पुराजीवविज्ञान: विविधता व विलोपन, ताफ़ोनॉमी, प्रकार्यात्मक आकारिकी, आकारमिति, कशेरुकी तथा पुरापारिस्थितिकी

यह अध्याय भूविज्ञान एवं भूभौतिकी (GG) पेपर के भाग B1 के शीर्षक “Paleontology” (पुराजीवविज्ञान) का उत्तर देता है: “जीवन की समय के साथ विविधता, सामूहिक विलोपन- कारण व प्रभाव; ताफ़ोनॉमी- जीवाश्मीकरण की प्रक्रियाएँ; अकशेरुकियों (द्विकपाटी, ब्रैकियोपोड, उदरपाद, इकाइनॉइड, ऐमोनाइट) तथा सूक्ष्मजीवाश्मों (फ़ोरैमिनिफ़ेरा, ऑस्ट्राकोडा, कोनोडॉन्ट, ब्रायोज़ोआ) की प्रकार्यात्मक आकारिकी; आकारिकी का सांख्यिकीय विश्लेषण; कशेरुकी पुराजीवविज्ञान; पुरापारिस्थितिकी की मूल अवधारणाएँ; जीवाश्म व पुरापर्यावरण।” यह विविधता व उसके सूचकांक, बिग फ़ाइव विलोपन, ताफ़ोनॉमी, नौ जीवाश्म-समूहों का प्रकार्यात्मक निर्वचन, ऐलोमेट्री, कशेरुकी संक्रमण व पुरापर्यावरण पढ़ाता है। संख्यात्मक प्रश्न हैं: शैनन सूचकांक, रेयरफ़ैक्शन, प्रति-व्यक्ति विलोपन दर, ऐलोमेट्रिक पूर्वानुमान और विश्वास्यता अंतराल।

1. समय के साथ जीवन की विविधता और उसका मापन

जीवाश्म-अभिलेख विकिरणों व पतनों की एक शृंखला के रूप में पढ़ा जाता है। मुलायम देह वाले एडियाकरन जीव (लगभग 570 से 539 Ma) के बाद कंकालधारी जंतुओं का कैम्ब्रियन विस्फोट आता है। इसके बाद समुद्री विविधता महान ऑर्डोविशियन जैव-विविधीकरण घटना में तेज़ी से बढ़ती है, पैलियोज़ोइक में लंबे समय तक एक पठार पर टिकी रहती है, पर्मियन के अंत में बुरी तरह कटती है, और मेसोज़ोइक व सीनोज़ोइक में अपने उच्चतम स्तर तक पहुँचती है। सेप्कोस्की के तीन विकासात्मक जीव-समूह इस प्रतिरूप का सार हैं: कैम्ब्रियन जीव-समूह (ट्राइलोबाइट, अनार्टिकुलेट ब्रैकियोपोड), पैलियोज़ोइक जीव-समूह (आर्टिकुलेट ब्रैकियोपोड, क्रिनॉइड, रूगोस व टेबुलेट प्रवाल, नॉटिलॉइड) तथा आधुनिक जीव-समूह (द्विकपाटी, उदरपाद, इकाइनॉइड, अस्थिल मछलियाँ, चीलोस्टोम ब्रायोज़ोआ), जिनमें प्रत्येक के प्रभुत्व में आने का बड़ा कारण यह रहा कि सामूहिक विलोपनों ने उससे पहले वाले को हटा दिया।

टैक्सा की कच्ची गिनती प्रतिदर्श-आकार पर निर्भर करती है, इसलिए समृद्धि की तुलना रेयरफ़ैक्शन (rarefaction) के बाद ही हो: N में से n व्यक्तियों के यादृच्छिक उपप्रतिदर्श में प्रजातियों की प्रत्याशित संख्या E(S_n) = Σ [1 − C(N − N_i, n) / C(N, n)] है, जहाँ N_i प्रजाति i की गिनती है। बहुलता का उपयोग करने वाले सूचकांक हैं सिम्पसन D = Σ p_i² (यादृच्छिक चुने दो व्यक्तियों के एक ही प्रजाति के होने की प्रायिकता; 1 − D विविधता के साथ बढ़ता है) तथा शैनन H = −Σ p_i ln p_i, जहाँ p_i = N_i / N। S प्रजातियों हेतु H का अधिकतम ln S तब होता है जब सभी समान बहुल हों, और समता J = H / ln S है। उदाहरण: 60 कवचों की एक परत में तीन प्रजातियों के 30, 20 व 10 व्यक्ति हों तो p = 0.50, 0.33, 0.17 है, अतः H = 1.01 जबकि अधिकतम ln 3 = 1.10, और J = 0.92।

जीवाश्म-अभिलेख की विविधता स्तरिकीय परासों से गिनी जाती है। रेंज-थ्रू (range-through) विधि किसी टैक्सॉन को उसके प्रथम व अंतिम प्रकटन के बीच के प्रत्येक अंतराल में गिनती है, जिससे प्रतिचयन-रिक्तियाँ भरती हैं; पर नवीन शैलों का बेहतर प्रतिचयन वर्तमान के पास विविधता फुला देता है (पुल ऑफ़ द रिसेंट)। प्रतिशत विलोपन (विलुप्त ÷ विद्यमान विविधता × 100) दर नहीं है। असमान लंबाई के अंतरालों की तुलना कराने वाली प्रति-व्यक्ति दर q = −ln(N_bt / N_b) / Δt है, जहाँ N_b निचली सीमा पार करने वाले टैक्सा की संख्या, N_bt दोनों सीमाएँ पार करने वालों की संख्या और Δt अंतराल की लंबाई Myr में है; अंतराल के भीतर ही सीमित टैक्सा नहीं गिने जाते।

2. सामूहिक विलोपन: कारण व प्रभाव

सामूहिक विलोपन (mass extinction) भूवैज्ञानिक दृष्टि से संक्षिप्त अंतराल (प्रायः कुछ Myr से कम) है जिसमें असंबद्ध समूहों व आवासों में विश्वव्यापी स्तर पर प्रजातियों का बड़ा भाग पृष्ठभूमि (background) दर से कहीं अधिक दर पर लुप्त हो जाता है।

बिग फ़ाइव; प्रतिशत अनुमान हैं, किंतु अंत-पर्मियन सबसे बड़ा है
घटनाआयु (Ma, लगभग)लुप्त समुद्री प्रजातियाँ (लगभग; अनुमान भिन्न)प्रमुख प्रस्तावित कारण
अंत-ऑर्डोविशियन445लगभग 85%गोंडवाना का हिमनदन व समुद्र-तल में गिरावट, फिर तापन व अनॉक्सिया
उत्तर-डेवोनियन372लगभग 75%बार-बार के अनॉक्सिक स्पंद, जलवायु परिवर्तन, प्रवाल-भित्ति तंत्रों का ध्वस्त होना
अंत-पर्मियन252लगभग 90% या अधिकसाइबेरियन ट्रैप ज्वालामुखीयता, तापन, महासागरीय अनॉक्सिया व अम्लीकरण
अंत-ट्राइऐसिक201लगभग 75 से 80%सेंट्रल एटलांटिक मैग्मैटिक प्रॉविंस ज्वालामुखीयता, CO₂ तापन, अम्लीकरण
अंत-क्रिटेशियस66लगभग 75%चिक्सुलुब प्रहार, साथ में डेक्कन ट्रैप ज्वालामुखीयता (सापेक्ष भूमिकाएँ विवादित)

क्रिटेशियस के अंत में प्रहार के प्रमाण हैं इरिडियम-समृद्ध मृत्तिका परत, आघातित क्वार्ट्ज़, गोलिकाएँ और चिक्सुलुब क्रेटर (यूकाटान, लगभग 180 km चौड़ा)। ज्वालामुखीयता CO₂ (दीर्घकालिक तापन व अम्लीकरण), SO₂ ऐरोसॉल (अल्पकालिक शीतलन) तथा गर्म, स्थिर, ऑक्सीजन-विरल महासागरों के रास्ते काम करती है। अंत-पर्मियन ने ट्राइलोबाइट तथा रूगोस व टेबुलेट प्रवाल हटा दिए, अतः पैलियोज़ोइक जीव-समूह फिर कभी प्रभुत्व में नहीं लौटा।

प्रभाव। विलोपन चयनात्मक होता है: भौगोलिक रूप से सीमित, संकीर्ण-अनुकूलित, उष्णकटिबंधीय भित्ति-निर्माता व विशालकाय टैक्सा सबसे अधिक पीड़ित होते हैं। बचे हुए जीव रिक्त हुए पारिस्थितिक स्थान में विकिरित होते हैं (अंत-क्रिटेशियस के बाद स्तनपायी, अंत-पर्मियन के बाद आर्कोसॉर), पर समुद्री पुनर्प्राप्ति में कई मिलियन वर्ष लगते हैं, और आपदा टैक्सा (disaster taxa) (अंत-पर्मियन के बाद द्विकपाटी Claraia व थेरैप्सिड Lystrosaurus) कुछ समय के लिए छा जाते हैं। लज़ारस टैक्सॉन (Lazarus taxon) अभिलेख से लुप्त होकर बाद में फिर प्रकट होता है। चूँकि किसी वंश की कोई एक प्रजाति भी बचे तो वंश बचा रहता है, इसलिए उसी घटना में लुप्त प्रजातियों का प्रतिशत प्रायः लुप्त वंशों के प्रतिशत से अधिक होता है।

⚠️ सिग्नॉर–लिप्स प्रभाव: आकस्मिक घटना क्रमिक दिख सकती है
किसी टैक्सॉन का अंतिम जीवाश्म लगभग कभी उसकी मृत्यु के क्षण का नहीं होता, इसलिए परास सच्चे विलोपन-स्तर से नीचे समाप्त होते दिखते हैं। विरल प्रतिचयन में एक आकस्मिक घटना अतः कई मीटर शैल में फैला क्रमिक ह्रास दिखती है।

3. ताफ़ोनॉमी: जीवाश्मीकरण की प्रक्रियाएँ

ताफ़ोनॉमी (taphonomy) मृत्यु से खोज तक अवशेषों के साथ घटने वाली हर बात का अध्ययन है। बायोस्ट्रैटिनोमी (biostratinomy) मृत्यु से अंतिम निक्षेपण तक (मृतभक्षण, विघटन, अंग-वियोजन, परिवहन, घर्षण, जैव-अपरदन) और जीवाश्म डायाजेनेसिस दबने के बाद (संपीडन, सीमेंटन, विलयन, पुनर्क्रिस्टलन, प्रतिस्थापन) को समेटता है। संरक्षण के लिए टिकाऊ कठोर भाग, शीघ्र निक्षेपण और प्रायः ऑक्सीजन-विरल तलीय जल चाहिए जो मृतभक्षियों को दूर रखे।

  • परखनिजीकरण (permineralisation): मूल ऊतक बने रहते हैं और रंध्र सिलिका, कैल्साइट या पाइराइट से भर जाते हैं (अश्मीभूत काष्ठ, अस्थि)।
  • प्रतिस्थापन (replacement): मूल पदार्थ घुल जाता है और अणु-दर-अणु दूसरा खनिज उसकी जगह ले लेता है (सिलिकीभूत या पाइराइटीभूत कवच)।
  • पुनर्क्रिस्टलन या प्रतिलोमन: संघटन वही रहता है पर क्रिस्टल-रूप बदल जाता है (ऐरागोनाइट से कैल्साइट), जिससे सूक्ष्म संरचना नष्ट हो जाती है।
  • कार्बनीकरण (आसवन): वाष्पशील पदार्थ निकल जाते हैं और कार्बन की पतली परत बची रहती है (ग्रैप्टोलाइट, पत्तियाँ, मृदु ऊतक)।
  • साँचे व ढलाइयाँ (moulds and casts): घुला कवच बाह्य साँचा (बाहरी छाप) और आंतरिक साँचा या स्टाइनकर्न (भरा हुआ भीतरी भाग) छोड़ता है; सीमेंट से भरी रिक्ति ढलाई (cast) देती है।
  • अपरिवर्तित अवशेष: एम्बर (कीट), हिमीकरण (मैमथ), निर्जलन, टार-रिसाव।

खनिज-संघटन तय करता है कि क्या बचेगा। ऐरागोनाइट (अनेक द्विकपाटी व उदरपाद, स्क्लेरैक्टीनियन प्रवाल, ऐमोनाइट कवच) आसानी से घुलता या प्रतिलोमित होता है, इसलिए ये समूह प्रायः केवल साँचों के रूप में बचते हैं, जबकि निम्न-Mg कैल्साइट (आर्टिकुलेट ब्रैकियोपोड, ट्राइलोबाइट), उच्च-Mg कैल्साइट (इकाइनोडर्म पट्टिकाएँ), एपेटाइट (अस्थि, कोनोडॉन्ट, Lingula) और सिलिका (रेडियोलेरिया, स्पंज-कंटिकाएँ) अधिक टिकाऊ हैं। कोई समुच्चय स्वस्थानिक (autochthonous) (जीवन-स्थिति में), अर्ध-स्वस्थानिक या परस्थानिक (allochthonous) (परिवहित) हो सकता है। काल-औसतीकरण (time-averaging) सैकड़ों से हज़ारों वर्षों में फैली पीढ़ियों को एक परत में मिला देता है, अतः मृत समुच्चय दीर्घकालिक औसत है, तात्कालिक चित्र नहीं।

लागरश्टेटे (Lagerstätten) असाधारण जीवाश्म-सामग्री वाले निक्षेप हैं। कॉन्ज़ेंट्रैट (Konzentrat) निक्षेप कठोर भागों को केंद्रित करते हैं (अस्थि-परतें, कवच-परतें); कॉन्ज़र्वैट (Konservat) निक्षेप मृदु ऊतक सुरक्षित रखते हैं: बर्जेस शेल (कैम्ब्रियन, ब्रिटिश कोलंबिया), चेंगजियांग (आरंभिक कैम्ब्रियन, चीन) और सोलनहोफ़ेन चूना-पत्थर (उत्तर जुरैसिक, जर्मनी)। अतः अभिलेख कठोर कवच वाले, छिछले समुद्री, शीघ्र दबे जीवों की ओर झुका है, और विविधता-गणनाएँ यह झुकाव विरासत में पाती हैं।

4. अकशेरुकियों की प्रकार्यात्मक आकारिकी

प्रकार्यात्मक आकारिकी (functional morphology) कंकाल को अभियांत्रिक समाधान के रूप में पढ़ती है। विधि है: जीवित संबंधियों से तुलना, संरचना का मॉडल बनाना, और मॉडल को अवसाद व सहवर्ती जीवाश्मों से परखना।

पाठ्यक्रम के समूहों के मानक प्रकार्यात्मक निर्वचन
समूहकंकाल व सममितिप्रकार्यात्मक लक्षण व उनका संकेत
द्विकपाटीदो कपाट, जो संधि-तल के आर-पार एक-दूसरे के दर्पण-प्रतिबिंब हैं; अकेला एक कपाट प्रायः सममित नहीं होता (असमभुज)गहरा पैलियल साइनस (पैलियल रेखा में वह खाँच जहाँ साइफ़न-पेशियाँ जुड़ती हैं) का अर्थ लंबे साइफ़न व गहरा बिलकारी है; बिसस-खाँच का अर्थ धागों से जकड़न है; एक कपाट का आधार से सीमेंटित होना सीप-प्रकार का सीमेंटित जीव है
ब्रैकियोपोडदो असमान कपाट (पेडिकल व ब्रैकियल); सममिति-तल दोनों कपाटों को काटता है और प्रत्येक कपाट स्वयं द्विपार्श्विक सममित है। आर्टिकुलेट रूपों के निम्न-Mg कैल्साइट कवच में दंत व गर्तिकाएँ होती हैं; अनार्टिकुलेट रूपों (Lingula) के फ़ॉस्फ़ेटी कवच केवल पेशियों से जुड़े रहते हैंपेडिकल, पेडिकल कपाट के एक छिद्र से निकलकर जंतु को जकड़ता है; भीतरी ब्रैकिडिया (स्पिरिफ़ेरिडों में कुंडलित) भोजन-अंग लोफ़ोफ़ोर को सहारा देते हैं; चौड़ी हिंज-रेखा नरम पंक पर कवच को स्थिर रखती है
उदरपादएक एकल-कपाटी कवच, प्रायः कुंडलित: ट्रोकोस्पाइरल (सर्पिल) या प्लैनिस्पाइरल। टॉर्शन, लार्वा में देह का 180° मरोड़ जो मैंटल-गुहा को आगे ले आता है, कवच के कुंडलन से भिन्न हैकुंडलन दक्षिणावर्त (शिखर ऊपर और मुख दर्शक की ओर हो तो मुख दाईं ओर) या वामावर्त होता है; मुख पर साइफ़नी नाल मांसाहारी घोंघों की विशेषता है, जबकि गोल पूर्ण मुख चरने वालों में आम है
इकाइनॉइडप्लेटों का कैल्साइट कवच (टेस्ट), जो पाँच ऐम्बुलैक्रल (नाल-पाद रंध्र) व पाँच इंटरऐम्बुलैक्रल क्षेत्रों में व्यवस्थित है; नियमित अर्चिनों में अरीय, अनियमितों में द्वितीयक रूप से द्विपार्श्विकनियमित अर्चिन सतह पर रहते हैं; मुख नीचे, गुदा (पेरिप्रॉक्ट) शीर्ष पर और चबाने वाली ऐरिस्टॉटल की लालटेन होती है। अनियमित अर्चिन (हृदय-अर्चिन, सैंड डॉलर) बिल खोदते हैं: पेरिप्रॉक्ट पश्च भाग में खिसका, छोटे घने कंटक, चपटा या हृदयाकार कवच; हृदय-अर्चिनों ने लालटेन खो दी है
ऐमोनाइटबाह्य कक्षीय कवच, प्रायः प्लैनिस्पाइरल; पटियाँ (septa) कक्षों को बाँटती हैं और ऐमोनॉइडों में साइफ़ंकल बाहरी (अधर) किनारे के साथ चलता हैसीवन-रेखा (suture), जहाँ पटी कवच-भित्ति से मिलती है, प्रायः डेवोनियन–पर्मियन में गोनियाटाइटिक (सरल टेढ़ी-मेढ़ी), ट्राइऐसिक में सेराटाइटिक और जुरैसिक–क्रिटेशियस में ऐमोनाइटिक (बारीक झालरदार) होती है। संपीडित, धारारेखित, अंतर्वलित कवच कुशलता से तैरते हैं, खुले बहिर्वलित कम। तेज़ विकास उन्हें मेसोज़ोइक ज़ोन-जीवाश्म बनाता है
⚠️ सममिति के दो भिन्न नियम
द्विकपाटी में सममिति-तल कपाटों के बीच होता है, अतः दोनों कपाट दर्पण-प्रतिबिंब हैं और प्रत्येक प्रायः असममित है। ब्रैकियोपोड में तल दोनों कपाटों को काटता है, अतः प्रत्येक कपाट सममित है पर दोनों कपाट भिन्न हैं। अतः द्विपार्श्विक सममित एकल कपाट ब्रैकियोपोड की ओर संकेत करता है, क्योंकि अधिकांश द्विकपाटी कपाट असमभुज होते हैं।

5. सूक्ष्मजीवाश्म: फ़ोरैमिनिफ़ेरा, ऑस्ट्राकोडा, कोनोडॉन्ट व ब्रायोज़ोआ

सूक्ष्मजीवाश्म, जो प्रायः एक मिलीमीटर से छोटे होते हैं, छानने व अम्ल-अवशेषों से प्राप्त होते हैं; एक छोटे ड्रिल-नमूने में उनके सैकड़ों नग होते हैं, इसीलिए वे उपसतही जैव-स्तरिकी के औज़ार हैं।

पाठ्यक्रम के चार सूक्ष्मजीवाश्म समूह
समूहकवच व परासमुख्य उपयोग
फ़ोरैमिनिफ़ेराएककोशिकीय प्रोटिस्ट, कक्षीय कवच सहित: समेकित (agglutinated), पोर्सेलेनी या पारदर्शी चूनेदार। नितलस्थ रूप कैम्ब्रियन से, प्लवकी रूप जुरैसिक सेप्लवकी प्रजातियाँ जुरैसिक से वर्तमान तक के ज़ोन बनाती हैं; नितलस्थ समुच्चय व प्लवकी : नितलस्थ अनुपात (तट से दूर अधिक) गहराई दर्शाते हैं; Neogloboquadrina pachyderma ठंडे जल में प्रायः वामावर्त और गर्म में दक्षिणावर्त कुंडलित होता है; कैल्साइट कवचों का δ¹⁸O ताप व हिम-आयतन देता है
ऑस्ट्राकोडाद्विकपाटी क्रस्टेशियाई, निम्न-Mg कैल्साइट कार्पेस सहित; कपाट असमान व हिंजित, पेशी-चिह्न सहित; ऑर्डोविशियन से वर्तमानअलंकरण, मोटाई व समुच्चय-संघटन लवणता, ताप व गहराई दर्शाते हैं; कवच का Mg/Ca व δ¹⁸O जल-ताप देता है
कोनोडॉन्टविलुप्त ईल-सदृश कॉर्डेट के दाँत-जैसे फ़ॉस्फ़ेटी (एपेटाइट) अवयव, जो कई अवयव-प्रकारों के उपकरण बनाते हैं; उत्तर कैम्ब्रियन से अंत-ट्राइऐसिकतेज़ी से विकसित होने के कारण ऑर्डोविशियन से ट्राइऐसिक समुद्री शैलों का मुख्य ज़ोनीकरण। वर्ण-परिवर्तन सूचकांक (CAI 1, हल्का, से CAI 5, काला) अधिकतम तापन को अप्रतिवर्ती रूप से दर्ज करता है: लगभग 50 से 80 °C (CAI 1) से 300 °C से ऊपर (CAI 5) तक
ब्रायोज़ोआऔपनिवेशिक जंतु; प्रत्येक ज़ूऑइड चूनेदार डिब्बे या नली (ज़ूईशियम) में रहता है और लोफ़ोफ़ोर से भोजन करता है; ऑर्डोविशियन से वर्तमान; अधिकांशतः समुद्रीकॉलोनी का रूप जल-ऊर्जा का अनुसरण करता है: विक्षुब्ध जल में पर्पटीय चादरें, शांत जल में खड़ी शाखित या पंखाकार (फ़ेनेस्ट्रेट) कॉलोनियाँ; चीलोस्टोम सीनोज़ोइक शेल्फ़ों पर छाए हैं

6. आकारिकी का सांख्यिकीय विश्लेषण

ऐलोमेट्री (allometry) एक भाग की दूसरे के सापेक्ष वृद्धि को हक्सले के घात-नियम y = a x^b से वर्णित करती है, जो लघुगणकीय आलेख पर ढाल b की सरल रेखा है: log y = log a + b log x। आइसोमेट्री (isometry) (आकार बढ़ने पर आकृति अपरिवर्तित) का अर्थ है कि b वही मान है जो ज्यामिति माँगती है: दो लंबाइयों हेतु 1, लंबाई के सापेक्ष क्षेत्रफल हेतु 2, लंबाई के सापेक्ष आयतन या द्रव्यमान हेतु 3। बड़ा b धनात्मक ऐलोमेट्री और छोटा b ऋणात्मक है। ढाल एक वृद्धि-शृंखला में ओंटोजेनिक, एक आयु के व्यक्तियों में स्थैतिक (static) तथा प्रजातियों के बीच विकासात्मक कहलाती है। उदाहरण: x = 10, y = 4 वाला एक कवच और x = 40, y = 32 वाला दूसरा b = ln 8 / ln 4 = 1.5 देते हैं, अतः x = 90 पर पूर्वानुमानित y = 4 × 9^1.5 = 108 है।

n मापों हेतु माध्य x̄, मानक विचलन s, मानक त्रुटि SE = s / √n तथा विचरण-गुणांक CV = 100 s / x̄ होते हैं। माध्य का 95% विश्वास्यता अंतराल (confidence interval) x̄ ± t s / √n है, जहाँ t स्टूडेंट वितरण से n − 1 स्वातंत्र्य कोटि पर लिया जाता है: n = 16, x̄ = 42.0 mm, s = 6.0 mm व t = 2.131 हेतु अर्ध-चौड़ाई 2.131 × 6 / 4 = 3.20 mm है। प्रतिदर्श चौगुना करने पर अंतराल केवल आधा होता है। द्विबहुलक (bimodal) आमाप-आयतचित्र दो आयु-वर्गों, लैंगिक द्विरूपता या दो प्रजातियों का संकेत देता है, जिसे मान लेना नहीं, परखना चाहिए।

आकृति की तुलना बहुचर विधियों से होती है: मुख्य घटक (principal components) (पहली अक्ष में प्रायः आमाप रहता है), विभेदक विश्लेषण, और भू-चिह्न-आधारित ज्यामितीय आकारमिति (geometric morphometrics), जो आकृति की तुलना से पहले स्थिति, पैमाना व घूर्णन हटा देती है। रॉप की सैद्धांतिक आकारिकी कुंडलित कवच को W (कुंडली-प्रसार दर), D (जनक वक्र की अक्ष से दूरी) तथा T (अक्ष के अनुदिश स्थानांतरण, प्लैनिस्पाइरल कवचों में शून्य) से वर्णित करती है।

⚠️ ढाल सहसंबंध नहीं है
सहसंबंध गुणांक r रेखा के इर्द-गिर्द बिखराव मापता है, ढाल नहीं। समान b वाली दो ऐलोमेट्री रेखाओं के r बहुत भिन्न हो सकते हैं। वृद्धि का निर्णय b और उसके विश्वास्यता अंतराल से, उन आयामों के आइसोमेट्रिक मान से तुलना कर, किया जाता है।

7. कशेरुकी पुराजीवविज्ञान

कशेरुकी कथा संक्रमणों की शृंखला है, जिनमें से प्रत्येक कुछ प्रमुख शारीरिक परिवर्तनों से पहचाना जाता है।

प्रमुख कशेरुकी संक्रमण
संक्रमणमुख्य प्रमाण
मछली से चतुष्पाद (उत्तर डेवोनियन, लगभग 375 से 360 Ma)पालि-पंख मछलियाँ, अंग-सदृश पंख-अस्थियों सहित; Tiktaalik (ग्रीवा, कलाई-सदृश पंख), फिर अंगुलियों वाले Acanthostega व Ichthyostega
ऐम्नियोटऐम्नियोटिक अंडा प्रजनन को जल से मुक्त करता है (कार्बोनिफ़ेरस)। कपाल-छिद्र वर्गीकरण देते हैं: ऐनैप्सिड में कोई नहीं, सिनैप्सिड में एक निचला शंख-छिद्र (थेरैप्सिड, स्तनपायी), डायैप्सिड में दो (छिपकली, साँप, मगरमच्छ, डायनासोर, पक्षी)
थेरैप्सिड से स्तनपायी (ट्राइऐसिक)साइनोडॉन्ट पूर्वज; एकल निचली जबड़ा-अस्थि (डेंटरी) जो स्क्वैमोसल से जुड़ी; पुराने जबड़ा-संधि अस्थियाँ (आर्टिकुलर, क्वाड्रेट) मध्य-कर्ण की मैलियस व इंकस बन जाती हैं; दाँत कृंतक, रदनक, अग्र-चर्वणक व चर्वणक में विभेदित होते हैं
डायनासोर व पक्षीसॉरिश्चियन छिपकली-श्रोणि वाले हैं (थेरोपॉड, सॉरोपोडोमॉर्फ); ऑर्निथिश्चियन पक्षी-श्रोणि वाले हैं (प्यूबिस पीछे इस्कियम के बगल में मुड़ा)। पक्षी थेरोपॉड सॉरिश्चियनों के वंशज हैं; Archaeopteryx (उत्तर जुरैसिक, सोलनहोफ़ेन) में पंख, दाँत व लंबी अस्थिल पूँछ है। टेरोसॉर, इक्थियोसॉर व प्लीसियोसॉर डायनासोर नहीं हैं
व्हेलइंडो-पाकिस्तान क्षेत्र के ईओसीन Pakicetus व संबंधित रूप स्थल से समुद्र के संक्रमण को दर्शाते हैं

दाँत व अंग आहार तथा गति दर्शाते हैं: मांसाहारियों में तीक्ष्ण कर्तन दाँत; चरने वालों में चपटे, उच्च-मुकुट (हाइप्सोडॉन्ट) गाल के दाँत, जो मायोसीन के घास-मैदानों के साथ फैले। भारत का अभिलेख समृद्ध है: उत्तर ट्राइऐसिक मालेरी शैल-समूह (रिंकोसॉर, फ़ाइटोसॉर), आरंभिक जुरैसिक कोटा शैल-समूह (सॉरोपोड Barapasaurus), उत्तर क्रिटेशियस लमेटा शैल-समूह (टाइटैनोसॉर, Rajasaurus, अंडे) और शिवालिक समूह (मायोसीन से प्लाइस्टोसीन के स्तनपायी, वानर Sivapithecus)।

8. पुरापारिस्थितिकी, जीवाश्म व पुरापर्यावरण

पुरापारिस्थितिकी (paleoecology) पुनर्निर्माण करती है कि प्राचीन जीवों का अपने परिवेश से क्या संबंध था। इसके मूल शब्द हैं जीवन-आदत (life habit) (नितलस्थ एपिफ़ौना या इन्फ़ौना, नेक्टन, प्लवक), आहार-विधि (निलंबन, निक्षेप, चराई, मांसाहारी), समुदाय (community) (जो जीव साथ रहे) बनाम समुच्चय (assemblage) (जो साथ दबे, जिनमें परिवहन व काल-औसतीकरण से समुदाय मिल सकते हैं)। विधि एकरूपतावादी है: निकटतम जीवित संबंधी, प्रकार्यात्मक आकारिकी तथा आवरक अवसाद का उपयोग करें, और अनेक स्वतंत्र सूचकों को वरीयता दें।

जीवाश्म प्रमाण व उनके द्वारा संकेतित पर्यावरण
प्रमाणक्या संकेत देता है
हर्मैटिपिक (ज़ूज़ैंथेलेट) भित्ति प्रवालप्रकाशिक मंडल के भीतर गर्म, स्वच्छ, छिछला, सामान्य लवणता वाला जल
स्टेनोहेलाइन समूह (इकाइनोडर्म, ब्रैकियोपोड, सेफ़ैलोपॉड, प्रवाल)सामान्य समुद्री लवणता; उनकी अनुपस्थिति, कुछ बहुल यूरीहेलाइन प्रजातियों (कुछ द्विकपाटी, उदरपाद, ऑस्ट्राकोड) सहित, खारे या अतिलवणीय जल की ओर संकेत करती है
लैमिनायुक्त काला शेल, जैव-विक्षोभ नहीं, नितलस्थ कवच नहींऑक्सीजन-रिक्त तलीय जल
काष्ठीय द्विबीजपत्री वनस्पति में अधिकांशतः पूर्ण-किनारे वाली पत्तियाँगर्म, प्रायः उष्णकटिबंधीय जलवायु; अधिक दंतुर पत्तियाँ ठंडी जलवायु
चिह्न जीवाश्म: Skolithos (ऊर्ध्वाधर आवास-बिल), Cruziana (क्षैतिज भोजन व विश्राम चिह्न), Zoophycos, Nereites (प्रतिरूपित चराई चिह्न)इक्नोफ़ेसीज़: Skolithos, उच्च-ऊर्जा तटीय अग्र-भाग के स्वच्छ गतिशील बालू; Cruziana, शांत निचला तटीय अग्र-भाग से शेल्फ़; Zoophycos, शांत गहरा पंकिल जल; Nereites, गहरे समुद्र के टर्बिडाइट तल

सूचक जीवाश्म (index fossils) शैलों की आयु बताते हैं। वे व्यापक, प्रचुर, तेज़ी से विकसित (छोटा परास), पहचानने में आसान और किसी एक फ़ेसीज़ तक सीमित नहीं होने चाहिए। फ़ेसीज़ जीवाश्म इसके उलट हैं: दीर्घ-परास व आवास से बँधे, अतः वे आयु नहीं, पर्यावरण दिखाते हैं। इसलिए अच्छा पुरापर्यावरण सूचक प्रायः बुरा सूचक जीवाश्म होता है, और उलटा भी।

मुख्य बिंदु

  • जीवन की विविधता तीन विकासात्मक जीव-समूहों (कैम्ब्रियन, पैलियोज़ोइक, आधुनिक) से गुज़रती है। समृद्धि की तुलना रेयरफ़ैक्शन के बाद ही करें; शैनन H = −Σ p ln p का अधिकतम ln S है, सिम्पसन D = Σ p²; विलोपन दर प्रति-व्यक्ति है, q = −ln(N_bt/N_b)/Δt, केवल प्रतिशत नहीं।
  • बिग फ़ाइव (लगभग 445, 372, 252, 201 व 66 Ma) अंत-ऑर्डोविशियन, उत्तर-डेवोनियन, अंत-पर्मियन (सबसे बड़ा), अंत-ट्राइऐसिक व अंत-क्रिटेशियस हैं। विलोपन चयनात्मक है, प्रजाति-हानि प्रायः वंश-हानि से अधिक होती है, और सिग्नॉर–लिप्स प्रभाव आकस्मिक घटनाओं को क्रमिक दिखाता है।
  • ताफ़ोनॉमी बायोस्ट्रैटिनोमी (मृत्यु से निक्षेपण) से डायाजेनेसिस तक चलती है। ऐरागोनाइट कवच घुलकर साँचे छोड़ते हैं, काल-औसतीकरण समुच्चयों को धुँधला करता है, और कॉन्ज़र्वैट लागरश्टेटे (बर्जेस शेल, चेंगजियांग, सोलनहोफ़ेन) मृदु ऊतक बचाते हैं जबकि कॉन्ज़ेंट्रैट निक्षेप केवल कठोर भाग केंद्रित करते हैं।
  • द्विकपाटी के कपाट संधि के आर-पार दर्पण-प्रतिबिंब हैं और प्रत्येक प्रायः असममित; ब्रैकियोपोड के कपाट प्रत्येक सममित व असमान हैं। गहरा पैलियल साइनस गहरे बिलकारी का सूचक है, टॉर्शन कुंडलन नहीं है, और ऐमोनॉइड सीवन गोनियाटाइटिक, सेराटाइटिक, ऐमोनाइटिक क्रम में चलती है।
  • ऐलोमेट्री y = a x^b है, लघुगणकीय अक्षों पर ढाल b, जिसकी तुलना आइसोमेट्रिक 1, 2 या 3 से होती है; r ढाल नहीं है। माध्य का 95% अंतराल x̄ ± t s/√n है, अतः n चौगुना करने पर वह आधा होता है।
  • कशेरुकी इतिहास मछली, चतुष्पाद, ऐम्नियोट, थेरैप्सिड, स्तनपायी के क्रम में चलता है, और पक्षी थेरोपॉड (सॉरिश्चियन) डायनासोरों के भीतर आते हैं, पक्षी-श्रोणि वाले ऑर्निथिश्चियनों के नहीं। सूचक जीवाश्म व्यापक, लघु-परास व फ़ेसीज़-मुक्त होते हैं; फ़ेसीज़ जीवाश्म व इक्नोफ़ेसीज़ (Skolithos, Cruziana, Zoophycos, Nereites) पर्यावरण पढ़ते हैं।

अभ्यास प्रश्न (18)

उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।

  1. किसी स्तरिकीय सीमा की मृत्तिका परत में इरिडियम विसंगति, आघातित क्वार्ट्ज़ कण व गोलिकाएँ हैं, और लगभग 180 km चौड़े एक दबे क्रेटर की आयु उसी समय की निर्धारित हुई है। यह प्रमाण सबसे सीधे किस सामूहिक विलोपन से जुड़ा है?

    1. अंत-ऑर्डोविशियन विलोपन, जिसका कारण गोंडवाना का हिमनदन व समुद्र-तल में गिरावट माना जाता है
    2. अंत-पर्मियन विलोपन, जिसका कारण साइबेरियन ट्रैप ज्वालामुखीयता व महासागरीय अनॉक्सिया माना जाता है
    3. अंत-ट्राइऐसिक विलोपन, जिसका कारण सेंट्रल एटलांटिक मैग्मैटिक प्रॉविंस की ज्वालामुखीयता माना जाता है
    4. अंत-क्रिटेशियस विलोपन, जिसका मुख्य कारण चिक्सुलुब पर बड़ा प्रहार माना जाता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — अंत-क्रिटेशियस विलोपन, जिसका मुख्य कारण चिक्सुलुब पर बड़ा प्रहार माना जाता है

    इरिडियम भूपर्पटी की शैलों में दुर्लभ पर उल्कापिंडों में प्रचुर होता है, और आघातित क्वार्ट्ज़, गोलिकाएँ व लगभग 180 km का क्रेटर बड़े प्रहार के हस्ताक्षर हैं; प्रमाणों का यह समूह लगभग 66 Ma की अंत-क्रिटेशियस सीमा का है। अंत-पर्मियन भ्रामक उत्तर इसलिए है कि वह सबसे बड़ा विलोपन है, पर उसका अभिलेख बाढ़-बैसाल्ट ज्वालामुखीयता व महासागरीय रसायन की ओर संकेत करता है, आघात-लक्षणों की ओर नहीं। अंत-ट्राइऐसिक व अंत-ऑर्डोविशियन घटनाएँ भी क्रमशः ज्वालामुखीयता व हिमनदन से जुड़ी हैं।
  2. एक मापे गए खंड में 12 ऐमोनाइट प्रजातियों की अंतिम उपस्थितियाँ सीमा-मृत्तिका से नीचे की 4 m शैल में फैली हैं, जबकि स्वतंत्र प्रमाण बताते हैं कि सभी 12 सीमा पर एक संक्षिप्त घटना में समाप्त हुईं। आभासी क्रमिक लोप की व्याख्या कौन-सा प्रभाव सबसे अच्छी करता है?

    1. सिग्नॉर–लिप्स प्रभाव: अपूर्ण प्रतिचयन में किसी टैक्सॉन का अंतिम संरक्षित जीवाश्म उसकी सच्ची अंतिम उपस्थिति से नीचे होता है, इसलिए परास पहले समाप्त होते दिखते हैं
    2. लज़ारस प्रभाव: संकट-अंतराल में टैक्सा अभिलेख से लुप्त हो जाते हैं और संकट बीतने व परिस्थितियाँ सुधरने के बाद नवीन शैलों में फिर प्रकट होते हैं
    3. पुल ऑफ़ द रिसेंट: नवीन शैलों का प्रतिचयन बेहतर होता है और उनमें अधिक टैक्सा संरक्षित रहते हैं, इसलिए परास खंड के शीर्ष की ओर ऊपर तक बढ़े दिखते हैं
    4. काल-औसतीकरण: भिन्न आयु के कवच एक ही परत में मिल जाते हैं, इसलिए पुरानी प्रजातियाँ उनके ऊपर की नवीन परतों में पुनःकार्यित मिलती हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — सिग्नॉर–लिप्स प्रभाव: अपूर्ण प्रतिचयन में किसी टैक्सॉन का अंतिम संरक्षित जीवाश्म उसकी सच्ची अंतिम उपस्थिति से नीचे होता है, इसलिए परास पहले समाप्त होते दिखते हैं

    अपूर्ण संरक्षण का अर्थ है कि मिला अंतिम जीवाश्म सच्ची अंतिम उपस्थिति से नीचे होता है, अतः एक घटना क्रमिक ह्रास के रूप में फैली दिखती है: यही सिग्नॉर–लिप्स प्रभाव है। लज़ारस टैक्सॉन के लिए अंतराल के ऊपर पुनः प्रकटन चाहिए, जो यहाँ वर्णित नहीं है। पुल ऑफ़ द रिसेंट नवीन शैलों के बेहतर प्रतिचयन से संबंधित है और वर्तमान के पास विविधता बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है। काल-औसतीकरण से आभासी अंतिम उपस्थितियाँ ऊपर की ओर खिसकतीं (नवीन परतों में पुरानी कवच), जो सीमा के नीचे फैलाव का उलटा है।
  3. एक सामूहिक विलोपन किसी समुद्री समूह के 60% वंशों को हटा देता है। प्रजातियाँ यादृच्छिक रूप से, प्रत्येक वंश में समान प्रायिकता से, लुप्त हुईं और समूह के अधिकांश वंशों में कई प्रजातियाँ हैं। प्रजाति-हानि के बारे में कौन-सा कथन सही है?

    1. प्रजाति-हानि लगभग 60% थी, क्योंकि यादृच्छिक विलोपन में प्रजातियाँ व वंश समान अनुपात में लुप्त होते हैं
    2. प्रजाति-हानि 60% से कम थी, क्योंकि किसी वंश की कोई एक प्रजाति बचे तो वंश बचा रहता है
    3. प्रजाति-हानि 60% से काफ़ी अधिक थी, क्योंकि कोई वंश तभी लुप्त होता है जब उसकी सभी प्रजातियाँ लुप्त हो जाएँ
    4. प्रति प्रजाति व्यक्तियों की संख्या जाने बिना प्रजाति-हानि को वंश-हानि से संबद्ध नहीं किया जा सकता
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — प्रजाति-हानि 60% से काफ़ी अधिक थी, क्योंकि कोई वंश तभी लुप्त होता है जब उसकी सभी प्रजातियाँ लुप्त हो जाएँ

    कोई वंश तभी लुप्त होता है जब उसकी सभी k प्रजातियाँ लुप्त हों। यादृच्छिक प्रजाति-हानि अंश p हो तो वंश-हानि अंश p^k होता है, जो k > 1 हेतु p से छोटा है। अतः 60% वंश-हानि के लिए p^k = 0.6 चाहिए, इसलिए p = 0.6^(1/k) जो 0.6 से काफ़ी अधिक है (k = 3 हेतु p लगभग 0.84)। भ्रामक उत्तर, 60% से कम प्रजाति-हानि, इस तर्क को उलट देता है: बचे वंश वे हैं जिन्होंने कम से कम एक प्रजाति बचाई, पर लुप्त वंशों ने अपनी सभी खोईं, जिससे प्रजाति-प्रतिशत बड़ा हो जाता है।
  4. एक बलुआ पत्थर परत में गैस्ट्रोपोड व द्विकपाटी कवचों के आकार की अनेक गुहिकाएँ हैं पर कवच-पदार्थ नहीं है, जबकि सहवर्ती आर्टिकुलेट ब्रैकियोपोड कवच (निम्न-Mg कैल्साइट) अक्षत हैं। कौन-सी व्याख्या सबसे संभावित है?

    1. कार्बनीकरण ने मोलस्क कवचों के वाष्पशील घटक निकाल दिए और बलुआ पत्थर के परत-तलों पर केवल कार्बन की पतली परतें छोड़ीं
    2. ऐरागोनाइटी मोलस्क कवच दबने के बाद घुल गए और साँचे छोड़ गए, जबकि निम्न-Mg कैल्साइट ब्रैकियोपोड कवच घुलने से बचे रहे
    3. परखनिजीकरण ने मोलस्क कवचों के रंध्र सिलिका से भर दिए, इसलिए वे बाद में ठोस ढलाइयों के रूप में अपक्षयित होकर निकले
    4. काल-औसतीकरण ने अनेक आयु के कवचों को मिला दिया, और परत के बार-बार पुनःकार्यन में मोलस्क कवच नष्ट हो गए
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — ऐरागोनाइटी मोलस्क कवच दबने के बाद घुल गए और साँचे छोड़ गए, जबकि निम्न-Mg कैल्साइट ब्रैकियोपोड कवच घुलने से बचे रहे

    ऐरागोनाइट CaCO3 का कम स्थायी बहुरूप है और डायाजेनेसिस के आरंभ में ही घुल या प्रतिलोमित हो जाता है, जबकि निम्न-Mg कैल्साइट स्थायी है। अतः मोलस्क कवच (ऐरागोनाइट) अक्षत कैल्साइटी ब्रैकियोपोडों के पास बाह्य व आंतरिक साँचों के रूप में बचते हैं। कार्बनीकरण कार्बन-परतें छोड़ता है, आकारित गुहिकाएँ नहीं। परखनिजीकरण कवच-पदार्थ को ही बचाता है, अतः गुहिकाएँ रिक्त नहीं होतीं। काल-औसतीकरण आयुओं को मिलाता है पर किसी एक खनिजिकी को चुनकर नहीं मिटाता।
  5. एक जीवाश्म कवच के दो असमान कपाट हैं। द्विपार्श्विक सममिति का एक तल प्रत्येक कपाट के मध्य से गुज़रता है, और बड़े कपाट की चोंच के पास मांसल वृंत हेतु एक छोटा छिद्र है। कौन-सी पहचान सबसे अधिक समर्थित है?

    1. द्विकपाटी मोलस्क, क्योंकि द्विकपाटियों के कपाट असमान होते हैं और प्रत्येक कपाट का अपना सममिति-तल होता है
    2. उदरपाद, क्योंकि चोंच के पास का छोटा छिद्र द्विकपाटी कवच वाले घोंघे की साइफ़नी नाल है
    3. सीप-प्रकार की द्विकपाटी, क्योंकि एक कपाट दूसरे से बड़ा है और वृंत द्वारा आधार से सीमेंटित है
    4. ब्रैकियोपोड, क्योंकि प्रत्येक कपाट अकेले सममित है और पेडिकल बड़े कपाट से होकर निकलता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — ब्रैकियोपोड, क्योंकि प्रत्येक कपाट अकेले सममित है और पेडिकल बड़े कपाट से होकर निकलता है

    ब्रैकियोपोडों में सममिति-तल दोनों कपाटों को काटता है, अतः प्रत्येक कपाट सममित है, कपाटों का आमाप भिन्न है, और पेडिकल, पेडिकल कपाट के छिद्र से निकलता है। द्विकपाटी मोलस्कों में सममिति-तल दोनों कपाटों के बीच होता है, अतः अकेला कपाट प्रायः असममित होता है। सीप असमान-कपाटी है, जिससे वह भ्रामक उत्तर बनती है, पर उसके कपाट अनियमित हैं और उनमें पेडिकल-छिद्र नहीं होता। उदरपाद का एक कवच होता है, दो कपाट नहीं।
  6. उत्तरी अटलांटिक के एक गहरे-समुद्री कोर में सिनिस्ट्रल (वामावर्त) कुंडलित Neogloboquadrina pachyderma का अंश आधार पर 90% से शीर्ष पर 10% तक लगातार घटता है, जबकि प्लवकी : नितलस्थ फ़ोरैमिनिफ़ेरा अनुपात स्थिर रहता है। कौन-सा निर्वचन सर्वोत्तम है?

    1. सतही जल ऊपर की ओर ठंडा हुआ, क्योंकि इस प्रजाति में वामावर्त कुंडलन ठंडे नहीं, गर्म सतही जल का सूचक है
    2. सतही जल ऊपर की ओर गर्म हुआ, क्योंकि यह प्रजाति ठंडे जल में प्रायः वामावर्त और गर्म जल में दक्षिणावर्त कुंडलित होती है
    3. जल की गहराई ऊपर की ओर बढ़ी, क्योंकि इस प्रजाति द्वारा बसाए गए छिछले शेल्फ़-जल में वामावर्त व्यक्ति प्रमुख होते हैं
    4. लवणता ऊपर की ओर घटी, क्योंकि इस प्रजाति में दक्षिणावर्त कुंडलन खारे जल तक सीमित है
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — सतही जल ऊपर की ओर गर्म हुआ, क्योंकि यह प्रजाति ठंडे जल में प्रायः वामावर्त और गर्म जल में दक्षिणावर्त कुंडलित होती है

    Neogloboquadrina pachyderma में प्रमुख कुंडलन-दिशा सतही ताप का अनुसरण करती है: ठंडे जल में वामावर्त, गर्म में दक्षिणावर्त। अतः 90% से 10% वामावर्त तक की गिरावट ऊपर की ओर तापन दर्ज करती है। गहराई-परिवर्तन प्रायः प्लवकी : नितलस्थ अनुपात खिसकाता, जो यहाँ स्थिर है, और इस प्रजाति में कुंडलन लवणता या गहराई का सूचक नहीं है। जो विकल्प वामावर्त कुंडलन को गर्म जल का सूचक बताता है, वह ताप-संबंध को उलट देता है।
  7. डायनासोर छिपकली-श्रोणि व पक्षी-श्रोणि वाले समूहों में बाँटे जाते हैं। श्रोणि-संरचना और पक्षियों की वंशावली के बारे में कौन-सा कथन सही है?

    1. पक्षी थेरोपॉड डायनासोरों के वंशज हैं, जो छिपकली-श्रोणि वाले सॉरिश्चियन हैं; पक्षी-श्रोणि वाले डायनासोर ऑर्निथिश्चियन हैं
    2. पक्षी ऑर्निथिश्चियनों के वंशज हैं, इसीलिए उस समूह को पक्षी-श्रोणि कहा जाता है और उसमें Archaeopteryx भी शामिल है
    3. छिपकली-श्रोणि वाले सॉरिश्चियनों में प्यूबिस पक्षियों की भाँति इस्कियम के बगल में पीछे मुड़ा होता है, अतः वे पक्षियों के पूर्वज हैं
    4. पक्षी टेरोसॉरों के वंशज हैं, जो पक्षी-श्रोणि डायनासोर समूह के उड़ने वाले सदस्य हैं और अंत-क्रिटेशियस घटना में बचे रहे
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — पक्षी थेरोपॉड डायनासोरों के वंशज हैं, जो छिपकली-श्रोणि वाले सॉरिश्चियन हैं; पक्षी-श्रोणि वाले डायनासोर ऑर्निथिश्चियन हैं

    पक्षी छोटे थेरोपॉडों से विकसित हुए, जो छिपकली-श्रोणि सॉरिश्चियन वंश है; Archaeopteryx उत्तर जुरैसिक का थेरोपॉड-सदृश पक्षी है। ऑर्निथिश्चियनों को पक्षी-श्रोणि इसलिए कहते हैं कि उनका प्यूबिस इस्कियम के बगल में पीछे घूम गया, जो स्थिति पक्षियों ने स्वतंत्र रूप से विकसित की, इसलिए नाम भ्रामक है। टेरोसॉर डायनासोर नहीं हैं और अंत-क्रिटेशियस में विलुप्त हुए।
  8. एक मडस्टोन इकाई में केवल तीन प्रजातियों के लाखों व्यक्ति हैं, सभी पतले कवच वाले द्विकपाटी, उदरपाद व ऑस्ट्राकोड। इस इकाई में इकाइनोडर्म, ब्रैकियोपोड, प्रवाल व सेफ़ैलोपॉड अनुपस्थित हैं, जबकि वे उसके ऊपर व नीचे की परतों में मिलते हैं। कौन-सा पर्यावरण सबसे संभावित है?

    1. सामान्य समुद्री लवणता व समृद्ध, विविध जीव-जात वाला गर्म, स्वच्छ, छिछला भित्ति-समतल
    2. सामान्य समुद्री लवणता वाला खुला बाह्य शेल्फ़, जहाँ ऊपर व नीचे की परतों के सभी स्टेनोहेलाइन समूह फलते-फूलते
    3. खारा लैगून या ज्वारनदमुख, जहाँ केवल यूरीहेलाइन टैक्सा बदलती लवणता सह पाते हैं और उच्च बहुलता तक पहुँच सकते हैं
    4. ठंडा, गहरा, भली-भाँति ऑक्सीजनित बेसिन-तल, जहाँ स्टेनोहेलाइन समूह केवल निम्न ताप के कारण बहिष्कृत हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: C — खारा लैगून या ज्वारनदमुख, जहाँ केवल यूरीहेलाइन टैक्सा बदलती लवणता सह पाते हैं और उच्च बहुलता तक पहुँच सकते हैं

    इकाइनोडर्म, ब्रैकियोपोड, प्रवाल व सेफ़ैलोपॉड स्टेनोहेलाइन हैं और उन्हें सामान्य समुद्री लवणता चाहिए। जिन परतों में वे मिलते हैं उनके बीच उनकी अनुपस्थिति, सहनशील द्विकपाटी, उदरपाद व ऑस्ट्राकोडों के निम्न-विविधता किंतु अति प्रचुर समुच्चय सहित, लैगून या ज्वारनदमुख जैसी उतार-चढ़ाव वाली खारी परिस्थितियाँ दर्शाती है। भित्ति-समतल या खुले शेल्फ़ पर स्टेनोहेलाइन समूह होते, और यह परत समुद्री परतों के बीच है, ठंडे बेसिन-तल पर नहीं, इसलिए केवल ताप इसे नहीं समझाता।
  9. कॉन्ज़र्वैट-लागरश्टेटे के लिए कौन-सा वर्णन उपयुक्त है?

    1. ऐसी परत जिसमें अनेक पीढ़ियों के कठोर भाग धाराओं द्वारा केंद्रित हो गए हों, जैसे अस्थि-परत या कवच-परत
    2. ऐसा बलुआ पत्थर जिसमें कवच घुल गए हों और केवल बाह्य व आंतरिक साँचों के रूप में बचे हों
    3. ऐसा निक्षेप जिसमें अनेक भिन्न आवासों के जीवाश्म परिवहन से आपस में मिल गए हों, जिससे पूरा समुच्चय परस्थानिक हो
    4. ऐसा निक्षेप, जैसे बर्जेस शेल या सोलनहोफ़ेन चूना-पत्थर, जो मृदु ऊतकों या पूरी देह को असाधारण बारीकी से सुरक्षित रखता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: D — ऐसा निक्षेप, जैसे बर्जेस शेल या सोलनहोफ़ेन चूना-पत्थर, जो मृदु ऊतकों या पूरी देह को असाधारण बारीकी से सुरक्षित रखता है

    कॉन्ज़र्वैट-लागरश्टेटे की परिभाषा मृदु ऊतकों या पूरी देह का असाधारण संरक्षण है, जैसे बर्जेस शेल, चेंगजियांग व सोलनहोफ़ेन में। अस्थि-परत जैसा कठोर भागों का संकेंद्रण कॉन्ज़ेंट्रैट-लागरश्टेटे है, जो भ्रामक भ्रम है। साँचे और मिश्रित परिवहित समुच्चय अन्य ताफ़ोनॉमिक परिणाम बताते हैं और मृदु ऊतकों के असाधारण संरक्षण का कोई दावा नहीं करते।
  10. सामूहिक विलोपनों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. विलोपन प्रायः चयनात्मक होता है: संकीर्ण-अनुकूलित, भौगोलिक रूप से सीमित व भित्ति-निर्माता टैक्सा व्यापक सामान्यज्ञों से अधिक पीड़ित होते हैं
    2. लज़ारस टैक्सॉन वह है जो विलोपन में इसलिए बचता है कि उसके व्यक्ति असामान्य रूप से दीर्घजीवी होते हैं
    3. आपदा टैक्सा, जैसे अंत-पर्मियन घटना के बाद द्विकपाटी Claraia व थेरैप्सिड Lystrosaurus, घटना के बाद कुछ समय के लिए प्रचुर हो जाते हैं
    4. किसी विलोपन घटना में लुप्त वंशों का प्रतिशत उसी घटना में लुप्त प्रजातियों के प्रतिशत से प्रायः बड़ा होता है
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — विलोपन प्रायः चयनात्मक होता है: संकीर्ण-अनुकूलित, भौगोलिक रूप से सीमित व भित्ति-निर्माता टैक्सा व्यापक सामान्यज्ञों से अधिक पीड़ित होते हैं; C — आपदा टैक्सा, जैसे अंत-पर्मियन घटना के बाद द्विकपाटी Claraia व थेरैप्सिड Lystrosaurus, घटना के बाद कुछ समय के लिए प्रचुर हो जाते हैं

    विलोपन चयनात्मक होता है, और आपदा टैक्सा अंत-पर्मियन संकट के बाद पनपते हैं, इसलिए ये दो कथन सही हैं। लज़ारस टैक्सॉन वह है जो जीवाश्म-अभिलेख से लुप्त होकर बाद में फिर प्रकट होता है, दीर्घजीवी नहीं। चूँकि वंश तभी लुप्त होता है जब उसकी सभी प्रजातियाँ लुप्त हों, लुप्त वंशों का प्रतिशत प्रायः लुप्त प्रजातियों के प्रतिशत से छोटा होता है, अतः वंश बनाम प्रजाति वाला कथन उलटा है।
  11. अकशेरुकी प्रकार्यात्मक आकारिकी के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. उदरपाद टॉर्शन लार्वा-विकास के दौरान देह-द्रव्यमान का 180° मरोड़ है और शंख के कुंडलन से भिन्न है
    2. नियमित इकाइनॉइड द्विपार्श्विक सममित होते हैं, जिनमें गुदा टेस्ट के शीर्ष से पश्च किनारे की ओर खिसकी होती है
    3. द्विकपाटी में गहरा पैलियल साइनस लंबे साइफ़नों व गहरे बिल खोदने की आदत का सूचक है
    4. ऐमोनॉइड सीवन-रेखाएँ प्रायः डेवोनियन से पर्मियन में गोनियाटाइटिक, ट्राइऐसिक में सेराटाइटिक तथा जुरैसिक व क्रिटेशियस में ऐमोनाइटिक होती हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — उदरपाद टॉर्शन लार्वा-विकास के दौरान देह-द्रव्यमान का 180° मरोड़ है और शंख के कुंडलन से भिन्न है; C — द्विकपाटी में गहरा पैलियल साइनस लंबे साइफ़नों व गहरे बिल खोदने की आदत का सूचक है; D — ऐमोनॉइड सीवन-रेखाएँ प्रायः डेवोनियन से पर्मियन में गोनियाटाइटिक, ट्राइऐसिक में सेराटाइटिक तथा जुरैसिक व क्रिटेशियस में ऐमोनाइटिक होती हैं

    टॉर्शन लार्वा का मरोड़ है जिसका कवच-कुंडलन से संबंध नहीं; पैलियल साइनस साइफ़न-प्रत्यावर्तकों के जुड़ाव को दर्शाता है, अतः गहरा साइनस लंबे साइफ़न व गहरे दबाव का सूचक है; और गोनियाटाइटिक, सेराटाइटिक, ऐमोनाइटिक क्रम सीवन-जटिलता बढ़ने का सामान्य प्रतिरूप है। नियमित इकाइनॉइड अरीय सममित होते हैं और गुदा शीर्ष पर होती है; खिसकी गुदा व द्वितीयक द्विपार्श्विक सममिति अनियमित इकाइनॉइडों में होती है, अतः वह कथन गलत है।
  12. कशेरुकी विकास के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. Tiktaalik, ग्रीवा व कलाई-सदृश पंख-अस्थियों वाली उत्तर डेवोनियन पालि-पंख मछली, मछलियों व चतुष्पादों के बीच का संक्रमणकालीन रूप है
    2. सिनैप्सिड, जिस समूह में थेरैप्सिड व स्तनपायी हैं, के कपाल में प्रत्येक ओर आँख के पीछे एक ही छिद्र होता है
    3. टेरोसॉर व इक्थियोसॉर डायनासोर हैं जो क्रमशः वायु व समुद्र में लौट गए
    4. स्तनपायी कर्ण के विकास में सरीसृप जबड़ा-संधि की आर्टिकुलर व क्वाड्रेट अस्थियाँ मैलियस व इंकस बन गईं
    उत्तर देखें

    उत्तर: A — Tiktaalik, ग्रीवा व कलाई-सदृश पंख-अस्थियों वाली उत्तर डेवोनियन पालि-पंख मछली, मछलियों व चतुष्पादों के बीच का संक्रमणकालीन रूप है; B — सिनैप्सिड, जिस समूह में थेरैप्सिड व स्तनपायी हैं, के कपाल में प्रत्येक ओर आँख के पीछे एक ही छिद्र होता है; D — स्तनपायी कर्ण के विकास में सरीसृप जबड़ा-संधि की आर्टिकुलर व क्वाड्रेट अस्थियाँ मैलियस व इंकस बन गईं

    Tiktaalik मछली-चतुष्पाद का क्लासिक संक्रमणकालीन रूप है; सिनैप्सिड एक निचले शंख-छिद्र से परिभाषित होते हैं; और सरीसृप की आर्टिकुलर व क्वाड्रेट अस्थियाँ मैलियस व इंकस बनीं जब स्तनपायी जबड़ा-संधि डेंटरी व स्क्वैमोसल पर आ गई। टेरोसॉर (उड़ने वाले आर्कोसॉर) व इक्थियोसॉर (समुद्री सरीसृप) डायनासोर नहीं हैं, अतः वह कथन गलत है।
  13. जीवाश्मों व पुरापर्यावरणों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

    1. मृत समुच्चय एकल जीवित समुदाय का तात्कालिक चित्र है, क्योंकि अधिकांश कवच-परतों में काल-औसतीकरण नगण्य होता है
    2. अच्छा सूचक जीवाश्म व्यापक, प्रचुर, तेज़ी से विकसित होने वाला और किसी एक फ़ेसीज़ तक सीमित न होने वाला होता है
    3. काष्ठीय द्विबीजपत्री वनस्पति जिसकी अधिकांश पत्तियों के किनारे दंतुर हों, अधिकांशतः पूर्ण-किनारे वाली वनस्पति से अधिक गर्म जलवायु दर्शाती है
    4. स्वच्छ बालू में Skolithos प्रकार के ऊर्ध्वाधर आवास-बिल उच्च-ऊर्जा तटीय अग्र-भाग पर्यावरण के विशिष्ट हैं
    उत्तर देखें

    उत्तर: B — अच्छा सूचक जीवाश्म व्यापक, प्रचुर, तेज़ी से विकसित होने वाला और किसी एक फ़ेसीज़ तक सीमित न होने वाला होता है; D — स्वच्छ बालू में Skolithos प्रकार के ऊर्ध्वाधर आवास-बिल उच्च-ऊर्जा तटीय अग्र-भाग पर्यावरण के विशिष्ट हैं

    सूचक जीवाश्म व्यापक, प्रचुर, तेज़ी से विकसित और फ़ेसीज़-निरपेक्ष होना चाहिए, और ऊर्ध्वाधर आवास-बिलों का Skolithos इक्नोफ़ेसीज़ उच्च-ऊर्जा बालुई तटीय अग्र-भाग को चिह्नित करता है। मृत समुच्चय प्रायः काल-औसतीकृत होता है और समुदायों को मिला सकता है, इसलिए वह तात्कालिक चित्र नहीं है। गर्म जलवायु में पूर्ण-किनारे वाली पत्तियाँ प्रबल होती हैं, दंतुर नहीं, अतः पत्ती वाला कथन उलटा है।
  14. एक परत में चार प्रजातियों के 40, 30, 20 व 10 व्यक्ति हैं। शैनन H = −Σ p_i ln p_i का उपयोग कर, जहाँ p_i प्रजाति i के व्यक्तियों का अनुपात है और प्राकृतिक लघुगणक लिया गया है, H का मान ____ है (उत्तर दशमलव के दो स्थानों तक दें)।

    संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।

    उत्तर देखें

    उत्तर: 1.28

    p = 0.40, 0.30, 0.20, 0.10। पद −p ln p हैं: 0.4 × 0.9163 = 0.3665, 0.3 × 1.2040 = 0.3612, 0.2 × 1.6094 = 0.3219 तथा 0.1 × 2.3026 = 0.2303। इनका योग 1.2799 है, यानी 1.28। चार प्रजातियों हेतु अधिकतम ln 4 = 1.39 होता, अतः परत काफ़ी सम है।
  15. 4 Myr लंबे एक स्टेज में 120 वंश उसकी निचली सीमा पार करते हैं। इनमें से 30 उसकी ऊपरी सीमा भी पार करते हैं और शेष 90 स्टेज के भीतर विलुप्त हो जाते हैं। 40 और वंश स्टेज के भीतर ही उत्पन्न होकर विलुप्त हो जाते हैं। q = −ln(N_bt / N_b) / Δt का उपयोग करें, जहाँ N_b निचली सीमा पार करने वाले टैक्सा की संख्या, N_bt दोनों सीमाएँ पार करने वालों की संख्या और Δt Myr में लंबाई है। प्रति-व्यक्ति विलोपन दर q, प्रति Myr में, ____ है (उत्तर दशमलव के तीन स्थानों तक दें)।

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    उत्तर: 0.347

    N_b = 120 और N_bt = 30, अतः N_bt / N_b = 0.25 और −ln 0.25 = 1.3863। Δt = 4 Myr से भाग देने पर q = 0.3466, यानी 0.347 प्रति Myr। स्टेज तक सीमित 40 वंश किसी सीमा को पार नहीं करते और नहीं गिने जाते; बचे हुओं के स्थान पर 90 (विलुप्त संख्या) ले लेना प्रचलित भूल है।
  16. N = 10 जीवाश्म व्यक्तियों के एक प्रतिदर्श में तीन प्रजातियों के 6, 3 व 1 व्यक्ति हैं। प्रतिस्थापन के बिना दो व्यक्ति यादृच्छिक रूप से चुने जाते हैं। E(S_n) = Σ [1 − C(N − N_i, n) / C(N, n)] का उपयोग कर, जहाँ N_i प्रजाति i की गिनती है, n = 2 के उपप्रतिदर्श में प्रजातियों की प्रत्याशित संख्या ____ है (उत्तर दशमलव के एक स्थान तक दें)।

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    उत्तर: 1.6

    C(10, 2) = 45। 6 व्यक्तियों वाली प्रजाति हेतु C(4, 2) = 6, अतः 1 − 6/45 = 0.8667। 3 व्यक्तियों हेतु C(7, 2) = 21, अतः 1 − 21/45 = 0.5333। 1 व्यक्ति हेतु C(9, 2) = 36, अतः 1 − 36/45 = 0.2। योग 1.6 है। जाँच: दोनों चुने व्यक्तियों के एक ही प्रजाति के होने की प्रायिकता (15 + 3 + 0)/45 = 0.4 है, अतः E(S_2) = 1 × 0.4 + 2 × 0.6 = 1.6।
  17. एक ब्रैकियोपोड समष्टि में दो नमूने मापे गए: छोटे हेतु x = 4 mm व y = 10 mm, और बड़े हेतु x = 64 mm व y = 40 mm। मान लें कि y = a x^b ठीक-ठीक लागू है। x = 100 mm वाले नमूने के लिए y का पूर्वानुमानित मान, mm में, ____ है।

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    उत्तर: 50

    लघुगणकीय आलेख पर ढाल b = ln(40/10) / ln(64/4) = ln 4 / ln 16 = 0.5 है, जो दो लंबाइयों हेतु आइसोमेट्रिक मान 1 से कम है, अतः यह ऋणात्मक ऐलोमेट्री है। तब y(100) = 10 × (100/4)^0.5 = 10 × 5 = 50 mm। घात-नियम के स्थान पर सरल रेखीय बहिर्वेशन करना प्रचलित भूल है।
  18. n = 25 ब्रैकियोपोड कवचों की लंबाइयों का माध्य 30.0 mm और मानक विचलन 5.0 mm है। माध्य के 95% विश्वास्यता अंतराल हेतु x̄ ± t s / √n का उपयोग करें, t = 2.064 (24 स्वातंत्र्य कोटि) के साथ। निचली से ऊपरी सीमा तक अंतराल की पूरी चौड़ाई, mm में, ____ है (उत्तर दशमलव के दो स्थानों तक दें)।

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    उत्तर: 4.13

    मानक त्रुटि s / √n = 5.0 / 5 = 1.0 mm है। अर्ध-चौड़ाई t × SE = 2.064 mm है, अतः अंतराल 27.94 से 32.06 mm है और उसकी पूरी चौड़ाई 2 × 2.064 = 4.128, यानी 4.13 mm है। केवल अर्ध-चौड़ाई (2.06) बता देना प्रचलित भूल है।