भूभौतिकीय सिग्नल प्रसंस्करण: प्रतिचयन, फ़ूरियर व हिल्बर्ट रूपांतरण, सहसंबंध व संवलन, डिजिटल फ़िल्टर तथा समय-आवृत्ति विश्लेषण

भूविज्ञान एवं भूभौतिकी (GG) पेपर के भाग B2 के सिग्नल-प्रसंस्करण विषय का यह अध्याय शीर्षक “Geophysical Signal Processing” का उत्तर देता है: “प्रतिचयन प्रमेय, नाइक्विस्ट आवृत्ति, एलियासिंग, फ़ूरियर श्रेणी, आवर्ती तरंगरूप, फ़ूरियर व हिल्बर्ट रूपांतरण, Z-रूपांतरण व वेवलेट रूपांतरण; पावर स्पेक्ट्रम, डेल्टा फ़ंक्शन, स्व-सहसंबंध, परस्पर सहसंबंध, संवलन, प्रतिसंवलन, डिजिटल फ़िल्टरों के सिद्धांत, विंडो, ध्रुव व शून्यक, समय-आवृत्ति विश्लेषण के मूल तत्त्व।” इसमें प्रतिचयन व एलियासिंग, फ़ूरियर श्रेणी व फ़ूरियर रूपांतरण, DFT, पावर स्पेक्ट्रम व विंडो, डेल्टा फ़ंक्शन सहित संवलन, सहसंबंध व प्रतिसंवलन, Z-रूपांतरण सहित ध्रुव, शून्यक व डिजिटल फ़िल्टर, हिल्बर्ट रूपांतरण, तथा वेवलेट रूपांतरण सहित समय-आवृत्ति विश्लेषण पढ़ाए गए हैं। संख्यात्मक प्रश्न हैं: नाइक्विस्ट व एलियास आवृत्ति, चार-बिंदु DFT, असतत संवलन, एक-ध्रुव फ़िल्टर का लब्धि, स्थायित्व-परीक्षण तथा आवृत्ति विभेदन 1/T।

1. प्रतिचयन प्रमेय, नाइक्विस्ट आवृत्ति व एलियासिंग

भूकंपीय ट्रेस, मैग्नेटोमीटर अभिलेख या वेधन-लॉग स्वभाव से सतत होता है, पर अंतराल Δt पर लिए गए नमूनों (samples) के रूप में संचित होता है। प्रतिचयन प्रमेय कहता है कि जिस सिग्नल में f_max से ऊपर कोई आवृत्ति नहीं है, उसे उसके नमूनों से पूर्णतः पुनर्प्राप्त किया जा सकता है यदि प्रतिचयन आवृत्ति fs = 1/Δt, 2 f_max से अधिक हो। सीमा fN = fs/2 = 1/(2Δt) नाइक्विस्ट आवृत्ति है, यानी वह सर्वोच्च आवृत्ति जिसे नमूने निरूपित कर सकते हैं। 2 ms के भूकंपीय अभिलेख में fs = 500 Hz व fN = 250 Hz है; 4 ms के अभिलेख में fN = 125 Hz।

fN से ऊपर की ऊर्जा नष्ट नहीं होती: वह एलियासिंग (aliasing) से मुड़कर बैंड 0 से fN में झूठी निम्न आवृत्ति के रूप में आ जाती है। आवृत्ति f की ज्या-तरंग को fs पर प्रतिचयित करने पर वह f_a = |f − k·fs| पर दिखती है, जहाँ पूर्णांक k इस प्रकार चुना जाता है कि f_a, 0 व fs/2 के बीच रहे। हल उदाहरण: 100 Hz पर प्रतिचयित 130 Hz सिग्नल (Δt = 10 ms, fN = 50 Hz) में k = 1 है, अतः f_a = 30 Hz; इसी दर पर 70 Hz का स्वर भी 30 Hz पर दिखता है। 130 Hz व 30 Hz ज्या-तरंगों के नमूने एक-से होते हैं, इसलिए आँकड़ों में कुछ भी इन दोनों को अलग नहीं करता।

⚠️ एलियासिंग को बाद में हटाया नहीं जा सकता
प्रतिचयन के बाद एलियास किसी वास्तविक निम्न-आवृत्ति सिग्नल से अभेद्य हो जाता है। उपचार डिजिटाइज़र से पहले होता है: एनालॉग एंटी-एलियास फ़िल्टर जो fN से ऊपर की ऊर्जा हटाता है। ठीक 2 f_max पर प्रतिचयन केवल सैद्धांतिक सीमा है; वास्तविक फ़िल्टर धीरे-धीरे घटते हैं, इसलिए व्यावहारिक दरें ऊँची रखी जाती हैं। यही नियम दिक् में भी लागू है: Δx अंतराल पर लगे ग्राही केवल 1/(2Δx) तक के तरंग-संख्या निरूपित करते हैं, और छोटी आभासी तरंगदैर्ध्य वाली तीव्र नति की घटनाएँ दिक्गत रूप से एलियास हो जाती हैं।

2. फ़ूरियर श्रेणी, आवर्ती तरंगरूप व फ़ूरियर रूपांतरण

आवर्तकाल T वाला आवर्ती तरंगरूप (मूल आवृत्ति f₀ = 1/T, ω₀ = 2π/T) संनादियों (harmonics) का योग है: f(t) = a₀/2 + Σ [aₙ cos nω₀t + bₙ sin nω₀t], जहाँ एक आवर्त पर aₙ = (2/T)∫f cos nω₀t dt व bₙ = (2/T)∫f sin nω₀t dt हैं; सम्मिश्र रूप f(t) = Σ cₙ einω₀t है। सममिति से श्रम बचता है: सम तरंगरूप में केवल कोज्याएँ, विषम में केवल ज्याएँ, और अर्ध-तरंग सममिति f(t + T/2) = −f(t) में केवल विषम संनादी रहते हैं। t = 0 के सापेक्ष विषम, ऊँचाई ±A वाली वर्ग-तरंग में विषम n हेतु bₙ = 4A/(nπ) और अन्यथा शून्य होता है, अतः उसके संनादी मूल के 1, 1/3, 1/5 … गुना घटते हैं। आवर्ती सिग्नल का f₀ के गुणजों पर रेखा-स्पेक्ट्रम होता है, और पार्सेवल संबंध से उसकी माध्य शक्ति Σ|cₙ|² है।

वर्ग-तरंग का उछाल गिब्स परिघटना भी दिखाता है: कितने भी पद रखें, आंशिक योग उछाल के लगभग 9% से आगे निकल जाते हैं, और उछाल पर वे मध्य-मान पर अभिसरित होते हैं। अनावर्ती सिग्नल हेतु T → ∞ लें: रेखाएँ मिलकर सतत हो जाती हैं, F(ω) = ∫ f(t) e−iωt dt व f(t) = (1/2π) ∫ F(ω) eiωt dω। वास्तविक f(t) हेतु |F|, ω में सम और कला विषम होती है।

जानने योग्य फ़ूरियर युग्म व गुण
समय प्रक्षेत्रआवृत्ति प्रक्षेत्र
डेल्टा फ़ंक्शन δ(t)अचर: प्रत्येक आवृत्ति समान मात्रा में उपस्थित
अचर (DC स्तर)शून्य आवृत्ति पर एक स्पाइक
cos ω₀t+ω₀ व −ω₀ पर दो स्पाइक
अवधि T का बॉक्सकारsinc आकार, पहला शून्य 1/T पर
गाउसीय स्पंदगाउसीय; समय में संकरा यानी आवृत्ति में चौड़ा
t₀ से विलंबe−iωt₀ से गुणन: वही आयाम, रैखिक कला
अवकलज d/dtiω से गुणन: उच्च आवृत्तियाँ बढ़ती हैं
दो सिग्नलों का संवलनउनके रूपांतरणों का गुणनफल

स्केलिंग का परिणाम: सिग्नल को समय में 2 गुना संपीडित करने पर उसका स्पेक्ट्रम 2 गुना चौड़ा और शिखर आधा हो जाता है। rms अवधि व rms बैंडविड्थ Δt·Δω ≥ 1/2 मानते हैं, समानता गाउसीय में होती है। अतः छोटे तीक्ष्ण स्पंद को अनेक आवृत्तियाँ चाहिए, और तीक्ष्ण किनारों को ऊँची आवृत्तियाँ।

3. DFT, पावर स्पेक्ट्रम, विंडो व आवृत्ति विभेदन

N नमूनों x[n] हेतु असतत फ़ूरियर रूपांतरण X[k] = Σ x[n] e−i2πkn/N है, n व k 0 से N − 1 तक। बिन k आवृत्ति k·fs/N के संगत है, और वास्तविक श्रेणी हेतु N/2 से ऊपर के बिन ऋणात्मक आवृत्तियों का दर्पण-प्रतिबिंब हैं। बिनों का अंतराल Δf = fs/N = 1/T केवल अभिलेख-लंबाई T = NΔt पर निर्भर है: Δf से भिन्न दो स्वरों को अलग करने हेतु अभिलेख कम से कम लगभग 1/Δf चलना चाहिए। FFT, DFT को N² के बदले लगभग N log₂N संक्रियाओं में निकालता है। x = [1, 2, 3, 4], N = 4 का हल उदाहरण, e−i2π/4 = −i के साथ: X[0] = 10, X[1] = 1 − 2i − 3 + 4i = −2 + 2i, X[2] = 1 − 2 + 3 − 4 = −2, X[3] = −2 − 2i; अतः |X[1]|² = 8।

पावर स्पेक्ट्रम (पीरियडोग्राम) |X|²/T है: वह प्रत्येक आवृत्ति पर ऊर्जा की मात्रा रखता है और कला छोड़ देता है। पार्सेवल प्रमेय समय व आवृत्ति में कुल ऊर्जा बराबर रखता है, Σ|x|² = (1/N) Σ|X|², और वीनर–खिंचिन प्रमेय के अनुसार पावर स्पेक्ट्रम स्व-सहसंबंध का फ़ूरियर रूपांतरण है। सीमित अभिलेख सिग्नल को विंडो (window) से गुणा करने के तुल्य है, अतः स्पेक्ट्रम वास्तविक स्पेक्ट्रम का विंडो के अपने रूपांतरण से संवलन है: उसका मुख्य लोब विभेदन तय करता है और पार्श्व लोब प्रबल शिखर को दुर्बल पड़ोसियों पर रिसाते हैं।

लंबाई T के अभिलेख हेतु प्रचलित विंडो
विंडोमुख्य लोब चौड़ाई, शून्य से शून्यउच्चतम पार्श्व लोब (लगभग)
आयताकार (बिना टेपर)2/T−13 dB
त्रिकोणीय (बार्टलेट)4/T−26 dB
हान4/T−31 dB
हैमिंग4/T−43 dB
ब्लैकमैन6/T−58 dB
⚠️ ज़ीरो-पैडिंग अंतर्वेशन करती है, विभेदन नहीं
FFT से पहले 2 s के अभिलेख में शून्य जोड़ने से बिन-अंतराल सूक्ष्म हो जाता है और आलेखित स्पेक्ट्रम चिकना दिखता है, पर वास्तविक विभेदन अब भी लगभग 1/2 s = 0.5 Hz ही रहता है क्योंकि कोई नई जानकारी नहीं जुड़ी। टेपर विभेदन के बदले रिसाव घटाता है: अधिक चिकनी विंडो के पार्श्व लोब कम और मुख्य लोब चौड़ा होता है, तथा आयताकार विंडो सबसे तीक्ष्ण पर सबसे अधिक रिसाने वाली है।

4. डेल्टा फ़ंक्शन, संवलन, सहसंबंध व प्रतिसंवलन

डेल्टा फ़ंक्शन δ(t) t = 0 के अतिरिक्त शून्य है, इकाई क्षेत्रफल रखता है और छाँटता है: ∫ f(t) δ(t − t₀) dt = f(t₀)। δ(t − t₀) से संवलन सिग्नल को केवल t₀ विलंबित करता है। इकाई आवेग पर किसी निकाय का निर्गत उसकी आवेग प्रतिक्रिया h है। किसी भी निवेश पर निर्गत संवलन (convolution) y[n] = Σ h[k] x[n − k] है, जिसमें N व M नमूनों के निवेशों हेतु N + M − 1 नमूने होते हैं, और आवृत्ति प्रक्षेत्र में Y = H·X। भूकंपीय संवलन-मॉडल है: ट्रेस = वेवलेट * परावर्तकता + रव। हल उदाहरण (पलटें, सरकाएँ, गुणा करें, जोड़ें): [1, 2, 3] * [1, −1, 2] = [1, 1, 3, 1, 6]; जाँच: निर्गत का योग 12 = 6 × 2 है, जो निवेशों के योगों का गुणनफल है।

सहसंबंध (correlation) बिना पलटे सरकता है। स्व-सहसंबंध r[τ] = Σ x[n] x[n + τ] शून्य विलंब के सापेक्ष सममित होता है और वहीं ऊर्जा Σx² पर शिखर बनाता है; श्वेत (यादृच्छिक) श्रेणी का स्पाइक होता है, अनुनादी श्रेणी का दोलित स्व-सहसंबंध। दो अभिलेखों का परस्पर सहसंबंध उस विलंब पर शिखर बनाता है जिससे एक दूसरे के सापेक्ष विलंबित है: x = [1, 2, 1, 0, 0] व y = [0, 0, 1, 2, 1] हेतु शिखर विलंब +2 पर है। आवृत्ति-रूप में परस्पर सहसंबंध X*·Y है (संयुग्मी, अतः कलाएँ घटती हैं) और संवलन X·Y। Vibroseis अभिलेख को स्वीप से सहसंबद्ध करने पर वह शून्य-कला वेवलेट में संपीडित हो जाता है।

प्रतिसंवलन (deconvolution) संवलन को पलटता है। स्पेक्ट्रमों को भाग देने, R = D/W, पर वहाँ अनंत आता है जहाँ वेवलेट स्पेक्ट्रम शून्य के निकट हो, इसलिए एक छोटा स्थायीकारक जोड़ा जाता है: R ≈ D·W*/(|W|² + ε)। समय प्रक्षेत्र में वीनर (न्यूनतम-वर्ग) फ़िल्टर वेवलेट को यथासंभव स्पाइक के निकट लाता है (स्पाइकिंग प्रतिसंवलन) और केवल स्व-सहसंबंध माँगता है, श्वेत परावर्तकता व न्यूनतम-कला वेवलेट मानकर। पूर्वानुमान-विलंब सहित पूर्वानुमानी प्रतिसंवलन आवर्ती अनुरणन व लघु-आवर्त बहुपरावर्तनों को हटाता है। द्वि-पद वेवलेट (1, −a) का प्रतिलोम 1 + a z⁻¹ + a² z⁻² + … है, जो केवल |a| < 1 पर अभिसरित होता है।

🧠 संवलन पलटता है, सहसंबंध नहीं
x का y से सहसंबंध, समय-उत्क्रमित x के y से संवलन के बराबर है। यही तथ्य बताता है कि स्व-सहसंबंध सममित क्यों है (कला खो जाती है, केवल |X|² बचता है), परस्पर सहसंबंध विलंब क्यों रखता है, और प्रतिसंवलन वहाँ रव को क्यों बढ़ाता है जहाँ सिग्नल-स्पेक्ट्रम दुर्बल हो।

5. Z-रूपांतरण, ध्रुव व शून्यक, तथा डिजिटल फ़िल्टर

किसी अनुक्रम का Z-रूपांतरण X(z) = Σ x[n] z⁻ⁿ है, अतः z⁻¹ एक-नमूना विलंब है। इकाई वृत्त पर, z = eiω जहाँ ω = 2πf/fs (नाइक्विस्ट पर ω = π), यह फ़ूरियर रूपांतरण में बदल जाता है। जिस फ़िल्टर में y[n] = Σ bₖ x[n − k] − Σ aₖ y[n − k] हो उसका अंतरण फ़ंक्शन H(z) = B(z)/A(z) है और Y = H·X। शून्यक (zeros) B के मूल हैं (H = 0) और ध्रुव (poles) A के मूल (H → ∞)। आवृत्ति ω पर लब्धि, eiω से शून्यकों की दूरियों के गुणनफल को ध्रुवों की दूरियों के गुणनफल से भाग देने पर मिलती है: इकाई वृत्त पर स्थित शून्यक उस आवृत्ति को मिटा देता है, और वृत्त के निकट ध्रुव तीक्ष्ण शिखर बनाता है।

स्थायित्व। कारणात्मक फ़िल्टर तभी स्थायी है जब उसका प्रत्येक ध्रुव इकाई वृत्त के भीतर, |z| < 1, हो; वृत्त पर ध्रुव ऐसी प्रतिक्रिया देता है जो घटती नहीं (संचायक y[n] = y[n − 1] + x[n]), और वृत्त के बाहर का ध्रुव बढ़ती प्रतिक्रिया। FIR फ़िल्टर के ध्रुव केवल z = 0 पर होते हैं और वह सदा स्थायी है, तथा सममित FIR रैखिक कला रखता है। IIR फ़िल्टर पुनर्भरण (feedback) प्रयोग करता है, तीक्ष्ण प्रतिक्रिया सस्ते में देता है, और अस्थायी हो सकता है। वृत्त के भीतर के शून्यक (न्यूनतम कला) ऊर्जा को आरंभ में केंद्रित करते हैं और स्थायी प्रतिलोम देते हैं, पर स्थायित्व वे तय नहीं करते।

हल उदाहरण। (i) y[n] = x[n] + x[n − 1] में H = 1 + z⁻¹, शून्यक z = −1 पर, और |H| = 2|cos(ω/2)| है: DC पर लब्धि 2, ω = π/2 पर √2 तथा नाइक्विस्ट पर 0, अतः यह निम्न-पारक फ़िल्टर है। (ii) y[n] = 0.5 y[n − 1] + x[n] में H = 1/(1 − 0.5 z⁻¹), एक ध्रुव z = 0.5 पर (स्थायी), और |H| = 1/|1 − 0.5 e−iω| है: DC पर लब्धि 2, ω = π/2 पर 1/√1.25 = 0.894 तथा नाइक्विस्ट पर 0.667। फ़िल्टर को आगे और फिर पीछे चलाने पर शून्य कला व वर्गित आयाम-प्रतिक्रिया मिलती है।

⚠️ स्थायित्व ध्रुवों का प्रश्न है, शून्यकों का नहीं
z = −0.9 का ध्रुव स्थायी है (वह वृत्त के भीतर है, और ऋण चिह्न केवल प्रतिक्रिया को एकांतरित करता है), जबकि z = 1.05 का ध्रुव स्थायी नहीं है। शून्यक कहीं भी हों, वृत्त के बाहर भी, कारणात्मक फ़िल्टर को कभी अस्थायी नहीं बनाते; वे केवल कला-व्यवहार और प्रतिलोम फ़िल्टर के स्थायित्व को बदलते हैं।

6. हिल्बर्ट रूपांतरण व विश्लेषिक सिग्नल

हिल्बर्ट रूपांतरण H{x}(t) = (1/π) P∫ x(τ)/(t − τ) dτ है, यानी x का 1/(πt) से संवलन। आवृत्ति प्रक्षेत्र में यह स्पेक्ट्रम को −i·sgn(ω) से गुणा करता है: प्रत्येक धनात्मक आवृत्ति −90° और प्रत्येक ऋणात्मक आवृत्ति +90° खिसकती है, आयाम अपरिवर्तित रहता है। अतः H{cos ω₀t} = sin ω₀t, H{sin ω₀t} = −cos ω₀t, और इसे दो बार लगाने पर −x मिलता है। कारणात्मक सिग्नल के स्पेक्ट्रम के वास्तविक व काल्पनिक भाग हिल्बर्ट-युग्म होते हैं (क्रेमर्स–क्रोनिग संबंध)।

विश्लेषिक सिग्नल (analytic signal) z(t) = x(t) + i·H{x}(t) में ऋणात्मक आवृत्ति-घटक नहीं होते। उसका मापांक आवरण A(t) = √(x² + H²) है (भूकंपिकी में परावर्तन-सामर्थ्य), उसका कोण तात्क्षणिक कला φ(t) = tan⁻¹(H/x), और (1/2π) dφ/dt तात्क्षणिक आवृत्ति। हल उदाहरण: x = 3 cos ω₀t + 4 sin ω₀t का H{x} = 3 sin ω₀t − 4 cos ω₀t है, अतः A² = 9 + 16 = 25 और A = 5 सभी समय पर: सिग्नल 5 cos(ω₀t − φ₀) है जहाँ tan φ₀ = 4/3।

7. वेवलेट रूपांतरण व समय-आवृत्ति विश्लेषण के मूल तत्त्व

फ़ूरियर रूपांतरण बताता है कि कौन-सी आवृत्तियाँ हैं, कब, यह नहीं, और वह सिग्नल को स्थिर (stationary) मानता है। भूकंपीय ट्रेस ऐसा नहीं है: क्षीणन परवर्ती आगमनों की उच्च आवृत्तियाँ घटा देता है। अल्प-काल फ़ूरियर रूपांतरण (STFT) ट्रेस पर विंडो w(t − τ) सरकाता है और प्रत्येक खंड का रूपांतरण लेता है; उसका वर्गित मापांक स्पेक्ट्रोग्राम है। एक विंडो-लंबाई दोनों विभेदन तय करती है, समय का लगभग T_w और आवृत्ति का लगभग 1/T_w, और गैबर–हाइज़ेनबर्ग सीमा Δt·Δf ≥ 1/(4π) दोनों के छोटे होने को वर्जित करती है। चर्प, जैसे Vibroseis स्वीप, स्पेक्ट्रोग्राम में एक कटक दिखाता है जबकि उसका साधारण स्पेक्ट्रम अपने बैंड में लगभग समतल होता है।

सतत वेवलेट रूपांतरण W(a, b) = (1/√a) ∫ x(t) ψ*((t − b)/a) dt है, जहाँ मातृ वेवलेट ψ का माध्य शून्य होता है और मापांक a उसे खींचता है (निम्न आवृत्ति, f ≈ f_c/a) या संपीडित करता है (उच्च आवृत्ति)। विंडो उच्च आवृत्ति पर छोटी और निम्न आवृत्ति पर लंबी होती हैं, अतः आपेक्षिक बैंडविड्थ Δf/f अचर रहती है: तीक्ष्ण क्षणिक घटनाओं हेतु अच्छा समय-विभेदन और धीमी प्रवृत्तियों हेतु अच्छा आवृत्ति-विभेदन। प्रचलित चयन हैं मॉरलेट (गाउसीय गुणा सम्मिश्र ज्या-तरंग), रिकर या मेक्सिकन हैट (गाउसीय का द्वितीय अवकलज, वास्तविक व शून्य-कला, शिखर आवृत्ति f_p वाली मानक मॉडल भूकंपीय वेवलेट) तथा हार (सरलतम लांबिक वेवलेट)।

असतत वेवलेट रूपांतरण द्विआधारी मापांक 2ʲ और फ़िल्टर-बैंक प्रयोग करता है जो सिग्नल को निम्न-पारक (सन्निकटन) व उच्च-पारक (विवरण) अर्धों में बाँटता है, प्रत्येक को 2 से अवप्रतिचयित करके, अतः N नमूनों से N गुणांक मिलते हैं। छोटे विवरण-गुणांकों की देहली लगाने से रव घटता है और आँकड़े संपीडित होते हैं। अन्वेषण में वेवलेट व स्पेक्ट्रमी-अपघटन विधियाँ पतली परतों की समस्वरण आवृत्तियाँ व आवृत्ति-निर्भर क्षीणन मानचित्रित करती हैं।

🎯 वेवलेट भूकंपीय आँकड़ों हेतु उपयुक्त क्यों हैं
गहराई की परावर्तित तरंगें निम्न-आवृत्ति व लंबी होती हैं, उथली तीक्ष्ण। निश्चित STFT विंडो दोनों हेतु समझौता है, जबकि वेवलेट की अचर-Q टाइलिंग प्रत्येक का विश्लेषण उसकी अपनी आवृत्ति से मेल खाती विंडो में करती है।

मुख्य बिंदु

  • Δt पर प्रतिचयन से नाइक्विस्ट आवृत्ति fN = 1/(2Δt) मिलती है; उससे ऊपर की आवृत्ति f बैंड 0 से fN में |f − k·fs| पर एलियास हो जाती है और बाद में पहचानी नहीं जा सकती, अतः डिजिटाइज़ करने से पहले एंटी-एलियास फ़िल्टर आवश्यक है।
  • आवर्ती तरंगरूप रेखा-स्पेक्ट्रम वाले संनादियों का योग है (विषम वर्ग-तरंग: विषम n हेतु bₙ = 4A/nπ; गिब्स अतिरेक लगभग 9%); फ़ूरियर रूपांतरण इसे अनावर्ती सिग्नलों तक बढ़ाता है, और समय में संकरा सिग्नल आवृत्ति में चौड़ा होता है।
  • DFT का बिन-अंतराल व विभेदन 1/T है; ज़ीरो-पैडिंग केवल अंतर्वेशन करती है। विंडो मुख्य लोब चौड़ाई व पार्श्व लोब स्तर में विनिमय करती हैं (आयताकार 2/T व −13 dB, हान 4/T व −31 dB, ब्लैकमैन 6/T व −58 dB), और पावर स्पेक्ट्रम स्व-सहसंबंध का रूपांतरण है।
  • संवलन (N + M − 1 नमूने, Y = H·X) वेवलेट व परावर्तकता से ट्रेस बनाता है; सहसंबंध पलटता नहीं, अतः स्व-सहसंबंध सममित है और परस्पर सहसंबंध विलंब पर शिखर देता है; प्रतिसंवलन को स्थायीकारक चाहिए क्योंकि वह दुर्बल स्पेक्ट्रम वाले स्थानों पर रव बढ़ाता है।
  • H(z) = B/A में शून्यक B के मूल व ध्रुव A के मूल हैं; लब्धि शून्यकों की दूरियों के गुणनफल को ध्रुवों की दूरियों के गुणनफल से भाग देने पर मिलती है। कारणात्मक फ़िल्टर तभी स्थायी है जब सभी ध्रुव इकाई वृत्त के भीतर हों, और FIR फ़िल्टर सदा स्थायी हैं।
  • हिल्बर्ट रूपांतरण कला को 90° खिसकाकर विश्लेषिक सिग्नल बनाता है जिसका मापांक आवरण है; STFT में एक निश्चित विभेदन-टाइल होती है, जबकि वेवलेट रूपांतरण में अचर-Q टाइलें होती हैं जो उच्च आवृत्ति पर छोटी और निम्न आवृत्ति पर लंबी हैं।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. एक भूकंपीय अभिलेखक किसी सिग्नल को प्रत्येक 4 ms पर प्रतिचयित करता है। अभिलेखित आँकड़ों की नाइक्विस्ट आवृत्ति क्या है?

    1. 62.5 Hz
    2. 125 Hz
    3. 250 Hz
    4. 500 Hz
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — 125 Hz

    प्रतिचयन आवृत्ति fs = 1/Δt = 1/0.004 s = 250 Hz है, और नाइक्विस्ट आवृत्ति उसकी आधी, fs/2 = 125 Hz, है। 250 Hz भ्रामक उत्तर इसलिए है कि वह स्वयं प्रतिचयन आवृत्ति है, वह सर्वोच्च आवृत्ति नहीं जिसे नमूने निरूपित कर सकें।
  2. एंटी-एलियास फ़िल्टर को अंकीयकारी (digitiser) तक पहुँचने से पहले एनालॉग सिग्नल पर क्यों कार्य करना चाहिए, बाद में अंकीय नमूनों पर क्यों नहीं?

    1. क्योंकि फ़िल्टर अंकीयकारी की नाइक्विस्ट आवृत्ति बढ़ा देता है, जिससे सिग्नल का अधिक चौड़ा बैंड बिना त्रुटि निरूपित हो सकता है
    2. क्योंकि अंकीय फ़िल्टरों के ध्रुव नाइक्विस्ट आवृत्ति के निकट नहीं होते और इसलिए वे उससे ऊपर की किसी भी आवृत्ति की ऊर्जा को क्षीण नहीं कर सकते
    3. क्योंकि प्रतिचयन के बाद एलियास घटक वास्तविक निम्न-आवृत्ति घटक से अभेद्य हो जाता है और उसे फिर अलग नहीं किया जा सकता
    4. क्योंकि एलियासिंग केवल यादृच्छिक रव को प्रभावित करती है, इसलिए फ़िल्टर केवल अंतिम अभिलेख का सिग्नल-रव अनुपात सुधारने के लिए चाहिए
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — क्योंकि प्रतिचयन के बाद एलियास घटक वास्तविक निम्न-आवृत्ति घटक से अभेद्य हो जाता है और उसे फिर अलग नहीं किया जा सकता

    प्रतिचयन fN से ऊपर की समस्त ऊर्जा को बैंड 0 से fN में मोड़ देता है, जहाँ वह वास्तविक निम्न-आवृत्ति सिग्नल के ठीक ऊपर बैठ जाती है; fs = 100 Hz पर एलियास हुए 130 Hz स्वर व वास्तविक 30 Hz स्वर के नमूने एक-से होते हैं, अतः बाद की कोई अंकीय प्रक्रिया उन्हें अलग नहीं कर सकती। फ़िल्टर नाइक्विस्ट आवृत्ति नहीं बदलता, जो Δt से निश्चित है, और एलियासिंग सिग्नल को उतना ही प्रभावित करती है जितना रव को।
  3. आवर्तकाल T की एक आवर्ती वर्ग-तरंग +A व −A के बीच बदलती है, t = 0 के सापेक्ष विषम है और उसमें अर्ध-तरंग सममिति f(t + T/2) = −f(t) है। उसकी फ़ूरियर श्रेणी में हैं:

    1. केवल ज्या पद, मूल आवृत्ति के विषम संनादियों पर
    2. केवल कोज्या पद, मूल आवृत्ति के विषम संनादियों पर
    3. केवल ज्या पद, मूल आवृत्ति के प्रत्येक संनादी पर
    4. ज्या व कोज्या दोनों पद, केवल विषम संनादियों पर
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — केवल ज्या पद, मूल आवृत्ति के विषम संनादियों पर

    t = 0 के सापेक्ष विषमता सभी कोज्या पद हटा देती है, और अर्ध-तरंग सममिति सभी सम संनादी हटा देती है, जिससे केवल विषम n हेतु bₙ = 4A/(nπ) बचता है। सभी संनादियों पर ज्या पद अर्ध-तरंग सममिति-रहित विषम तरंग, जैसे आरी-दंत (sawtooth), का वर्णन करेंगे।
  4. ऊँचाई 1 व अवधि T का एक बॉक्सकार स्पंद, ऊँचाई 1 व अवधि T/2 के बॉक्सकार से बदला जाता है। मूल के स्पेक्ट्रम की तुलना में नए स्पंद के स्पेक्ट्रम में है:

    1. आधी चौड़ाई का मुख्य लोब और शून्य-आवृत्ति पर दोगुना मान
    2. दोगुनी चौड़ाई का मुख्य लोब और शून्य-आवृत्ति पर वही मान
    3. वही मुख्य लोब चौड़ाई और शून्य-आवृत्ति पर आधा मान
    4. दोगुनी चौड़ाई का मुख्य लोब और शून्य-आवृत्ति पर आधा मान
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — दोगुनी चौड़ाई का मुख्य लोब और शून्य-आवृत्ति पर आधा मान

    स्पेक्ट्रम का पहला शून्य 1/अवधि पर होता है, अतः अवधि आधी करने पर वह 1/T से 2/T पर चला जाता है, यानी चौड़ाई दोगुनी। शून्य आवृत्ति पर मान स्पंद के नीचे के क्षेत्रफल के बराबर है, जो T से T/2 होकर आधा रह जाता है। उलटा युग्म (संकरा व ऊँचा) भ्रामक भूल है, पर वह अधिक लंबे स्पंद का परिणाम है।
  5. 500 Hz पर प्रतिचयित 2 s के अभिलेख में FFT लेने से पहले शून्य जोड़कर उसे 8 s का कर दिया जाता है, और मूल अभिलेख पर आयताकार विंडो है। कौन-सा कथन सही है?

    1. विभेदन सुधरकर 0.125 Hz हो जाता है, अतः 0.25 Hz के अंतर वाले दो स्वर स्पेक्ट्रम में अब दो स्पष्ट अलग शिखरों के रूप में दिखते हैं
    2. बिन-अंतराल 0.125 Hz हो जाता है, पर 0.25 Hz के अंतर वाले स्वर अविभेदित रहते हैं क्योंकि आँकड़े अब भी केवल 2 s लंबे हैं
    3. एलियासिंग घटती है क्योंकि नाइक्विस्ट आवृत्ति पैड किए अभिलेख की लंबाई के अनुपात में बढ़ती है
    4. स्पेक्ट्रमी रिसाव समाप्त हो जाता है क्योंकि पैड किया अभिलेख अब शून्यों से आरंभ और समाप्त होता है, अतः कोई आकस्मिक किनारा नहीं बचता
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — बिन-अंतराल 0.125 Hz हो जाता है, पर 0.25 Hz के अंतर वाले स्वर अविभेदित रहते हैं क्योंकि आँकड़े अब भी केवल 2 s लंबे हैं

    8 s तक पैडिंग से बिन-अंतराल 1/8 s = 0.125 Hz हो जाता है, जो केवल 2 s के अभिलेख के स्पेक्ट्रम का अंतर्वेशन करता है। वास्तविक विभेदन लगभग 1/2 s = 0.5 Hz ही रहता है, अतः 0.25 Hz के अंतर वाले दो स्वर एक ही मुख्य लोब के भीतर रहते हैं और अलग नहीं होते। नाइक्विस्ट आवृत्ति केवल प्रतिचयन अंतराल पर निर्भर है (यहाँ 250 Hz), और मूल अभिलेख का आकस्मिक कटाव रिसाव करता रहता है चाहे उसके बाद कुछ भी हो।
  6. उसी लंबाई की आयताकार विंडो की तुलना में हान विंडो देती है:

    1. संकरा मुख्य लोब और कम पार्श्व लोब, जिससे विभेदन व रिसाव दोनों बिना किसी हानि के साथ-साथ सुधरते हैं
    2. वही मुख्य लोब चौड़ाई पर ऊँचे पार्श्व लोब, क्योंकि टेपर अभिलेख के सिरों की ऊर्जा हटा देता है
    3. चौड़ा मुख्य लोब और ऊँचे पार्श्व लोब, क्योंकि टेपर अभिलेख के सिरों पर स्पेक्ट्रमी ऊर्जा जोड़ता है
    4. चौड़ा मुख्य लोब और बहुत कम पार्श्व लोब: प्रबल शिखरों के निकट दुर्बल शिखर दिखने लगते हैं, पर निकट स्वर कम अच्छी तरह अलग होते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — चौड़ा मुख्य लोब और बहुत कम पार्श्व लोब: प्रबल शिखरों के निकट दुर्बल शिखर दिखने लगते हैं, पर निकट स्वर कम अच्छी तरह अलग होते हैं

    हान टेपर का शून्य-से-शून्य मुख्य लोब 4/T है जबकि आयताकार विंडो का 2/T, और उसका उच्चतम पार्श्व लोब लगभग −31 dB है जबकि आयताकार का −13 dB। अधिक चिकना टेपर सदा विभेदन के बदले कम रिसाव देता है; कोई विंडो दोनों नहीं सुधारती, जिससे ‘दोनों साथ सुधरते हैं’ वाला दावा अस्वीकार हो जाता है।
  7. इनमें से कौन-सा कारणात्मक निकाय, जो निवेश x[n] से चलता है, स्थायी है, अर्थात् प्रत्येक परिबद्ध निवेश पर उसका निर्गत परिबद्ध रहता है?

    1. y[n] = 1.05 y[n − 1] + x[n], जिसका एकल ध्रुव z = 1.05 पर है
    2. y[n] = −0.9 y[n − 1] + x[n], जिसका एकल ध्रुव z = −0.9 पर है
    3. y[n] = y[n − 1] + x[n], जिसका एकल ध्रुव इकाई वृत्त पर z = 1 पर है
    4. y[n] = 0.5 y[n − 1] + 1.2 y[n − 2] + x[n], जिसके ध्रुव z² − 0.5z − 1.2 = 0 के मूल हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — y[n] = −0.9 y[n − 1] + x[n], जिसका एकल ध्रुव z = −0.9 पर है

    कारणात्मक फ़िल्टर के स्थायित्व हेतु प्रत्येक ध्रुव का |z| < 1 के कड़ाई से भीतर होना आवश्यक है। −0.9 का ध्रुव भीतर है, और उसका ऋण चिह्न केवल आवेग प्रतिक्रिया का चिह्न एकांतरित करता है जबकि वह घटती है। 1.05 का ध्रुव बाहर है (बढ़ती प्रतिक्रिया), 1 का ध्रुव वृत्त पर है (संचायक कभी घटता नहीं, अतः अचर निवेश पर वह असीमित बढ़ता है), और z² − 0.5z − 1.2 के मूल लगभग 1.37 व −0.87 हैं, जिनमें एक वृत्त के बाहर है।
  8. हिल्बर्ट रूपांतरण को 1/(πt) से संवलन के रूप में परिभाषित करने पर, ω₀ > 0 हेतु cos(ω₀t) का हिल्बर्ट रूपांतरण है:

    1. −sin(ω₀t)
    2. −cos(ω₀t)
    3. sin(ω₀t)
    4. स्वयं cos(ω₀t), क्योंकि रूपांतरण की प्रत्येक आवृत्ति पर इकाई लब्धि है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — sin(ω₀t)

    रूपांतरण धनात्मक आवृत्तियों को −i से गुणा करता है, यानी −90° का कला-विस्थापन, और 90° विलंबित कोज्या ज्या होती है: H{cos ω₀t} = sin ω₀t। परिणाम −sin(ω₀t) विपरीत चिह्न-परिपाटी (धनात्मक आवृत्तियों हेतु +90°) का है, और −cos(ω₀t) दो बार लगाने का परिणाम है। इकाई लब्धि का अर्थ आयाम अपरिवर्तित है, तरंगरूप नहीं।
  9. अल्प-काल फ़ूरियर रूपांतरण (एक निश्चित विंडो) और सतत वेवलेट रूपांतरण की तुलना में कौन-सा कथन सही है?

    1. वेवलेट विंडो आवृत्ति बढ़ने पर छोटी होती जाती हैं, अतः Δf/f अचर रहता है, जबकि निश्चित विंडो का विभेदन प्रत्येक आवृत्ति पर वही रहता है
    2. निश्चित विंडो का आकार भली-भाँति चुनने पर वह समय व आवृत्ति के मनमाने सूक्ष्म विभेदन एक साथ पा सकती है, जो वेवलेट रूपांतरण नहीं पा सकता
    3. वेवलेट रूपांतरण प्रत्येक आवृत्ति पर एक ही निश्चित लंबाई की विंडो प्रयोग करता है, अतः उसका समय-विभेदन सभी आवृत्तियों पर समान है
    4. वेवलेट रूपांतरण को स्थिर (stationary) सिग्नल चाहिए, जबकि अल्प-काल फ़ूरियर रूपांतरण भूकंपीय ट्रेसों जैसे अस्थिर (non-stationary) सिग्नलों हेतु है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — वेवलेट विंडो आवृत्ति बढ़ने पर छोटी होती जाती हैं, अतः Δf/f अचर रहता है, जबकि निश्चित विंडो का विभेदन प्रत्येक आवृत्ति पर वही रहता है

    वेवलेट को निम्न आवृत्तियों हेतु खींचा और उच्च हेतु संपीडित किया जाता है, जिससे उच्च आवृत्ति पर छोटी विंडो (अच्छा समय-निर्धारण) और निम्न आवृत्ति पर लंबी विंडो (अच्छा आवृत्ति-विभेदन) मिलती है, यानी अचर-Q टाइलिंग। निश्चित STFT विंडो में सर्वत्र एक ही टाइल-आकार है, और कोई विंडो गैबर–हाइज़ेनबर्ग सीमा Δt·Δf ≥ 1/(4π) को नहीं लाँघ सकती। दोनों रूपांतरण अस्थिर सिग्नलों हेतु लाए गए हैं, अतः स्थिरता वाला दावा उलटा है।
  10. संवलन, सहसंबंध व प्रतिसंवलन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. 6 नमूनों के ट्रेस का 4 नमूनों के फ़िल्टर से संवलन करने पर 9 नमूनों का निर्गत मिलता है
    2. वास्तविक श्रेणी का स्व-सहसंबंध शून्य विलंब के सापेक्ष सममित होता है और उसका उच्चिष्ठ शून्य विलंब पर होता है
    3. आवृत्ति प्रक्षेत्र में x व y का परस्पर सहसंबंध X·Y है, ठीक उनके संवलन जैसा
    4. प्रतिसंवलन सादे स्पेक्ट्रमी भाग से वहाँ सुरक्षित है जहाँ वेवलेट का स्पेक्ट्रम बहुत छोटा हो
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — 6 नमूनों के ट्रेस का 4 नमूनों के फ़िल्टर से संवलन करने पर 9 नमूनों का निर्गत मिलता है; B — वास्तविक श्रेणी का स्व-सहसंबंध शून्य विलंब के सापेक्ष सममित होता है और उसका उच्चिष्ठ शून्य विलंब पर होता है

    संवलन की लंबाई N + M − 1 = 6 + 4 − 1 = 9 है, और स्व-सहसंबंध सममित होता है जिसका शिखर शून्य विलंब पर ऊर्जा-मान है। परस्पर सहसंबंध संयुग्मी सहित X*·Y है, अतः कलाएँ घटती हैं और विलंब बचा रहता है, जो संवलन से भिन्न है। बहुत छोटे वेवलेट स्पेक्ट्रम से भाग देना रव को अत्यधिक गुना कर देता है, इसीलिए स्थायीकारक जोड़ा जाता है।
  11. डिजिटल फ़िल्टरों, उनके ध्रुवों व शून्यकों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. कारणात्मक FIR फ़िल्टर के z = 0 के अतिरिक्त कोई ध्रुव नहीं होते और इसलिए वह सदा स्थायी है
    2. कारणात्मक फ़िल्टर तब स्थायी होता है जब भी उसके सभी शून्यक इकाई वृत्त के भीतर हों
    3. इकाई वृत्त पर z = eiω₁ पर रखा शून्यक आवृत्ति ω₁ पर लब्धि को शून्य कर देता है
    4. इकाई वृत्त के ठीक भीतर कोण ω₁ पर स्थित ध्रुव ω₁ के निकट लब्धि में तीक्ष्ण शिखर बनाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — कारणात्मक FIR फ़िल्टर के z = 0 के अतिरिक्त कोई ध्रुव नहीं होते और इसलिए वह सदा स्थायी है; C — इकाई वृत्त पर z = e^{iω₁} पर रखा शून्यक आवृत्ति ω₁ पर लब्धि को शून्य कर देता है; D — इकाई वृत्त के ठीक भीतर कोण ω₁ पर स्थित ध्रुव ω₁ के निकट लब्धि में तीक्ष्ण शिखर बनाता है

    FIR फ़िल्टर के एकमात्र ध्रुव मूल-बिंदु पर होते हैं, अतः वह अस्थायी नहीं हो सकता; वृत्त पर शून्यक अपने कोण पर शून्य लब्धि देता है; और वृत्त के निकट ध्रुव से वहाँ दूरी छोटी हो जाती है, अतः लब्धि (शून्यकों की दूरियाँ भागे ध्रुवों की दूरियाँ) शिखर बनाती है। स्थायित्व केवल ध्रुवों से तय होता है, इसलिए वृत्त के भीतर के शून्यक उसकी गारंटी नहीं देते।
  12. विश्लेषिक सिग्नल व वेवलेटों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. विश्लेषिक सिग्नल x(t) + i·H{x}(t) में कोई ऋणात्मक आवृत्ति-घटक नहीं होता
    2. सिग्नल x(t) का आवरण मापांक |x(t) + i·H{x}(t)| है
    3. तात्क्षणिक आवृत्ति आवरण के समय-अवकलज के रूप में परिभाषित है
    4. रिकर वेवलेट गाउसीय गुणा सम्मिश्र ज्या-तरंग है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — विश्लेषिक सिग्नल x(t) + i·H{x}(t) में कोई ऋणात्मक आवृत्ति-घटक नहीं होता; B — सिग्नल x(t) का आवरण मापांक |x(t) + i·H{x}(t)| है

    i·H{x} जोड़ने से स्पेक्ट्रम का ऋणात्मक अर्ध कट जाता है, और उसका मापांक आवरण है। तात्क्षणिक आवृत्ति तात्क्षणिक कला का अवकलज भाग 2π है, आवरण का नहीं। गाउसीय गुणा सम्मिश्र ज्या-तरंग मॉरलेट वेवलेट है; रिकर वेवलेट गाउसीय का वास्तविक द्वितीय अवकलज है।
  13. 130 Hz की एक ज्या-तरंग को बिना एंटी-एलियास फ़िल्टर के प्रति सेकंड 100 नमूनों की दर से प्रतिचयित किया जाता है। प्रतिचयित अभिलेख में वह जिस आवृत्ति पर, Hz में, दिखती है वह ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 30

    नाइक्विस्ट आवृत्ति 100/2 = 50 Hz है, अतः 130 Hz एलियास हो जाती है। वह |f − k·fs| पर दिखती है, जहाँ k ऐसा चुना जाता है कि मान 0 व 50 Hz के बीच आए: k = 1 पर |130 − 100| = 30 Hz, जो बैंड में है, जबकि k = 0 पर 130 Hz और k = 2 पर 70 Hz मिलते हैं, दोनों बैंड से बाहर। उत्तर 30 Hz है।
  14. चार-बिंदु अनुक्रम x = [2, 0, 1, 3] है, और उसका DFT X[k] = Σ x[n] e−i2πkn/4 है, जहाँ n व k 0 से 3 तक चलते हैं। |X[1]|² का मान ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 10

    k = 1 हेतु n = 0, 1, 2, 3 पर गुणक e−iπn/2 क्रमशः 1, −i, −1 व +i हैं। अतः X[1] = 2·1 + 0·(−i) + 1·(−1) + 3·(i) = 1 + 3i। तब |X[1]|² = 1² + 3² = 10। विपरीत चिह्न-परिपाटी e+iπn/2 लेने पर सम्मिश्र संयुग्मी 1 − 3i मिलता है जिसका मापांक वही है, अतः |X[1]|² उस परिपाटी पर निर्भर नहीं है।
  15. अनुक्रम a = [2, −1, 1] का b = [1, 3] से संवलन किया जाता है और पूरा निर्गत y (सभी N + M − 1 नमूने) मिलता है। y के सभी नमूनों के वर्गों का योग ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 42

    निर्गत में 3 + 2 − 1 = 4 नमूने हैं: y₀ = 2·1 = 2; y₁ = 2·3 + (−1)·1 = 5; y₂ = (−1)·3 + 1·1 = −2; y₃ = 1·3 = 3। जाँच: नमूनों का योग 8 = (2 − 1 + 1)(1 + 3) है। वर्गों का योग 4 + 25 + 4 + 9 = 42 है।
  16. एक डिजिटल फ़िल्टर y[n] = 0.8 y[n − 1] + x[n] का पालन करता है। प्रतिचयन आवृत्ति के एक-चौथाई के बराबर आवृत्ति (ω = 2πf/fs = π/2) पर उसकी लब्धि |H| दशमलव के दो स्थानों तक ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 0.78

    Z-रूपांतरण लेने पर H(z) = 1/(1 − 0.8 z⁻¹) मिलता है, जिसका एकल ध्रुव z = 0.8 पर है (स्थायी)। ω = π/2 पर इकाई वृत्त पर z⁻¹ = e−iπ/2 = −i, अतः H = 1/(1 + 0.8i) और |H| = 1/√(1 + 0.64) = 1/√1.64 = 0.781, जो दो दशमलव तक 0.78 है। DC लब्धि 1/(1 − 0.8) = 5 मूल्यांकन हेतु भ्रामक गलत आवृत्ति है।
  17. 30.0 Hz व 30.4 Hz आवृत्तियों की दो स्थिर-आयाम ज्या-तरंगों को आयताकार विंडो से लिए गए एकल अभिलेख के DFT में अलग शिखरों के रूप में विभेदित करना है। इस नियम से कि अभिलेख-लंबाई कम से कम 1/Δf हो, जहाँ Δf आवृत्ति-अंतर है, न्यूनतम अभिलेख-लंबाई ____ सेकंड है, दशमलव के एक स्थान तक।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 2.5

    आवृत्ति-अंतर Δf = 30.4 − 30.0 = 0.4 Hz है, और DFT विभेदन 1/T है, अतः T ≥ 1/0.4 = 2.5 s। प्रतिचयन दर का इसमें कोई योगदान नहीं, क्योंकि उसी अवधि में अधिक नमूने (या शून्य) जोड़ने से कोई अतिरिक्त विभेदन नहीं मिलता।