ऊष्मा-प्रवाह: भूतापीय वक्र, अर्ध-समष्टि शीतलन, संवहन, रुद्धोष्म वक्र व प्रावार गलन

यह अध्याय भूविज्ञान एवं भूभौतिकी (GG) पेपर के भाग B2 के शीर्षक “Heat flow” का उत्तर देता है: “प्रावार व क्रोड के भीतर चालन व संवहन के तत्त्व, अर्ध-समष्टि शीतलन, सरल भूतापीय वक्रों की गणना, भू-तापीय प्रवणता, साम्यावस्था भूतापीय वक्र, प्लेट विवर्तनिकी में तापीय मॉडल, रुद्धोष्म वक्र तथा प्रावार में गलन।” इसमें फ़ूरियर का नियम व ऊष्मा-समीकरण, रेडियोजनित ऊष्मा सहित व रहित स्थायी-अवस्था भूतापीय वक्र, अर्ध-समष्टि शीतलन का हल व प्लेट मॉडल, प्रावार व क्रोड में संवहन व रैले संख्या (Rayleigh number), रुद्धोष्म वक्र, तथा प्रावार के गलने की प्रक्रिया पढ़ाई गई है। संख्यात्मक प्रश्न हैं: भूतापीय वक्र के तापमान, त्रुटि-फलन (error function) वाला तापमान-प्रोफ़ाइल, आयु से स्थलमंडल की मोटाई, रुद्धोष्म प्रवणता तथा रैले संख्या।

1. पृथ्वी में ऊष्मा: स्रोत, फ़ूरियर का नियम व पृष्ठीय ऊष्मा-प्रवाह

पृथ्वी अपनी सतह से लगभग 45 TW ऊष्मा खोती है, अर्थात् माध्य ऊष्मा-प्रवाह (heat flow) लगभग 0.09 W/m² (87 mW/m²)। यह माध्य महाद्वीपों पर लगभग 65 mW/m² और महासागरीय तल पर लगभग 100 mW/m² है, जहाँ रेडियोधर्मी भूपर्पटी लगभग नहीं है परंतु तल युवा है और अब भी ठंडा हो रहा है। ऊष्मा यूरेनियम, थोरियम व पोटैशियम के क्षय से, दीर्घकालिक शीतलन (secular cooling) से (निर्माण की संचित ऊष्मा का पृथ्वी के ठंडा होने पर निकलना) तथा अंतः क्रोड के बढ़ने पर निकली गुप्त ऊष्मा व गुरुत्वीय ऊर्जा से आती है। इन स्रोतों में कुल का बँटवारा अब भी विवादित है, अतः परीक्षा प्रतिशत नहीं, क्रियाविधियाँ पूछती है।

चालन हेतु फ़ूरियर का नियम (Fourier’s law) q = −k dT/dz है: ऊष्मा-फ्लक्स (W/m²) तापमान-प्रवणता के अनुदिश उच्च से निम्न ताप की ओर बहता है और उसके अनुक्रमानुपाती होता है, अनुपात-स्थिरांक ऊष्मा-चालकता (thermal conductivity) k है (भूपर्पटी की चट्टान हेतु सामान्यतः 2 से 3 W m⁻¹ K⁻¹)। z को नीचे की ओर मापने व ऊपर की ओर प्रवाह को धनात्मक गिनने पर परिमाण q = k dT/dz होता है, अतः भू-तापीय प्रवणता (geothermal gradient) dT/dz = q/k है। 60 mW/m² ऊष्मा-प्रवाह व k = 2.5 W/m/K से 24 K/km मिलता है, जो सतह के पास प्रेक्षित 20 से 30 K/km के निकट है। फ़ूरियर नियम व ऊर्जा-संरक्षण से ऊष्मा-समीकरण (heat equation) ∂T/∂t = κ ∂²T/∂z² + A/(ρ c_p) बनता है, जहाँ κ = k/(ρ c_p) ऊष्मीय विसरणशीलता (thermal diffusivity) है (चट्टान हेतु लगभग 10⁻⁶ m²/s) और A प्रति इकाई आयतन रेडियोजनित ऊष्मा-उत्पादन (W/m³) है: महाद्वीपीय भूपर्पटी में लगभग 1 µW/m³ की कोटि का और प्रावार-पेरिडोटाइट में कई कोटि कम।

⚠️ मान रखने से पहले इकाइयाँ बदलें
1 ऊष्मा-प्रवाह इकाई (HFU) = 1 µcal cm⁻² s⁻¹ = 41.84 mW/m²। सबसे प्रचलित संख्यात्मक भूल mW/m² को W/m² से मिला देना है। पहले mW/m² को W/m², km को m और µW/m³ को W/m³ में बदलें, फिर जाँचें कि उत्तर की इकाई तापमान की है।

2. सरल भूतापीय वक्र: रेडियोजनित ऊष्मा सहित व रहित स्थायी अवस्था तथा साम्यावस्था भूतापीय वक्र

भूतापीय वक्र (geotherm) तापमान–गहराई का वक्र है। स्थायी अवस्था (steady state) (∂T/∂t = 0) में ऊष्मा-समीकरण k d²T/dz² = −A रह जाता है। मान लें T₀ सतह का तापमान और q₀ सतही ऊष्मा-प्रवाह है।

  • ऊष्मा-उत्पादन नहीं (A = 0): प्रवणता स्थिर रहती है और T(z) = T₀ + q₀ z/k, यानी q₀/k ढाल की सरल रेखा।
  • एकसमान A: ऊपर की ओर का फ्लक्स गहराई के साथ q(z) = q₀ − A z के अनुसार घटता है, क्योंकि ऊपर उत्पन्न ऊष्मा नीचे से नहीं आती। दो बार समाकलन से T(z) = T₀ + q₀ z/k − A z²/(2k) मिलता है। प्रवणता (q₀ − A z)/k गहराई के साथ घटती है।
  • चरघातांकी घटता A = A₀ e^(−z/h): T(z) = T₀ + q_r z/k + (A₀ h²/k)(1 − e^(−z/h)), जहाँ q₀ = q_r + A₀ h। न्यूनीकृत ऊष्मा-प्रवाह (reduced heat flow) q_r वह फ्लक्स है जो रेडियोजनित परत में नीचे से प्रवेश करता है, और अनेक ऊष्मा-प्रवाह प्रांतों में h लगभग 10 km है।

हल उदाहरण। q₀ = 60 mW/m², k = 3.0 W/m/K, A = 1.0 µW/m³, T₀ = 0 °C, गहराई 35 km (मोहो की गहराई)। ऊष्मा-उत्पादन के बिना T = 0.060 × 35 000 / 3.0 = 700 °C। उसके साथ A z²/(2k) = 1.0×10⁻⁶ × (35 000)² / 6.0 ≈ 204 °C घटाएँ, तो T ≈ 496 °C, और 35 km तक पहुँचने वाला फ्लक्स 60 − 35 = 25 mW/m² है। समान सतही ऊष्मा-प्रवाह पर भूपर्पटी का ऊष्मा-उत्पादन गहरे तापमान को घटाता है, क्योंकि नीचे से कम ऊष्मा आनी होती है।

साम्यावस्था भूतापीय वक्र (equilibrium geotherm) वह स्थायी-अवस्था भूतापीय वक्र है जिसे स्थलमंडल तब पाता है जब नीचे से आती ऊष्मा और भीतर उत्पन्न ऊष्मा का योग सतह पर खोई ऊष्मा के बराबर हो। भूपर्पटी के मोटे होने, विदरण या अंतर्वेधन जैसा विक्षोभ L²/κ की कोटि के समय में मिटता है: L = 100 km व κ = 10⁻⁶ m²/s हेतु यह 10¹⁶ s, यानी लगभग 300 Myr है, अतः पुराना स्थलमंडल बहुत लंबे समय तक साम्य से बाहर रह सकता है। साम्य पर कम q₀ का अर्थ अधिक ठंडा व मोटा स्थलमंडल है। क्रेटनों में q₀ लगभग 40 mW/m² होता है और उनके तापीय स्थलमंडल का आधार, जहाँ भूतापीय वक्र प्रावार के रुद्धोष्म वक्र से मिलता है (लगभग 1300 °C समतापी के निकट), 200 km या अधिक पर होता है; तप्त विस्तारित भूखंडों में स्थलमंडल पतला होता है।

3. अर्ध-समष्टि शीतलन व महासागरीय स्थलमंडल

नया महासागरीय तल कटक पर प्रावार-तापमान T_m पर बनता है और फिर ऊपर से ठंडा होता है। इसे अर्ध-समष्टि (half-space) z ≥ 0 मानें, जो t = 0 पर एकसमान T_m पर है और बाद में जिसकी सतह T₀ (समुद्री जल) पर बँधी रहती है। स्रोत-रहित चालन ∂T/∂t = κ ∂²T/∂z² समानता-चर z/(2√(κt)) से हल होता है और देता है T(z, t) = T₀ + (T_m − T₀) erf( z / (2√(κt)) ), जहाँ erf(0) = 0 व erf(∞) = 1। यहाँ t समुद्री तल की आयु है, यानी कटक से दूरी को प्रसरण-दर से भाग देने पर।

त्रुटि-फलन (error function) के मान
η = z / 2√(κt)erf(η)अर्थ
0.50.520तापमान T₀ से T_m की ओर 52% पर है
1.00.84384% पर
1.1630.90090%: तापीय स्थलमंडल का परंपरागत आधार
2.00.995लगभग प्रावार-तापमान पर
  • समतापी की गहराई z ∝ √(κt): आयु चौगुनी करने पर प्रत्येक समतापी की गहराई दुगुनी हो जाती है। 90% कसौटी से मोटाई z_L = 2.32 √(κt) है। κ = 10⁻⁶ m²/s व 100 Myr (3.15×10¹⁵ s) हेतु यह 2.32 × 56.1 km ≈ 130 km है।
  • पृष्ठीय ऊष्मा-प्रवाह q(t) = k (T_m − T₀)/√(π κ t) ∝ t^(−1/2): सामान्य स्थिरांकों हेतु लगभग 0.4 से 0.5 W/m² को √(Myr में आयु) से भाग देने पर, अतः 20 Myr पर 100 mW/m² के निकट।
  • समुद्री तल की गहराई √t से बढ़ती है क्योंकि ठंडा होता स्तंभ सिकुड़ता है: लगभग 70 Myr तक की आयु हेतु d ≈ 2500 + 350 √t मीटर (t Myr में), अतः महासागरीय तल कटक-शीर्ष से बाहर की ओर गहरा होता जाता है।

हल उदाहरण। T_m = 1300 °C, T₀ = 0 °C लें और ऐसी आयु जिस पर 2√(κt) = 80 km हो। z = 40 km पर η = 0.5 व erf(0.5) = 0.5205, अतः T = 0.5205 × 1300 ≈ 677 °C। z = 80 km पर η = 1 और T = 0.843 × 1300 ≈ 1096 °C।

4. प्लेट विवर्तनिकी में तापीय मॉडल: प्लेट मॉडल, कटक, स्लैब व महाद्वीप

लगभग 70 Myr के बाद समुद्री तल की गहराई व ऊष्मा-प्रवाह √t का अनुसरण छोड़कर समतल हो जाते हैं। प्लेट मॉडल (plate model) स्थलमंडल को निश्चित मोटाई (लगभग 100 km की कोटि) की ऐसी प्लेट मानता है जिसका आधार T_m पर बँधा है, अतः ऊष्मा नीचे से मिलती है। यह युवा आयु हेतु अर्ध-समष्टि शीतलन से सहमत है और पुरानी आयु पर स्थायी अवस्था की ओर जाता है, जिसमें भूतापीय वक्र रैखिक, ऊष्मा-प्रवाह स्थिर व गहराई स्थिर होती है। युवा महासागरीय तल पर मापा ऊष्मा-प्रवाह पूर्वानुमान से कम भी दिखता है, क्योंकि भूपर्पटी की दरारों में बहता समुद्री जल ऊष्मा बहा ले जाता है (जलतापीय परिसंचरण, hydrothermal circulation) और चालन-जाँचक उसे नहीं देख पाते।

अर्ध-समष्टि शीतलन व प्लेट मॉडल की तुलना
विशेषताअर्ध-समष्टि शीतलनप्लेट मॉडल
निचली सीमाकोई नहीं: अर्ध-अनंतT_m पर बँधा निश्चित प्लेट-आधार
आयु के साथ मोटाई√t से बिना सीमा बढ़ती हैएक स्थिरांक की ओर जाती है
पुरानी आयु का ऊष्मा-प्रवाहt^(−1/2) से घटता रहता हैस्थिर मान पर समतल
पुरानी आयु की गहराई√t से गहरी होती रहती हैसमतल हो जाती है
  • अधःक्षेपण मंडल: स्लैब चालन से गर्म होने की तुलना में तेज़ी से डूबता है, अतः वह ठंडा बना रहता है, इसीलिए टोमोग्राफी में वह उच्च-वेग विसंगति दिखता है। ठंडक कितनी गहराई तक बचती है, यह तापीय प्राचल, यानी प्लेट की आयु × उसकी ऊर्ध्वाधर अवतलन-दर, के साथ बदलता है।
  • महाद्वीप: खंड 2 का साम्यावस्था भूतापीय वक्र, रेडियोजनित भूपर्पटी सहित। कटक व प्लूम: तप्त प्रावार ऊपर उठता है, गलता है, और नई प्लेट फिर ऊपर वर्णित ढंग से ठंडी होती है।
⚠️ पुराने महासागरीय तल पर अर्ध-समष्टि शीतलन न लगाएँ
√t व t^(−1/2) नियम युवा समुद्री तल हेतु हैं। बड़ी आयु पर अर्ध-समष्टि सूत्र अधिकाधिक मोटे स्थलमंडल व अधिकाधिक कम ऊष्मा-प्रवाह का पूर्वानुमान देते हैं, पर वास्तविक प्लेटें लगभग 100 km पर समतल हो जाती हैं, और प्लेट मॉडल का अस्तित्व इसी कारण है।

5. प्रावार व क्रोड में चालन व संवहन

जब श्यान अवरोध व ऊष्मीय विसरण जीतते हैं तो ऊष्मा चालन से चलती है, और जब उत्प्लावन जीतता है तो संवहन से। इस होड़ को रैले संख्या (Rayleigh number) Ra = ρ g α ΔT d³ / (κ η) मापती है, जहाँ α ऊष्मीय प्रसार-गुणांक, ΔT मोटाई d की परत के आर-पार तापांतर और η गतिक श्यानता (dynamic viscosity) है। संवहन तब शुरू होता है जब Ra एक क्रांतिक मान, जो 10³ की कोटि का है, से अधिक हो (सटीक मान सीमा-शर्तों पर निर्भर है)। Ra, d³ के साथ बढ़ती और 1/η के साथ घटती है। संपूर्ण प्रावार (η लगभग 10²¹ Pa s की कोटि) हेतु Ra लगभग 10⁷ की कोटि की है, क्रांतिक से बहुत ऊपर, अतः संवहन प्रबल है; उसकी सतही अभिव्यक्ति कुछ cm/yr की प्लेट-गति है।

  • प्रावार: तप्त पदार्थ प्लूमों में ऊपर उठता है और ठंडा स्थलमंडल अधःक्षेपण मंडलों पर डूबता है। भीतरी भाग भली-भाँति मिश्रित और रुद्धोष्म वक्र के निकट है; चालन पतली ऊष्मीय सीमा-परतों (thermal boundary layers) में काम करता है, ऊपर स्थलमंडल और क्रोड–प्रावार सीमा (CMB) के ठीक ऊपर D″ परत। प्रबल संवहन में नुसेल्ट संख्या (Nusselt number: कुल ऊष्मा-फ्लक्स ÷ केवल चालन-फ्लक्स) लगभग Ra^(1/3) की तरह बढ़ती है।
  • बाह्य क्रोड: अति-कम श्यानता वाला द्रव लौह-मिश्रधातु, अतः Ra अत्यधिक है और द्रव लगभग रुद्धोष्म है। लोहा ऊष्मा को भली-भाँति चालित करता है, अतः क्रोड से निकलती ऊष्मा का बड़ा भाग रुद्धोष्म वक्र के नीचे-नीचे चालन से जा सकता है। यदि केवल चालन ही CMB के आर-पार सारी ऊष्मा ले जा सके तो तापीय संवहन रुक जाएगा, पर अंतः क्रोड के जमने से गुप्त ऊष्मा व हल्के तत्त्व निकलते हैं, और उससे बना संघटनीय संवहन (compositional convection) फिर भी भू-डायनमो चला सकता है।
  • अंतः क्रोड: ठोस है, बाह्य क्रोड के जमने से बढ़ता है, और उसमें ऊष्मा मुख्यतः चालन से गुज़रती है।
🎯 ठोस प्रावार जो बहता है
मानव-काल-मापनी पर प्रावार कठोर है और S तरंगें ले जाता है। लाखों वर्षों में ठोस-अवस्था विसर्पण (creep) उसे 10²⁰ से 10²² Pa s श्यानता वाले तरल की तरह बहने देता है। चूँकि η, Ra के हर में है, इसलिए पानी से बीस से अधिक कोटि अधिक श्यान परत भी हज़ारों km मोटी होने पर संवहन कर सकती है।

6. रुद्धोष्म वक्र: संवहनी प्रावार व क्रोड में तापमान

रुद्धोष्म वक्र (adiabat) उस पिंड-खंड का तापमान-परिवर्तन है जो बिना ऊष्मा-विनिमय (स्थिर एंट्रॉपी) के संपीडित या विसंपीडित हो। (∂T/∂P)_S = αT/(ρ c_p) और dP = ρ g dz से रुद्धोष्म प्रवणता (adiabatic gradient) (dT/dz)_S = α g T / c_p है। α = 3×10⁻⁵ K⁻¹, g = 10 m/s², T = 1600 K और c_p = 1200 J/kg/K वाले प्रावार हेतु यह 4×10⁻⁴ K/m = 0.4 K/km है, जो महाद्वीपीय स्थलमंडल के 20 से 30 K/km के आगे नगण्य है। अतः भली-भाँति मिश्रित संवहनी परत रुद्धोष्म वक्र के निकट रहती है, और प्रवणता T के अनुक्रमानुपाती है।

विभव तापमान (potential temperature) T_p वह तापमान है जो पिंड-खंड का तब होता जब उसे बिना गले रुद्धोष्म रूप से सतह पर लाया जाए; सामान्य प्रावार हेतु यह लगभग 1300 से 1400 °C है। रुद्धोष्म वक्र के अनुदिश तापमान 410 km पर लगभग 1500 °C और 660 km पर लगभग 1650 °C की कोटि का है। प्रावार की निचली सीमा-परत D″ के नीचे, जहाँ तापमान CMB के मान तक तीव्रता से बढ़ता है, बाह्य क्रोड फिर रुद्धोष्म के निकट है, और अंतः क्रोड सीमा का तापमान लगभग 5000 K की कोटि का है। स्थलमंडल का तीव्र, चालनी भूतापीय वक्र प्रावार के रुद्धोष्म वक्र से तापीय स्थलमंडल के आधार पर मिलता है।

ℹ️ प्रावस्था-परिवर्तन रुद्धोष्म वक्र व स्लैबों को मोड़ते हैं
ऑलिवीन लगभग 410 km पर अधिक सघन, स्पिनेल-जैसी उच्च-दाब प्रावस्था (वैड्सलेयाइट, wadsleyite) में बदलता है (धनात्मक क्लैपेरॉन ढाल), अतः ठंडे स्लैबों में सीमा ऊपर उठती है। लगभग 660 km पर ब्रिजमेनाइट व फ़ेरोपेरिक्लेज़ में परिवर्तन का क्लैपेरॉन ढाल ऋणात्मक है, अतः ठंडे स्लैबों में सीमा नीचे धकेली जाती है और स्लैबों के गुज़रने में अवरोध डालती है।

7. प्रावार में गलन

प्रावार का अधिकांश भाग ठोस है क्योंकि उसका तापमान सॉलिडस (solidus), जहाँ गलन आरंभ होता है, से नीचे है। शुष्क पेरिडोटाइट सॉलिडस दाब के साथ तीव्रता से बढ़ता है, ऊपरी प्रावार में लगभग 100 से 130 K प्रति GPa, जबकि रुद्धोष्म वक्र केवल लगभग 10 से 15 K प्रति GPa बढ़ता है (α T/(ρ c_p) = 3×10⁻⁵ × 1600 / (3300 × 1200) ≈ 12 K/GPa)। अतः रुद्धोष्म रूप से ऊपर उठता पिंड-खंड चढ़ाई के प्रति GPa लगभग 110 K की दर से सॉलिडस के निकट पहुँचता है, और गलन वहाँ शुरू होता है जहाँ दोनों वक्र कटते हैं। दाब व गहराई P = ρ g z से जुड़े हैं, अतः ऊपरी प्रावार में 1 GPa लगभग 30 km है।

  • दाब-ह्रास गलन (decompression melting) मुख्य क्रियाविधि है: मध्य-महासागरीय कटकों के नीचे निष्क्रिय ऊर्ध्वगमन (गलन लगभग 60 से 80 km गहराई पर शुरू होकर लगभग 7 km बेसाल्टी भूपर्पटी बनाता है), विदरों व प्लूम-शीर्षों में।
  • फ़्लक्स गलन (flux melting): अधःक्षेपित स्लैब से निकले जल व अन्य वाष्पशील पदार्थ सॉलिडस को सैकड़ों केल्विन घटा देते हैं, जिससे चाप-मैग्मा बनते हैं।
  • तापन: प्लूम परिवेशी प्रावार से सौ से कुछ सौ केल्विन तप्त होता है, अतः तप्त स्थल (hotspot) पर वह अधिक गहराई से गलना शुरू करता है और अधिक गलता है, जिससे भूपर्पटी मोटी बनती है। अंतर्वेधनों की ऊष्मा भी भूपर्पटी को गला सकती है।
⚠️ केवल दाब शुष्क प्रावार को नहीं गलाता
शुष्क पिंड-खंड पर दाब बढ़ाने से उसका सॉलिडस ऊँचा हो जाता है, अतः वह गलन से दूर जाता है। गलन हेतु पिंड-खंड को विसंपीडित, आर्द्र या तप्त करना होता है जब तक वह सॉलिडस को पार न कर ले। गलन की गुप्त ऊष्मा ऊपर उठते पिंड-खंड को ठंडा भी करती है, अतः चढ़ाई के साथ गलित अंश धीरे-धीरे ही बढ़ता है।

मुख्य बिंदु

  • फ़ूरियर नियम q = −k dT/dz से भू-तापीय प्रवणता q/k मिलती है; ऊष्मा-समीकरण में κ = k/(ρ c_p) व रेडियोजनित ऊष्मा A जुड़ते हैं। मान रखने से पहले mW/m², km व µW/m³ को SI में बदलें।
  • स्थायी भूतापीय वक्र: ऊष्मा-उत्पादन न हो तो T = T₀ + q₀ z/k, और एकसमान A हो तो T = T₀ + q₀ z/k − A z²/(2k), जहाँ फ्लक्स q₀ − A z की तरह घटता है। दिए q₀ पर भूपर्पटी का ऊष्मा-उत्पादन गहरे तापमान घटाता है, और कम q₀ का अर्थ मोटा, ठंडा स्थलमंडल है।
  • अर्ध-समष्टि शीतलन: T = T₀ + (T_m − T₀) erf(z/2√(κt)); समतापी-गहराई व समुद्री तल की गहराई √t से बढ़ती है, ऊष्मा-प्रवाह t^(−1/2) से घटता है, और 90% मोटाई 2.32√(κt) है (100 Myr पर लगभग 130 km)।
  • प्लेट मॉडल निश्चित मोटाई की, तप्त आधार वाली प्लेट जोड़ता है, अतः पुराना समुद्री तल गहराई व ऊष्मा-प्रवाह में √t का अनुसरण करने के बजाय समतल हो जाता है; जलतापीय परिसंचरण युवा तल का मापा ऊष्मा-प्रवाह कम कर देता है, और ठंडे स्लैब गर्म होने से तेज़ डूबते हैं।
  • Ra = ρ g α ΔT d³/(κ η), क्रांतिक मान 10³ की कोटि, प्रावार लगभग 10⁷। प्रावार का भीतरी भाग लगभग रुद्धोष्म है और चालनी सीमा-परतें (स्थलमंडल, D″) हैं; बाह्य क्रोड प्रबलता से संवहन करता है और चालन उसकी सारी ऊष्मा ले जाए तब भी संघटनीय रूप से मथा जा सकता है।
  • रुद्धोष्म प्रवणता α g T/c_p है, प्रावार में लगभग 0.4 K/km। गलन वहाँ होता है जहाँ कम ढाल वाला रुद्धोष्म वक्र तीव्र सॉलिडस को काटता है (दाब-ह्रास), जब वाष्पशील पदार्थ सॉलिडस घटाते हैं (फ़्लक्स), या जब पिंड-खंड अधिक तप्त हो (प्लूम); शुष्क पिंड-खंड पर दाब बढ़ाने से कभी नहीं।

अभ्यास प्रश्न (17)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. एक महाद्वीपीय स्थल पर 2.5 W/m/K ऊष्मा-चालकता वाली चट्टान से सतही ऊष्मा-प्रवाह 50 mW/m² है और ऊष्मा-उत्पादन नगण्य है। सतह के पास भू-तापीय प्रवणता कितनी है?

    1. 2 K/km
    2. 20 K/km
    3. 125 K/km
    4. 200 K/km
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — 20 K/km

    प्रवणता q/k = 0.050 / 2.5 = 0.020 K/m = 20 K/km है। भाग देने के बजाय गुणा करने पर भ्रामक 125 आता है, पर गुणनफल q·k की इकाई प्रवणता की नहीं है, और अन्य मान इकाई-परिवर्तन में दस की घात खिसकने से आते हैं।
  2. महासागरीय तल से माध्य ऊष्मा-प्रवाह महाद्वीपों से अधिक है, जबकि महासागरीय भूपर्पटी में रेडियोधर्मी ऊष्मा-स्रोत लगभग नहीं हैं। कौन-सा स्पष्टीकरण ठीक बैठता है?

    1. महासागरीय तल औसतन युवा है और नई प्लेट के ठंडा होने पर ऊष्मा खोता है, जबकि पुराने, मोटे महाद्वीप अपना ऊष्मा-प्रवाह रेडियोजनित भूपर्पटी पर टिकाते हैं
    2. महासागरीय भूपर्पटी में ग्रेनाइटी महाद्वीपीय भूपर्पटी से प्रति इकाई आयतन अधिक यूरेनियम, थोरियम व पोटैशियम है, अतः वह अधिक ऊष्मा उत्पन्न करती है
    3. समुद्री जल महासागरीय चट्टान की ऊष्मा-चालकता को इतना बढ़ा देता है कि समान तापमान-प्रवणता पर प्रत्येक स्तंभ अधिक ऊष्मा चालित करता है
    4. महाद्वीपीय स्थलमंडल औसतन महासागरीय स्थलमंडल से पतला है, अतः महाद्वीपों से बाहर निकलने हेतु ऊष्मा को अपेक्षाकृत छोटा पथ तय करना होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — महासागरीय तल औसतन युवा है और नई प्लेट के ठंडा होने पर ऊष्मा खोता है, जबकि पुराने, मोटे महाद्वीप अपना ऊष्मा-प्रवाह रेडियोजनित भूपर्पटी पर टिकाते हैं

    युवा महासागरीय तल से ऊष्मा-प्रवाह नई प्लेट के ठंडा होने से निर्धारित होता है, इसीलिए महासागरीय माध्य अधिक है। रेडियोजनित विकल्प उल्टा है, क्योंकि महासागरीय भूपर्पटी ऊष्मा-उत्पादक तत्त्वों में निर्धन है, और महाद्वीपीय स्थलमंडल औसतन मोटा है, पतला नहीं। चालकता वाला विकल्प जलतापीय परिसंचरण (जो वास्तव में युवा तल पर मापा चालन-ऊष्मा-प्रवाह घटाता है) को चालन से गड्ड-मड्ड करता है।
  3. एक भूपर्पटी-स्तंभ में एकसमान रेडियोजनित ऊष्मा-उत्पादन A और ऊष्मा-चालकता k है। सतह का तापमान T₀ और सतही ऊष्मा-प्रवाह q₀ है, z नीचे की ओर मापा गया है। स्थायी अवस्था में z गहराई पर तापमान है

    1. T₀ + q₀ z/k + A z²/(2k), क्योंकि भीतर उत्पन्न ऊष्मा नीचे से आए फ्लक्स में जुड़ जाती है
    2. T₀ + (q₀ − A) z/k, क्योंकि ऊष्मा-उत्पादन पूरे स्तंभ में फ्लक्स को एक नियत मात्रा से घटाता है
    3. T₀ + q₀ z/k − A z/k, क्योंकि ऊष्मा-उत्पादन तापमान-प्रवणता को z के अनुपात में घटाता है
    4. T₀ + q₀ z/k − A z²/(2k), क्योंकि फ्लक्स q₀ − A z की तरह घटता है और उसका एक बार और समाकलन होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — T₀ + q₀ z/k − A z²/(2k), क्योंकि फ्लक्स q₀ − A z की तरह घटता है और उसका एक बार और समाकलन होता है

    k d²T/dz² = −A से फ्लक्स q(z) = q₀ − A z और प्रवणता (q₀ − A z)/k है; समाकलन से T₀ + q₀ z/k − A z²/(2k) मिलता है। विमा-जाँच शेष विकल्प हटा देती है: A z/k की इकाई K/m है, यानी प्रवणता की, तापमान की नहीं, और q₀ − A में W/m² से W/m³ घटाया जाता है, जबकि A z²/(2k) की इकाई केल्विन है। द्विघात पद जोड़ने से तापमान बढ़ता भी, जो ऊपर ही उत्पन्न होने के कारण नीचे से चालित न करनी पड़ी ऊष्मा के प्रभाव का उलटा है।
  4. एकसमान ऊष्मा-चालकता मान लें। स्थायी-अवस्था महाद्वीपीय भूतापीय वक्रों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. एकसमान ऊष्मा-उत्पादन A होने पर ऊपर की ओर का ऊष्मा-फ्लक्स गहराई के साथ रैखिक रूप से q₀ − A z की तरह घटता है
    2. समान सतही ऊष्मा-प्रवाह पर अधिक रेडियोजनित ऊष्मा-उत्पादन वाली भूपर्पटी में मोहो पर तापमान कम होता है
    3. न्यूनीकृत ऊष्मा-प्रवाह सतही ऊष्मा-प्रवाह का वह भाग है जो ऊष्मा-उत्पादक परत में नीचे से प्रवेश करता है
    4. ऊष्मा-उत्पादन न होने पर भूतापीय वक्र ऐसा वक्र है जिसकी तापमान-प्रवणता बढ़ती गहराई के साथ लगातार घटती जाती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — एकसमान ऊष्मा-उत्पादन A होने पर ऊपर की ओर का ऊष्मा-फ्लक्स गहराई के साथ रैखिक रूप से q₀ − A z की तरह घटता है; B — समान सतही ऊष्मा-प्रवाह पर अधिक रेडियोजनित ऊष्मा-उत्पादन वाली भूपर्पटी में मोहो पर तापमान कम होता है; C — न्यूनीकृत ऊष्मा-प्रवाह सतही ऊष्मा-प्रवाह का वह भाग है जो ऊष्मा-उत्पादक परत में नीचे से प्रवेश करता है

    फ्लक्स q₀ − A z, दिए q₀ पर अपेक्षाकृत ठंडा मोहो (नीचे से कम ऊष्मा आनी होती है) और न्यूनीकृत ऊष्मा-प्रवाह की परिभाषा, तीनों सही हैं। A = 0 पर ऊष्मा-समीकरण d²T/dz² = 0 देता है, अतः भूतापीय वक्र स्थिर प्रवणता q₀/k की सरल रेखा है; गहराई के साथ घटती प्रवणता के लिए ऊष्मा-उत्पादन चाहिए।
  5. महासागरीय स्थलमंडल अर्ध-समष्टि शीतलन से ठंडा होता है। समुद्री तल के एक खंड की आयु 16 Myr से बढ़कर 64 Myr हो जाती है। किसी निश्चित समतापी की गहराई और सतही ऊष्मा-प्रवाह का क्या होता है?

    1. समतापी की गहराई चौगुनी हो जाती है और ऊष्मा-प्रवाह घटकर चौथाई रह जाता है
    2. समतापी की गहराई दुगुनी हो जाती है और ऊष्मा-प्रवाह भी दुगुना हो जाता है
    3. समतापी की गहराई दुगुनी हो जाती है और ऊष्मा-प्रवाह घटकर आधा रह जाता है
    4. समतापी की गहराई वही रहती है और ऊष्मा-प्रवाह घटकर आधा रह जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — समतापी की गहराई दुगुनी हो जाती है और ऊष्मा-प्रवाह घटकर आधा रह जाता है

    समतापी की गहराई √t और ऊष्मा-प्रवाह t^(−1/2) से चलते हैं। t को 4 से गुणा करने पर √4 = 2 से समतापी 2 गुना गहरी होती है और ऊष्मा-प्रवाह 2 से भाग हो जाता है। दोनों को चौगुना मान लेना √t की जगह t लेने की भ्रामक भूल है।
  6. लगभग 70 Myr से पुराने महासागरीय तल हेतु प्रेक्षित गहराई √आयु की तरह बढ़ना बंद कर देती है और मापा गया ऊष्मा-प्रवाह अर्ध-समष्टि शीतलन के पूर्वानुमान से ऊपर बना रहता है। तापीय मॉडल में कौन-सा परिवर्तन दोनों प्रेक्षणों की व्याख्या करता है?

    1. ऊष्मीय विसरणशीलता को आयु के साथ लगातार बढ़ने दें, जिससे पुराना स्थलमंडल युवा स्थलमंडल की तुलना में अधिक तेज़ी से ठंडा हो
    2. अर्ध-समष्टि के स्थान पर निश्चित मोटाई की ऐसी प्लेट रखें जिसका आधार प्रावार-तापमान पर बँधा हो, ताकि ऊष्मा नीचे से मिले
    3. ऐसा जलतापीय परिसंचरण जोड़ें जो पुराने महासागरीय तल से युवा महासागरीय तल की तुलना में क्रमशः अधिक ऊष्मा हटाए
    4. महासागरीय भूपर्पटी में आयु के साथ लगातार बढ़ने वाला रेडियोजनित ऊष्मा-स्रोत जोड़ें जो पुराने तल के अवतलन को मंद करे
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अर्ध-समष्टि के स्थान पर निश्चित मोटाई की ऐसी प्लेट रखें जिसका आधार प्रावार-तापमान पर बँधा हो, ताकि ऊष्मा नीचे से मिले

    तप्त आधार वाली प्लेट मोटी होना बंद कर देती है, अतः गहराई व ऊष्मा-प्रवाह अर्ध-समष्टि पूर्वानुमान से ऊपर स्थिर मानों पर समतल हो जाते हैं। अतिरिक्त शीतलन (तेज़ विसरण या अधिक जलतापीय ह्रास) ऊष्मा-प्रवाह को पूर्वानुमान से नीचे ले जाता, जो उलटी दिशा है, और महासागरीय भूपर्पटी में रेडियोजनित ऊष्मा इतनी कम है कि उसका महत्त्व नहीं।
  7. एक संवहनी परत की श्यानता दस गुना घटा दी जाती है और उसकी मोटाई आधी कर दी जाती है, तापांतर व अन्य पदार्थ-गुण वही रहते हैं। रैले संख्या कितने गुना बदलती है?

    1. यह 1.25 से गुणित हो जाती है
    2. यह ठीक 5 से गुणित हो जाती है
    3. यह लगभग 0.8 से गुणित हो जाती है
    4. यह ठीक 80 से गुणित हो जाती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — यह 1.25 से गुणित हो जाती है

    Ra, d³/η के अनुक्रमानुपाती है। d आधा करने पर d³ का गुणक 1/8 और η को 10 से भाग देने पर Ra का गुणक 10 होता है, अतः कुल गुणक 10/8 = 1.25 है। d³ की जगह d लेने पर भ्रामक 5 आता है, व्युत्क्रम से 0.8, और 80 में 8 से भाग देने के बजाय गुणा हो गया है।
  8. एक प्रावार पिंड-खंड रुद्धोष्म रूप से ऊपर उठता है। 5.0 GPa पर उसका तापमान शुष्क सॉलिडस से 216 K नीचे है। दाब घटने पर रुद्धोष्म वक्र प्रति GPa 12 K और सॉलिडस प्रति GPa 120 K घटता है। गलन शुरू होने से पहले दाब कितना घटना चाहिए?

    1. 1.6 GPa
    2. 1.8 GPa
    3. 2.0 GPa
    4. 18 GPa
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — 2.0 GPa

    अंतर 120 − 12 = 108 K प्रति GPa की दर से बंद होता है, अतः 216 / 108 = 2.0 GPa, और गलन लगभग 3.0 GPa पर शुरू होता है। रुद्धोष्म वक्र का ठंडा होना अनदेखा करने पर 216/120 = 1.8 आता है, दोनों दरें जोड़ने पर 216/132 ≈ 1.6, और केवल रुद्धोष्म दर से भाग देने पर असंभव 18।
  9. प्रावार का विभव तापमान परिभाषित है

    1. तापीय स्थलमंडल के आधार पर का तापमान, जिस बिंदु पर भूतापीय वक्र चालनी अवस्था छोड़ता है
    2. प्रावार के शीर्ष व तल के तापमानों का माध्य
    3. वह तापमान जिस पर शुष्क पेरिडोटाइट सतह पर गलना शुरू करता है
    4. वह तापमान जो पिंड-खंड का तब होता जब उसे बिना गले रुद्धोष्म रूप से सतह पर लाया जाता
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — वह तापमान जो पिंड-खंड का तब होता जब उसे बिना गले रुद्धोष्म रूप से सतह पर लाया जाता

    विभव तापमान प्रत्येक पिंड-खंड को सतह के सापेक्ष लेकर रुद्धोष्म वक्र पर गहराई का प्रभाव हटा देता है। तापीय स्थलमंडल के आधार का तापमान (लगभग 1300 °C) भिन्न राशि है और सतह का सॉलिडस सामान्य प्रावार के विभव तापमान से कम है, इसीलिए ऊपर उठता प्रावार गहराई पर सॉलिडस तक पहुँचता है।
  10. मान लें बाह्य क्रोड के रुद्धोष्म वक्र के नीचे-नीचे जितनी ऊष्मा चालित हो सकती है वह क्रोड–प्रावार सीमा के आर-पार वास्तव में जाती ऊष्मा से अधिक है। कौन-सा निष्कर्ष सही है?

    1. बाह्य क्रोड को तुरंत जम जाना चाहिए, क्योंकि उसकी सीमा के आर-पार द्रव से कोई भी ऊष्मा बिल्कुल नहीं हटाई जा रही
    2. तापीय संवहन नहीं चल सकता, पर अंतः क्रोड के जमने से उत्पन्न संघटनीय उत्प्लावन फिर भी डायनमो को चला सकता है
    3. बाह्य क्रोड किसी भी क्रियाविधि से संवहन नहीं कर सकता, अतः भू-डायनमो को तुरंत बंद हो जाना चाहिए
    4. संवहन अधिक प्रबल हो जाता है, क्योंकि अपने रुद्धोष्म वक्र से नीचे के तापमान वाला तरल अस्थिर रूप से स्तरित होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — तापीय संवहन नहीं चल सकता, पर अंतः क्रोड के जमने से उत्पन्न संघटनीय उत्प्लावन फिर भी डायनमो को चला सकता है

    यदि रुद्धोष्म वक्र के अनुदिश चालन सारी ऊष्मा ले जा सके तो द्रव ऊष्मीय रूप से स्थिर-स्तरित हो जाता है और तापीय संवहन रुक जाता है। अपने रुद्धोष्म वक्र से ठंडा द्रव स्थिर होता है, अस्थिर नहीं, जिससे अधिक प्रबल संवहन वाला दावा कटता है। अंतः क्रोड सीमा पर जमने से गुप्त ऊष्मा व हल्के तत्त्व निकलते हैं, और संघटनीय उत्प्लावन संवहन व डायनमो को बनाए रख सकता है, अतः डायनमो का रुकना आवश्यक नहीं।
  11. प्रावार के रुद्धोष्म वक्र के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. रुद्धोष्म प्रवणता α g T / c_p के बराबर होती है
    2. प्रबल सीमा-परतों रहित भली-भाँति मिश्रित संवहनी परत रुद्धोष्म वक्र के निकट रहती है
    3. ऊपरी प्रावार में रुद्धोष्म प्रवणता लगभग 10 K प्रति km है, जो महाद्वीपीय स्थलमंडल की चालनी प्रवणता के तुल्य है
    4. अन्य गुण समान होने पर, जहाँ परम तापमान अधिक हो वहाँ रुद्धोष्म प्रवणता अधिक होती है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — रुद्धोष्म प्रवणता α g T / c_p के बराबर होती है; B — प्रबल सीमा-परतों रहित भली-भाँति मिश्रित संवहनी परत रुद्धोष्म वक्र के निकट रहती है; D — अन्य गुण समान होने पर, जहाँ परम तापमान अधिक हो वहाँ रुद्धोष्म प्रवणता अधिक होती है

    प्रवणता α g T/c_p, T के अनुक्रमानुपाती है, और भली-भाँति मिश्रित संवहनी भीतरी भाग उसी का अनुसरण करता है। प्रावार में इसका परिमाण लगभग 0.4 K/km है, जो स्थलमंडल की 20 से 30 K/km चालनी प्रवणता से बहुत कम है, अतः 10 K/km का मान लगभग 25 गुना गलत है।
  12. निम्नलिखित में से कौन-से कारक प्रावार पेरिडोटाइट के पिंड-खंड को गलन तक ला सकते हैं?

    1. कटक-प्रसरण के नीचे पिंड-खंड के ऊपर उठने पर रुद्धोष्म दाब-ह्रास
    2. अधःक्षेपित स्लैब से निकले जल का जुड़ना, जो सॉलिडस को घटाता है
    3. सामान्य से कई सौ केल्विन अधिक तप्त प्रावार का आना, जैसा प्लूम में होता है
    4. नियत तापमान पर शुष्क पिंड-खंड पर दाब बढ़ाना, जैसे उसे नीचे ले जाने पर
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — कटक-प्रसरण के नीचे पिंड-खंड के ऊपर उठने पर रुद्धोष्म दाब-ह्रास; B — अधःक्षेपित स्लैब से निकले जल का जुड़ना, जो सॉलिडस को घटाता है; C — सामान्य से कई सौ केल्विन अधिक तप्त प्रावार का आना, जैसा प्लूम में होता है

    दाब-ह्रास, वाष्पशील पदार्थों का फ़्लक्सन और अतिरिक्त तापमान, तीनों पिंड-खंड को सॉलिडस के पार ले जाते हैं। शुष्क पिंड-खंड पर दाब बढ़ाने से उसका सॉलिडस ऊँचा होता है और पिंड-खंड गलन से दूर जाता है, अतः वह गलन नहीं ला सकता।
  13. एक महाद्वीपीय स्तंभ का सतही तापमान 10 °C, सतही ऊष्मा-प्रवाह 60 mW/m², ऊष्मा-चालकता 3.0 W/m/K और एकसमान रेडियोजनित ऊष्मा-उत्पादन 1.0 µW/m³ है। z को नीचे की ओर मापकर स्थायी-अवस्था हल से 30 km गहराई पर तापमान °C में ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 460

    T = T₀ + q₀ z/k − A z²/(2k)। q₀ z/k = 0.060 × 30 000 / 3.0 = 600 K। A z²/(2k) = 1.0×10⁻⁶ × (30 000)² / 6.0 = 150 K। T = 10 + 600 − 150 = 460 °C। ऊष्मा-उत्पादन पद भूलने पर 610 आता है और गुणक 2 भूलने पर 310।
  14. महासागरीय स्थलमंडल अर्ध-समष्टि शीतलन का अनुसरण करता है, प्रावार-तापमान 1300 °C और सतही तापमान 0 °C है। विचाराधीन आयु पर 2√(κt) = 80 km है। erf(0.5) = 0.5205 लेकर 40 km गहराई पर तापमान निकटतम °C में ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 677

    η = z / (2√(κt)) = 40 / 80 = 0.5। T = T₀ + (T_m − T₀) erf(η) = 0 + 1300 × 0.5205 = 676.65, जो पूर्णांकित होकर 677 °C है। भूल से z/√(κt) = 1 लेने पर erf(1) और लगभग 1096 °C आता।
  15. तापीय स्थलमंडल का आधार वहाँ लिया जाता है जहाँ तापमान सतही मान से प्रावार-मान की ओर 90% पर हो, जो अर्ध-समष्टि शीतलन में z = 2.32 √(κt) है। κ = 1.0×10⁻⁶ m²/s व 100 Myr आयु (1 Myr = 3.15×10¹³ s) हेतु मोटाई km में, निकटतम km तक, ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 130

    κt = 1.0×10⁻⁶ × 100 × 3.15×10¹³ = 3.15×10⁹ m², अतः √(κt) = 56.1 km। z = 2.32 × 56.1 = 130.2 km, जो पूर्णांकित होकर 130 km है। वर्गमूल भूलने पर 10⁹ पैमाने का बेतुका मान आता और केवल गुणक 2 लेने पर 112 km।
  16. एक प्रावार-परत में α = 2.5×10⁻⁵ K⁻¹, g = 10 m/s², c_p = 1000 J/kg/K है और पूरे में तापमान 1600 K लिया गया है। रुद्धोष्म प्रवणता α g T / c_p से 500 km के गहराई-अंतराल में केल्विन में तापमान-वृद्धि ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 200

    प्रवणता = 2.5×10⁻⁵ × 10 × 1600 / 1000 = 4.0×10⁻⁴ K/m = 0.40 K/km। 500 km में वृद्धि 0.40 × 500 = 200 K है। प्रवणता K/m में रखकर गहराई km में छोड़ देना प्रचलित इकाई-भूल होती।
  17. एक प्रावार-परत में ρ = 3000 kg/m³, g = 10 m/s², α = 3×10⁻⁵ K⁻¹, ΔT = 1000 K, मोटाई d = 1000 km, κ = 1×10⁻⁶ m²/s और η = 1×10²¹ Pa s है। उसकी रैले संख्या N × 10⁵ है। N ज्ञात कीजिए।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

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    उत्तर: 9

    Ra = ρ g α ΔT d³ / (κ η)। अंश: 3000 × 10 × 3×10⁻⁵ × 1000 = 900, गुणा d³ = (10⁶ m)³ = 10¹⁸ से 9×10²⁰। हर: 10⁻⁶ × 10²¹ = 10¹⁵। Ra = 9×10⁵, अतः N = 9। d = 1000 (km) को मीटर में बदले बिना लेना प्रचलित भूल है।