वाष्प चक्र: कार्नो वाष्प चक्र, आदर्श रैंकिन चक्र तथा वाष्प-संपीडन प्रशीतन
2. आदर्श रैंकिन चक्र, अवस्था-दर-अवस्था
चार स्थायी-प्रवाह युक्तियाँ, सभी आदर्श: पंप व टर्बाइन समएन्ट्रॉपिक, बॉयलर व कंडेन्सर स्थिर दाब पर और दाब-पतन रहित। 1→2 पंप: कंडेन्सर दाब के संतृप्त द्रव को बॉयलर दाब तक। 2→3 बॉयलर: ऊष्मा तब तक जुड़ती है जब तक भाप संतृप्त या अतितप्त वाष्प बनकर न निकले। 3→4 टर्बाइन: कंडेन्सर दाब तक समएन्ट्रॉपिक प्रसार (s₄ = s₃)। 4→1 कंडेन्सर: संतृप्त द्रव बनने तक ऊष्मा-त्याग। T-s आरेख पर तापन रेखा 2→3 पहले द्रव वक्र के अनुदिश, फिर समतल क्वथन रेखा और फिर अतितापन पर चलती है।
प्रति kg स्थायी-प्रवाह ऊर्जा समीकरण (गतिज व स्थितिज ऊर्जा नगण्य) हर पद देता है:
- पंप: w_p = h₂ − h₁ = v₁(p₂ − p₁) (द्रव असंपीड्य, v₁ = कंडेन्सर दाब पर v_f)
- बॉयलर: q_in = h₃ − h₂
- टर्बाइन: w_t = h₃ − h₄
- कंडेन्सर: q_out = h₄ − h₁
- दक्षता: η = w_net/q_in = [(h₃ − h₄) − (h₂ − h₁)]/(h₃ − h₂) = 1 − q_out/q_in
- पश्च कार्य अनुपात = w_p/w_t (अत्यल्प, यहाँ लगभग 0.4 %); कार्य अनुपात = w_net/w_t = 1 − bwr
- विशिष्ट भाप खपत = 3600/w_net kg/kWh (w_net kJ/kg में)।
| अवस्था | h (kJ/kg) | कैसे |
|---|---|---|
| 1 (संतृप्त द्रव, 10 kPa) | 192 | दिया |
| 2 (पंप निकास) | 196.03 | w_p = 0.00101 × 3990 = 4.03; h₂ = 192 + 4.03 |
| 3 (टर्बाइन प्रवेश) | 3214 | दिया |
| 4 (टर्बाइन निकास, s₄ = s₃) | 2150 | दिया |
तब q_in = 3214 − 196.03 = 3017.97, w_t = 1064, w_net = 1064 − 4.03 = 1059.97 kJ/kg, अतः η = 1059.97/3017.97 = 35.1 %, bwr = 4.03/1064 = 0.38 %, और भाप खपत = 3600/1059.97 = 3.40 kg/kWh। दूसरी राह से जाँच: q_out = 2150 − 192 = 1958, और 1 − 1958/3017.97 = 35.1 %।
3. रैंकिन दक्षता क्या बढ़ाता है; पुनस्तापन व पुनर्योजी तापन की रूपरेखा
यह चक्र ऊष्मा-योग के माध्य ताप T_m,in और ऊष्मा-त्याग ताप T_L पर कार्नो चक्र जैसा व्यवहार करता है: लगभग η ≈ 1 − T_L/T_m,in। T_L बढ़ाए बिना T_m,in बढ़ाने वाला हर परिवर्तन लाभकारी है। नीचे हर परिवर्तन शेष चक्र को स्थिर मानकर है।
| परिवर्तन | दक्षता | टर्बाइन निकास शुष्कता x₄ | सीमा |
|---|---|---|---|
| कंडेन्सर दाब घटाना | बढ़ती है (T_L घटता है) | घटती है (अधिक आर्द्र) | शीतक जल ताप; वायु-रिसाव; ब्लेड अपरदन |
| बॉयलर दाब बढ़ाना (वही T₃) | बढ़ती है (T_m,in बढ़ता है) | घटती है (अधिक आर्द्र) | बॉयलर की मज़बूती व लागत; निकास पर नमी |
| अतितापन (वही दाब) | बढ़ती है | बढ़ती है (अधिक शुष्क) | T₃ पर धातुकर्मीय सीमा |
नमी की व्यावहारिक सीमा लगभग x₄ ≳ 0.88 से 0.90 है, क्योंकि जल-बूँदें अंतिम टर्बाइन ब्लेडों को घिसती हैं और टर्बाइन दक्षता घटाती हैं। इसीलिए उच्च बॉयलर दाब के साथ अतितापन या पुनस्तापन जोड़ा जाता है।
पुनस्तापन (रूपरेखा): भाप को उच्च-दाब टर्बाइन में मध्यवर्ती दाब तक फैलाएँ, बॉयलर में लौटाकर पुनः तप्त करें (प्रायः T₃ तक) और निम्न-दाब टर्बाइन में फैलाएँ। पुनस्तापन मुख्यतः निकास शुष्कता बढ़ाता है; दक्षता-लाभ छोटा रहता है जब तक पुनस्तापन दाब ठीक न चुना जाए।
पुनर्योजी तापन (रूपरेखा): टर्बाइन से कुछ भाप निकालकर (खुले या बंद फीडवाटर हीटर में) फीडवाटर गरम करें ताकि जल बॉयलर में अधिक गरम पहुँचे। ऊष्मा-योग का माध्य ताप बढ़ता है, अतः η बढ़ती है; प्रति kg बॉयलर भाप कार्य घटता है और कंडेन्सर तक कम भाप पहुँचती है।
4. सरल वाष्प-संपीडन प्रशीतन चक्र
उलटे रैंकिन का विचार: कार्य खर्चकर शीत स्थान (T_e) से परिवेश (T_c) को ऊष्मा पहुँचाना। चार अवस्थाएँ: 1 वाष्पित्र से p_e पर संतृप्त वाष्प निकलती है; 1→2 संघनित्र दाब p_c तक समएन्ट्रॉपिक संपीडन (अवस्था 2 अतितप्त); 2→3 संघनित्र: अतितापहरण, संघनन, p_c पर संतृप्त द्रव के रूप में निकास; 3→4 प्रसार वाल्व में अवमंदन, अनुत्क्रमणीय समएन्थैल्पिक प्रक्रम, h₄ = h₃, अंत में ठंडा आर्द्र मिश्रण; 4→1 वाष्पित्र, जहाँ शीत स्थान से ऊष्मा अवशोषित होती है। टर्बाइन के स्थान पर अवमंदक इसलिए है कि द्रव-प्रधान धारा पर छोटा टर्बाइन लगभग कोई कार्य नहीं लौटाता और महँगा पड़ता है।
प्रति kg प्रशीतक:
- प्रशीतन प्रभाव q_L = h₁ − h₄
- संपीडक कार्य w = h₂ − h₁
- त्यागी गई ऊष्मा q_H = h₂ − h₃ = q_L + w
- COP = q_L/w = (h₁ − h₄)/(h₂ − h₁), और कार्नो सीमा COP_C = T_e/(T_c − T_e) (परम ताप)
- द्रव्यमान प्रवाह ṁ = प्रशीतन क्षमता/q_L, संपीडक शक्ति = ṁw।
p-h आरेख पर चक्र टेढ़ा लूप है: संपीडन रेखा ऊपर झुकी, संघनित्र p_c पर क्षैतिज, अवमंदन ऊर्ध्वाधर रेखा (स्थिर h), वाष्पित्र p_e पर क्षैतिज। T-s पर अवमंदन दाईं ओर जाता बिंदुकित अनुत्क्रमणीय पथ है।
हल उदाहरण: क्षमता 10 kW, h₁ = 392, h₂ = 428, h₃ = h₄ = 245 kJ/kg। q_L = 147, w = 36, COP = 147/36 = 4.08, ṁ = 10/147 = 0.0680 kg/s, शक्ति = 0.0680 × 36 = 2.45 kW। त्यागी गई ऊष्मा = 0.0680 × (428 − 245) = 12.45 kW = 10 + 2.45। 270 K व 310 K के बीच कार्नो मशीन का COP_C = 270/40 = 6.75, और वास्तविक 4.08 उससे कम है।
5. वाष्पित्र व संघनित्र दाब, अतितापन तथा अधःशीतलन का प्रभाव
| परिवर्तन | प्रशीतन प्रभाव | संपीडक कार्य | COP |
|---|---|---|---|
| वाष्पित्र दाब घटाना | घटता है (h₄ वही, h₁ कम) | बढ़ता है (दाब अनुपात अधिक) | घटता है |
| संघनित्र दाब बढ़ाना | घटता है (h₃, h₄ बढ़ते हैं) | बढ़ता है | घटता है |
| द्रव को संतृप्ति से नीचे अधःशीतलित करना | बढ़ता है (h₄ = h₃ कम) | अपरिवर्तित | बढ़ता है |
| संपीडन से पूर्व वाष्प को अतितप्त करना | तभी बढ़ता है जब ऊष्मा शीत स्थान से आए | बढ़ता है | बढ़ या घट सकता है; प्रशीतक पर निर्भर |
अधःशीतलन स्पष्ट लाभ क्यों है: यह अवस्था 3 (और इसलिए 4) को p-h आरेख पर बाईं ओर खिसकाता है, संपीडक रेखा को छुए बिना प्रशीतन प्रभाव बढ़ाता है। T_e घटाना हानिकर क्यों: कार्नो COP T_e/(T_c − T_e) उठान T_c − T_e बढ़ने पर घटता है, और वास्तविक चक्र उसी का अनुसरण करता है। अतः डिज़ाइनर वाष्पित्र को जितना गरम और संघनित्र को जितना ठंडा, अनुप्रयोग व शीतक माध्यम अनुमति दें, रखता है।
हल उदाहरण, अधःशीतलन: 10 kW वाले उदाहरण में द्रव को इतना अधःशीतलित करें कि h₃ = h₄ = 235 kJ/kg हो, संपीडक कार्य वही 36 kJ/kg। तब q_L = 392 − 235 = 157 और COP = 157/36 = 4.36, 4.08 से ऊपर, बिना अतिरिक्त कार्य के 6.8 % लाभ।
6. अनादर्श टर्बाइन व पंप, तथा रैंकिन बनाम कार्नो
वास्तविक मशीनें अनुत्क्रमणीय हैं, अतः निकास अवस्था उच्च एन्ट्रॉपी पर होती है। समएन्ट्रॉपिक दक्षताओं η_t = (h₃ − h₄)/(h₃ − h₄s) और η_p = (h₂s − h₁)/(h₂ − h₁) से वास्तविक टर्बाइन कार्य η_t(h₃ − h₄s) और वास्तविक पंप कार्य v₁Δp/η_p है। कम दक्ष टर्बाइन निकास को अधिक गरम और शुष्क (h₄ > h₄s) छोड़ता है, जो एकमात्र स्थिति है जिसमें हानि भाप को बेहतर दिखाती है; फिर भी वह w_net व η घटाती है।
हल उदाहरण: ऊपर के 4 MPa, 10 kPa चक्र में h₄s = 2150, η_t = 0.85 और η_p = 0.80 लें। टर्बाइन कार्य = 0.85 × 1064 = 904.4 kJ/kg। पंप कार्य = 4.03/0.80 = 5.04, अतः h₂ = 197.04 और q_in = 3214 − 197.04 = 3016.96। तब w_net = 904.4 − 5.04 = 899.4 kJ/kg और η = 899.4/3016.96 = 29.8 %, जबकि आदर्श चक्र में 35.1 %।
इस चक्र के क्वथन व संघनन तापों के बीच कार्नो चक्र से तुलना करें। यदि भाप 523 K पर उबाली और 319 K पर संघनित की जाए, तो η_Carnot = 1 − 319/523 = 39.0 %, जो रैंकिन मान से अधिक है, क्योंकि रैंकिन चक्र में अधिकांश ऊष्मा शीर्ष ताप पर नहीं जुड़ती: द्रव लगभग 319 K से 523 K तक गरम होता है, जो T_m,in को नीचे खींचता है। पुनर्योजी तापन ठीक इसी निम्न-ताप तापन पर प्रहार करता है, इसीलिए पुनर्योजी चक्र कार्नो मान के निकट पहुँचता है।
मुख्य बिंदु
- कार्नो वाष्प चक्र में आर्द्र मिश्रण का संपीडक चाहिए और T_H क्रांतिक ताप पर रुक जाता है, अतः यह नहीं बनता; रैंकिन चक्र पूर्ण संघनन कर द्रव पंप करता है।
- आदर्श रैंकिन: w_p = v₁(p₂ − p₁), q_in = h₃ − h₂, w_t = h₃ − h₄, η = w_net/q_in; पश्च कार्य अनुपात अत्यल्प है और 3600/w_net kg/kWh में भाप खपत है।
- ऊष्मा-योग का माध्य ताप बढ़ने और कंडेन्सर ताप घटने पर दक्षता बढ़ती है; कंडेन्सर दाब घटाने व बॉयलर दाब बढ़ाने से निकास अधिक आर्द्र होता है, जबकि अतितापन व पुनस्तापन उसे अधिक शुष्क करते हैं।
- पुनर्योजी तापन (निकाली भाप से फीडवाटर गरम करना) माध्य ऊष्मा-योग ताप और दक्षता बढ़ाता है; पुनस्तापन मुख्यतः अंतिम ब्लेडों को नमी से बचाता है।
- वाष्प-संपीडन: q_L = h₁ − h₄, w = h₂ − h₁, COP = q_L/w, q_H = q_L + w, अवमंदक के आर-पार h₄ = h₃; COP सदा T_e/(T_c − T_e) से कम रहता है।
- अधःशीतलन बिना अतिरिक्त कार्य COP बढ़ाता है; वाष्पित्र दाब घटाने या संघनित्र दाब बढ़ाने से COP घटता है।
अभ्यास प्रश्न (17)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
भाप के साथ कार्नो चक्र के व्यावहारिक शक्ति चक्र के रूप में प्रयुक्त न होने का मुख्य कारण यह है कि
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उत्तर: B — संपीडन द्रव-वाष्प मिश्रण से आरंभ होता है जिसे कोई मशीन ठीक से नहीं सँभालती
अवस्था 1 गुंबद के भीतर है, अतः संपीडक को द्विप्रावस्था मिश्रण सँभालना पड़ता है, और अधिकतम ताप क्रांतिक ताप पर सीमित रहता है। दो दिए तापों के बीच कार्नो दक्षता अधिकतम संभव है, अतः कम दक्षता का दावा गलत है; आर्द्र क्षेत्र में समतापी ऊष्मा-योग आसान है (स्थिर p व T पर क्वथन)।आदर्श रैंकिन चक्र के चार प्रक्रम, कंडेन्सर निकास से आरंभ करते हुए क्रम में, हैं
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उत्तर: A — समएन्ट्रॉपिक पंपन, समदाबी तापन, समएन्ट्रॉपिक प्रसार, समदाबी ऊष्मा-त्याग
बॉयलर व कंडेन्सर स्थिर दाब के ऊष्मा-विनिमयक हैं, और पंप व टर्बाइन आदर्श अर्थात समएन्ट्रॉपिक हैं। अवमंदन प्रशीतन चक्र का है, और रैंकिन चक्र में क्वथन व संघनन खंडों को छोड़कर कोई प्रक्रम समतापी नहीं, जो समदाबी भी हैं।आदर्श रैंकिन चक्र में, अन्य बातें स्थिर रहने पर, कंडेन्सर दाब घटाने से
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उत्तर: C — दक्षता बढ़ती है और टर्बाइन निकास अधिक आर्द्र होता है
कम कंडेन्सर दाब का अर्थ कम ऊष्मा-त्याग ताप, अतः η बढ़ती है; समएन्ट्रॉपिक प्रसार तब कम दाब व कम x₄ पर समाप्त होता है, अतः निकास अधिक आर्द्र होता है। पंप कार्य छोटा होने से दक्षता T_L के प्रति अप्रभावित नहीं होती; टर्बाइन कार्य और q_out बहुत बदलते हैं।आदर्श रैंकिन चक्र में प्रति kg पंप कार्य का सर्वोत्तम आकलन है
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उत्तर: D — कंडेन्सर दाब के संतृप्त द्रव के v_f से v_f(p₂ − p₁)
पंप संतृप्त द्रव सँभालता है, जो व्यवहारतः असंपीड्य है, अतः समएन्ट्रॉपिक प्रक्रम में ∫v dp ≈ v_f(p₂ − p₁)। v_g लेने से पंप कार्य लगभग तीन कोटि अधिक आँका जाता, यही कारण है कि वाष्प संपीडक कहीं अधिक महँगा होता है।स्थिर बॉयलर व कंडेन्सर दाब पर रैंकिन चक्र में अतितापन जोड़ने से दक्षता मुख्यतः इसलिए बढ़ती है कि
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उत्तर: C — ऊष्मा संतृप्ति ताप से ऊपर जुड़ती है, जिससे ऊष्मा-योग का माध्य ताप बढ़ता है
अतिरिक्त ऊष्मा संतृप्ति ताप से ऊपर जुड़ती है, अतः T_m,in बढ़ता है जबकि कंडेन्सर दाब से तय T_L नहीं बदलता; इसलिए η बढ़ती है। शुष्क निकास T_L नहीं बदलता, और आदर्श टर्बाइन मान्यता से पहले ही 100 % समएन्ट्रॉपिक है।सरल वाष्प-संपीडन प्रशीतन चक्र में प्रसार वाल्व से अवमंदन प्रक्रम है
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उत्तर: B — समएन्थैल्पिक व अनुत्क्रमणीय, अतः h₄ = h₃ और एन्ट्रॉपी बढ़ती है
वाल्व कार्यरहित, नगण्य गतिज ऊर्जा परिवर्तन वाली रुद्धोष्म युक्ति है, अतः स्थायी-प्रवाह ऊर्जा समीकरण से h₄ = h₃; दाब-पतन क्षयकारी है, अतः एन्ट्रॉपी बढ़ती है। प्रशीतक का ताप गिरता है (वह ठंडे आर्द्र मिश्रण में फ्लैश होता है), अतः समतापी नहीं, और विशिष्ट आयतन बहुत बढ़ता है।एक वाष्प-संपीडन प्रशीतक में संपीडक में संतृप्त वाष्प प्रवेश करती और संघनित्र से संतृप्त द्रव निकलता है। यदि संघनित्र दाब बढ़ाया जाए (वाष्पित्र दाब वही), तो प्रशीतन प्रभाव और COP बदलते हैं
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उत्तर: B — प्रशीतन प्रभाव घटता है और COP घटता है
उच्च p_c से संतृप्त द्रव एन्थैल्पी h₃ = h₄ बढ़ती है, अतः h₁ − h₄ घटता है, और संपीडक कार्य h₂ − h₁ दाब अनुपात के साथ बढ़ता है; दोनों COP घटाते हैं। प्रशीतन प्रभाव अपरिवर्तित नहीं रह सकता क्योंकि h₄ खिसकती है।रैंकिन संयंत्र में उच्च-दाब व निम्न-दाब टर्बाइन के बीच भाप के पुनस्तापन का मुख्य उद्देश्य है
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उत्तर: C — निकास शुष्कता बढ़ाकर अंतिम ब्लेडों की नमी-क्षति सीमित करना
पुनस्तापन के बिना उच्च दाब से प्रसार आर्द्र क्षेत्र में गहरे जाकर समाप्त होता है। मध्यवर्ती दाब पर उच्च ताप तक पुनस्तापन से अंतिम प्रसार अधिक शुष्क अवस्था में पहुँचता है। कंडेन्सर दाब व पंप कार्य अप्रभावित हैं, और चक्र रैंकिन ही रहता है।समान वाष्पित्र व संघनित्र तापों के बीच काम करने वाले वाष्प-संपीडन प्रशीतक और उलटे कार्नो प्रशीतक में वाष्प-संपीडन का वास्तविक COP
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उत्तर: A — सदा कम होता है, अवमंदन व परिमित ताप-अंतरों के कारण
दो भंडारों के बीच कोई चक्र उलटे कार्नो COP T_e/(T_c − T_e) से अधिक नहीं हो सकता। अवमंदक शुद्ध हानि है (कार्य नहीं देता), और ऊष्मा का कुछ भाग T_c से ऊपर के तापपरास में त्यागा जाता है, अतः किसी भी प्रशीतक हेतु वास्तविक COP कार्नो मान से कम है।निम्नलिखित में से कौन-से भाप शक्ति संयंत्रों हेतु कार्नो वाष्प चक्र न अपनाने के वास्तविक कारण हैं?
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उत्तर: A — संपीडन द्रव-वाष्प मिश्रण से आरंभ करना पड़ेगा; B — समतापी ऊष्मा-योग अधिकतम ताप को क्रांतिक ताप से नीचे सीमित करता है; D — ऊष्मा-योग समतापी रखते हुए भाप का अतितापन संभव नहीं, अतः चक्र उच्च-ताप अतितापन क्षेत्र का उपयोग नहीं कर सकता
मिश्रण-संपीडन, क्रांतिक ताप की सीमा और समतापी अतितापन की समस्या, तीनों वास्तविक सीमाएँ हैं। समान दो तापों के बीच कुछ भी कार्नो दक्षता से अधिक नहीं हो सकता; चक्र ठीक वही मान प्राप्त करता है, अतः द्वितीय नियम का उल्लंघन नहीं है।पुनर्योजी रैंकिन चक्र में, जहाँ टर्बाइन से कुछ भाप निकालकर फीडवाटर गरम किया जाता है, समान बॉयलर व कंडेन्सर स्थितियों वाले सरल चक्र की तुलना में
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उत्तर: A — ऊष्मा-योग का माध्य ताप अधिक होता है; B — बॉयलर से निकली प्रति kg भाप में से कंडेन्सर तक पहुँचने वाला भाप प्रवाह कम होता है
निकाली गई भाप उस जल को गरम करती है जो अन्यथा बॉयलर में निम्न ताप पर गरम होता, अतः T_m,in बढ़ता है; और निकाला गया अंश कंडेन्सर तक नहीं फैलता, अतः वहाँ कम भाप पहुँचती है और प्रति kg बॉयलर भाप कंडेन्सर ऊष्मा घटती है। दक्षता सुधरने हेतु टर्बाइन प्रवेश ताप बदलना आवश्यक नहीं।सरल वाष्प-संपीडन चक्र हेतु (आधार स्थिति: वाष्पित्र से संतृप्त वाष्प व संघनित्र से संतृप्त द्रव निकलना) निम्नलिखित में से कौन-से सही हैं?
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उत्तर: A — द्रव का अधःशीतलन संपीडक कार्य बदले बिना प्रशीतन प्रभाव बढ़ाता है; B — संघनित्र दाब स्थिर रखकर वाष्पित्र दाब घटाने से COP घटता है; C — संघनित्र में त्यागी ऊष्मा प्रशीतन प्रभाव और संपीडक कार्य के योग के बराबर है
अधःशीतलन, वाष्पित्र दाब और ऊष्मा-संतुलन वाले कथन p-h आरेख और चक्र हेतु ऊर्जा संतुलन q_H = q_L + w से निकलते हैं। प्रसार वाल्व कार्यरहित अवमंदक है, क्योंकि h₄ = h₃ है और कुछ निकाला नहीं जाता।एक आदर्श रैंकिन चक्र के आँकड़े (सभी kJ/kg में): कंडेन्सर से निकलते संतृप्त द्रव की एन्थैल्पी h₁ = 192, टर्बाइन प्रवेश h₃ = 3214, टर्बाइन निकास (समएन्ट्रॉपिक प्रसार, दिया) h₄ = 2150। पंप दाब 10 kPa से 4 MPa करता है, v₁ = 0.00101 m³/kg, असंपीड्य द्रव। जोड़ी ऊष्मा धनात्मक है, तरल द्वारा किया कार्य धनात्मक है। ऊष्मीय दक्षता ____ % है (एक दशमलव स्थान)।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 35.1
w_p = v₁Δp = 0.00101 × (4000 − 10) = 4.03 kJ/kg, h₂ = 196.03। q_in = 3214 − 196.03 = 3017.97; w_t = 3214 − 2150 = 1064; w_net = 1059.97। η = 1059.97/3017.97 = 0.3512 = 35.1 %। जाँच: 1 − (2150 − 192)/3017.97 = 35.1 %। पंप को नगण्य मानने पर 1064/3022 = 35.2 % आता है, जो थोड़ा भिन्न है।उसी आदर्श रैंकिन चक्र (h₁ = 192, h₃ = 3214, h₄ = 2150 kJ/kg; v₁ = 0.00101 m³/kg; पंप 10 kPa से 4 MPa) हेतु संयंत्र को 100 MW नेट शक्ति देनी है। आवश्यक भाप द्रव्यमान प्रवाह ____ kg/s है (एक दशमलव स्थान)।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 94.3
w_net = (3214 − 2150) − 0.00101 × 3990 = 1064 − 4.03 = 1059.97 kJ/kg। ṁ = 100 000 kW/1059.97 = 94.34 kg/s। केवल w_t लेने पर 94.0 आता है, जो पंप-नगण्य त्रुटि है।एक प्रशीतक सरल वाष्प-संपीडन चक्र पर 10 kW प्रशीतन क्षमता से चलता है। प्रशीतक एन्थैल्पियाँ (kJ/kg): वाष्पित्र निकास (संतृप्त वाष्प) h₁ = 392, संपीडक निकास h₂ = 428, संघनित्र निकास (संतृप्त द्रव) h₃ = 245। प्रसार समएन्थैल्पिक है। संपीडक शक्ति निवेश ____ kW है (दो दशमलव स्थान)।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 2.45
h₄ = h₃ = 245, अतः q_L = 392 − 245 = 147 kJ/kg और ṁ = 10/147 = 0.06803 kg/s। w = 428 − 392 = 36 kJ/kg, अतः P = 0.06803 × 36 = 2.449 = 2.45 kW (COP = 4.08)। h₂ − h₃ को कार्य मानने पर 12.45 आता, जो ऊष्मा-त्याग की त्रुटि है।ऊपर वाले प्रशीतक में (h₁ = 392 व h₂ = 428 kJ/kg, संपीडक कार्य अपरिवर्तित), संघनित्र से निकलता द्रव अधःशीतलित है, जिससे उसकी एन्थैल्पी, और अतः प्रसार वाल्व के बाद की एन्थैल्पी, 235 kJ/kg हो जाती है। COP अब ____ है (दो दशमलव स्थान)।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 4.36
q_L = h₁ − h₄ = 392 − 235 = 157 kJ/kg; w = 428 − 392 = 36 kJ/kg। COP = 157/36 = 4.361 = 4.36, अधःशीतलन से पूर्व के 4.08 की तुलना में।एक आदर्श उलटा कार्नो प्रशीतक 270 K के शीत स्थान से ऊष्मा लेकर 310 K के परिवेश में त्यागता है। इसका निष्पादन गुणांक ____ है (दो दशमलव स्थान)।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 6.75
COP = T_e/(T_c − T_e) = 270/(310 − 270) = 270/40 = 6.75। T_c/(T_c − T_e) = 7.75 लेना ऊष्मा-पंप का COP है, जो सामान्य भूल है।