परिसंचरण व भ्रमिलता, सामान्य परिसंचरण, तापीय पवन, भारतीय मानसून व उष्णकटिबंधीय चक्रवात

यह अध्याय अभियांत्रिकी विज्ञान (XE) पेपर के नौ वैकल्पिक खंडों में से एक XE7 वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान के खंड XE7.1 वायुमंडलीय विज्ञान की गतिकी-सूची के उत्तरार्ध का उत्तर देता है: “परिसंचरण व भ्रमिलता, वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण। भारतीय मानसून की व्यापक विशेषताएँ; उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के मूल सिद्धांत।” यह परिसंचरण, Kelvin प्रमेय की रूपरेखा व सापेक्ष तथा निरपेक्ष भ्रमिलता, जेट धाराओं व तापीय-पवन संबंध सहित Hadley, Ferrel व ध्रुवीय कोष्ठ, भारतीय मानसून की व्यापक विशेषताएँ और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के मूल सिद्धांत पढ़ाता है। संख्यात्मक प्रश्न पवन-क्षेत्र से भ्रमिलता, निरपेक्ष भ्रमिलता का संरक्षण, उपोष्ण जेट का कोणीय-संवेग तर्क, तापीय पवन और उष्णकटिबंधीय चक्रवात में प्रवणता-पवन की चाल हैं। प्रयुक्त स्थिरांक: Ω = 7.292×10⁻⁵ s⁻¹, पृथ्वी की त्रिज्या a = 6.371×10⁶ m, g = 9.81 m/s²; अन्य मान प्रत्येक प्रश्न में दिए हैं।

1. परिसंचरण व भ्रमिलता; Kelvin प्रमेय

किसी बंद वक्र के गिर्द परिसंचरण उसके अनुदिश वेग का रेखा-समाकल है, C = ∮ V·dl। Stokes प्रमेय से C = ∬ (∇×V)·dA, अतः परिसंचरण परिबद्ध क्षेत्रफल पर जोड़ी गई ऊर्ध्वाधर भ्रमिलता (vorticity) के बराबर है। क्षैतिज प्रवाह के लिए ऊर्ध्वाधर घटक सापेक्ष भ्रमिलता ζ = ∂v/∂x − ∂u/∂y है: वामावर्त (उत्तरी गोलार्ध में चक्रवातीय) घूर्णन के लिए धनात्मक। कोणीय चाल ω से दृढ़-पिंड घूर्णन वाले प्रवाह में ζ = 2ω; शुद्ध अपरूपण u(y) में ζ = −∂u/∂y, अतः उत्तर की ओर दुर्बल होती पछुआ पवन की भ्रमिलता धनात्मक है।

पृथ्वी स्वयं घूमती है, अतः उसके सापेक्ष विरामस्थ तरल में ग्रहीय भ्रमिलता f (Ω के स्थानीय ऊर्ध्वाधर घटक का दोगुना) होती है। निरपेक्ष भ्रमिलता η = ζ + f है। Kelvin प्रमेय (रूपरेखा में): अश्यान, बैरोट्रॉपिक तरल (घनत्व केवल दाब का फलन) के लिए बंद पदार्थ-वक्र के गिर्द निरपेक्ष परिसंचरण संरक्षित रहता है, DC_a/Dt = 0। क्षेत्रफल A के क्षैतिज लूप के लिए C_a = (ζ + f)A। बैरोक्लिनिक तरल में, जहाँ समदाब व समघनत्व पृष्ठ काटते हैं, सोलेनॉइड −∮ α dp की दर से परिसंचरण उत्पन्न करते हैं, यही समुद्री समीर का आरंभ है (स्थल व समुद्र भिन्न ताप पर); घर्षण भी परिसंचरण बदलता है।

परिणाम (बैरोट्रॉपिक, अपसरण-रहित प्रवाह): η = ζ + f संरक्षित है (अधिक व्यापक रूप में D(ζ + f)/Dt = −(ζ + f)∇_h·V, अतः अपसरण भ्रमिलता घटाता और अभिसरण बढ़ाता है, जैसे बाँहें समेटने पर स्केटर तेज़ घूमता है)। हल किया उदाहरण। 30°N पर ζ = 0 वाली वायु बिना अपसरण 45°N पर जाती है: ζ = f₃₀ − f₄₅ = 7.29×10⁻⁵ − 10.31×10⁻⁵ = −3.02×10⁻⁵ s⁻¹। ध्रुव की ओर गति ग्रहीय भ्रमिलता जोड़ती है, अतः सापेक्ष भ्रमिलता प्रतिचक्रवातीय हो जाती है। ζ व f का यही विनिमय बृहत् पैमाने के प्रवाह को Rossby तरंगों के रूप में लहरदार बनाता है।

⚠️ भ्रमिलता का अर्थ वक्र धारारेखाएँ नहीं है
सीधी समांतर धारारेखाओं वाले पर प्रवाह के आर-पार बदलती पवन-चाल (अपरूपण) वाले प्रवाह में भ्रमिलता होती है, और 1/r से घटती चाल वाले वक्र प्रवाह (अघूर्णी भँवर) में अपने क्रोड के बाहर भ्रमिलता नहीं होती। ζ का मूल्यांकन u व v के अवकलजों से करें, धारारेखाओं के आकार से कभी नहीं। साथ ही, ζ + f संरक्षित है, अकेला ζ नहीं।

2. सामान्य परिसंचरण: कोष्ठ, धरातलीय पवनें व जेट धाराएँ

विभेदी तापन (विषुवत् रेखा उत्सर्जन से अधिक अवशोषित करती है, ध्रुव कम) एक याम्योत्तर परिवर्तन चलाता है, जिसे पृथ्वी का घूर्णन प्रत्येक गोलार्ध में तीन कोष्ठों का रूप देता है।

तीन-कोष्ठ चित्र, प्रत्येक गोलार्ध
कोष्ठविस्तारपरिसंचरण व धरातलीय पवन
Hadley (ऊष्मीय प्रत्यक्ष)विषुवत् रेखा से लगभग 30° तकवायु ITCZ पर उठती है, ऊपर ध्रुव की ओर बहती है, उपोष्ण उच्च में उतरती है, धरातल पर व्यापारिक पवनों के रूप में विषुवत् रेखा की ओर लौटती है (उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-पूर्वी, दक्षिणी में दक्षिण-पूर्वी)
Ferrel (ऊष्मीय अप्रत्यक्ष)लगभग 30° से 60°धरातलीय पछुआ पवनें; प्रत्यक्ष तापन से नहीं, भँवरों (चक्रवात व प्रतिचक्रवात) से चालित
ध्रुवीय (ऊष्मीय प्रत्यक्ष)लगभग 60° से ध्रुव तकठंडी वायु ध्रुव पर उतरती है, ध्रुवीय पूर्वी पवनों के रूप में विषुवत् रेखा की ओर बहती है, 60° के निकट उठती है

अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) वह पट्टी है जहाँ दोनों व्यापारिक पवन-तंत्र मिलते हैं, जिसमें गहरे क्यूम्युलोनिम्बस, भारी वर्षा व दुर्बल धरातलीय पवनें (डोलड्रम) होती हैं। यह ऊष्मीय विषुवत् रेखा का अनुसरण करता है और ग्रीष्म गोलार्ध की ओर खिसकता है; दक्षिण एशिया पर ग्रीष्म में यह लगभग 20 से 25°N तक चला जाता है। 30° के निकट उपोष्ण उच्च अवरोही, शुष्क क्षेत्र हैं (बड़े मरुस्थल)। Hadley कोष्ठ में विषुवत् रेखा की ओर बढ़ती वायु Coriolis से पश्चिम की ओर मुड़ती है, इसीलिए पूर्वी व्यापारिक पवनें।

जेट धाराएँ क्षोभसीमा के निकट संकीर्ण, तेज़ पछुआ धाराएँ हैं। उपोष्ण जेट (लगभग 30°, लगभग 12 km) Hadley कोष्ठ के ध्रुवीय किनारे पर है; ध्रुवीय-वाताग्र जेट (50 से 60°, लगभग 9 से 10 km) ध्रुवीय वाताग्र के तीव्र ताप-विपर्यास के ऊपर है। क्रोड की प्रारूपिक चाल 30 से 60 m/s है, शीत ऋतु में शिखर 100 m/s से अधिक। उपोष्ण जेट की सरल व्याख्या कोणीय संवेग में है: विषुवत् रेखा पर विरामस्थ वायु का निरपेक्ष कोणीय संवेग M = Ωa² (cos φ = 1) है। यदि वह M संरक्षित रखते हुए ध्रुव की ओर चले तो M = (Ωa cos φ + u) a cos φ से u = Ωa sin²φ / cos φ मिलता है। 30° पर u = 7.292×10⁻⁵ × 6.371×10⁶ × 0.25/0.866 = 134 m/s। वास्तविक जेटें बहुत दुर्बल (लगभग 50 से 60 m/s) हैं क्योंकि भँवर व घर्षण संवेग हटाते हैं, पर यह तर्क दिखाता है कि ध्रुव की ओर बढ़ती वायु पूर्व की ओर क्यों त्वरित होती है।

3. तापीय पवन संबंध

भूविक्षेपी संतुलन को द्रवस्थैतिक समीकरण से मिलाकर ऊँचाई के सापेक्ष अवकलन करें: भूविक्षेपी पवन का ऊर्ध्वाधर अपरूपण क्षैतिज ताप-प्रवणता के अनुपाती है। ऊँचाई-निर्देशांक में ∂u_g/∂z = −(g/(fT)) ∂T/∂y तथा ∂v_g/∂z = (g/(fT)) ∂T/∂x। सदिश रूप में ∂V_g/∂z = (g/(fT)) k × ∇T। तापीय पवन दो स्तरों की भूविक्षेपी पवनों का अंतर है; यह उत्तरी गोलार्ध में समताप रेखाओं के समांतर, ठंडी वायु अपने बाईं ओर रखते हुए, बहती है (दक्षिणी में दाईं ओर)।

हल किया उदाहरण। एक परत में, जिसका माध्य T = 260 K है, उस अक्षांश पर जहाँ f = 1.0×10⁻⁴ s⁻¹ है, ताप उत्तर की ओर 1.0×10⁻⁵ K/m (1000 km पर 10 K) से घटता है। तब ∂u_g/∂z = −(9.81 / (1.0×10⁻⁴ × 260)) × (−1.0×10⁻⁵) = 3.77×10⁻³ s⁻¹, यानी 3.8 m/s प्रति km। 1 km से 9 km के बीच Δu = 3.77×10⁻³ × 8000 = 30.2 m/s: पछुआ पवनें ऊँचाई के साथ प्रबल होती हैं। इसीलिए पछुआ जेटें सबसे तीव्र ताप-प्रवणता के ऊपर क्षोभ मंडल के शीर्ष पर होती हैं, और इसीलिए उष्णकटिबंधीय ग्रीष्म में उत्तर में गर्म वायु वाला गर्म-क्रोड ऊपरी प्रतिचक्रवात अपरूपण उलटकर ऊपरी पूर्वी पवनें देता है।

⚠️ तापीय पवन अपरूपण है, किसी स्तर की पवन नहीं
तापीय पवन सदिश अंतर V_g(ऊपरी) − V_g(निचली) है और बताती है कि ऊँचाई के साथ पवन कैसे बदलती है। यह किसी एक स्तर की पवन नहीं बताती; दक्षिणी धरातलीय भूविक्षेपी पवन में पछुआ तापीय पवन जोड़ने पर ऊपर दक्षिण-पश्चिमी पवन मिलती है। साथ ही यह संबंध भूविक्षेपी व द्रवस्थैतिक संतुलन माँगता है, अतः भूमध्य रेखा के निकट विफल रहता है।

4. भारतीय मानसून की व्यापक विशेषताएँ

मानसून निम्न-स्तरीय पवन का मौसमी उत्क्रमण है, जो स्थल व महासागर के तापन-विपर्यास और ITCZ के मौसमी प्रवास से चलता है। ग्रीष्म में भारतीय भू-भाग व तिब्बती पठार प्रबल तप्त होते हैं, उत्तर-पश्चिम भारत पर ऊष्मा-निम्न बनता है और विषुवत् रेखा पार करने वाली दक्षिण-पश्चिमी धारा हिंद महासागर से नमी लाती है: जून से सितंबर का दक्षिण-पश्चिम मानसून, जो भारत की वार्षिक वर्षा का लगभग तीन-चौथाई देता है। शीत में प्रवाह उलटकर शुष्क उत्तर-पूर्वी हो जाता है; उत्तर-पूर्व मानसून अक्टूबर से दिसंबर में तमिलनाडु को वर्षा देता है।

  • आगमन। दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः लगभग 1 जून को केरल पहुँचता है, झोंकों में उत्तर की ओर बढ़ता है और जुलाई के पूर्वार्ध के आसपास पूरे देश को ढक लेता है (सामान्य तिथि लगभग 8 जुलाई)। वापसी सितंबर में उत्तर-पश्चिम भारत से आरंभ होती है।
  • मानसून द्रोणी। उत्तर-पश्चिम भारत व पाकिस्तान के ऊष्मा-निम्न से गंगा के मैदान को पार कर बंगाल की खाड़ी के शीर्ष तक फैली लंबी निम्न-दाब अक्ष। वर्षा इसके दक्षिण में सर्वाधिक होती है। बंगाल की खाड़ी के निम्न व अवदाब इस पर बनते हैं और पश्चिम-उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़कर मध्य भारत की अधिकांश वर्षा देते हैं।
  • निम्न-स्तरीय जेट (सोमाली या Findlater जेट)। अरब सागर पर लगभग 1 से 1.5 km (लगभग 850 hPa) पर क्रोड वाली, विषुवत् रेखा पार करती संकीर्ण दक्षिण-पश्चिमी जेट, चाल 15 m/s या अधिक। यह नमी देती है और विषुवत् रेखा पार करते दक्षिणी गोलार्ध के दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों से Coriolis द्वारा मुड़ी है। ऊपर, तिब्बती प्रतिचक्रवात व उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट (लगभग 150 hPa) दक्षिण भारत के ऊपर हैं।
  • सक्रिय व विराम काल। सक्रिय काल में द्रोणी अपनी सामान्य स्थिति में रहती है और मध्य भारत में भारी वर्षा होती है। विराम काल (कई दिन) में द्रोणी उत्तर की ओर हिमालय की तलहटी में खिसक जाती है: वहाँ व उत्तर-पूर्व में वर्षा भारी, पर देश के अधिकांश भाग में अल्प।

ENSO व IOD (रूपरेखा)। El Niño (उष्ण पूर्वी प्रशांत) Walker परिसंचरण को खिसकाता है और सामान्यतः भारतीय मानसून को दुर्बल करता है, सूखे का जोखिम सहित; La Niña सामान्यतः उसके अनुकूल है। यह संबंध सटीक नहीं है और कुछ दशकों में कमज़ोर पड़ा है। हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole), यानी हिंद महासागर के पश्चिम-घटा-पूर्व समुद्र-सतह ताप का अंतर, धनात्मक (उष्ण पश्चिम) होने पर मानसून के अनुकूल है और El Niño को निष्प्रभ कर सकता है।

5. उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के मूल सिद्धांत

निर्माण की शर्तें (सभी एक साथ चाहिए): लगभग 50 m गहराई तक लगभग 26.5 °C या अधिक समुद्र-सतह ताप, जो ऊष्मा व नमी देता है; विषुवत् रेखा से लगभग 5° से आगे का अक्षांश, ताकि f भँवर को घूर्णन देने के लिए पर्याप्त बड़ा हो; दुर्बल ऊर्ध्वाधर पवन-अपरूपण, ताकि गर्म क्रोड बहकर बाहर न चला जाए; आर्द्र, सप्रतिबंध अस्थायी क्षोभ मंडल; और आरंभ के लिए निम्न-स्तरीय चक्रवातीय भ्रमिलता व अभिसरण वाला पूर्व-विद्यमान विक्षोभ। इसीलिए वे भूमध्य रेखा पर, ठंडे जल या स्थल पर नहीं बनते। उत्तर हिंद महासागर में ऋतुएँ अप्रैल से जून व अक्टूबर से दिसंबर हैं, बंगाल की खाड़ी अरब सागर से अधिक सक्रिय।

संरचना। निम्न-स्तर की वायु सीमा-परत में भीतर की ओर कुंडलित होती है, समुद्र से ऊष्मा व नमी लेती है (घर्षण उसे समदाब रेखाएँ काटने देता है), और नेत्र-भित्ति (eyewall) में उठती है, जो दसियों किलोमीटर त्रिज्या पर ऊँचे क्यूम्युलोनिम्बस का वलय है, जहाँ सबसे प्रबल पवनें व सबसे भारी वर्षा होती हैं। इसके भीतर नेत्र (eye) (व्यास लगभग 20 से 60 km) है, जहाँ वायु अवतलित होकर गर्म व शुष्क होती है: साफ़ आकाश, हल्की पवन व निम्नतम दाब। बाहर सर्पिल वर्षा-पट्टियाँ हैं। तूफ़ान के शीर्ष (10 से 15 km) पर वायु प्रतिचक्रवातीय दिशा में बाहर बहती है। तूफ़ान का उष्ण क्रोड होता है और धरातल से ऊपर पवनें घटती हैं। स्थल या ठंडे जल पर ऊष्मा व नमी का स्रोत कट जाता है और घर्षण बढ़ता है, अतः वह दुर्बल पड़ता है।

तीव्रता व संतुलन। तीव्रता केंद्रीय दाब और अधिकतम निरंतर पवन से मापी जाती है। भारत मौसम विज्ञान विभाग उत्तर हिंद महासागर के तंत्रों को अधिकतम निरंतर पवन से श्रेणीबद्ध करता है: अवदाब, गहरा अवदाब, चक्रवाती तूफ़ान (34 नॉट व अधिक), तीव्र, अति तीव्र व अत्यंत तीव्र चक्रवाती तूफ़ान, और अति-प्रचंड चक्रवाती तूफ़ान (120 नॉट व अधिक)। क्रोड से दूर पवन प्रवणता-पवन संतुलन में है, V²/r + fV = (1/ρ)∂p/∂r। नेत्र-भित्ति के निकट V²/r ≫ fV, अतः संतुलन लगभग चक्रवातीय है, V ≈ √((r/ρ)∂p/∂r)। उदाहरण: r = 50 km, f = 5.0×10⁻⁵ s⁻¹, ρ = 1.1 kg/m³ व ∂p/∂r = 0.10 Pa/m (10 km पर 10 hPa) पर (1/ρ)∂p/∂r = 0.0909 m/s², V² + 2.5V − 4545 = 0 और V = 66 m/s; चक्रवातीय आकलन 67 m/s है।

🎯 गुप्त ऊष्मा ही ईंधन है
गर्म समुद्र-सतह पर वाष्पन वाष्प में ऊर्जा संचित करता है; नेत्र-भित्ति में संघनन उसे L_v प्रति किलोग्राम के रूप में मुक्त कर क्रोड को गर्म करता है। गर्म क्रोड धरातलीय दाब घटाता है, जिससे दाब-प्रवणता तीक्ष्ण होती है, जिससे पवनें व वाष्पन प्रबल होते हैं: धनात्मक पुनर्निवेश, जो तब रुकता है जब तूफ़ान स्थल या ठंडे जल पर जाए, अपरूपित प्रवाह में आए, या ऊर्जा की आपूर्ति कट जाए। तूफ़ान को गुप्त ऊष्मा का मोचन शक्ति देता है, Coriolis नहीं; Coriolis केवल घूर्णन तय करता है।

मुख्य बिंदु

  • परिसंचरण C = ∮V·dl क्षेत्रफल पर समाकलित भ्रमिलता के बराबर है। निरपेक्ष भ्रमिलता η = ζ + f है; बैरोट्रॉपिक, अपसरण-रहित प्रवाह के लिए यह संरक्षित है (Kelvin प्रमेय रूपरेखा में), अतः ध्रुव की ओर गति सापेक्ष भ्रमिलता को प्रतिचक्रवातीय बनाती है और अपसरण उसे घटाता है।
  • सामान्य परिसंचरण में Hadley (प्रत्यक्ष, 0 से 30°), Ferrel (अप्रत्यक्ष, 30 से 60°) व ध्रुवीय कोष्ठ हैं; व्यापारिक पवनें उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-पूर्व से बहती हैं, ITCZ अभिसरण-पट्टी है, और उपोष्ण उच्च शुष्क अवरोही क्षेत्र हैं।
  • जेट धाराएँ क्षोभसीमा के निकट पछुआ महत्तम हैं, लगभग 30° (उपोष्ण) व 50 से 60° (ध्रुवीय वाताग्र) पर। विषुवत् रेखा से कोणीय संवेग-संरक्षण 30° पर 134 m/s देता, वास्तविक जेट भँवरों व घर्षण के कारण लगभग 50 से 60 m/s है।
  • तापीय पवन: ∂V_g/∂z = (g/(fT)) k × ∇T, जो क्षैतिज ताप-प्रवणता से जुड़ा ऊर्ध्वाधर अपरूपण है; उत्तरी गोलार्ध में यह ठंडी वायु को बाईं ओर रखकर बहती है, और जहाँ उत्तर में वायु ठंडी है वहाँ पछुआ पवनें ऊँचाई के साथ प्रबल होती हैं।
  • भारतीय ग्रीष्म मानसून: केरल पर लगभग 1 जून को आगमन, मानसून द्रोणी, सोमाली निम्न-स्तरीय जेट, सक्रिय व विराम काल (विराम में द्रोणी तलहटी में); El Niño प्रायः उसे दुर्बल करता है और धनात्मक IOD इसे निष्प्रभ कर सकता है।
  • उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को उष्ण समुद्र (लगभग 26.5 °C या अधिक), लगभग 5° से आगे का अक्षांश, दुर्बल अपरूपण व बीज-विक्षोभ चाहिए। उनमें उष्ण क्रोड, नेत्र व नेत्र-भित्ति होती है; पवन प्रवणता-संतुलन में है, नेत्र-भित्ति के निकट लगभग चक्रवातीय, और गुप्त ऊष्मा उन्हें शक्ति देती है।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. Kelvin का परिसंचरण प्रमेय कहता है कि बंद पदार्थ-वक्र के गिर्द निरपेक्ष परिसंचरण उस तरल के लिए संरक्षित रहता है जो

    1. श्यान व बैरोक्लिनिक हो, क्योंकि घर्षण व घनत्व-प्रवणताएँ एक-दूसरे को संतुलित करती हैं
    2. संपीड्य हो, जिसमें Mach संख्या हर जगह एक से अधिक हो
    3. असंपीड्य हो और सदैव पृथ्वी के सापेक्ष विराम में हो
    4. अश्यान व बैरोट्रॉपिक हो, जिसमें घनत्व केवल दाब का फलन हो
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — अश्यान व बैरोट्रॉपिक हो, जिसमें घनत्व केवल दाब का फलन हो

    DC_a/Dt = −∮ α dp + घर्षण, अतः परिसंचरण तभी संरक्षित है जब सोलेनॉइड पद लुप्त हो (बैरोट्रॉपिक) और घर्षण अनुपस्थित हो (अश्यान)। बैरोक्लिनिक तरल परिसंचरण उत्पन्न करता है, यही समुद्री समीर का आरंभ है।
  2. दोपहर में समुद्री समीर का परिसंचरण मुख्यतः इसलिए विकसित होता है कि

    1. तट पर Coriolis बल वायु को मोड़ता है और इस प्रकार उसे समुद्र से स्थल की ओर चलाता है
    2. निरपेक्ष भ्रमिलता का संरक्षण समुद्र के ऊपर की वायु को तप्त स्थल-सतह की ओर बढ़ने को विवश करता है
    3. स्थल व समुद्र की वायु के ताप भिन्न हैं, अतः दाब व घनत्व पृष्ठ काटते हैं और परिसंचरण उत्पन्न करते हैं
    4. दोपहर में समुद्र-सतह स्थल से अधिक गर्म होती है और अपने ऊपर की वायु को अधिक तप्त करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — स्थल व समुद्र की वायु के ताप भिन्न हैं, अतः दाब व घनत्व पृष्ठ काटते हैं और परिसंचरण उत्पन्न करते हैं

    विभेदी तापन बैरोक्लिनिक अवस्था बनाता है जिसमें सोलेनॉइड पद −∮ α dp अशून्य होता है, अतः परिसंचरण उत्पन्न होता है: धरातल पर ठंडे समुद्र से गर्म स्थल की ओर प्रवाह। दोपहर में स्थल समुद्र से गर्म होता है, अतः समुद्र के अधिक गर्म होने का दावा उलटा है, और इतने छोटे पैमाने पर Coriolis की भूमिका गौण है।
  3. उत्तरी गोलार्ध में Hadley कोष्ठ में धरातल के निकट व्यापारिक पवनें बहती हैं

    1. उत्तर-पूर्व से विषुवत् रेखा की ओर
    2. दक्षिण-पश्चिम से ध्रुव की ओर
    3. उत्तर-पश्चिम से विषुवत् रेखा की ओर
    4. दक्षिण-पूर्व से ध्रुव की ओर
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उत्तर-पूर्व से विषुवत् रेखा की ओर

    Hadley कोष्ठ में धरातलीय वायु विषुवत् रेखा की ओर चलती है, और Coriolis उसे उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर मोड़कर उत्तर-पूर्वी पवन (उत्तर-पूर्व से आने वाली) बना देता है। दक्षिण-पश्चिमी पवनें मध्य अक्षांशों की पछुआ हैं।
  4. लगभग 30° से 60° के बीच Ferrel कोष्ठ ऊष्मीय अप्रत्यक्ष कहलाता है, क्योंकि

    1. इसमें कोई ऊर्ध्वाधर गति होती ही नहीं और यह केवल दोनों अन्य कोष्ठों के बीच वायु को क्षैतिज चलाता है
    2. यह अकेले Coriolis बल से चालित है, जो गति की सारी ऊर्जा देता है
    3. यह केवल महासागरों पर मिलता है, जहाँ सतह द्वारा वायु का तापन अप्रत्यक्ष होता है
    4. इसमें गर्म वायु उतरती और ठंडी उठती है, अतः यह प्रत्यक्ष तापन से नहीं, भँवर-परिवहन से चालित है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — इसमें गर्म वायु उतरती और ठंडी उठती है, अतः यह प्रत्यक्ष तापन से नहीं, भँवर-परिवहन से चालित है

    Ferrel कोष्ठ में गर्म वायु उतरती और ठंडी वायु उठती है, जो ऊष्मा-इंजन का उलटा है, अतः यह चक्रवातों व प्रतिचक्रवातों द्वारा संवेग व ऊष्मा के परिवहन से बना रहता है। Coriolis बल कार्य नहीं करता और ऊर्जा नहीं दे सकता।
  5. उत्तरी गोलार्ध के क्षोभ मंडल में पछुआ पवनें ऊँचाई के साथ वहाँ बढ़ती हैं जहाँ वायु

    1. उत्तर में दक्षिण से अधिक गर्म हो, तापीय-पवन संबंध से
    2. उत्तर में दक्षिण से अधिक ठंडी हो, तापीय-पवन संबंध से
    3. सर्वत्र समान गर्म हो, क्योंकि ऊर्ध्वाधर अपरूपण केवल दाब पर निर्भर है
    4. बहुत आर्द्र हो, क्योंकि नमी पवन को त्वरित करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — उत्तर में दक्षिण से अधिक ठंडी हो, तापीय-पवन संबंध से

    ∂u_g/∂z = −(g/(fT)) ∂T/∂y, अतः ∂T/∂y < 0 होने पर ∂u_g/∂z > 0: वायु ध्रुव की ओर ठंडी है। उत्तर में गर्म वायु होने पर पछुआ पवनें ऊँचाई के साथ दुर्बल होतीं और अंततः पूर्वी हो जातीं, जैसा उष्णकटिबंधीय ग्रीष्म के ऊपरी क्षोभ मंडल में।
  6. भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून के विराम काल में

    1. द्रोणी हिमालय की तलहटी में खिसक जाती है, वहाँ भारी वर्षा और भारत के अधिकांश भाग में दुर्बल वर्षा होती है
    2. मानसून द्रोणी प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे पर चली जाती है, अकेले केरल पर भारी वर्षा होती है
    3. मानसून स्पेल आरंभ होने के कुछ ही दिनों में पूरे देश से स्थायी रूप से लौट जाता है
    4. निम्न-स्तरीय जेट प्रबल होती है और द्रोणी मध्य भारत पर रहती है, सर्वाधिक वर्षा के साथ
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — द्रोणी हिमालय की तलहटी में खिसक जाती है, वहाँ भारी वर्षा और भारत के अधिकांश भाग में दुर्बल वर्षा होती है

    विराम में द्रोणी उत्तर की ओर हिमालय की तलहटी में चली जाती है, अतः मध्य व प्रायद्वीपीय भारत सूखे रहते हैं जबकि तलहटी व उत्तर-पूर्व में भारी वर्षा होती है। मध्य भारत पर द्रोणी व प्रबल जेट वाला कथन सक्रिय काल का वर्णन है। विराम कुछ दिन चलता है, फिर मानसून पुनः सक्रिय होता है।
  7. कौन-सा संयोजन सामान्यतः सामान्य से दुर्बल भारतीय ग्रीष्म मानसून से जुड़ा है?

    1. La Niña के साथ धनात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव, जिसमें पश्चिमी हिंद महासागर उष्ण हो
    2. सामान्य से ठंडा अरब सागर और साथ में सामान्य से प्रबल निम्न-स्तरीय जेट
    3. अप्रैल के दौरान ITCZ का लगभग 25°N तक सामान्य से पहले उत्तर की ओर खिसकना
    4. El Niño, जो Walker परिसंचरण खिसकाकर भारत पर अवतलन बढ़ाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — El Niño, जो Walker परिसंचरण खिसकाकर भारत पर अवतलन बढ़ाता है

    El Niño Walker परिसंचरण की आरोही शाखा के पूर्व की ओर खिसकने व भारतीय क्षेत्र पर प्रबल अवतलन से जुड़ा है, जो दुर्बल मानसून का जोखिम कारक है (सांख्यिकीय प्रवृत्ति, नियम नहीं)। La Niña व धनात्मक IOD मानसून के अनुकूल हैं।
  8. उष्णकटिबंधीय चक्रवात भूमध्य रेखा के लगभग 5° के भीतर मुख्यतः इसलिए नहीं बनते कि

    1. वहाँ समुद्र-सतह सदैव इतनी ठंडी रहती है कि आवश्यक ऊष्मा व नमी न दे सके
    2. वहाँ धरातलीय दाब सदैव अन्यत्र से अधिक रहता है, अतः निम्न बन ही नहीं सकता
    3. भूमध्यरेखीय वायुमंडल में संघनन पर गुप्त ऊष्मा मुक्त करने हेतु जलवाष्प होती ही नहीं
    4. Coriolis प्राचल इतना छोटा है कि अभिसारी वायु को भँवर बनाने हेतु आवश्यक घूर्णन नहीं मिलता
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — Coriolis प्राचल इतना छोटा है कि अभिसारी वायु को भँवर बनाने हेतु आवश्यक घूर्णन नहीं मिलता

    भूमध्य रेखा के निकट f ≈ 0 है, अतः अभिसारी वायु को चक्रवातीय घूर्णन कम मिलता है और घूमते भँवर में दाब-प्रवणता बल संतुलित नहीं हो सकता। भूमध्यरेखीय समुद्र बहुत गर्म व आर्द्र है, अतः ताप व आर्द्रता कारण नहीं हैं।
  9. 20°N पर पृथ्वी के सापेक्ष विरामस्थ (ζ = 0) एक बैरोट्रॉपिक, अपसरण-रहित पार्सल 40°N पर जाता है। पहुँचने पर उसकी सापेक्ष भ्रमिलता है

    1. धनात्मक, f₄₀ − f₂₀ के बराबर, क्योंकि ध्रुव की ओर जाने पर पार्सल को ग्रहीय भ्रमिलता मिलती है
    2. शून्य, क्योंकि अपसरण या घर्षण न होने पर सापेक्ष भ्रमिलता संरक्षित रहती है
    3. ऋणात्मक, f₂₀ − f₄₀ के बराबर, क्योंकि f बढ़ने पर निरपेक्ष भ्रमिलता संरक्षित रहती है
    4. ऋणात्मक, −f₄₀ के बराबर, क्योंकि पहुँचने पर पार्सल अपनी सारी ग्रहीय भ्रमिलता खो देता है
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    उत्तर: C — ऋणात्मक, f₂₀ − f₄₀ के बराबर, क्योंकि f बढ़ने पर निरपेक्ष भ्रमिलता संरक्षित रहती है

    η = ζ + f संरक्षित है: 0 + f₂₀ = ζ + f₄₀, अतः ζ = f₂₀ − f₄₀ < 0 क्योंकि f अक्षांश के साथ बढ़ता है। सापेक्ष भ्रमिलता अकेली संरक्षित नहीं है, और पार्सल अपनी निरपेक्ष भ्रमिलता रखता है, ग्रहीय नहीं।
  10. सामान्य परिसंचरण के बारे में सभी सही कथन चुनिए।

    1. ITCZ अभिसरण व गहरे संवहन की पट्टी है जो मौसम के अनुसार ऊष्मीय विषुवत् रेखा का अनुसरण करती है
    2. 30° के निकट उपोष्ण उच्च अवरोही वायु के क्षेत्र हैं, जिनसे शुष्क दशाएँ बनती हैं
    3. ध्रुवीय कोष्ठ ऊष्मीय अप्रत्यक्ष है, जिसमें ध्रुव पर गर्म वायु उतरती है
    4. मध्य-अक्षांशीय Ferrel कोष्ठ में धरातलीय पवनें मुख्यतः पूर्वी हैं
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    उत्तर: A — ITCZ अभिसरण व गहरे संवहन की पट्टी है जो मौसम के अनुसार ऊष्मीय विषुवत् रेखा का अनुसरण करती है; B — 30° के निकट उपोष्ण उच्च अवरोही वायु के क्षेत्र हैं, जिनसे शुष्क दशाएँ बनती हैं

    ITCZ व अवरोही उपोष्ण उच्च मानक विशेषताएँ हैं। ध्रुवीय कोष्ठ ऊष्मीय प्रत्यक्ष है, जिसमें ध्रुव पर ठंडी वायु उतरती है, और मध्य-अक्षांशीय धरातलीय पवनें पछुआ हैं।
  11. भारतीय ग्रीष्म मानसून के बारे में सभी सही कथन चुनिए।

    1. निम्न-स्तरीय (सोमाली) जेट अरब सागर पर दक्षिण-पश्चिमी प्रवाह में नमी ले जाती है
    2. मानसून द्रोणी उत्तर-पश्चिम भारत के ऊष्मा-निम्न से बंगाल की खाड़ी के शीर्ष तक फैली है
    3. केरल पर आगमन की सामान्य तिथि लगभग 1 जुलाई है
    4. धनात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव ENSO की स्थिति कुछ भी हो, प्रबल मानसून की गारंटी सदैव देता है
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    उत्तर: A — निम्न-स्तरीय (सोमाली) जेट अरब सागर पर दक्षिण-पश्चिमी प्रवाह में नमी ले जाती है; B — मानसून द्रोणी उत्तर-पश्चिम भारत के ऊष्मा-निम्न से बंगाल की खाड़ी के शीर्ष तक फैली है

    सोमाली जेट व मानसून द्रोणी मानक विशेषताएँ हैं। केरल पर सामान्य आगमन लगभग 1 जून है, 1 जुलाई नहीं, और IOD केवल प्रवृत्ति है, गारंटी नहीं।
  12. परिपक्व उष्णकटिबंधीय चक्रवात के बारे में सभी सही कथन चुनिए।

    1. नेत्र अवतलित, गर्म, अपेक्षाकृत शुष्क वायु व हल्की पवन का क्षेत्र है
    2. सर्वाधिक प्रबल पवनें व सबसे भारी वर्षा नेत्र-भित्ति में होती हैं
    3. तूफ़ान मुख्यतः उस Coriolis बल से चालित है जो वायु पर कार्य करता है
    4. नेत्र-भित्ति के निकट पवन-संतुलन लगभग चक्रवातीय है, V²/r ≈ (1/ρ)∂p/∂r
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    उत्तर: A — नेत्र अवतलित, गर्म, अपेक्षाकृत शुष्क वायु व हल्की पवन का क्षेत्र है; B — सर्वाधिक प्रबल पवनें व सबसे भारी वर्षा नेत्र-भित्ति में होती हैं; D — नेत्र-भित्ति के निकट पवन-संतुलन लगभग चक्रवातीय है, V²/r ≈ (1/ρ)∂p/∂r

    अवतलन नेत्र को गर्म व शुष्क करता है, नेत्र-भित्ति में शिखर पवन व वर्षा होती है, और उसके निकट V²/r ≫ fV, अतः संतुलन लगभग चक्रवातीय है। ऊर्जा गुप्त ऊष्मा के मोचन से आती है; Coriolis बल कार्य नहीं करता।
  13. एक पछुआ पवन y = 0 पर u = 12 m/s से उत्तर की ओर y = 400 km पर u = 4 m/s तक घटती है, और सर्वत्र v = 0 है। सापेक्ष भ्रमिलता ζ = ∂v/∂x − ∂u/∂y, 10⁻⁵ s⁻¹ की इकाई में, एक दशमलव स्थान तक, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 2.0

    ∂u/∂y = (4 − 12)/(4×10⁵ m) = −2×10⁻⁵ s⁻¹, अतः ζ = −(−2×10⁻⁵) = +2.0×10⁻⁵ s⁻¹ (चक्रवातीय)।
  14. 30°N पर सापेक्ष भ्रमिलता ζ = 0 वाली वायु निरपेक्ष भ्रमिलता संरक्षित रखते हुए (बैरोट्रॉपिक, अपसरण-रहित प्रवाह) 45°N पर जाती है। Ω = 7.292×10⁻⁵ s⁻¹ लें। 45°N पर उसकी सापेक्ष भ्रमिलता 10⁻⁵ s⁻¹ की इकाई में, दो दशमलव स्थानों तक (चिह्न सहित), ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: -3.02

    f₃₀ = 2Ω sin 30° = 7.292×10⁻⁵; f₄₅ = 2Ω sin 45° = 10.312×10⁻⁵। ζ = f₃₀ − f₄₅ = −3.02×10⁻⁵ s⁻¹।
  15. भूमध्य रेखा पर पृथ्वी के सापेक्ष विरामस्थ वायु निरपेक्ष कोणीय संवेग संरक्षित रखते हुए ध्रुव की ओर चलती है, जिससे u = Ωa sin²φ / cos φ। Ω = 7.292×10⁻⁵ s⁻¹ व a = 6.371×10⁶ m लेकर φ = 30° पर u m/s में, निकटतम पूर्णांक तक, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 134

    Ωa = 7.292×10⁻⁵ × 6.371×10⁶ = 464.6 m/s। sin²30° / cos 30° = 0.25/0.8660 = 0.2887। u = 464.6 × 0.2887 = 134.1 m/s।
  16. माध्य ताप T = 260 K वाली परत में, उस अक्षांश पर जहाँ f = 1.0×10⁻⁴ s⁻¹ है, ताप उत्तर की ओर 1.0×10⁻⁵ K/m से घटता है। g = 9.81 m/s² व तापीय-पवन संबंध ∂u_g/∂z = −(g/(fT)) ∂T/∂y लेकर 1 km से 9 km की ऊँचाई के बीच भूविक्षेपी पछुआ पवन की वृद्धि m/s में, एक दशमलव स्थान तक, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 30.2

    ∂u_g/∂z = −(9.81/(1.0×10⁻⁴ × 260)) × (−1.0×10⁻⁵) = 3.773×10⁻³ s⁻¹। 8000 m पर Δu = 3.773×10⁻³ × 8000 = 30.2 m/s।
  17. r = 40 km त्रिज्या पर एक उष्णकटिबंधीय चक्रवात में f = 5.0×10⁻⁵ s⁻¹ है और केंद्र की ओर प्रति इकाई द्रव्यमान दाब-प्रवणता बल (1/ρ)∂p/∂r = 0.080 m/s² है। प्रवणता-पवन समीकरण V²/r + fV = (1/ρ)∂p/∂r का धनात्मक मूल लेकर V m/s में, एक दशमलव स्थान तक, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 55.6

    fr = 2.0 m/s और (1/ρ)(∂p/∂r) r = 0.080 × 4×10⁴ = 3200। V² + 2.0V − 3200 = 0, अतः V = (−2 + √(4 + 12800))/2 = (−2 + 113.15)/2 = 55.6 m/s।