।
- वर्नर का नियम ग्रिम के अपवाद समझाता है: ग्रिम के अघोष संघर्षी (व s) तब घोष हुए जब PIE स्वराघात ठीक पूर्ववर्ती अक्षर पर नहीं था; z बाद में r बना (रेफीकरण)। father बनाम brother वही PIE t को स्वराघात-स्थान से भिन्न जर्मानिक व्यंजन देता दिखाता है।
- व्याकरणीकरण शब्द को अर्थवान शब्द > प्रकार्यात्मक शब्द > आश्रित रूप > प्रत्यय शृंखला पर नीचे ले जाता है, विरंजन व अपरदन सहित, मुख्यतः एकदिश (will, gonna, -mente)। अर्थ-परिवर्तन चार मुख्य मार्ग लेता है: विस्तार, संकोच, उत्कर्ष व अपकर्ष, रूपक व लक्षणा द्वारा।
- तुलनात्मक विधि सजात-समुच्चयों व उनकी नियमित ध्वनि-अनुरूपताओं से आद्य-भाषा पुनर्निर्मित करती है, आद्य-रूपों को तारांकन के साथ लिखते हुए और बहुमत के साथ स्वाभाविकता व दिशात्मकता का उपयोग करते हुए। आंतरिक पुनर्निर्माण एक भाषा के विकल्पन उपयोग करता है; संयोग, ध्वन्यनुकरण व उधार संकट हैं।
- संपर्क विशेषताएँ फैलाता है: ऋण-शब्द (देशीकृत) व अनुवाद-ऋण (calque), उधार-योग्यता पदानुक्रम से क्रमित जिसमें अर्थवान शब्द सर्वाधिक उधार-योग्य। प्रभाव अधःस्तर, अधिस्तर या संस्तर होता है। जिस शब्द ने अपेक्षित ध्वनि-परिवर्तन छोड़ दिया वह प्रायः ऋण-शब्द होता है।
अभ्यास प्रश्न (16)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
ध्वनि-परिवर्तन के बारे में नवव्याकरणविद परिकल्पना को किस कथन से सर्वोत्तम रूप से सार-रूप दिया जा सकता है?
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उत्तर: B — ध्वनि-नियम अपवाद-रहित होते हैं, प्रत्येक ऐसे शब्द पर यांत्रिक रूप से लागू होते हैं जो उनकी ध्वन्यात्मक शर्तें पूरी करे
नवव्याकरणविदों का मत था कि ध्वनि-नियम अपवाद-रहित व ध्वन्यात्मक रूप से परिवेश-बद्ध है: वह प्रत्येक शर्त-पूरक शब्द पर, अर्थ की परवाह किए बिना, लागू होता है। शब्द-दर-शब्द फैलाव बाद के शाब्दिक विसरण (lexical diffusion) विचार का वर्णन है, नवव्याकरणविद मत का नहीं; अर्थ-संचालित परिवर्तन व केवल-संपर्क परिवर्तन दोनों नियमितता-दावे का खंडन करते हैं।पुरानी अंग्रेज़ी 'brid' आधुनिक अंग्रेज़ी 'bird' बनी, जिसमें स्वर व r ने क्रम बदल लिया। इस प्रकार के ध्वनि-परिवर्तन को कहते हैं:
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उत्तर: C — ध्वनि-विपर्यय, जिसमें दो ध्वनियाँ अपने स्थान आपस में बदल लेती हैं
दो ध्वनियों का पुनः-क्रमण ध्वनि-विपर्यय है, जो 'brid' से 'bird' ठीक दिखाता है। समीकरण ध्वनि को हिलाए बिना उसकी विशेषताएँ बदलता है; ध्वनि-निवेश ध्वनि जोड़ता है; अंत्य-लोप अंतिम ध्वनि हटाता है। यहाँ कुछ जोड़ा या हटाया नहीं गया, केवल पुनः-क्रमित हुआ, जो शेष को अलग करता है।ग्रिम के नियम के अंतर्गत आद्य-भारोपीय अघोष स्पर्श p, t, k आद्य-जर्मानिक में किस वर्ग की ध्वनियों में विकसित हुए?
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उत्तर: A — अघोष संघर्षी जैसे f, th व h
ग्रिम के नियम की पहली श्रेणी PIE अघोष स्पर्शों को अघोष संघर्षी में बदलती है (p>f, t>th, k>h), जैसे pater>father। घोष-स्पर्श वाला उत्तर वर्णन करता है कि घोष महाप्राण क्या बनते हैं, अघोष स्पर्श क्या नहीं; नासिक्य ग्रिम के नियम से अछूते हैं; और घोष महाप्राण नियम का निवेश हैं, इस श्रेणी का निर्गत नहीं।किस लैटिन–अंग्रेज़ी युग्म के आरंभिक व्यंजन को ग्रिम के नियम ने बदला है?
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उत्तर: D — लैटिन 'decem' व अंग्रेज़ी 'ten', जहाँ आरंभिक d आरंभिक t से मेल खाता है
PIE/लैटिन घोष d जर्मानिक में अघोष t बनता है (decem>ten), एक पाठ्य-पुस्तकीय ग्रिम अनुरूपता। m–m युग्म अपरिवर्तित है क्योंकि नासिक्य नियम से बाहर हैं; r–r भी वैसे ही। 'person' अपना p रखता है क्योंकि वह बाद का लैटिन ऋण-शब्द है जो ग्रिम के नियम के बंद होने के बहुत बाद अंग्रेज़ी में आया, अतः वह उत्तराधिकृत अनुरूपता है ही नहीं।ग्रिम का नियम केवल PIE स्पर्शों को स्थानांतरित करता है; नासिक्य, पार्श्विक/लुंठित या स्वरों को नहीं। आरंभिक जर्मानिक उच्चारण के अनुसार (knee का k तब भी बोला जाता था), इन पाँच PIE/लैटिन–अंग्रेज़ी युग्मों के शब्द-आरंभिक व्यंजनों पर विचार कीजिए: pater–father, mater–mother, tres–three, genu–knee, nokwt-–night। पाँच में से कितने आरंभिक व्यंजन ग्रिम के नियम से स्थानांतरित होते हैं? केवल संख्या लिखिए।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 3
स्थानांतरित: p>f (father), t>th (three), g>k (knee) — तीन स्पर्श। अस्थानांतरित: mother का m व night का n नासिक्य हैं, जिन्हें ग्रिम का नियम छोड़ देता है। अतः पाँच में से तीन आरंभिक व्यंजन स्थानांतरित होते हैं। नासिक्य को स्थानांतरण गिन लेना सामान्य भूल है।'father' व 'brother' में मध्यवर्ती व्यंजन एक ही PIE *t से आता है, फिर भी आद्य-जर्मानिक अवस्था में एक में घोष हुआ और दूसरे में अघोष रहा। इस अंतर को किसने नियंत्रित किया?
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उत्तर: B — व्यंजन के सापेक्ष PIE शब्द-स्वराघात का स्थान, वर्नर के नियम के माध्यम से
वर्नर के नियम ने ग्रिम-संघर्षी को तब घोष किया जब PIE स्वराघात उससे ठीक पहले के अक्षर पर नहीं था। 'father' (PIE स्वराघात दूसरे अक्षर पर) घोष हुआ; 'brother' (स्वराघात प्रथम अक्षर पर) नहीं। अक्षर-संख्या व लिंग वर्नर के नियम से असंबद्ध हैं, और दोनों शब्द उत्तराधिकृत हैं, उधार नहीं, अतः लैटिन-ऋण व्याख्या विफल है।ग्रिम के नियम व वर्नर के नियम के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — ग्रिम का नियम आद्य-भारोपीय स्पर्श व्यंजनों को प्रभावित करने वाला एक शृंखला-स्थानांतरण है; B — वर्नर का नियम उन स्थितियों की व्याख्या करता है जहाँ केवल ग्रिम का नियम ग़लत व्यंजन का अनुमान देता है; C — वर्नर के नियम से बना घोष z बाद में उत्तरी व पश्चिमी जर्मानिक में r बन गया
ग्रिम का नियम PIE स्पर्शों का तीन-श्रेणीय शृंखला-स्थानांतरण है; वर्नर का नियम स्वराघात के संदर्भ से उसके स्पष्ट अपवाद सुलझाता है; और वर्नर का z रेफीकृत होकर r बना (was/were का s/r)। यह दावा कि दोनों नियम ध्वनियों के सभी वर्गों पर लागू होते हैं, असत्य है: ग्रिम का नियम केवल स्पर्शों को प्रभावित करता है, और वर्नर का नियम ग्रिम द्वारा बने संघर्षियों पर चलता है, नासिक्य, पार्श्विक/लुंठित या स्वरों पर नहीं।व्याकरणीकरण की सर्वोत्तम परिभाषा वह प्रक्रिया है जिससे:
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उत्तर: A — कोई शाब्दिक शब्द क्रमशः किसी व्याकरणीय चिह्न, जैसे सहायक क्रिया या प्रत्यय, में बदल जाता है
व्याकरणीकरण अर्थवान शब्द का व्याकरणीय प्रकार्य में स्थानांतरण है (अर्थवान शब्द > प्रकार्यात्मक शब्द > आश्रित रूप > प्रत्यय), अर्थ-विरंजन व ध्वन्यात्मक अपरदन सहित। प्रत्यय का पूरा उधार संपर्क है, व्याकरणीकरण नहीं; विषमीकरण ध्वनि-परिवर्तन है; और अर्थ का अधिक अनुकूल होना अर्थ-उत्कर्ष है, अर्थ-परिवर्तन का एक प्रकार।गति-पदबंध 'going to' से बना अंग्रेज़ी भविष्यत्-चिह्न 'gonna' किसका शास्त्रीय उदाहरण है?
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उत्तर: C — व्याकरणीकरण, गति-अर्थ के अर्थ-विरंजन व ध्वन्यात्मक अपरदन सहित
'going to' अपना शाब्दिक 'गति' अर्थ खोता है (विरंजन) और छोटा होकर 'gonna' बनता है (अपरदन), जैसे-जैसे वह काल-चिह्न बनता है — व्याकरणीकरण का लक्षण। वह किसी अन्य भाषा से अनूदित नहीं, अतः अनुवाद-ऋण नहीं; उसकी ध्वनियाँ घटती हैं, पुनः-क्रमित नहीं, अतः ध्वनि-विपर्यय नहीं; और वह व्याकरणीय स्थानांतरण है, उल्लेख का संकोच नहीं।शब्द 'meat' कभी किसी भी प्रकार के भोजन का अर्थ देता था, पर अब केवल पशु-मांस का। यह किसका उदाहरण है?
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उत्तर: D — अर्थ-संकोच, क्योंकि शब्द अब पहले से छोटा उल्लेख्य-परास ढकता है
'सामान्य भोजन' से 'पशु-मांस' तक जाना उल्लेख्य-समूह को सिकोड़ता है, जो अर्थ-संकोच है (तुलना करें 'deer' 'कोई भी पशु' से, 'hound' 'कोई भी कुत्ता' से)। अर्थ-विस्तार इसका विलोम है। अर्थ-उत्कर्ष व अपकर्ष शब्द के सकारात्मक या नकारात्मक मूल्य से संबंधित हैं, उसके उल्लेख की व्यापकता से नहीं, और यहाँ मूल्य नहीं बदला।इन इतिहासों पर विचार कीजिए: P = 'silly' पुरानी अंग्रेज़ी 'saelig' (धन्य या सुखी) से उसके वर्तमान अर्थ तक; Q = 'knight' सेवक या बालक के अर्थ से उसके वर्तमान अर्थ तक; R = 'holiday' 'holy day' से किसी भी कार्य-अवकाश-दिन तक। लेबल किए गए किन परिवर्तनों में शब्द के सकारात्मक-या-नकारात्मक मूल्य में बदलाव शामिल है (अर्थ-उत्कर्ष या अपकर्ष)?
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उत्तर: A — P, जो अनुकूल अर्थ से प्रतिकूल अर्थ की ओर गया (अर्थापकर्ष); B — Q, जो निम्न अर्थ से उन्नत अर्थ की ओर गया (अर्थ-उत्कर्ष)
'silly' मूल्य में बिगड़ा (धन्य से मूर्ख) — अर्थापकर्ष; 'knight' मूल्य में सुधरा (सेवक से कुलीन योद्धा) — अर्थ-उत्कर्ष। दोनों मूल्य-बदलाव हैं। 'holiday' अर्थ-विस्तार का मामला है, जो उल्लेख की व्यापकता का बदलाव है, सकारात्मक-या-नकारात्मक मूल्य का नहीं। यह दावा कि तीनों में कोई अर्थ-परिवर्तन नहीं है, स्पष्टतः असत्य है।तुलनात्मक विधि में, वह पुनर्निर्मित आद्य-रूप जो किसी पाठ में प्रत्यक्षतः प्रमाणित नहीं है, परंपरागत रूप से कैसे लिखा जाता है?
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उत्तर: B — एक पूर्ववर्ती तारांकन के साथ, जैसे *pater
रूप से पूर्व तारांकन (जैसे *pater) एक पुनर्निर्मित, अप्रमाणित आकृति चिह्नित करता है। वर्गाकार कोष्ठक वास्तविक उच्चारणों का ध्वन्यात्मक लिप्यंतरण दर्शाते हैं; बड़े अक्षर व अनुगामी प्रश्नचिह्न पुनर्निर्माणों हेतु मानक परिपाटी नहीं हैं।एक सजात-समुच्चय छह संबंधित भाषाओं में शब्द-आरंभिक व्यंजन इस प्रकार देता है: L1 k, L2 k, L3 ch, L4 ch, L5 ch, L6 ch। परिवर्तन k > ch (तालव्यीकरण) सामान्य व एकदिश है, जबकि ch > k किसी स्वाभाविक परिवर्तन के रूप में प्रमाणित नहीं। दिशात्मकता मानदंड का उपयोग करते हुए, आद्य-ध्वनि *k पुनर्निर्मित की जाती है। छह वंशज भाषाओं में से कितनों में यह आद्य-ध्वनि अपरिवर्तित बनी रही है? केवल संख्या लिखिए।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 2
यद्यपि छह में से चार भाषाएँ ch दिखाती हैं, k > ch की स्वाभाविकता व एकदिश दिशा का अर्थ है कि *k पुनर्निर्मित होता है, *ch नहीं। आद्य-ध्वनि *k केवल L1 व L2 (दो भाषाएँ) में सुरक्षित है; L3 से L6 में तालव्यीकरण हुआ। जाल यह है कि बहुमत ध्वनि ch चुनकर 4 उत्तर दें, पर दिशात्मकता कोरे बहुमत पर भारी पड़ती है।एक भाषाविद किसी एकल भाषा की पूर्ववर्ती अवस्था को उसके अपने ही रूपावली-प्रतिरूपों के भीतर s व r के विकल्पन (जैसे was/were) का अध्ययन करके, किसी भी सहोदर भाषा से तुलना किए बिना, पुनः प्राप्त करता है। यह तकनीक है:
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उत्तर: C — आंतरिक पुनर्निर्माण, क्योंकि यह एक ही भाषा के भीतर के विकल्पनों का उपयोग करती है
किसी एकल भाषा के भीतर के विकल्पनों से, बिना किसी सहोदर भाषा के, पूर्ववर्ती अवस्था पुनर्निर्मित करना आंतरिक पुनर्निर्माण है। तुलनात्मक विधि संबंधित भाषाओं में तुलना माँगती है, जो यहाँ ठीक वर्जित है। कोई उधार या व्याकरणीकरण शामिल नहीं; s/r विकल्पन वर्नर के नियम व रेफीकरण का अवशेष है।निम्नलिखित में से किनका वर्णन सही है?
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उत्तर: A — अनुवाद-ऋण (calque) किसी विदेशी अभिव्यक्ति की संरचना को अंश-दर-अंश अनुवाद करके नक़ल करता है; C — ऋण-शब्द प्रायः देशीकृत होता है, ग्राही भाषा की ध्वनि-प्रणाली में बैठने हेतु पुनः ढाला जाता है; D — अधःस्तर प्रभाव किसी विस्थापित या त्यागी गई भाषा का प्रभावी भाषा पर प्रभाव है
अनुवाद-ऋण संरचना का अंश-दर-अंश अनुवाद करते हैं; ऋण-शब्द ग्राही की ध्वनि-प्रणाली में देशीकृत होते हैं; अधःस्तर अंतर्निहित, त्यागी गई भाषा का प्रभाव है। उधार-योग्यता दावा उलटा है: संज्ञाओं जैसे अर्थवान शब्द सबसे सहजता से उधार लिए जाते हैं, जबकि बद्ध विभक्ति-रूपिम उधार लेना सबसे कठिन में से है।अंग्रेज़ी युग्म 'father' (उत्तराधिकृत) व 'paternal' (लैटिन से) दोनों एक ही PIE मूल से आते हैं, फिर भी 'paternal' अपने p व t रखता है जबकि 'father' f व th दिखाता है। कौन-से अनुमान सही हैं?
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उत्तर: A — 'paternal' में ग्रिम का नियम नहीं लगा, जो प्रमाण है कि वह नियम के बंद होने के बाद अंग्रेज़ी में आया; B — नियमित ध्वनि-नियमों का उपयोग उत्तराधिकृत शब्दों को ऋण-शब्दों से अलग करने हेतु नैदानिक कसौटी के रूप में किया जा सकता है; D — 'father' में ग्रिम के नियम का प्रभाव दिखता है क्योंकि वह आद्य-जर्मानिक से होकर उत्तराधिकार में मिला, जहाँ यह नियम चला था
वह शब्द जो अपेक्षित ध्वनि-परिवर्तन से बच गया, वह परिवर्तन रुकने के बाद आया ऋण-शब्द है, अतः 'paternal' लैटिन उधार है; इससे ध्वनि-नियम ऋण-शब्दों हेतु नैदानिक कसौटी बनते हैं; और 'father', उत्तराधिकृत होने से, ग्रिम का नियम यथावत् दिखाता है। संयोग-समानता दावा असत्य है: दोनों शब्द एक मूल से बना पाठ्य-पुस्तकीय युग्मक (doublet) हैं, एक उत्तराधिकृत व एक उधार।