योज्य, कंपाउंडिंग एवं फ़ॉर्मुलेशन: संघटक, कार्बन ब्लैक, मिश्रण व वल्कनीकरण

यह अध्याय अभियांत्रिकी विज्ञान (XE) पेपर के XE5 बहुलक विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के खंड XE5.5, योज्य, कंपाउंडिंग एवं फ़ॉर्मुलेशन, का उत्तर देता है; यह नौ वैकल्पिक खंडों में से एक है, जिनमें से परीक्षा में परीक्षार्थी कोई दो चुनता है। पाठ्यक्रम में लिखा है: “Polymer compounding-need and significance; Different compounding ingredients for rubber and plastics (crosslinkers, antioxidants, heat stabilizers, UV stabilizers, lubricants, processing aids, impact modifiers, flame retardant, antistatic agents. PVC stabilizers and plasticizers) and their function; Use of carbon black; Polymer mixing equipment; Vulcanization and kinetics.” अध्याय सिखाता है कि कच्चा बहुलक अकेला क्यों नहीं प्रयुक्त होता, प्रत्येक संघटक क्या करता है और कैसे, कार्बन ब्लैक की संरचना व ग्रेड, मिश्रण मशीनें, सल्फर वल्कनीकरण पद्धतियाँ, क्योर वक्र तथा प्रथम-कोटि क्योर बलगतिकी। संख्यात्मक प्रश्न दूसरे ताप पर क्योर-समय (Q10 नियम व अरहीनियस), क्योर दर सूचकांक तथा क्योर का दर-स्थिरांक हैं।

1. बहुलकों की कंपाउंडिंग क्यों की जाती है

बनाया गया बहुलक प्रायः उपयोगी पदार्थ नहीं होता। प्राकृतिक रबर चिपचिपा गोंद है जो भार में बहने लगता है, PVC उसी ताप पर अपघटित होता है जिस पर वह पिघलता है, और पॉलीओलेफ़िन एक्स्ट्रूडर में ऑक्सीकृत होते व धूप में चटकते हैं। कंपाउंडिंग आधार बहुलक को योज्यों व भरावों के साथ उपयुक्त मिश्रण-प्रक्रम द्वारा ऐसे फ़ॉर्मुलेशन में मिलाना है जो संसाधित हो सके, उत्पाद के गुण-लक्ष्य पूरे करे और सेवा-आयु भर टिके। कारण चार हैं: संसाधन संभव बनाना (स्नेहक, प्रक्रमण सहायक, सुघट्यकारी, पेप्टाइज़र), गुण विकसित करना (क्रॉसलिंकर, भराव, आघात-रूपांतरक, सुघट्यकारी), बहुलक की रक्षा (प्रतिऑक्सीकारक, ऊष्मा व UV स्थायीकारी, एंटीओज़ोनेंट) तथा विशेष कार्य देना (ज्वाला-रोधन, प्रतिस्थैतिक क्रिया, रंग, फूलक); पाँचवाँ कारण सस्ते भरावों व विस्तारक तेलों से लागत-कमी है।

रबर के फ़ॉर्मुलेशन phr (प्रति सौ भाग रबर पर भार-भाग) में लिखे जाते हैं, अतः रबर सदा 100 होता है और शेष हर संघटक उसी के सापेक्ष पढ़ा जाता है; प्लास्टिक के नुस्खे भी प्रायः phr में या भार-प्रतिशत में दिए जाते हैं। टायर-ट्रेड जैसा एक उदाहरण नुस्खा है: रबर 100, कार्बन ब्लैक 50, प्रक्रमण तेल 8, ज़िंक ऑक्साइड 5, स्टिअरिक अम्ल 2, प्रतिक्षयकारी 2, त्वरक 1, सल्फर 2.5 phr। phr को भार-प्रतिशत में बदलने हेतु कुल से भाग दें: यहाँ कुल 170.5 है, अतः कार्बन ब्लैक 50/170.5 = 29.3 % है।

⚠️ phr प्रतिशत नहीं है
phr में संघटकों का योग सदा 100 से अधिक होता है। 100 phr रबर व 100 phr भराव वाला यौगिक भार में 50 % भराव है, 100 % नहीं। आयतन-अंश, जो कठोरता व श्यानता तय करता है, के लिए घनत्व भी चाहिए।

2. स्थायीकारी: PVC ऊष्मा स्थायीकारी, प्रतिऑक्सीकारक व UV स्थायीकारी

PVC ऊष्मा स्थायीकारी। लगभग 100 °C से ऊपर PVC अस्थिर स्थलों (ऐलिलिक व तृतीयक क्लोरीन) से HCl त्यागता है, जिससे संयुग्मित पॉलीईन अनुक्रम बनते हैं जो दृश्य प्रकाश अवशोषित करते हैं; फलतः बहुलक पीला, भूरा और अंततः काला पड़ता है। मुक्त HCl आगे की हानि को उत्प्रेरित करता है (स्वतः-उत्प्रेरण), और ज़िंक या आयरन क्लोराइड की उपस्थिति में हानि तेज़ होती है। स्थायीकारी (i) HCl अवशोषित करके, (ii) अस्थिर क्लोरीन को स्थिर समूह से प्रतिस्थापित करके, (iii) पॉलीईन या ऑक्सीजन से अभिक्रिया करके, या (iv) हानिकारक धातु-क्लोराइडों का कीलेशन करके कार्य करता है। मुख्य वर्ग: लेड लवण (ट्राइबेसिक लेड सल्फ़ेट: सस्ता, उत्कृष्ट दीर्घकालिक ऊष्मीय व विद्युत स्थायित्व, अपारदर्शी, विषैला, चरणबद्ध रूप से हटाया जा रहा), कैल्शियम-ज़िंक साबुन (अविषैले; ज़िंक साबुन अस्थिर Cl बदलता है पर ZnCl₂ बनाता है जो स्वयं अपघटन तेज़ करता है, अतः ZnCl₂ को वापस ज़िंक साबुन में बदलने हेतु कैल्शियम साबुन मिलाया जाता है), ऑर्गेनोटिन मर्कैप्टाइड (पारदर्शी कठोर PVC) तथा एपॉक्सीकृत सोयाबीन तेल, एक सह-स्थायीकारी जो अपने एपॉक्साइड वलयों से HCl ग्रहण करता है।

प्रतिऑक्सीकारक। ऑक्सीकरण एक मूलक-शृंखला है: प्रारंभ से R• बनता है, फिर R• + O₂ → ROO• व ROO• + RH → ROOH + R•, और गर्म करने पर ROOH टूटकर और मूलक देता है। प्राथमिक प्रतिऑक्सीकारक (अवरुद्ध फ़ीनॉल, ऐरोमैटिक ऐमीन) ROO• को हाइड्रोजन परमाणु देते हैं, और जो मूलक वे बनते हैं वह शृंखला चलाने हेतु अति-स्थायी होता है: ये शृंखला-भंजक हैं। द्वितीयक प्रतिऑक्सीकारक (फ़ॉस्फ़ाइट, थायोएस्टर) मूलकों को नहीं छूते; वे ROOH को हानिरहित ऐल्कोहॉलों में विघटित करते हैं, अतः हाइड्रोपरॉक्साइड-अपघटक हैं। दोनों का साथ-साथ उपयोग सहक्रियात्मक है। रबरों में प्रतिक्षयकारी मुख्यतः ऐरोमैटिक ऐमीन (जैसे p-फ़ेनिलीनडाइऐमीन प्रकार) होते हैं, जो सतह पर आकर (ब्लूम) ओज़ोन-दरारों से भी बचाते हैं, और सुरक्षात्मक सतही परत हेतु मोम मिलाया जाता है।

UV स्थायीकारी। सूर्य-प्रकाश आबंध तोड़ता है और वही ऑक्सीकरण-शृंखला शुरू करता है। UV अवशोषक (बेंज़ोफ़ीनोन, बेंज़ोट्राइऐज़ोल) विकिरण अवशोषित करके उसे हानिरहित ऊष्मा के रूप में छोड़ते हैं; इन्हें कार्य हेतु मोटाई चाहिए, अतः ये पतली फ़िल्मों से अधिक मोटे भागों की रक्षा करते हैं। HALS (अवरुद्ध ऐमीन प्रकाश स्थायीकारी) UV अवशोषित नहीं करते: वे मूलकों को पकड़ते हैं और चक्र में पुनर्जनित होते हैं, अतः पतली फ़िल्मों व तंतुओं की दीर्घकाल तक रक्षा करते हैं। स्क्रीनर जैसे कार्बन ब्लैक व टाइटेनियम डाइऑक्साइड सतह पर प्रकाश को परावर्तित या अवशोषित करते हैं।

⚠️ ऊष्मा स्थायीकारी बनाम प्रतिऑक्सीकारक
PVC ऊष्मा स्थायीकारी विहाइड्रोक्लोरीनन से लड़ता है, जो अम्ल-चालित HCl-हानि है और जिसे ऑक्सीजन नहीं चाहिए; फ़ीनॉलिक प्रतिऑक्सीकारक ऑक्सीजन-मूलकों से लड़ता है। पॉलीओलेफ़िन में अस्थिर क्लोरीन नहीं होता, अतः उसे प्रतिऑक्सीकारक चाहिए, PVC स्थायीकारी नहीं। HALS UV अवशोषित नहीं करते: उन्हें UV अवशोषक कहना ग़लत है।

3. सुघट्यकारी, स्नेहक, प्रक्रमण सहायक, आघात-रूपांतरक, ज्वाला-रोधी व प्रतिस्थैतिक

सुघट्यकारी अल्प-वाष्पशील, संगत द्रव है (PVC हेतु सामान्य DOP, जिसे DEHP भी कहते हैं, डाई-2-एथिलहेक्सिल फ़ेथैलेट) जो शृंखलाओं के बीच बैठकर मुक्त आयतन बढ़ाता है और क्लोरीन व हाइड्रोजन स्थलों के बीच द्विध्रुवी आकर्षण को ढकता है। यह Tg व मॉड्यूलस घटाता और दीर्घन बढ़ाता है: कठोर PVC (Tg लगभग 80 °C) 30 से 60 phr पर लचीला हो जाता है क्योंकि Tg कक्ष-ताप से नीचे आ जाता है। सुघट्यकारी प्रवासित, वाष्पित या निष्कर्षित हो सकते हैं; द्वितीयक सुघट्यकारी या विस्तारक (एपॉक्सीकृत तेल, क्लोरीनीकृत पैराफ़िन) सस्ता पर कम संगत है। रबरों में प्रक्रमण तेल सुघट्यकारी व विस्तारक का कार्य करते हैं: अदागदार हेतु पैराफ़िनी और SBR व BR से संगति हेतु ऐरोमैटिक।

मुख्य योज्य वर्गों के कार्य
योज्यकार्य-विधिविशिष्ट उदाहरण
आंतरिक स्नेहकसंगत, गलित श्यानता व आंतरिक घर्षण घटाता हैवसीय ऐल्कोहॉल, एस्टर
बाह्य स्नेहकअल्प संगत, धातु-सतह पर प्रवासित होता है, संगलन देर से कराता है, विमोचन में सहायकपैराफ़िन व PE मोम
प्रक्रमण सहायकPVC का संगलन व गलित सामर्थ्य बढ़ाता हैउच्च-मोलर-द्रव्यमान ऐक्रिलिक सहबहुलक
आघात-रूपांतरकरबरी कण क्रेज़िंग व अपरूपण-यील्डिंग शुरू करते हैं जो ऊर्जा सोखती हैMBS, ऐक्रिलिक, CPE; PP में EPDM
ज्वाला-रोधीगैस-प्रावस्था मूलक-ग्रहण, ऊष्माशोषी जल-मुक्ति, या चार-निर्माणSb₂O₃ सहित ब्रोमीनीकृत यौगिक; Al(OH)₃; फ़ॉस्फ़ोरस
प्रतिस्थैतिक कारकप्रवासित होकर आर्द्रता खींचता और आवेश प्रवाहित करता है, या चालक भरावएथॉक्सिलित ऐमीन, ग्लिसरॉल एस्टर; कार्बन ब्लैक

दो संख्याएँ याद रखने योग्य हैं। ऐल्युमिनियम हाइड्रॉक्साइड लगभग 200 °C पर ऊष्माशोषी रूप से विघटित होता है, 2Al(OH)₃ → Al₂O₃ + 3H₂O, और अपने द्रव्यमान का 54/156 = 34.6 % जल मुक्त करता है जो ज्वाला को ठंडा व तनु करता है, पर लगभग 50 से 65 % भरण चाहिए और इसलिए इसे 200 °C से बहुत ऊपर संसाधित बहुलकों में प्रयुक्त नहीं कर सकते; मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड लगभग 330 °C पर आरंभ होता है। हैलोजन ज्वाला-रोधी ऐंटिमनी ट्राइऑक्साइड के साथ सहक्रियात्मक रूप से कार्य करता है: दोनों मिलकर ऐंटिमनी हैलाइड स्पीशीज़ बनाते हैं जो गैस-प्रावस्था में ज्वाला-मूलकों को पकड़ती हैं।

4. रबर कंपाउंडिंग संघटक

रबर यौगिक में सात प्रकार के संघटक होते हैं। आधार प्रत्यास्थक; क्रॉसलिंकर (असंतृप्त रबरों हेतु सल्फर; डाइक्यूमिल परऑक्साइड जैसे कार्बनिक परऑक्साइड, जो C–C क्रॉसलिंक बनाते हैं और EPDM व सिलिकॉन जैसे संतृप्त रबरों व पॉलीएथिलीन में कार्य करते हैं; पॉलीक्लोरोप्रीन हेतु ZnO व MgO धातु-ऑक्साइड); सक्रियक (स्टिअरिक अम्ल सहित ज़िंक ऑक्साइड, जो विलेय ज़िंक साबुन बनाकर त्वरक को कार्य करने देता है); त्वरक; भराव (प्रबलक कार्बन ब्लैक या सिलिका, अर्ध-प्रबलक व अक्रिय भराव जैसे क्ले या कैल्शियम कार्बोनेट); रक्षक कारक व प्रक्रमण सहायक (तेल, पेप्टाइज़र जो मैस्टिकेशन में शृंखला-लंबाई घटाते हैं, चिपकाने वाले); तथा मंदक (पूर्व-वल्कनीकरण संदमक सुरक्षित स्कॉर्च समय बढ़ाता है)।

योग का क्रम प्रत्येक संघटक की संवेदनशीलता का अनुसरण करता है। रबर को पहले मुलायम करने हेतु मैस्टिकेट किया जाता है, फिर भराव, तेल, ज़िंक ऑक्साइड व स्टिअरिक अम्ल मिलाए जाते हैं, और क्योरेटिव (सल्फर व त्वरक) अंत में, न्यूनतम ताप पर, प्रायः लगभग 100 °C से नीचे, ताकि मिश्रक में कोई क्रॉसलिंकन (स्कॉर्च) शुरू न हो।

5. कार्बन ब्लैक: संरचना, प्रबलन व ग्रेड

भट्ठी कार्बन ब्लैक एरोमैटिक तेल के तप्त भट्ठी में आंशिक दहन व विखंडन से बनता है। बढ़ते कार्बन गोले, लगभग 10 से 100 nm के प्राथमिक कण, मिलकर शाखित, अंगूर-गुच्छ जैसे एग्रीगेट बनाते हैं, जो मिश्रण में बचने वाली सबसे छोटी इकाई है। तीन गुण महत्त्वपूर्ण हैं। कण-आकार (समतुल्यतः पृष्ठीय क्षेत्रफल, नाइट्रोजन अधिशोषण या आयोडीन संख्या से मापित): महीन ब्लैक अधिक रबर-भराव संपर्क देता है, अतः तन्य सामर्थ्य, विदारण व अपघर्षण-प्रतिरोध अधिक, पर ऊष्मा-संचयन व श्यानता भी अधिक। संरचना, एग्रीगेट की शाखन-मात्रा, जो तेल अवशोषण (DBP) संख्या से मापी जाती है: उच्च संरचना अपने रिक्तों में रबर फँसाती है (अवरुद्ध रबर), जिससे प्रभावी भराव-आयतन बढ़ता है, अतः मॉड्यूलस, कठोरता व श्यानता बढ़ते और डाई स्वेल घटता है। पृष्ठ सक्रियता तय करती है कि कितना रबर बद्ध रबर के रूप में थमा रहे, जो विलायक-निष्कर्षण का प्रतिरोध करता है।

ASTM कार्बन ब्लैक ग्रेड (N = सामान्य क्योर)
ग्रेडनामविशेषता व उपयोग
N110, N220SAF, ISAFअति महीन, उच्च अपघर्षण-प्रतिरोध: टायर ट्रेड
N330HAFसामान्य-प्रयोजन प्रबलक ग्रेड: ट्रेड, यांत्रिक वस्तुएँ
N550FEFमध्यम आकार, उच्च संरचना: अच्छा एक्स्ट्रूज़न, कारकस
N660, N774GPF, SRFमोटे, कम ऊष्मा-संचयन: इनर लाइनर, साइडवॉल, ढले भाग
N990MT (तापीय)सबसे बड़े कण, निम्न संरचना, बहुत उच्च भरण, अल्प प्रबलन

N-संख्या में N सामान्य क्योर दर दर्शाता है और पहला अंक कण-आकार वर्ग को: N1 सबसे महीन है और N7, N9 क्रमशः मोटे होते जाते हैं, अतः छोटा अंक यानी छोटा कण व अधिक प्रबलन। सामान्य भरण टायर यौगिकों में 30 से 60 phr है; प्लास्टिकों में 2 से 3 % कार्बन ब्लैक UV स्क्रीनर व चालक भराव के रूप में प्रयुक्त होता है। सिलेन युग्मन कारक सहित सिलिका मुख्य गैर-ब्लैक प्रबलक भराव है, जो न्यून रोलिंग प्रतिरोध हेतु पसंद किया जाता है।

6. बहुलक मिश्रण उपकरण

मिश्रण के दो उद्देश्य हैं। परिक्षेपी मिश्रण भराव के समूहों को एग्रीगेट तक तोड़ता है: इसे उच्च प्रतिबल चाहिए, समूह के संसंजन-सामर्थ्य से अधिक, इसलिए यह उच्च-अपरूपण क्षेत्रों में होता है। वितरी मिश्रण संघटकों को आकाश में समान रूप से फैलाता है: इसे बड़ा कुल विकृति, तह लगाना और बार-बार काटना चाहिए, उच्च प्रतिबल नहीं। प्रत्येक मशीन दोनों करती है, भिन्न अनुपात में।

मिश्रण मशीनें
मशीनक्या करती हैविशिष्ट उपयोग
दो-रोल मिलदो क्षैतिज विपरीत-घूर्णी रोल भिन्न चालों (घर्षण अनुपात लगभग 1.1 से 1.25) पर समायोज्य निप में रबर को अपरूपित करते हैं; खुले, ठंडे रोल, बैच, ऑपरेटर द्वारा कटाईमैस्टिकेशन, क्योरेटिव मिलाना, शीट बनाना, प्रयोगशाला व छोटे बैच
आंतरिक मिश्रक (बैनबरी प्रकार)दो रोटर वाला बंद कक्ष, भरण को दबाता राम; रोटर-सिरे के अंतराल पर उच्च अपरूपण; कुछ मिनट का बैच; ताप व भरण-गुणक नियंत्रितबड़े पैमाने की रबर कंपाउंडिंग, भराव परिक्षेपण; निकासी मिल या एक्स्ट्रूडर में
एकल-स्क्रू एक्स्ट्रूडरफ़ीड, संपीड़न व मीटरन क्षेत्र वहन, गलन व पंपन करते हैं; मिश्रण-खंड जोड़े बिना मिश्रण कमज़ोरआकार देना, पेलेटीकरण, प्रोफ़ाइल
द्वि-स्क्रू एक्स्ट्रूडरअंतर्ग्रथित, स्वतः-पोंछने वाले स्क्रू, धनात्मक वहन, मॉड्यूलर अवयव; सतत, प्रबल परिक्षेपी व वितरी मिश्रण, वाष्प-निष्कासन हेतु वेंटप्लास्टिकों का कंपाउंडिंग व मास्टरबैच, अभिक्रियात्मक एक्स्ट्रूज़न

7. वल्कनीकरण: सल्फर पद्धतियाँ, त्वरक व सक्रियक

वल्कनीकरण प्लास्टिक, चिपचिपे रबर को कुछ स्थलों पर शृंखलाएँ जोड़कर प्रत्यास्थ जालक में बदलता है। केवल सल्फर धीमा है (140 °C पर घंटे) और उच्च भरण माँगता है; त्वरक व सक्रियक युग्म ZnO तथा स्टिअरिक अम्ल के साथ क्योर मिनटों में होता है और दक्ष है। त्वरक व ज़िंक साबुन एक सक्रिय सल्फ़रीकारी संकुल बनाते हैं जो असंतृप्त शृंखला के ऐलिलिक स्थलों से अभिक्रिया करके तीन प्रकार के क्रॉसलिंक देता है: मोनो-सल्फ़िडिक (C–S–C), डाई-सल्फ़िडिक तथा पॉली-सल्फ़िडिक (Sₓ, x ≥ 3)। क्रॉसलिंकन मॉड्यूलस, कठोरता व प्रतिक्षेप-क्षमता बढ़ाता, हिस्टैरिसिस, दीर्घन व स्थायी विकृति घटाता, और रबर को अविलेय बनाता है: वह केवल फूलता है।

सल्फर वल्कनीकरण पद्धतियाँ (विशिष्ट परास, phr)
पद्धतिसल्फरत्वरकक्रॉसलिंक व गुण
परंपरागत2.0 से 3.50.4 से 1.2अधिकांश पॉली-सल्फ़िडिक: उच्च सामर्थ्य व श्रांति-आयु, कमज़ोर ऊष्मा-जरण व प्रत्यावर्तन
अर्ध-EV1.0 से 1.71.2 से 2.4मिश्रित: श्रांति व जरण का समझौता
EV (दक्ष)0.4 से 0.83 से 6अधिकांश मोनो- व डाई-सल्फ़िडिक: अच्छा ऊष्मा-जरण, कम संपीड़न-स्थिरांक व प्रत्यावर्तन, कम सामर्थ्य व श्रांति

परंपरागत से EV की ओर जाना उच्च त्वरक-सल्फर अनुपात की ओर जाना है: प्रति क्रॉसलिंक-स्थल अल्प सल्फर उपलब्ध होता है, अतः क्रॉसलिंक छोटे रहते हैं। छोटे, सशक्त C–S–C आबंध ऊष्मा सहते हैं; लंबे, दुर्बल Sₓ आबंध विकृति में टूटते व पुनः बनते हैं, जिससे श्रांति-आयु मिलती है पर ऊष्मा में वे टूटते हैं (प्रत्यावर्तन: अतिक्योर में मॉड्यूलस का गिरना)। त्वरक वर्ग गति के बढ़ते क्रम में हैं: ग्वानिडीन (जैसे DPG, द्वितीयक त्वरक), थायाज़ोल (MBT, MBTS), सल्फ़ेनैमाइड (CBS, TBBS: तेज़ पर विलंबित आरंभ, अतः लंबा सुरक्षित स्कॉर्च समय), थायूरैम (TMTD, जो सल्फर भी दे सकता है) तथा डाइथायोकार्बामेट (अति-तीव्र)।

⚠️ अधिक सल्फर अधिक दक्ष नहीं
परंपरागत पद्धतियाँ सर्वाधिक सल्फर लेती हैं पर सबसे कम उपयोगी छोटे क्रॉसलिंक बनाती हैं; EV पद्धतियाँ सबसे कम सल्फर व सबसे अधिक त्वरक लेती हैं। सल्फर वल्कनीकरण को द्विबंध चाहिए, अतः यह NR, SBR, BR व NBR हेतु कार्य करता है; संतृप्त रबरों को परऑक्साइड या अन्य क्रॉसलिंकर चाहिए।

8. क्योर वक्र व क्योर बलगतिकी

क्योरमापी स्थिर ताप पर बलाघूर्ण को समय के साथ अभिलेखित करता है, और बलाघूर्ण अपरूपण मॉड्यूलस के, अतः क्रॉसलिंक घनत्व के अनुक्रमानुपाती है। वक्र से मिलता है: ML, न्यूनतम बलाघूर्ण (यौगिक की श्यानता); ts2, स्कॉर्च समय, बलाघूर्ण के ML से 2 इकाई ऊपर उठने का समय; MH, अधिकतम बलाघूर्ण; t90, इष्टतम क्योर समय, ML + 0.9 (MH − ML) तक पहुँचने का समय; तथा क्योर दर सूचकांक CRI = 100/(t90 − ts2) min⁻¹ में। MH के बाद प्राकृतिक रबर प्रत्यावर्तन (गिरता बलाघूर्ण) दिखा सकता है, जबकि कुछ संश्लिष्ट रबर बढ़ता, मार्चिंग बलाघूर्ण दिखाते हैं। बलाघूर्ण-वृद्धि ΔM = MH − ML क्रॉसलिंक घनत्व का सापेक्ष माप है।

बलगतिकी। क्योर की अवस्था α = (M − ML)/(MH − ML) है, 0 से 1 तक। प्रेरण-अवधि के बाद, अच्छे सन्निकटन में क्योर प्रथम कोटि है: dα/dt = k (1 − α), अतः ln (1 − α) = − k (t − ts) और ln (1 − α) बनाम t का आलेख ढाल − k की सरल रेखा है। t90 पर α = 0.9, अतः k = ln 10/(t90 − ts) = 2.303/(t90 − ts)। ताप-निर्भरता अरहीनियस है, k = A exp(−Ea/RT), अतः दो तापों (केल्विन में) के बीच t₂ = t₁ exp[(Ea/R)(1/T₂ − 1/T₁)], R = 8.314 J mol⁻¹ K⁻¹ के साथ। कारख़ाने का रूप Q10 नियम है: प्रत्येक 10 °C वृद्धि पर क्योर समय आधा, t₂ = t₁/2^[(T₂ − T₁)/10], जो लगभग 150 °C पर लगभग 100 kJ/mol सक्रियण ऊर्जा के संगत है।

हल उदाहरण। एक यौगिक का 140 °C पर t90 = 24 min है। Q10 नियम से 160 °C पर, जो 10 °C के दो चरण हैं, t90 = 24/2² = 6 min। अरहीनियस व Ea = 90 kJ/mol से 150 °C (423.15 K) पर 18 min का समय 170 °C (443.15 K) पर t = 18 exp[−(90000/8.314)(1/423.15 − 1/443.15)] हो जाता है; यह (1/423.15 − 1/443.15) = 1.0666 × 10⁻⁴ K⁻¹ है, इसे 10825 K से गुणा करने पर 1.1546, और e^−1.1546 = 0.3152, अतः 18 × 0.3152 = 5.67 min। मोटे उत्पादों में भीतरी भाग सतह से पिछड़ता है: क्योर का निर्णय तुल्य क्योर ∫ 2^[(T − Tref)/10] dt से होता है, सबसे ठंडे केंद्र की अवस्था प्रेस-समय तय करती है, जबकि सतह अतिक्योर हो सकती है।

मुख्य बिंदु

  • कंपाउंडिंग बहुलक को संसाध्य बनाती, गुण-लक्ष्य देती, सेवा में रक्षा करती और विशेष कार्य जोड़ती है; रबर नुस्खे phr (प्रति सौ भाग रबर) में होते हैं, अतः संघटकों का योग 100 से अधिक होता है और भार-प्रतिशत phr को कुल से भाग देने पर मिलता है।
  • PVC HCl की स्वतः-उत्प्रेरित हानि से अपघटित होता है, अतः उसके स्थायीकारी (लेड, Ca/Zn, ऑर्गेनोटिन, एपॉक्सीकृत तेल) HCl अवशोषित करते या अस्थिर क्लोरीन बदलते हैं; प्राथमिक प्रतिऑक्सीकारक मूलक-शृंखला तोड़ते, द्वितीयक हाइड्रोपरॉक्साइड विघटित करते हैं, UV अवशोषकों को मोटाई चाहिए जबकि HALS मूलक पकड़ते हैं और मोटाई पर निर्भर नहीं।
  • सुघट्यकारी Tg व मॉड्यूलस घटाते हैं; आंतरिक स्नेहक संगत होकर गलित श्यानता घटाते, बाह्य धातु पर प्रवासित होकर संगलन में देरी करते हैं; आघात-रूपांतरक रबरी कण हैं; Al(OH)₃ लगभग 200 °C पर 34.6 % जल और Mg(OH)₂ लगभग 330 °C पर मुक्त करता है; प्रतिस्थैतिक प्रवासित होकर आर्द्रता बाँधते हैं या चालक भराव हैं।
  • कार्बन ब्लैक: महीन कण अपघर्षण-प्रतिरोध, तन्य सामर्थ्य व हिस्टैरिसिस बढ़ाते हैं; उच्च संरचना (DBP संख्या) मॉड्यूलस व श्यानता बढ़ाती और डाई स्वेल घटाती है; N-संख्या में छोटा पहला अंक यानी महीन; मिश्रण परिक्षेपी (उच्च प्रतिबल) व वितरी (बड़ा विकृति) है, जो मिल, आंतरिक मिश्रक व द्वि-स्क्रू एक्स्ट्रूडर में होता है।
  • सल्फर वल्कनीकरण को द्विबंध चाहिए और सक्रियक के रूप में स्टिअरिक अम्ल सहित ZnO; परंपरागत पद्धतियाँ (उच्च S, निम्न त्वरक) पॉली-सल्फ़िडिक, श्रांति-प्रतिरोधी पर प्रत्यावर्तन-प्रवण हैं, EV पद्धतियाँ (निम्न S, उच्च त्वरक) मोनो- व डाई-सल्फ़िडिक और ऊष्मा-स्थायी हैं; स्कॉर्च से बचने हेतु क्योरेटिव अंत में व ठंडे मिलाए जाते हैं।
  • क्योर वक्र: ML, ts2, MH, t90 = ML + 0.9(MH − ML) तक का समय, CRI = 100/(t90 − ts2)। प्रथम-कोटि क्योर से ln(1 − α) = −k(t − ts), k = 2.303/(t90 − ts); अरहीनियस विस्थापन t₂ = t₁ exp[(Ea/R)(1/T₂ − 1/T₁)] है, और Q10 नियम प्रत्येक 10 °C पर समय आधा करता है।

अभ्यास प्रश्न (16)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. PVC के ऊष्मीय संसाधन के दौरान बहुलक से मुक्त कौन-सी स्पीशीज़ उसके आगे के अपघटन को स्वयं तेज़ करती है?

    1. हाइड्रोजन क्लोराइड, जो आगे के विहाइड्रोक्लोरीनन को उत्प्रेरित करता है
    2. आणविक हाइड्रोजन, जो शृंखला का हाइड्रोजनीकरण करके उसे मुलायम करती है
    3. कार्बन डाइऑक्साइड, जो मेरुदंड को कार्बोनिल समूहों में ऑक्सीकृत करती है
    4. जल-वाष्प, जो कार्बन-क्लोरीन आबंध का जलअपघटन करती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — हाइड्रोजन क्लोराइड, जो आगे के विहाइड्रोक्लोरीनन को उत्प्रेरित करता है

    PVC अस्थिर क्लोरीन स्थलों से HCl त्यागता है और HCl आगे की हानि को उत्प्रेरित करता है, इसलिए स्थायीकारी को HCl अवशोषित करना या अस्थिर क्लोरीन बदलना होता है। जलअपघटन मार्ग नहीं है: अपघटन जल या ऑक्सीजन के बिना चलता है, और सूचीबद्ध अन्य गैसें स्वतः-उत्प्रेरक नहीं हैं।
  2. पॉलीप्रोपिलीन में प्राथमिक प्रतिऑक्सीकारक के रूप में अवरुद्ध फ़ीनॉल मिलाया गया है। यह बहुलक की रक्षा कैसे करता है?

    1. यह पराबैंगनी प्रकाश अवशोषित करके उसे ऊष्मा में बदलता है
    2. यह मूलकों से अभिक्रिया किए बिना हाइड्रोपरॉक्साइडों को स्थिर ऐल्कोहॉलों में विघटित करता है
    3. यह बहुलकन उत्प्रेरक के अम्लीय अवशेषों को उदासीन करता है
    4. यह परॉक्सी मूलक को हाइड्रोजन परमाणु देकर ऑक्सीकरण-शृंखला तोड़ता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — यह परॉक्सी मूलक को हाइड्रोजन परमाणु देकर ऑक्सीकरण-शृंखला तोड़ता है

    प्राथमिक प्रतिऑक्सीकारक शृंखला-भंजक हैं: वे ROO• को H परमाणु देकर स्थायी मूलक बन जाते हैं। मूलकों को छुए बिना हाइड्रोपरॉक्साइड विघटित करना फ़ॉस्फ़ाइट जैसे द्वितीयक प्रतिऑक्सीकारकों का कार्य है, और यही भ्रामक ग़लत उत्तर है। UV अवशोषण UV अवशोषकों का कार्य है।
  3. लचीले PVC में कैल्शियम-ज़िंक स्थायीकारी प्रयुक्त है, जिसमें कैल्शियम साबुन ज़िंक साबुन से बहुत अधिक है। कैल्शियम साबुन क्या करता है?

    1. यह बहुलक को सुघट्य बनाता और उसका काँच संक्रमण ताप कक्ष-ताप से नीचे घटाता है
    2. यह ZnCl₂ को वापस ज़िंक साबुन में बदलता है, क्योंकि ZnCl₂ अपघटन तेज़ करता है
    3. यह पराबैंगनी प्रकाश अवशोषित करता है ताकि ज़िंक साबुन व्यय न हो
    4. यह शृंखलाओं को क्रॉसलिंक करता है ताकि पॉलीईन अनुक्रम न बन सकें
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — यह ZnCl₂ को वापस ज़िंक साबुन में बदलता है, क्योंकि ZnCl₂ अपघटन तेज़ करता है

    ज़िंक साबुन अस्थिर क्लोरीन बदलता है पर ZnCl₂ बनाता है, जो आगे के विहाइड्रोक्लोरीनन का प्रबल उत्प्रेरक है (ज़िंक बर्निंग)। कैल्शियम साबुन ZnCl₂ से विनिमय करके ज़िंक साबुन पुनर्जनित करता और हानिरहित CaCl₂ बनाता है। यह सुघट्यकारी या UV अवशोषक नहीं है, और PVC स्थायीकरण में क्रॉसलिंकन नहीं होता।
  4. दो यौगिक केवल कार्बन ब्लैक में भिन्न हैं: एक में अति महीन N220 ग्रेड और दूसरे में मोटा N774 ग्रेड है, दोनों 50 phr पर। कौन-सा कथन सही है?

    1. N774 यौगिक का अपघर्षण-प्रतिरोध अधिक है क्योंकि मोटे कण घिसाव का प्रतिरोध करते हैं
    2. N220 यौगिक में ऊष्मा-संचयन कम है क्योंकि उसके एग्रीगेट छोटे हैं
    3. N220 यौगिक में अपघर्षण-प्रतिरोध व तन्य सामर्थ्य अधिक पर ऊष्मा-संचयन भी अधिक है
    4. दोनों यौगिक एक-से व्यवहार करते हैं, क्योंकि प्रबलन केवल भरण से तय होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — N220 यौगिक में अपघर्षण-प्रतिरोध व तन्य सामर्थ्य अधिक पर ऊष्मा-संचयन भी अधिक है

    महीन ब्लैक बड़ा रबर-भराव अंतरापृष्ठ देता है, अतः अपघर्षण-प्रतिरोध, तन्य सामर्थ्य व विदारण अधिक, पर अधिक हिस्टैरिसिस (ऊष्मा-संचयन) व उच्च श्यानता की क़ीमत पर। मोटा ग्रेड इसके उलट है, अतः पहले दो दावे उलटे हैं, और समान भरण पर भी कण-आकार मायने रखता है।
  5. स्थिर भरण व कण-आकार पर, उच्च संरचना (उच्च DBP तेल अवशोषण संख्या) वाला कार्बन ब्लैक रबर यौगिक में प्रयुक्त होता है। किन परिवर्तनों की अपेक्षा है?

    1. उच्च मॉड्यूलस व श्यानता और कम डाई स्वेल, क्योंकि एग्रीगेटों में अधिक रबर अवरुद्ध है
    2. निम्न मॉड्यूलस व श्यानता, क्योंकि एग्रीगेट स्नेहक गोलों की तरह कार्य करते हैं
    3. उच्च मॉड्यूलस पर निम्न श्यानता, क्योंकि संरचना केवल यौगिक की क्योर अवस्था को प्रभावित करती है
    4. किसी गुण में परिवर्तन नहीं, क्योंकि संरचना व कण-आकार एक ही बात हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उच्च मॉड्यूलस व श्यानता और कम डाई स्वेल, क्योंकि एग्रीगेटों में अधिक रबर अवरुद्ध है

    शाखित एग्रीगेट अपने रिक्तों में रबर फँसाता है, प्रभावी भराव-आयतन बढ़ता है, अतः मॉड्यूलस, कठोरता व अक्योर श्यानता बढ़ते और डाई स्वेल घटता है। संरचना कण-आकार से अलग गुण है और अक्योर अवस्था में भी कार्य करती है, अतः परिवर्तन-रहित दावा विफल है।
  6. एक NR इंजन माउंट को 100 °C पर लंबी सेवा के बाद अपना मॉड्यूलस बनाए रखना है, संपीड़न-स्थिरांक कम चाहिए, और श्रांति-आयु गौण है। कौन-सी वल्कनीकरण पद्धति सर्वाधिक उपयुक्त है?

    1. परंपरागत: उच्च सल्फर (लगभग 2.5 phr) व निम्न त्वरक, जिससे अधिकांश पॉली-सल्फ़िडिक क्रॉसलिंक बनते हैं
    2. बिना त्वरक केवल 5 phr सल्फर, जिससे सबसे लंबे क्रॉसलिंक बनते हैं
    3. EV: निम्न सल्फर (लगभग 0.5 phr) व उच्च त्वरक, जिससे अधिकांश मोनो- व डाई-सल्फ़िडिक क्रॉसलिंक बनते हैं
    4. कोई क्रॉसलिंकर नहीं, क्योंकि प्राकृतिक रबर पहले से प्रत्यास्थ है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — EV: निम्न सल्फर (लगभग 0.5 phr) व उच्च त्वरक, जिससे अधिकांश मोनो- व डाई-सल्फ़िडिक क्रॉसलिंक बनते हैं

    छोटे मोनो- व डाई-सल्फ़िडिक क्रॉसलिंक ऊष्मीय रूप से स्थिर हैं, प्रत्यावर्तन का प्रतिरोध करते हैं और कम संपीड़न-स्थिरांक देते हैं; EV पद्धति यही बनाती है। परंपरागत पद्धति दुर्बल पॉली-सल्फ़िडिक बंध बनाती है जो ऊष्मा में टूटते हैं; यह भ्रामक चयन तभी होता जब श्रांति-आयु प्राथमिकता होती। अवल्कनित रबर बहता है और स्थायी रूप से सेट हो जाता है।
  7. एक रबर नुस्खा है: रबर 100, कार्बन ब्लैक 45, प्रक्रमण तेल 5, ज़िंक ऑक्साइड 5, स्टिअरिक अम्ल 2, त्वरक 1, सल्फर 2 (सब phr में)। संपूर्ण यौगिक के भार-प्रतिशत में कार्बन ब्लैक की मात्रा क्या है, एक दशमलव स्थान तक?

    1. 45.0 %
    2. 30.4 %
    3. 22.5 %
    4. 28.1 %
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — 28.1 %

    कुल = 100 + 45 + 5 + 5 + 2 + 1 + 2 = 160 phr, अतः कार्बन ब्लैक = 45/160 = 28.1 %। 45 phr को 45 % पढ़ना शेष संघटकों की उपेक्षा है, और 30.4 % (45/148) कुल से तेल, ज़िंक ऑक्साइड व स्टीयरिक अम्ल ग़लती से छोड़ देता है।
  8. एक पॉलीएथिलीन फ़िल्म को वर्षों तक सूर्य-प्रकाश सहना है, पर फ़िल्म केवल 40 µm मोटी है। कौन-सा UV स्थायीकारी बेहतर विकल्प है, और क्यों?

    1. अकेला UV अवशोषक, क्योंकि पतली फ़िल्म योज्य के प्रति इकाई द्रव्यमान सर्वाधिक प्रकाश अवशोषित करती है
    2. HALS, जो मूलक पकड़ते और पुनर्जनित होते हैं, अतः फ़िल्म-मोटाई से स्वतंत्र कार्य करते हैं
    3. कैल्शियम स्टिअरेट, जो पराबैंगनी प्रकाश को ऊष्मा के रूप में अवशोषित करता है
    4. एक स्नेहक, जो सतह को चिकना बनाकर प्रकाश परावर्तित करता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — HALS, जो मूलक पकड़ते और पुनर्जनित होते हैं, अतः फ़िल्म-मोटाई से स्वतंत्र कार्य करते हैं

    UV अवशोषक को पर्याप्त विकिरण हटाने हेतु पथ-लंबाई (मोटाई) चाहिए, अतः 40 µm की फ़िल्म की उससे रक्षा कमज़ोर है। HALS पुनर्जननी चक्र में मूलक पकड़कर कार्य करते हैं और मोटाई पर निर्भर नहीं, इसीलिए ये फ़िल्मों व तंतुओं हेतु मानक चयन हैं। कैल्शियम स्टिअरेट व स्नेहक UV स्थायीकारी नहीं हैं।
  9. एक पॉलीएमाइड 250 °C पर गलित कंपाउंडिंग से बनता है और उसे उच्च भरण पर हैलोजन-मुक्त ज्वाला-रोधी भराव चाहिए। ऐल्युमिनियम हाइड्रॉक्साइड लगभग 200 °C पर और मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड लगभग 330 °C पर जल मुक्त करते हुए विघटित होना आरंभ करते हैं। कौन-सा चयन उचित है?

    1. ऐल्युमिनियम हाइड्रॉक्साइड, क्योंकि उसका उच्च जल-उत्पाद उसे गलित में अधिक प्रभावी बनाता है
    2. कोई भी, क्योंकि दोनों केवल ज्वाला में विघटित होते हैं, कंपाउंडिंग में कभी नहीं
    3. अकेला ऐंटिमनी ट्राइऑक्साइड, क्योंकि यह ऊष्माशोषी जल-मुक्तिकारी भराव है
    4. मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड, क्योंकि ऐल्युमिनियम हाइड्रॉक्साइड कंपाउंडिंग में अपना जल मुक्त करके गलित में झाग बनाएगा
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड, क्योंकि ऐल्युमिनियम हाइड्रॉक्साइड कंपाउंडिंग में अपना जल मुक्त करके गलित में झाग बनाएगा

    250 °C पर ऐल्युमिनियम हाइड्रॉक्साइड एक्स्ट्रूडर में ही निर्जलित हो जाएगा, जिससे उसकी अग्निरोधी क्रिया व्यर्थ और रिक्त बनेंगे। मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड लगभग 330 °C के आरंभ तक स्थिर है, अतः कंपाउंडिंग सह लेता है। उच्च जल-उत्पाद तब अप्रासंगिक है जब जल पहले ही निकल जाए, और ऐंटिमनी ट्राइऑक्साइड हैलोजनों का सहक्रियाकारी है, जल-मुक्तिकारी भराव नहीं।
  10. PVC व अन्य प्लास्टिकों के योज्यों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. DOP जैसा सुघट्यकारी PVC का काँच संक्रमण ताप व मॉड्यूलस घटाता है
    2. आंतरिक स्नेहक अल्प संगत होता है और डाई की धातु-सतह पर प्रवासित होता है
    3. बाह्य स्नेहक तप्त धातु-सतह पर प्रवासित होता है और PVC के संगलन में देरी करता है
    4. सुघट्यकारी तन्य मॉड्यूलस बढ़ाता और विच्छेद पर दीर्घन घटाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — DOP जैसा सुघट्यकारी PVC का काँच संक्रमण ताप व मॉड्यूलस घटाता है; C — बाह्य स्नेहक तप्त धातु-सतह पर प्रवासित होता है और PVC के संगलन में देरी करता है

    सुघट्यकारी Tg व मॉड्यूलस घटाता और दीर्घन बढ़ाता है, अतः पहला दावा सही है और अंतिम उसका उलटा। बाह्य स्नेहक अल्प संगत होते और धातु-सतहों पर प्रवासित होते हैं, संगलन में देरी व विमोचन में सहायता करते हैं, अतः वह दावा सही है। आंतरिक स्नेहक संगत वाला है, जो गलित श्यानता घटाता है; प्रवासन उसे देना दोनों वर्गों को उलझाना है।
  11. रबर में कार्बन ब्लैक के बारे में कौन-से कथन सही हैं?

    1. उच्च DBP तेल अवशोषण संख्या उच्च संरचना दर्शाती है
    2. बद्ध रबर वह रबर है जो ब्लैक-सतह पर थमा रहता और विलायक-निष्कर्षण का प्रतिरोध करता है
    3. संरचना बढ़ाने से अक्योर यौगिक की श्यानता घटती और डाई स्वेल बढ़ता है
    4. N-संख्या में बड़ा पहला अंक महीन कण व अधिक प्रबलन दर्शाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उच्च DBP तेल अवशोषण संख्या उच्च संरचना दर्शाती है; B — बद्ध रबर वह रबर है जो ब्लैक-सतह पर थमा रहता और विलायक-निष्कर्षण का प्रतिरोध करता है

    DBP संख्या एग्रीगेटों के रिक्त, अतः संरचना, मापती है, और बद्ध रबर परिभाषा से वह भाग है जो निष्कर्षित नहीं हो सकता। उच्च संरचना तीसरे दावे का उलटा करती है: श्यानता बढ़ाती और डाई स्वेल घटाती है। N-पद्धति में छोटा अंक महीन ब्लैक है, अतः अंतिम दावा उलटा है।
  12. बहुलक मिश्रण उपकरणों के बारे में कौन-से कथन सही हैं?

    1. परिक्षेपी मिश्रण को भराव-समूहों के संसंजन-सामर्थ्य से अधिक प्रतिबल चाहिए
    2. दो-रोल मिल अपने दो रोलों को भिन्न चालों पर चलाकर कार्य करती है, जिसका अनुपात घर्षण अनुपात कहलाता है
    3. आंतरिक मिश्रक सतत मशीन है जो रबर की स्थिर धारा निकालता है
    4. सह-घूर्णी द्वि-स्क्रू एक्स्ट्रूडर में वेंट नहीं हो सकता, अतः वह वाष्प-निष्कासन नहीं कर सकता
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — परिक्षेपी मिश्रण को भराव-समूहों के संसंजन-सामर्थ्य से अधिक प्रतिबल चाहिए; B — दो-रोल मिल अपने दो रोलों को भिन्न चालों पर चलाकर कार्य करती है, जिसका अनुपात घर्षण अनुपात कहलाता है

    समूह तोड़ने हेतु उच्च स्थानीय प्रतिबल चाहिए, और मिल निप में रबर को अपरूपित करती है क्योंकि रोल भिन्न चालों पर चलते हैं। आंतरिक मिश्रक कुछ मिनट के बंद बैच संसाधित करता है, स्थिर धारा नहीं। द्वि-स्क्रू एक्स्ट्रूडर वाष्प-निष्कासन हेतु नियमित रूप से वेंट किए जाते हैं, अतः अंतिम दावा असत्य है।
  13. एक रबर यौगिक का 140 °C पर इष्टतम क्योर समय t90 = 24 min है। Q10 नियम (तापमान में प्रत्येक 10 °C वृद्धि पर क्योर समय आधा) से 160 °C पर t90, मिनट में, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 6

    वृद्धि 20 °C है, जो 10 °C के दो चरण हैं, अतः t90 = 24/2² = 24/4 = 6 min। केवल एक बार आधा करना (12 min) प्रचलित भूल है।
  14. एक यौगिक का 150 °C पर इष्टतम क्योर समय t90 = 18 min है। क्योर दर की अरहीनियस प्रवृत्ति मानिए, t90 दर-स्थिरांक का व्युत्क्रमानुपाती, अतः t₂ = t₁ exp[(Ea/R)(1/T₂ − 1/T₁)], Ea = 90 kJ/mol, R = 8.314 J mol⁻¹ K⁻¹ व T = °C + 273.15 के साथ। 170 °C पर t90, मिनट में, दो दशमलव स्थान तक ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 5.67

    T₁ = 423.15 K व T₂ = 443.15 K। Ea/R = 90000/8.314 = 10825 K। 1/T₂ − 1/T₁ = −1.0666 × 10⁻⁴ K⁻¹, अतः घातांक −1.1546 और t₂ = 18 × e^−1.1546 = 18 × 0.3152 = 5.67 min। धनात्मक घातांक (उच्च ताप पर अधिक समय) संकेत-भूल है जिससे बचें।
  15. 160 °C पर एक क्योर वक्र से स्कॉर्च समय ts2 = 3.5 min और इष्टतम क्योर समय t90 = 12.5 min मिलता है। CRI = 100/(t90 − ts2) से, समय मिनट में, क्योर दर सूचकांक min⁻¹ में दो दशमलव स्थान तक ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 11.11

    t90 − ts2 = 12.5 − 3.5 = 9.0 min, अतः CRI = 100/9.0 = 11.11 min⁻¹। केवल t90 लेना (100/12.5 = 8) यह भूलना है कि प्रेरण-समय घटाना है।
  16. एक क्योरमापी रन में ML = 1.0 dN·m व MH = 19.0 dN·m हैं। 6.0 min पर बलाघूर्ण 10.5 dN·m है। क्योर की अवस्था α = (M − ML)/(MH − ML) लीजिए, नगण्य प्रेरण-समय सहित प्रथम-कोटि क्योर dα/dt = k(1 − α) मानिए (अतः t = 0 पर α = 0), और k, min⁻¹ में, तीन दशमलव स्थान तक ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 0.125

    α = (10.5 − 1.0)/(19.0 − 1.0) = 9.5/18 = 0.5278, अतः 1 − α = 0.4722। प्रथम कोटि हेतु ln(1 − α) = −kt, अतः k = −ln(0.4722)/6.0 = 0.7503/6.0 = 0.125 min⁻¹। α को 10.5/19 लेना (ML भूलना) भिन्न, ग़लत मान देता है।