विभव व समय-परिवर्ती क्षेत्र: विभव, लाप्लास, मैक्सवेल व हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण, ग्रीन प्रमेय, प्रतिबिंब व समाकल समीकरण

यह अध्याय भूविज्ञान एवं भूभौतिकी (GG) पेपर के भाग B2 के “विभव व समय-परिवर्ती क्षेत्र (Potential and Time Varying Fields)” शीर्षक का उत्तर देता है: “अदिश व सदिश विभव क्षेत्र; कार्तीय, बेलनाकार व गोलीय ध्रुवीय निर्देशांकों में विभिन्न प्रकार की परिसीमा-मान समस्याओं के हल हेतु लाप्लास, मैक्सवेल व हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण; ग्रीन प्रमेय; प्रतिबिंब सिद्धांत; विभव व समय-परिवर्ती क्षेत्र सिद्धांत में समाकल समीकरण।” यह पढ़ाता है अदिश व सदिश विभव, मैक्सवेल समीकरण व उनका हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण तक सरलीकरण, तीनों निर्देशांक-पद्धतियों में लाप्लास समीकरण का चर-पृथक्करण, मानक स्रोतों के विभव, अद्वितीयता सहित गाउस व ग्रीन प्रमेय, प्रतिबिंब विधि, तथा गुरुत्व व विद्युतचुंबकत्व में समाकल समीकरण। संख्यात्मक प्रश्न पट्टी व गोले में परिसीमा-मान हल, तरंग-संख्या, अपसरण-प्रमेय से अभिवाह, प्रतिबिंब आवेश व बल, तथा वियोज्य समाकल समीकरण हैं।

1. अदिश व सदिश विभव क्षेत्र

अदिश विभव (scalar potential) φ(r) किसी क्षेत्र को प्रत्येक बिंदु पर एक संख्या से वर्णित करता है, और क्षेत्र उसकी प्रवणता (gradient) है: स्थिरविद्युतिकी में E = −∇V। भूभौतिकी में गुरुत्व विभव प्रायः धनात्मक चिह्न के साथ लिखा जाता है, U = G ∫ ρ/|r − r′| dV, ताकि g = +∇U द्रव्यमान की ओर इंगित करे। जो क्षेत्र किसी विभव की प्रवणता हो वह संरक्षी (conservative) है: ∇ × F = 0, दो बिंदुओं के बीच रेखा-समाकल पथ से स्वतंत्र है और बंद पाश पर शून्य। जहाँ स्रोत हों वहाँ φ प्वासों समीकरण का पालन करता है, स्थिरविद्युतिकी में ∇²φ = −ρ/ε0 और गुरुत्व में ∇²U = −4πGρ। स्रोत-रहित क्षेत्र में वह लाप्लास समीकरण ∇²φ = 0 का पालन करता है।

सदिश विभव (vector potential) A परिनालिकीय क्षेत्र, ∇ · B = 0, के लिए B = ∇ × A से परिभाषित है। वह अद्वितीय नहीं है, क्योंकि किसी भी अदिश की प्रवणता जोड़ने पर B नहीं बदलता (गेज-स्वतंत्रता); कूलॉम गेज ∇ · A = 0 प्रचलित है। हेल्महोल्ट्ज़ वियोजन के अनुसार, अनंत पर लुप्त होने वाला सुव्यवहारी क्षेत्र कर्ल-रहित भाग −∇φ और अपसरण-रहित भाग ∇ × A का योग है, और अपने अपसरण व कर्ल से निर्धारित होता है।

  • प्रसंवादी फलनों (लाप्लास समीकरण के हल) का स्रोत-रहित क्षेत्र के भीतर कोई स्थानीय उच्चिष्ठ या निम्निष्ठ नहीं होता, अतः चरम मान परिसीमा पर होते हैं।
  • किसी बिंदु का मान उस पर केंद्रित किसी भी गोले के औसत के बराबर होता है (माध्य-मान गुण), इसलिए विभव क्षेत्र चिकने होते हैं।
⚠️ चिह्न-परिपाटी जाँच लें
भौतिकी V = −GM/r लिखती है और g = −∇V; भूभौतिकी U = +GM/r और g = +∇U लिखती है। बल वही है, विभव का चिह्न नहीं, इसलिए विभव का मान देने वाले प्रश्न को अपनी परिपाटी बतानी चाहिए।

2. मैक्सवेल व हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण

माध्यम में मैक्सवेल समीकरण हैं ∇·D = ρ_f, ∇·B = 0, ∇×E = −∂B/∂t और ∇×H = J + ∂D/∂t, जहाँ D = εE, B = μH व J = σE। चूँकि ∇·B = 0, B = ∇×A सदा अस्तित्व में है। तीसरे समीकरण के कारण समय-परिवर्ती क्षेत्र में E कर्ल-रहित नहीं रहता: E = −∇V − ∂A/∂t।

स्रोत-रहित एकसमान माध्यम में H का विलोपन करने पर ∇²E = με ∂²E/∂t² + μσ ∂E/∂t मिलता है। समय-निर्भरता exp(iωt) के लिए यह हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण ∇²E + k²E = 0 है, जिसमें k² = ω²με − iωμσ। विद्युतरोधी (σ = 0) में k = ω√(με) = ω/v = 2π/λ वास्तविक है: वेग v = 1/√(με) की अनवमंदित तरंगें। निम्न आवृत्ति पर चालक पृथ्वी में (σ ≫ ωε, अर्ध-स्थैतिक सीमा, विस्थापन धारा उपेक्षित) k² = −iωμσ और k = √(ωμσ/2)(1 − i): क्षेत्र विसरित होता है और exp(−z/δ) से घटता है, त्वचा गहराई (skin depth) δ = √(2/(ωμσ)) ≈ 503 √(ρ/f) m (ρ Ω·m में, f Hz में)। अदिश रूप ∇²p + k²p = 0, k = ω/c के साथ, स्थिर वेग c वाले माध्यम में ध्वनिक व भूकंपीय तरंगों का भी वर्णन करता है।

क्षेत्र-समीकरण व प्रत्येक का उपयोग
समीकरणरूपउपयोग
लाप्लास∇²φ = 0स्रोत-रहित स्थैतिक विभव (गुरुत्व, चुंबकीय, DC विद्युत)
प्वासों∇²φ = −ρ/ε0स्रोत सहित स्थैतिक विभव
हेल्महोल्ट्ज़∇²ψ + k²ψ = 0एक आवृत्ति: तरंगें (k वास्तविक) या EM प्रेरण (k सम्मिश्र)
विसरण∇²ψ = μσ ∂ψ/∂tपृथ्वी में अर्ध-स्थैतिक EM क्षेत्र
तरंग∇²ψ = (1/v²) ∂²ψ/∂t²समय-प्रक्षेत्र में भूकंपीय व रेडार तरंगें
⚠️ कौन-सा k?
k = ω/v = 2π/λ केवल विद्युतरोधी माध्यम में लागू है। अर्ध-स्थैतिक चालक में |k| = √(ωμσ) = √2/δ है और k के वास्तविक व काल्पनिक भाग बराबर हैं, इसलिए क्षेत्र अवमंदित है, संचरणशील नहीं। exp(iωt) समय-निर्भरता के लिए हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण का बहिर्गामी बिंदु-स्रोत हल exp(−ikr)/(4πr) है।

3. लाप्लास समीकरण: तीन निर्देशांक-पद्धतियों में चर-पृथक्करण

∇²φ = 0 हल करने के लिए φ को एक-एक निर्देशांक के फलनों के गुणनफल के रूप में लिखा जाता है। समीकरण पृथक्करण-स्थिरांकों से जुड़े साधारण अवकल समीकरणों में बँट जाता है और परिसीमा प्रतिबंध स्थिरांकों को चुनते हैं।

  • कार्तीय, φ = X(x)Y(y)Z(z): X″/X + Y″/Y + Z″/Z = 0। X″ = −α²X व Y″ = −β²Y लेने पर Z″ = (α² + β²)Z: x व y में दोलनी, z में चरघातांकी।
  • बेलनाकार (ρ, θ, z): ∇²φ = (1/ρ)∂ρ(ρ∂ρφ) + (1/ρ²)∂θ²φ + ∂z²φ। z के बिना: ρⁿ cos nθ, ρ⁻ⁿ cos nθ (और ज्या रूप) तथा n = 0 के लिए ln ρ। z-निर्भरता सहित: Jₙ(kρ) cos nθ exp(±kz), बेसेल फलन।
  • गोलीय (r, θ, φ), दिगंशीय सममिति सहित: (1/r²)∂r(r²∂rφ) + (1/(r² sin θ))∂θ(sin θ ∂θφ) = 0, जिससे φ = Σ (A_l r^l + B_l r^−(l+1)) P_l(cos θ), जहाँ P0 = 1, P1 = cos θ, P2 = (3cos²θ − 1)/2। l = 0 पद एकध्रुव 1/r है और l = 1 द्विध्रुव cos θ/r² देता है।

उदाहरण (कार्तीय)। पट्टी 0 < x < a, y > 0, जिसमें x = 0, x = a पर व y → ∞ पर φ = 0, और y = 0 पर φ = V0। दोनों किनारों पर शून्य होने से X = sin(nπx/a) बाध्य होता है, अतः Y, exp(−nπy/a) से घटता है, और आधार पर अचर V0 की फ़ूरिये श्रेणी से φ = (4V0/π) × विषम n पर (1/n) sin(nπx/a) exp(−nπy/a) का योग मिलता है। उच्च पद y के साथ तेज़ी से मरते हैं, इसलिए आधार से दूर n = 1 पद प्रमुख है: x = a/2, y = a पर φ ≈ (4/π)e^(−π) V0 = 0.055 V0।

उदाहरण (गोलीय)। त्रिज्या a के गोले पर φ(a, θ) = V0 cos θ है, r = 0 पर φ सीमित और r → ∞ पर φ → 0। केवल l = 1 cos θ से मेल खाता है। भीतर φ = V0 (r/a) cos θ (केंद्र पर r⁻² पद वर्जित है); बाहर φ = V0 (a/r)² cos θ (अनंत पर r वाला पद वर्जित है)। दोनों r = a पर मेल खाते हैं। r = 2a व θ = 60° पर φ = V0 × (1/4) × 0.5 = 0.125 V0।

⚠️ परिसीमा प्रतिबंध हल तय करते हैं
सामान्य हल में प्रत्येक विधा के दो अंश होते हैं, जैसे r^l व r^−(l+1), exp(+kz) व exp(−kz)। भौतिक शर्तें उनमें से चुनती हैं। अनंत पर या केंद्र पर की शर्त भूल जाना इन समस्याओं की सबसे आम भूल है।

4. बिंदु, रेखा, द्विध्रुव व गोले के स्रोतों के विभव

धनात्मक भूभौतिकीय परिपाटी में बिंदु द्रव्यमान U = GM/r व द्रव्यमान की ओर g = GM/r² देता है। प्रति इकाई लंबाई द्रव्यमान λ का अनंत रेखा-स्रोत U = −2Gλ ln ρ + अचर व g = 2Gλ/ρ देता है। पृष्ठ-घनत्व σ की अनंत एकसमान समतल पट्टिका दूरी से स्वतंत्र अचर क्षेत्र g = 2πGσ देती है, जो Bouguer पट्टिका का मूल है। द्विध्रुव (आवेश +q व −q, दूरी d पर, आघूर्ण p = qd) का दूर विभव V = p cos θ/(4πε0 r²) है, E_r = 2p cos θ/(4πε0 r³) और E_θ = p sin θ/(4πε0 r³) के साथ: विभव r⁻² से और क्षेत्र r⁻³ से घटता है, तथा समान r पर अक्ष पर क्षेत्र विषुवतीय तल के क्षेत्र का दुगुना है।

दूरी के साथ विभव व क्षेत्र कैसे घटते हैं
स्रोतविभवक्षेत्र
बिंदु (एकध्रुव)1/r1/r²
द्विध्रुव1/r²1/r³
चतुर्ध्रुव1/r³1/r⁴
अनंत रेखा (2-D)ln ρ1/ρ
अनंत समतल पट्टिकादूरी में रैखिकअचर

त्रिज्या a, घनत्व ρ व द्रव्यमान M = 4πa³ρ/3 का एकसमान गोला बाहर ठीक अपने केंद्र पर स्थित बिंदु द्रव्यमान की तरह कार्य करता है (कोश-प्रमेय): U = GM/r। भीतर केवल त्रिज्या r के भीतर का द्रव्यमान आकर्षित करता है, अतः g = GMr/a³ = (4/3)πGρ r, जो केंद्र पर शून्य से सतह पर GM/a² तक रैखिक बढ़ता है; भीतर विभव U = 2πGρ(a² − r²/3) है। किसी भी परिमित स्रोत का बहुध्रुव प्रसार U = GM/r + (द्विध्रुव पद)/r² + (चतुर्ध्रुव पद)/r³ + … होता है, अतः दूर सबसे निम्न अशून्य पद प्रमुख होता है; मूल-बिंदु को द्रव्यमान-केंद्र पर लेने से द्विध्रुव पद हट जाता है।

🎯 पट्टिका का क्षेत्र अचर क्यों है
किसी खंड का आकर्षण 1/r² से घटता है, पर दिशाओं के दिए शंकु में पड़ने वाले खंड का क्षेत्रफल r²/cos θ की भाँति बढ़ता है और उसके ऊर्ध्वाधर अंश में cos θ आता है, इसलिए ठोस-कोण का प्रत्येक अवयव Gσ dΩ जोड़ता है। दिशाओं का अर्ध-आकाश 2π फैलता है, अतः किसी भी ऊँचाई पर 2πGσ मिलता है: Bouguer पट्टिका पद।

5. गाउस व ग्रीन प्रमेय तथा अद्वितीयता

अपसरण (गाउस) प्रमेय ∮ F·n dS = ∫ ∇·F dV है। गुरुत्व के लिए यह ∮ g·n dS = −4πG M_परिबद्ध देता है: अभिवाह केवल परिबद्ध द्रव्यमान पर निर्भर है, उसके आकार पर नहीं। उदाहरण: घन 0 ≤ x, y, z ≤ 2 पर F = (x², y², z²)। तब ∇·F = 2(x + y + z) और आयतन-समाकल 2 × 3 × (∫x dV) = 2 × 3 × 8 = 48 है। जाँच: फलक x = 2, y = 2 व z = 2 प्रत्येक 4 × 4 = 16 देते हैं, और 0 वाले फलक कुछ नहीं देते।

ग्रीन तत्समक अपसरण प्रमेय में F = φ∇ψ रखने से मिलते हैं। पहला ∫(φ∇²ψ + ∇φ·∇ψ) dV = ∮ φ ∂ψ/∂n dS है; φ व ψ बदलकर घटाने पर दूसरा, ∫(φ∇²ψ − ψ∇²φ) dV = ∮(φ ∂ψ/∂n − ψ ∂φ/∂n) dS, मिलता है। ψ = G(r, r′) = 1/(4π|r − r′|) लें, जो ∇²G = −δ(r − r′) को संतुष्ट करता है। ∇²φ = −f के लिए दूसरा तत्समक ग्रीन निरूपण φ(r) = ∫ G f dV′ + ∮ (G ∂φ/∂n′ − φ ∂G/∂n′) dS′ देता है: भीतर का विभव भीतर के स्रोतों तथा परिसीमा पर φ व ∂φ/∂n से निर्धारित होता है। S पर लुप्त होने वाला ग्रीन फलन लेने पर केवल S पर φ देना शेष रहता है।

अद्वितीयता। यदि φ1 व φ2 दोनों V में लाप्लास समीकरण को S पर समान φ (डिरिख्ले आँकड़े) के साथ हल करें, तो w = φ1 − φ2 प्रसंवादी है और S पर शून्य। φ = ψ = w के साथ पहला तत्समक ∫|∇w|² dV = 0 देता है, अतः w = 0। न्यूमान आँकड़ों (∂φ/∂n दिया हो) के लिए हल एक योज्य अचर तक अद्वितीय है। फलस्वरूप किसी भी विधि से मिला कोई भी हल, चाहे चर-पृथक्करण हो या प्रतिबिंब, वही हल है।

⚠️ न्यूमान आँकड़े मनमाने नहीं चुने जा सकते
बंद पृष्ठ के भीतर लाप्लास समीकरण के लिए कुल बहिर्गामी अभिवाह ∮ ∂φ/∂n dS शून्य होना चाहिए, क्योंकि भीतर कोई स्रोत नहीं। डिरिख्ले आँकड़े कोई भी सतत फलन हो सकते हैं, पर हल के अस्तित्व के लिए न्यूमान आँकड़ों को यह संगति-शर्त पूरी करनी होती है।

6. प्रतिबिंब सिद्धांत

प्रतिबिंब विधि (method of images) परिसीमा को क्षेत्र के बाहर कल्पित स्रोतों से बदल देती है ताकि परिसीमा प्रतिबंध पूरा हो। अद्वितीयता प्रमेय से परिणाम क्षेत्र के भीतर का सच्चा विभव है। अनंत भूसंपर्कित चालक तल से ऊँचाई h पर बिंदु आवेश q का प्रतिबिंब गहराई h पर −q है। तल के ऊपर का विभव दोनों आवेशों का है, प्रेरित पृष्ठ-आवेश कुल −q है, और q पर बल तल की ओर q²/(4πε0 (2h)²) है, क्योंकि प्रतिबिंब तक दूरी 2h है। उदाहरण: q = 5 nC, h = 0.30 m पर F = 9 × 10⁹ × (5 × 10⁻⁹)²/0.6² = 6.25 × 10⁻⁷ N।

परिसीमाएँ व उनके प्रतिबिंब
परिसीमास्रोत q का प्रतिबिंब
भूसंपर्कित चालक तल (φ = 0)दर्पण-बिंदु पर −q
विद्युतरोधी तल (अभिलंब प्रवणता शून्य), जैसे धारा हेतु भू-सतहदर्पण-बिंदु पर +q: विभव दुगुना
त्रिज्या a का भूसंपर्कित गोला, स्रोत केंद्र से दूरी d > a परकेंद्र से a²/d दूरी पर, उसी रेखा पर, −qa/d
प्रतिरोधकताओं ρ1 व ρ2 की अंतरापृष्ठदर्पण-बिंदु पर kq, k = (ρ2 − ρ1)/(ρ2 + ρ1)

अंतरापृष्ठ वाली पंक्ति में दोनों सीमाएँ हैं: ρ2 → ∞ पर k = +1 (विद्युतरोधी) और ρ2 → 0 पर k = −1 (भूसंपर्कित चालक)। प्रतिरोधकता ρ1 व मोटाई h की परत पर, जो अर्ध-आकाश के ऊपर है, सतह पर धारा-इलेक्ट्रोड I के लिए सतह व अंतरापृष्ठ के बीच के प्रतिबिंब अनंत श्रेणी बनाते हैं, V = (Iρ1/2π)[1/r + 2 Σ kⁿ/√(r² + (2nh)²)], n = 1, 2, …। उदाहरणतः a = 0.20 m के गोले और केंद्र से d = 0.50 m पर 10 nC आवेश के लिए प्रतिबिंब केंद्र से 0.08 m पर −4 nC है। समय-परिवर्ती क्षेत्रों में पूर्ण चालक विद्युतचुंबकीय द्विध्रुव का दर्पण-प्रतिबिंब बनाता है; परिमित चालक पृथ्वी के लिए सम्मिश्र प्रतिबिंब विधि त्वचा गहराई से तय सम्मिश्र गहराई लेती है।

⚠️ बल में प्रतिबिंब तक की दूरी, तल तक की नहीं
भूसंपर्कित तल के ऊपर आवेश पर बल में प्रतिबिंब तक की दूरी 2h ली जाती है; h लेने पर बल 4 गुना अधिक आँका जाता है। प्रतिबिंब क्षेत्र के बाहर रहता है और केवल एक युक्ति है: तल के नीचे क्षेत्र शून्य है।

7. विभव व समय-परिवर्ती क्षेत्र सिद्धांत में समाकल समीकरण

समाकल समीकरण (integral equation) में अज्ञात समाकल के भीतर होता है। प्रथम प्रकार के फ़्रेडहोम समीकरण f(x) = ∫ K(x, s) φ(s) ds में अज्ञात केवल समाकल के नीचे आता है; द्वितीय प्रकार φ(x) = f(x) + λ ∫ K(x, s) φ(s) ds में वह बाहर भी आता है। जो कर्नेल a(x)b(s) के रूप में वियोज्य हो, वह द्वितीय प्रकार को बीजगणित में बदल देता है। उदाहरण: φ(x) = x + ∫₀¹ x s φ(s) ds। समाकल एक संख्या C = ∫₀¹ s φ(s) ds है, अतः φ(x) = x(1 + C)। तब C = (1 + C) ∫₀¹ s² ds = (1 + C)/3, जिससे C = 1/2 और φ(x) = 1.5x मिलता है।

विभव सिद्धांत में अग्र समस्याएँ समाकल हैं: गुरुत्व विसंगति g(r) = G ∫ Δρ(r′)(z′ − z)/|r − r′|³ dV′, या पृष्ठ-परत का क्षेत्र। g से Δρ पाना प्रथम प्रकार का समीकरण है और अ-सुस्थित (ill-posed) है: कर्नेल चिकना करता है, इसलिए आँकड़ों की छोटी त्रुटियाँ मॉडल में बड़े परिवर्तन लाती हैं, और हल अनद्वितीय है, क्योंकि अनेक घनत्व वही बाह्य क्षेत्र देते हैं। इसे नियमितीकरण व बाध्यताएँ चाहिए। मॉडल को n कोष्ठों में विभक्त करने पर समीकरण आव्यूह समीकरण A m = d बनता है, और प्रथम-प्रकार का कर्नेल बुरी तरह दुःस्थित (ill-conditioned) A देता है।

समय-परिवर्ती क्षेत्रों में EM प्रकीर्णन का आयतन समाकल समीकरण E(r) = E_p(r) + ∫ Ĝ(r, r′) Δσ(r′) E(r′) dV′ है, जहाँ E_p पृष्ठभूमि का प्राथमिक क्षेत्र, Δσ विसंगत चालकता और Ĝ पृष्ठभूमि का ग्रीन फलन है। अज्ञात E विसंगत पिंड पर समाकल के भीतर आता है, अतः यह द्वितीय प्रकार का समीकरण है, और कोष्ठ केवल वहीं चाहिए। परिसीमा समाकल समीकरण 3-D समस्या को उसके पृष्ठों तक घटा देते हैं, जैसे V(r) = ∮ q_s/(4πε0|r − r′|) dS′ में चालक का अज्ञात पृष्ठ-आवेश q_s। दोनों कोष्ठ-विभाजन (आघूर्ण विधि) से हल होते हैं।

ℹ️ प्रथम प्रकार बनाम द्वितीय प्रकार
द्वितीय प्रकार के समीकरण में समाकल के बाहर तत्समक पद होता है और वह λ के विशेष मानों को छोड़कर सुस्थित (well-posed) है (फ़्रेडहोम विकल्प); चिकने कर्नेल वाले प्रथम प्रकार के समीकरण में वह पद नहीं होता और वह अ-सुस्थित है, जैसा गुरुत्व व चुंबकीय प्रतिलोमन में होता है, जिन्हें इसीलिए नियमितीकरण चाहिए।

मुख्य बिंदु

  • F = −∇φ संरक्षी है, ∇·B = 0 से B = ∇ × A मिलता है, स्रोत प्वासों समीकरण (∇²U = −4πGρ) देते हैं और मुक्त आकाश लाप्लास। प्रसंवादी फलनों के भीतर चरम मान नहीं होते। चिह्न-परिपाटी बताएँ: भूभौतिकी U = +GM/r, g = +∇U लेती है।
  • मैक्सवेल समीकरण हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण ∇²E + k²E = 0 देते हैं, k² = ω²με − iωμσ। विद्युतरोधी: k = ω/v = 2π/λ। अर्ध-स्थैतिक चालक: k² = −iωμσ, विसरण, त्वचा गहराई δ = √(2/(ωμσ)) ≈ 503 √(ρ/f) m।
  • चर-पृथक्करण: कार्तीय ज्या व चरघातांकी क्षय देता है, बेलनाकार ρⁿ cos nθ, ln ρ व बेसेल फलन, गोलीय (A r^l + B r^−(l+1)) P_l(cos θ)। केंद्र पर सीमितता व अनंत पर क्षय पदों को चुनते हैं।
  • बिंदु स्रोत: विभव 1/r, क्षेत्र 1/r²। द्विध्रुव: विभव 1/r², क्षेत्र 1/r³, अक्षीय क्षेत्र विषुवतीय का दुगुना। एकसमान गोला बाहर बिंदु द्रव्यमान की तरह है और भीतर g ∝ r; अनंत पट्टिका अचर 2πGσ देती है।
  • गाउस: ∮F·n dS = ∫∇·F dV। ग्रीन का दूसरा तत्समक ग्रीन निरूपण देता है और पहला अद्वितीयता: डिरिख्ले आँकड़े φ को निश्चित करते हैं, न्यूमान आँकड़े अचर तक, और लाप्लास समीकरण में उनका कुल अभिवाह शून्य होना चाहिए।
  • प्रतिबिंब: भूसंपर्कित तल पर दर्पण-बिंदु पर −q, बल q²/(4πε0(2h)²); विद्युतरोधी तल पर +q; भूसंपर्कित गोले में a²/d पर −qa/d; अंतरापृष्ठ पर kq, k = (ρ2 − ρ1)/(ρ2 + ρ1)। द्वितीय प्रकार के समाकल समीकरण सुस्थित हैं, प्रथम प्रकार के (गुरुत्व व चुंबकीय प्रतिलोमन) अ-सुस्थित।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. एक आदर्श बिंदु विद्युत द्विध्रुव की अक्ष के अनुदिश बड़ी दूरी r पर स्थिरविद्युत विभव r के साथ कैसे बदलता है?

    1. 1/r की भाँति, ठीक एकल बिंदु आवेश के विभव की तरह
    2. 1/r³ की भाँति, ठीक द्विध्रुव के अपने विद्युत क्षेत्र की तरह
    3. 1/r² की भाँति, क्योंकि दोनों विपरीत आवेश अग्रणी 1/r पद को निरस्त कर देते हैं
    4. ln r की भाँति, ठीक आवेश की अनंत रेखा के विभव की तरह
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — 1/r² की भाँति, क्योंकि दोनों विपरीत आवेश अग्रणी 1/r पद को निरस्त कर देते हैं

    +q व −q के 1/r पद निरस्त हो जाते हैं और द्विध्रुव पद V = p cos θ/(4πε0 r²) बचता है, अतः अक्ष के अनुदिश विभव 1/r² से घटता है। 1/r³ नियम द्विध्रुव-क्षेत्र का क्षय है, जो क्षेत्र व विभव का भ्रामक घालमेल है। ln r नियम द्वि-विमीय रेखा-स्रोत का है।
  2. त्रिज्या a के ठोस गोले का घनत्व एकसमान है और M उसका कुल द्रव्यमान है। गोले के भीतर, 0 < r < a के लिए, गुरुत्वीय त्वरण कैसे बदलता है?

    1. यह r के साथ रैखिक बढ़ता है, केंद्र पर शून्य से सतह पर GM/a² तक
    2. यह भीतर सर्वत्र शून्य है, ठीक जैसे पतले एकसमान गोलीय कोश के भीतर होता है
    3. यह सतह के मान GM/a² के बराबर बना रहता है, क्योंकि गोले का कुल द्रव्यमान अपरिवर्तित है
    4. यह केंद्र की ओर 1/r² से बढ़ता है, क्योंकि द्रव्यमान-केंद्र तक दूरी घटती जाती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — यह r के साथ रैखिक बढ़ता है, केंद्र पर शून्य से सतह पर GM/a² तक

    केवल त्रिज्या r के भीतर का द्रव्यमान आकर्षित करता है (बाहर का कोश कुछ योगदान नहीं देता), अतः g = G(4πr³ρ/3)/r² = (4/3)πGρ r, r में रैखिक और r = a पर GM/a² के बराबर। शून्य क्षेत्र खोखले कोश का परिणाम है, ठोस गोले का नहीं। अचर g के लिए समस्त द्रव्यमान को प्रत्येक गहराई पर कार्य करना पड़ता।
  3. एक आदर्श बिंदु द्विध्रुव के लिए द्विध्रुव-अक्ष पर दूरी r पर विद्युत क्षेत्र के परिमाण की तुलना विषुवतीय तल पर उसी दूरी r के क्षेत्र से की जाती है। अनुपात (अक्ष : विषुवत) क्या है?

    1. आधा, क्योंकि अक्ष द्विध्रुव के अनुदिश है जबकि विषुवत उसके आर-पार
    2. एक, क्योंकि दोनों बिंदु द्विध्रुव के केंद्र से समान दूरी r पर हैं
    3. चार, क्योंकि द्विध्रुव का क्षेत्र उसके केंद्र से दूरी के घन के रूप में घटता है
    4. दो, क्योंकि अक्ष पर E = 2p/(4πε0 r³) है और विषुवतीय तल पर E = p/(4πε0 r³)
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — दो, क्योंकि अक्ष पर E = 2p/(4πε0 r³) है और विषुवतीय तल पर E = p/(4πε0 r³)

    अक्ष पर (θ = 0) E = 2p/(4πε0 r³); विषुवतीय तल पर (θ = 90°) E = p/(4πε0 r³)। अनुपात 2 है। समान दूरी का अर्थ समान क्षेत्र नहीं, क्योंकि द्विध्रुव-क्षेत्र विषमदैशिक है, और r⁻³ नियम केवल यह बताता है कि प्रत्येक मान r के साथ कैसे घटता है।
  4. एक विभव पट्टी 0 < x < a, y > 0 में लाप्लास समीकरण को संतुष्ट करता है। वह x = 0 पर, x = a पर और y → ∞ पर शून्य है। कौन-सा रूप स्वीकार्य पृथक्कृत हल है?

    1. sinh(nπx/a) sin(nπy/a), जो x के अतिपरवलयिक फलन व y के ज्या फलन का गुणनफल है
    2. sin(nπx/a) exp(−nπy/a), x में ज्या जो दोनों किनारों पर लुप्त होती है और y में क्षय
    3. cos(nπx/a) exp(−nπy/a), x में कोज्या जो y बढ़ने पर घटती है
    4. sin(nπx/a) exp(+nπy/a), x में ज्या जो y के साथ चरघातांकी बढ़ती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — sin(nπx/a) exp(−nπy/a), x में ज्या जो दोनों किनारों पर लुप्त होती है और y में क्षय

    x = 0 व x = a पर शून्य होने से X = sin(nπx/a) बाध्य होता है, अतः Y″ = +(nπ/a)²Y और Y चरघातांकी है। y → ∞ पर लुप्त होने की शर्त से केवल exp(−nπy/a) बचता है। शेष तीनों लाप्लास समीकरण को संतुष्ट करते हैं पर शर्तों को नहीं: कोज्या x = 0 पर शून्य नहीं है, बढ़ती चरघातांकी y → ∞ पर अपसृत होती है, और sinh(nπx/a) sin(nπy/a) x = a पर शून्य नहीं है और बड़े y पर लुप्त नहीं होता।
  5. समतल निर्देशांकों के निम्न फलनों में से, r = √(x² + y²) के साथ, कौन-सा मूल-बिंदु से दूर द्वि-विमा में लाप्लास समीकरण को संतुष्ट करता है?

    1. x² + y², जिसके x व y के प्रति द्वितीय अवकलज दोनों धनात्मक हैं
    2. स्वयं r, जो मूल-बिंदु से दूर सुचारु व सममित रूप से बढ़ता है
    3. 1/r, जो मूल-बिंदु से दूर सुचारु व सममित रूप से घटता है
    4. x² − y², जिसके x व y द्वितीय अवकलज बराबर व विपरीत हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — x² − y², जिसके x व y द्वितीय अवकलज बराबर व विपरीत हैं

    x² − y² के लिए द्वितीय अवकलज +2 व −2 हैं, अतः ∇² = 0। x² + y² के लिए यह 4 है, r के लिए 1/r और 1/r के लिए द्वि-विमा में 1/r³, इसलिए इनमें कोई प्रसंवादी नहीं। द्वि-विमीय अरीय सममित प्रसंवादी फलन ln r है, 1/r नहीं, जो त्रि-विमा से लाया गया भ्रामक रूप है।
  6. एक एकसमान चालक पृथ्वी की निम्न आवृत्ति पर जाँच की जाती है, जिससे विस्थापन धारा चालन धारा के सामने नगण्य है। समय-निर्भरता exp(iωt) वाले विद्युत क्षेत्र E के लिए कौन-सा कथन सही है?

    1. E तरंग समीकरण ∇²E = με ∂²E/∂t² का पालन करता है और गति 1/√(με) से बिना अवमंदन के संचरित होता है
    2. E विसरण समीकरण का पालन करता है, जो हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण ∇²E + k²E = 0, k² = −iωμσ, के तुल्य है, अतः वह अवमंदित है
    3. E लाप्लास समीकरण ∇²E = 0 का पालन करता है क्योंकि निम्न आवृत्ति पर क्षेत्र प्रभावी रूप से स्थैतिक होते हैं
    4. E हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण का पालन करता है जिसमें वास्तविक k = ω√(με) है, अतः गहराई के साथ केवल उसकी कला बदलती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — E विसरण समीकरण का पालन करता है, जो हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण ∇²E + k²E = 0, k² = −iωμσ, के तुल्य है, अतः वह अवमंदित है

    ∂²E/∂t² हटाने पर ∇²E = μσ ∂E/∂t बचता है। exp(iωt) के साथ यह ∇²E + k²E = 0, k² = −iωμσ, है, अतः k सम्मिश्र है जिसके वास्तविक व काल्पनिक भाग बराबर हैं और आयाम त्वचा गहराई पर घटता है। तरंग समीकरण व वास्तविक-k वाला हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण विद्युतरोधी माध्यम के हैं, और लाप्लास समीकरण समय-परिवर्तन को पूरी तरह अनदेखा करता।
  7. एक फलन φ बंद क्षेत्र V के भीतर लाप्लास समीकरण को संतुष्ट करता है और संपूर्ण परिसीमा S पर φ = 0 है। ग्रीन का पहला तत्समक V के भीतर φ के बारे में क्या दर्शाता है?

    1. φ भीतर फिर भी धनात्मक हो सकता है, क्योंकि प्रसंवादी फलन को आंतरिक उच्चिष्ठ की अनुमति है
    2. φ भीतर अशून्य हो सकता है, क्योंकि केवल लाप्लास समीकरण आरंभिक प्रतिबंधों के बिना हल निश्चित नहीं कर सकता
    3. V में सर्वत्र φ = 0, क्योंकि ∫|∇φ|² dV = ∮ φ ∂φ/∂n dS = 0
    4. φ एक अचर है जो केवल योज्य अचर तक निश्चित है, जैसा परिसीमा पर न्यूमान आँकड़ों के लिए होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — V में सर्वत्र φ = 0, क्योंकि ∫|∇φ|² dV = ∮ φ ∂φ/∂n dS = 0

    पहले तत्समक में ψ = φ रखें: ∫(φ∇²φ + |∇φ|²) dV = ∮ φ ∂φ/∂n dS। ∇²φ = 0 व S पर φ = 0 होने से दायाँ पक्ष लुप्त है, अतः ∫|∇φ|² dV = 0 और φ अचर है, इसलिए शून्य क्योंकि S पर शून्य है। प्रसंवादी फलनों के आंतरिक उच्चिष्ठ वर्जित हैं। योज्य अचर न्यूमान समस्या का है, जहाँ S पर φ स्वयं नहीं दिया होता।
  8. बिंदु आवेश q, त्रिज्या a के भूसंपर्कित चालक गोले के केंद्र से दूरी d पर है, d > a। गोले पर शून्य विभव को कौन-सा प्रतिबिंब आवेश पुनः उत्पन्न करता है?

    1. −qa/d, केंद्र से q तक जाने वाली रेखा पर केंद्र से दूरी a²/d पर रखा हुआ
    2. −q, सतह में q के दर्पण-बिंदु पर, केंद्र से दूरी 2a − d पर रखा हुआ
    3. −qd/a, केंद्र से q तक जाने वाली रेखा पर केंद्र से दूरी a²/d पर रखा हुआ
    4. +qa/d, केंद्र से q तक जाने वाली रेखा पर केंद्र से दूरी a²/d पर रखा हुआ
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — −qa/d, केंद्र से q तक जाने वाली रेखा पर केंद्र से दूरी a²/d पर रखा हुआ

    प्रतिबिंब q′ = −qa/d, केंद्र से a²/d पर है। रेखा पर निकट के पृष्ठ-बिंदु पर जाँच: q तक दूरी d − a और प्रतिबिंब तक a − a²/d = a(d − a)/d है, अतः विभव q/(d − a) − (qa/d) × d/[a(d − a)] = 0 के अनुपाती हैं। दूर वाला पृष्ठ-बिंदु भी इसी प्रकार d + a व a(d + a)/d से निरस्त होता है। समतल का नियम (दर्पण-बिंदु पर −q) केवल समतल के लिए है, और +qa/d विभव को निरस्त करने के बजाय बढ़ाता।
  9. मापी गई गुरुत्व विसंगति से घनत्व-वितरण पाना प्रथम प्रकार के फ़्रेडहोम समीकरण से वर्णित होता है। इस प्रतिलोम समस्या को अ-सुस्थित (ill-posed) क्यों कहा जाता है?

    1. आँकड़ों की छोटी त्रुटियाँ पुनःप्राप्त घनत्व में बड़े परिवर्तन ला सकती हैं, और अनेक घनत्व उन्हीं आँकड़ों से मेल खाते हैं
    2. समाकल का कर्नेल सममित नहीं है, इसलिए किसी भी गुरुत्व आँकड़े के लिए समीकरण का कोई हल अस्तित्व में नहीं हो सकता
    3. समीकरण में समाकल के बाहर तत्समक पद है, जो हल को असीमित रूप से बढ़ा देता है
    4. गुरुत्व सदिश क्षेत्र है, इसलिए घनत्व केवल मापे गए घटक की दिशा में ही पुनःप्राप्त हो सकता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — आँकड़ों की छोटी त्रुटियाँ पुनःप्राप्त घनत्व में बड़े परिवर्तन ला सकती हैं, और अनेक घनत्व उन्हीं आँकड़ों से मेल खाते हैं

    गुरुत्व का कर्नेल चिकना करता है, इसलिए प्रतिलोमन शोर को बढ़ाता है (अस्थिरता), और गाउस प्रमेय व समतुल्य-परत की धारणा से भिन्न घनत्व-वितरण समान बाह्य क्षेत्र देते हैं (अनद्वितीयता)। समाकल के बाहर तत्समक पद वाला द्वितीय प्रकार का समीकरण सुस्थित प्रकार है। कर्नेल की सममिति और g की सदिश प्रकृति कारण नहीं हैं।
  10. मैक्सवेल समीकरणों व हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. चूँकि ∇·B = 0, चुंबकीय प्रेरण को सदा किसी सदिश विभव A के लिए B = ∇ × A लिखा जा सकता है
    2. विद्युतरोधी एकसमान माध्यम में, exp(iωt) समय-निर्भरता के लिए, E का प्रत्येक कार्तीय घटक k = ω√(με) के साथ ∇²E + k²E = 0 का पालन करता है
    3. समय-परिवर्ती क्षेत्र में E कर्ल-रहित रहता है, इसलिए उसे सदा केवल −∇V लिखा जा सकता है, किसी सदिश-विभव पद के बिना
    4. अर्ध-स्थैतिक सीमा में तरंग-संख्या k = √(−iωμσ) वास्तविक है, इसलिए क्षेत्र बिना क्षीणन के संचरित होते हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — चूँकि ∇·B = 0, चुंबकीय प्रेरण को सदा किसी सदिश विभव A के लिए B = ∇ × A लिखा जा सकता है; B — विद्युतरोधी एकसमान माध्यम में, exp(iωt) समय-निर्भरता के लिए, E का प्रत्येक कार्तीय घटक k = ω√(με) के साथ ∇²E + k²E = 0 का पालन करता है

    ∇·B = 0 से B = ∇ × A मिलता है, और विद्युतरोधी माध्यम का तरंग समीकरण वास्तविक k वाले हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण में बदल जाता है। समय-परिवर्ती क्षेत्र में ∇ × E = −∂B/∂t ≠ 0, इसलिए E को −∂A/∂t पद भी चाहिए। अर्ध-स्थैतिक सीमा में k = √(ωμσ/2)(1 − i) सम्मिश्र है, जिसका अर्थ त्वचा गहराई पर क्षीणन है।
  11. स्रोत-रहित आंतरिक क्षेत्र हेतु ग्रीन तत्समकों व परिसीमा-मान समस्याओं के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. ग्रीन का दूसरा तत्समक ∫(φ∇²ψ − ψ∇²φ) dV = ∮(φ ∂ψ/∂n − ψ ∂φ/∂n) dS है
    2. लाप्लास समीकरण की आंतरिक डिरिख्ले समस्या, जिसमें परिसीमा पर φ दिया हो, का एक अद्वितीय हल होता है
    3. लाप्लास समीकरण की आंतरिक न्यूमान समस्या का हल केवल एक योज्य अचर तक अद्वितीय होता है
    4. लाप्लास समीकरण की आंतरिक न्यूमान समस्या में परिसीमा पर ∂φ/∂n मनमाने ढंग से निर्धारित किया जा सकता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — ग्रीन का दूसरा तत्समक ∫(φ∇²ψ − ψ∇²φ) dV = ∮(φ ∂ψ/∂n − ψ ∂φ/∂n) dS है; B — लाप्लास समीकरण की आंतरिक डिरिख्ले समस्या, जिसमें परिसीमा पर φ दिया हो, का एक अद्वितीय हल होता है; C — लाप्लास समीकरण की आंतरिक न्यूमान समस्या का हल केवल एक योज्य अचर तक अद्वितीय होता है

    दूसरा तत्समक सही कहा गया है, डिरिख्ले समस्या अद्वितीय है (दो हलों का अंतर पहले तत्समक से शून्य है), और न्यूमान हल एक अचर तक अद्वितीय है। न्यूमान आँकड़े मनमाने नहीं हो सकते: भीतर कोई स्रोत न होने से अपसरण प्रमेय ∮ ∂φ/∂n dS = ∫∇²φ dV = 0 बाध्य करता है।
  12. प्रतिबिंब विधि के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. अनंत भूसंपर्कित चालक तल के ऊपर बिंदु आवेश q का प्रतिबिंब आवेश तल में q के दर्पण-बिंदु पर −q होता है
    2. भूसंपर्कित चालक तल पर प्रेरित कुल आवेश −q के बराबर होता है, जो बिंदु आवेश का ऋणात्मक है
    3. विद्युतरोधी वायु के नीचे एकसमान अर्ध-आकाश पर सतही धारा-इलेक्ट्रोड के लिए प्रतिबिंब का चिह्न वही रहता है और पूर्ण-आकाश का विभव दुगुना हो जाता है
    4. भूसंपर्कित तल के ऊपर आवेश पर बल q²/(4πε0 h²) है, जहाँ h तल से आवेश की ऊँचाई है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — अनंत भूसंपर्कित चालक तल के ऊपर बिंदु आवेश q का प्रतिबिंब आवेश तल में q के दर्पण-बिंदु पर −q होता है; B — भूसंपर्कित चालक तल पर प्रेरित कुल आवेश −q के बराबर होता है, जो बिंदु आवेश का ऋणात्मक है; C — विद्युतरोधी वायु के नीचे एकसमान अर्ध-आकाश पर सतही धारा-इलेक्ट्रोड के लिए प्रतिबिंब का चिह्न वही रहता है और पूर्ण-आकाश का विभव दुगुना हो जाता है

    प्रतिबिंब दर्पण-बिंदु पर −q है, प्रेरित आवेश कुल −q है, और विद्युतरोधी परिसीमा को समान-चिह्न प्रतिबिंब चाहिए, जो विभव को दुगुना करता है (Iρ/2πr बनाम Iρ/4πr)। बल में प्रतिबिंब तक की दूरी 2h ली जाती है, अतः वह q²/(4πε0 (2h)²) है, उद्धृत मान का एक-चौथाई।
  13. त्रिज्या a के गोले की सतह पर विभव φ(a, θ) = V0 cos θ है, V0 = 80 V। विभव केंद्र पर सीमित है और अनंत पर शून्य की ओर जाता है, और गोले के बाहर वह लाप्लास समीकरण को संतुष्ट करता है। r = 2a, θ = 60° पर विभव, वोल्ट में, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 10

    केवल l = 1 पद cos θ से मेल खाता है। बाहर, अनंत पर लुप्त होने वाला हल φ = V0 (a/r)² cos θ है, जो r = a पर V0 cos θ के बराबर है। r = 2a व θ = 60° पर: φ = 80 × (1/2)² × cos 60° = 80 × 0.25 × 0.5 = 10 V। भीतरी रूप (r/a) लेने पर 80 × 2 × 0.5 = 80 V आता, जो r के साथ गलत ढंग से बढ़ता है।
  14. 50 Hz आवृत्ति की एकवर्णी तरंग उस माध्यम में अदिश हेल्महोल्ट्ज़ समीकरण ∇²p + k²p = 0 का पालन करती है जहाँ तरंग-वेग 2500 m/s है। तरंग-संख्या k का परिमाण, rad/km में निकटतम पूर्ण संख्या तक, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 126

    k = ω/c = 2πf/c = 2π × 50/2500 = 0.1257 rad/m। rad/km में यह 125.66 है, यानी 126। 0.126 बताना किलोमीटर में बदलना भूलना है, और f/c = 0.02 लेना 2π छोड़ना है, जो चक्र प्रति मीटर होता।
  15. मान लीजिए φ = x² + 2y² + 3z² (लंबाइयाँ मीटर में)। घन −1 ≤ x, y, z ≤ 1 के पृष्ठ पर बहिर्गामी अभिलंब अवकलज का पृष्ठ-समाकल ∮ ∂φ/∂n dS ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 96

    अपसरण प्रमेय से ∮ ∇φ·n dS = ∫ ∇²φ dV। यहाँ ∇²φ = 2 + 4 + 6 = 12 और घन का आयतन 2³ = 8 है, अतः समाकल 96 है। फलकों से जाँच: दो x-फलक 2 × (2 × 4) = 16, दो y-फलक 2 × (4 × 4) = 32 और दो z-फलक 2 × (6 × 4) = 48 देते हैं, कुल 96।
  16. बिंदु आवेश q = 2.0 nC एक बड़े भूसंपर्कित चालक तल से 0.50 m ऊपर थामा गया है। 1/(4πε0) = 9.0 × 10⁹ N·m²/C² लीजिए। आवेश पर बल का परिमाण, nN में, ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 36

    प्रतिबिंब गहराई 0.50 m पर −2.0 nC है, अतः पृथकन 2h = 1.00 m है। F = 9.0 × 10⁹ × (2.0 × 10⁻⁹)²/1.00² = 3.6 × 10⁻⁸ N = 36 nN, तल की ओर। 2h की जगह h = 0.50 m लेने पर 144 nN आता।
  17. फलन φ, 0 ≤ x ≤ 1 के लिए, समाकल समीकरण φ(x) = 1 + 2 ∫₀¹ x s φ(s) ds को संतुष्ट करता है। मान φ(1) ____ है।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 4

    समाकल एक संख्या C = ∫₀¹ s φ(s) ds है, अतः φ(x) = 1 + 2Cx। तब C = ∫₀¹ s(1 + 2Cs) ds = 1/2 + 2C/3, जिससे C/3 = 1/2 और C = 3/2। इसलिए φ(x) = 1 + 3x और φ(1) = 4। जाँच: ∫₀¹ s(1 + 3s) ds = 1/2 + 1 = 3/2।