भू-पृष्ठीय प्रक्रियाएँ: ढाल, नदी, पवन, हिमनद, तटीय व ज्वालामुखीय भू-आकृतियाँ
2. अपवाह द्रोणी, प्रवाह-क्रम व अपवाह-प्रतिरूप
अपवाह द्रोणी (drainage basin) वह क्षेत्र है जो एक निर्गम को जल देता है, जल-विभाजक से घिरा। स्ट्रेलर क्रमण में शीर्ष-धाराएँ क्रम 1 हैं; जहाँ समान क्रम u की दो धाराएँ मिलती हैं, नीचे की धारा क्रम u + 1 की होती है, और असमान क्रमों के संगम पर ऊँचा क्रम बना रहता है। हॉर्टन का धारा-संख्या नियम: क्रम के साथ धाराओं की संख्या गुणोत्तर रूप से घटती है, और अनुपात Rb = N(u) ÷ N(u+1) द्विशाखन अनुपात (bifurcation ratio) है, संरचना-प्रभावहीन द्रोणियों में प्रायः 3 से 5। अधिकतम क्रम Ω व स्थिर Rb वाली द्रोणी में प्रथम-क्रम धाराओं की संख्या Rb^(Ω−1) होती है। क्रम 1 से 4 की 64, 16, 4 व 1 धाराओं वाली द्रोणी में प्रत्येक चरण पर Rb = 4 है।
अपवाह घनत्व (drainage density) Dd = नालों की कुल लंबाई ÷ द्रोणी क्षेत्रफल (km प्रति km²)। यह अपारगम्य, विरल वनस्पति, सरलता से अपरदित या अति आर्द्र भूमि पर उच्च, और पारगम्य, सघन वनस्पति वाले भूभाग पर निम्न होता है। 12.5 km² की द्रोणी में 40 km नाले हों तो Dd = 3.2 km/km²। उच्च Dd का अर्थ तीव्र बाढ़-प्रतिक्रिया है, क्योंकि जल शीघ्र नालों तक पहुँचता है।
| प्रतिरूप | रूप | विशिष्ट नियंत्रक |
|---|---|---|
| वृक्षाकार (dendritic) | तीक्ष्ण कोणों पर वृक्ष-सदृश शाखन | एकसमान प्रतिरोध: क्षैतिज या स्थूल चट्टान |
| जालीनुमा (trellis) | लंबी समानांतर मुख्य धाराएँ, छोटी समकोण सहायक | वलित कठोर व कोमल स्तरों का एकांतरण |
| आयताकार (rectangular) | मुख्य व सहायक धाराओं में समकोण मोड़ | प्रतिच्छेदी संधियाँ व भ्रंश |
| अरीय (radial) | धाराएँ केंद्र से बाहर की ओर | गुंबद या ज्वालामुखी शंकु |
| अभिकेंद्री (centripetal) | धाराएँ निम्न बिंदु की ओर भीतर | द्रोणी, क्रेटर या अवसादी गर्त |
| समानांतर (parallel) | सीधी, लगभग समानांतर धाराएँ | एकसमान तीव्र प्रादेशिक ढाल |
| वलयाकार (annular) | केंद्र के चारों ओर वलय-सदृश धाराएँ | कठोर व कोमल वलयों वाला अपरदित गुंबद |
| अव्यवस्थित (deranged) | कोई समेकित जाल नहीं, अनेक झीलें | हिमनदन के बाद का नव भूभाग |
3. नदी-प्रक्रियाएँ, दीर्घ परिच्छेदिका व नदीय भू-आकृतियाँ
नदी घुलित भार, निलंबित भार व तल-भार (लुढ़कते, सरकते व उछलते कण) ढोती है। एकसमान प्रवाह हेतु तल अपरूपण प्रतिबल τ_b = ρ g h S है (जल घनत्व ρ = 1000 kg/m³, गहराई h, तल-ढाल S)। व्यास D का कण तब चलना आरंभ करता है जब शील्ड्स प्राचल (Shields parameter) τ* = τ_b ÷ [(ρ_s − ρ) g D] क्रांतिक मान τ*c तक पहुँचे, विक्षुब्ध प्रवाह में बजरी हेतु लगभग 0.03 से 0.06। अतः चलने वाला सबसे बड़ा कण D = τ_b ÷ [τ*c (ρ_s − ρ) g] है। हल उदाहरण (g = 9.8 m/s², ρ_s = 2650 kg/m³, τ*c = 0.05 लें): h = 1.5 m व S = 0.002 हेतु τ_b = 1000 × 9.8 × 1.5 × 0.002 = 29.4 Pa और D = 29.4 ÷ (0.05 × 1650 × 9.8) = 0.0364 m, लगभग 36 mm। D, h व S के रैखिक अनुपात में बदलता है।
दीर्घ परिच्छेदिका (long profile) (ऊँचाई बनाम दूरी) अवतल-ऊपर होती है: शीर्ष में तीव्र व स्थूल तल-भार वाली, नीचे जहाँ जल-विसर्जन बड़ा है वहाँ मंद व महीन-कणीय। संतुलित (graded) नदी अपनी परिवहन-क्षमता व अवसाद-आपूर्ति में संतुलन रखती है। आधार-तल (base level) वह निम्नतम स्तर है जिस तक नदी काट सकती है (अंततः समुद्र-तल, या स्थानीय रूप से झील या प्रतिरोधी कगार)। आधार-तल का गिरना या उत्थान निक-बिंदु (knickpoint) बनाता है, जलप्रपात जैसा तीव्र सोपान, जो ऊपरधारा की ओर खिसकता है और नदी उसके पीछे गहरा काटकर वेदिकाएँ (terraces) छोड़ती है; आधार-तल का चढ़ना नदी को अवसाद जमाने की ओर ले जाता है।
- ऊपरी मार्ग: V-आकार घाटियाँ, तीव्र धाराएँ, प्लंज-पूल सहित जलप्रपात, जलगर्त व गार्ज।
- विसर्प (meanders): बाहरी कटाव-तट पर, जहाँ प्रवाह सबसे तेज़ है, अपरदन और भीतरी तट पर बिंदु-रोधिका (point bar) का निक्षेपण; वक्रता (sinuosity) = नाले की लंबाई ÷ घाटी की लंबाई। ग्रीवा-कटाव गोखुर झील (oxbow lake) छोड़ता है।
- बाढ़-मैदान: उफान की बाढ़ें नाले के पास स्थूल प्राकृतिक तटबंध (levee) और दूर महीन पश्च-दलदल कीचड़ बनाती हैं। गुंफित (braided) नदियाँ (उच्च तल-भार, अपरदनशील तट, परिवर्ती जल-विसर्जन) मध्य-नाला रोधिकाओं के चारों ओर बँटती हैं; विसर्पी नदियाँ संसंजी तटों में महीन भार ढोती हैं।
- जलोढ़ पंख (alluvial fan) जहाँ धारा पर्वत-सम्मुख छोड़कर बंधन खो देती है; डेल्टा जहाँ वह स्थिर जल में मिलती है: नदी-प्रधान (पंजा-आकार, मिसिसिपी), तरंग-प्रधान (चापाकार, नील), ज्वार-प्रभावित (गंगा–ब्रह्मपुत्र)।
4. पवन: परिवहन, अपरदनी रूप व बालुका-स्तूप
पवन कणों को निलंबन (धूल), उछलन (saltation) (रेत का प्रक्षेप-पथों पर उछलना, रेत हेतु प्रमुख विधा) और पृष्ठीय विसर्पण (उछलते कणों के आघात से धकेले गए स्थूल कण) द्वारा चलाती है। वायु जल से लगभग 800 गुना हल्की है, अतः पवन केवल रेत व उससे महीन पदार्थ ढोती है। देहली से ऊपर रेत-फ़्लक्स लगभग अपरूपण-वेग के घन के अनुपात में बढ़ता है, q ∝ u*³ (बैगनोल्ड), अतः u* तिगुना करने पर फ़्लक्स 27 गुना हो जाता है।
- अपस्फीति (deflation) महीन कण उड़ाकर अपस्फीति गर्त (blowout) व पथरीला मरु-फ़र्श (desert pavement) छोड़ती है।
- भूमि के निकट उछलती रेत का अपघर्षण फलकित गोटियाँ (वात-घर्षित, ventifacts), पवन के समानांतर धारारेखित कटक (यारडांग, yardangs) व पादपीठ-शैल गढ़ता है।
- लोएस (loess) पवन-निक्षेपित, अस्तरित सिल्ट है जो ऊर्ध्व भृगुओं में खड़ी रहती है, हिमनदीय बहाव-निक्षेपों व मरुस्थल-किनारों से आई।
| स्तूप | पवन व रेत-आपूर्ति | आकार |
|---|---|---|
| बरखान (barchan) | एक प्रमुख दिशा, सीमित रेत | अर्धचंद्र, सींग पवन की दिशा में (अनुपवन) |
| अनुप्रस्थ (transverse) | एक दिशा, प्रचुर रेत | पवन के लंबवत लहरदार कटक |
| रैखिक (seif) | दो तिर्यक पवन-दिशाएँ | परिणामी परिवहन-दिशा में लंबे कटक |
| तारा (star) | अनेक दिशाओं की पवनें | केंद्रीय शिखर व अरीय भुजाएँ; ऊपर उठता है, मुश्किल से खिसकता है |
| परवलयिक (parabolic) | एक दिशा, आंशिक वनस्पति आवरण | U-आकार, भुजाएँ पवन के विपरीत पीछे, नासिका पवन की दिशा में आगे |
प्रत्येक खिसकते स्तूप का पवनाभिमुख (स्टॉस) पार्श्व मंद, लगभग 10° से 15°, होता है और पवन-विमुख पार्श्व पर विश्राम कोण पर स्लिप फ़ेस (slip face), लगभग 30° से 34°। कण शिखर पर से लुढ़कते हैं, अतः स्तूप पवन की दिशा में आगे बढ़ता है और तिर्यक संस्तरण (cross-bedding) छोड़ता है जिसके फ़ोरसेट पवन की दिशा में झुके होते हैं। थार मरुस्थल में बरखान, रैखिक व अनुप्रस्थ स्तूप तथा अन्य रूप मिलते हैं।
5. हिमनद: अपरदनी व निक्षेपणी भू-आकृतियाँ
हिमनद (glacier) संहत हिम (फ़र्न) से बना गतिशील बर्फ़ पिंड है। यह आंतरिक विरूपण तथा दाब-गलन बिंदु पर पिघले जल पर तलीय सर्पण से चलता है। संतुलन-रेखा (equilibrium line) (निवल द्रव्यमान-संतुलन शून्य) के ऊपर हिम संचित होती है; उसके नीचे बर्फ़ क्षय होती है, और संचय क्षय से अधिक होने पर हिमनद आगे बढ़ता है। बर्फ़ उत्पाटन (plucking) (संधित चट्टान का उखड़ना) तथा तल में जकड़े चट्टानी खंडों के घर्षण से अपरदन करती है, जो पॉलिश व खरोंचें (striations) छोड़ता है। गंगोत्री, जिसका मुख गौमुख भागीरथी को जल देता है, हिमालयी घाटी हिमनद है।
| भू-आकृति | वर्णन |
|---|---|
| सर्क (झील भरने पर टार्न) | घाटी हिमनद के शीर्ष पर आरामकुर्सी-सा गर्त |
| अरेत व हॉर्न | सर्कों के बीच छुरी-धार कटक; कई सर्कों के मिलन पर पिरामिडी शिखर |
| U-आकार घाटी | तीव्र दीवारें, समतल तल, कटे स्पर |
| लटकती घाटी | गहरी हुई मुख्य घाटी के ऊपर ऊँचाई पर छूटी सहायक घाटी, प्रायः जलप्रपात सहित |
| फ़ियॉर्ड (fjord) | समुद्र में डूबी हिमनदीय द्रोणी, मुख पर उथली देहली |
| रॉश मूतोने (roche moutonnée) | आधार-शैल टीला, बर्फ़ आने की (ऊपरधारा) ओर चिकना व मंद ढाल, अनुप्रवाह ओर तीव्र व उत्पाटित |
निक्षेप दो प्रकार के हैं। टिल (till) सीधे बर्फ़ द्वारा छोड़ा जाता है, मृत्तिका से शिलाखंड तक अवर्गीकृत व अस्तरित। बहाव-निक्षेप (outwash) वर्गीकृत व स्तरित होता है, पिघले जल द्वारा जमा। हिमोढ़ (moraine) टिल के कटक हैं: पार्श्विक, मध्यवर्ती (घाटी हिमनदों के संगम के नीचे दो पार्श्विक हिमोढ़ों के मिलने से), अंतिम (end), जो अधिकतम अग्रसरण दर्शाता है, तथा तलीय हिमोढ़। ड्रमलिन (drumlin) टिल की धारारेखित अंडाकार पहाड़ियाँ हैं, प्रवाह की दिशा में लंबी, तीव्र भोथरा सिरा बर्फ़ आने की (ऊपरधारा) ओर। एस्कर (esker) अवहिमनदीय धाराओं से बने रेत-बजरी के लंबे सर्पिल कटक हैं, केम (kame) पिघले जल के टीले, केटल (kettle) दबी बर्फ़ पिघलने से बने गर्त, और वार्व (varve) हिमनदीय झीलों में ग्रीष्म की स्थूल व शीत की महीन वार्षिक परतों के युग्म हैं। इरैटिक (erratic) अपने स्रोत से दूर ढोए गए शिलाखंड हैं।
6. महासागर व तट
तरंगें अपनी तरंगदैर्ध्य के लगभग आधे गहराई पर तल का अनुभव करती हैं; उथले जल में वे धीमी, तीव्र ढाल वाली होकर टूटती हैं। तिरछे आने वाली तरंगें जल को तट पर तिरछा चढ़ाती हैं (स्वाश) जबकि प्रतिप्रवाह ढाल पर सीधा उतरता है, अतः रेत तटीय अपवाह (longshore drift) के रूप में तट के साथ टेढ़ी-मेढ़ी चलती है। अपवर्तन (refraction) तरंग-अग्रों को तट की ओर मोड़कर ऊर्जा अंतरीपों पर केंद्रित करता है, जो कटते हैं, जबकि खाड़ियों में रेत जमती है।
- अपरदनी रूप: समुद्री भृगु व खाँच, तरंग-कटित मंच (wave-cut platform), तथा संधित अंतरीप से क्रम गुफा, मेहराब, स्टैक, ठूँठ।
- निक्षेपणी रूप: स्पिट (spit) (एक सिरे से स्थल से जुड़ा कटक), खाड़ीमुख रोधिका, टोम्बोलो (tombolo) (द्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ती रोधिका), पीछे लैगून सहित रोधक द्वीप, और ज्वारीय समतल व मैंग्रोव, जैसे सुंदरबन में।
- समुद्र-तल परिवर्तन: उन्मज्जित (emergent) तटों पर उठे समुद्र-तट व समुद्री वेदिकाएँ मिलती हैं; निमज्जित (submergent) तटों पर रिया (ria) (डूबी नदी-घाटियाँ) व फ़ियॉर्ड मिलते हैं।
- प्रवाल भित्तियाँ: झालरदार (fringing), रोधक (barrier) व एटोल (atoll)। डार्विन का क्रम धँसते ज्वालामुखीय द्वीप का झालरदार से रोधक भित्ति और फिर एटोल बनना है; लक्षद्वीप के द्वीप अधिकांशतः एटोल हैं।
7. ज्वालामुखीय भू-आकृतियाँ
ज्वालामुखी का रूप उसके मैग्मा की श्यानता व गैस-मात्रा के अनुसार बनता है। तरल बेसाल्ट दूर तक बहकर मंद ढाल वाली संरचनाएँ बनाता है; श्यान, गैस-समृद्ध एंडेसाइट व रायोलाइट निर्गम के निकट ढेर बनते हैं या विस्फोट करते हैं।
| संरचना | मैग्मा व शैली | आकार |
|---|---|---|
| शील्ड ज्वालामुखी | तरल बेसाल्ट, प्रवाही | केवल कुछ अंश ढाल वाला चौड़ा गुंबद (मौना लोआ) |
| स्ट्रैटोवोल्केनो (मिश्रित) | एंडेसाइट से डेसाइट, लावा व ज्वालामुखी-खंडाश्म की एकांतर परतें | तीव्र, अवतल-ऊपरमुखी शंकु (फ़ूजी, वेसुवियस) |
| सिंडर (स्कोरिया) शंकु | निर्गम से उछला बेसाल्टी स्कोरिया | विश्राम कोण के निकट ढाल वाला छोटा शंकु |
| लावा गुंबद | अति श्यान रायोलाइटी या डेसाइटी लावा | निर्गम पर तीव्र पार्श्व वाला टीला |
| काल्डेरा | विशाल विस्फोटक उद्गार मैग्मा-कक्ष रिक्त करता है | छत धँसने से चौड़ा वृत्ताकार गर्त |
| बाढ़-बेसाल्ट पठार | अति तरल बेसाल्ट के दरार-उद्गार | सोपानी (ट्रैप) भूभाग में परतदार प्रवाह, जैसे दक्कन ट्रैप |
बेसाल्ट लावा के दो पृष्ठीय रूप हैं: चिकना, रस्सीनुमा पाहोइहोइ (pahoehoe) और खुरदरा, क्लिंकरदार आ (aa); जल के नीचे यह गोलक (पिलो) लावा बनाता है। शीतलन-संकुचन से स्तंभाकार संधियाँ बनती हैं। खंडाश्मी उत्पाद राख, लैपिली व बम हैं, और तप्त ज्वालामुखीय-खंडाश्म प्रवाह (pyroclastic flows) वेल्डित टफ़ छोड़ते हैं। दक्कन ट्रैप लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व के दरार-उद्गारों का उत्पाद हैं, और अंडमान सागर का बैरन द्वीप भारत का एकमात्र ऐतिहासिक रूप से सक्रिय ज्वालामुखी है।
मुख्य बिंदु
- ढाल तब विफल होते हैं जब चालक प्रतिबल अपरूपण सामर्थ्य से अधिक हो जाए, और जल प्रायः ट्रिगर होता है। पतन, सर्पण, प्रवाह व विसर्पण टैलस, कगार, जिह्वाएँ व उत्तल-अवतल ढाल छोड़ते हैं। प्रवणता = tan θ, प्रतिशत = 100 tan θ, अतः 100 % ढाल 45° है।
- स्ट्रेलर क्रम वहाँ बढ़ता है जहाँ समान क्रम मिलते हैं; Rb = N(u) ÷ N(u+1) और N1 = Rb^(Ω−1)। अपवाह घनत्व = नाला-लंबाई ÷ क्षेत्रफल। अपवाह-प्रतिरूप संरचना दर्ज करते हैं: वृक्षाकार एकसमान, जालीनुमा वलित स्तर, आयताकार संधियाँ, अरीय गुंबद।
- कण तब चलता है जब τ_b = ρ g h S मान τc (ρ_s − ρ) g D से अधिक हो, अतः D = τ_b ÷ [τc (ρ_s − ρ) g]। दीर्घ परिच्छेदिका अवतल-ऊपर है; आधार-तल का गिरना निक-बिंदु बनाता है जो ऊपरधारा की ओर पीछे हटता और वेदिकाएँ छोड़ता है।
- पवन रेत को उछलन से चलाती है, फ़्लक्स u*³ से बढ़ता है। अपस्फीति गर्त, मरु-फ़र्श, वात-घर्षित गोटियाँ व यारडांग अपरदनी हैं; बरखान, अनुप्रस्थ, रैखिक, तारा व परवलयिक स्तूप तथा लोएस निक्षेपणी हैं, जिनके स्लिप फ़ेस विश्राम कोण पर हैं।
- हिमनद उत्पाटन व घर्षण से अपरदन कर सर्क, अरेत, हॉर्न, U-घाटियाँ, लटकती घाटियाँ व फ़ियॉर्ड बनाते हैं, और टिल (हिमोढ़, ड्रमलिन) तथा वर्गीकृत गलित-जल निक्षेप (एस्कर, केम, बहाव-निक्षेप) जमा करते हैं। ड्रमलिन निक्षेपणी है, रॉश मूतोने अपरदनी।
- तरंगें अंतरीपों पर अपवर्तित होती हैं और रेत को तट के साथ ले जाकर स्पिट, टोम्बोलो व रोधिकाएँ बनाती हैं। ज्वालामुखी का आकार मैग्मा के अनुसार है: तरल बेसाल्ट शील्ड व बाढ़-बेसाल्ट पठार बनाता है, श्यान एंडेसाइट स्ट्रैटोवोल्केनो व गुंबद, और काल्डेरा-धँसाव चौड़ा अवनमन छोड़ता है।
अभ्यास प्रश्न (17)
उत्तर खोलने से पहले प्रत्येक प्रश्न हल करें। हर व्याख्या सही विकल्प के साथ लुभावना गलत विकल्प भी बताती है, क्योंकि अंक वहीं जाते हैं।
एक पहाड़ी ढाल पर पेड़ों के तने आधार के पास ऊपर की ओर मुड़े हैं और बाड़ के खंभे ढाल की ओर झुके हैं। इसका सबसे संभावित कारण कौन-सी वृहद्-संचलन प्रक्रिया है?
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उत्तर: A — मृदा विसर्पण, सतही मृदा परत की धीमी सतत अधोढाल गति
मुड़े तने व झुके खंभे धीमे, सतत विसर्पण का प्रमाण हैं: वृक्ष सीधा बढ़ता रहता है जबकि मृदा खिसकती है, अतः आधार मुड़ जाता है। घूर्णी सर्पण भ्रामक विकल्प है, पर वह अचानक होता है, अर्धचंद्राकार कगार व पीछे झुका खंड छोड़ता है और तनों को चिकने वक्र में नहीं मोड़ता। शैल-पतन व मलबा-प्रवाह तीव्र घटनाएँ हैं और क्रमशः टैलस व जिह्वाएँ छोड़ते हैं।1:25 000 पैमाने के एक भू-आकृतिक मानचित्र पर 20 m ऊँचाई-अंतर वाली दो आसन्न समोच्च रेखाएँ 5 cm दूर हैं। उनके बीच औसत ढाल प्रतिशत (उन्नयन ÷ दूरी × 100) में, एक दशमलव स्थान तक, क्या है? केवल संख्या लिखिए।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 1.6
धरातलीय दूरी = 5 cm × 25 000 = 125 000 cm = 1250 m। ढाल = 20 m ÷ 1250 m = 0.016, यानी 1.6 %। सामान्य भूल मानचित्र की 5 cm दूरी को मीटर मान लेना, या प्रतिशत के बजाय कोण (लगभग 0.9°) लिखना है।वलित अवसादी स्तरों के एक क्षेत्र में, जहाँ प्रतिरोधी बलुआ पत्थर के कटक और कमज़ोर शेल की घाटियाँ एकांतर हैं, लंबी मुख्य धाराएँ स्ट्राइक-घाटियों के साथ समानांतर बहती हैं और छोटी सहायक धाराएँ कटकों के पार्श्वों से लगभग समकोण पर उतरकर उनसे मिलती हैं। यह कौन-सा अपवाह-प्रतिरूप है?
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उत्तर: D — जालीनुमा, क्योंकि मुख्य धाराएँ झुके एकांतर स्तरों की कमज़ोर स्ट्राइक-घाटियों का अनुसरण करती हैं
जालीनुमा अपवाह वलित या झुके एकांतर कठोर-कोमल स्तरों का लक्षण है: मुख्य धाराएँ कमज़ोर स्ट्राइक-घाटियों में रहती हैं और छोटी सहायक धाराएँ कटकों को काटती हैं। आयताकार अपवाह भ्रामक विकल्प है, क्योंकि उसमें भी समकोण संगम दिखते हैं, पर वहाँ मोड़ लगभग एकसमान प्रतिरोध वाली चट्टानों की संधियों व भ्रंशों से आते हैं और स्ट्राइक-घाटियों की लंबी समानांतर धाराएँ नहीं होतीं।एक अपवाह द्रोणी में 81 प्रथम-क्रम धाराएँ हैं और प्रत्येक क्रम पर उसका द्विशाखन अनुपात स्थिर 3 है। यदि उच्चतम क्रम का नाला एकल धारा है, तो द्रोणी-निर्गम का स्ट्रेलर क्रम क्या है?
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 5
Rb = 3 होने पर क्रम 1 से 5 की गणनाएँ 81, 27, 9, 3, 1 घटती हैं। समतुल्य रूप से N1 = Rb^(Ω−1) से 81 = 3^4, अतः Ω − 1 = 4 और Ω = 5। 4 उत्तर चार विभाजनों को पाँच क्रमों के स्थान पर गिनने से आता है।एक जलग्रहण का क्षेत्रफल 12.5 km² है और उसके सभी नालों की कुल लंबाई 40 km है। उसका अपवाह घनत्व km/km² में, एक दशमलव स्थान तक, क्या है? केवल संख्या लिखिए।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 3.2
अपवाह घनत्व = नालों की कुल लंबाई ÷ द्रोणी क्षेत्रफल = 40 km ÷ 12.5 km² = 3.2 km/km²। अनुपात उलटने पर 0.31 आता है, जो प्रति इकाई लंबाई क्षेत्रफल है, घनत्व नहीं।एक स्थिर, एकसमान नदी 1.5 m गहरी है और उसके तल का ढाल 0.002 है। g = 9.8 m/s², जल-घनत्व 1000 kg/m³, कण-घनत्व 2650 kg/m³ व क्रांतिक शील्ड्स प्राचल 0.05 लीजिए। प्रवाह जिस सबसे बड़े कण को बस चला सकता है उसका व्यास मिलीमीटर में, निकटतम मिलीमीटर तक, कितना है? केवल संख्या लिखिए।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
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उत्तर: 36
तल अपरूपण प्रतिबल τ_b = ρ g h S = 1000 × 9.8 × 1.5 × 0.002 = 29.4 Pa। देहली पर τ* = τ_b ÷ [(ρ_s − ρ) g D] = 0.05, अतः D = 29.4 ÷ (0.05 × 1650 × 9.8) = 29.4 ÷ 808.5 = 0.03636 m = 36.4 mm, जो 36 बनता है। (ρ_s − ρ) के स्थान पर ρ_s लेने से लगभग 23 mm आता है, जो प्रचलित भूल है।समुद्र तक संतुलित परिच्छेदिका प्राप्त कर चुकी एक नदी को समुद्र-तल 20 m गिरने पर अचानक निम्नतर आधार-तल मिलता है। किस प्रतिक्रिया-क्रम की अपेक्षा है?
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उत्तर: A — मुहाने पर निक-बिंदु बनकर ऊपरधारा की ओर खिसकता है, और उसके पीछे की कटाई पुराने बाढ़-मैदान पर वेदिकाएँ छोड़ती है
आधार-तल का गिरना निचले खंड को तीव्र करता है, अतः नदी वहाँ पहले नीचे की ओर काटती है; तीव्र हुआ सोपान निक-बिंदु है जो ऊपरधारा की ओर पीछे हटता है, और पूर्व बाढ़-मैदान में गहरी कटाई वेदिकाएँ छोड़ती है। अवसाद-जमाव आधार-तल के चढ़ने की प्रतिक्रिया है, जो भ्रामक उलटाव है। निक-बिंदु अनुप्रवाह नहीं खिसक सकता क्योंकि विक्षोभ निर्गम से आरंभ होकर नाले में ऊपर की ओर जाता है।मेंडर करती नदियों व बाढ़-मैदानों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
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उत्तर: A — बिंदु-रोधिका मोड़ के भीतर बनती है जहाँ प्रवाह धीमा है, जबकि कटाव-तट बाहर पीछे हटता है जहाँ प्रवाह सबसे तेज़ है; C — गोखुर झील तब बचती है जब अपरदन विसर्प की ग्रीवा को संकरा करता है और नदी उसे सीधे काट देती है
मोड़ का भीतरी भाग धीमा होता है और बिंदु-रोधिका जमाता है, जबकि बाहरी तट सबसे तेज़ प्रवाह से कटता है; ग्रीवा-कटाव पुराने फेरे को गोखुर झील के रूप में अलग कर देता है। तटबंध सबसे स्थूल उफान-निक्षेप हैं, नाले के पास जमे जहाँ बाढ़ की गति पहले घटती है, और महीन कीचड़ पश्च-दलदल में जाता है। गुंफन उच्च तल-भार व तीव्र, अपरदनशील तटों को दर्शाता है; वह चौड़ा, निम्न-वक्रता वाला नाला बनाता है, अति वक्र नहीं।सीमित रेत-आपूर्ति और एक स्थिर पवन-दिशा वाले मरुस्थलीय धरातल पर अलग-अलग अर्धचंद्राकार स्तूप हैं जिनके सींग पवन की दिशा में हैं और जिनके तीव्र स्लिप फ़ेस अवतल पार्श्व पर हैं। ये कौन-से स्तूप हैं?
उत्तर देखें
उत्तर: C — बरखान, जो वहाँ बनते हैं जहाँ रेत कम है और पवन एक दिशा से चलती है
एक दिशा की पवन में कम रेत से बना, सींग पवन की दिशा में वाला अर्धचंद्र बरखान है। परवलयिक स्तूप भ्रामक विकल्प हैं क्योंकि वे भी वक्र हैं, पर उनकी भुजाएँ वनस्पति से जकड़ी पवन के विपरीत पीछे जाती हैं और नासिका पवन की दिशा में बढ़ती है। प्रचुर रेत में बरखान मिलकर अनुप्रस्थ कटक बन जाते हैं।निम्नलिखित में से कौन-सी भू-आकृतियाँ मुख्यतः पवन के निक्षेपण के बजाय पवन के अपरदन से बनती हैं?
उत्तर देखें
उत्तर: A — यारडांग, प्रचलित पवन के समानांतर तराशे गए कोमल चट्टान के धारारेखित कटक; C — अपस्फीति गर्त, उथली द्रोणियाँ जिनसे महीन कण उड़ा दिए गए हैं
यारडांग घर्षण व अपस्फीति से कटते हैं, और अपस्फीति गर्त वे द्रोणियाँ हैं जहाँ से महीन कण हट गए: दोनों अपरदनी हैं। परवलयिक स्तूप व लोएस पवन द्वारा जमा रेत व सिल्ट के संचय हैं, अतः वे निक्षेपणी हैं भले पवन ने उन्हें बनाया हो।थ्रेशोल्ड से काफ़ी ऊपर किसी स्थिर पवन में रेत-फ़्लक्स को अपरूपण-वेग u* के घन के समानुपाती माना जा सकता है। u* के 0.20 m/s से 0.60 m/s होने पर फ़्लक्स कितने गुना बढ़ता है? केवल संख्या लिखिए।
संख्यात्मक उत्तर — मान टाइप करें।
उत्तर देखें
उत्तर: 27
फ़्लक्स-अनुपात = (0.60 ÷ 0.20)³ = 3³ = 27। वेगों का अनुपात सीधे (3) या उसका वर्ग (9) लेना सामान्य भूलें हैं; घन-नियम के कारण ही प्रबल पवनें अधिकांश रेत चलाती हैं।हिमनदीकृत घाटी में आधार-शैल का एक टीला उस ओर चिकना, पॉलिशदार व मंद ढाल वाला है जिधर से बर्फ़ आई, और अनुप्रवाह की ओर तीव्र व खुरदरा है जहाँ संधि-खंड उखाड़े गए हैं। उसके बारे में कौन-सा कथन सही है?
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उत्तर: B — यह रॉश मूतोने है, ऊपरधारा ओर घर्षण व अनुप्रवाह ओर उत्पाटन से बना अपरदनी रूप
आधार-शैल का जो टीला बर्फ़ आने की (ऊपरधारा) ओर घर्षित व मंद ढाल वाला और अनुप्रवाह ओर उत्पाटित व तीव्र है, वह रॉश मूतोने है। ड्रमलिन रूप-रेखा में समान दिखता है, पर वह टिल का ढेर है, आधार-शैल नहीं, और उसका तीव्र, भोथरा सिरा बर्फ़ आने की (ऊपरधारा) ओर है, इस टीले का उलटा। इरैटिक ढोए गए शिलाखंड हैं और केम वर्गीकृत गलित-जल निक्षेप।निम्नलिखित में से कौन-सी भू-आकृतियाँ मुख्यतः हिमनदीय निक्षेपण के बजाय हिमनदीय अपरदन से बनती हैं?
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उत्तर: A — सर्क, घाटी हिमनद के शीर्ष पर आरामकुर्सी-आकार का गर्त; C — लटकती घाटी, गहरी हुई U-आकार द्रोणी के ऊपर ऊँचाई पर छूटी सहायक घाटी
सर्क हिमनद के शीर्ष पर उत्पाटन व घर्षण से खुदता है, और लटकती घाटी मुख्य हिमनद के अपनी सहायक की तुलना में गहरे अपरदन को दर्शाती है: दोनों अपरदनी हैं। एस्कर पिघले जल के अवसाद से बनता है, और केटल हिमनदीय निक्षेपों के भीतर वह अवनमन है जहाँ दबी बर्फ़ पिघली, अतः दोनों निक्षेपण से संबंधित हैं।रेत का एक संकरा कटक एक छोटे चट्टानी द्वीप को मुख्य भूमि के तट से जोड़ता है। इस भू-आकृति को क्या कहते हैं?
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उत्तर: D — टोम्बोलो, वह रोधिका जो द्वीप को मुख्य भूमि से बाँधती है
रेत या बजरी की जो रोधिका द्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ती है, वह टोम्बोलो है। स्पिट भ्रामक विकल्प है क्योंकि वह भी तट पर रेत का कटक है, पर स्पिट केवल एक सिरे से जुड़ी होती है और खुले जल में समाप्त होती है, अतः वह किसी द्वीप से नहीं जुड़ती।एक तट पर चट्टानी अंतरीप और रेतीली खाड़ियाँ एकांतर हैं, और तरंगें खुले समुद्र से आती हैं। तरंग-व्यवहार व उसके परिणाम का कौन-सा वर्णन सही है?
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उत्तर: B — अपवर्तन तरंग-ऊर्जा को अंतरीपों पर केंद्रित और खाड़ियों में बिखेरता है, अतः अंतरीप कटते हैं और खाड़ियों में रेत जुड़ती है
अंतरीप के निकट उथले जल में तरंगें धीमी होकर उसकी ओर मुड़ती हैं, अतः उनकी ऊर्जा वहाँ अभिसरित होती है और अंतरीप कटता है; खाड़ियों में तरंग-अग्र फैलते हैं और कम ऊर्जा में रेत बैठती है। उलटा कथन भ्रामक त्रुटि है। तरंगें तरंग-आधार पर सारी ऊर्जा नहीं खोतीं, क्योंकि वह गहराई केवल यह दर्शाती है कि वे तल का अनुभव करना कहाँ से शुरू करती हैं।दो ज्वालामुखियों की तुलना की गई है। ज्वालामुखी P के चौड़े उत्तल ढाल केवल कुछ अंश के हैं और वह लगभग पूर्णतः पतले बेसाल्टी लावा प्रवाहों से बना है। ज्वालामुखी Q एंडेसाइटी लावा व ज्वालामुखी-खंडाश्म परतों की एकांतर वाला तीव्र अवतल-ऊपरमुखी शंकु है। कौन-सा युग्म उन्हें सही नाम देता है?
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उत्तर: C — P शील्ड ज्वालामुखी है और Q स्ट्रैटोवोल्केनो है
तरल बेसाल्ट दूर तक फैलकर कुछ अंश ढाल वाला चौड़ा शील्ड बनाता है, जबकि श्यान एंडेसाइट व विस्फोटक खंडाश्म परतें तीव्र मिश्रित शंकु बनाती हैं। स्ट्रैटोवोल्केनो व शील्ड का उलटा युग्मन भ्रामक जाल है। सिंडर शंकु छोटा व विश्राम कोण के निकट ढाल वाला तीव्र होता है, और काल्डेरा धँसाव-अवनमन है, संरचना नहीं।कई किलोमीटर चौड़ा एक बड़ा वृत्ताकार अवनमन, जिसकी दीवारें तीव्र हैं, वहाँ स्थित है जहाँ कभी ऊँचा ज्वालामुखी शंकु था। कौन-सी प्रक्रिया इसे सबसे अच्छी तरह समझाती है?
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उत्तर: A — अति विशाल विस्फोटक उद्गार से रिक्त मैग्मा-कक्ष में छत का धँस जाना
काल्डेरा तब बनता है जब मैग्मा की विशाल मात्रा इतनी तेज़ी से उद्गारित होती है कि कक्ष अपनी छत को सँभाल नहीं पाता, जो वलय-भ्रंशों के साथ धँसती है। नदी अपरदन अरीय घाटियाँ काटता है, तीव्र दीवारों वाली चौड़ी वृत्ताकार द्रोणी नहीं बनाता, जो भ्रामक पर गलत विकल्प है। प्रवाह व गुंबद-वृद्धि धनात्मक उच्चावच बनाते हैं, अवनमन नहीं।