जलभूविज्ञान: सरंध्रता व पारगम्यता, जलभृत गुण, डार्सी नियम, भूजल प्रवाह, कूप जलगतिकी व अन्वेषण
2. भूजल की उपस्थिति, संग्रहण व जलभृत गुण
सतह के नीचे असंतृप्त (वैडोज़) मंडल में मृदा-जल, मध्यवर्ती जल व केशिका-झालर होती है; जल-स्तर (दाब वायुमंडलीय के बराबर) के नीचे संतृप्त मंडल में भूजल होता है। जलभृत उपयोगी जल देता है; अर्ध-पारगम्य स्तर (aquitard) कम पारगम्य परत है जो रिसती है; अपारगम्य स्तर (aquiclude) (मृत्तिका) नगण्य जल संचारित करता है। अपरिबद्ध जलभृत का जल-स्तर मुक्त होता है। परिबद्ध जलभृत अर्ध-पारगम्य स्तरों के बीच होता है, उसका जल दाब में रहता है और कूप में दाबमापी तल (piezometric surface) तक चढ़ता है; वह तल भू-सतह से ऊपर हो तो कूप स्वतः बहता है (आर्टीजियन)। आसीन (perched) जल-स्तर मुख्य जल-स्तर के ऊपर किसी स्थानीय अर्ध-पारगम्य स्तर पर टिका होता है।
- विशिष्ट उत्पादन S_y: जल-स्तर की प्रति इकाई गिरावट पर प्रति इकाई क्षेत्रफल अपरिबद्ध जलभृत से रंध्र निकालकर मिलने वाले जल का आयतन; प्रारूपिक रूप से 0.01 से 0.3।
- विशिष्ट संग्रहण S_s: शीर्ष की प्रति इकाई गिरावट पर जलभृत के प्रति इकाई आयतन से जल के प्रत्यास्थ प्रसार व कंकाल के संहनन द्वारा निकला आयतन, S_s = ρg(α + nβ)। संग्रहण गुणांक S = S_s b विमाहीन है: परिबद्ध जलभृतों में लगभग 10⁻⁵ से 10⁻³, जबकि अपरिबद्ध में S ≈ S_y।
- संचारणता (transmissivity) T = K b (m²/d) पूरी संतृप्त मोटाई b से इकाई प्रवणता में प्रति इकाई चौड़ाई प्रवाह है, अतः चौड़ाई w के आर-पार Q = T i w।
निकला जल V = S·A·Δh है। 50 km² के अपरिबद्ध जलभृत में S_y = 0.12 हो तो जल-स्तर की 2 m गिरावट 50 × 10⁶ × 0.12 × 2 = 120 लाख m³ जल निकालती है। समान क्षेत्र का परिबद्ध जलभृत, S = 2 × 10⁻⁴ पर, 20 m शीर्ष-गिरावट में केवल 2 लाख m³ देता है: वह जल दाब-मुक्ति से देता है, रंध्र खाली करके नहीं, और पूर्णतः संतृप्त रहता है। जल-स्तर उतार-चढ़ाव विधि में किसी ऋतु का पुनर्भरण प्रति इकाई क्षेत्रफल R = S_y Δh है (साथ में निकासी, यदि देखी गई वृद्धि पंपिंग से घटी हुई शुद्ध वृद्धि हो)।
3. डार्सी नियम व उसकी सीमाएँ
हेनरी डार्सी (1856) ने डिजॉन के रेत-फ़िल्टरों पर कार्य करते हुए पाया कि निस्सरण क्षेत्रफल व शीर्ष-हानि के अनुक्रमानुपाती तथा लंबाई के व्युत्क्रमानुपाती है: q = Q/A = −K dh/dl = K i, तथा Q = K i A। द्रवचालित शीर्ष h = z + p/(ρg) है (उच्चता व दाब-शीर्ष का योग; वेग-शीर्ष नगण्य)। जल उच्च से निम्न कुल शीर्ष की ओर चलता है, आवश्यक नहीं कि उच्च से निम्न दाब की ओर। प्रवणता i = Δh/L विमाहीन है।
डार्सी अभिवाह q प्रति इकाई क्षेत्रफल प्रति समय आयतन है, जल की चाल नहीं। जल केवल प्रभावी रंध्रों से चलता है, अतः अंतःस्रवण (औसत रैखिक) वेग v_s = q/n_e है, q से अधिक, और दूरी L का यात्रा-काल L/v_s है। उदाहरण: 250 m दूर कूपों में शीर्ष 105.2 m व 104.7 m से i = 0.002; K = 20 m/d व n_e = 0.25 पर q = 0.04 m/d, v_s = 0.16 m/d, और 400 m में 2500 दिन (लगभग 6.8 वर्ष) लगते हैं। प्रवणता व उसकी दिशा तय करने हेतु तीन कूप चाहिए: प्रवाह प्रवणता के अनुदिश, शीर्ष-समोच्चों के लंबवत होता है।
- सीमाएँ। डार्सी नियम स्तरीय प्रवाह हेतु लगभग 1 से 10 के रेनॉल्ड्स संख्या (कण-आकार पर आधारित) तक मान्य है। यह मोटी बजरी या खुले विभंगों में उच्च वेग पर, विशेषतः पंपित कूप के निकट, विफल होता है, और संतृप्त प्रवाह हेतु है, क्योंकि असंतृप्त मंडल में K नमी पर निर्भर है।
- प्रयोगशाला K। स्थिर-शीर्ष पारगम्यतामापी (रेत): K = VL/(A h t)। पतित-शीर्ष पारगम्यतामापी (गाद, मृत्तिका): K = (aL/At) ln(h₁/h₂)। छोटे नमूने विभंग व परतें चूक जाते हैं, अतः प्रतिनिधि K क्षेत्र के पंपन-परीक्षण देते हैं।
- प्रवाह-जाल व डुपुई। प्रवाह-जाल में प्रवाह-रेखाएँ समविभव रेखाओं को समकोण पर काटती हैं और प्रति इकाई चौड़ाई q = K H N_f/N_d (N_f प्रवाह-नलिकाएँ, N_d शीर्ष-पात)। L दूर दो जल-स्तरों h₁ व h₂ के बीच अपरिबद्ध प्रवाह हेतु डुपुई q = K(h₁² − h₂²)/(2L) देता है।
4. द्रवचालित चालकता व भूजल प्रवाह गतिकी
अपवर्तन। चालकता K₁ व K₂ वाले माध्यमों की सीमा पर प्रवाह-रेखाएँ ऐसे मुड़ती हैं कि tan θ₁/tan θ₂ = K₁/K₂ (θ सीमा के अभिलंब से मापा): वे कम चालक परत में अभिलंब की ओर मुड़ती हैं। प्रवाह उच्च-K परतों में केंद्रित होता है, इसीलिए रेत-बजरी के लेंस, दबी जलधाराएँ व विभंग-क्षेत्र अधिकांश जल वहन करते हैं।
शासी समीकरण। समांगी समदैशिक माध्यम में स्थायी प्रवाह हेतु शीर्ष लाप्लास समीकरण ∇²h = 0 का पालन करता है। परिबद्ध जलभृत में अस्थायी प्रवाह हेतु ∂²h/∂x² + ∂²h/∂y² = (S/T) ∂h/∂t। अनुपात T/S द्रवचालित विसरणशीलता है: परिबद्ध जलभृतों में यह बड़ी है (S छोटा), अतः एक बिंदु का दाब-परिवर्तन दूर तक शीघ्र अनुभव होता है, जबकि अपरिबद्ध जलभृत में प्रतिक्रिया धीमी है क्योंकि S ≈ S_y बड़ा है।
प्रादेशिक प्रवाह। पुनर्भरण (वर्षा, प्रभावी नदियाँ, नहरें, सिंचाई-प्रत्यागम) स्थलाकृतिक उच्च स्थानों पर प्रवेश करता है और निम्न स्थानों पर झरनों, बहि:स्रावी नदियों, आर्द्रभूमि व वाष्पोत्सर्जन के रूप में निकलता है। जल-स्तर स्थलाकृति की मंद प्रतिकृति है, और प्रवाह-तंत्र स्थानीय, मध्यवर्ती व प्रादेशिक (टोथ) रूप में एक-दूसरे में बसे होते हैं। पुनर्भरण क्षेत्र में शीर्ष गहराई के साथ घटता है (अधोमुखी प्रवाह); निस्सरण क्षेत्र में शीर्ष गहराई के साथ बढ़ता है (ऊर्ध्वमुखी प्रवाह, आर्टीजियन स्थिति संभव)। प्राकृतिक वेग छोटे हैं, सेंटीमीटर से कुछ मीटर प्रति दिन, अतः आवास-काल वर्षों से सहस्राब्दियों तक चलता है।
5. कूप जलगतिकी
पंपन कूप के चारों ओर शीर्ष घटाकर अवनमन शंकु (cone of depression) बनाता है; अवनमन s = h₀ − h। परिबद्ध जलभृत में पूर्ण-भेदी कूप की ओर स्थायी अरीय प्रवाह (थीम, साम्य) हेतु, त्रिज्याओं r₁ व r₂ पर शीर्ष h₁ व h₂ के साथ, Q = 2πT(h₂ − h₁)/ln(r₂/r₁), अर्थात् s₁ − s₂ = [Q/(2πT)] ln(r₂/r₁)। अपरिबद्ध जलभृत हेतु Q = πK(h₂² − h₁²)/ln(r₂/r₁)। उदाहरण: Q = 1800 m³/d, T = 600 m²/d, 5 m व 50 m पर प्रेक्षण-कूपों से s₁ − s₂ = (1800/(2π × 600)) × ln 10 = 1.10 m।
थीस (असाम्य) त्रिज्या r व समय t पर अवनमन देता है: s = Q W(u)/(4πT), u = r²S/(4Tt)। यह एकसमान मोटाई व अनंत विस्तार के परिबद्ध, समांगी, समदैशिक जलभृत, नगण्य व्यास के पूर्ण-भेदी कूप, आरंभ में समतल दाबमापी तल, स्थिर Q तथा संग्रहण से तात्कालिक निर्मुक्ति मानता है। u < 0.05 (बाद के समय, या छोटे r) पर कूपर-जैकब रूप अर्ध-लघुगणकीय आलेख पर सीधी रेखा है: s = [2.303Q/(4πT)] log₁₀(2.25Tt/(r²S))। प्रति लघुगणकीय चक्र अवनमन Δs से T = 2.303Q/(4πΔs) ≈ 0.183Q/Δs मिलता है, और जिस समय t₀ पर रेखा s = 0 को काटे उससे S = 2.25Tt₀/r²। उदाहरण: Q = 1200 m³/d व Δs = 0.5 m से T = 440 m²/d।
सीमाओं को प्रतिबिंब कूपों से सँभाला जाता है। अपारगम्य सीमा (भ्रंश, आधार-शैल की दीवार) समान दर से पंप करते प्रतिबिंब कूप की तरह कार्य करती है, अतः अवनमन तेज़ी से बढ़ता है और अर्ध-लघुगणकीय ढाल दोगुना हो जाती है। पुनर्भरण सीमा (बारहमासी नदी) प्रतिबिंब अंतःक्षेपण कूप की तरह कार्य करती है, अतः अवनमन समतल हो स्थिर होता है। कूप-निष्पादन: विशिष्ट क्षमता Q/s_w है, और पंपित कूप में कुल अवनमन s_w = BQ + CQ² है, जहाँ BQ रैखिक जलभृत-हानि व CQ² छन्नी व आवरण से विक्षुब्ध प्रवाह की कूप-हानि है। पास के कूपों के अवनमन जुड़ते हैं (अध्यारोपण)। पुनः-प्राप्ति परीक्षण, अवशिष्ट अवनमन बनाम t/t′ से, T स्वतंत्र रूप से देता है। अपरिबद्ध जलभृत में थीस समीकरण तभी प्रयोज्य है जब अवनमन संतृप्त मोटाई b की तुलना में छोटा हो, s′ = s − s²/(2b) से संशोधन के बाद।
6. भूजल अन्वेषण
अन्वेषण सस्ते से महँगे की ओर चलता है: भूविज्ञान, भू-आकृतिविज्ञान, वर्षा व वर्तमान कूपों का डेस्क-अध्ययन; सुदूर संवेदन व GIS (रेखीयता, अपवाह-घनत्व, भू-आकृतिक इकाइयाँ व भूमि-उपयोग, भारित अध्यारोपण से संभावित क्षेत्रों में संयोजित); क्षेत्रीय जलभूविज्ञान (कूप-सूची, जल-स्तर समोच्च, झरने, गुणवत्ता); भूभौतिकी; लॉगिंग सहित परीक्षण-ड्रिलिंग; और अंत में पंपन-परीक्षण। जलोढ़ व घाटी-भरावों में लक्ष्य मोटी रेत-बजरी व दबी जलधाराएँ हैं। कार्स्ट में लक्ष्य विलयन से चौड़ी संधियाँ व नलिकाएँ हैं। बेसाल्ट में पुटिकामय व संधित क्षेत्र, अपक्षयित शीर्ष व प्रवाह-अंतराल परतें हैं। क्रिस्टलीय कठोर शैल (ग्रेनाइट-नाइस) में जल अपक्षयित आवरण व उसके नीचे के विभंगों में होता है, अतः अनुकूल स्थल स्थलाकृतिक निम्न स्थानों में मोटा अपक्षय, रेखीयता-प्रतिच्छेदन व विभंग-क्षेत्र हैं, जबकि ताज़ा विशाल शैल शुष्क है और डाइक अवरोध का कार्य कर सकता है।
| विधि | क्या संवेदित करती है | भूजल में उपयोग |
|---|---|---|
| विद्युत प्रतिरोधकता (VES) | गहराई के साथ प्रतिरोधकता-स्तरण | जलभृत व आधार-शैल की गहराई, अपक्षय की मोटाई, मीठे-खारे का अंतर |
| भूकंपीय अपवर्तन | P-तरंग वेग-स्तरण | असंगठित आवरण में जल-स्तर व आधार-शैल |
| विद्युतचुंबकीय व VLF | पार्श्व चालकता-परिवर्तन | विभंग व अपरूपण क्षेत्र, मृत्तिका-लेंस |
| गुरुत्व व चुंबकीय | घनत्व व सुग्राहिता-अंतर | दबी घाटियाँ व बेसिन; डाइक व भ्रंश |
ऊर्ध्वाधर विद्युत ध्वनन में धारा-इलेक्ट्रोड किसी निश्चित केंद्र के सममित फैलाए जाते हैं। वेनर विन्यास (अंतराल a) हेतु आभासी प्रतिरोधकता ρ_a = 2πa ΔV/I तथा श्लमबर्जर विन्यास हेतु ρ_a = π(L² − l²)/(2l) · ΔV/I (L = AB/2, l = MN/2) है। आर्ची नियम प्रतिरोधकता को स्वच्छ संतृप्त संरचना के रंध्रों से जोड़ता है: F = ρ₀/ρ_w = a φ^(−m), स्वच्छ रेत हेतु a ≈ 1 व m ≈ 2 (प्रश्न में बताए गए मान लें)। φ = 0.25 व जल-प्रतिरोधकता 20 Ωm हेतु F = 16 व ρ₀ = 320 Ωm। उच्च सरंध्रता, लवणीय जल व मृत्तिका-अंश से प्रतिरोधकता घटती है। बोरहोल लॉग चित्र पूरा करते हैं: प्रतिरोधकता व स्वतः-विभव लॉग परतें पहचानते हैं, और गामा लॉग मृत्तिका दर्शाता है।
मुख्य बिंदु
- सरंध्रता n = V_v/V, n = S_y + S_r व n_e ≤ n; K = kρg/μ। स्तरित भूमि में K_h = ΣK_i b_i/Σb_i व K_v = Σb_i/Σ(b_i/K_i)। उच्च सरंध्रता का अर्थ उच्च पारगम्यता नहीं।
- निकला जल V = S A Δh: अपरिबद्ध में S ≈ S_y (0.01–0.3) रंध्र खाली करता है, परिबद्ध में S (लगभग 10⁻⁵–10⁻³) प्रत्यास्थ संग्रहण से आता है। T = Kb, और जल-स्तर उतार-चढ़ाव से पुनर्भरण S_y Δh जोड़ निकासी है।
- डार्सी: q = Ki व Q = KiA; प्रवाह कुल शीर्ष h = z + p/ρg का अनुसरण करता है। अंतःस्रवण वेग v_s = q/n_e। नियम स्तरीय प्रवाह (Re लगभग 1–10 से नीचे) हेतु मान्य है।
- प्रवाह tan θ₁/tan θ₂ = K₁/K₂ से अपवर्तित होता है; अस्थायी प्रवाह ∂²h/∂x² + ∂²h/∂y² = (S/T)∂h/∂t का अनुसरण करता है। पुनर्भरण क्षेत्रों में अधोमुखी व निस्सरण क्षेत्रों में ऊर्ध्वमुखी शीर्ष-प्रवणता होती है।
- थीम (परिबद्ध): s₁ − s₂ = [Q/(2πT)] ln(r₂/r₁)। थीस: s = QW(u)/(4πT), u = r²S/(4Tt)। कूपर-जैकब (u < 0.05): T = 2.303Q/(4πΔs), S = 2.25Tt₀/r²। अपारगम्य सीमा अर्ध-लघुगणकीय ढाल दोगुना करती है; पुनर्भरण सीमा उसे समतल करती है।
- अन्वेषण भूविज्ञान, भू-आकृतिविज्ञान, रेखीयताओं व GIS से करें, फिर भूभौतिकी (VES: वेनर हेतु ρ_a = 2πaΔV/I) व लॉग से। आर्ची F = ρ₀/ρ_w = aφ^(−m); निम्न प्रतिरोधकता मृत्तिका या लवणीय जल हो सकती है, अच्छा जलभृत नहीं।
अभ्यास प्रश्न (18)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
एक मृत्तिका-परत की तुलना एक भली-भाँति वर्गीकृत मोटी रेत की परत से की जाती है। कौन-सा कथन सही है?
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उत्तर: A — मृत्तिका की कुल सरंध्रता अधिक हो सकती है पर चालकता बहुत कम, क्योंकि उसके रंध्र सूक्ष्म हैं और जल को थामे रखते हैं
मृत्तिका की कुल सरंध्रता (प्रायः 40 प्रतिशत या अधिक) रेत से अधिक हो सकती है, पर रंध्र सूक्ष्म होते हैं और जल कणों से बँधा रहता है, अतः K कई कोटि छोटा होता है। चालकता रंध्र-आकार व संयोजन पर निर्भर है, केवल सरंध्रता पर नहीं, इसलिए मृत्तिका के अधिक K का दावा गलत है। महीन कण गुरुत्व के विरुद्ध अधिक जल थामते हैं, अतः बड़ा विशिष्ट धारण रेत का नहीं, मृत्तिका का होता है।एक संतृप्त रेत की सरंध्रता 0.38 है। गुरुत्व से मुक्त निकास के बाद भी वह अपने कुल आयतन के 9 प्रतिशत के बराबर जल थामे रहती है। उसका विशिष्ट उत्पादन है
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उत्तर: C — 0.29, सरंध्रता में से विशिष्ट धारण घटाने पर
सरंध्रता n = S_y + S_r के रूप में बँटती है। निकास के बाद रुका जल (0.09) विशिष्ट धारण है, अतः S_y = 0.38 − 0.09 = 0.29। मान 0.09 स्वयं धारण है, 0.38 का अर्थ होता कि कोई जल रुकता ही नहीं, और दोनों राशियाँ जोड़ना संबंध n = S_y + S_r को तोड़ता है।जब परिबद्ध जलभृत में शीर्ष गिरता है, तो संग्रहण से निकलने वाला जल मुख्यतः आता है
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उत्तर: D — रंध्र-दाब घटने पर जल के प्रसार व कंकाल के संहनन से, जबकि जलभृत संतृप्त बना रहता है
परिबद्ध जलभृत में रंध्र भरे रहते हैं: शीर्ष-गिरावट रंध्र-दाब घटाती है, अतः जल थोड़ा फैलता है और कंकाल सिकुड़ता है, यही छोटे संग्रहण गुणांक S = S_s b को परिभाषित करता है। विशिष्ट उत्पादन वाला रंध्रों का गुरुत्व-निकास अपरिबद्ध जलभृतों का है। केशिका-झालर से वाष्पन व ऊपर से निकास परिबद्ध संग्रहण से निर्मुक्ति का वर्णन नहीं करते।एक ही स्थल के दो पीज़ोमीटरों की छन्नियाँ एक आधार-तल से 90 m व 70 m की उच्चता पर हैं। उथले पीज़ोमीटर में जल आधार-तल से 98 m पर और गहरे में 95 m पर स्थित है। दोनों छन्नियों के बीच ऊर्ध्वाधर प्रवाह है
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उत्तर: A — अधोमुखी, क्योंकि कुल शीर्ष उथली छन्नी पर 98 m व गहरी छन्नी पर 95 m है, अतः शीर्ष गहराई के साथ घटता है
कुल शीर्ष आधार-तल से ऊपर जल-स्तर है: उथली छन्नी पर 98 m व गहरी पर 95 m। प्रवाह उच्च से निम्न कुल शीर्ष की ओर होता है, अतः यह अधोमुखी है, पुनर्भरण स्थिति। दाब-शीर्ष (8 m व 25 m) भ्रामक है: गहराई पर दाब अधिक है, फिर भी प्रवाह दाब का अनुसरण नहीं करता। केवल उच्चता भी दिशा तय नहीं करती, और भिन्न कुल शीर्ष का अर्थ है कि प्रवाह है।संतृप्त रेत में डार्सी अभिवाह q व अंतःस्रवण वेग v_s के बारे में कौन-सा कथन सही है?
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उत्तर: B — v_s = q/n_e, अतः रंध्र-जल q से तेज़ चलता है, क्योंकि प्रवाह अनुप्रस्थ-काट के केवल भाग से होता है
डार्सी अभिवाह निस्सरण को पूरे अनुप्रस्थ-काट क्षेत्रफल से भाग देने पर मिलता है, पर जल केवल प्रभावी रंध्रों से निकल सकता है, अतः वास्तविक औसत चाल v_s = q/n_e है, जो q से अधिक है क्योंकि n_e < 1। यात्रा-काल व अनुरेखक-चाल इसीलिए v_s लेते हैं। अभिवाह रंध्र-चाल नहीं है, और n_e से गुणा करने वाले संबंध प्रवाह की ज्यामिति उलट देते हैं।निम्नलिखित में से किस स्थिति में डार्सी का रैखिक नियम सबसे कम संभावना से मान्य होगा?
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उत्तर: B — पंपित कूप के निकट मोटी बजरी या खुले विभंग से तीव्र प्रवाह, जहाँ रेनॉल्ड्स संख्या 10 से अधिक है
डार्सी नियम स्तरीय, श्यानता-प्रधान प्रवाह मानता है, जो रेनॉल्ड्स संख्या लगभग 1 से 10 तक मान्य है। बजरी या खुले विभंग में पंपित कूप के निकट वेग इतने अधिक होते हैं कि जड़त्वीय व विक्षुब्ध हानियाँ आ जाती हैं, अतः अभिवाह व प्रवणता का संबंध अरैखिक हो जाता है। महीन रेत, गाद या प्रादेशिक बलुआ पत्थर जलभृत में धीमा प्रवाह इस नियम का मानक क्षेत्र है।परिबद्ध जलभृत के पंपन-परीक्षण में अवनमन को लघुगणकीय समय के सापेक्ष आलेखित करने पर वह पहले एक सीधी रेखा और बाद में दोगुने ढाल की दूसरी सीधी रेखा का अनुसरण करता है। इसकी सर्वोत्तम व्याख्या है
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उत्तर: B — एकल अपारगम्य सीमा, जो समान दर से पंप करते प्रतिबिंब कूप के तुल्य है
अपारगम्य सीमा अवनमन शंकु को परावर्तित करती है, जो समान चिह्न व समान दर वाले दूसरे कूप के तुल्य है, अतः उसका प्रभाव पहुँचने के बाद अवनमन-दर दोगुनी हो जाती है और अर्ध-लघुगणकीय ढाल दोगुना हो जाता है। पुनर्भरण सीमा या रिसने वाला अर्ध-पारगम्य स्तर जल देकर वक्र को समतल करते हैं, और विलंबित-उत्पादन प्रभाव अंतिम ढाल दोगुना करने के बजाय बीच के भाग को समतल करता है।एक पूर्ण-भेदी कूप 300 m²/d संचारणता के परिबद्ध जलभृत से 1500 m³/d पंप करता है। स्थायी अरीय प्रवाह मानिए। कूप से 20 m व 200 m पर प्रेक्षण-कूपों के अवनमन का अंतर लगभग है
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उत्तर: C — 1.83 m, [Q/(2πT)] ln(200/20) से
थीम का समीकरण s₁ − s₂ = [Q/(2πT)] ln(r₂/r₁) = [1500/(2π × 300)] × ln 10 = 0.7958 × 2.3026 = 1.83 m देता है। मान 0.80 दशमक लघुगणक लेता है जो समीकरण के इस रूप में गलत है, 0.92 थीस वाला हर 4π लेता है, और 11.5 में 2π छूट गया है।एक जलोढ़ मैदान में ऊर्ध्वाधर विद्युत ध्वनन 25 m से 60 m गहराई के बीच निम्न प्रतिरोधकता की परत दर्शाता है। ड्रिलिंग से पहले कौन-सी व्याख्या सबसे अधिक तर्कसंगत है?
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उत्तर: D — यह मृत्तिका या लवणीय जल से संतृप्त रेत हो सकती है, अतः उन्हें अलग करने हेतु लॉग, शैल-विज्ञान व जल-गुणवत्ता के आँकड़े चाहिए
मृत्तिका व लवणीय जल से संतृप्त रेत, दोनों की प्रतिरोधकता निम्न होती है, और उनमें से केवल एक उपयोगी मीठे जल का जलभृत है, अतः ध्वनन अकेले निर्णय नहीं कर सकता। मीठे जल की रेत की प्रतिरोधकता मध्यम से उच्च होती है, न्यूनतम नहीं। शुष्क रेत उच्च प्रतिरोधी है, संचालक नहीं, और ताज़ा अनपक्षयित क्रिस्टलीय शैल संतृप्त अवसादों से कहीं अधिक प्रतिरोधी होता है।ग्रेनाइट-नाइस भूभाग में बोर-कूप हेतु कौन-सा स्थल सर्वोत्तम प्रथम लक्ष्य है?
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उत्तर: D — रेखीयता-प्रतिच्छेदन पर स्थलाकृतिक निम्न स्थान, विभंगित शैल पर मोटे अपक्षय के ऊपर
क्रिस्टलीय शैल में जल अपक्षयित आवरण व उसके नीचे के विभंगों में होता है, अतः सर्वोत्तम स्थल मोटे अपक्षय व प्रतिच्छेदी रेखीयताओं वाले निम्न स्थान हैं, जो पुनर्भरण व विभंगन केंद्रित करते हैं। ताज़ा विशाल शैल, पहाड़ी की चोटी या पतली मृदा वाला तीव्र कगार कम संग्रहण, कम अंतःस्यंदन और कम खुले विभंग देता है।जलभृत के संग्रहण गुणों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — शीर्ष में समान गिरावट पर अपरिबद्ध जलभृत प्रति इकाई क्षेत्रफल परिबद्ध से कहीं अधिक जल निकालता है, क्योंकि S_y परिबद्ध संग्रहण गुणांक से बहुत बड़ा है; C — संचारणता T = Kb की विमा लंबाई के वर्ग प्रति इकाई समय है
S_y (0.01 से 0.3) परिबद्ध S (लगभग 10⁻⁵ से 10⁻³) से कोटियों बड़ा है, और T = K × b की इकाई m²/d है। विशिष्ट धारण गुरुत्व के विरुद्ध थमा जल है, जो मुक्त निकास का उलटा है, और संग्रहण गुणांक S = S_s b विमाहीन है; प्रति इकाई लंबाई के व्युत्क्रम की इकाई वाली राशि विशिष्ट संग्रहण S_s है।भूजल प्रवाह के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: B — परतों के समानांतर प्रवाह हेतु प्रभावी चालकता मोटाई-भारित समांतर माध्य है, और परतों के आर-पार प्रवाह हेतु हरात्मक माध्य; C — दो माध्यमों की सीमा पर प्रवाह-रेखाएँ ऐसे अपवर्तित होती हैं कि tan θ₁/tan θ₂ = K₁/K₂, कोण अभिलंब से मापे जाते हैं
मोटाई-भारित समांतर माध्य (समानांतर प्रवाह) व हरात्मक माध्य (परतों के आर-पार) स्तरित माध्यम के मानक परिणाम हैं, और अपवर्तन का स्पर्शज्या नियम tan θ₁/tan θ₂ = K₁/K₂ है। जल कुल शीर्ष के अनुदिश नीचे चलता है, अतः गहरे बिंदु पर दाब अधिक होने पर भी उथले बिंदु से प्रवाह नहीं मिलता। अंतःस्रवण वेग v_s = q/n_e डार्सी अभिवाह से बड़ा है, छोटा नहीं।कूप जलगतिकी के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — थीस हल एक परिबद्ध, समांगी, समदैशिक अनंत विस्तार वाले जलभृत और नगण्य व्यास के पूर्ण-भेदी कूप को मानता है; D — बारहमासी नदी जैसी पुनर्भरण सीमा प्रतिबिंब अंतःक्षेपण कूप की तरह कार्य करती है और अवनमन को समतल कर देती है
बताई गई थीस मान्यताएँ मानक हैं, और पुनर्भरण सीमा प्रतिबिंब अंतःक्षेपण कूप जैसा व्यवहार करती है इसलिए अवनमन समतल होता है। कूपर-जैकब रेखा छोटे u (बाद के समय) हेतु मान्य है, बड़े u हेतु नहीं। s_w = BQ + CQ² में रैखिक पद BQ जलभृत-हानि और द्विघात पद CQ² कूप-हानि है, जो दिए गए कथन का उलटा है।एक रेत जलभृत में 300 m दूर दो प्रेक्षण-कूपों के शीर्ष 52.4 m व 51.2 m हैं। द्रवचालित चालकता 15 m/d और प्रभावी सरंध्रता 0.20 है। भूजल को अंतःस्रवण वेग से प्रवाह-रेखा के अनुदिश 600 m चलने में लगा समय ____ दिन है।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 2000
प्रवणता i = (52.4 − 51.2)/300 = 0.004। डार्सी अभिवाह q = K i = 15 × 0.004 = 0.06 m/d। अंतःस्रवण वेग v_s = q/n_e = 0.06/0.20 = 0.30 m/d। समय = 600/0.30 = 2000 दिन। v_s के स्थान पर q लेने पर 10 000 दिन आते।25 km² क्षेत्रफल के अपरिबद्ध जलभृत का विशिष्ट उत्पादन 0.08 है। मानसून-पूर्व व मानसून-पश्चात सर्वेक्षणों के बीच जल-स्तर 2.4 m बढ़ा। यह वृद्धि उसी अवधि में जलभृत से निकाली गई 13 लाख m³ की ऋतुगत निकासी से घटी हुई शुद्ध वृद्धि है; अन्य अंतर्वाह व बहिर्वाह नगण्य हैं। जल-स्तर उतार-चढ़ाव विधि से सकल पुनर्भरण (शुद्ध संग्रहण-वृद्धि जोड़ निकासी) ____ मिलियन m³ है, एक दशमलव स्थान तक।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 6.1
शुद्ध संग्रहण-वृद्धि = S_y × Δh × A = 0.08 × 2.4 × 25 × 10⁶ = 4.8 × 10⁶ m³ = 4.8 मिलियन m³। चूँकि वह वृद्धि निकासी निकलने के बाद की है, सकल पुनर्भरण = 4.8 + 1.3 = 6.1 मिलियन m³। 4.8 बताने से पुनर्भरण निकाली गई मात्रा जितना कम आँका जाता।तीन क्षैतिज परतें एक-दूसरे के ऊपर हैं: 4 m मोटी K = 12 m/d की, 2 m मोटी K = 0.3 m/d की और 4 m मोटी K = 6 m/d की। अनुक्रम की प्रभावी ऊर्ध्वाधर द्रवचालित चालकता, दो दशमलव स्थान तक, ____ m/d है।
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उत्तर: 1.30
परतों के आर-पार प्रवाह हेतु K_v = Σb_i/Σ(b_i/K_i)। कुल मोटाई = 10 m। Σ(b_i/K_i) = 4/12 + 2/0.3 + 4/6 = 0.3333 + 6.6667 + 0.6667 = 7.6667 d। K_v = 10/7.6667 = 1.30 m/d। समांतर माध्य, 7.26 m/d, क्षैतिज चालकता है और ऊर्ध्वाधर प्रवाह हेतु गलत है, जहाँ पतली 0.3 m/d की परत नियंत्रण करती है।Q = 2400 m³/d पर पंपन-परीक्षण का कूपर-जैकब विश्लेषण समय के प्रति log₁₀ चक्र Δs = 0.8 m अवनमन देता है। सीधी रेखा r = 30 m पर प्रेक्षण-कूप में t₀ = 0.002 d पर शून्य अवनमन को काटती है। T = 2.303Q/(4πΔs) व S = 2.25Tt₀/r² का प्रयोग करें। संग्रहण गुणांक S, 10⁻³ के गुणज के रूप में व दो दशमलव स्थान तक, ____ × 10⁻³ है।
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उत्तर: 2.75
T = 2.303 × 2400/(4π × 0.8) = 5527.2/10.053 = 549.8 m²/d। S = 2.25 × 549.8 × 0.002/30² = 2.474/900 = 2.749 × 10⁻³, यानी 2.75 × 10⁻³। ढाल से T मिलता है और उसके बाद ही अंतःखंड से S; r² = 900 के स्थान पर 30 लेने पर मान 30 गुना अधिक आता।एक स्वच्छ संतृप्त रेत की सरंध्रता 0.20 व रंध्र-जल प्रतिरोधकता 15 Ωm है। आर्ची नियम ρ₀ = ρ_w a φ^(−m) में a = 1 व m = 2 लें। रेत की समग्र प्रतिरोधकता ____ Ωm है।
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उत्तर: 375
संरचना-गुणक F = a φ^(−m) = 0.20^(−2) = 25। समग्र प्रतिरोधकता ρ₀ = F × ρ_w = 25 × 15 = 375 Ωm। φ^(−m) के स्थान पर φ^m लेने पर 0.6 Ωm आता, जो रंध्र-जल की प्रतिरोधकता से बहुत कम है और इसलिए उस शैल हेतु असंभव है जिसमें विद्युतरोधी कण भी हैं।